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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

२७ अकबर बीरबल विनोद

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२७ अकबर बीरबल विनोद


राध की माफी माँगी और उसको आदरपूर्वक अपने मकान पर ले गया। उसने अपना सारा धन शेरअली के हवाले कर दिया। शेरअली बहुत बड़ा व्यापारी था उसका सारा कारोबार ईमान पर चलता था। उसने विचार किया-“व्यापार से मेरे धन के अतिरिक्त जो कुछ नसीबा ने अधिक उपार्जन किया है वह उसके परिश्रम का है। उसने अपना असली धन लेकर शेष बचा धन नसीबा के हवाले किया और खुशी खुशी अपने ईरान शहर को लौट गया।


मोती की खेती।

एक दिन की घटना है कि बादशाह और बेगम दोनों भोजनोपरान्त बाग में झूला झूलते हुए सानन्द गपशप लड़ा रहे थे अचानक बेगम की उर्ध्ववायु खुली, जिससे बादशाह बहुत चिढ़ गया और बेगम को तुरत महल से बाहर निकल जाने की आज्ञा दी। बेगम शहर से बाहर एक बाग में कैदी की सूरत में नजरबन्द कर दी गई। बाद- शाह को वही धुन सवार थी। दूसरे दिन जब सबेरे दरबार लगा तो बादशाह ने सभासदों से पूछा-"क्या कभी तुमलोगों को भी अधोवायु निकलती है ? अधोवायु निकलने के कारण बेगम का दण्डित होना सबपर विदित था इस कारण एक स्वर से सभों ने इन्कार कर दिया, और उस दिन का दुर्वार समाप्त हुआ। जिस दिन की यह बात थी उस दिन बीरबल किसी

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अकबर बीरबल बिनोद २८ सरकारी काम से बाहर गया था। इसलिये जब कई दिन पश्चात वह लौटा तो बादशाह ने वही प्रश्न बीरबल से भी किया। भला बीरबल कब चूकने वाला था, वह झट बोला-"पृथ्वीनाथ ! जिस तरह से अन्य लोगों को अधोवायु होती है उसी तरह मुझे भी होती है।" बीरबल के इस उत्तर से बादशाह बहुत नाराज हुआ और उससे बोला-"वाह खूब अच्छे रहे ! इस सभा में ऐसा एक भी आदमी नहीं है जिसे अधोवायु सरती हो, फिर तुम्हें कैसे सरने लगी ? जब यही बात है तो तुम दरबार से बाहर चले जावो और जब तक मैं तुम्हें आने की आज्ञा न दूँ कदापि न आना। बीरबल हाजिर जवाब था उसे उत्तर प्रत्युत्तर करने में हिचकिचाहट नहीं होती थी। परन्तु मौका देखकर काम करना बुद्धिमानो का काम है। बादशाह को अपने ऊपर बहुत नाराज देख वहाँ से वह तत्काल बाहर चला गया। बेगम को नजरबन्द हुए जब बहुत दिन हो गए तो एक दिन वह अपने नजरबन्दी के कष्टों से ऊब कर बीरबल को बुलवाया और उससे आजिजी कर बोली-"बीरबल ! आपकी मदद के बिना मेरा उद्धार नहीं हो सकता कोई तरकीब निकाल कर मुझे इस निविड़ कैद से मुक्त करो। मेरा जीवन असंभव हो रहा है। बीरबल ने कहा-"दूसरे की वकालत वही कर सकता है जो निर्दोष हो मैं तो खुद ही तुम्हारे दोष में शामिल हूँ तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ ? बेगम बीरबल को भलीभाँति जानतीथी अतएव उसकी बात

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२६ Akbar Birbal Binod अकबर बीरबल बिनोद

बीच में ही काट कर बोली-"बीरबल ! तुमको मैं भलीभाँति जानती हूँ, मेरा दृढ़ विश्वास है कि चाहे बादशाह तुम से भले ही नाखुश हों, परन्तु उनको मना लेना तुम्हारे बायें हाथ का खेल है ! बेगम की इस युक्तिसंगत बात को सुनकर बीरबल खुश होकर उसके कार्यसाधन के निमित्त दश हजार रुपये की माँग पेश की । उसे तत्क्षण दशहजार की थैली समर्पण की गई । बीरबल घर पहुँचकर एक सुनार को बुलवाया वह अपने काम का बड़ा पक्का था । वीरबल उसको रुपये की एक थैली देकर बोला-"सेठजी मुझे मोती मंडित सुवर्ण का एक जव की बाली दर्कार है, इसलिये आप उत्तम २ मोतियों को बाजार से संग्रह कर उन्हें सोने में इस प्रकार जड़ो कि देखने में हूबहू जव की बाली ही जान पड़े ।” सुनार कुछ कालोपरान्त एक उत्कृष्ट बाली बना लाया । बीरबल उसे देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे कुछ द्रव्य इनाम में देकर बिदा किया। आप उस बाली को लेकर बादशाह के महल की तरफ चला । दर्बार में पहुँचते।पहुँचते आधा दिन ढल गया । पहरेदारों से अपने आने का सन्देशा बादशाह के पास यह भेजा कि-“पृथ्वीनाथ ! मैं एक बड़े आवश्यक कार्यवश आपसे मिलने आया हूँ यदि आज्ञा हो तो अन्दर आऊँ ।” बादशाह ने आज्ञा देकर बीरबल को दर्बार में बुलवा लिया । बीरवल बादशाह के पास पहुँचकर नियम अनुसार सलाम कर बगल में बैठ गया और मोती उसके हाथ में देकर बोला-

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अकबर बीरबल बिनोद ३० "गरीबपरवर ! यह मोती का बीज एक बाहरी व्यापारी लेकर आया,था जिससे मैंने बड़ी कठिनता से प्राप्त किया है। इसमें एक खास खसूसियत यह है कि यदि कोई पाक साफ आदमी इसको अच्छी जमीन में बोयेगा तो इसी के समान और बहुत सी मोतियाँ पैदा होंगी । मैंने देखा कि यह काम सिवा आपके दूसरा कोई न कर सकेगा अतएव आपकी सेवा में लेकर उपस्थित हुआ हूँ। कृपया इसको किसी अच्छी जमीन पर बो दीजिये, आपको आगे चलकर इससे बड़ा लाभ होगा। बादशाह उसकी बात मानकर तुरत आज्ञा दिया-"बीरबल ! इसके योग्य जमीन ढूँढ़कर सूचना दो। परवाने में यह भी लिखा था कि जिस जमीन को बीरबल इस कार्य्य के लिये पसन्द करेगा वह चाहे बड़ी आलीशान मकानों से ही क्यों न सुशोभित की गई हो, तुरत साफ करा दी जायगी । बीरबल की खूब बन आई उसने अपने पुराने बैरियों के मकानात को आर्डर देकर तोड़वा दिया। कितने लोगों ने तो बीरबल के आतंक से बचने के लिये बड़ी बड़ी रकमों की घूसें दीं। पहले वह नाक भौं सिकोड़ कर लोगों को टरकाता, परन्तु जब न मानते और बहुत मिन्नत करते तो किसी से कम और किसी से बेस लेकर उनका मकान छोड़ देता । जब बीरबल का खासी रकम मिल गई तो बड़े बड़े महलों को गिरवाना बन्द कर दिया बाद को गरीबों की झोपड़ियों का चौगुनी कीमत देकर कुछ झोपड़ियाँ गिरवा कर एक खासी चौरस जमीन बना ली

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३१ अकबर बीरबल बिनोद ओर उसे खूब जोतवाकर उसमें उत्तम प्रकार की खाद डलवा दी। पंक्ति से आवपाशी कराकर उसको भली-भाँति सिंचवा कर खेत को दुरुस्त करवा लिया। जब बीज बोने के काबिल खेत तैयार हुआ तब बीरबल ने एक दूत द्वारा बादशाह के पास खबर भेजी-“पृथ्वीनाथ ! आपका खेत तैयार हो गया है अब आप सभा सदों के सहित पधार कर खेत का मुलाहिजा फर्मावें। बीरबल उस मोती के बीज को लेकर सभा के सम्मुख आया और उसे बादशाह को दिखा कर बोला-“हुजूर ! इस बीज को बोने वाला खूब पाक साफ मनुष्य होना चाहिये, जिससे दुर्गन्धि आती होगी उसके बोने से बीज से हरगिज मोती नहीं उगेगी। इसलिये जिसके शरीर से कभी वायु न सरती हो वही इसको बोये। आपके दर्बार में तो ऐसों की कमी भी नहीं है। किसी एक को आज्ञा दीजिये कि जो इस काम को प्रसन्नता पूर्वक करे। बादशाह ने एक एक कर अपने सभी उपस्थित सभासदों से पूछा परन्तु कोई बीज बोनेके लिये हामी न हुआ। लगभग हजारों की संख्या में लोग उपस्थित थे पर सभों ने नहीं कर दिया। कारण कि यदि कोई यह कहकर कि मुझे हवा नहीं सरती, मोती बोने का साहस करता और कहीं बाद में मोती न उगती तो उसकी गर्दन मारी जाती। तब बादशाह ने बीरबल को बीज बोने के लिये कहा। बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ ! यह तो मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि मुझको वायु सरती है, आपके सामने बहुतेरे

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अकबर बीरबल बिनोद ३२ लोगों ने इस बात की साक्षी दी है कि उनको वायु नहीं सरती तो बड़े अफसोस की बात है कि बीज बोने के लिये कोई तैयार क्यों नहीं होता। श्रीमान को भी वायु नहीं सरती अतएव अब इस काम को स्वयं आपही करें तो कितना उत्तम हो। बादशाह बीरबल के प्रस्ताव को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि मुझे भी तो वायु सरती है। इस संसार में ऐसा एक भी मनुष्य न निकलेगा जिसे वायु न सरती हो। तब बीरबल ने मौका देखकर कहा-“पृथ्वीनाथ ! जब यही बात है तो बेगम और मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया था जिसके लिये हम दंडित किये गये। बीरबल की इस युक्ति से बादशाह का गुस्सा शान्त हो गया और बेगम को महल में बुलवाने की आज्ञा दी। बीरबल भी दीवान पद पर नियुक्त किया गया। नया कौतुक । अकबर बादशाह को ठट्ठेबाजी का बड़ा शौक था और दैवयोग से बीरबल भी बड़ा ठट्ठेबाज था। एक दिन बादशाह और बीरबल में ठट्ठेबाजी हो रही थी बादशाह ने कहा-“बीर- बल बहुत दिन हुआ कोई नया कौतुक तुमने मुझे नहीं दिखलाया अतएव अब कोई ऐसा नवीन कौतुक दिखलाओ जैसा फिर कभी देखने में न आवे ।” बीरबल हँसते हुये बादशाह की आज्ञा शिरोधार्य की और बोला-“हुजूर इसमें कोई कठिनता की बात नहीं है परन्तु उसकी तैयारी करने में

३३ अकबर बीरबल विनोद

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३३ अकबर बीरबल विनोद दो लाख रुपये खर्च पड़ेगे। बीरबल को तत्काल दो लाख रुपये दिये गये। वह उन रुपयों को लेकर घर गया। दूसरे दिन स्नान ध्यान से निवृत्त होकर एक लाख तो ब्राह्मणों को दान किया बाकी एक लाख रुपये अपने काममें खर्च किया। जब रुपया लिये बहुत दिन हो गये तो एक दिन बीरबल के जी में आया कि जो बादशाह को किसी दिन कौतुक की बात याद आयेगी तो वह तत्काल तकाजा कर बैठेगा इसलिये इसको गुप चुप इसी समय कर दिखाना चाहिये। वह बीमारी का बहाना कर दरबार जाना बन्द कर दिया; धीरे धीरे बीरबलके बीमारी की बात बादशाह के कानों तक पहुँची। वह घबड़ाकर इलाज के लिये बड़े बड़े हकीम और वैद्यों को उसके पास भेजा, पर उसकी बीमारी घटने के बजाय दिनोंदिन बढ़ती ही गई। यह समाचार सुन बादशाह एक दिन स्वयं बीरबल से मिलने गया। बादशाह को देखकर बीरबल रोने लगा और बोला—"पृथ्वीनाथ ! अब मेरी जिन्दगी का अन्तिम दिन है, इस बीमारी से मैं बच नहीं सकता। बीरबल के असाधारण बीमारी से बादशाह को बड़ा खेद हुआ और वह बीरबल को तसल्ली देता हुआ बोला-“बीरबल ! तुम जानते ही हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूँ; तुम्हारे बिना मेरा एक क्षण भी सुखपूर्वक नहीं बीत सकता। खुदा करे ऐसा न हो; नहीं तो तुम्हारी मौत से बढ़कर मेरी मौत होगी।" बीरबलने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! विधि के विधान में

अकबर बीरबल विनोद ३४

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अकबर बीरबल विनोद ३४ कोई उलट फेर नहीं कर सकता। समय आने पर किसी की चाहे कितनी ही प्यारी वस्तु क्यों न हो, हाथ से निकल जाती है। आप से यह मेरी अन्तिम प्रार्थना है कि मेरे पीछे कृपाकर मेरे कुटुम्ब का पालन करते रहियेगा। आपके अतिरिक्त कोई उनको सहारा देनेवाला नहीं है। आह ! ...आह... !! मेरा जी बहुत घबड़ा रहा है। इसप्रकार ढोंग रचकर बीरबल अपने तईं को ऐसा बनाया मानों कोई सचमुच असाधारण बीमार हो। बादशाह बोला-“तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो, मैं तुम्हारे बाल बच्चों का अच्छी तरह पालन करता रहूँगा।” इसके बाद बादशाह वहाँ से बिदा हो अपने महल को चला गया। इधर जब रात्रि आई तो बीरबल के घर से रोने की आवाज आने लगी। बीरबल के मृत्यु का समाचार लोगों के कानों कान पहुँचा। क्रमशः खबर पाकर बीरबल के जाति विरादरी के लोग एकत्रित हुये। सर्वसम्मति से उरद का एक पुतला बनाकर उसके साथ कुछ रिश्ते के लोग स्मशान पहुँचे और उसे चितापर विधिवत रखकर उसमें आग लगा दी। इधर बीरबल तहखाने की एक कोठरी में छिप रहा और अपने घर के लोगों से सख्त मनाही कर दी की उसके छिपने का हाल किसी पर विदित न हो। जब बीरबल के मृत्यु का समाचार बादशाह के पास पहुँचा, तो वह अपने प्यारे दीवान की मृत्यु पर शोक करने लगा, परन्तु अन्य मुसलमान अमीर उमराव बीरबल की मृत्यु से बड़े प्रसन्न हुए और इस खुशी में फकीरों को मिठाई खिलाई। हिन्दू प्रजा अनाथ सी होकर चारों तरफ शोक मनानेलगी।

३५ अकबर बीरबल विनोद

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३५ अकबर बीरबल विनोद लोगों ने कई दिनों तक अपना २ कार्य क्रम बन्द रक्खा । हर तरफ से बीरबल की मृत्यु का समाचार आने लगा । बाद- शाह ने बीरबल के बालकों को उसकी क्रिया करने के लिये काफी सहायता दी ; कुछ दिनों तक अकबर बिना दीवान के ही सभासदों की सहायता से राजकीय कार्यों को निपटाता रहा, परन्तु जब प्रजावर्ग और बादशाह दोनों को क्रमशः बीरबल विस्मर्ण हो गया तो सभासदों की सम्मति से एक मुसलमान को अपना दीवान बनाया । नये दीवान की अन्धाधुन्धी से प्रजा वर्ग में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और चारों तरफ से त्राहि-त्राहि की ध्वनि सुन पड़ने लगी । अपनी मृत्यु के एक वर्ष पश्चात् बीरबल अपने कार्य साधन के लिये तत्पर हुआ और अपने पुत्र को एक लाख रुपया देकर बोला-“ तुम यहाँ से दो मील दूर किसी पहाड़ी पर एक बड़ा भव्य महल तय्यार कराओ । महल ऐसा हो कि उसकी लपट ( चमक ) कई मीलों तक पहुँचे । यह काम बड़े गुप्त रूपसे करना है, अतएव महल का पूर्णतया निर्माण एक ही रात में होना चाहिये ।” बीरबल का पुत्र बड़ा समझदार था । पिताके आदेश पर पहले महल में लगने वाली वस्तुओं को बड़ी सावधानी से संग्रह किया । जब उसे भली भाँति सन्तोष हो गया कि अब समान के अभाव में महल बनने का कोई काम न रुकेगा, तो वह गुप्त रीति से बहुत से कारीगरों को नियुक्त कर एक रात में हल्ला बोल दिया, और कारीगरों को भली- भाँति ताकीद करदी कि महल बनने का काम बड़ी गुप्त रीति

अकबर बीरबल विनोद ३६

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अकबर बीरबल विनोद ३६ से किया जाय और महल एक ही रात में बनकर तय्यार हो। महल रातो-रात बनकर तय्यार हो गया। कारीगरों ने भली-भाँति दस्तकारी दिखलाई। लकड़ी पर इस सफाई से रोगन किया कि कोई भी देखकर नहीं कह सकता था कि वह लकड़ी का बना है। स्थान-स्थान पर शीशों को ऐसी खूबी से जड़ दिया कि उसकी चमक कोसों तक फैलती थी। तब बीरबल खूब साफ सुथरे वस्त्रों से सुसज्जित होकर उस नये महल में आबाद हुआ। सबेरा होते ही वह बड़े ठाट बाट से सजकर नगर में पहुँचा। एक वर्ष का विश्राम पाकर बीरबल खूब तगड़ा हो गया था। अच्छी सेवा होने से उसके शरीर के अंग प्रत्यंग खिल गये थे। नगर में जाते समय उसे देखकर किसी को बीरबल होने का भ्रम न हुआ। इस प्रकार देखता भालता राजदरबार में जा पहुँचा। एक लब्ध प्रतिष्ठ आगन्तुक को देखकर सभासदगण एकटक उसी की तरफ देखने लगे, सभा का काम बन्द होगया; परन्तु किसी ने उसको छेड़ा नहीं। अन्त में कुछ देर बाद बादशाह ने पूछा- "आप कौन हैं! कहाँ से आये हैं, और यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?" बादशाहके ऐसे अपरिचितों से प्रश्नों को सुन कर बीरबल बोला-"गरीबपरवर! मैं आपका पुराना दीवान बीरबल हूँ।" बादशाह भौंचक सा हो गया और रुखाई से बोला-"अर्य! बीरबल; तू तो मर गयाथा न, फिर सजीव कैसे लौटा। बीरबल ने उत्तर दिया-"हुजूर! मैं मर तो गया था परन्तु जब स्वर्ग लोक को गया तो इन्द्र मुझपर प्रसन्न होकर मुझे अपना मंत्री बना लिया, तबसे मेरा दिन बड़ा

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३७ अकबर बीरबल बिनोद सुखपूर्वक बीतता है, मेरी सेवा के लिये अप्सरायें नियुक्त हुई हैं। सर्वदा खाने को उत्तमोत्तम पदार्थ और पान करने के लिये अमृत प्रस्तुत रहता है।" बीरबल की ऐसी बातें सुन बादशाह ने पूछा—"तो ऐसे आनन्द उपभोग को छोड़कर तुम्हारा यहाँ आना कैसे हुआ ?" बीरबल ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया—"पृथ्वीनाथ ! आप हमारे पुराने अन्न दाता हैं, यह स्मरण कर इन्द्र से मुहलत लेकर आपसे मिलने आया हूँ, आपके किये हुए उपकार मेरे हृदय-पट पर अंकित हैं इसीलिये आपके निमित्त स्वर्गलोक से एक उत्तम महल और एक परी साथ लाया हूँ। उपरोक्त दोनों चीजें यहाँ से थोड़ी दूर एक पहाड़ी पर छोड़ आया हूँ, यदि आप यहाँ तक चलने का कष्ट करें तो मैं उन्हें आप को दिखला दूँ। बीरबल की बातें बादशाह को सच्ची जान पड़ीं। उसने मनमें अनुमान किया—"जब बीरबल मर गया था तो बिना प्रयोजनके हुये लौटकर कैसे आया, और आया भी तो परी और महल इसके हाथ कैसे लगा। निःसन्देह बीरबल सत्य कहता है ! उन चीजों की परीक्षा के लिये नये दीवान और कुछ अन्य प्रतिष्ठित लोगों को उसके साथ भेजा। बीरबल सबके साथ२ चलकर उस पहाड़ीके समीप जापहुँचा और उन लोगोंको दूर से अँगुली का इशारा करके बोला—"देखो वह सातवें खंड पर बैठी हुई परी हम लोगों की तरफ ध्यानपूर्वक देख रही है। अधिक आदमियों को एक साथ अपने ही तरफ आते देखकर उसे ताज्जुब हो रहा है, उसका चन्द्रमुख कैसा चमक रहा है?

अकबर बीरबल विनोद ३८

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अकबर बीरबल विनोद ३८ उसकी बिखरी लटें स्याही काली नागिन के समान लपलपा रही हैं। आदि आदि कई प्रकार के चकमें देकर बड़ी मुलायमी से पूछा-“क्यों; वे सब बातें अब तक आप लोगों को दिखलाई पड़ीं वा नहीं, यदि न दीख पड़ती हों तो अभी मोका है उन्हें भली भाँति देखलें, ये सब बातें आप लोगों को बादशाह से कहनी पड़ेंगी। फिर किसी प्रकार हीला हवाली करने से काम न चलेगा। बीरबल के साथ एक से एक सुप्रतिष्ठित नागरिक और दरबारी भेजे गये थे, वे ऐसी कौतूहल भरी वार्ता सुन मन में कहने लगे-“हो न हो यह बीरबल प्रेत होकर आया हो ! क्योंकि सिवा महल के इसकी बतलाई एक बात भी हमें नहीं दीख पड़तीं। बीरबल के बारंबार पूछने पर उन लोगों ने एक स्वर से कहा-“अफसोस हमें सिवा महलके और कुछ भी नहीं दीख पड़ता।” तब बीरबल बोला-“आप लोग क्षमा करेंगे, मैं पहले आप लोगों से एक बात कहना भूल गया था, वह यह कि इस लोक के मनुष्य अधिक तर पाप कर्म में रत हैं, दूसरे बहुत से लोग वर्णशंकर भी हो गये हैं इसलिये इन दोनों श्रेणी के मनुष्यों के अतिरिक्त बाकी लोगों को ही ये स्व- र्गीय चीजें दीख पड़ेंगी। एक बार फिर से देखकर आप लोग सत्यासत्य का निर्णय कर लें।” बीरबल फिर पहले की तरह सबको दिखलाना शुरू किया। इस बार लोग बड़ीसत- र्कता से देख रहे थे, पर कुछ हो तब तो दिखलाई पड़े, सिवा महल के उनकी दृष्टि में और कुछ भी न आया। परन्तु वर्णशंकर बनने के भय से सब लोगों ने परी का दिखलाई

अकबर-बीरबल विनोद

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३६ अकबर-बीरबल विनोद

पड़ना स्वीकार किया और एक साथ ही बोल उठे-“वाह वाह ! क्या कहना !! जो परी का नाम सुना था सो आज प्रत्यक्ष देखने में आई, ऐसो वारांगणा आज तक मृत्युलोक में किसी को दृष्टिगत न हुई होगी ।” बीरबल बोला-“आप लोग भली-भाँति पुनः पुनः देख लीजिये क्योंकि यह बात बादशाह के सामने कहनी पड़ेगी ।” दरबारियों ने कहा-“निसन्देह हम सब इस बात को बादशाह के सामने भी इसी प्रकार ज्यों की त्यों कहदेंगे । पहले तो बीरबल इन लोगों की मूर्खता पर मन में बड़ी देर तक हर्ष मनाता रहा, परन्तु उनको अपने माफिक समझ कर शान्त रहा । इन्हें यह सब देखते सुनते बहुत देर हो गई । उधर बादशाह भी इनकी प्रतीक्षा करते करते घबड़ा रहा था, इसी बीच बीरबल सबको साथ लिये हुये जा पहुँचा । इनको देखते ही बादशाह प्रफुल्लित होगया और हर्ष के सहित नये दीवान तथा अन्य बड़े बड़े कर्मचारियों से वहाँ का समाचार पूछा । वे बीरबल के कथन की पुष्टि करते हुए महल और परी का होना स्वीकार किये, बल्कि कुछ और बढ़ा चढ़ा कर वर्णन किये । नया दीवान बोला-“हुजूर लाहौल बिला कूवत ! ऐसी परी क्या आज तक किसी को नसीब हुई होगी । नाहक यहाँ की स्त्रियाँ अपनी खूबसूरती का डींग हाँकती हैं । महल की शोभा और चमक तो सूर्य के तेज को भी मात करने वाली है ।” दीवान के मुख से वहाँ की प्रशंसा सुन बादशाह और भी भुलावे में पड़गया और उसका हृदय काबू से बाहर होने

अकबर बीरबल विनोद ४०

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[header] अकबर बीरबल विनोद ४० [/header]

लगा। घप तुरत बीरबल से बोला-“बीरबल ! उसको यहाँ लिवालावो ।” बीरबल बादशाह की बात काटते हुए बोला- “पृथ्वीनाथ ! वह स्वर्ग की परी है, पैदल चलकर यहाँ नहीं आ सकती; हाँ यदि आप स्वयं चलकर उसे लिवा लावें तो भले ही आपके प्रेम में पड़कर शायद चली आवे ।” वह तो दीवान के मुख से परी की प्रशंसा सुनकर मात हा चुका था, इनकार कब करता। तत्काल सवारी तैयार करने की आज्ञा दी और आप भी कपड़े लत्ते से लैस हो गया । थोड़ी देर बाद सवारी तय्यार होकर आन पहुँची, सभा के लोग पहले ही से सुसज्जित थे, सब लोग नगर से बाहर निकले। जिस समय बादशाह की सवारी इस ठाट बाट से निकली देखते ही बनती थी, अगर कोई अपरिचित मनुष्य उस समय के समाज को देखता तो उसकी और उसके वैभव की 'भूरि २ प्रशंसा करता । मध्याह्न में बादशाह पहाड़ी के समीप जा पहुँचा, धूप बड़ी तेज पड़ रही थी । धूप की लपट महल के शीशों पर पड़ने से उसका प्रतिबिम्ब बहुत दूर तक पहुँचता था, जिससे महल की शोभा दिन दूनी रात चौगुनी हो रही थी । दृष्टि पड़ते ही आँखें चौंधिया जाती थीं । बादशाह ऐसे अपूर्व महल को देख सारे महलों की उत्तमता भूल गया और बीरबल के आग्रह से अपनी मण्डली सहित पहाड़ी पर चढ़ने लगा । थोड़ी देर चलकर महल के नीचे जा पहुँचा और महल की सुन्दरता देखने लगा । बीरबल बोला-“गरीबपरवर ! ऊपर दृष्टि फैलाकर

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[Header] ४१ \t\t\t अकबर बीरबल बिनोद

देखिये वह सातवें खण्ड की खिड़की पर बैठी हुई परी हमलोगों की तरफ देख रही है, उसकी दासी पीछे से पान बीड़ा थमा रही है। यह दासी क्या है मानो सुन्दरता की सीमा है, इसकी जोड़ की सारे महल में एक भी बेगम नहीं है । वाह परी का क्या कहना ! जिस की दासी ऐसी है उसके मालकिन की प्रशंसा करना तो मानो सूर्य को दीपक दखाना है। बरंबार उँगली का संकेत कर उसे दिखलाने लगा फिर भी कुछन देख पड़ने पर बादशाह ताज्जुबसे बोला- “आप न जाने क्या देख रहे हैं; मुझे तो कुछ भी दिखलाई नहीं पड़ता ।” बीरबल बोला-“यदि आपको मेरे कहने पर विश्वास नहीं पड़ता तो आप अपने दीवान और अन्य मुसाहिबों से पूछ लीजिये । वे लोग तो पहले ही से बीर- बल के पंजे में पड़ चुके थे, एक स्वर से परी का दीख पड़ना स्वीकार किया और बादशाह को उसके न दिखाई पड़ने पर आश्चर्य्य प्रकट करने लगे। बादशाह विचार सागर में लहरें मार रहा था, उसका मन नितान्त चंचल हो रहा था। इसी बीच बीरबल ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मैं पहले आपसे एक बात कहना भूल गया था, वह यह कि स्वर्गीय वस्तुएँ यहाँ के निवासियों को बड़ी कठिनता से दीख पड़ती हैं कारण कि आजकल अधिकतर लोग वर्णशंकर हो गये हैं और वर्णशंकरों को स्वर्गीय वस्तुएँ स्वप्न में भी नहीं दृष्टिगत होतीं; प्रत्यक्ष की तो बात ही निराली है। आप को खूब दृष्टि गड़ाकर ध्यानपूर्वक देखना चाहिये । देखिये दुइज का चाँद थोड़े अर्से के लिये अवश्य उदय होता है

अकबर बीरबल विनोद ४२

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अकबर बीरबल विनोद ४२ परन्तु सभी देखनेवाले उसको नहीं देख पाते हाँ जो जन्मजा- कुलीन और कर्म से पवित्र होते हैं वे उसे तुरत देख लेते हैं।” बीरबल की इन बातोंसे बादशाह और घबड़ाया और मनमें कल्पना करने लगा“—सबको तो वह स्वर्ग की परी और उसकी दासी प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ती है और मुझे नहीं; इसका क्या कारण है? हो न हो; मैं ही वर्णशंकर होऊँ। अब तक मैं अपने को वर्णशंकर नहीं समझता था, परन्तु आज इस स्वर्ग की परी के सामने परीक्षा होने पर मुझे अपना वर्णशंकर होना निश्चित हो गया। मेरे ऐसे पतित जीवन को कोटिशः धिक्कार है। अब मुझे इस भेद को छिपाना आवश्यक है नहीं तो प्रजावर्ग में मेरी बड़ी अपकीर्ति फैलेगी, मुँहपर तो सब वाह वाह करेंगे पीछे वर्णशंकर समझ कर मेरी हँसी उड़ावेंगे। इतने में बीरबल फिर अंगुली का संकेत करता हुआ बोला—“देखिये २ पृथ्वीनाथ ! वह चन्द्रा- नना बैठी है और उसकी दासी बगल में खड़ी है। बादशाह ने लाचार होकर उसकी बात मानली और बोला-“हाँ हाँ अबकी बार वह मुझे प्रत्यक्ष दीख पड़ी। वह खिड़की में खड़ी होकर इधर को ही देख रही है।” बादशाह को परी का देख पड़ना स्वीकार करने पर बीरबल सब सभासद और नये मंत्री के सहित महल के चौथे खण्ड पर गया। वहाँ पर पहले से मुलायम कोंच और मखमल की तकिया सुसज्जित रक्खी जा चुकी थी, बीरबल बादशाह को कोंच पर बैठाकर उनसे गपाष्टक मारने लगा, पर यह बात बादशाह को पसंद नहीं आती थी, उसका मन तो

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४३ अकबर बीरबल बिनोद परी के देखने में लगा था। वह तत्क्षण बादशाह के मनकी बात ताड़ गया, जल्दी में फूल और इत्र तथा गुलाबजल से सबका स्वागतकर बोला-"गरीबपरवर ! आप और आपके साथी मृत्यु लोक के वस्त्राभूषणों को धारण किये हुए हैं, और ये सब नश्वर हैं, मैं सबको स्वर्गीय वस्त्र देता हूँ कृपया उसे धारण कर इहलोक और परलोक दोनों का सुख अनु- भव करें । ये कपड़े मैं पहले ही से अपने साथ लेता आया हूँ और ये कभी नष्ट होने वाले भी नहीं हैं। भला बीरबल के चकमें से कौन निकल सकता था, बादशाह के स्वीकार करते ही सब लोग अपने कपड़े उतार २ कर अलग धर दिये और बीरबल के दिये कपड़ों को धारण करने पर उद्यत हुए। बीरबल कुछ सोच विचार कर बादशाह को तो असली वस्त्र पहनाया परन्तु दीवान आदिकों को इतना ही कहकर रह गया कि इन स्वर्गीय कपड़ों को पहन लीजिये । नये दीवान ने अपनी आँखों के सामने कोई वस्त्र न देख कर मन में सोचा-"ऐसे कपड़े पहनने का अर्थ तो अपने को नग्न करना है; परन्तु बीरबल की बात नामंजूर कर वर्णशंकर कौन बने, इस बेइज्जती से तो नग्न होकर रहना ही अच्छा है। उसके बदन पर केवल पाजामाशेषथा उसे भी उतार कर अलग फेंक दिया और ऐसा ढोंग बनाया मानों लोगों के देखने में स्वर्गीय कपड़े ही पहन रहा हो। फिर कपड़े पहने हुओं के समान ऐँड़कर अपनी जगह पर नंग धड़ंग जा बैठा। उसके बदन पर यदि एक लगोट न रह गया होता तो गुप्तेन्द्रियाँ भी प्रगट दिखलाई पड़ने लगतीं। दीवान का ऐसा भेष

अकबर बीरबल विनोद ४४

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अकबर बीरबल विनोद ४४ देखकर लोगों का हँसी आने लगी, परन्तु समय हँसने के विपरीत था इसलिये लागों ने उसे प्रगट नहीं होने दिया। हँसकर वर्णशंकर बनना किसी को मंजूर नहीं था—"भाई तू भी चुप, मैं भी चुप।" नये दीवान के नग्न हो जाने पर बीरबल ने बारी-बारी सबको नग्न कर दिया। क्या कहना था दरबार का दरबार नगोठिया हो गया; बादशाह मन ही मन आन की तान सोचता रहा अन्त में उसकी हृदय तंत्री बोली- "भाई स्वर्गीय चरित्र बड़े ही अद्भुत हैं।" तब बादशाह ने बीरबल से पूछा—"क्यों साहब अब तक लोग स्वर्गीय पोशाक पहन चुके वा नहीं?" "बीरबल ने उत्तर दिया"-जी हाँ, अब सब लोग एक दम कपड़े लत्ते से लैस हैं, परन्तु एकाएक वहाँ (परी के पास) सबको न लिवा चलकर पहले मैं उसकी अनुमति ले लेना उत्तम समझता हूँ; आप लोग यहीं ठहरे मैं उसकी स्वीकृति लेकर तत्काल लौट आता हूँ। बीरबल बगल के एक कमरे में भीतर से सिटकना बन्द कर छिप रहा, कुछ समय बिताकर बाहर निकला और बादशाह से प्रार्थना कर बोला—"गरीबपरवर ! परी की ऐसी अनुमति है कि यह दिन का समय है, इस वक्त सब लोग वापस जावें रात्रि में मुझसे मिल सकते हैं। उसने एक बात और भी कहा है-"अपने मालिक से बोलना कि मुझे इस पहाड़ो की आबहवा बड़ी सुहावनी और निरोग जान पड़ती है इसलिये कुछ दिनों तक मेरा यहीं रहने का विचार है। मैं पहले से बादशाह की हो चुकी हूँ तदर्थ किसी न किसी दिन उनसे

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४५ अकबर बीरबल बिनोद


अवश्य मिलूँगो । इस समय बादशाह के साथ और बहुत से लोग आये हुए हैं, मैंउनके सामने नहीं मिल सकती” स्वर्गीय परी का ऐसा सन्देशा सुनाकर बीरबल फिर बोला-“पृथ्वि- वीनाथ ! मुझे भी मुनासिब यही जान पड़ता है। हम लोग उसकी मरजी के अनुसार चलें, नहीं तो यदि हमारे ब्योहारों से ऊबकर कहीं वह रुष्ट हो गई तो फिर बना बनाया काम बिगड़ जायगा। इस समय लौट ही चलना बुद्धि- मानी है। कोई उपाय कार्यान्वित होते न देख बादशाह लाचार होकर मनगढंत परी की आज्ञा पालन करता हुआ नगर की तरफ चला। आगे २ बीरबल उसके पीछे बादशाह और सबके पीछे कतार से अन्य लोग चल रहे थे। बीरबल और बादशाह तो कपड़े पहने हुये थे लेकिन पीछे वाले सब नग्न शरीर केवल एक लगोटी पहने हुये थे। बादशाह विमुख लौटने के कारण बड़ा दुखी था; लेकिन चूँकि परी ने रात को उससे मिलने का वादा किया था इससे भीतर भीतर कुछ धैर्य भी बँधा हुआ था। इस प्रकार सबको लिये हुए बीरबल नगर में पहुँचा। शहर के रईसों को यों नंगधड़ंग घूमते देख नागरिकों को हँसी आने लगी। यह दल लिये हुये बीरबल जिस गली से होकर जाता वहाँ के लोग इन को देखकर हँस पड़ते। जब इनसे रहा न गया तो नागरिकों को डाटकर बोले-“तुम लोग बड़े मूर्ख हो जो हमको देखकर हँस रहे हो, तुम्हें मालूम नहीं कि बीरबल हम को स्वर्गीय आनन्द लुटा रहा है। हमारे इन पवित्र वस्त्रों को मृत्युलोक

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निवासी देख नहीं सकते इसीसे तुम मुझे नग्न देख रहे हो।” नगर निवासी निरे भाँदू नहीं थे; उनमें भी एक से एक धुरंधर विद्वान थे । आपस में बोले-“हो न हो! यह सब बीर- बल के ही बहकावे में आ गये हों । तुम लोग जानते हो कि बीरबलको मरे आज कई वर्षों का समय बीत गया, फिर बीर- बल कहाँ से आ पहुँचा । यह बात सबको स्मरण होगा कि एक समय बादशाह ने बीरबल से एक अजीब तमाशा दिखलाने को कहा था । जिस कारण इतने दिनों तक गुप्त रह कर आज बादशाह को अजीब तमाशा दिखलाता हुआ आ रहा है।” सब नागरिकों ने इस बात को स्वीकार किया और सब बीरबल की बुद्धिमानी पर और जोर जोर से हँसने लगे । नागरिकों के ऐसे हास्य और भाषण को सुनकर नग्न अमीरों के कान खड़े हो गये; परन्तु फिर भी वे बीरबलकी सारी बातें सच्ची मानकर नगर वासियों की उपेक्षा करते हुये महल की तरफ चले । बीरबल अपने दल के सहित सारे नगर में घूमता फिरता शाही दर्बार में जा पहुँचा । सब लोग जगह बा जगह खड़े हो गये, परन्तु बीर- बल बादशाह को सबसे अलग ले गया और तब एकान्त में अपना दोनों हाथ जोड़कर बोला-“पृथ्वीनाथ ! यदि मेरे अपराधों की माफी मिले तो मैं कुछ निवेदन करूँ ।” बादशाह ने कहा-“अच्छा कहो, तुम्हें माफी दी जायगी ।” तब बीरबल बोला-“हुजूर को स्मर्ण होगा कि एक समय वर्ष के भीतर मुझे एक अजीब तमाशा दिखलाने को श्रीमान् ने हुक्म दिया था और यह भी बचन दिया था कि उस अजीब