अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद २०
अकबर बीरबल विनोद २० से रोका। उसको निश्चय हो गया कि इसीने बालक का वध किया है। बीरबल ने सिपाहियों को उसे पीटने की आज्ञा दी। उसका दोनों हाथ पाँव बाँध दिया गया और सिपाही मारने को उद्यत हुए। अब तो दुष्टा स्त्री का होश ठिकाने आ गया और उसने तुरत अपना कसूर स्वीकार कर लिया। बादशाह को उस मक्कारा की काली करतूत पर बड़ा रंज हुआ इसलिये उसे कारागार भुगतने की सजा दी और उस विनम्रा स्त्री को पुरस्कार देकर बिदा किया। गुलाम को मारडाल । सन्ध्या का समय था अकबर अपने बाग में दरबारियों के साथ राजकीय विषयों पर विचार कर रहा था, इतने में तानसेन ने अपनी सारंगी मिलानी शुरू की। सबका ध्यान तानसेन के वाद्य की तरफ आकृष्ट हो गया। दरबार का शेष कार्य स्थगित कर दिया गया। तानसेन ने एक मनहरन तान सारंगी पर छेड़ी। चारोतरफ से वाह वाह की ध्वनि आने लगी। बादशाह आनन्दमग्न तकिये के सहारे लेटा हुआ सुन रहा था। चारो तरफ आनन्द छा रहा था। इसी समय शहर का कोतवाल दो आदमियों को लिये हुए आया। उन आदमियों के कपड़े खून से लथपथ हो रहे थे। कोतवाल के अचानक आ पहुँचने से बड़ा रंग में भंग होगया । बादशाह झल्ला गया और झिड़ककर कोतवाल
२१ अकबर बीरबल बिनोद से बोला—"क्या तुमको इतनी भी तमीज न हुई कि यह समय दरबार का नहीं है, ऐसे मनबहलाव के समय बन्दियों का लाना कहाँ तक उचित था। ये कैदी रातभर हवालात में रक्खे जा सकते थे। कल्ह दरबार लगने पर इनके मामले पर विचार किया जा सकता था, फिर इतनी आतुरता दिखलाने का क्या कारण है ?" बादशाह की नाराजगी से कोतवाल सहम गया, परन्तु बिना असलियत बतलाये भी काम नहीं चलते देखा। कुछ सोच समझकर उसने कहा-“गरीबपरवर ! इसमें सन्देह नहीं कि मैं इनको सुबह लेकर हाजिर हो सकता था परन्तु इनका मामला बड़ा बेढंगा है जिस कारण मुझको विवश होकर इसी समय आना पड़ा।" उससे ऐसा सुनकर बादशाह कुछ शान्त होकर बोला-“अच्छी बात है ! इनका अभियोग सुनाओ।” कोतवाल ने कहा-“आज जब मैं नगर में गस्त लगाते हुए व्यापारियों की मंडी में पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि एक जगह बहुतेरे आदमियों की भीड़ लगी हुई है, जब वहाँ गया तो इस अपरिचित मनुष्य को इस नगर व्यापारी से मार पीट करते देखा। यह अपरिचित मनुष्य नगर व्यापारी को झिड़क रहा था कि-“अरे दुष्ट ! आज से पाँच सात वर्ष पहले तू मेरा दास था और वहाँ से छिप कर भाग आया है। बड़े परिश्रम के बाद आज तुझे पकड़ लिया है, अब मेरे रुपये अदा कर । इसको झिड़कते देख नगर व्यापारी बोला-“नालायक ! दास तो मेरा तू है तुझे मैं आज कितने ही वर्षों से ढूँढ़ रहा था, भाग्यवश इससमय हाथ
हमारा नौकर इससे दो वर्ष पहले ही मुझको छोड़कर भाग
अकबर बीरबल बिनोद २२ लगा है। इन की आपस की ऐसी लड़ाई देखकर मैं इन्हें गिरफ्तार कर सरकार में लाया हूँ, अब आपकी जैसी मरजी हो इनका निपटारा कीजिये।" बादशाह ने उनसे साक्षी माँगी। नगर सौदागर ने कहा- "गरीबपरवर ! आज पाँच वर्ष का अर्सा हुआ कि मैं अपना शहर ईरान छोड़कर दिल्ली आ बसा हूँ और यह हमारा नौकर इससे दो वर्ष पहले ही मुझको छोड़कर भाग गया था। आज जब मैं बाजार में खरीद फरोख्त कर रहा था तो यह भी अचानक वहीं आपहुँचा और मेरा हाथ पकड़ कर बोला- "तू मेरा गुलाम है, तू मेरा गुलाम है।" मेरे व्यापारी होने का सारा शहर साक्षी है।" जब पहला व्यापारी अपना बयान दे चुका तो दूसरा विदेशी व्यापारी बोला- "पृथ्वीनाथ ! यह झूठ बोलता है। क्योंकि ईरान का व्यापारी मैं हूँ। इस शहर में मैं बिल्कुल नया नया आया हूँ; इस कारण यहाँ का एक भी नागरिक मुझे नहीं पहचानता। यह जो इस नगर में शेरअली के नाम से विख्यात हो रहा है सो इसका फर्जी नाम है। यह "नसीबा" नामी मेरा गुलाम है। सात वर्ष का जमाना गुजरा जब मैं इसे दूकान पर छोड़ बाहर व्यापार के लिये गया था। मौका देख यह मेरी बहुत बड़ी रकम चुराकर भाग आया है। तभी से मैं इसकी खोज में दरदर ढूँढ़ता फिरता हूँ। आज सात वर्षों के बाद यहाँ मिला है।" इनका अभियोग दरबार के सभी लोग बड़े गौर से सुने रहे थे, मामला भी बड़ा पेचीदा जान पड़ता था, दोनों ही सौदागर के लिबास में थे और दोनों की मुखाकृति
२३ अकबर बीरबल बिनोद
भी अमीरों की सी थी । जब यह मामला चल रहा था इसी बीच एक सरदार साहब भी आ पहुँचे और नगर व्यापारी शेरअली को कैदी की सूरत में देखकर बोले- "शेरअली ! यह तुम्हारी क्या हालत है, तुम कैदी की सूरत में क्यों दिखाई पड़ रहे हो ?" शेरअली को इस सरदार के आनेसे बड़ी तसल्ली हुई और बोला- "सरदार साहब ! आप भी जानते हैं कि मैं कितने वर्षों से इस नगर में व्यापार कर रहा हूँ और यहाँ का बच्चा बच्चा मुझे पहचानता है। समय के फेर से वा दैव की अकृपा से आज मैं अपने ही दास द्वारा अभिशापित किया जा रहा हूँ । सरदार बादशाह को चिताकर बोला- "गरीबपरवर ! यह शेरअली आजकल का व्यापारी नहीं है बल्कि लड़ाई के समय में इसने कई बार सरकार को रुपये की मदद देकर राजभक्ति प्रकट की है। (शेरअली की तरफ इशारा करके ) "शेरअली ! यह तुम्हारी ही उदारता का कारण था कि मैंने गुजरात ऐसे सामर्थ्यशाली अधिपति पर विजय प्राप्त की थी तुम्हारी वह मदद हमारी नहीं बल्कि बादशाह की मदद थी।" सरकार की तरफसे तुमको अभी तक उसका कोई पुरस्कार नहीं मिला है ? सरदार की इस सारगर्भित शाक्षी से बादशाह खुश हो गया और बोला शेरअली को उस उपकार का बदला चुकाया जायगा । बादशाह ने ईरान के सौदागर की तरफ इशारा करके कहा- "क्यों भाई ! तुमको भी किसीकी साक्षी दिलानी है, यदि
अकबर बीरबल बिनोद २४ है तो उसे सामने लावो, सरदार की साक्षी से तो नगर व्या- पारी का शेरअली होना साबित होता है। ईरान का व्या- पारी बोला-"गरीबपरवर ! मैं इस स्थान में पहले पहल आया हूँ, यहाँ की भाषा तक नहीं समझता और न यहाँ पर मेरा कोई परिचित ही है। अभी मेरा सामान भी बाहर ही पड़ा हुआ है, उसको यहाँ लाने में अभी कई दिन व्यतीत हो जायेंगे, फिर मैं किसकी साक्षी दूँ। हाँ इतना जरूर है कि मैं दूर देशों से सुनता आ रहा हूँ कि आपके दर्बार में बड़ा सच्चा न्याय होता है इसलिये कृपया हमारा उचित न्याय करा दीजिये । दोनों फरीकैनों की बातें सुनकर एक सभासद् ने बाद- शाह से अर्ज किया-"पृथ्वीनाथ ! यह मामला बड़ा ही बेढंगा दीख पड़ता है। इसका फैसला कवि गंग से कराया जाय। वे ऐसे२ मामलातों को महज खिलवाड़ मात्र समझा करते हैं। विचारा कवि गंग बड़ा घबराया और झट बोल उठा- "हजूर । बीरबल के रहते इसका न्याय करने की दूसरे की आवश्यकता नहीं है अतएव इसका न्याय बीरबल से ही कराया जाय। वे इससे कभी इनकार नहीं कर सकते। बादशाह तो पहले ही से समझ रहा था, उसने बीरबल को आज्ञा दी-"इस मामले को अच्छी तरह जांचकर न्याय करो।" बीरबल ने भी सहर्ष स्वीकार किया । बीरबल की कार्रवाई शुरू हुई। वह दोनों व्यापारियों को पास बुलाकर उनसे बहुत प्रकार की पूछ-ताछ की परन्तु फिर भी कुछ मतलब की बात हासिल न हुई।
२५ अकबर बीरबल विनोद
२५ अकबर बीरबल विनोद
तब उसने एक नई सूझ निकाली। बीरबल उन दोनों सौदा- गरों को एक जगह खड़ा कराकर एक जल्लाद को नंगी तलवार लिये हुए बुलवाया। जब वह आकर हाजिर हुआ तो बीरबल उससे बोला-“क्या देखता है “गुलाम को अभी मार डाल।” बीरबल के मुख से इतना शब्द निकलते ही जल्लाद तलवार लेकर झपटा। उसका झपटना था कि नगर व्यापारी यानी नकली शेरअली अलग हट गया। बीरबल उसकी ऐसी हरकत देखकर तुरत ताड़ गया कि असल में यही गुलाम है। उसने उसकी कलाई पकड़ ली। नकली शेरअली ने भी अपना गुलाम होना स्वीकार कर लिया और वह तुरन्त कैद कर लिया गया। अनन्तर दरबारियों के पूछने पर उसने कहा-“असल में मैं ही अपने इस ईरानी मालिक असली शेरअली का गुलाम था। मेरी आदत धीरे धीरे बिगड़ने लगी, मैं हमेशा इसे हटाने की ताक में था जब मेरा मालिक मुझे दूकान पर अकेला छोड़कर बाहर चला गया तो मेरी नीयत बिगड़ी और उसका बहुत सा माल लेकर वहाँ से भाग निकला। घूमते फिरते यहाँ पहुँचा और उस चोरी के रुपयों से व्यापार करने लगा। चूंकि इस काम को मैंने अपने मालिक के यहाँ ही सीख लिया था इस कारण व्यापार चलाने में मुझे कोई दिक्कत न पड़ी और मेरा काम धड़ल्ले से चलने लगा। अब मैं असली शेरअली के नाम से विख्यात हो गया हूँ। इतने दिनोंके परिश्रम से जो मैंने भारत- वर्ष में अपना नाम प्रख्यात किया था सो आज दैव के प्रकोप से मिट्टी में मिल गया। अब मुझसे गुलामी करते नहीं
बनेगी अतएव कृपाकर मुझे प्राण दण्ड की आज्ञा दीजिये । बादशाह ने शेरअली से पूछा-शेरअली-"अब तुम इस आदमी को क्या करना चाहते हो।" शेरअली बोला- "गरीबपरवर ! अब मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है मेरी बात रह गई अब आपके जी में जो आवे सो कीजिये। शेर- अली के ऐसे सन्तोषप्रद वाक्यों से बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई परन्तु उसने अपना राज किसी पर जाहिर न किया। विचारा अपराधी नसीबा जीवन की आशात्यागकर एक तरफ खड़ा था। बादशाह उसकी तरफ लक्ष्य कर बोला- "नसीबा ! तुम्हारा अपराध प्राण-दण्ड पाने के योग्य है परन्तु तूने मेरे साथ उपकार किया है और मैंने अभी तक तुझे उसका कुछ बदला नहीं चुकाया है अतएव तुझे जीवन- दान देता हूँ और पुरस्कार में तुझे दर्बार का एक काम सौंपता हूँ, अब तुम उसी काम के सहारे से अपना जीवन निर्वाह करो। नसीबा खुशी के मारे फूला न समाया और बड़ी प्रसन्नता से उस पद को स्वीकार किया। बादशाह ने मन में विचार किया कि इस न्याय में बीरबल ने कमाल किया है इसकारण उसको भी उचित पुरस्कार देना परमोचित है। बादशाह ने तीन पोशाक मँगवाई। उसमें पहली कुछ आभूषणों के साथ असली शेरअली को और दूसरी बीरबल को तथा तीसरी नसीबा नामी गुलाम को देकर बिदा किया। नसीबा शेरअली के चरणों पर गिरकर अपने अप-
२७ अकबर बीरबल विनोद
२७ अकबर बीरबल विनोद
राध की माफी माँगी और उसको आदरपूर्वक अपने मकान पर ले गया। उसने अपना सारा धन शेरअली के हवाले कर दिया। शेरअली बहुत बड़ा व्यापारी था उसका सारा कारोबार ईमान पर चलता था। उसने विचार किया-“व्यापार से मेरे धन के अतिरिक्त जो कुछ नसीबा ने अधिक उपार्जन किया है वह उसके परिश्रम का है। उसने अपना असली धन लेकर शेष बचा धन नसीबा के हवाले किया और खुशी खुशी अपने ईरान शहर को लौट गया।
मोती की खेती।
एक दिन की घटना है कि बादशाह और बेगम दोनों भोजनोपरान्त बाग में झूला झूलते हुए सानन्द गपशप लड़ा रहे थे अचानक बेगम की उर्ध्ववायु खुली, जिससे बादशाह बहुत चिढ़ गया और बेगम को तुरत महल से बाहर निकल जाने की आज्ञा दी। बेगम शहर से बाहर एक बाग में कैदी की सूरत में नजरबन्द कर दी गई। बाद- शाह को वही धुन सवार थी। दूसरे दिन जब सबेरे दरबार लगा तो बादशाह ने सभासदों से पूछा-"क्या कभी तुमलोगों को भी अधोवायु निकलती है ? अधोवायु निकलने के कारण बेगम का दण्डित होना सबपर विदित था इस कारण एक स्वर से सभों ने इन्कार कर दिया, और उस दिन का दुर्वार समाप्त हुआ। जिस दिन की यह बात थी उस दिन बीरबल किसी
अकबर बीरबल बिनोद २८ सरकारी काम से बाहर गया था। इसलिये जब कई दिन पश्चात वह लौटा तो बादशाह ने वही प्रश्न बीरबल से भी किया। भला बीरबल कब चूकने वाला था, वह झट बोला-"पृथ्वीनाथ ! जिस तरह से अन्य लोगों को अधोवायु होती है उसी तरह मुझे भी होती है।" बीरबल के इस उत्तर से बादशाह बहुत नाराज हुआ और उससे बोला-"वाह खूब अच्छे रहे ! इस सभा में ऐसा एक भी आदमी नहीं है जिसे अधोवायु सरती हो, फिर तुम्हें कैसे सरने लगी ? जब यही बात है तो तुम दरबार से बाहर चले जावो और जब तक मैं तुम्हें आने की आज्ञा न दूँ कदापि न आना। बीरबल हाजिर जवाब था उसे उत्तर प्रत्युत्तर करने में हिचकिचाहट नहीं होती थी। परन्तु मौका देखकर काम करना बुद्धिमानो का काम है। बादशाह को अपने ऊपर बहुत नाराज देख वहाँ से वह तत्काल बाहर चला गया। बेगम को नजरबन्द हुए जब बहुत दिन हो गए तो एक दिन वह अपने नजरबन्दी के कष्टों से ऊब कर बीरबल को बुलवाया और उससे आजिजी कर बोली-"बीरबल ! आपकी मदद के बिना मेरा उद्धार नहीं हो सकता कोई तरकीब निकाल कर मुझे इस निविड़ कैद से मुक्त करो। मेरा जीवन असंभव हो रहा है। बीरबल ने कहा-"दूसरे की वकालत वही कर सकता है जो निर्दोष हो मैं तो खुद ही तुम्हारे दोष में शामिल हूँ तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ ? बेगम बीरबल को भलीभाँति जानतीथी अतएव उसकी बात
२६ Akbar Birbal Binod अकबर बीरबल बिनोद
बीच में ही काट कर बोली-"बीरबल ! तुमको मैं भलीभाँति जानती हूँ, मेरा दृढ़ विश्वास है कि चाहे बादशाह तुम से भले ही नाखुश हों, परन्तु उनको मना लेना तुम्हारे बायें हाथ का खेल है ! बेगम की इस युक्तिसंगत बात को सुनकर बीरबल खुश होकर उसके कार्यसाधन के निमित्त दश हजार रुपये की माँग पेश की । उसे तत्क्षण दशहजार की थैली समर्पण की गई । बीरबल घर पहुँचकर एक सुनार को बुलवाया वह अपने काम का बड़ा पक्का था । वीरबल उसको रुपये की एक थैली देकर बोला-"सेठजी मुझे मोती मंडित सुवर्ण का एक जव की बाली दर्कार है, इसलिये आप उत्तम २ मोतियों को बाजार से संग्रह कर उन्हें सोने में इस प्रकार जड़ो कि देखने में हूबहू जव की बाली ही जान पड़े ।” सुनार कुछ कालोपरान्त एक उत्कृष्ट बाली बना लाया । बीरबल उसे देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे कुछ द्रव्य इनाम में देकर बिदा किया। आप उस बाली को लेकर बादशाह के महल की तरफ चला । दर्बार में पहुँचते।पहुँचते आधा दिन ढल गया । पहरेदारों से अपने आने का सन्देशा बादशाह के पास यह भेजा कि-“पृथ्वीनाथ ! मैं एक बड़े आवश्यक कार्यवश आपसे मिलने आया हूँ यदि आज्ञा हो तो अन्दर आऊँ ।” बादशाह ने आज्ञा देकर बीरबल को दर्बार में बुलवा लिया । बीरवल बादशाह के पास पहुँचकर नियम अनुसार सलाम कर बगल में बैठ गया और मोती उसके हाथ में देकर बोला-
अकबर बीरबल बिनोद ३० "गरीबपरवर ! यह मोती का बीज एक बाहरी व्यापारी लेकर आया,था जिससे मैंने बड़ी कठिनता से प्राप्त किया है। इसमें एक खास खसूसियत यह है कि यदि कोई पाक साफ आदमी इसको अच्छी जमीन में बोयेगा तो इसी के समान और बहुत सी मोतियाँ पैदा होंगी । मैंने देखा कि यह काम सिवा आपके दूसरा कोई न कर सकेगा अतएव आपकी सेवा में लेकर उपस्थित हुआ हूँ। कृपया इसको किसी अच्छी जमीन पर बो दीजिये, आपको आगे चलकर इससे बड़ा लाभ होगा। बादशाह उसकी बात मानकर तुरत आज्ञा दिया-"बीरबल ! इसके योग्य जमीन ढूँढ़कर सूचना दो। परवाने में यह भी लिखा था कि जिस जमीन को बीरबल इस कार्य्य के लिये पसन्द करेगा वह चाहे बड़ी आलीशान मकानों से ही क्यों न सुशोभित की गई हो, तुरत साफ करा दी जायगी । बीरबल की खूब बन आई उसने अपने पुराने बैरियों के मकानात को आर्डर देकर तोड़वा दिया। कितने लोगों ने तो बीरबल के आतंक से बचने के लिये बड़ी बड़ी रकमों की घूसें दीं। पहले वह नाक भौं सिकोड़ कर लोगों को टरकाता, परन्तु जब न मानते और बहुत मिन्नत करते तो किसी से कम और किसी से बेस लेकर उनका मकान छोड़ देता । जब बीरबल का खासी रकम मिल गई तो बड़े बड़े महलों को गिरवाना बन्द कर दिया बाद को गरीबों की झोपड़ियों का चौगुनी कीमत देकर कुछ झोपड़ियाँ गिरवा कर एक खासी चौरस जमीन बना ली
३१ अकबर बीरबल बिनोद ओर उसे खूब जोतवाकर उसमें उत्तम प्रकार की खाद डलवा दी। पंक्ति से आवपाशी कराकर उसको भली-भाँति सिंचवा कर खेत को दुरुस्त करवा लिया। जब बीज बोने के काबिल खेत तैयार हुआ तब बीरबल ने एक दूत द्वारा बादशाह के पास खबर भेजी-“पृथ्वीनाथ ! आपका खेत तैयार हो गया है अब आप सभा सदों के सहित पधार कर खेत का मुलाहिजा फर्मावें। बीरबल उस मोती के बीज को लेकर सभा के सम्मुख आया और उसे बादशाह को दिखा कर बोला-“हुजूर ! इस बीज को बोने वाला खूब पाक साफ मनुष्य होना चाहिये, जिससे दुर्गन्धि आती होगी उसके बोने से बीज से हरगिज मोती नहीं उगेगी। इसलिये जिसके शरीर से कभी वायु न सरती हो वही इसको बोये। आपके दर्बार में तो ऐसों की कमी भी नहीं है। किसी एक को आज्ञा दीजिये कि जो इस काम को प्रसन्नता पूर्वक करे। बादशाह ने एक एक कर अपने सभी उपस्थित सभासदों से पूछा परन्तु कोई बीज बोनेके लिये हामी न हुआ। लगभग हजारों की संख्या में लोग उपस्थित थे पर सभों ने नहीं कर दिया। कारण कि यदि कोई यह कहकर कि मुझे हवा नहीं सरती, मोती बोने का साहस करता और कहीं बाद में मोती न उगती तो उसकी गर्दन मारी जाती। तब बादशाह ने बीरबल को बीज बोने के लिये कहा। बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ ! यह तो मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि मुझको वायु सरती है, आपके सामने बहुतेरे
अकबर बीरबल बिनोद ३२ लोगों ने इस बात की साक्षी दी है कि उनको वायु नहीं सरती तो बड़े अफसोस की बात है कि बीज बोने के लिये कोई तैयार क्यों नहीं होता। श्रीमान को भी वायु नहीं सरती अतएव अब इस काम को स्वयं आपही करें तो कितना उत्तम हो। बादशाह बीरबल के प्रस्ताव को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि मुझे भी तो वायु सरती है। इस संसार में ऐसा एक भी मनुष्य न निकलेगा जिसे वायु न सरती हो। तब बीरबल ने मौका देखकर कहा-“पृथ्वीनाथ ! जब यही बात है तो बेगम और मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया था जिसके लिये हम दंडित किये गये। बीरबल की इस युक्ति से बादशाह का गुस्सा शान्त हो गया और बेगम को महल में बुलवाने की आज्ञा दी। बीरबल भी दीवान पद पर नियुक्त किया गया। नया कौतुक । अकबर बादशाह को ठट्ठेबाजी का बड़ा शौक था और दैवयोग से बीरबल भी बड़ा ठट्ठेबाज था। एक दिन बादशाह और बीरबल में ठट्ठेबाजी हो रही थी बादशाह ने कहा-“बीर- बल बहुत दिन हुआ कोई नया कौतुक तुमने मुझे नहीं दिखलाया अतएव अब कोई ऐसा नवीन कौतुक दिखलाओ जैसा फिर कभी देखने में न आवे ।” बीरबल हँसते हुये बादशाह की आज्ञा शिरोधार्य की और बोला-“हुजूर इसमें कोई कठिनता की बात नहीं है परन्तु उसकी तैयारी करने में
३३ अकबर बीरबल विनोद
३३ अकबर बीरबल विनोद दो लाख रुपये खर्च पड़ेगे। बीरबल को तत्काल दो लाख रुपये दिये गये। वह उन रुपयों को लेकर घर गया। दूसरे दिन स्नान ध्यान से निवृत्त होकर एक लाख तो ब्राह्मणों को दान किया बाकी एक लाख रुपये अपने काममें खर्च किया। जब रुपया लिये बहुत दिन हो गये तो एक दिन बीरबल के जी में आया कि जो बादशाह को किसी दिन कौतुक की बात याद आयेगी तो वह तत्काल तकाजा कर बैठेगा इसलिये इसको गुप चुप इसी समय कर दिखाना चाहिये। वह बीमारी का बहाना कर दरबार जाना बन्द कर दिया; धीरे धीरे बीरबलके बीमारी की बात बादशाह के कानों तक पहुँची। वह घबड़ाकर इलाज के लिये बड़े बड़े हकीम और वैद्यों को उसके पास भेजा, पर उसकी बीमारी घटने के बजाय दिनोंदिन बढ़ती ही गई। यह समाचार सुन बादशाह एक दिन स्वयं बीरबल से मिलने गया। बादशाह को देखकर बीरबल रोने लगा और बोला—"पृथ्वीनाथ ! अब मेरी जिन्दगी का अन्तिम दिन है, इस बीमारी से मैं बच नहीं सकता। बीरबल के असाधारण बीमारी से बादशाह को बड़ा खेद हुआ और वह बीरबल को तसल्ली देता हुआ बोला-“बीरबल ! तुम जानते ही हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूँ; तुम्हारे बिना मेरा एक क्षण भी सुखपूर्वक नहीं बीत सकता। खुदा करे ऐसा न हो; नहीं तो तुम्हारी मौत से बढ़कर मेरी मौत होगी।" बीरबलने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! विधि के विधान में
अकबर बीरबल विनोद ३४
अकबर बीरबल विनोद ३४ कोई उलट फेर नहीं कर सकता। समय आने पर किसी की चाहे कितनी ही प्यारी वस्तु क्यों न हो, हाथ से निकल जाती है। आप से यह मेरी अन्तिम प्रार्थना है कि मेरे पीछे कृपाकर मेरे कुटुम्ब का पालन करते रहियेगा। आपके अतिरिक्त कोई उनको सहारा देनेवाला नहीं है। आह ! ...आह... !! मेरा जी बहुत घबड़ा रहा है। इसप्रकार ढोंग रचकर बीरबल अपने तईं को ऐसा बनाया मानों कोई सचमुच असाधारण बीमार हो। बादशाह बोला-“तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो, मैं तुम्हारे बाल बच्चों का अच्छी तरह पालन करता रहूँगा।” इसके बाद बादशाह वहाँ से बिदा हो अपने महल को चला गया। इधर जब रात्रि आई तो बीरबल के घर से रोने की आवाज आने लगी। बीरबल के मृत्यु का समाचार लोगों के कानों कान पहुँचा। क्रमशः खबर पाकर बीरबल के जाति विरादरी के लोग एकत्रित हुये। सर्वसम्मति से उरद का एक पुतला बनाकर उसके साथ कुछ रिश्ते के लोग स्मशान पहुँचे और उसे चितापर विधिवत रखकर उसमें आग लगा दी। इधर बीरबल तहखाने की एक कोठरी में छिप रहा और अपने घर के लोगों से सख्त मनाही कर दी की उसके छिपने का हाल किसी पर विदित न हो। जब बीरबल के मृत्यु का समाचार बादशाह के पास पहुँचा, तो वह अपने प्यारे दीवान की मृत्यु पर शोक करने लगा, परन्तु अन्य मुसलमान अमीर उमराव बीरबल की मृत्यु से बड़े प्रसन्न हुए और इस खुशी में फकीरों को मिठाई खिलाई। हिन्दू प्रजा अनाथ सी होकर चारों तरफ शोक मनानेलगी।
३५ अकबर बीरबल विनोद
३५ अकबर बीरबल विनोद लोगों ने कई दिनों तक अपना २ कार्य क्रम बन्द रक्खा । हर तरफ से बीरबल की मृत्यु का समाचार आने लगा । बाद- शाह ने बीरबल के बालकों को उसकी क्रिया करने के लिये काफी सहायता दी ; कुछ दिनों तक अकबर बिना दीवान के ही सभासदों की सहायता से राजकीय कार्यों को निपटाता रहा, परन्तु जब प्रजावर्ग और बादशाह दोनों को क्रमशः बीरबल विस्मर्ण हो गया तो सभासदों की सम्मति से एक मुसलमान को अपना दीवान बनाया । नये दीवान की अन्धाधुन्धी से प्रजा वर्ग में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और चारों तरफ से त्राहि-त्राहि की ध्वनि सुन पड़ने लगी । अपनी मृत्यु के एक वर्ष पश्चात् बीरबल अपने कार्य साधन के लिये तत्पर हुआ और अपने पुत्र को एक लाख रुपया देकर बोला-“ तुम यहाँ से दो मील दूर किसी पहाड़ी पर एक बड़ा भव्य महल तय्यार कराओ । महल ऐसा हो कि उसकी लपट ( चमक ) कई मीलों तक पहुँचे । यह काम बड़े गुप्त रूपसे करना है, अतएव महल का पूर्णतया निर्माण एक ही रात में होना चाहिये ।” बीरबल का पुत्र बड़ा समझदार था । पिताके आदेश पर पहले महल में लगने वाली वस्तुओं को बड़ी सावधानी से संग्रह किया । जब उसे भली भाँति सन्तोष हो गया कि अब समान के अभाव में महल बनने का कोई काम न रुकेगा, तो वह गुप्त रीति से बहुत से कारीगरों को नियुक्त कर एक रात में हल्ला बोल दिया, और कारीगरों को भली- भाँति ताकीद करदी कि महल बनने का काम बड़ी गुप्त रीति
अकबर बीरबल विनोद ३६
अकबर बीरबल विनोद ३६ से किया जाय और महल एक ही रात में बनकर तय्यार हो। महल रातो-रात बनकर तय्यार हो गया। कारीगरों ने भली-भाँति दस्तकारी दिखलाई। लकड़ी पर इस सफाई से रोगन किया कि कोई भी देखकर नहीं कह सकता था कि वह लकड़ी का बना है। स्थान-स्थान पर शीशों को ऐसी खूबी से जड़ दिया कि उसकी चमक कोसों तक फैलती थी। तब बीरबल खूब साफ सुथरे वस्त्रों से सुसज्जित होकर उस नये महल में आबाद हुआ। सबेरा होते ही वह बड़े ठाट बाट से सजकर नगर में पहुँचा। एक वर्ष का विश्राम पाकर बीरबल खूब तगड़ा हो गया था। अच्छी सेवा होने से उसके शरीर के अंग प्रत्यंग खिल गये थे। नगर में जाते समय उसे देखकर किसी को बीरबल होने का भ्रम न हुआ। इस प्रकार देखता भालता राजदरबार में जा पहुँचा। एक लब्ध प्रतिष्ठ आगन्तुक को देखकर सभासदगण एकटक उसी की तरफ देखने लगे, सभा का काम बन्द होगया; परन्तु किसी ने उसको छेड़ा नहीं। अन्त में कुछ देर बाद बादशाह ने पूछा- "आप कौन हैं! कहाँ से आये हैं, और यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?" बादशाहके ऐसे अपरिचितों से प्रश्नों को सुन कर बीरबल बोला-"गरीबपरवर! मैं आपका पुराना दीवान बीरबल हूँ।" बादशाह भौंचक सा हो गया और रुखाई से बोला-"अर्य! बीरबल; तू तो मर गयाथा न, फिर सजीव कैसे लौटा। बीरबल ने उत्तर दिया-"हुजूर! मैं मर तो गया था परन्तु जब स्वर्ग लोक को गया तो इन्द्र मुझपर प्रसन्न होकर मुझे अपना मंत्री बना लिया, तबसे मेरा दिन बड़ा
३७ अकबर बीरबल बिनोद सुखपूर्वक बीतता है, मेरी सेवा के लिये अप्सरायें नियुक्त हुई हैं। सर्वदा खाने को उत्तमोत्तम पदार्थ और पान करने के लिये अमृत प्रस्तुत रहता है।" बीरबल की ऐसी बातें सुन बादशाह ने पूछा—"तो ऐसे आनन्द उपभोग को छोड़कर तुम्हारा यहाँ आना कैसे हुआ ?" बीरबल ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया—"पृथ्वीनाथ ! आप हमारे पुराने अन्न दाता हैं, यह स्मरण कर इन्द्र से मुहलत लेकर आपसे मिलने आया हूँ, आपके किये हुए उपकार मेरे हृदय-पट पर अंकित हैं इसीलिये आपके निमित्त स्वर्गलोक से एक उत्तम महल और एक परी साथ लाया हूँ। उपरोक्त दोनों चीजें यहाँ से थोड़ी दूर एक पहाड़ी पर छोड़ आया हूँ, यदि आप यहाँ तक चलने का कष्ट करें तो मैं उन्हें आप को दिखला दूँ। बीरबल की बातें बादशाह को सच्ची जान पड़ीं। उसने मनमें अनुमान किया—"जब बीरबल मर गया था तो बिना प्रयोजनके हुये लौटकर कैसे आया, और आया भी तो परी और महल इसके हाथ कैसे लगा। निःसन्देह बीरबल सत्य कहता है ! उन चीजों की परीक्षा के लिये नये दीवान और कुछ अन्य प्रतिष्ठित लोगों को उसके साथ भेजा। बीरबल सबके साथ२ चलकर उस पहाड़ीके समीप जापहुँचा और उन लोगोंको दूर से अँगुली का इशारा करके बोला—"देखो वह सातवें खंड पर बैठी हुई परी हम लोगों की तरफ ध्यानपूर्वक देख रही है। अधिक आदमियों को एक साथ अपने ही तरफ आते देखकर उसे ताज्जुब हो रहा है, उसका चन्द्रमुख कैसा चमक रहा है?
अकबर बीरबल विनोद ३८
अकबर बीरबल विनोद ३८ उसकी बिखरी लटें स्याही काली नागिन के समान लपलपा रही हैं। आदि आदि कई प्रकार के चकमें देकर बड़ी मुलायमी से पूछा-“क्यों; वे सब बातें अब तक आप लोगों को दिखलाई पड़ीं वा नहीं, यदि न दीख पड़ती हों तो अभी मोका है उन्हें भली भाँति देखलें, ये सब बातें आप लोगों को बादशाह से कहनी पड़ेंगी। फिर किसी प्रकार हीला हवाली करने से काम न चलेगा। बीरबल के साथ एक से एक सुप्रतिष्ठित नागरिक और दरबारी भेजे गये थे, वे ऐसी कौतूहल भरी वार्ता सुन मन में कहने लगे-“हो न हो यह बीरबल प्रेत होकर आया हो ! क्योंकि सिवा महल के इसकी बतलाई एक बात भी हमें नहीं दीख पड़तीं। बीरबल के बारंबार पूछने पर उन लोगों ने एक स्वर से कहा-“अफसोस हमें सिवा महलके और कुछ भी नहीं दीख पड़ता।” तब बीरबल बोला-“आप लोग क्षमा करेंगे, मैं पहले आप लोगों से एक बात कहना भूल गया था, वह यह कि इस लोक के मनुष्य अधिक तर पाप कर्म में रत हैं, दूसरे बहुत से लोग वर्णशंकर भी हो गये हैं इसलिये इन दोनों श्रेणी के मनुष्यों के अतिरिक्त बाकी लोगों को ही ये स्व- र्गीय चीजें दीख पड़ेंगी। एक बार फिर से देखकर आप लोग सत्यासत्य का निर्णय कर लें।” बीरबल फिर पहले की तरह सबको दिखलाना शुरू किया। इस बार लोग बड़ीसत- र्कता से देख रहे थे, पर कुछ हो तब तो दिखलाई पड़े, सिवा महल के उनकी दृष्टि में और कुछ भी न आया। परन्तु वर्णशंकर बनने के भय से सब लोगों ने परी का दिखलाई
अकबर-बीरबल विनोद
३६ अकबर-बीरबल विनोद
पड़ना स्वीकार किया और एक साथ ही बोल उठे-“वाह वाह ! क्या कहना !! जो परी का नाम सुना था सो आज प्रत्यक्ष देखने में आई, ऐसो वारांगणा आज तक मृत्युलोक में किसी को दृष्टिगत न हुई होगी ।” बीरबल बोला-“आप लोग भली-भाँति पुनः पुनः देख लीजिये क्योंकि यह बात बादशाह के सामने कहनी पड़ेगी ।” दरबारियों ने कहा-“निसन्देह हम सब इस बात को बादशाह के सामने भी इसी प्रकार ज्यों की त्यों कहदेंगे । पहले तो बीरबल इन लोगों की मूर्खता पर मन में बड़ी देर तक हर्ष मनाता रहा, परन्तु उनको अपने माफिक समझ कर शान्त रहा । इन्हें यह सब देखते सुनते बहुत देर हो गई । उधर बादशाह भी इनकी प्रतीक्षा करते करते घबड़ा रहा था, इसी बीच बीरबल सबको साथ लिये हुये जा पहुँचा । इनको देखते ही बादशाह प्रफुल्लित होगया और हर्ष के सहित नये दीवान तथा अन्य बड़े बड़े कर्मचारियों से वहाँ का समाचार पूछा । वे बीरबल के कथन की पुष्टि करते हुए महल और परी का होना स्वीकार किये, बल्कि कुछ और बढ़ा चढ़ा कर वर्णन किये । नया दीवान बोला-“हुजूर लाहौल बिला कूवत ! ऐसी परी क्या आज तक किसी को नसीब हुई होगी । नाहक यहाँ की स्त्रियाँ अपनी खूबसूरती का डींग हाँकती हैं । महल की शोभा और चमक तो सूर्य के तेज को भी मात करने वाली है ।” दीवान के मुख से वहाँ की प्रशंसा सुन बादशाह और भी भुलावे में पड़गया और उसका हृदय काबू से बाहर होने