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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ
६२८योगवाशिष्ठ ।

की नाईं मत हो। क्योंकि मूढ़जीव सब चेष्टा मिथ्या ही करता है। मिथ्या चेष्टा से जिनकी बुद्धि नष्ट हुई है और अविद्यारूपीधूर्त से बिके हैं उनके तुल्य न होना। यह जगत् अणुमात्र भी कुछ नहीं है। पर बड़ा विस्तार रूपी जो दृष्ट आता है सो निर्णय में देखा है कि मूढ़ता से भासित हुआ है। मूढ़ता परम दुःखरूप है, इससे अधिक दुःख कोई नहीं। आत्मा-रूपी सूर्य के आगे आवरणकर्त्ता जो अज्ञानरूपी मेघ है उसको विवेक-रूपी पवन से नाश करोगे तब आत्मा का साक्षात्कार होगा। आत्म-विचार के अभ्यास और विषयों में वैराग्य बिना आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता। वेदरूप वेदान्तशास्त्र जो दृष्टान्त और तर्कयुक्त हैं उनसे भी अपने विचार बिना साक्षात्कार नहीं होता। आत्मविचार और पुरुषार्थ से आत्मा की प्रसन्नता होती है और बुद्धि की निर्मलता बोध से प्राप्त होती है। इससे संकल्प विकल्प से रहित होकर चैतन्यतत्त्व में स्थित हो जाओ। विस्तृत और व्यापकरूप आत्मतत्त्व की स्थिति मेरे वचनों के ग्रहण करने से सब सङ्कल्प तुम्हारे लीन हो गये हैं संवेदनरूपी भ्रम शान्त हुआ है और संसाररूपी कुहिरा तुम्हारा नष्ट हुआ है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपाख्यानसमाप्तिवर्णन-नामैकोनत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २९ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अब तुम विज्ञान प्राप्ति के निमित्त और क्रम सुनो जैसे दैत्य असुर प्रह्लाद को आत्मा की सिद्धता हुई तैसे तुम भी हो जाओ। पाताल में एक हिरण्यकशिपु दैत्य महाबलिष्ठ हुआ है जिसने इन्द्र आदि भगाये थे और विष्णुजी के सम उसका पराक्रम था। सम्पूर्ण भुवन उसने वशकर छोड़े थे और सब देवता और दैत्यों को वश करके जगत् का कार्य करता था। वह दैत्यों और तीनों भुवनों का ईश्वर हुआ और समय पाकर कई पुत्र उत्पन्न किये—जैसे वसन्त ऋतु अंकुर उत्पन्न करती है। उसके पुत्रों में बड़ा पुत्र प्रह्लाद सबसे अधिक प्रकाश-वान् हुआ और निज पुत्र से हिरण्यकशिपु ऐसा शोभित हुआ जैसे सब सुन्दर लताओं से वसन्तऋतु शोभता है। जैसे प्रलयकाल में सूर्य सब लोकों को तपाता है तैसे ही वह सबको तपाने लगा। जब दुष्ट कीड़ा

उपशम प्रकरण । ६२६

से देवताओं को दैत्य दुःख देने लगे तब सब देवता मिलकर विष्णु की शरण गये और विनती की कि यह हिरण्यकशिपु महादुष्ट है इसका नाश करो और हमारी रक्षा करो। बारम्बार दुःखवाने से महापुरुष भी क्रोधवान् हो जाते हैं । हे रामजी ! जब इस प्रकार देवताओं ने प्रार्थना की तब विष्णुदेव ने कहा अब तुम जाओ में इसके पुत्र के हेतु से मारूँगा । ऐसे कहकर विष्णु भगवान् अन्तर्धान हो गये और हिरण्यकशिपु अपने ऐश्वर्य की शिक्षा प्रह्लाद को देने लगा परन्तु वह ग्रहण न करे और बहुत प्रकार ताड़ना भी दे तो भी उसकी शिक्षा को प्रह्लाद अङ्गीकार न करे । वह ईश्वर विष्णुजी की आराधना में रहता था इस कारण ताड़ना का दुःख प्रह्लाद को कुछ न हो । तब दैत्य अपने हाथ में खङ्ग लेकर कहने लगा कि हे दुष्ट ! तेरा ईश्वर कहाँ है, जिसका तू आराधन करता है । मेरे सिवा ईश्वर और कौन है ? प्रह्लाद ने कहा मेरा ईश्वर सर्वव्यापक है । तब हिरण्यकशिपु ने कहा इस खम्भे में कहाँ है ? जो है तो दिखा दे और यदि न दिखावेगा तो तुझको मारूँगा । तब सर्वव्या-पक विष्णु खम्भे से भासने लगे और बड़े शब्द होने लगे। फिर उस खम्भे को फोड़कर बड़ी भुजा और तीक्ष्ण नखों से संयुक्त महाभयानक-रूप से विष्णु भगवान् ने नरसिंहरूप प्रकट करके हिरण्यकशिपु को नखों से विदारण किया और ऐसा कोपवान् रूप धरा जिसमें दैत्यों के स्थान जलने लगे और दृष्टि से मानों पर्वत चूर्ण होते थे। दैत्यों के कई समूह मारे गये, कई भागे और बहुत से दिशाविदिशा को दौड़ गये-जैसे वायु के मारे मच्छर उड़ जाते हैं और कुछ पाताल छिद्र में नाश हो गये । निदान प्रलयकालवत् स्थान शून्य हो गये मानों अकाल प्रलय आया है और दैत्यों को नाश करके फिर विष्णुदेव अन्तर्धान हो गये । कुछ दैत्य बान्धव और टहलुये जो रहे थे वे प्रह्लाद के निकट मुख कुम्हि-लाये हुए आये-जैसे जल से रहित कमल होता है और भाई, बान्धव मिलकर प्रह्लाद को समझाने लगे । प्रह्लाद ने सबसे मिलकर पिता का शोच किया और फिर उठकर सब कर्म किये । निदान संशयसंयुक्त सब दैत्य बैठे और विचार करके शोकवान् हुए और मद्य सूखकर चित्र की

६३० योगवाशिष्ठ ।

पुतलीवत् हो गये । जैसे दग्धवृक्ष सूखकर रस से रहित हो जाता है तैसे ही हिरण्यकशिपु बिना दैत्य शोकवान् और महादुःखी हुए ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे हिरण्यकशिपुवधोनाम त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब हिरण्यकशिपु के मारने से दैत्य बहुत दुःखी हुए तब प्रह्लाद ने मौन होकर विचारा कि पाताल में सब दैत्य मिलकर चिन्तासंयुक्त बैठे हैं । उनसे जाकर प्रह्लाद ने कहा कि अब अपनी रक्षा के निमित्त कौन उपाय कीजियेगा, हमारे दैत्यों के नाश करनेवाले विष्णु बड़े बली हैं, जिनके नख तीक्ष्ण खङ्ग की धारवत् हैं जैसे सिंह मृगों को मारता है तैसे वे हमको मारते हैं और पाताल में दैत्य शान्तिमान् कदाचित् नहीं होने पाते । जब दैत्य बढ़ते हैं तब विष्णु आ उन्हें नाश करते हैं और जैसे कमलों पर पर्वत आ पड़े तैसे उन्हें चूर्ण करते हैं । बड़े आकाश गौरव शब्द करनेवाले दैत्य उपज उपजकर नष्ट हो जाते हैं—जैसे जल में तरङ्ग उपजकर नष्ट हो जाते हैं । भीतर बाहर वह हमको बड़ा कष्ट देता है । हमारा शत्रु बड़ा दृढ़ और बड़ा अपूर्वतम् आ बढ़ा है, हमारा हृदय तम से पूर्ण हो गया है और सम्पदा नष्ट हो गई है । जो देवता हमारे पिता से चूर्ण हुए थे उनका बल अब हमसे अधिक हो गया है और वे हमारी स्त्रियों को वश कर ले गये हैं—जैसे मृग को व्याध ले जाता है वे हमारा सब धन भी ले गये हैं और हम दीन हो रहे हैं जैसे जल बिना कमल कुम्हिला जाता है तैसे ही हम भी बान्धव बिना हुए हैं । हमारे घरों में धूल उड़ती है, जो बड़े स्थान मणियों से खचित थे वे शून्य हो गये और हमारे स्थानों में जो बड़े कल्पवृक्ष लगे थे वे उखाड़कर नन्दन वन में लगाये हैं । नरसिंह की सहायता से देवताओं ने ऐसा बल पाया है । हमारे वृक्ष और स्थान नरसिंहजी ने जला दिये हैं जिन देवताओं की स्त्रियों के मुख दैत्य देखते थे, उन सब दैत्यों की स्त्रियों के मुख अब देवता देखते हैं । जिस सुमेरु पर्वत पर कल्प और मन्दारवृक्ष विराजते थे वे स्थान अब शून्य हो गये वहाँ धूल उड़ती है और शोभा से रहित हो गया है । जो दैत्यों की स्त्रियाँ अपने

उपशम प्रकरण । ६३१

स्थानों में बैठी थीं वे अब देवाङ्गनाओं के शिर पर चमर करती हैं और वे हास विलास करती हैं. यह बड़ा कष्ट है । हमको आपदा ने दीन किया है । हे दैत्यों ! हमको और उपाय कोई दृष्टि नहीं आता जब उस ही विष्णु की शरण में जावें तब सुखी होंगे वह कैसा पुरुष है, जिसके दो भुजारूपी वृक्षों की छाया में देवता विश्राम करते हैं और जैसे हिमालय पर्वत कदाचित् तपायमान नहीं होता तैसे ही जो पुरुष विष्णु की शरण जाता है वह तपायमान नहीं होता । तुम देखते हो कि जो देवाङ्गना असुरों की स्त्रियों का पूजन करती थीं वे अब अपने को पुजाने लगीं हैं और हम दैत्यों की स्त्रियों के मुख कुम्हिला गये हैं । जैसे बर्फ की वर्षा से कमल सूख जाता है तैसे ही हमारे मण्डप टूट गये हैं और नीलमणि के खम्भे गिर पड़े हैं । दैत्य सेना जो आपदा के समुद्र में डूबती थी उसके रक्षा करने को हमारे पितादि बड़े समर्थ थे और डूबने न देते थे । जैसे क्षीरसमुद्र में मन्दराचल को कच्छपरूप ने डूबने न दिया था हमारे पितादि जो बड़े बड़े बली रक्षा करनेवाले थे उनको विष्णुजी ने मारके चूर्ण किया-प्रलयकाल का पवन पर्वतों को चूर्ण करता है । ऐसे मधुसूदन की गति अति विषम है वे दैत्यों की भुजारूपी दण्ड के काटनेवाले कुठार हैं, उनकी सहायता से इन्द्रादिक देवता दैत्य सेना को जीतने और मारने लगे हैं-जैसे बालक को, वानर मारें । इस पुण्डरीकाक्ष विष्णु को जीतना कठिन है । जो वे शस्त्रों बिना हों तो भी हमारे शस्त्र इनको छेद नहीं सकते और वज्र भी छेद नहीं सकता । वे महापराक्रमी हैं उन्होंने युद्ध का बड़ा अभ्यास किया है और पर्वतों के साथ युद्ध करते रहे हैं । हमारा पिता जो बड़ा बली था और जिसने त्रिलोकी के राजा और सब देवता वश किये थे उसको भी इसने मार डाला तो हमारा मारना कौन कठिन है । यह महाबली है इसको हम नहीं जीत सकते, इसलिये एक उपाय में तुमसे कहता हूँ उससे विष्णु वश होंगे । उपाय यह है कि विष्णु जो सर्वात्मा, सबका प्रकाश और सबका कारण है उसकी हम शरण हों, और हमारी कोई गति आश्रय नहीं । हे दैत्यों ! उसमे अधिक इस त्रिलोकी में कोई नहीं, जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और

६३२ योगवाशिष्ठ ।

प्रत्ययकर्ता वही देवता है। उसके ध्यान में लगो और एक निमेष भी उसके ध्यान से न उतरो। मैं भी उसके ध्यान में लगता हूँ। वह नारायण अजन्मा पुरुष है और में सदा उसके परायण हूँ और सब प्रकार नारायण में हूँ। 'ओंनमोनारायणाय' यह मन्त्र सब अर्थों को सिद्ध करता है इस मंत्र के ध्यान जाप करते हुए हमारे हृदय में स्फुरणरूप होगा। वह हरि सबका आत्मा है, पृथ्वी हरि है, यह सब जगत् भी हरि है, में भी हरि हूँ, आकाश भी हरि है और सबका आत्मा भी हरि है। अविष्णु होकर जो विष्णु का पूजन करते हैं वे पूजने का फल नहीं पाते और जो विष्णु होकर विष्णु का पूजन करते हैं वे परम उत्तम फल पाते हैं। इससे में विष्णुरूप होकर स्थित होता हूँ। में अनन्त आत्मा आकाश गरुड़ पर आरूढ़ हूँ और सुवर्ण के भूषण पहिरे हूँ मेरे हाथरूप वृक्ष पर जीवरूप सब पक्षी विश्राम पाते हैं। यह मेरी चतुर्भुजा है। जब मैंने क्षीरसमुद्र मथन किया था तब यह परस्पर घिसे हैं और यह मेरे पार्षद हैं, सुन्दर चमर जिनके हाथों में हैं इनको मैंने क्षीरसमुद्र में उपजाया है। त्रिलोकीरूप वृक्ष की यह सुन्दर मञ्जरी जो महाधवल मन के हरनेवाली है। यह मेरे पार्षदों में माया है, जिसने अनन्त जगत्जाल निरन्तर उत्पत्ति, प्रलय किया है और इन्द्रजाल की विलासिनी है। यह मेरे पार्षदों में जो शक्ति है इन्होंने लीला करके त्रिलोकीखण्ड वश किया है। जैसे कल्पवृक्ष लता फूलती है तैसे ही मेरे पार्षदों में यह फूलती है शीत उष्ण मेरे दो नेत्र हैं जो सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशते हैं और चन्द्रमा और सूर्य उनके नाम हैं। यह मेरा नीलकमल और महासुन्दर श्याम मेघवत देह महाप्रकाशरूप है। यह मेरे हाथ में पाञ्चजन्य शंख जिसकी स्फुरण-रूप ध्वनि है क्षीरसमुद्र में निकला है। यह नाभिकमल है जिसमें ब्रह्मा उत्पन्न हुए और इसमें निवास करते हैं-जैसे भ्रमर कमल में निवास करता है। यह मेरे हाथ में कौमोदकी गदा है जो सुमेरु के शिखरवत रत्नों की बनी हुई है और दैत्यदानवों के नाश करनेवाली है। यह मेरे हाथों में महाप्रकाशरूप सुदर्शनचक्र है। जिसका तेज ज्वाला के पुञ्जवत है और साधु को सुख देनेवाला है। यह मेरे हाथों में अग्नि के समूह

उपशम प्रकरण । ६३३

वाला कुठार है सो दैत्यरूपी वृक्षों को काटनेवाला है और साधुओं को आनन्ददायक है । यह मेरे हाथ में शार्ङ्गधनुष है, इसकी महाप्रकाशवत् ध्वनि है । यह मेरे पीतवर्ण वस्त्र हैं यह वैजयन्तीमाला है और कौस्तुभमणि मेरे कण्ठ में है । ऐसा मैं विष्णुदेव हूँ । अनन्त जगत् जो उत्पत्ति और लय हो गये हैं सबों का धारनेवाला हूँ । यह पृथ्वी मेरे चरण हैं, आकाश मेरा शीश है तीनों लोक मेरा वपु है, दशोदिशा मेरे वक्षःस्थल हैं और मैं साक्षात् विष्णु हूँ । नीलमेघवत् मेरी कान्ति है, गरुड़ पर आरूढ़, शंख, चक्र, गदा, पद्म का धारनेवाला हूँ । जिसका चित्त दुष्ट है वह हमको देखकर भाग जाता है । यह सुन्दर, शीतल चन्द्रमावत् मेरी कान्ति है और पीतवस्त्र श्यामवदन गदाधारी हूँ । लक्ष्मी मेरे वक्षस्थल में है और अच्युतरूपी विष्णु में हूँ । वह कौन है जो मेरे साथ विरोध कर सके ? मैं त्रिलोकी जला सकता हूँ, जो मेरे साथ युद्ध करने को सम्मुख आवे उसको मैं नाश का कारण हूँ । जैसे अग्नि में पतङ्ग जल मरते हैं तैसे ही मेरा तेज है । मेरी दृष्टि कोई सह नहीं सकता । मैं विष्णु ईश्वर हूँ, ब्रह्मा, इन्द्र और यमादिक नित्य मेरी स्तुति करते हैं और तृणकाष्ठ स्थावर जङ्गम जो कुछ जाल है सबके भीतर व्यापकरूप हूँ । त्रिलोकी में मैं प्रकाशरूप अजन्मा और भयनाशकर्त्ता हूँ । ऐसा मेरे स्वरूप को मेरा नमस्कार है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्णादविज्ञानन्नाम एकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार प्रह्णाद ने अपना नारायण-स्वरूप करके ध्यान किया । फिर पूजन के निमित्त विष्णु का चिन्तन किया और मन में विष्णुजी की दूसरी मूर्ति जो गरुड़ पर आरूढ़ और चार शक्ति—अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से सम्पन्न चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये श्याम रङ्ग है, चन्द्रमा और सूर्य की नाईं सुन्दर नेत्र हैं और हाथ में शार्ङ्गधनुष है, धारण करके परिवारसंयुक्त भली प्रकार धूप दीप और नाना प्रकार के विचित्र वस्त्र और भूषणों सहित पूजन किया और अर्घ दिया । चन्दन का लेपन, धूप, दीप, नाना प्रकार के भूषणों सहित पिस्ता, खजूर, बादाम आदिक मेवों से भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, और

६३४योगवाशिष्ठ ।

लेह्य चार प्रकार के भोजन कराये । फिर अपना आप विष्णु को अर्पण किया और परम भक्ति को प्राप्त हुआ । जिस प्रकार मन से पूजन किया उसी प्रकार अन्तःपुर में विष्णु की मूर्ति देखकर पूजा । इसी प्रकार दिन प्रति दिन विष्णु का पूजन किया और जिस प्रकार प्रह्लाद मन की चिन्तन से पूजा करे उसी प्रकार और दैत्य भी मानसी पूजा करें । उनको प्रह्लाद ने सिखाया और उस पुर में सब दैत्य कल्याण मूर्ति विष्णुभक्त हो गये । जैसा राजा होता है तैसी ही उसकी प्रजा होती है । इसमें कुछ आश्चर्य नहीं । यह वार्ता देवलोक में प्रकट हुई कि दैत्यों ने विष्णु का द्वेष त्याग किया है और भक्त हुए हैं तब देवता आश्चर्य को प्राप्त हुए और इन्द्रादिक अमर गण विचारने लगे कि यह क्या हुआ जो दैत्यों ने विष्णु की भक्ति ग्रहण की और उनको यह प्राप्त कैसे हुई । ऐसे आश्चर्यवान होकर क्षीरसमुद्र में दैत्यों की वार्ता करने के निमित्त वे विष्णु के निकट गये और कहा, हे भगवन् ! यह आपने क्या माया फैलाई कि जो दैत्य सर्वदा विरोध करते थे वे अब तुम्हारे साथ तन्मयरूप हो रहे हैं, कहाँ वह दुर्वृत्ति पर्वत को चूर्ण करनेवाले दैत्य और कहाँ तुम्हारी भक्ति, जो अनेक जन्मों में भी दुर्लभ है । हे जनार्दन ! तुम्हारी भक्ति कहाँ और उनकी वृत्ति कहाँ । यह तो अपूर्व वार्ता हुई है । जैसे समय बिना पुष्पों की माला नहीं शोभती तैसे ही पात्र बिना तुम्हारी भक्ति नहीं शोभती और यह हमको सुखदायक नहीं भासता । जैसा जैसा कोई होता है तैसे ही तैसे स्थान में शोभता है । जैसे काँच में महामणि नहीं शोभती तैसे ही दैत्यों में तुम्हारी भक्ति नहीं शोभती । जैसा गुण किसी में होता है तैसी ही पंक्ति में वह शोभता है और में स्थित हुआ नहीं शोभता है । जो सुदेश नहीं होता सो दुःखदायक होता है । जैसे अङ्गों में वज्र दुःखदायक होता है । जैसा गुणवान हो तैसा पदार्थ जब प्राप्त होता है सो इह शोभा पाता है विपर्यय हो तब शोभा नहीं पाता । जैसे कमलिनी जल में शोभती है मरुस्थल में नहीं शोभती तैसे ही कहाँ वह अधर्म नीचजन भयानक कर्म करनेवाले और कहाँ तुम्हारी आश्चर्य भक्ति । जैसे कमलिनी पृथ्वी पर नहीं शोभती तैसे ही तुम्हारी भक्ति दैत्यों में नहीं

उपशम प्रकरण । ६३५

शोभती और तैसे ही भक्ति हमको उनमें सुखदायक नहीं भासती ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादोपाख्याने विविध- व्यतिरेको नाम द्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार बड़े शब्द से देवता कहने लगे तब माधव आकर बोले, हे देवगण ! तुम शोक मत करो । प्रह्लाद मेरा भक्त है, इसका यह अन्त का जन्म है, और अब मोक्ष को प्राप्त होकर फिर जन्म न पावेगा । हे देवगण ! गुणवान् के गुणों को त्यागकर द्वेष ग्रहण करना अनर्थरूप होता है और जो प्रथम गुणों से रहित निर्गुण हो और उनको त्यागकर गुण ग्रहण करे और शास्त्र मार्ग में विचरे तो यह सुखदायक होता है । प्रह्लाद की विचित्र चेष्टा तुमको सुखदायक होगी । अब तुम अपने स्थानों में जाओ, प्रह्लाद मेरा भक्त है । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर भगवान् क्षीरसमुद्र में अन्तर्धान हो गये देवता नमस्कार करके अपने अपने स्थानों में गये और प्रह्लाद से द्वेष भावना त्याग की । प्रह्लाद दिन प्रतिदिन अपने घर में जनार्दन की मनसा वाचा और कर्मणा से भक्ति करने लगा और समय पाकर दैत्यों में बड़ी भक्ति हो गई । तब उन्हें परम विवेक प्राप्त हुआ और विषय भोग से वैराग्यवान् हुए । वे विषयों से प्रीति न करें, सुन्दर स्त्रियों से न रमें, दृश्य में उनकी प्रीति न उपजे और यह भोग जो रोगरूप है उनमें उनका चित्त विश्राम न पावे और राग भी न करें परन्तु मुक्तकर्त्ता जो आत्मबोध है सो उन्हें प्राप्त न हुआ वे मुक्तफल के निकट आ स्थित हुए और भोगों की अभिलाषा त्यागकर निर्मल हो गये पर परम समाधि को न प्राप्त हुए चित्त अवस्था में डोला-यमान हो रहे । तब श्याममूर्ति विष्णुदेव प्रह्लाद की वृत्ति विचारकर पाताल में उसके गृह पूजा के स्थान में महाप्रकाश सुन्दररूप से प्रकटे और उनको देखकर प्रह्लाद ने विशेष पूजा की और प्रेम से गद्गद हो कहा, हे ईश्वर ! त्रिलोकी में सुन्दरमूर्ति, सबके धारनेवाले, सब कलङ्कों के हरनेवाले, प्रकाशस्वरूप, अशरणों के शरण, अजन्म और अच्युत ! मैं तुम्हारी शरण हूँ । हे नीलोत्पल और कमलों के पर्वत, श्यामरूप, अनेक चरित्रों को धरनेवाले ! मैं तुम्हारी शरण हूँ । हे निर्मलरूप कलेवत्

६३६ योगवाशिष्ठ ।

कोमल अङ्ग और श्वेत कमल की नाईं श्वेत शंख हाथ में धारण किये ! तुम्हारे नाभिकमल में भँवरेरूप ब्रह्मा स्थित हो वेद का उच्चारणरूपी ओऽम् शब्द करते हैं और हृदयकमल में बिराजनेवाले जल के ईश्वररूप ! मैं तुम्हारी शरण हूँ। जिसके श्वेतनख तारागणवत् प्रकाशरूप, हँसता मुख चन्द्रमा के मण्डलवत्, हृदयमणि सबका प्रकाशक और शरत्काल के आकाशवत् निर्मल विस्तृतरूप ! मैं तेरी शरण हूँ । हे त्रिभुवनरूपी कम-लिनियों के प्रकाशनेवाले चन्द्रमा ! मोहरूपी अन्धकार के नाशकर्त्ता, सूर्य, अजड़, चिदात्मा, सम्पूर्ण जगत् के कष्ट हरनेवाले ! मैं तुम्हारी शरण हूँ। हे नूतनविकसितरूप कमलपुष्पों से भूषित अङ्ग और स्वर्णवत् पीताम्बरधारी महासुन्दरस्वरूप ! मैं तेरी शरण हूँ। हे ईश्वर ! लीला करके सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और नाश करनेवाले और परमशक्ति शङ्खवत् दृढ़ देह ! मैं तेरी शरण हूँ। हे दामिनीवत् प्रकाशरूप, सबको संहारकर जल में बालकरूप धर वट के नीचे शयन करनेवाले ! मैं तेरी शरण हूँ। हे देवतारूप कमलों के प्रकाश करनेवाले सूर्यमण्डल, दैत्य पुत्ररूपी कम-लिनियों के तुषाररूपी बर्फ को जलानेवाले और हृदयरूपी कमलों के आश्रयभूत ! मैं तेरी शरण हूँ। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब अनेक गुणों से आठ श्लोक प्रह्लाद ने कहे तब विष्णुजी ने प्रह्लाद से कहा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादाष्टकानन्तरनारायणागमन-नाम त्रयस्त्रिंशतितमस्सर्गः ॥ ३३ ॥

श्रीभगवान्‌जी बोले, हे गुणनिधि, दैत्यकुल के शिरोमणि ! जो तुमको वाञ्छित फल है सो माँगो और जन्मदुःख के शान्ति निमित्त वर माँगो । प्रह्लाद बोले, हे सर्व मङ्गल के फलदायक और सर्वलोकों में व्यापकरूप ! जो वस्तु दुर्लभतर है वह शीघ्र ही मुझसे कहिये और दीजिये। श्रीभगवान्‌जी बोले, हे पुत्र ! सब भ्रम के नाश करनेवाले और परम फलरूप ब्रह्म से विश्रान्ति होती है और वह जिस आत्मविवेक की समता से प्राप्त होती है वही आत्मविवेक तुमको होगा । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार दैत्येन्द्र से कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गये । फिर प्रह्लाद ने पुष्पाञ्जली दी और पूजा करके श्रेष्ठ आसन बिछा उन पर आप पद्मासन धरके बैठा और

उपशम प्रकरण । ६३७

विधिसंयुक्त उत्तम शास्त्रों का पाठ करने लगा । जब पाठ करके निश्चिन्त हुआ तब विचारने लगा कि विष्णु ने मुझसे क्या कहा था, उन्होंने कहा था कि तुझको विवेक होगा । इसलिए संसारसमुद्र तरने के निमित्त शीघ्र ही विचार करूँ । इस संसार आडम्बर में में कौन हूँ जो बोलता हूँ, देह और यह जगत् तो में नहीं, यह तो असत्य उपजा है और जड़रूप पवन से स्फुरणरूप होता है सो में कैसे होऊँ ? यह देह भी में नहीं क्योंकि यह तो क्षण-क्षण में काल से लीन होता है और जड़रूप है । श्रवणरूपी नड़ भी में नहीं, क्योंकि जो शब्द सुनते हैं वह शून्य में उपजा है । त्वचा इन्द्रिय भी में नहीं इसका क्षण-क्षण विनाश स्वभाव है । प्राप्त हुआ अथवा न हुआ, यह इष्ट है, यह अनिष्ट है, इन्द्रियाँ आप जड़ हैं पर इनके जानने-वाला चैतन्यतत्त्व है और चैतन्य के प्रमाद से ये विषय उपलब्ध होते हैं । इस-मे न में त्वचा इन्द्रिय हूँ, और न स्पर्श विषय हूँ, यह जड़ात्मक है यह जो चञ्चलरूपी तुच्छ जिह्वा इन्द्रिय है और जिसके अग्र में अल्प जल अणु स्थित है वही रस ग्रहण करता है, वह रस भी आत्मसत्ता करके लब्धरूप होता है आप जड़ है, इससे यह जड़रूप जिह्वा और रस में नहीं ये जो विनाशरूप नेत्र दृश्य के दर्शन में लीन हैं सो में नहीं और न में इनका विषयरूप हूँ, ये जड़ हैं । यह जो नासिका पृथ्वी का अंश है सो केवल आत्मा के आधार है यह आप जड़ है पर इसका जाननेवाला चैतन्य है, सो न में नासिका हूँ, न गन्ध हूँ, में अहं मम से और मन के मनन से रहित शान्तरूप हूँ और ये पञ्च इन्द्रियाँ मेरे में नहीं में शुद्ध चैतन्यरूप कलना कलंक से और चित्त से रहित चिन्मात्र और सबका प्रकाशक सबके भीतर बाहर व्यापक और निःसंकल्प निर्मल शान्तरूप हूँ । आश्चर्य है अब मुझको अपना स्वरूप स्मरण आता है । प्रकाशरूप चैतन्यअनुभव अद्वैत मेरे अनुभव में स्थित है । सूर्य घट, पटादिक मत्र पदार्थ में प्रकाशता हूँ । जैसे दीपक से उत्तम तेज भासे तैसे ही चैतन्य अनुभव से इन्द्रियों की वृत्ति स्फुरणरूप होती है । जैसे तेज में चिनगारे स्फुरणरूप होते हैं तैसे ही सर्वज्ञ अनुभव सत्ता में मन का मननरूप शक्ति फुरती है । जैसे सूर्य के तेज से मरुस्थल में मृगतृष्णा की नदी फुरती है तैसे ही अनुभव सत्ता

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से पदार्थ भासते हैं जैसे दीपक में शुक्लादि रङ्ग भासते हैं तैसे ही इन पदार्थों में अहं आदिक पदार्थ भासने हैं वह जाग्रद्वत् सब पदार्थों का प्रकाशक है, सबको अनुभव से भासता है और सबके भीतर आत्मभाव से स्थित है। जैसे बीज में अंकुर स्थित होता है तैसे ही चैतन्यरूप दीपक के प्रकाश से विकल्परूपी पदार्थों की शक्ति भासता है। उष्णरूपी सूर्य, शीतलरूपी चन्द्रमा, घनरूपी पर्वत, द्रवरूपी जल है और इसी प्रकार अनुभवसत्ता से सकल पदार्थ प्रकट होते हैं जैसे सूर्य के प्रकाश से घटपटादिक होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र ये सबके कारणरूप जगत में स्थित हैं और इनका कारण अनुभव तत्त्व आदि अन्त से रहित और सब कारणों का कारण है। जैसे बरफ से शीतलता उपजती है तैसे ही अनुभव से जगत् उदय होता है। चित्त, चैत्य, दृश्य, दर्शन कल्पना से रहित प्रकाशरूप सत्ता मेरा आत्मा मुझको नमस्कार है। इसी से सर्वभूत उत्पन्न और स्थित होकर फिर लय होते हैं सो निर्विकल्प चैतन्य सबका आश्रयभूत आत्मा है। जो इस चित्त में अन्तःकरण में कल्पता है वही होता है। आत्मा से रहित सत्य भी असत्य हो जाता है। जो चैतन्य संचित में कल्पितरूप होता है सो ही उलटकर अपने स्वरूप को पाता है और जो चित्तसंवित् में कल्पितरूप नहीं होता वह नहीं भासता है। ये जो घट, पटादि पदार्थों के समूह भासते हैं वे विस्तृतरूप चिदाकाश दर्पण में प्रतिबिम्बित हैं और अनुभवसत्ता सब भूतों का आदर्शरूप है। जिनका चित्त नष्ट हो जाता है उन सन्त पुरुषों को दृढभाव प्राप्त है और वे परम आकाशरूप आत्मा में अभ्यास से तन्मय हो जाते हैं अनुभवसत्ता पदार्थों के वृद्ध होने से वृद्ध नहीं होती और नष्ट होने से नष्ट नहीं होती। पदार्थों के भाव अभाव में सत्ता सामान्य ज्यों का त्यों है जैसे सूर्य के प्रतिबिम्ब में घट सत्य हो अथवा असत्य हो सूर्य ज्यों का त्यों है। संसार रूप नाना प्रकार की विचित्र रचना ऐसे आत्मा में स्थित है जैसे विचित्र गुच्छों के संयुक्त वृक्षों की पंक्ति की विचित्र रचना पर्वत पर स्थित होती है तैसे ही संसाररूप दृश्य नाना प्रकार की मञ्जरी को धरनेवाला आत्म सत्ता का वृक्ष है जितने भूतगण त्रिलोकी उदर में वर्तते हैं वे सब आत्मा

उपशम प्रकरण । ६३६

में अभिन्नरूप है, ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त सबका प्रकाशक आत्मा है । वह अनुभवसत्ता आदि अन्त से रहित है, जिसके सब आकार हैं और स्थावर जङ्गम सब जगत भूत जाति अन्तर अनुभवरूप स्थित है वह एक अनुभव आत्मा में हूँ, द्रष्टा दर्शन दृश्य सर्वरूप आत्मा में हूँ और सहस्रनेत्र सहस्रहस्त मेरे हैं । में ही चिदाकाशरूप हूँ, सूर्य देह से आकाश में विचरता हूँ और पवन देह से बहता वायु वाहन पर आरूढ़ हूँ । में विष्णुरूप शंख, चक्र, गदा, पद्म के धरनेवाला हूँ, सब सौभाग्य देखनेवाला हूँ और सब दैत्यों को भगाता और नाशकर्त्ता में ही हूँ। में नाभिकमल में उत्पन्न हुआ हूँ, पद्मासन से निर्विकल्प समाधि में स्थित-रूप ब्रह्मा हूँ और मनवृत्तिरूप को प्राप्त हुआ हूँ मैंने ही त्रिनेत्र आकार लिया है, गौरी मेरी अर्द्धाङ्गिनी है और सृष्टि के अन्त में सबको में ही संहार करता हूँ जैसे कोई अपने अंगों को संकोच ले तैसे ही मैं संहार करता हूँ । त्रिलोकीरूपी मढ़ी की इन्द्ररूप होकर में पालना करता हूँ और कर्मों के अनुसार जैसा कोई भाव करे तैसा फल देता हूँ । तृणबेलि और गुच्छों में रस होकर में स्थित हूँ में ही उत्पत्तिकर्त्ता और चेतनरूप हूँ और लीला के निमित्त जगत् आडम्बर विस्ताररूप मैंने ही किया है, जैसे मृत्तिका के खिलौने बालक रच लेता है । मेरे में सब कर्म अर्पण करने से सब शान्ति प्राप्त होती है और मुझसे रहित कुछ वस्तु नहीं, मैं सत्तास्वरूप आदर्श हूँ, सब पदार्थ मेरे में प्रतिबिम्बित होते हैं, तब यह असत्यरूप भी सत्यता को प्राप्त होता है-इससे मुझसे भिन्न कुछ नहीं पुष्पों में सुगन्ध, पत्रों में सुन्दरता, पुरुषों में अनुभव और स्थावर जङ्गमरूप जो जगत् दृष्ट आता है वह सब में हूँ । में सब संकल्प से रहित परम चैतन्य हूँ और अहं त्वं आदिक से परे हूँ, जल में रसशक्ति, अग्नि में उष्णता और बरफ में शीतलता में ही हूँ । जैसे काष्ठ में अग्नि है तैसे ही सबमें स्थित हूँ, सब पदार्थों में में परमात्मा व्यापक हूँ और सबको अपनी इच्छा से उप-जाता हूँ । जैसे दूध में घृतशक्ति, जल में रसशक्ति और सूर्य में प्रकाश-शक्ति है तैसे ही में चैतन्यस्वरूप सब पदार्थों में स्थित हूँ । त्रिकाल का जगत सब मेरे में स्थित है और में चित्त के उपचार, फुरने से रहित शुद्ध-

६४० योगवाशिष्ठ ।

स्वरूप और सबका भरण और पोषण करनेवाला और वैराट्‌राज होकर स्थित भया हूँ । त्रिलोकी का राज्य मुझको अपूर्व प्राप्त हुआ है जो शास्त्रो और देवों के दल बिना निर्जित विस्तृत है । बड़ा आश्चर्य है कि में इतना बड़ा विस्तृतरूप हूँ और अपने आपमें नहीं समाता, जैसे कल्पान्तर के वायु से उछला समुद्र आपमें नहीं समाता । में अनन्तरूप आत्मा अपनी इच्छा से आप प्रकाशता हूँ । जैसे क्षीरसमुद्र अपनी उज्ज्वलता से शोभता है तैसे ही में भी अपने आपसे शोभता हूँ । यह जगतरूपी मटकी महाअल्परूप है—जैसे बिल में हाथी नहीं समाता तैसे ही में अपने आपमें विस्तृतरूप से जगत् में नहीं समाता । में कोटि ब्रह्माण्ड में व्यापक हूँ और ब्रह्मलोक से परे जो तत्त्वों का अन्त आता है उसके भी परे में अनन्तरूप हूँ । यह में हूँ, यह में नहीं, यह निर्बलता मेरे तुच्छ रूप है । में तो आदि अन्त से रहित चैतन्य आकाश हूँ और परे से परिच्छिन्नता मिथ्या भासती थी में, तू, यह, वह आदिक मिथ्या भ्रम है । देह क्या, पर क्या और अपर क्या, में तो सर्वव्यापक चैतन्यतत्त्व हूँ । मेरे पितामह बड़े नीचबुद्धि थे जो ऐसे ऐश्वर्य को त्यागकर तुच्छ ऐश्वर्य में स्वेचित हुए थे । कहाँ यह महादृष्टि सर्व का कर्ता ब्रह्मवपु और कहाँ वह संसारश्रम का राजा अनित्यरूप सुख भोग दुःखदायक । अनन्त सुख, परम उपशम स्वभाव, शुद्ध चैतन्य दृष्टि अब मेरे में हुई है । सब भाव पदार्थों में चेत्य से रहित में चैतन्य आत्मा स्थित हूँ । अब मुझको नमस्कार है, क्योंकि मेरी जय हुई है और जीर्णरूप संसारश्रम से निकला हूँ । इसमें मेरी जीत हुई है पाने योग्य आत्मपद पाया है और जीवन सार्थक हुआ है । ऐसा उत्तम समराज चक्रवर्ती में भी नहीं मिलना । ये जीव निरन्तर बोध को त्यागकर दुःखरूपी कार्यों में रमते हैं । काष्ठ जल और मृत्तिका से संयुक्त जो पृथ्वी है उसको पाकर जो भुलायमान हुए हैं उनको धिक्कार है, वे कीट हैं । यह द्रव्य ऐश्वर्य अविद्यारूप है, अविद्या से उपजते हैं और अविद्यारूप इनका बढ़ना है । इनमें क्या गुण है जिस निमित्त यत्न करते हैं । इस जगतरूपी मट्टी में कई वर्ष हिरण्यकशिपु ने राजसुख भोगा परन्तु उपशम जो शान्तिरूप है उसको न प्राप्त हुआ । उसने एक जगत

उपशम प्रकरण । ६४१

का राज किया है परन्तु सौ जगतों का राजसुख हो तो भी अनास्वाद है इससे वह जो समतारूप आत्मानन्द है सो नहीं प्राप्त होता । जब उस आत्मानन्द के स्वाद का यत्न हो तब प्राप्त हो, अन्यथा नहीं होता । जिस पुरुष को बड़े ऐश्वर्य और इन्द्रियों के सुख प्राप्त हुए हैं पर समता-सुख से रहित है सो जानिये कि उसको कुछ ऐश्वर्य और सुख नहीं मिला और जिनको कुछ ऐश्वर्य और सुख नहीं प्राप्त हुआ पर समता सुख संयुक्त हैं उनको सब कुछ प्राप्त हुआ जानिये । वे परम अमृत से संपन्न हैं और अखण्डित सुख जो आत्मा है उस परमसुख को प्राप्त हुए हैं और आनन्दरूप हैं । जो अखण्ड पद को त्यागकर परिच्छिन्नता को प्राप्त है वह मूढ़ है और जो पण्डित और ज्ञानवान् है वह परिच्छिन्नता में प्रीति नहीं करता । जैसे ऊँट दूसरे पदार्थों को त्यागकर कण्टकों के पास धावता है और दूसरा पशु नहीं जाता तैसे ही मूढ़ बिना ऐसे कौन हैं जो आत्म-सुख को त्यागकर जले हुए राजसुख मेंरमै और अमृत को त्यागकर नीम का पान करे । मेरे पितामह और जो बड़े सब मूढ़ हुए हैं वे इस परम अमृतरूप दृष्टि को त्यागकर राजकण्टक में प्रीतिमान् हुए हैं । कहाँ फल फलादिक से संयुक्त नन्दनवन की भूमिका और कहाँ जले हुए मरुस्थल की भूमिका । तैसे ही कहाँ यह शान्तरूप बोधदृष्टि और कहाँ भोगों में आत्मबुद्धि । इससे ऐसा पदार्थ त्रिलोकी में कोई नहीं जिसकी में इच्छा करूँ । सब चैतन्यस्वरूप है और अनुभव कर्त्ता चैतन्यतत्त्व स्वच्छसम भाव और निर्विकार, सर्वदा, सर्व में सर्व और स्थित है । यह जैसे है तैसे पाया जाता है-ज्ञानवान् को प्रत्यक्ष है । सूर्य में प्रकाश चन्द्रमा में अमृत स्रवन, ब्रह्मा में महत्, इन्द्र में त्रिलोकपालन, विष्णुजी में सब ओर से पूर्ण लक्ष्मीशक्ति है, शीघ्र मननकर्त्ता शक्ति मन की है, बलवान शक्ति पवन में, दाहक अग्नि में, रसशक्ति जल में है और मौन से महातम की सिद्धता शक्ति और बृहस्पति में विद्या, देवताओं में विमानों पर आरूढ़ होकर आकाशमार्ग गमन करने की शक्ति है । पर्वतों में स्थिरता, वसन्त ऋतु में पुष्प, सब काल मेघों की शान्तशक्ति, यज्ञों में ममत्वशक्ति, आकाश में निर्लेपता, वरफ में शीतलता, ज्येष्ठ आषाढ़ में तपता इत्यादि देश,

६४२ | योगवाशिष्ठ ।

काल, क्रियारूप नाना प्रकार के आकार विकार जो त्रिकाल के उदर में स्थित हैं सो सर्वशक्ति, स्वच्छ, निर्विकार कल्पनारूप कलङ्क से रहित चैतन्य की है सो इस प्रकार हो भासती है और वही आत्मतत्व सब पदार्थ जाति में व्यापक हुआ है । जैसे सूर्य का प्रकाश सब ओर से समान उदय होता है तैसे ही वह सर्व देश पदार्थों का भण्डार और सर्व का आश्रयभूत है, त्रिकाल उसी में कल्पितरूप होते हैं । जैसे अनुभव उसमें होता तैसा ही तत्काल ही भासता है । जैसे जैसे चैतन्यतत्त्व में देश, काल और क्रिया द्रव्य का फुरना होता है तैसा ही तैसा भासता है । आत्मा में त्रिकालों की सम प्रतिभा फुरी है, उसमें फिर अनन्तकाल की प्रतिभा हुई है और शुद्ध चैतन्यतत्त्व सर्व ओर से पूर्ण है । त्रैकालिक दृश्यसंयुक्त भासता है तो भी चैतन्यतत्त्व शेष रहता है और इसी को त्रिकाल का ज्ञान होता है । मधुर, कटुक आदिक भिन्न भिन्न रसों में एक समता भासती है । जैसे मधुरता पान करनेवाले जीवों को मधुरता भासती है और को नहीं भासती तैसे ही जो संकल्पकल्पना है सबको भोगता है । सूक्ष्म चैतन्यसत्तास्वरूप सब पदार्थों का अधिष्ठान है उससे अनागत होकर द्वैत जगत् भासता है और नाना प्रकार की जो पदार्थ लक्ष्मी है वह अत्यन्त दुःख को प्राप्त करती है । जब त्रिकाल का अनुभव होता है तब सबही सम भासता है । भाव पदार्थों में जो पदार्थ हैं वे ईश्वर के हैं, उन भाव पदार्थों को त्याग-कर भाव की भावना करने से दुःख सब नष्ट हो जाते हैं और संतुष्टता प्राप्त होती है इससे त्रिकाल को मत देखो, यह बन्धनरूप है । त्रिकाल से रहित जो चैतन्यतत्त्व है उसके देखने से विभाग कल्पना काल का अभाव हो जाता है और एक सम आत्मा शेष रहता है जिसको वाणी वश कर नहीं सकती और जो अमन्द की नाईं निरन्तर स्थिर है उसकी प्राप्ति होती है । अनामयसिद्धान्त शून्यता की नाईं स्थित होता है निष्किञ्चन आत्माब्रह्म होता है अथवा सर्वरूप परम उपशम में लीन होता है और जिसका अन्तः-करण मलीन है और संकल्प में स्थित है उसको ज्यों का त्यों नहीं भासता--जगत् भासता है और जिसकी इच्छा नष्ट हुई है और परमपद का अभ्यास करता है उसको आत्मतत्त्व भासता है जो किसी जगत् के पदार्थ की वाञ्छा

उपशम प्रकरण । ६४३

करता है और हेयोपादेय फांसी में बांधा है वह परमपद नहीं पा सकता जैसे पेट में बांधा पर्त्ता आकाशमार्ग में नहीं उड़ सकता। जो पुरुष सङ्कल्प कल्पना संयुक्त है वह मोहरूपी जाल में गिर पड़ता है—जैसे नेत्रों बिना मनुष्य गिर पड़ता है। सङ्कल्प कल्पनाजाल में जिनका चित्त वेष्टित है वह विषयरूपीगढ़े में गिरा है और अच्युतपदवी को प्राप्त नहीं होता । अरे पितामह कई दिन पृथ्वी में फुर-फुर के लीन हो गये हैं वे बालकवत् नीच थे, जैसे गढ़े में मच्छर लीन हो जाते हैं तैसे ही अज्ञान से वे परमतत्त्व को न जानते थे। भोगों की वाञ्छा जो दुःखरूप है अज्ञानी करते हैं और उनसे भाव अभावरूप गड्ढे और अन्धकूप में नष्ट होते हैं। और इच्छा और द्वेष से जो उठा है उसके बन्धायमान हुए हैं। जैसे पृथ्वी में कीट मग्न होते हैं वे जीव उनके तुल्य हैं और जिनकी मृगतृष्णारूप जगत् के पदार्थों में ग्रहण त्याग की बुद्धि शान्त हुई है वे पुरुष जीते हैं, और सब नीच मृतक रूप हैं कहाँ निर्मल और अविच्छिन्नरूप, चैतन्यचन्द्रमावत् शीतलता और कहाँ उष्ण-काल कलङ्क संयुक्त चित्त की आस्था । अब मेरे आत्मा को नमस्कार है जो अविच्छिन्न प्रकाशता है और प्रकाश और तम दोनों का प्रकाशरूप है। हे चिदात्मा देव ! मुझको तू चिरकाल में प्राप्त होकर परमानन्द हुआ है जो विकल्परूपी समुद्र से मेरा उद्धार किया है। जो तू है, वह में हूँ और जो में हूँ सो तू है तुझको नमस्कार है। सङ्कल्प विकल्प कल्पना के नष्ट हुए अनन्तशिव आत्मतत्त्व का चन्द्रमा सदा निर्मल और उदितरूप है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादोपदेशो नाम चतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३४ ॥

प्रह्लाद बोले, कि जिनका नाम 'ॐ' है वह विकार से रहित ब्रह्म में हूँ । जो कुछ जगत् है वह सब आत्मस्वरूप, सत्य-असत्य से अतीत, चैतन्यस्वरूप और सब जीवों के भीतर है। सूर्यादिक में प्रकाश वही है, अग्नि आदिक को उष्णकर्ता वही है और चन्द्रमा में शीतकर्ता वही है । अमृत का स्रवना आत्मा में ही है और इन्द्रियों के भोगों का भोक्ता अनुभवरूप वही है । राजा की नाईं खड़ा बैठा हूँ तो में कभी नहीं बैठा और चलता हूँ तो कभी नहीं चलता और न व्यवहार करता हूँ। मैं सदा

६४४ योगवाशिष्ठ ।

शान्तरूप कर्त्ता हूँ, किसी में लिपायमान नहीं होता । त्रिकालों में समरूप हूँ और सर्वदा सर्व अवस्था में पदार्थों के उपजने और मिटने में सदा ज्यों का त्यों हूँ। ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त सब जगत् में आत्मतत्त्व स्थित है पवन जो स्पन्दरूप है उसमें भी में अतिसूक्ष्म स्पन्दरूप हूँ, पर्वत स्थान जो अचल पदार्थ है उनसे भी मैं अचल हूँ, आकाश से भी अति निर्लेप हूँ। मन को भी आत्मा चलाता है-जैसे पत्रों को पवन चलाता है और इन्द्रियों को आत्मा फेरता है-जैसे घोड़े को सवार चलाता है । समर्थ चक्रवर्ती राजा की नाईं मैं भोग भोगता हूँ और अपने ऐश्वर्य से आप शोभता हूँ। संसारसमुद्र में जरामरणरूपी जल के पार करनेवाला आत्मा है। यह सबसे सुलभ है और अपने आपसे जाना जाता है और बान्धव की नाईं प्राप्त होता है। आत्मा शरीररूपी कमलों के छिद्रों का भँवरा है और बिना खेंचे बुलाये सुलभ आ प्राप्त होता है। जो कोई अल्प भी उसको बुलाता है तो उसी क्षण वह उसके सम्मुख होता है इसमें कोई संशय और विकल्प नहीं । वह निष्कलंक और परम संपदावान् है और सदा स्वस्थरूप है । रसदायक पदार्थों में जैसे रस स्वाद है, पुष्पों में सुगन्ध और तिलों में तेल है तैसे ही वह देव परमात्मा देहों में स्थित है तो भी अविचार के वश से नहीं जाना जाता, जैसे चिरकाल उपरान्त आया बान्धव अपने आगे आन स्थित हो तो भी उसको नहीं पहिचाना जाता । जब विचार उदय होता है तब आत्मा परमेश्वर को जान लेता है। जैसे किसी प्रियतम बान्धव के पाने से आनन्द उदय होता है तैसे ही आत्मदेव के साक्षात्कार से परम-आनन्द उदय होता है और सब बान्धवपन नष्ट हो जाता, जितनी कुछ दुष्ट चेष्टा है उसका अभाव हो जाता है, सब ओर से बन्धन फाँस टूट जाती है, सब शत्रु क्षय हो जाते हैं और आशा चिर नहीं फुरती-जैसे पर्वत को चूहा तोड़ नहीं सकता । ऐसे देव के देखे से सब कुछ देखना होता है और सुने से सब कुछ सुनना होता है, उसके स्पर्श किये से सब जगत् का स्पर्श होता है और उसकी स्थित से सर्वजगत् स्थित भासता है। यह जो जाग्रत है सो संसार की ओर से स्वप्न है, उसी जाग्रत से

उपशम प्रकरण । ६४५

अज्ञान नष्ट हो जाता है और जितनी आपदाएँ हैं उनका कष्ट दूर हो जाता है। आत्मा के प्राप्त हुए आत्मामय हो जाता है और वह विस्तृतरूप आत्मा दीपकवत् साक्षीभूत होता है। जगत् की स्थिति में भोगों से राग उठा है, सब ओर से आत्मतत्त्व का प्रकाश भासता है और भीतर शान्त-रूप सबको अनुभव करनेवाला सब देहों में मैं स्थित हूँ। जैसे मिरचों में तीक्ष्णता स्थित है तैसे ही सब जगत् के भीतर बाहर मैं व्याप रहा हूँ। जो कुछ जगत् के पदार्थ भासते हैं उन सब में ईश्वररूप सत्ता सामान्य स्थित है, आकाश में शून्यता, वायु में स्पन्दता, तेज में प्रकाश, जल में रस, पृथ्वी में कठोरता, चन्द्रमा में शीतलतारूप वही है और सब जगत् में अनुस्यूत एक आत्मतत्त्व ही व्याप रहा है । जैसे बरफ में श्वेत, और पुष्पों में गन्ध है तैसे ही सब देहों में आत्मा व्यापक है । जैसे सर्वगत काल है और सर्वव्यापक आकाश है तैसे ही सब जगत् में आत्मा व्यापक है। जैसे राजा की प्रभुता सबमें होती है तैसे ही मुझसे भिन्न और कोई कलना नहीं है जैसे धूलि को पकड़ के आकाश को स्पर्श नहीं कर सकते, कमलों को जल स्पर्श नहीं करता और पाषाण को स्फुरणरूप स्पर्श नहीं करता तैसे ही मेरे साथ किसी का सम्बन्ध नहीं स्पर्श करता । सुख दुःख का सम्बन्ध देह को होता है यदि देह चिरकाल रहे अथवा अब ही नष्ट हो तो मुझको लाभ हानि कुछ नहीं जैसे दीपक की प्रभा रज्जु में नहीं बाँधी जाती तैसे ही आत्मा किसी से बाँधा नहीं जाता, सब पदार्थों के ग्रहण में अबन्धरूप है । जैसे आकाश किसी में बाँधा नहीं जाता और मन किसी से रोका नहीं जाता तैसे ही परमात्मा को देह इन्द्रिय का सम्बन्ध वास्तव में नहीं होता । यदि शरीर के टुकड़े हो जावें तो भी आत्मा का नाश नहीं होता—जैसे घट फूटे से दूध आदिक पदार्थ नहीं रहता परन्तु आकाश कहीं नहीं जाता वह ज्यों का त्यों ही रहता है तैसे ही देह के नाश हुए प्राणकला निकल जाती है आत्मा का कुछ नाश नहीं होता और पिशाच की नाईं उदय होकर भासता है। जिसका नाम मन है उस मन से जगत् भासित हुआ है और उसी में जड़ शरीर के नाश का निश्चय हुआ है हमारा क्या नाश होता है ? जिसके

६४६ योगवाशिष्ठ ।

मन में दुःख सुख की वासना नाश होती है सो भोगों से निवृत्त होकर सुख सम्पन्न होता है और ग्रहण करते भोगते अज्ञानी दुःख पाते हैं । यह बड़ा आश्चर्य है कि आत्मा के अज्ञान से मूढ़ दुःख पाता है । अब मैंने आत्मतत्त्व देखा है, उससे मेरा भ्रम शान्त हो गया है और कुछ भी किसी से मुझको क्षोभ नहीं अब मुझे न कुछ भोगों के ग्रहण करने की इच्छा है और न त्याग की वाञ्छा है, जो जावे सो जावे और जो प्राप्त हो सो हो, न मुझको देहादि के सुख की अपेक्षा है, न दुःख के निवृत्त की अपेक्षा है सुख दुःख आवे और जावे में एकरस चिदानन्दस्वरूप हूँ जिस देह में वासना करने से नाना प्रकार की वासना उपजती है वह देहभ्रम मेरा नष्ट हो गया है वह वासना नहीं फुरती । इतने कालपर्यन्त मुझको अज्ञानरूपी शत्रु ने नाश किया था अब मैंने आपको जाना है और अब इसको मैं चूर्ण करता हूँ । इस शरीररूपी वृक्ष में अहङ्काररूपी पिशाच था सो मैंने परमबोधरूपी मन्त्र से दूर किया है इससे पवित्र हुआ हूँ और प्रफुल्लित वृक्षवत् शोभता हूँ । मोहरूपी दृष्टि मेरी शान्ति हुई है, दुःख सब नष्ट हुए हैं और विवेकरूपी धन मुझको प्राप्त हुआ है । अब मैं परम ईश्वररूप होकर स्थित हुआ हूँ । जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना है और जो कुछ देखने योग्य था वह देखा है । अब मैं उस पद को प्राप्त हुआ हूँ जिसके पाने से कुछ पाने योग्य नहीं रहता । अब मैंने आत्म-तत्त्व को देखा है, विपद्रूपी सर्प मुझको त्याग गया है, मोहरूपी कुहिग नष्ट हो गया है इच्छारूपी मृगतृष्णा शान्त हो गई और रागद्वेषरूपी धूलि से रहित सब ओर से निर्मल हुआ हूँ । अब में उपशमरूपी वृक्ष से शीतल हुआ हूँ और सब ओर से समतारूप को प्राप्त हुआ हूँ । जब मैंने सबसे उचित परमात्मा देव को ज्ञान और विचार से पाया है और प्रकट देखा है । अधोगति का कारण जो अहङ्कार है उसको मैंने दूर से त्याग दिया है और अपना स्वभावरूप जो आत्मभगवान् सनातन ब्रह्म है जो अहङ्कार के वश विस्मरण हुआ था उसे अब निरखाल करके देखा है । इन्द्रियरूपी गड्ढे में में गिरा था । और रागद्वेषरूपी सर्प से दुःख पाकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था । मृत्यु की भूमिका टोये विना तृष्णारूपी

उपशम प्रकरण । ६४७

करंजुये की कुञ्जों में मैं भ्रमता रहा जहाँ कामरूपी कोयल के शब्द होते थे और जन्मरूपी कूप में दुःख पाता था । सुख पाने की आशा में हुया; वासनारूपी जाल में फँसा, दुःखरूपी दावाग्नि में जला और आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ मैं कई बार जन्ममरण को प्राप्त हुआ था, क्योंकि अहंकार के वश हुए जन्म मृत्यु को प्राप्त होता है—जैसे रात्रि में पिशाच दिखाई दे और अधीरता को प्राप्त करे तैसे ही मुझको अहंकार ने किया था सो अब परमात्मारूप की मुझको तुमने प्रेरणा की है और अपनी शक्ति विष्णुरूप धारकर विवेक उपदेश किया और जगाया है । हे देव, ईश्वर ! तुम्हारे बोध से अहंकाररूपी राक्षस नष्ट हुआ है । हे विभो ! अब में उसको नहीं देखता जैसे दीपक में तम नहीं भासता । अहंकाररूपी जो यक्ष था और मन में जो वासना थी वह सब नष्ट हुई है । अब में नहीं जानता कि वे कहाँ गये—जैसे दीपक निर्वाण होता है तब नहीं जाना जाता कि प्रकाश कहाँ गया । हे ईश्वर ! तुम्हारे दर्शन से मेरा अहंभाव नष्ट हुआ है । जैसे सूर्य के उदय हुए चोरभय मिट जाता है तैसे ही देहरूपी रात्रि में अहंकाररूपी पिशाच उठा था वह अब नष्ट हुआ है । और अब मैं परम-स्वस्थ हुआ हूँ । जैसे वानरों से रहित वृक्ष स्वस्थ होता है तैसे ही मैं परम निर्वाण को प्राप्त हुआ हूँ । अब मैं सम और शान्त बोध में जागा हूँ और चिरपर्यन्त चोरों से जो घिरा था सो अब छूटा हूँ । अब मेरा हृदय शीतल हुआ है और आशारूपी मृगतृष्णा शान्त हो गई है । जैसे जल से पर्वत की तप्तता मिटे और वर्षा से शीतलता को प्राप्त हो तैसे ही विवेकरूपी विचार से अहंकाररूपी तप्तता दूर हो गई है । अब मोह कहाँ और दुःख कहाँ, आशारूपी स्वर्ग कहाँ और नरक कहाँ, बन्ध कहाँ और मुक्त कहाँ । अहंकार के होने से पदार्थ भासते हैं, अहंकार के गये इनका अभाव हो जाता है । जैसे मूर्ति दीवार पर लिखी जाती है आकाश पर नहीं लिखी जाती तैसे ही अहंकार संयुक्त जो चेतन है वह नहीं शोभता अहंकार से ही सुख दुःखादिक का पात्र होता है । जैसे मलीन वस्त्र पर केशर का रङ्ग नहीं शोभता तैसे ही उसमें ज्ञान नहीं शोभता जब अहं-काररूपी मेघ का अभाव हो तब तृष्णारूपी कुहिरा भी नहीं रहता और