अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद २३२
अकबर बीरबल विनोद २३२ की उदारता देखकर उसे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। दोनों सानन्द घोड़ा बढ़ाते हुये नगर से बाहर निकले। तुम बड़े गदहे हो एक दिन बीरबल और बादशाह दोनों एक साथ बैठे हुये आपस में कुछ वार्तालाप कर रहे थे। इसी बीच बीरबल को वायु सरी। बादशाह ने कहा-"बीरबल तुम बड़े गदहे हो।" बीरबलने उत्तर दिया-पृथिवीनाथ ! पहले तो मैं ऐसा नहीं था परन्तु गधों की संगत में पड़कर गधा हो गया हूँ। बीरबल के ऐसे उत्तर से बादशाह की बोलती बन्द हो गई। कौन कौन क्या क्या नहीं कर सकता एक दिन का यह समाचार है कि अकबर बादशाह दरबार में बैठे हुए सरकारी कामों को दत्तचित्त होकर देख रहे थे। जब वे उन कामों से निवृत्त हुए तो उन्हें गपाष्टक करनेकी सूझी और कुछ मुसाहिबों को साथ में लेकर आकाश पाताल की बातें करने लगे। कोई किसी विषय को लेकर विवेचन, करता, तो कोई किसी विषय को। इसी बीच बादशाह को पुराने कवियों का कहा हुआ एक दोहा याद आया- दोहा-"क्या नहिं अबला करि सकै, क्या नहिं सिन्धु समाय। क्या नहिं पावक जर सकै, क्यो काल न.हिं खाय ॥"
२३३ अकबर बीरबल विनोद
२३३ अकबर बीरबल विनोद वे दरबारियों से उपरोक्त दोहे का उत्तर पूछ बैठे, पर अफ- सोस कि एक दरबारी भी उत्तर देने को समर्थ न हुआ। तब बादशाह ने दीवानखाने से बीरबल को बुलवाया। जब वह आया तो उससे उसी दोहे का उत्तर पूछा-बीरबल अपनी बुद्धि से ऐसे ऐसे चुटकुलों को अँगुली पर नचाया करता था, वह तुरत बोला:- “पुत्र न अबला कर सके, यश नहिं सिन्धु समाय। धर्म अग्नि में नहिं जलै, नाम काल नहिं खाय ॥” बीरबल के ऐसे सटीक उत्तर को सुनकर बादशाह बहुत सन्तुष्ट हुए और बीरबल को कई बहुमूल्य आभूषण पारि- तोषिक में दिया। सभासद् बीरबल का मुख निहारते रह गये। उन लोगों ने बीरबल के बुद्धि की भूरि २ प्रसंशा की। दीपक तले अँधेरा एक दिन बादशाह अपनी सबसे ऊँची छतपर बीरबल के साथ बैठे हुए हवाखोरी कर रहे थे इसी बीच उनके सामने ही कुछ दूरी पर एक यात्री को कई चोर मिलकर लूटते हुये दिखाई पड़े। विचारे यात्री का कुछ वश नहीं चलता था। सारा धन लुट जाने पर उस यात्री ने बादशाह के महल के समीप पहुँच कर बम लगाया-“बड़े दुख की बात है, कि मैं सरकार के देखते देखते सरे बाजार लुटगया। बादशाह को इस यात्री की करुण कथा पर बड़ी दया आई और वे बीरबल
अकबरवीरबल विनोद २३४
अकबरवीरबल विनोद २३४ को डाँटकर कहा-“क्यों बीरबल ! क्या ऐसा ही प्रबन्ध करते हो। जब हमारी आँखों के सामने विचारे परदेशी लुटे जाते हैं तो आँख पीछे क्या होता होगा।” बीरबल ने उत्तर दिया- “पृथ्वीनाथ ! क्या आप नहीं जानते कि दीपक तो दूसरों को प्रकाश देता है, परन्तु उसके तले अँधेरा ही बना रहता है।” बादशाह बीरबलकी बातें सच्ची मानकर खामोश रह गये। —:*:— बादशाह के चार प्रश्न एक दिन जब कि कड़ाके की शर्दी पड़ रही थी। बादशाह बीरबलके साथ अपने बागमें टहलते हुए धूप खा रहे थे। उनके मन में अचानक एक तरंग उठी और उसके निराकरण के लिये बीरबल को मध्यस्त बनाकर पूछेः- “कौन बोलने को चहै, और कौन चहै है चूप। कौन चहै है बरसनो, कौन चहै है धूप ॥” इतना कहने के साथही बादशाह बीरबल को धमका कर बोले-“यदि आजके चारों सवालों का समुचित उत्तर न दे सकोगे तो जान से मारे जावोगे।” बीरबल को बादशाह का कथन सुनकर बड़ी करुणा आई; क्योंकि बादशाह सचमुच उसकी जान मारने को उतारू होगये थे। दूसरे करुणा इसलिये आई कि इतने छोटे से प्रश्न के लिये बादशाह इतना उग्ररूप क्यों धारण करते हैं। इसका उत्तर तो एक बुद्धिमान लड़का भी समझ कर दे सकता है। खैर इस समय तो अपनी जान बचानी चाहिये। ऐसा विचार कर वह बोला-
२३५ अकबर बीरबलविनोद
२३५ अकबर बीरबलविनोद
“माली बरसन को चहै, धोबी के मन धूप । साई चाहै बोलना, चोर चहै जू चूप ॥” बादशाहको बीरबल का यह युक्तिसंगत दोहा बहुत भला मालूम हुआ, परन्तु वह उससे और भी सरलार्थ चाहते थे इसलिये फिर बोले-“बीरबल ! आपका यह दोहा काटने लायक नहीं है; फिरभी मुझे इससे पूरा सन्तोष नहीं हुआ। इसलिये कोई दूसरी विधि से और स्पष्ट कर मुझे समझावो । बीरबल ने कहा-“बहुत अच्छा, और यह दूसरा दोहा रचकर पढ़ सुनाया— “अति का भला न बोलना, अति की भली न धूप । अतिका भला न बरसना, अति की भली न धूप ॥” फिर भी बादशाह संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बीरबल से दूसरा उत्तर माँगा। तब बीरबल बोला-“हे पृथ्वीनाथ ! सबका मूलमंत्र यह है कि अपनी अपनी सभी चाहते हैं, मैं इस संबंध का एक दास्तान आपको सुनाता हूँ, शायद उससे आप सन्तुष्ट हो जायें। एक गरीब बापके दो लड़कियाँ थीं। उसने उनमें से एक को तो बागवान के घर ब्याहा और दूसरी को कोंहार से । जब कुछ दिनों के बाद उनसे मिलने गया तो पहले बागवान के घर गया। वहाँ पहुँचकर कुशल प्रश्न के पश्चात् अपनी कन्या का चेहरा उतरा हुआ देखकर उसके सोच का कारण पूछा? वह बोली-“हे पिताजी ! मैं अपने दुःखकी बात आपसे क्या सुनाऊँ । उसका छूटना ईश्वर के हाथ है। इधर कितनेही दिनों से अवर्षण होरहा है। जिस
कारण सारा बाग का बाग सूखा जा रहा है। उसमें न तो अच्छे फूल आते हैं और न फल ही। तब वह वहाँ से बिदा हो अपनी दूसरी लड़की से मिलने कोहार के घर गया। वह लड़की मन मारकर द्वार पर बैठी हुई थी। पिता से मिलकर बड़ी प्रसन्न हुई और अपना सारा दुखड़ा सुनाकर फिर मौन हो गई। पिता ने उसकी ऐसी उदासी का कारण पूछा तो वह बोली- "हे पिताजी! मैं आपसे अपने दुख की बात क्या कहूँ। इधर कई दिनों से मेह बराबर बरस रहा है। न बरतन सूखने पाते हैं और न सूखी गोहरी ही आँवाँ लगाने को मिलती है। सब हाल रोजगार बन्द है। न मालूम इस बारिस का क्रम कब तक जारी रहेगा।" पिता अपनी दोनों लड़कियों की पृथक पृथक चाहना सुनकर चुप रहगया और सोचने लगा-"यह सब कुछ नहीं, हम जीव धारी अपनी- अपनी चाहते हैं। परन्तु ईश्वर किसकी करे और किसकी न करे। वह जो कुछ करता है सब भला ही करता है।" इस दृष्टान्त को सुनाकर बीरबल ने कहा- "पृथ्वीनाथ ! यों तो पेशे के अनुसार सब की चाहना अलग-अलग होती है, परन्तु आपके प्रश्नों का वही ठीक उत्तर है जो मैंने पहले दोनों दोहों में आपको सुनाया है। बादशाह बीरबल के उत्तर से बहुत सन्तुष्ट हुए।
२३७ अकबर बीरबल बिनोद शाही रामायण एक दिन बीरबल और बादशाह की एकान्त में बातें हो रही थीं। इसी बीच बादशाह ने बीरबल से शाही रामायण बनाने की चर्चा की। बीरबल बोला-“पृथवीनाथ ! यह कौन बड़ी बात है। शाही रामायण मैं बनाकर आपको दिखलाऊँगा; परन्तु यह इतना आसान काम नहीं है जो थोड़े समय में कर दिखाया जाय। इसमें तीन माँस की देर लगेगी और रुपये भी काफी खर्च पड़ेंगे। इस समय मैं खर्च के रुपयों का ठीक- ठीक आँकड़ा तो नहीं बता सकता, परन्तु इतना है कि पहले पहल कार्यारम्भ के लिये मुझे १५ हजार रुपये मिलने चाहिये। बादशाह ने खजाने से पन्द्रह हजार रुपये दिलाकर बीरबल को तीन मास की मुहलत दे शाही रामायण तय्यार करने के लिये विदा किया। वह रुपयों को लेकर सीधे अपने घर पहुँचा और उनसे स्थान २ पर मौका देखकर कुँआँ बावली खुदवाने का कार्यारंभ किया। इस प्रकार जब दो मास समाप्त होकर तीसरा भी समाप्त होने पर आया तो बीरबल को शाही रामायण की सूझी। वह बाजार से कोरा कागज मँगाकर उसकी एक मोटी पुस्तक तय्यार कराई और फिर उसे एक आदमी के सिर पर रख कर बादशाह के पास पहुँचा। बादशाह को पुस्तक दिखाकर बोला-“पृथिवीनाथ ! अबतक रामायण तय्यार हो गई होती; परन्तु अभी इसमें कुछ काम बाकी हैं; जिसकी पूर्ति के लिये आपके पास आना पड़ा। कृपा
अकबर बीरबल विनोद २३८
[Header] अकबर बीरबल विनोद २३८
कर मेरे सन्देह को मिटाकर इसकी पूर्ति करा दीजिये । रामायण में एक नायक और नायिका का प्रधान होना आव- श्यक है । नायक तो आप अकेले हैं । परन्तु आपके पास कई नायिकाएँ हैं । इसलिये इसमें किस बेगम को प्रधान मानकर नायिका बनाया जाय ।” बादशाह बोले-“प्रधान बेगम को ही इसकी नायका बनाओ ।” बीरबल पुस्तक को लिये दिये बड़ी बेगम के पास पहुँचा और उनसे कुशल प्रश्न के पश्चात् पूछा-“ रामायण की नायिका महारानी सीताजी को राक्षस राज रावण के घर रहना पड़ा था । इसलिये आप किसके घर रही हो ।” आपसे इसका उत्तर मिलने पर मैं शाही रामा- यण तय्यार कर डालूँगा ।” बीरबल की ऐसी बातें सुनकर बेगम सिर से पैर तक जल गईं और वे अपनी दासी को आज्ञा देकर उस रामायण को बीरबल के सामने ही जलवा दिया । बीरबल बेगम से बिदा होकर बादशाह के पास आया और बेगम के द्वारा चिढ़कर रामायण जलाये जाने का सारा किस्सा कह सुनाया। फिर हाथ जोड़कर बोला-“पृथ्वीनाथ ! शाही रामायण फिर भी तय्यार हो सकती है । यदि आप चाहते हों तो दूसरी आज्ञा दीजिये ।” बादशाह हँसते हुए बोले-“बीरबल जो कुछ होना था सो हो गया, अब दूसरी रामायण बनाने का कष्ट आपको नहीं दिया जायगा । महाराज रामचन्द्र समर्थ थे, मैं उनकी तुलना नहीं कर सकता । तो मैं यह पहले ही समझ चुका था मुझे तो केवल तुम्हारी परीक्षा लेनी थी । सो ले लिया । मैं भली
२३६ अकबर बीरबल विनोद
२३६ अकबर बीरबल विनोद भाँति जानता हूँ कि तुम्हारे हाथ से रुपये बुरे कामों में खर्च नहीं हो सकते । इसलिये समय कुसमय आने पर तुम्हें कुछ रुपये देकर इसी बहाने तुमसे अच्छे २ कामों को कराया करता हूँ । अब तुम घर जाकर विश्राम करो । कल से दरबार में हाजिर होकर अपना तीन मास का पिछड़ा काम सँभालो । —०:*:०— केवल लोटा न था एक दिन आपस में कुछ पहेली बुझौवल की बातें छिड़ीं इसी बीच बादशाह ने पूछा-“गधा उदास क्यों दीखता था, ब्राह्मण क्यों प्यासा रहा ?” बीरबल ने दोनों के लिये एक ही उत्तर देकर किस्सा समाप्त किया । उसने कहा-“के ल लोटा नहीं था ।” उसका अभिप्राय यह था कि बिना लोटे गधा उदास था और लोटा ही न रहने से ब्राह्मण भी प्यासा रहा । बादशाह को बीरबल के इस दुअर्थी उत्तर से बड़ी प्रसन्नता हुई और वे बीरबल को इनाम देकर बिदा किये । कौन ऋतु सर्वोत्तम है ? एक दिन बादशाह राजकीय कामों से अवकाश पाकर अपने दरबार में बैठे थे। इधर उधरकी बातें भी हो रहीं थी। तब बादशाह ने पूछा-गर्मी, बरसात, जाड़ा, हेमन्त, शिशिर और बसन्त इन छहों ऋतुओं में सर्वोत्तम ऋतु कौन है ?” दरबारियों ने अपनी अभिरुचि के अनुसार किसी ने कुछ और किसी ने कुछ बतलाया, परन्तु उनका मतैक्य न हुआ। तब बादशाह बीरबल
अकबर बीरबल विनोद २४०
अकबर बीरबल विनोद २४० से पूछे-"बीरबल ने तुरत उत्तर दिया-"पृथ्वीनाथ ! पेट भरों को सभी ऋतुवें अच्छी होतो हैं, भूखों के लिये एक भी नहीं। यानी सभी बुरी होती हैं।" पीर, बावर्ची भिश्ती-खर एक दिन बादशाह प्रफुल्लित चित्त हो अपने पुत्र को गोदी में लिये हुए खेला रहे थे। इसी बीच बीरबल भी वहाँ आ पहुँचा। बादशाह तुरत पूछ बैठे-"बीरबल ! कोई लावे नर, पीर, बबर्ची, भिश्ती, खर।" बीरबल ने कहा-"पृथ्वीनाथ ! मैं कल इस सवाल का जवाब ढूढ़कर लाऊँगा। जब संध्या समय वह लौटकर घर जाने लगा तो रास्ते में एक गरीब ब्राह्मण के घर पहुँचा और उसको पाँच रुपये देकर बोला-“ देखो कल तुम्हें दस बजे मेरे साथ दरबार में चलना होगा। अपने खाने पीने का प्रबन्ध कर ठीक समय पर तय्यार रहना।” वह बोला-“बहुत अच्छा, ताबेदार हर एक आज्ञाओं को अक्षरसह पालन करने के लिये तय्यार है।” दूसरे दिन बीरबल ठीक समय पर उसे लेकर दर्बार में हाजिर हुआ। बादशाह ब्राह्मण को देखकर बीरबल का भावार्थ समझ गये और उससे पूछे-"साबित करो कि इस मनुष्य में कलवालेचारो गुण विद्यमान हैं।" बीरबल दोनों हाथ जोड़कर बोला-"पृथ्वीनाथ ! यह पुजाते समय पीर होता है और ब्राह्मण के हाथ का बनाया भोजन सभी लोग खाते हैं, इस संबंध से बावर्ची है, पौसरा चलाने का काम ब्राह्मण से लिया
२४१ अकबर बीरबल विनोद
२४१ अकबर बीरबल विनोद जाता है, इसलिये पानी पिलाते समय यह भिश्ती बन जाता है। परदेश में जाने पर इसी के सर बोझ भी लादा जाता है इसलिये ऐसा काम करने से खर भी कहा जा सकता है।" केवल एक ब्राह्मण को नौकर रखने से ये चारों काम आसानी से निकल आते हैं। पूजन के समय इसकी पैर पूजा कर पीर बना लीजिये, समय पर रोटी बनवा कर बवर्ची बनाइये, प्यास लगे तो इससे भिश्ती का काम कराइये यानी वह पानी भी पिला देगा, और चाहे जब बोझा भी ढुलवा कर खर का काम भी सुगमता से करा लीजिये। यानी यह उन समस्त चारों कामों को भली भाँति कर सकता है।" बादशाह बीरबल का उत्तर सुनकर मन में प्रसन्न हो मुसकरा दिये। बीरबल उस गरीब ब्राह्मण को २५ रुपये पुरस्कार देकर विदा किया। ❖-❖ बनस्पति का बीज एक दिन ऐसा हुआ कि बादशाह के बहुतेरे दरबारी उस पर चिढ़कर मौन धारण कर लिये। जब बादशाह स्वयं किसी को छेड़कर कुछ पूछते तो वे थोड़े में उसका उत्तर देकर चुप रह जाते। आज की सभा में बीरबल नहीं था। बादशाह अपने दरबारियों की खपको को मन ही मन ताड़ गये और उनके ऐसे मनमलीनता का कारण पूछा। तब एक वृद्ध दरबारी बादशाह से विनती कर बोला—"पृथ्वीनाथ ! मुझे एक बात का बड़ा खेद है, यदि आज्ञा पाऊँ तो कहूँ।" बादशाह ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब बुड्ढा बोला—"मैं २५ वर्ष से १६
अकबर बीरबल विनोद २४२
अकबर बीरबल विनोद २४२ आपका नमक खाता हूँऔर अपना सब काम बराबर खैरख्वाही से करता आ रहा हूँ, फिर भी देखता हूँ कि आप एक कल के आये हुए छोकरे के सामने हम लोगों को कुछ भी नहीं समझते । आपको जो कुछ भी पूछना होता है बीरबल ही से पूछा करते हैं। इस बातकी हम लोगों को बड़ी चोट है।” बादशाह बोले-“आप लोग इसके लिये कोई चिन्ता न करें, अच्छा मौका है। इस समय बीरबल भी यहाँ मौजूद नहीं है। मैं एक जरूरी बात पूछना चाहता हूँ आप में से कोई भी बतलावे कि बनस्पति के बीज कहाँ हैं।” दरबारियों ने इसका अनुसन्धान करनेमें महीनों सिर तोड़ परिश्रम किया, परन्तु सब बेफायदा हुआ। लाचार होकर एक दिन भरी सभा में बादशाहने वही बात बीरबल से पूछा- “बीरबल तत्क्षण हाथ में गंगाजल लेकर जमीन पर छिड़क दिया और बोला- “बस पृथ्वीनाथ ! वह बीज इसी ठौर पर है।” लोगों का मुख मलीन हो गया और फिर बादशाह के सामने ऐसी बातें कभी जवान पर नहीं लाये ।
हौज के अण्डे
एक दिन बादशाह को बीरबल की हँसी उड़ाने की इच्छा जागृत हुई। अतएव वे बीरबल के आने के पूर्व ही बाजार से बहुत से मुर्गी के अण्डे मँगाकर अपने दरबारियों को एक एक कर बाँट दिया। केवल बीरबल ही खाली रह गया था। वह ज्योंही दरबार में हाजिर हुआ, बादशाह ने कहा-
२४३ अकवल बीरवल विनोद़
२४३ अकवल बीरवल विनोद़ “बीरबल ! मैंने आज रातमें एक अजीब सपना देखा है,उसका तात्पर्य यह निकलता है कि जो मनुष्य इस हौजमें डुबकी लगा कर एक अण्डा मुरगी का न निकाल लावे उसे दो बाप का समझना चाहिये। मैं केवल तुम्हारी ही बाट देख रहा था। बेहतर है कि सबकी वारी२ से परीक्षा ली जाय। देखें स्वप्न का क्या प्रभाव पड़ता है।” बादशाह की अनुमति से सभी दरबारी हौज में डुबकी मार कर हाथ में एक एक मुरगी का अण्डा लेकर बाहर निकले। जब बीरबल की ओसरी आई तो वह हौज में डुबकी मारकर खाली हाथ निकला। परन्तु उसके मुखारबिन्द से कुकड़ू कूं का शब्द निकल रहा था।” बादशाह ने कहा- मियाँ बीरबल तुम्हारा अण्डा कहाँ है, जल्दी दिखलाओ। बीरबल ने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! तमाम अण्डा देने वाली मुर्गियों के बीच एक मैं ही मुर्गा हूँ। विचारे दरबारी सहम गये और बादशाह के ओठों पर मुस्कुराहट आ गई। कोई धनी और कोई दरिद्र क्यों होता है एक दिन बीरबल और बादशाह में विज्ञान की बातें छिड़ीं थीं। दोनों अपनी अपनीवाली कहते थे, परन्तु उनका मन किसी सिद्धान्त पर स्थिर नहीं होता था इसी बीच बादशाह ने बीरबल से पूछा-“अच्छा बीरबल इसका विवेचन कर सिद्ध करो कि संसार में कोई तो धनी और कोई दरिद्री क्यों हो जाता है?” बीरबल ने तुरत उत्तर दिया-
अकबर बीरबल विनोद २४४
अकबर बीरबल विनोद २४४ राम झरोखे बैठ के, सब सौदा कर लेत । जो जैसा कर लावता, वाको वैसहिं देत ॥ अब मैं उसको भूल गया एक दिन बादशाह बीरबल से हँसी मजाक करते हुए पूछ बैठे-“बीरबल ! मैंने सुना है कि तुम्हारी स्त्री नितान्त सुन्दरी है दरअसल क्या है?” बीरबल ने उत्तर दिया- “पृथिवीनाथ ! मुझे भी ऐसा ही गुमान था, परन्तु बेगम साहिबा को देखकर अब मैं उसे एकदम भूल गया हूँ।” बीरबल को कुत्तों की हाकिमी एक दिन बादशाह अपने चुने २ दरबारियों के साथ बातांलाप कर रहे थे। इसी अन्तर्गत अब्दुलफजल नामी दरबारी को बीरबल की हँसी उड़ाने की सूझी। वह बीरबल को चिताकर बोला-“बीरबल ! आज से तुमको कुत्तों की हाकिमी प्रदान की जाती है।” बीरबल झट बोल उठा-“फिर तो आपको मेरी आज्ञा पालन करनी पड़ेगी। उलटे मुँह खाकर अब्दुलफजल शरमिन्दा हो गया। फिर कभी उससे बीरबल से ऐसी छेड़खानी नहीं करी। एक हजार जूते एक दिन बादशाह बीरबल को झिपाने की नीयत से उसके जूते गुम करा दिये। जब घर जाने का समय हुआ
२४५ Akbar Birbal Vinod \quad अकबर बीरबल विनोद
२४५ Akbar Birbal Vinod \quad अकबर बीरबल विनोद तो बीरबल अपने जूतों को तलाश करने लगा। जब वे न मिले तो बादशाहने कहा-"अच्छी बात है; बीरबलको हमारी तरफ से जूते दिये जायँ।" बीरबल नये जूतों को पहन कर ऊपरी प्रसन्नता दिखलाते हुए बोला- "मैं आपको आशीर्वाद देता हूँ कि ईश्वर इसके पहले आपको हरलोक परलोक सभी जगह ऐसे ही हजार जूते दे।" बीरबल के ऐसे हास्यपूर्ण आशीर्वाद को सुनकर बाद- शाह खिलखिला कर हँस पड़ा। दरबारी लोग चकित होकर बीरबल का मुँह देखते रह गये।
चोर की दाढ़ी में तिनका
बादशाहके यहाँ एक दिन चोरी होगई यानी आलमारी से एक कीमती जेवर गायब हो गया। बादशाह ने बीरबल को अन्वेषण करने की आज्ञा दी। तब बीरबल ने चाल चलने की एक नई तरकीब सोचकर निकाली। वह पहले आलमारी से बारी२ अपना दोनों कान सटाया, गोया कोई बात सुनने की चेष्टा कर रहा हो। बाद फिर कान हटाकर बादशाह से अर्ज किया- "पृथिवीनाथ ! वह आपकी आलमारी साफ बतला रही है कि चोर की दाढ़ी में तिनका है।" एक दरबारी सहम कर अपनी दाढ़ी से हाथ लगाया। बीरबलने झट उसे गिरफ्तार कर लिया। उस दरबारी ने थोड़ी देर बाद भरी सभा में अपना अपराध स्वीकार कर लिया।
अकबर बीरबल विनोद २४६
अकबर बीरबल विनोद २४६ सोया सो खोया एक दिन बीरबल किसी मसलहत से कुजड़े का भेष बनाकर बादशाहके महल का चक्कर काट रहा था। अचानक बादशाह की दृष्टि उस पर जा पड़ी। बादशाह ने उसे कुँजड़ा समझकर पूछा- "अरे ओ कुँजड़े, सोया किस भाव पर बेचेगा ?" कुँजड़ा भेषधारी बीरबल बोला- "टके का एक सेर ।" बादशाह उसका उत्तर सुनकर बोले- "तब तो और भी चूका ?" बीरबल ने कहा- "सोया सो खोया।" ऐसे उत्तर से बादशाह को सन्देह हो गया और भलीभाँति जाँच पड़ताल करने पर सोये वाले को बीरबल जानकर हँस पड़े। लड़ाई में जीत किसकी ? एक दिन कहीं संग्राम में जाने के लिये उद्यत होकर बादशाहने बीरबल से पूछा 'अच्छा बीरबल ! मैं तुमसे पूछता हूँ कि आज की लड़ाई में किसकी जीत होगी ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथिवीनाथ ! यह बात मैं यहाँ से नहीं बतला सकता । हाँ युद्ध का मैदान देखकर आपको बतला दूँगा।" बादशाह जब संग्रामांगण में पहुँचे तो फिर वही बात बीरबल से पूछा । बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथिवीनाथ ! आपकी ही जीत होगी।" बादशाह बोले- "यह तुमने कैसे जाना ?" बीरबल ने "-सरकार ! मैं इससे कह रहा हूँ कि आपका शत्रु हाथी पर सवार होकर आया है और हाथी एक मनहूस
२४७ अकबर वीरबल विनोद
२४७ अकबर वीरबल विनोद जानवर है। यहाँतक कि वह अपनी सूँड से धूल उठाकर अपने ही शरीर पर फेका करता है और आप घोड़ेपर सवार हैं। घोड़ा बहादुर होता है। उसको लोग गाजीमर्द भी कहते हैं। बादशाह बीरबल के उत्तर से बड़ा प्रसन्न हुए और लड़ाई में जीत होने पर उसे भरपूर इनाम दिये। मूर्ख से पाला पड़े तो चुप रहना प्रकृति की समानता होने से बादशाह और बीरबल में उत्तरोत्तर प्रेम बढ़ता ही गया। जिस कारण बीरबल को गरीबों का हित करने के लिये अच्छा अवसर मिलता था। वह येनकेन प्रकारेण बादशाह को प्रेरित कर कुछ न कुछ नित्य गरीबों को दिला दिया करता था। एक दिन की ऐसी घटना घटी कि बादशाह के गुरु महाशय मक्का से चलकर दिल्ली आये। रास्ते में राह की जानकारी न रहने के कारण उन्हें बहुत भटकना पड़ा था। बादशाह ने अपने गुरु का भलीभाँति आदर सत्कार किया। जब वे प्रकार कुछ दिन रहकर तगड़े हो गये तो फिर मक्का शरीफ लौट जाने का विचार प्रगट किया। बादशाह ने बड़ी प्रसन्नता से उन्हें पर्याप्त वस्त्राभूषण तथा धन धान्यादि देकर विदा किया। कितने दिनों के पश्चात् एक दिन बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्यों बीरबल ! जैसे ये पीर साहब हमारे गुरु हैं, वैसे ही तुम्हारे भी कोई गुरु होंगे ?” यदि हैं तो वे कहाँ रहते हैं ?
अकबर बीरबल विनोद २४८
यहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक पाठ्यान्तरण (transcription) प्रस्तुत है:
अकबर बीरबल विनोद २४८ वे कभी तुम्हारे यहाँ आते हैं वा तुम ही उनसे मिलने जाया करते हो?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवी- नाथ ! मैं निगुरी नहीं हूँ, आपकी मेहरबानी से मेरे अनेकों गुरु हैं, परन्तु उसमें भेद केवल इतना ही है कि वे सबके सब बाहर रहते हैं। इसी कारण न कभी यहाँ आते हैं न हमको उनका दर्शन ही मिलता है। थोड़े दिन से मेरे सुनने में आया है कि हमारे एक गुरु यहाँ आ रहे हैं। मुझे उनके रहने का स्थान तक ज्ञात नहीं है, फिर वे बताने ही क्यों लगे उन्हें तो किसी के दाम टके की दरकार नहीं है। वैसे निस्प्रिय गुरु देखने में नहीं आते। यही कारण है कि इस दीनके द्वार पर कभी भी नहीं आने की कृपा करते। बादशाह को ऐसे गुरु से मिलने की इच्छा हुई और वे बीरबल से बोले- “दीवान जी ! जो तुम्हारे गुरु में इतनी विशेषता है तो मैं भी एकबार उनका दर्शन करना चाहता हूँ। हो सके तो जल्दी से जल्दी मुझे उनसे मिलाने का प्रबन्ध करो। बीरबल बोला- “पृथिवीनाथ ! जब आप उनसे मिलने की इच्छा प्रकट करते हैं तो मैं तत्परता से उनकी खोज कराऊँगा और यदि वे भी आपसे मिलने की इच्छा करेंगे तो मैं अवश्य आपसे उनका साक्षात् करा दूंगा।” बादशाह ने कहा-“मुझे अविलम्ब उनसे मिलाने की चेष्टा करो।” बीरबल बादशाह को तसल्ली देकर वहाँ से बिदा हुआ। घर जाते समय रास्ते में एक वृद्ध लकड़हारे से उसकी मुला- कात हो गई। वह विचारा तमाम परेशानी उठाकर भी आज अपनी सम्पूर्ण लकड़ियों को नहीं बेंच सका था। बीरबलने
२४६ अकबर बीरबल विनोद
२४६ अकबर बीरबल विनोद
उससे बची हुई लकड़ियों का मूल्य दर्याफ्त किया; फिर पैसा देने के मिस से उसको अपने घर लिवा ले गया। लकड़ो का मूल्य देकर बीरबल ने लकड़हारे से पूछा—"क्यों जी लकड़हारे! तुम हमें कोई सभ्य पुरुष जान पड़ते हो। समय के फेर से इस समय लकड़ियां बेचकर अपनी गुजर करते हो। मेरा तुमसे एक जरूरी काम है। यदि तुम उसके करने पर उद्यत होजावो तो मैं तत्काल तुम्हें पचीस रुपये दूँ। काम हो जाने पर तुम्हारी गुजर माफिक काफी रुपये दूँगा।" लकड़हारे ने मनमें सोचा—"यदि नहीं करूँगा तो यह दीवान है जबरन बेगार में करावेगा। बेहतर है, कि इसकी राजी करूँ तिसपर रुपये भी काफी देनेको कहता है। मनमें ऐसा ठहरा कर वह बीरबल से बोला—"मैं आपकी छोटीसे छोटी आज्ञाएँ पालन करने के लिये तत्पर हूँ, आपकी सभी आज्ञाएँ मुझे स्वी- कार होंगी।" बीरबल ने कहा—"अच्छा मैं तुम्हें कुछ कपड़े देता हूँ; इन्हें धारण कर हनुमान जी के मन्दिर के पिछवाड़े वाली कोठरी में जा बैठो, हाथ में माला लेकर बराबर जपते रहो। किसी की तरफ आँख उठाकर भी न देखना। तुमसे मिलने के लिये बहुत से अमीर उमराव आवेंगे। मुमकिन है स्वयं बादशाह भी आवें, परन्तु उनसे भी कदापि न बोलना। रुपयों के ढेर दें तब भी उधर नहीं देखना। देखो सावधान, मैं यहीं पर किसी जगह छिपकर तुम्हारी सारी बातें देखता रहूँगा, यदि मेरे कहने से जरा भी खिलाफ चलोगे तो तुम्हारी गरदन मार दी जावेगी।" बूढ़े लकड़हारे ने दृढ़ता पूर्वक उसकी आज्ञाओं का पालन करना स्वीकार किया।
तब बीरबल ने उसके सारे बदन में खाक मलकर कोपीन वस्त्र पहनाया और हाथ में एक रुद्राक्ष की माला देकर मस्तक पर कृत्रिम जटा बाँध दी। फिर उसे हनुमानजी के मन्दिर में एक मृगचर्म पर बैठाकर आप बादशाह के पास पहुँचा। बादशाह का दरबार उमरावों से ठसाठस भरा हुआ था। बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा—"पृथ्वीनाथ ! मेरे गुरुजी आये हुये हैं, आपके विषय में बातें करने पर उन्होंने आपसे मिलना स्वीकार किय है। परन्तु मुझे साथ जाने की मुमानियत करते हैं। यदि इतने पर भी आपके साथ जाऊँगा तो वे मुझसे बहुत नाराज होंगे। मुमकिन है कि चिढ़कर मुझे शाप भी दे दें। बादशाह ने पूछा—"इस समय वे कहाँ ठहरे हुये हैं?" बीरबल ने उत्तर दिया—"हनुमानजी के मन्दिर के बाहर की कोठरी में।" बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर बीरबल के गुरु से मिलने गये। वहाँ पहुँचकर बड़े अदब से प्रणाम कर बाकायदे उन के सामने बैठ गये और फिर पूछा—"भगवन् ! कृपाकर आप अपना नाम तथा ठिकाना इस दास से बतलावें, मैं इस कृपा के लिये आपका चिर कृतज्ञ बना रहूँगा।" स्वामी जी तो पक्के गुरु के चेले थे। उन्होंने उनकी बातों का कुछ भी उत्तर न देकर बराबर अपना माला घुमाते ही रहे। बादशाह फिर बोले-"स्वामी जी ! मैं समस्त भारतवर्ष का अधिपति हूँ मैं आपकी सारी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता हूँ। यदि आपको किसी बात की चाहना हो तो मुझसे कहें। परन्तु स्वामी जी फिर भी कुछ न बोले बल्कि आँख उठाकर उनकी तरफ देखा भी नहीं। तब बादशाह ने एक लाख का तोड़ा उनके सामने
२५१ अकबर बीरबल विनोद
२५१ अकबर बीरबल विनोद रखवा दिया। उन्होंने सोचा कि शायद रुपयों के प्रलोभन में आकर स्वामीजी फेर में आ जावेंगे परन्तु वे न कुछ आशी- र्वाद दिये और न रुपयों की तरफ देखा ही। बादशाहको स्वामीजी की ऐसी निष्ठुरता सहन न हो सकी और वे झल्ला कर बोले—"अरे ऐसे अज्ञानियों से माथापच्ची करना मूर्खता है। यह तो कोई अज्ञानी है, जो मनुष्य होकर भी पशुवत व्योहार करता है।" बादशाह रुपयों की थैली उठवाकर बीरबलके घर भेजवा दिये। उनका कस्द था कि दिये दानको फिर वापस नहीं लेते थे। वे सबभाँतिसे हारकर अपने महल को चले गये। दर्बार उठने के पश्चात् फिर जब बादशाह और बीरबल का एकान्त में समागम हुआ तो बाद- शाह ने स्वामी के पास जाने से लेकर लौटने तक का सारा समाचार कह सुनाया। अन्त में बादशाह ने कहा- "अच्छा बीरबल ! यदि किसी को मूर्ख का सामना करना पड़े तो उस समय क्या करना चाहिये।" बीरबल ने तत्काल उत्तर दिया- "पृथिवी नाथ ! एकदम चुप रह जाना चाहिये।" बादशाह को उल्टी तोहमत लगी। पहले उनका विचार था- "इस प्रकार समझा कर बीरबल के गुरु का मूर्ख होना साबित करूँगा। लेकिन उनकी उस आशा पर एकदम पानी फिर गया। बीरबल ने उन्हें ही मूर्ख बना दिया। बादशाहने कहा- "सन्यासी को मैंने इतनी दौलत देकर बहुतेरा चाहा कि उससे कुछ वार्तालापकरूँ, परन्तु उसने धनका कुछ भी लालच नहीं किया बल्कि उल्टे मुझको ही मूर्ख बना चुप रह गया। आज से कस्द करता हूँ कि अब भविष्यमें जब कभी किसी महात्मा से मिलने