अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
२८१ \qquad अकबर बीरबल विनोद
२८१ \qquad अकबर बीरबल विनोद लोग चलकर मेरी झोपड़ी में विश्राम करो, सुबह होते ही अपने रास्ते चले जाना।” बीरबल ने पहले तो बूढ़े के प्रस्ताव को अनमनस्क होकर टाल दिया, परन्तु उसके बारंबार आग्रह करते रहने पर दोनों अपने २ घोड़ों पर सवार होकर उसके साथ हो लिये। कुछ दूर चलकर बूढ़े का झोपड़ा मिला। वह घोड़ों को अपने बाड़े में बँधवा कर उन्हें झोपड़े में लिवा ले गया और उनके विश्राम के लिये दो पृथक् पृथक् स्थान दिखला कर आप भी अपनी चारपाई पर जा लेटा। सबेरा होते ही बीरबल वहाँसे प्रस्थान करने की तय्यारी करने लगा। इतने में वह बुड्ढा ठेंगता २ आ पहुँचा और बीरबल से आग्रह पूर्वक बोला-“आप लोग न जाने मेरे किस पूर्व पुण्य से इस झोंपड़ी में आ गये हैं। रात्रि में आपके भोजनादि का कुछ प्रबन्ध नहीं हो सका जिस कारण मैं बड़ा शरमिन्दा हूँ, परन्तु अब आपको यहाँ से बिना भोजन किये जाना मुनासिब नहीं है, मुझ दीन की यह क्षुद्र सेवकाई आपको स्वीकार करना उचित और धर्मसंगत है।” बीरबल ने देखा कि एक तो हम लोग एक दिन के भूखे हैं दूसरे परदेश का मामला है। कब भोजन की व्यवस्था होगी और कब नहीं, इससे बेहतर है कि इस बुड्ढे वाली करके चलें। बुड्ढा बीरबल की स्वीकृति प्राप्त कर प्रसन्न हो गया और तुरत जंगली खाद्य सामग्रियों को लाकर उनको भोजन कराया। तब दोनों प्रसन्न प्रसन्न बुड्ढे से अनुमति लेकर नगर की तरफ अग्रसर हुए। ब्रह्मदेश की राजधानी आवा नगरी बड़ी मनोरम थी। वहाँ
अकबर बीरबल विनोद २६२
अकबर बीरबल विनोद २६२ की सड़कें और उच्च अट्टालिकाओं की उपमा दिल्ली नगर से कहीं बढ़ चढ़ कर थी। राजा बड़ा दयालु साहसी और प्रजावत्सल था, ऐसे राजा के सुशासन में प्रजा बड़ी खुश- हाल थी। क्या मजाल कि कोई सबल किसी निर्बल पर प्रहार करे, शेर बकरी एक घाट पानी पीते थे। विशेष कहना बाक्य चातुरी दिखलाना होगा। वहाँ हर तरह से राम राज्य था। राज्य वर्ग के कर्मचारी बड़े धर्मपरायण और ईमानदार थे। घूस खोरी कत्तई बन्द थी, सिफारिश करने वाला स्वयं दंडिए किया जाता था। ऐसी सुन्दर नगरी की सुन्दर व्य- वस्था को देखते सुनते तानसेन और बीरबल चले जारहे थे। इनकी उत्तम २ पोशाकों को देखकर वहाँ के निवासी उन्हें उच्च बंशीय समझ कर उनका सब जगह स्वागत करते थे। वे राज सभा को पूछते हुए नगर में चले जा रहे थे कि इसी बीच चोबदार ने पूछा-"आप लोंगों का यहाँ आना किस निमित्त हुआ है और आपका कहाँ से शुभ आगमन हुआ है।" बीरबल बोला-"हम दिल्ली के निवासी हैं। बादशाह का पत्र लेकर यहाँ के राजा से मिलने आये हैं।" इनका आशय समझ- कर चोबदार इन्हें राजा सभा में ले गया। और ड्योढ़ी पर ठहरा कर आप राजा के पास जाकर इनके आने की सूचना दी। राजाज्ञा प्राप्तकर वह इन दोनों को महाराज के सन्निकट पहुँचा दिया। ये बड़े अदबसे सलाम कर महाराज की आज्ञा से वहींएक स्थान पर बैठ गये। जब महाराज राजकीय कामों को खतम करके निश्चित हुए तो इनके आनेका कारण पूछा। बीर- बल कुछ उत्तर न देकर बादशाह का दिया हुआ पत्र महराज