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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

उपशम प्रकरण । ६३६

में अभिन्नरूप है, ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त सबका प्रकाशक आत्मा है । वह अनुभवसत्ता आदि अन्त से रहित है, जिसके सब आकार हैं और स्थावर जङ्गम सब जगत भूत जाति अन्तर अनुभवरूप स्थित है वह एक अनुभव आत्मा में हूँ, द्रष्टा दर्शन दृश्य सर्वरूप आत्मा में हूँ और सहस्रनेत्र सहस्रहस्त मेरे हैं । में ही चिदाकाशरूप हूँ, सूर्य देह से आकाश में विचरता हूँ और पवन देह से बहता वायु वाहन पर आरूढ़ हूँ । में विष्णुरूप शंख, चक्र, गदा, पद्म के धरनेवाला हूँ, सब सौभाग्य देखनेवाला हूँ और सब दैत्यों को भगाता और नाशकर्त्ता में ही हूँ। में नाभिकमल में उत्पन्न हुआ हूँ, पद्मासन से निर्विकल्प समाधि में स्थित-रूप ब्रह्मा हूँ और मनवृत्तिरूप को प्राप्त हुआ हूँ मैंने ही त्रिनेत्र आकार लिया है, गौरी मेरी अर्द्धाङ्गिनी है और सृष्टि के अन्त में सबको में ही संहार करता हूँ जैसे कोई अपने अंगों को संकोच ले तैसे ही मैं संहार करता हूँ । त्रिलोकीरूपी मढ़ी की इन्द्ररूप होकर में पालना करता हूँ और कर्मों के अनुसार जैसा कोई भाव करे तैसा फल देता हूँ । तृणबेलि और गुच्छों में रस होकर में स्थित हूँ में ही उत्पत्तिकर्त्ता और चेतनरूप हूँ और लीला के निमित्त जगत् आडम्बर विस्ताररूप मैंने ही किया है, जैसे मृत्तिका के खिलौने बालक रच लेता है । मेरे में सब कर्म अर्पण करने से सब शान्ति प्राप्त होती है और मुझसे रहित कुछ वस्तु नहीं, मैं सत्तास्वरूप आदर्श हूँ, सब पदार्थ मेरे में प्रतिबिम्बित होते हैं, तब यह असत्यरूप भी सत्यता को प्राप्त होता है-इससे मुझसे भिन्न कुछ नहीं पुष्पों में सुगन्ध, पत्रों में सुन्दरता, पुरुषों में अनुभव और स्थावर जङ्गमरूप जो जगत् दृष्ट आता है वह सब में हूँ । में सब संकल्प से रहित परम चैतन्य हूँ और अहं त्वं आदिक से परे हूँ, जल में रसशक्ति, अग्नि में उष्णता और बरफ में शीतलता में ही हूँ । जैसे काष्ठ में अग्नि है तैसे ही सबमें स्थित हूँ, सब पदार्थों में में परमात्मा व्यापक हूँ और सबको अपनी इच्छा से उप-जाता हूँ । जैसे दूध में घृतशक्ति, जल में रसशक्ति और सूर्य में प्रकाश-शक्ति है तैसे ही में चैतन्यस्वरूप सब पदार्थों में स्थित हूँ । त्रिकाल का जगत सब मेरे में स्थित है और में चित्त के उपचार, फुरने से रहित शुद्ध-

६४० योगवाशिष्ठ ।

स्वरूप और सबका भरण और पोषण करनेवाला और वैराट्‌राज होकर स्थित भया हूँ । त्रिलोकी का राज्य मुझको अपूर्व प्राप्त हुआ है जो शास्त्रो और देवों के दल बिना निर्जित विस्तृत है । बड़ा आश्चर्य है कि में इतना बड़ा विस्तृतरूप हूँ और अपने आपमें नहीं समाता, जैसे कल्पान्तर के वायु से उछला समुद्र आपमें नहीं समाता । में अनन्तरूप आत्मा अपनी इच्छा से आप प्रकाशता हूँ । जैसे क्षीरसमुद्र अपनी उज्ज्वलता से शोभता है तैसे ही में भी अपने आपसे शोभता हूँ । यह जगतरूपी मटकी महाअल्परूप है—जैसे बिल में हाथी नहीं समाता तैसे ही में अपने आपमें विस्तृतरूप से जगत् में नहीं समाता । में कोटि ब्रह्माण्ड में व्यापक हूँ और ब्रह्मलोक से परे जो तत्त्वों का अन्त आता है उसके भी परे में अनन्तरूप हूँ । यह में हूँ, यह में नहीं, यह निर्बलता मेरे तुच्छ रूप है । में तो आदि अन्त से रहित चैतन्य आकाश हूँ और परे से परिच्छिन्नता मिथ्या भासती थी में, तू, यह, वह आदिक मिथ्या भ्रम है । देह क्या, पर क्या और अपर क्या, में तो सर्वव्यापक चैतन्यतत्त्व हूँ । मेरे पितामह बड़े नीचबुद्धि थे जो ऐसे ऐश्वर्य को त्यागकर तुच्छ ऐश्वर्य में स्वेचित हुए थे । कहाँ यह महादृष्टि सर्व का कर्ता ब्रह्मवपु और कहाँ वह संसारश्रम का राजा अनित्यरूप सुख भोग दुःखदायक । अनन्त सुख, परम उपशम स्वभाव, शुद्ध चैतन्य दृष्टि अब मेरे में हुई है । सब भाव पदार्थों में चेत्य से रहित में चैतन्य आत्मा स्थित हूँ । अब मुझको नमस्कार है, क्योंकि मेरी जय हुई है और जीर्णरूप संसारश्रम से निकला हूँ । इसमें मेरी जीत हुई है पाने योग्य आत्मपद पाया है और जीवन सार्थक हुआ है । ऐसा उत्तम समराज चक्रवर्ती में भी नहीं मिलना । ये जीव निरन्तर बोध को त्यागकर दुःखरूपी कार्यों में रमते हैं । काष्ठ जल और मृत्तिका से संयुक्त जो पृथ्वी है उसको पाकर जो भुलायमान हुए हैं उनको धिक्कार है, वे कीट हैं । यह द्रव्य ऐश्वर्य अविद्यारूप है, अविद्या से उपजते हैं और अविद्यारूप इनका बढ़ना है । इनमें क्या गुण है जिस निमित्त यत्न करते हैं । इस जगतरूपी मट्टी में कई वर्ष हिरण्यकशिपु ने राजसुख भोगा परन्तु उपशम जो शान्तिरूप है उसको न प्राप्त हुआ । उसने एक जगत

उपशम प्रकरण । ६४१

का राज किया है परन्तु सौ जगतों का राजसुख हो तो भी अनास्वाद है इससे वह जो समतारूप आत्मानन्द है सो नहीं प्राप्त होता । जब उस आत्मानन्द के स्वाद का यत्न हो तब प्राप्त हो, अन्यथा नहीं होता । जिस पुरुष को बड़े ऐश्वर्य और इन्द्रियों के सुख प्राप्त हुए हैं पर समता-सुख से रहित है सो जानिये कि उसको कुछ ऐश्वर्य और सुख नहीं मिला और जिनको कुछ ऐश्वर्य और सुख नहीं प्राप्त हुआ पर समता सुख संयुक्त हैं उनको सब कुछ प्राप्त हुआ जानिये । वे परम अमृत से संपन्न हैं और अखण्डित सुख जो आत्मा है उस परमसुख को प्राप्त हुए हैं और आनन्दरूप हैं । जो अखण्ड पद को त्यागकर परिच्छिन्नता को प्राप्त है वह मूढ़ है और जो पण्डित और ज्ञानवान् है वह परिच्छिन्नता में प्रीति नहीं करता । जैसे ऊँट दूसरे पदार्थों को त्यागकर कण्टकों के पास धावता है और दूसरा पशु नहीं जाता तैसे ही मूढ़ बिना ऐसे कौन हैं जो आत्म-सुख को त्यागकर जले हुए राजसुख मेंरमै और अमृत को त्यागकर नीम का पान करे । मेरे पितामह और जो बड़े सब मूढ़ हुए हैं वे इस परम अमृतरूप दृष्टि को त्यागकर राजकण्टक में प्रीतिमान् हुए हैं । कहाँ फल फलादिक से संयुक्त नन्दनवन की भूमिका और कहाँ जले हुए मरुस्थल की भूमिका । तैसे ही कहाँ यह शान्तरूप बोधदृष्टि और कहाँ भोगों में आत्मबुद्धि । इससे ऐसा पदार्थ त्रिलोकी में कोई नहीं जिसकी में इच्छा करूँ । सब चैतन्यस्वरूप है और अनुभव कर्त्ता चैतन्यतत्त्व स्वच्छसम भाव और निर्विकार, सर्वदा, सर्व में सर्व और स्थित है । यह जैसे है तैसे पाया जाता है-ज्ञानवान् को प्रत्यक्ष है । सूर्य में प्रकाश चन्द्रमा में अमृत स्रवन, ब्रह्मा में महत्, इन्द्र में त्रिलोकपालन, विष्णुजी में सब ओर से पूर्ण लक्ष्मीशक्ति है, शीघ्र मननकर्त्ता शक्ति मन की है, बलवान शक्ति पवन में, दाहक अग्नि में, रसशक्ति जल में है और मौन से महातम की सिद्धता शक्ति और बृहस्पति में विद्या, देवताओं में विमानों पर आरूढ़ होकर आकाशमार्ग गमन करने की शक्ति है । पर्वतों में स्थिरता, वसन्त ऋतु में पुष्प, सब काल मेघों की शान्तशक्ति, यज्ञों में ममत्वशक्ति, आकाश में निर्लेपता, वरफ में शीतलता, ज्येष्ठ आषाढ़ में तपता इत्यादि देश,

६४२ | योगवाशिष्ठ ।

काल, क्रियारूप नाना प्रकार के आकार विकार जो त्रिकाल के उदर में स्थित हैं सो सर्वशक्ति, स्वच्छ, निर्विकार कल्पनारूप कलङ्क से रहित चैतन्य की है सो इस प्रकार हो भासती है और वही आत्मतत्व सब पदार्थ जाति में व्यापक हुआ है । जैसे सूर्य का प्रकाश सब ओर से समान उदय होता है तैसे ही वह सर्व देश पदार्थों का भण्डार और सर्व का आश्रयभूत है, त्रिकाल उसी में कल्पितरूप होते हैं । जैसे अनुभव उसमें होता तैसा ही तत्काल ही भासता है । जैसे जैसे चैतन्यतत्त्व में देश, काल और क्रिया द्रव्य का फुरना होता है तैसा ही तैसा भासता है । आत्मा में त्रिकालों की सम प्रतिभा फुरी है, उसमें फिर अनन्तकाल की प्रतिभा हुई है और शुद्ध चैतन्यतत्त्व सर्व ओर से पूर्ण है । त्रैकालिक दृश्यसंयुक्त भासता है तो भी चैतन्यतत्त्व शेष रहता है और इसी को त्रिकाल का ज्ञान होता है । मधुर, कटुक आदिक भिन्न भिन्न रसों में एक समता भासती है । जैसे मधुरता पान करनेवाले जीवों को मधुरता भासती है और को नहीं भासती तैसे ही जो संकल्पकल्पना है सबको भोगता है । सूक्ष्म चैतन्यसत्तास्वरूप सब पदार्थों का अधिष्ठान है उससे अनागत होकर द्वैत जगत् भासता है और नाना प्रकार की जो पदार्थ लक्ष्मी है वह अत्यन्त दुःख को प्राप्त करती है । जब त्रिकाल का अनुभव होता है तब सबही सम भासता है । भाव पदार्थों में जो पदार्थ हैं वे ईश्वर के हैं, उन भाव पदार्थों को त्याग-कर भाव की भावना करने से दुःख सब नष्ट हो जाते हैं और संतुष्टता प्राप्त होती है इससे त्रिकाल को मत देखो, यह बन्धनरूप है । त्रिकाल से रहित जो चैतन्यतत्त्व है उसके देखने से विभाग कल्पना काल का अभाव हो जाता है और एक सम आत्मा शेष रहता है जिसको वाणी वश कर नहीं सकती और जो अमन्द की नाईं निरन्तर स्थिर है उसकी प्राप्ति होती है । अनामयसिद्धान्त शून्यता की नाईं स्थित होता है निष्किञ्चन आत्माब्रह्म होता है अथवा सर्वरूप परम उपशम में लीन होता है और जिसका अन्तः-करण मलीन है और संकल्प में स्थित है उसको ज्यों का त्यों नहीं भासता--जगत् भासता है और जिसकी इच्छा नष्ट हुई है और परमपद का अभ्यास करता है उसको आत्मतत्त्व भासता है जो किसी जगत् के पदार्थ की वाञ्छा

उपशम प्रकरण । ६४३

करता है और हेयोपादेय फांसी में बांधा है वह परमपद नहीं पा सकता जैसे पेट में बांधा पर्त्ता आकाशमार्ग में नहीं उड़ सकता। जो पुरुष सङ्कल्प कल्पना संयुक्त है वह मोहरूपी जाल में गिर पड़ता है—जैसे नेत्रों बिना मनुष्य गिर पड़ता है। सङ्कल्प कल्पनाजाल में जिनका चित्त वेष्टित है वह विषयरूपीगढ़े में गिरा है और अच्युतपदवी को प्राप्त नहीं होता । अरे पितामह कई दिन पृथ्वी में फुर-फुर के लीन हो गये हैं वे बालकवत् नीच थे, जैसे गढ़े में मच्छर लीन हो जाते हैं तैसे ही अज्ञान से वे परमतत्त्व को न जानते थे। भोगों की वाञ्छा जो दुःखरूप है अज्ञानी करते हैं और उनसे भाव अभावरूप गड्ढे और अन्धकूप में नष्ट होते हैं। और इच्छा और द्वेष से जो उठा है उसके बन्धायमान हुए हैं। जैसे पृथ्वी में कीट मग्न होते हैं वे जीव उनके तुल्य हैं और जिनकी मृगतृष्णारूप जगत् के पदार्थों में ग्रहण त्याग की बुद्धि शान्त हुई है वे पुरुष जीते हैं, और सब नीच मृतक रूप हैं कहाँ निर्मल और अविच्छिन्नरूप, चैतन्यचन्द्रमावत् शीतलता और कहाँ उष्ण-काल कलङ्क संयुक्त चित्त की आस्था । अब मेरे आत्मा को नमस्कार है जो अविच्छिन्न प्रकाशता है और प्रकाश और तम दोनों का प्रकाशरूप है। हे चिदात्मा देव ! मुझको तू चिरकाल में प्राप्त होकर परमानन्द हुआ है जो विकल्परूपी समुद्र से मेरा उद्धार किया है। जो तू है, वह में हूँ और जो में हूँ सो तू है तुझको नमस्कार है। सङ्कल्प विकल्प कल्पना के नष्ट हुए अनन्तशिव आत्मतत्त्व का चन्द्रमा सदा निर्मल और उदितरूप है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादोपदेशो नाम चतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३४ ॥

प्रह्लाद बोले, कि जिनका नाम 'ॐ' है वह विकार से रहित ब्रह्म में हूँ । जो कुछ जगत् है वह सब आत्मस्वरूप, सत्य-असत्य से अतीत, चैतन्यस्वरूप और सब जीवों के भीतर है। सूर्यादिक में प्रकाश वही है, अग्नि आदिक को उष्णकर्ता वही है और चन्द्रमा में शीतकर्ता वही है । अमृत का स्रवना आत्मा में ही है और इन्द्रियों के भोगों का भोक्ता अनुभवरूप वही है । राजा की नाईं खड़ा बैठा हूँ तो में कभी नहीं बैठा और चलता हूँ तो कभी नहीं चलता और न व्यवहार करता हूँ। मैं सदा

६४४ योगवाशिष्ठ ।

शान्तरूप कर्त्ता हूँ, किसी में लिपायमान नहीं होता । त्रिकालों में समरूप हूँ और सर्वदा सर्व अवस्था में पदार्थों के उपजने और मिटने में सदा ज्यों का त्यों हूँ। ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त सब जगत् में आत्मतत्त्व स्थित है पवन जो स्पन्दरूप है उसमें भी में अतिसूक्ष्म स्पन्दरूप हूँ, पर्वत स्थान जो अचल पदार्थ है उनसे भी मैं अचल हूँ, आकाश से भी अति निर्लेप हूँ। मन को भी आत्मा चलाता है-जैसे पत्रों को पवन चलाता है और इन्द्रियों को आत्मा फेरता है-जैसे घोड़े को सवार चलाता है । समर्थ चक्रवर्ती राजा की नाईं मैं भोग भोगता हूँ और अपने ऐश्वर्य से आप शोभता हूँ। संसारसमुद्र में जरामरणरूपी जल के पार करनेवाला आत्मा है। यह सबसे सुलभ है और अपने आपसे जाना जाता है और बान्धव की नाईं प्राप्त होता है। आत्मा शरीररूपी कमलों के छिद्रों का भँवरा है और बिना खेंचे बुलाये सुलभ आ प्राप्त होता है। जो कोई अल्प भी उसको बुलाता है तो उसी क्षण वह उसके सम्मुख होता है इसमें कोई संशय और विकल्प नहीं । वह निष्कलंक और परम संपदावान् है और सदा स्वस्थरूप है । रसदायक पदार्थों में जैसे रस स्वाद है, पुष्पों में सुगन्ध और तिलों में तेल है तैसे ही वह देव परमात्मा देहों में स्थित है तो भी अविचार के वश से नहीं जाना जाता, जैसे चिरकाल उपरान्त आया बान्धव अपने आगे आन स्थित हो तो भी उसको नहीं पहिचाना जाता । जब विचार उदय होता है तब आत्मा परमेश्वर को जान लेता है। जैसे किसी प्रियतम बान्धव के पाने से आनन्द उदय होता है तैसे ही आत्मदेव के साक्षात्कार से परम-आनन्द उदय होता है और सब बान्धवपन नष्ट हो जाता, जितनी कुछ दुष्ट चेष्टा है उसका अभाव हो जाता है, सब ओर से बन्धन फाँस टूट जाती है, सब शत्रु क्षय हो जाते हैं और आशा चिर नहीं फुरती-जैसे पर्वत को चूहा तोड़ नहीं सकता । ऐसे देव के देखे से सब कुछ देखना होता है और सुने से सब कुछ सुनना होता है, उसके स्पर्श किये से सब जगत् का स्पर्श होता है और उसकी स्थित से सर्वजगत् स्थित भासता है। यह जो जाग्रत है सो संसार की ओर से स्वप्न है, उसी जाग्रत से

उपशम प्रकरण । ६४५

अज्ञान नष्ट हो जाता है और जितनी आपदाएँ हैं उनका कष्ट दूर हो जाता है। आत्मा के प्राप्त हुए आत्मामय हो जाता है और वह विस्तृतरूप आत्मा दीपकवत् साक्षीभूत होता है। जगत् की स्थिति में भोगों से राग उठा है, सब ओर से आत्मतत्त्व का प्रकाश भासता है और भीतर शान्त-रूप सबको अनुभव करनेवाला सब देहों में मैं स्थित हूँ। जैसे मिरचों में तीक्ष्णता स्थित है तैसे ही सब जगत् के भीतर बाहर मैं व्याप रहा हूँ। जो कुछ जगत् के पदार्थ भासते हैं उन सब में ईश्वररूप सत्ता सामान्य स्थित है, आकाश में शून्यता, वायु में स्पन्दता, तेज में प्रकाश, जल में रस, पृथ्वी में कठोरता, चन्द्रमा में शीतलतारूप वही है और सब जगत् में अनुस्यूत एक आत्मतत्त्व ही व्याप रहा है । जैसे बरफ में श्वेत, और पुष्पों में गन्ध है तैसे ही सब देहों में आत्मा व्यापक है । जैसे सर्वगत काल है और सर्वव्यापक आकाश है तैसे ही सब जगत् में आत्मा व्यापक है। जैसे राजा की प्रभुता सबमें होती है तैसे ही मुझसे भिन्न और कोई कलना नहीं है जैसे धूलि को पकड़ के आकाश को स्पर्श नहीं कर सकते, कमलों को जल स्पर्श नहीं करता और पाषाण को स्फुरणरूप स्पर्श नहीं करता तैसे ही मेरे साथ किसी का सम्बन्ध नहीं स्पर्श करता । सुख दुःख का सम्बन्ध देह को होता है यदि देह चिरकाल रहे अथवा अब ही नष्ट हो तो मुझको लाभ हानि कुछ नहीं जैसे दीपक की प्रभा रज्जु में नहीं बाँधी जाती तैसे ही आत्मा किसी से बाँधा नहीं जाता, सब पदार्थों के ग्रहण में अबन्धरूप है । जैसे आकाश किसी में बाँधा नहीं जाता और मन किसी से रोका नहीं जाता तैसे ही परमात्मा को देह इन्द्रिय का सम्बन्ध वास्तव में नहीं होता । यदि शरीर के टुकड़े हो जावें तो भी आत्मा का नाश नहीं होता—जैसे घट फूटे से दूध आदिक पदार्थ नहीं रहता परन्तु आकाश कहीं नहीं जाता वह ज्यों का त्यों ही रहता है तैसे ही देह के नाश हुए प्राणकला निकल जाती है आत्मा का कुछ नाश नहीं होता और पिशाच की नाईं उदय होकर भासता है। जिसका नाम मन है उस मन से जगत् भासित हुआ है और उसी में जड़ शरीर के नाश का निश्चय हुआ है हमारा क्या नाश होता है ? जिसके

६४६ योगवाशिष्ठ ।

मन में दुःख सुख की वासना नाश होती है सो भोगों से निवृत्त होकर सुख सम्पन्न होता है और ग्रहण करते भोगते अज्ञानी दुःख पाते हैं । यह बड़ा आश्चर्य है कि आत्मा के अज्ञान से मूढ़ दुःख पाता है । अब मैंने आत्मतत्त्व देखा है, उससे मेरा भ्रम शान्त हो गया है और कुछ भी किसी से मुझको क्षोभ नहीं अब मुझे न कुछ भोगों के ग्रहण करने की इच्छा है और न त्याग की वाञ्छा है, जो जावे सो जावे और जो प्राप्त हो सो हो, न मुझको देहादि के सुख की अपेक्षा है, न दुःख के निवृत्त की अपेक्षा है सुख दुःख आवे और जावे में एकरस चिदानन्दस्वरूप हूँ जिस देह में वासना करने से नाना प्रकार की वासना उपजती है वह देहभ्रम मेरा नष्ट हो गया है वह वासना नहीं फुरती । इतने कालपर्यन्त मुझको अज्ञानरूपी शत्रु ने नाश किया था अब मैंने आपको जाना है और अब इसको मैं चूर्ण करता हूँ । इस शरीररूपी वृक्ष में अहङ्काररूपी पिशाच था सो मैंने परमबोधरूपी मन्त्र से दूर किया है इससे पवित्र हुआ हूँ और प्रफुल्लित वृक्षवत् शोभता हूँ । मोहरूपी दृष्टि मेरी शान्ति हुई है, दुःख सब नष्ट हुए हैं और विवेकरूपी धन मुझको प्राप्त हुआ है । अब मैं परम ईश्वररूप होकर स्थित हुआ हूँ । जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना है और जो कुछ देखने योग्य था वह देखा है । अब मैं उस पद को प्राप्त हुआ हूँ जिसके पाने से कुछ पाने योग्य नहीं रहता । अब मैंने आत्म-तत्त्व को देखा है, विपद्रूपी सर्प मुझको त्याग गया है, मोहरूपी कुहिग नष्ट हो गया है इच्छारूपी मृगतृष्णा शान्त हो गई और रागद्वेषरूपी धूलि से रहित सब ओर से निर्मल हुआ हूँ । अब में उपशमरूपी वृक्ष से शीतल हुआ हूँ और सब ओर से समतारूप को प्राप्त हुआ हूँ । जब मैंने सबसे उचित परमात्मा देव को ज्ञान और विचार से पाया है और प्रकट देखा है । अधोगति का कारण जो अहङ्कार है उसको मैंने दूर से त्याग दिया है और अपना स्वभावरूप जो आत्मभगवान् सनातन ब्रह्म है जो अहङ्कार के वश विस्मरण हुआ था उसे अब निरखाल करके देखा है । इन्द्रियरूपी गड्ढे में में गिरा था । और रागद्वेषरूपी सर्प से दुःख पाकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था । मृत्यु की भूमिका टोये विना तृष्णारूपी

उपशम प्रकरण । ६४७

करंजुये की कुञ्जों में मैं भ्रमता रहा जहाँ कामरूपी कोयल के शब्द होते थे और जन्मरूपी कूप में दुःख पाता था । सुख पाने की आशा में हुया; वासनारूपी जाल में फँसा, दुःखरूपी दावाग्नि में जला और आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ मैं कई बार जन्ममरण को प्राप्त हुआ था, क्योंकि अहंकार के वश हुए जन्म मृत्यु को प्राप्त होता है—जैसे रात्रि में पिशाच दिखाई दे और अधीरता को प्राप्त करे तैसे ही मुझको अहंकार ने किया था सो अब परमात्मारूप की मुझको तुमने प्रेरणा की है और अपनी शक्ति विष्णुरूप धारकर विवेक उपदेश किया और जगाया है । हे देव, ईश्वर ! तुम्हारे बोध से अहंकाररूपी राक्षस नष्ट हुआ है । हे विभो ! अब में उसको नहीं देखता जैसे दीपक में तम नहीं भासता । अहंकाररूपी जो यक्ष था और मन में जो वासना थी वह सब नष्ट हुई है । अब में नहीं जानता कि वे कहाँ गये—जैसे दीपक निर्वाण होता है तब नहीं जाना जाता कि प्रकाश कहाँ गया । हे ईश्वर ! तुम्हारे दर्शन से मेरा अहंभाव नष्ट हुआ है । जैसे सूर्य के उदय हुए चोरभय मिट जाता है तैसे ही देहरूपी रात्रि में अहंकाररूपी पिशाच उठा था वह अब नष्ट हुआ है । और अब मैं परम-स्वस्थ हुआ हूँ । जैसे वानरों से रहित वृक्ष स्वस्थ होता है तैसे ही मैं परम निर्वाण को प्राप्त हुआ हूँ । अब मैं सम और शान्त बोध में जागा हूँ और चिरपर्यन्त चोरों से जो घिरा था सो अब छूटा हूँ । अब मेरा हृदय शीतल हुआ है और आशारूपी मृगतृष्णा शान्त हो गई है । जैसे जल से पर्वत की तप्तता मिटे और वर्षा से शीतलता को प्राप्त हो तैसे ही विवेकरूपी विचार से अहंकाररूपी तप्तता दूर हो गई है । अब मोह कहाँ और दुःख कहाँ, आशारूपी स्वर्ग कहाँ और नरक कहाँ, बन्ध कहाँ और मुक्त कहाँ । अहंकार के होने से पदार्थ भासते हैं, अहंकार के गये इनका अभाव हो जाता है । जैसे मूर्ति दीवार पर लिखी जाती है आकाश पर नहीं लिखी जाती तैसे ही अहंकार संयुक्त जो चेतन है वह नहीं शोभता अहंकार से ही सुख दुःखादिक का पात्र होता है । जैसे मलीन वस्त्र पर केशर का रङ्ग नहीं शोभता तैसे ही उसमें ज्ञान नहीं शोभता जब अहं-काररूपी मेघ का अभाव हो तब तृष्णारूपी कुहिरा भी नहीं रहता और

६४= योगवाशिष्ट ।

शरत्काल के आकाशवत स्वच्छ चित्त रहता है। निरहंकाररूपी जल में प्रसन्नतारूपी कमलों से शोभता है। हे आत्मा ! तुझको नमस्कार है। इन्द्रियाँरूपी तेंदुए और चित्तरूपी बड़वाग्नि, दोनों जिससे नष्ट भये हैं ऐसे आत्मारूपी समुद्रआत्मा को नमस्कार है, जिसमे अहंकार मेघ दूर हुआ है और दावाग्नि शान्त हुई है। ऐसे जो आत्मानन्दरूपी पर्वत है उस आनन्द के आश्रय मैंने विश्राम पाया है। हे देव ! तुझको नमस्कार है। जिसमें आनन्दरूपी कमल प्रफुल्लित है और जिसमे चित्तरूपी तरङ्ग शान्त हुआ है ऐसा जो मानसरोवर में आत्मा हूँ उसको नमस्कार है। आत्मारूपी हंस संवित्रूपी पंख हैं और हृदयरूपी कमलों से पूर्ण मानसरोवर, पर विश्राम करनेवाले को नमस्कार है। कालरूपी कल्पना से रहित निष्कलङ्क, सदा उदितरूप, सब ओर से पूर्ण और शान्त आत्मा तुझको नमस्कार है। मैं सदा उदित, शीतल हृदय कर तम दूर करता, और सर्वव्यापक हूँ, परन्तु अज्ञान से अदृष्ट हुआ था सो उस चैतन्य सूर्य को नमस्कार है। मन के मन से जो उपजे थे वह अब शान्त हुए हैं और मन को मन से और अहं को अहं से छेद के जो शेष रहे सो ही मेरी सत्ता है। भावरूप जो दृश्य पदार्थ हैं उनको आत्मभाव में तृष्णा को तृष्णा के छेद से, अनात्मा को आत्मविचार द्वारा नष्ट किये से और ज्ञान से ज्ञेय को जाने से मैं निरहंकारपद को प्राप्त हुआ हूँ और भाव अभाव क्रिया नष्ट हो गई है। मैं अब केवल स्वस्थित हूँ और निर्भय, निरहंकार, निर्मन, निष्पन्द, शुद्धात्मा हूँ। मेरा शरीर शव की नाईं स्थित है, लीला करके मैंने अहंकार को जीता है, परम उपशम को प्राप्त हुआ हूँ और परम शान्ति मुझको प्राप्त हुई है मोहरूपी बेताल और अहंकाररूपी राक्षस नष्ट हुए हैं, वासनारूपी कुत्सित भूमिका से मुक्त और विगतज्वर हुआ हूँ और तृष्णारूपी रस्मी में जो बँधा हुआ देहपिंजर था और उसमें अहंकाररूपी पक्षी फँसा था सो तृष्णारूपी रस्मी विवेक-रूपी करतनी से काटी है। अब जाना नहीं जाता कि शरीररूपी पिंजरे से अहंकाररूपी पक्षी कहाँ निकल गया। अज्ञानरूपी वृक्ष में अहंकार-रूपी पक्षी रहता था आत्मा के जानने से जाना नहीं जाता कि कहाँ

उपशम प्रकरण । ६४६

गया ? दुराशारूपी दुर्मति ने धूसर किया था, भोगरूपी भस्म ने शुद्ध दृष्टि दूर की थी और वासना मे हम मृतक हो गये थे । इतने काल मे में चित्त की भूमिका में मिथ्या अहंकार को प्राप्त हुआ था । अब में आनन्दित हुआ हूँ आज ही मेरी बड़ी शोभा बढ़ी है, अहंकाररूपी महामेघ नष्ट हुआ है और उसमें तृष्णारूपी श्यामता थी वह नष्ट हुई है । अब में निर्मल आकाशवत् शोभता हूँ, अब मैंने आत्म भगवान् देखा है और अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ और अनुभवरूप सदा प्राप्त है । प्रभुता के समूह के आगे अज्ञान अल्परूप है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे आत्मलाभचिन्तन नाम पञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३५ ॥

प्रह्लाद बोले, हे महात्मा पुरुष ! तुझको नमस्कार है । तू सर्वपद से अतीत आत्मा चिरकाल में मुझको स्मरण आया है और तेरे मिलने से मेरा कल्याण हुआ है । हे भगवन् ! तुझको देखकर सब ओर से नमस्कार करता हूँ और हृदय से तुझको आलिंगन करूँगा । त्रिलोकी में तुझसे अन्य बान्धव कोई नहीं । तू सबसे सुखदायक है और सबका तू ही संहार करता और रक्षा करता है और देने और लेनेवाला भी तू ही है । अब तू क्या करेगा और कहाँ जावेगा ? तूने अपनी सत्ता से विश्व को पूर्ण किया है और विश्वरूप भी तू ही है । अब सब ओर से में तुझको देखता हूँ और तू ही नित्यरूप सर्वत्र है । तेरे और मेरे से अनेक जन्म का अन्तर पड़ा था पर अब कल्याण हुआ जो तुझको देखा । तू अत्यन्त निकट है और परम बान्धवरूप है—तुझको नमस्कार है । तू सबका कृत कृत्यस्वरूप कर्त्ता हर्त्ता और संसार तेरा नृत्य है । हे नित्य, निर्मल स्वरूप ! तुझको नमस्कार है । शंख, चक्र, गदा और पद्म के धारनेवाले विष्णु और अर्ध चन्द्रमा के धारनेवाले सदाशिवरूप तुझको नमस्कार है । हे सहस्रनेत्र, इन्द्र ! तुझको नमस्कार है । पद्मज ब्रह्मा सब देवविद्या का सम्बन्ध तू ही है । तेरे में कुछ भेद नहीं तो तुम्हारे हमारे में भेद कैसे हो ? जैसे समुद्र और तरंगों का संयोग अभेद है तैसे ही तेरा और मेरा संयोग अभेद है । तू ही अनन्त और विचित्ररूप है और भाव अभावरूप जगत के धरनेवाली नीति है—जो जगत की मर्यादा करती है । हे द्रष्टा-

६५० योगवाशिष्ठ।

रूप! तुझको नमस्कार है। हे सर्वज्ञ! सर्वस्वभावरूप आत्मदेव! जन्म प्रति जन्म में बहुत दुःखमार्ग में विचरा हूँ और तेरी माया से चिरकाल दग्ध हुआ हूँ। हे देवेश! देशलोक मैंने अनन्त देखे हैं और दृश्य द्रष्टा भी अनेक देखे हैं परन्तु किसी से तृप्त न हुआ। जगत् को जिस ओर देखूँ उसी ओर से काष्ठ, पाषाण, जल, मृत्तिका, आकाश दृष्ट आता था अब तुझ बिना कुछ और दृष्ट नहीं आता अब वाञ्छा किसकी करूँ जब तुझको देखा है और उपलब्धस्वरूप प्राप्त हुआ हूँ। तुझको नमस्कार है। नेत्रों की श्यामता में जो पुतलीरूप स्थित है और रूप को देखता है वह साक्षीभूत भीतर कैसे नहीं देखता? जो त्वचा में स्पर्श करता है और शीत उष्ण आदिक को जानता है ऐसा सर्व अङ्गों में व्यापक अनुभवकर्ता है—जैसे तिलों में तेल व्यापक होता है। उसको अनुभव कोई नहीं करता। जो शब्द को श्रवण इन्द्रिय के भीतर ग्रहण करता है उस शब्दशक्ति को जो जाननेवाली सत्ता है और जिसमें शब्दशक्ति का विचार होता है इससे रोम खड़े हो आते हैं सो सत्ता दूर कैसे हो? जो जिह्वा के अग्र में रस स्वाद को ग्रहण करता है उस रस के अनुभव करनेवाली सत्ता दूर कैसे हो? नासा में जो ग्रहणशक्ति है उसको गन्ध आती है उसको अनुभव करनेवाली अलप सत्ता है सो सम्मुख कैसे न हो? वेदवेदान्त, सत्सिद्धान्त, पुराण और गीता में जो जानने योग्य आत्मा है उसको जब जाना तब विश्राम कैसे न हो? वह तो परावर परमात्मा पुरुष है। जिन भोगों की मैं तृष्णा करता था वह भोग विद्यमान रमणीय हैं तो भी तेरे दर्शन से रस नहीं देते। हे स्वच्छरूप निर्मल प्रकाश! तू सूर्यभाव होकर प्रकट हुआ है और तेरी सत्ता से चन्द्रमा शीतल हुआ है, तेरी सत्ता से पृथ्वी स्थित है, तेरी सत्ता से देवता आकाशमार्ग में विचरते हैं और तेरी सत्ता से आकाश में आकाशभाव है। मेरी अहंता तेरे में तत्त्व को प्राप्त हुई है, तेरे और मेरे में भेद कुछ नहीं। तुझे और मुझे नमस्कार है। मैं सम, स्वच्छ, साक्षीरूप, निर्विकार और देश, काल पदार्थ के परिच्छेद से रहित हूँ। मन जब क्षोभ को प्राप्त होता है तब इन्द्रियों की वृत्ति स्फुरणरूप होती है और प्राण, अपानशक्ति जब उल्लास को प्राप्त

उपशम प्रकरण । ६५१

होती है तब देहरूपी यन्त्र बहता है उस यन्त्र में चर्म अस्थि आदिक लकड़ियाँ और रस्मी है, इन्द्रियरूपी घोड़े हैं और मनरूपी सारथी चलानेवाला है । उस देहरूपी रथ में में चेतनरूप स्थित हूँ, परन्तु में किसी में आस्था नहीं करता । देह रहे अथवा गिरे मुझको कुछ इच्छा नहीं, मैं अब आत्मलाभ को प्राप्त हुआ हूँ और चिरकाल से पीछे उपशम को प्राप्त हुआ हूँ । जैसे कल्प के अन्त में जगत् शान्ति को प्राप्त होता है तैसे ही दीर्घ संसार मार्ग में चिर-काल तक भ्रमता भ्रमता अब विश्राम को प्राप्त हुआ हूँ । जैसे कल्प के अन्त में वायु चलता चलता रह जाता है । हे सर्वरूपात्मा ! तुझको नमस्कार है-जो तुझको और मुझको इस प्रकार जानते हैं । हे देव ! सम्पूर्ण जगत्जाल जो विस्तृतरूप है उसका तुमने कदाचित् स्पर्श नहीं किया-तुम्हारी जय है । जैसे पुष्पों में गन्ध और तिलों में तेल रहता है तैसे ही तुम सब देहों में रहते हो । तुम सर्व जगत् के प्रकाशक दीपक हो । उत्पत्ति और प्रलयकर्ता और सदा अकर्तारूप तेरी जय है तेरे परमाणु चिदअणु में यह विस्तार-रूप जगत् स्थित है जैसे वटबीज में वृक्ष होता है, फिर और में और होता है तैसे ही चिदअणु में जगत् है । जैसे आकाश में एक बादल के अनेक आकार दृष्ट आते हैं तैसे ही चित्तकला फुरने से अनेक पदार्थ भ्रमरूप भासते हैं इस संसार के जो क्षणभंगुररूप पदार्थ हैं इनकी अभावना किये से अब भाव अभाव से रहित भाव को देखता हूँ, मुझे अब यह निश्चय हुआ है कि मान, मद, क्रोध और कलुषता, कठोरता आदिक विकारों में महापुरुष नहीं डूबते पर जिनकी नीच प्रवृत्ति है वे इन दोनों और अवगुणों में डूबते हैं । पूर्व जो मेरी महादुरात्मा नीच अवस्था थी उसको स्मरण करके अब मैं हँसता हूँ कि कौन था और क्या जानता था । हे मेरे आत्मा ! मैं उस पद को प्राप्त हुआ था जहाँ चिन्तारूपी अग्नि की ज्वाला थी और दग्ध हुए जीर्ण संसार के आरम्भ थे पर अब देहरूपी नगर में स्फाररूपी परमार्थ की जय है और अब दुःख ग्रहण कर नहीं सकते । जहाँ दुष्ट इन्द्रियाँरूपी घोड़े और मनरूपी हाथी जाता था उस भोगरूपी शत्रु को अब चारों ओर से भक्षण किया है और निष्कण्टक राजा चक्रवर्ती हुआ हूँ । तू परम सूर्य है और परम आकाश में तेरा मार्ग

६५२ | योगवाशिष्ठ ।

हे, उदय-अस्त से रहित तू नित्य प्रकाशरूप है और सबके भीतर बाहर प्रकाशता है । अब मैं भोगों को लीलारूप देखता हूँ-जैसे कामी कामिनी को देखे परन्तु इच्छा से रहित हो तैसे ही तू ग्रहण करता है । नेत्ररूपी झरोखे में बैठकर तू रूप विषय को ग्रहण करता है और अपनी शक्ति से इसी प्रकार सब इन्द्रियों में वही रूप धारकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध विषयों को ग्रहण करता है । ब्रह्माकोटर में जो देश है उनमें प्राण अपान शक्ति से तू ही विचरता है, ब्रह्मपुरी में जाता है और क्षण में फिर आता है और सब जगत देहों में तू ही विचरता है । देहरूपी पुष्पों में तू सुगन्ध है, देहरूपी चन्द्रमा में तू अमृत है, देहरूपी वृक्ष में तू रस है और देहरूपी बरफ में तू शीतलता है । दूध में घृत, काष्ठ में अग्नि, उत्तम स्वादों में स्वाद, तेज में प्रकाश और सर्व असर्व की सिद्धकला पूर्ण तू ही है और सर्व जगत का प्रकाश भी तू ही है । वायु में स्पन्द, मन में मुदिता और अग्नि में तेज तुभी से सिद्ध है, प्रकाश में प्रकाश तू है और सब पदार्थों को सिद्धकर्त्ता दीपक तू है पर लीन हुए से जाना नहीं जाता कि कहाँ गया । संसार में जितने पदार्थ और अहं त्वं आदिक शब्द हैं वे ऐसे हैं जैसे सुवर्ण में भूषण होते हैं सो तूने अपनी लीला के निमित्त किये हैं और आपही प्रसन्न होता है । जैसे मन्द वायु से स्वगण्ड-स्वगण्ड हुए बादल के हाथी आदिक आकार हो भासते हैं तैसे ही तू भौतिक दृष्टि से भिन्न-भिन्न रूप भासता है । हे देव ! ब्रह्माण्डरूपी मोती में तू निरीच्छित व्यापक है । भूतोंरूपी जो अन्न का तू खेत है और चेतनरूपी रस से बढनेवाला है । तू अस्त की नाईं स्थित है अर्थात् इन्द्रियों के विषयों से रहित अव्यक्त-रूप है और सब पदार्थों का प्रकाशक है । जो पदार्थ शोभा संयुक्त विद्यमान होता है पर यदि तेरी सत्ता उसमें नहीं होती तो वह अस्त होता है-जैसे सुन्दर स्त्री भूषणों सहित अन्धे के आगे स्थित हो तो वह अस्त-रूपी होता है तैसे ही विद्यमान पदार्थ हो और तू न कल्पे तो अस्त हो जाता है । जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब होता है उसको देखकर अपनी सुन्दरता बिना कोई प्रसन्न नहीं होता । हे आत्मा ! तेरे संकल्प बिना देह काष्ठलोष्ठवत् होती है । जब पुर्यष्टक शरीर से अदृष्ट होती है तब सुख

उपशम प्रकरण । ६५३

दुःख आदिक क्रम नष्ट हो जाता है और किसी का ज्ञान नहीं होता—जैसे तम में कोई पदार्थ दृष्टि नहीं आता । तेरे देखने से सुख-दुःख आदिक स्थित होते हैं--जैसे सूर्य की दृष्टि से प्रातःकाल शुक्लवर्ण से प्रकाश आता है । जब अपने स्वरूप को प्राप्त होता है तब अज्ञानरूप सर्वविकार नष्ट हो जाते हैं--जैसे प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है तो पदार्थ ज्यों का त्यौं भासता है तैसे ही अज्ञान के नष्ट हुए से आत्मा ज्यों का त्यों भासता है । यह जो मनरूप तू है तेरे उपजने में सुख-दुःख की लक्ष्मी उपज आती है और तेरे अभाव हुए से सब नष्ट हो जाते हैं । स्वरूप से तू अनामयरूप है और क्षणभंगुर देह में जो मन ने आस्था की है सो महासूक्ष्म अणु निमेष के लक्ष भाग ऐसा सूक्ष्म है सुख दुःखआदिक की भावना करके अनीश्वरता को प्राप्त हुआ है तेरे प्रमाद से फुरनरूप होता है और तेरे देखने में सर्व लीन हो जाते हैं । यह जो पुर्यष्टक तेरा रूप है उसके देखने में क्षीण पदार्थ जाति भासि आते हैं--जैसे नेत्रों के खोलने से रूप भासता है और मन के अन्तर्धान होने से सर्व नष्ट हो जाता है और फिर किसी से ग्रहण नहीं होता । जो वस्तु क्षणभंगुर है उससे कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता--जैसे बिजली के चमकने से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता तैसे ही अन्तर्धान होने से देह में कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता । जो उपजकर तत्काल नष्ट हो जाता है उससे क्या कार्य सिद्ध हो ? देहादिक जड़ और नाशवन्त हैं और सबको प्रकाशता है वह सदा निर्विकार सच्चिदानन्दरूप है । सुख दुःख आदिक अज्ञानी के चित्त को स्पर्श करते हैं और जिसका समचित्त है उसको स्पर्श नहीं करते । हे देव ! ये जो सुख दुःख आदिक अविवेक के आश्रय हैं सो अविवेक नष्ट हो गया । तू निरीह निरंश निराकार है और सत्य असत्य से परे भैरवरूप परमात्मा तेरी सदा जय है । तू सर्वशास्त्रों का असि पद है । जात अज्ञातरूप सदा तेरी जय है, तेरे नाश और अविनाशरूप की जय है और तेरे भाव और अभावरूप की जय है और जीतने और न जीतने योग्य तेरी जय है । माया हुलाम और उपशान्ति को प्राप्त हुआ है तुझको नमस्कार है । हे निर्दोष ! तेरे में स्थित होने से मेरे राग द्वेष मिट गये हैं । अब बन्ध

६५४ | योगवाशिष्ठ ।

कहाँ और मोक्ष कहाँ और और आपदा, सम्पदा भाव-अभाव कहाँ । अब मेरे सर्वविकार शान्त हुए हैं और सम समाधि में स्थित हुआ हूँ । इति श्रीयोग० उप० प्रह्लादोपाख्याने संस्तवननाम षट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥३६॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार चिन्तनकर महाधैर्यवान् प्रह्लाद निर्विकार निरानन्द समाधि में ऐसे स्थित हुआ जैसे मूर्ति का पर्वत हो । जब बहुत काल अपने भुवन में सुमेरुवत् समाधि में स्थित रहा तब दैत्य उसको जगाने लगे परन्तु वह न जागा—जैसे समय बिना बीज अंकुर नहीं लेता—और पाँच सहस्र वर्ष समाधि में व्यतीत भये पर शरीर उसी प्रकार पुष्ट रहा । दैत्यों के नगर में शान्ति हो गई और वह परम आत्मा को प्राप्त हुआ, निरानन्द जो प्रकाश है सो प्रकाशमात्र रह गया और कलना सब मिट गई । इतना काल जब इस प्रकार व्यतीत हुआ तब रसातलमण्डल में राजभय दूर हो गया और छोटे को बड़ा भक्षण करने लगा । निदान दैत्यमण्डली की विपर्यय दशा हो गई और निर्बल को बलवान् मारके लूट ले गये । तब अनेक मल्ल मिलकर प्रह्लाद को जगाने लगे पर तो भी वह न जागा—जैसे सूर्यमुखी कमल को रात्रि में भँवरे गुञ्जार करें और तो भी वह प्रफुल्लित नहीं होता, मुँदा ही रहता है । संवित्कला जो चित्त धातु है सो उसके भीतर फुर्ती न भासती थी जैसे मूर्त्तिका लीला सूर्यप्रकाश में रहित होता है तैसे ही उसे देखकर दैत्य उद्वेगवान् हुए और जहाँ किसी को सुखदायक देश स्थान मिला वहाँ जा रहे, मर्यादा सब दूर हो गई मत्सर होने लगा और पुरुष स्त्रियाँ रुदन करने और शोकवान् होने लगे । कोई मारे जावें, कोई लूटे जावें और व्यर्थ अनर्थ कदर्थ करनेवाले हो गये । सब दैत्यतापपरायण हुए बान्धव नष्ट हो गये और उपद्रव उत्पन्न होने लगे । दिशा के मुख अग्नि रूप हो गये, देवता आन दिखाई देने लगे और दैत्य निर्बल को बाँध ले जाने लगे । दैत्य मूलभूमि से रहित निर्लक्ष्मी उजाड़ से हो गये और दैत्यपुर में अनीति अकारण उपद्रव हुआ जैसे कल्प के अन्त में जीव दुःख पाते हैं तैसे ही दैत्य दुःख पाने लगे । इति श्रीयोग० उप० दैत्यपुरी प्रभञ्जनवर्णननाम सप्तत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥३७॥

उपशम प्रकरण। ६५५

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब दैत्यपुरी की दशा हुई तब सम्पूर्ण जगत्जाल के क्रम पानेवाले विष्णुदेव, जो क्षीरसमुद्र में शेषनाग की शय्या पर शयन करनेवाले हैं, चतुर्मास वर्षाकाल की निद्रा से जागे और बुद्धि के नेत्रों से जगत् की मर्यादा विचारी तो देखा कि पाताल में प्रह्लाद दैत्य समाधि में पद्मासन बाँधकर स्थित हुआ है और सृष्टि दैत्यों से रहित हुई है। बड़ा कष्ट है कि अब देवता जीतने की इच्छा से रहित होकर आत्मपद में स्थित हो जावेंगे और जब देवता और दैत्यों का विरोध रहता है तब जीतने के निमित्त याचना करते हैं कि दैत्य नष्ट होवें। अब सब देवता निर्द्वन्द्वरूप होकर परमपद को प्राप्त होवेंगे। जैसे रस से रहित बेलि सूख जाती है तैसे ही अभिमान और इच्छा से रहित देवता जगत् की ओर सूखकर आत्मपद को प्राप्त होंगे। जब देवताओं के समूह शान्त को प्राप्त होंगे तब पृथ्वी में यज्ञ तपादिक उत्तम क्रिया निष्फल हो जावेगी न कोई करेगा, न किसी को प्राप्त होगा, और जब पृथ्वीलोक से शुभक्रिया नष्ट हुई तब लोक भी नष्ट हो जावेंगे, अकारण प्रलय प्रसंग होगा और सब मर्यादा क्रम जगत् का नष्ट हो जावेगा। जैसे धूप से बरफ नष्ट होती है तैसे ही जगत् क्रम सब नष्ट होवेगा। इसके नष्ट हुए भी मुझको कुछ नहीं, परन्तु मैंने अपनी लीला रची है सो सब नष्ट हो जावेगी। तब मैं भी इस शरीर को त्यागकर परमपद में स्थित हूँगा और अकारण ही जगत् उपशम को प्राप्त होगा, इसमें मैं कल्याण नहीं देखता। जो दैत्यों के उद्वेग से रहित देवता भी शान्ति हो जावेंगे तो तपक्रिया नष्ट हो जावेगी और जीव दुःखी होकर नष्ट हो जावेंगे। इससे मैं जगत्कर्म को स्थापन करूँ कि परमेश्वर की नीति इसी प्रकार है। अब रसातल को जाऊँ और जगत् की मर्यादा ज्यों की त्यों स्थापन करूँ पर जो मैं प्रह्लाद से भिन्न पाताल का राज्य करूँगा तो वह देवताओं का शत्रु होगा इससे ऐसे भी न करूँगा। प्रह्लाद का यह अन्त का जन्म है और परम पावन देह है और कल्प पर्यन्त रहेगी। यह ईश्वर की नीति है सो ज्यों की त्यों है, इसमें मैं जाकर दैत्येन्द्र प्रह्लाद को जगाऊँ कि अब वह जागकर जीवन्मुक्त

६५६ योगवाशिष्ठ ।

हुआ है दैत्यों का राज्य करे। जैसे मणि मल से रहित प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है तैसे ही प्रह्लाद भी इच्छा से रहित होकर प्रवर्त्ते। इस प्रकार सृष्टि देवता दैत्यों से संयुक्त रहेगी और परस्पर इनका द्वेष न होगा और मेरी क्रीड़ा (लीला) अच्छी होगी। यद्यपि सृष्टि का होना न होना मुझको तुल्य है तो भी जो नीति है वह जैसे स्थित है तैसे ही कहे। जो वस्तु भाव में तुल्य हो उसका नाश और स्थित में प्रयत्न करना कुबुद्धि है, आकाश के हनन के यत्न के तुल्य है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे भगवान्चित्तविवेको नामाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार चिन्तन कर सर्वात्मा विष्णुदेव अपने परिवार सहित क्षीरसमुद्र से चले—जैसे मेघघटा एकत्र होकर चले—और आकर प्रह्लाद के नगर को प्राप्त हुए। वह नगर मानो दूसरा इन्द्रलोक था और प्रह्लाद के मन्दिर में देखा कि निकट दैत्य थे वे विष्णुजी को दूर से देखकर भाग गये—जैसे सूर्य से उलूकादिक भाग जावें। तब जो मुख्य दैत्य थे उनके साथ विष्णुजी ने दैत्यपुरी में प्रवेश किया—जैसे तारासंयुक्त चन्द्रमा आकाश में प्रवेश करता है तैसे ही विष्णुजी गरुड़ पर आरूढ़ लक्ष्मी साथ चमर करतीं और अनेक ऋषि, देव सहित प्रह्लाद के गृह आये। आते ही विष्णुजी ने कहा, हे महात्मा पुरुष! जाग! जाग! ऐसे कहकर पाञ्चजन्य शंख बजाया जिससे महाशब्द हुआ। फिर उसे प्रह्लाद के कानों के साथ लगाया और जैसे प्रलयकाल में इकट्ठा मेघ का शब्द हो तैसे ही बड़े शब्द को सुनकर दैत्य पृथ्वी पर गिर पड़े। निदान शनैः शनैः दैत्येन्द्र को जगाया और प्राणशक्ति जो ब्रह्मरन्ध्र में थी वहाँ से विष्णुजी ने उठाई और वह शरीर में प्रवेश कर गई। जैसे सूर्य के उदय हुए सूर्य की प्रभा वन में प्रवेश कर जाती है तैसे नवद्वारों में प्रवेश कर गई। तब प्राणरूपी दर्पण में चित्तसंवित् प्रतिबिम्बित होकर चैतन्य मुखत्व हुई और मनभाव को प्राप्त हुई और तब जैसे प्रातःकाल में कमल खिल आते हैं तैसे ही उसके नेत्र प्रफुल्लित हो आये और प्राण और अपान नाड़ी में छिद्रों के मार्ग विचरने लगे। जैसे वायु

उपशम प्रकरण । ६१७

से कमल स्फुरने लगते हैं तैसे ही मन और प्राणशक्ति से अङ्ग स्फुरने लगे और जाग जाग शब्द जो भगवान् कहते थे उससे वह जगा और उसने जाना कि मुझको विष्णु भगवान् ने जगाया है और जैसे मेघ का शब्द सुनकर मोर प्रसन्न होता है तैसे वह प्रसन्न हुआ और मन में दृढ़ स्मृति हो आई । तब त्रिलोकी के ईश्वर विष्णुदेव ने, जैसे पूर्व कमलो- द्भव ब्रह्मा से कहा था कि हे साधु ! तू अपनी महालक्ष्मी को स्मरण कर कि तू कौन है । समय बिना देह के त्यागने की इच्छा क्यों की थी । जो ग्रहण त्याग के संकल्प से रहित पुरुष हैं उनको भाव अभाव के होने में क्या प्रयोजन है ? उठकर अपने आचार में सावधान हो, तेरा यह शरीर कल्पपर्यन्त रहेगा और नष्ट नहीं होगा । इस नीति को ज्यों की त्यों मैं जानता हूँ । हे आनन्दित ! तू जीवन्मुक्त हुआ राज्य में स्थित हो । हे जीर्णमन ! गतउद्वेग तेरा देह कल्पपर्यन्त रहेगा और फिर कल्प के अन्त में तू शरीर त्यागकर अपनी महिमा में स्थित होगा— जैसे घट के फूटे से घटाकाश महाकाश को प्राप्त होता है । अब तू निर्मल दृष्टि को प्राप्त हुआ है; लोकों का परावर तूने देखा है और अब तू जीवन्मुक्त विलासी हुआ है । हे साधु ! द्वादश सूर्य जो प्रलयकाल में तपते हैं उदय नहीं हुए तो तू क्यों शरीर त्यागता है; उन्मत्त पवन जो त्रिलोकी की भस्म उड़ानेवाला वह तो नहीं चला है और देवताओं के विमान उससे नहीं गिरे तू क्यों व्यर्थ शरीर त्यागता है ? सब लोगों के शरीर मूर्ख वृक्ष की मञ्जरीवत नहीं सूखे; पुष्कर मेघ और वह बिजली स्फुरने नहीं लगीं पर्वत तो युद्ध करके परस्पर नहीं गिरने लगे अब तक मैं भूतों को खींचने नहीं लगा लोकों में विचरता हूँ । यह अर्थ है, यह मैं हूँ, यह पर्वत है, ये भूतप्राणी हैं, यह जगत् है, यह आकाश है, तू देह मन त्याग; देह को धारे रह । हे साधो ! जो जीव अज्ञानयोग से शिथिल हुआ है अर्थात् जिसकी देह में आत्मा अभिमान है कि मैं और मम से व्याकुल रहता है और दुःखों में जीर्ण होता है उसको मरना शोभता है जिसको तृष्णा जलाती है और हृदय में संसारभावना जीर्ण करता है और जिसके मनरूपी वन में चित्तरूपी लता दुःख सुखरूपा

६५८योगवाशिष्ट ।

पुष्पों से प्रफुल्लित है और उदय होता है उसको मरना श्रेष्ठ है। जो पुरुष अपनी देह में आधि व्याधि दुःखों से जलता है और जिसके हृदय में कामक्रोधरूपी सर्प फुरते हैं और देहरूपी सूखा वृक्ष निष्फल है और चित्त चञ्चल है ऐसी देह के त्यागने को लोक में मरना कहते हैं; स्वरूप से नाश किसी का नहीं होता । क्या ज्ञानी का ही क्या अज्ञानी का हो । हे साधो ! जिसकी बुद्धि आत्मतत्त्व के अवलोकन से उपराम नहीं होती ऐसा जो यथार्थदर्शी ज्ञानवान् है और जिसका हृदय राग द्वेष से रहित शीतल हुआ है और दृश्यवर्ग को साक्षीभूत होकर देखता है उसका जीना श्रेष्ठ है । जो पुरुष सम्यक् ज्ञान द्वारा हेयोपादेय से रहित है और चेतनतत्त्व में तद्रूप चित्त हुआ है, जिसने संकल्प मल से रहित चित्त को आत्मपद में लगाया है और जिस पुरुष को जगत् के इष्ट-अनिष्ट पदार्थ समान भासते हैं और शान्तचित्त हुआ लीलावत् जगत् के कार्य करता है, जो इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में राग द्वेष नहीं करता, जिसे ग्रहण त्याग की बुद्धि उदय नहीं होती और जिसके श्रवण और दर्शन किये से औरों को आनन्द उपजता है उसका जीना शोभता है जिसके उदय हुए से जीवों के हृदयकमल प्रफुल्लित होते हैं उसका चिरजीना प्रकाश-वान् शोभता है और वही पूर्णमासी के चन्द्रमावत् सफल प्रकाशता है-नीच नहीं शोभते ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे प्रह्लादोपाख्याने नारायणवनो- पन्यासयोगोनामैकोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

श्रीभगवान् बोले, हे साधो ! यह जो देहसंग दृष्टि आती है उसका नाम जीना कहते हैं और इस देह को त्यागकर और देह में प्राप्त होने का नाम मरना है । हे बुद्धिमान् ! इन दोनों पक्षों से अब तू मुक्त है, तुझको मरना क्या है जीना क्या है-दोनों सममात्र हैं । इस अर्थ के दिखाने के निमित्त मैंने तुझसे मरना और जीना कहा है कि गुणवानों का जीना श्रेष्ठ है और मूढों का मरना श्रेष्ठ है पर तू न जीता है, न मरेगा । देह के होते भी तू विदेह है और तेरे आकाश की नाईं अङ्ग हैं । जैसे आकाश में वायु नित्य चलता है परन्तु उससे आकाश निर्लेप रहता है