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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

जब बीरबल को भाग्य की प्रधानता मालूम है तो

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और वह बादशाह से निवेदन कर बोला-“पृथिवीनाथ! जब बीरबल को भाग्य की प्रधानता मालूम है तो इसका कोई सबूत भी होगा। बादशाह ने झट बीरबल से पूछा-“हाँ बीरबल ! इस बात का कोई सबूत दो ।” बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ ! यह कोई ऐसी वैसी बात नहीं है जो कोई गाँठ में बाँधे फिर रहा हो और तुरत खोलकर दिखला दे, आपकी ऐसी ही इच्छा है तो कुछ दिनों में सिद्ध कर के दिखला दूँगा ।” उस दिन का कार्य्य समाप्त हुआ और लोग अपने २ घर गये । एक दिन बादशाह को जमुना में सैर करने की इच्छा हुई अतएव कुछ दरबारियों को साथ ले एक खास नौका पर बैठकर यमुनाजी में जल विहार करने लगा-बीच दरिया में पहुँच कर फिर उसे भाग्य और उद्योगवाली बात स्मरण हो आई, उसने बीरबल से कहा-“क्यों बीरबल! अभी तुम्हारा दिमाग ठिकाने आया की नहीं-“बोलो उद्योग को प्रारब्ध से प्रधान मानते हो वा नहीं ?” इस बार भी बीरबल ने पहले ही सा उत्तर दिया । बीरबल की इस हठधर्मी पर बादशाह चिढ़ गया और तत्क्षण अपने हाथ की अँगूठी निकालकर जमुना जलके मध्य में छोड़ दिया और बोला-“अच्छा बीरबल ! यदि अपनी भाग्य की प्रधानता से तू एक मास के अन्तरगत यह अँगूठी मुझे न मिला सकेगा तो तेरी गर्दन उड़ा दी जायगी ।” बादशाह के उस आकस्मिक कोप से सब लोग थर्रा गये । सब लोगों ने देखा कि यहाँ पर जमुना जी का जल बहुत गहरा है। यहाँ से अँगूठी का मिलना असम्भव हो

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१७७ अकबर बीरबल विनोद नहीं बल्कि नितान्त असम्भव है। अब बीरबल की जान नहीं बच सकती, परन्तु बीरबल ने कुछ जवाब नहीं दिया । वह चुपचाप बैठा रहा । नाव किनारे पर आ लगी । घर लौटते समय बादशाह ने उस जगह अपने सिपाहियों की पहरा चौकी बाँध दी ताकि बीरबल किसी प्रकार उस अँगूठी को जल से बाहर न निकाल सके । बीरबल प्रारब्ध के भरोसे चुप्पी साधकर बैठा रहा। जब सत्ताइस दिन व्यतीय हो गये तो बादशाह ने बीरबल से पूछा-“ क्यों बीरबल अँगूठी मिली ?' बीरबल ने इन्कार किया। तब बादशाह ने कहा--“देखो बीरबल ! अब भी उद्योग की प्रधानता स्वीकार करलो मैं तुम्हें माफी दे दूँगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! भाग्य के सामने उद्योग नहीं टिक सकता, मशल मशहूर है-“घड़ी में घर जले नौ घड़ी भद्रा ।” अभी तीन दिन का समय और है इतने में तो कितना उलट फेर हो सकता है।” बादशाह के क्रोध रूपी अग्नि में और भी आहुति पड़ गई, वह एक दम क्रोधित हो गये । जब अवधि का दिन बीत गया तो चौथे दिन फिर बादशाहने बीरबलसे अपनी अँगूठी माँगी । बीरबल ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मेरे भाग्यसे अँगूठी नहीं मिली।” बादशाह क्रोधित होकर बोला- “तबमरने के लिये प्रस्तुत हो जाओ।” बीरबल तो पहले से ही कमर कस चुका था, वह बादशाहके सामने निर्भय खड़ा हो गया । उसकी मुस्कें कसकर बाँध दी गईं । बीरबल की दशापर बादशाह को फिर तरस आ गई और बोले-“बीरबल ! अब भी मौक़ा है, तुम उद्योग की प्रधानता स्वीकार कर लो, मैं तुम्हें १२

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माफ कर दूँगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! मरते को मारना अच्छा नहीं, आप तुरत मुझे मारे जाने की आज्ञा दीजिये।” बादशाह ने कहा-अच्छी बात है, तब तो आगे ही आ रहा है।” बादशाहने वधिक को बीरबल को फाँसीघर ले जाने की आज्ञा दी। वह घर मकान के चौक के पास ही बना हुआ था। बीरबल की यह दशा देख समस्त प्रजा घबड़ा उठी क्योंकि बीर- बल।के समय में सबको रामराज्य था। न राजा का जुल्म प्रजा पर चलने पाता था और न प्रजा का राजा पर। सबके चेहरे पर मुरदनी छा गई। बीरबल के घर वाले भी चुपचाप मलीन मुख किये सब कार्य कलाप देख रहे थे, वे अब अपना धैर्य कायम न रख सकें और सबके सब सुसक सुसक कर रोने लगे। बीरबल फाँसी के तख्ते पर चढ़ाया गया। नियम के अनुसार वधिकों ने बीरबल से पूछा-“आप की अन्तिम इच्छा क्या है, उसको पूरी करने के लिये दस मिनट का समय और दिया जाता है। बीरबल अभी कुछ कहने भी नहीं पाया था कि एक फकीर प्रगट हुए। उनको आते किसी ने नहीं देखा था जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो जमीन को फाड़ कर प्रगट हुए हों। फकीर ने कहा-“बीरबल ! यह तुम्हारे फाँसी का समय है अतएव मरने से पहले एक पुण्य कर्म करता जा। यह सबेरे सबेरे का समय है और मुझे भूख बहुत लगी है इससे तू मेरे भोजन का प्रबन्ध कर। इससे बढ़कर दूसरा दान नहीं है, सा सदा ऐसे लोग कहते आये हैं। मैं मछली खाना चाहता हूँ, इसलिये एक अच्छी मछली पका कर खिला

अकबर बीरबल विनोद

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१७६ अकबर बीरबल विनोद और मुझ क्षुधित का आशीर्वाद ले ।” बीरबल बड़ी असमंजस में पड़ गया एक तो मरण काल दूसरे फकीर की याचना सो भी मछली । वह बोला—“शाह साहब ! आपको ज्ञात होना चाहिये कि मैं एक कुलीन ब्राह्मण हूँ; हमलोग अपने चौके में मछली माँस का प्रयोग नहीं करते फिर आपको क्योंकर खिलाऊँ ।” फकीर बोला-“यह सब सही है, परन्तु यदि तू इस मरणकाल में मेरी क्षुधा मिटायेगा तो इस पुण्य से तेरा बालबच्चों के सहित कल्याण होगा । वहाँ पर उस समय जितने लोग एकत्रित थे सभी ने बीरबल से फकीर की इच्छा पूर्ति का अनुरोध किया । कुछ काल तो योंही बात चीत में टल गया अन्त में मत विशेषता के कारण बीरबल को अपनी जिद्द छोड़नी पड़ी । एक आदमी बाजार जाकर एक मल्लाह से एक खूब मोटी और बड़ी मछली खरीद लाया । जब उस मछली को बीरबल छूड़ी लेकर चीरने बैठा तो उसके पेट में कोई ठोस चीज दिखाई पड़ी, उसका संपूर्ण पेट काटते ही बादशाह की वह जलमें फेकी हुई अँगूठी बाहर निकल आई । बादशाह अपनी खिरकी से गरदन निकाल कर बीरबल की फाँसी का दृश्य देख रहा था । उसने देखा कि बीरबल एक मछली फाड़ रहा है, परन्तु उसके और उस फकीर के अन्तर्गत क्या क्या बातें हुईं इसका उसे कुछ भी गम न था । बीरबल उस अँगूठी को हाथ में लेकर खड़ा हो गया और शाह साहब को देखने लगा । वे उसके खड़ा होने से पहले ही अन्तर्ध्यान हो गये थे ।

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अकबर बीरबल विनोद १८० बीरबल ने एकत्रित मंडली से कहा-“आप लोगों की अनुमति प्राप्त कर मैं एक बार पुनः बादशाह से मिलना चाहता हूँ, कृपाकर मुझे फिर बादशाह के समीप ले चलें। उन लोगों ने मछली का पेट फाड़ते समय कुछ निकलते हुये अवश्य देखा था पर क्या निकला सो कोई नहीं जानता था। वे बड़ी प्रसन्नता से कर्मचारियों के सहारे बीरबल को बादशाह के पास ले गये। बीरबल को अपने समीप आते हुये देखकर बादशाह ने अनुमान किया-“हो न हो बीरबल डरकर अब उद्योग की प्रधानता स्वीकार करने के लिये मेरे पास आ रहा हो परन्तु अब मैं अपनी आज्ञा भंग न करूँगा। इसी लिये इसके पहले ही मैंने उसे कई बार मौका दिया था, परन्तु उस समय उसने मेरी बातों पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया।” बीरबल पास पहुँचकर बादशाह को सलाम किया। तब बादशाहने कहा-“बीरबल ! अब तुम्हारा प्रयास करना वृथा है, इस समय चाहे तुम उद्योग की प्रधानता मान भी लो परन्तु मैं अपनी आज्ञा रद्द नहीं करूँगा। बीरबलने कहा-“प्रभु ! जरा पहले मेरी बातें सुन लें; मैं उद्योग की प्रधानता मानने नहीं आया हूँ।” बादशाह ने कहा-“अच्छा कहो।” तब बीरबल बोला-“आपकी अँगूठी देने आया हूँ इसे पहन लीजिये।” बादशाह ने उसे हाथ में लेकर देखा तो सचमुच वही राज मुहर वाली अँगूठी थी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि वे उसे जमुना के अगाध जल में फेंक आये थे। कई बार खूब उलट पलट कर देखा जब उसके निस्वत कुछ

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१८१ अकबर बीरबल विनोद सन्देह न रहा तो बोले-“बीरबल यह अँगूठी कैसे प्राप्त हुई?” बीरबल ने जवाब दिया-“गरीबपरवर ! मेरा प्रारब्ध घसीट लाया है। तब उसके मिलने का सब किस्सा बीरबलने बादशाह को सुनाया। बादशाह बीरबल से बहुत प्रसन्न हुए और दस हजार मुहरें, एक सुन्दर वस्त्र तथा कई बाहन पुरस्कार में दिये। उसके घर वालों को भी सुन्दर २ वस्त्र दिये गये। उप- स्थित जनता के सहित बादशाह ने प्रसन्नता से प्रारब्ध की प्रबलता स्वीकार कर ली। ─━o:*:o━─ बादशाह और कवि गंग एक दिन बादशाह जनाने महल में गाना सुन रहे थे, उसके कुटुम्ब की सारी स्त्रियाँ उपस्थित थीं। वहाँ पर सिवा बादशाह के दूसरा कोई मर्द नहीं था। यह जुमावड़ा बादशाह की बेगमों के मत से हुआ था। उनका विचार था कि बादशाह प्रेम में फाँसकर कुछ दिनों तक महल में रक्खे जायें। उनका उद्योग भी कुछ २ सफल होते दिखलाई पड़ा, बादशाह उनके प्रेम में फँस गये। एक बेगम जिसका कोकिल कंठा नाम था, सब के अन्त में एक वियोग मिश्रित गजल गाना शुरू किया। उसकी ऐसी दीनता भरी गजल से बादशाह पिघल गये और उससे पूछे “इस गाने से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?” बेगम ने कहा- “प्रभु आपका अधिकतर समय लड़ाई ही में बीतता है और यहाँ हम घर में पड़ी २ आपके वियोग की एक एक

अकबर बीरबल विनोद १८२

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अकबर बीरबल विनोद १८२ घड़ियों को वर्ष के समान काटती हैं। प्रभु क्या यह अनुचित नहीं है? मैं अपने हृदय की गवाही अपने मुख से कहाँ तक दें, उसे या तो हमारा मन या अन्तर्यामी ईश्वर ही जान सकता है। क्या आप बतलाने की कृपा करेंगे कि इस समय आप कितने समय के बाद लड़ाई से फुरसत पाकर महल में आये हुए हैं?" अब यदि न्याय की दृष्टि से देखें तो आपको हमें छोड़कर जाना उचित नहीं है। बादशाह ने कहा- "बेगम साहिबा! आप समझती हैं कि मैं एक लड़ाई ही के काम से बाहर रह जाता हूँ परन्तु दर- असल ऐसा नहीं होता, लड़ाई में तो कभी २ जाने का मौका लगता है। जो मैं अपनी प्रजाओं की देखरेख न करूँ तो भला इतना बड़ा साम्राज्य कभी टिक सकता है, मेरी अपकीर्ति संसार में फैल जावे। दो चार दिनों की तो तुम्हारी प्रार्थ- नाएँ भले ही स्वीकृत की जा सकती हैं। परन्तु एक साल, वा छ मास की गुंजायश नहीं है। मेरी अयोग सेवाओं से चिढ़कर मेरे सरदार और शाहजादे मुझ से गदर मचा सकते हैं, फिर मैं कितनी कठिनाई में पड़ जाऊँगा; क्या कभी इसपर भी विचार दौड़ाती हो? हाँ इतना भले ही कर सकता हूँ कि जो समय राजकीय कामों से बचाकर शिकार आदि में लगाता हूँ वह तुम्हारे पास ही रहकर बिताऊँगा। अब इससे अधिक और क्या चाहिये।" बादशाह के ऐसे रूखे उत्तर से सकुचाकर बड़ी बेगम साहिबा ने कहा- "प्रभु आप सारी बातें भले ही सही २ कहते हों, परन्तु फिर यह भी विचार करें कि हम घर में रहने वाली बेगमों

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का दिन रात कैसे कटे क्या हम पशु के समान बँधी पड़ी रहें ?” तब एक दूसरी बेगम बोली-“प्रभु ! आपकी न्याय प्रियता सब पर विदित है, आप अपने छोटे से छोटे कर्म- चारियों की प्रार्थनाएँ सुनते हैं तो क्या कारण है कि हम लोगों की न सुनेंगे, चाहे जो हो आज तो हम आपको यहाँ से हिलने न देंगी, आगे हमारा प्रारब्ध जाने । सेखी करना भूल है, पर हम लोगों की बिना आज्ञा लिये आप कैसे जायेंगे । तीसरी बेगम मुसकराती और नेत्रों का बाण चलाती हुई बोली-“आप लोग भी क्या हैं ? हमारे स्वामी अपनी दयालुता के लिये विश्व विख्यात हैं, ये अब हमारी प्रार्थनाओं को मानकर आज से हम लोगों का साथ छोड़ कर कहीं न जायेंगे; यदि तुम लोगों को मेरी बातों का विश्वास न हो तो मैं शर्त लगाने के लिये तय्यार हूँ । जिसका जी चाहे मुझसे आकर हाथ मारे । चौथी बेगम हाव भाव दिख- लाकर बोली-“ बहनो ! स्वामीजी तो नाहीं करते ही नहीं हैं आप लोग इतना आग्रह क्यों करती हैं, मौन्यं स्वीकृति लक्ष- णम् ।” उत्तर न देना ही स्वीकार कर लेना है । बादशाह इन स्त्रियों के नेत्र कटाक्ष और हाव भाव में बँध गये, किसे क्या उत्तर देना चाहिये इसका उन्हें कुछ भी ज्ञान न रहा और विवश होकर बोले-“बेगमों ! आप लोगों के प्रेम से मैं गद्गद हो गया हूँ और आपको यकीन दिलाता हूँ कि अब तुम्हारे पास ही रहूँगा ।” बादशाह के मुख से इतना निकलना था कि बेगमें प्रसन्नता से उछलने लगीं और उनके बहुतेरे नये नये नखरे और हावभाव होने लगे । नित्य

अकबर बीरबल विनोद १८४

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अकबर बीरबल विनोद १८४ के नये नये प्रेम और नई नई मनबहलाव की बातों से बादशाह का मन ऐसा लग गया कि उन्हें अपने दरबार तक की सुध बुध न रही, राज में क्या होता है और क्या नहीं इसकी कुछ भी चिन्ता न रही । कई महीनों का समय इसी प्रकार गुजस्त होगया, परन्तु विचारे दरबारियों को बादशाह की खोज करते ही बीत गया; उन्हें यहाँ तक भेद न मिला कि आखिरश बादशाह किस पर्दे में जा छिपे हैं। जनाने में रहने का तो हवा भी नहीं लगने पाई थी। इधर राज्य में गदर हो जाने की आशंका उत्पन्न होगई। ऐसी दशा में दरबारियों को बादशाह का अभाव बहुत खलने लगा । बेगमें दरबारियों से बड़ी सतर्क थीं, वे सब पहले ही से दृढ़ संगठन कर चुकी थीं कि बादशाह का भेद दरबारियों को न मिलने पावे नहीं तो हमारे रंग में भंग डालने को उद्यत हो जायेंगे और कोई न कोई चाल चलकर स्वामी को हमारे कब्जे से बाहर निकाल ले जायँगे । बादशाह प्रेम पास में ऐसे जकड़ गये थे कि उन्हें इतना भी गम नहीं था कि कहाँ सुबह हो रहा है और कहाँ साम । बेगमों को अन्य दरबारियों से तो उतनी चिन्ता न थी, परन्तु बीरबल और गंग कवि का उन्हें बराबर खटका बना रहता था। उनको विश्वास था कि यदि इन दोनों में से एक को भी किसी प्रकार से बादशाह का महल में होना विदित हो जायगा तो ये हाथ मारकर बादशाह को हमारे कब्जे से बाहर निकाल ले जायँगे । इसलिये उन्होंने अपनी सहचरियों और पहरे के सिपाहियों को खूब सावधान कर दिया था

१८४ अकबर बीरबल विनोद

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१८४ अकबर बीरबल विनोद इतना ही नहीं उनको अच्छी चौकसी के लिये छिपेतौर से कुछ अधिक वेतन भी देती थीं और उन्हें हुक्म दे रखा था कि कोई भी मर्द महल के भीतर प्रवेश न करने पाये। जो काम बादशाह के करने का था वह सब रुक गया। बाहर बाहर से कितने ही राजदूत आये, परन्तु उन्हें गद्दी खाली मिली। इस घटना को देखकर वे बहुत ही चकराये इधर नगर निवासियों के चेहरे पर भी कालिमा का पर्दा पड़ने लगा। आज नौ दस महीने से बादशाह का गुम हो जाना बड़े आश्चर्य की बात थी। धीरे धीरे लोगों का विचार पल्टा खाने लगा। वे अपनी मनमानी करने पर उद्यत हुए। दरबारियों को गुप्तचरों के जरिये सारी बातें विदित हो जाती थीं, इसलिये उन्हें भय था कि कहीं बाहरी राजदूत कोई नया फसाद न खड़ा करदें। बीरबल ने सोचा कि अब बिना बादशाह का पता लगाये अच्छा न होगा। अतएव इसका भार बीरबल ने अपने ही सिर उठाया। मुख्य-मुख्य सभासदों की एक प्राइवेट गोष्ठी हुई। सबको संबोधन कर बीरबल बोला-“मित्रों! अब राजका काम सँभ- लते नहीं दीखता है, कारण कि बादशाह के गायब हो जाने का समाचार दूर देशों तक फैल चुका है बाहरी राजदूत टंटा फानने पर उद्यत दिखाई पड़ते हैं। ईश्वर न करे कि कहीं से शत्रुओं की चढ़ाई हो जाय; नहीं तो अपने उद्धार में बड़ी अड़चन पड़ेगी। ऐसी स्थिति में एक ही शत्रु नहीं होते बल्कि राज्य के लोभ से जो लोग मित्र रहते हैं वे भी सत्रु बनकर चढ़ाई करने पर उद्यत हो जाते हैं। फिर इस

अकबर बीरबल विनोद १८६

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अकबर बीरबल विनोद १८६ स्थिति को हम कैसे सँभाल सकेंगे। इसलिये हमें मुनासिब है कि तन मन तथा धन से बादशाह की खोज में कटिबद्ध हो जावें। टोडरमल नामी एक प्रधान दरबारी बोला-"बीरबल ! मेरी अनुमति से आप पहले महल के उन स्थानों का अन्वेषण करें जहाँ तक कि आपको महलमें जाने की आज्ञा है।" बीरबलने कहा- "यह मैं इससे पहले ही कर चुका हूँ; परन्तु जब मेरा कुछ वश न चला तो आज यह बात आप लोगोंके सामने उपस्थित किया है।" गंग कवि बोला-"आप लोगों को विदित है कि मैं बादशाह को देखने के लिये कितना उतावला हो रहा था, सो कलह मुझसे बादशाह का साक्षात्कार होगया। मानो सूखते विरवे पर पानी पड़गया, सबकी आँखें खुल गईं। बीरबल ने पूछा- "आपने बादशाह को कहाँ पर देखा था।" गंग ने उत्तर दिया-"वह दिलाराम बेगम के कमरे में सोये थे।" बीरबल ने कहा-"ठीक है, बेगम ने बादशाह को मोहित कर लिया है, भला ऐसी दशा में बादशाह दरबार में कैसे आ सकते हैं?" गंग कविने कहा-"केवल पता लगाने ही में मुझे जानपर खेलने की नौबत आ पहुँची थी अब वहाँ से निकाल लाना कोई आशान बात नहीं है। बीरबल ने गंग को उसकाते हुये कहा-"फिर भी यह काम सिवा कविवर गंग के दूसरे के किये हो भी नहीं सकता।" एक अन्य दरबारी ने भी कहा- "भाई यह साधारण एहसान नहीं है, बादशाह को निकाल लाने वाले की कीर्ति अमर हो जायगी। कारण कि इससे अगणित लोगों का उपकार होगा। गंगजी तुरत कार्य संपा-

१८४ अकबर बीरबल विनोद

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१८४ अकबर बीरबल विनोद दन के लिये अग्रसर होइये।" गंग बोले- "क्या खूब ! जान पड़ता है कि आप लोग मेरा ही प्राण लेने को उद्यत हुए हैं।" खानखाना अबतक चुप्पी साधे हुये था परन्तु गंग को कच- ड़ियाते देखकर बोला- "गंगजी इसमें आपके लिये कोई भय करने की बात नहीं है। यदि बादशाह क्रोधित भी रहेंगे तो आपकी तरफ देखते ही पानी २ हो जायँगे । यह कोई साधारण काम नहीं है इससे आपको एक बड़ा एहशान मिलेगा।" गंग बोला- "क्या आप लोग उन बेगमों को कुछ कम समझते हैं जो बादशाह को अपने प्रेम फाँस में जकड़ कर आज दस महीनों से गुम किये हुए हैं यदि वे मुझसे रुष्ट होकर बादशाह को उल्टा सीधा समझा देंगी तो बादशाह मेरी जान लेने पर उतारू हो जायँगे । मेरे बालबच्चे बिलबिला कर बे मौत मरेंगे । बादशाह को महल से बाहर निकाल लाना शेर का सामना करना है" बीरबल बोला- "गंगजी ! मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यदि अबकी बार बादशाह उन बेगमों के हाथ से छूटे कि समझ लेना कि फिर वे उनके हाथ न लगेंगे । इस बार ही उनसबों ने उन्हें कैसे फँसा लिया, मुझे तो इसी पर बड़ा आश्चर्य हा रहा है।" अब राजा टोडरमल की बारी आई वे बोले- "कविवर ! आपको हतोत्साह होना शोभा नहीं देता; यह काम कवियों का ही है कि दूसरों को उत्साह देते हुए लड़ाई में स्वयं अपना प्राण भी विसर्जन कर देना। इसके अनेकों प्रमाण पुस्तकों में भरे पड़े हैं। लड़ाई में प्राण देकर हमारे प्राचीन कवियों ने केवल थोडे से आदमियों की जीवन

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अकबर बीरबल विनोद १८८

रक्षा की होगी यहाँ तो समस्त भारत को काल की गाल से बचाना है। आप धैर्य से काम लें, कामयाबी आपके ही द्वारा हासिल होगी। इस महान पुण्य का भागी होना विधाता ने आपही के करम में लिखा है।" बीरबल गंगको प्रोत्साहित करने के लिये फिर बोला— हमारे कवि सम्राट तो सदासे सूरमा हैं; इस बार न जाने क्यों इनका मन कदरा रहा है? क्या राज का प्रबन्ध उलटने वाला तो नहीं है? हरेच्छा! भावी बड़ी प्रबल होती है।" गंग से चुप न रहा गया वे बोले-“दीवान साहब अब कुछ न कहो आपके बोलने से मेरा कलेजा फड़कने लगता है। आपने कोई जादूगरी तो नहीं सीख रक्खी है। या आपकी बाणीमें कोई मोहनी शक्ति तो नहीं घुसी हुई है। मैं आपकी बातें सुनते ही आप के फेर में आ जाता हूँ। टोडरमल ने कहा-“देखो गंग मोहनी सोहनी कहना तो टाल मटोल की बातें हैं अब आपको अपना विचार स्पष्ट कर देना चाहिये या तो हाँ करो वा नाहीं करके सारा बखेड़ा दूर कर दो। गंग बोले-“क्या खूब, आप सब लोग एक मत होकर मेरे पीछे पड़ गये हैं, परन्तु स्मरण रखना कि इस बार प्राण लेने देने की बारी है, जब सर कटाने की दशा उपस्थित होगी तो क्या उस समय भी मेरी रक्षा करोगे।” बीरबल ने सबको इशारा किया जिस कारण सब सभासद एक साथ हामी भरने को तय्यार हो गये। बीरबल बोला-“कविवर! आपका एहसान इस सभासदों पर सबसे बढ़ कर होगा। क्या इतने लोगों के कहने पर बादशाह विचार नहीं करेंगे। टोडरमल ने कहा-“गंगजी अब

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१८६ अकबर बीरबल विनोद तत्काल बादशाहको महल से निकाल लाने का उपाय करो।” गंग बोला-“मैं दीवान बीरबल और राजा टोडरमल प्रभृत सभी दरबारियों से आग्रह पूर्वक निवेदन करता हूँ कि इस समय मेरा दिल और दिमाग काम नहीं करता है अतएव इस समय यश प्राप्ति के लिये कोई दूसरा दरबारी बीड़ा उठावे। मेरी सम्मति में तो ऐसा आता है कि बीरबल मानसिंह टोडर मल और खानखाना, प्रभृत कोई भी दरबारी इस काम का भार अपने सिर ले तो अति उत्तम हो।” राजा टोडरमल बड़ी चिन्ता में पड़ गये उन्होंने विचार किया कि जिस बात को हम लोग घंटों परिश्रम कर इतने ऊँचे पहुँचाया था वह थोड़े ही में गिरना चाहती है यदि सचमुच में गिर ही गई तो यह आज की सभा निष्फल हो जायगी। उन्होंने कहा-“जो काम जिसके करने का है वही उसके करने का असली हकदार है। कविवर ! यह काम कवियों का है; इसे कोई दूसरा नहीं कर सकता।” गंग कबि इस बार बिल्कुल निरुत्तर होगया असल में बात भी सही थी, सही के आगे हरएक विचार- वान पुरुष को झुकना पड़ता है। उसने हामी भर ली और बोला-“चाहे जैसे भी हो अब बादशाह को जनाने महल से बाहर निकाल कर ही दम लूँगा।” समस्त दरबारी आनन्दविह्वल हो गये। इस खुशखबरी के उपलक्ष में सभों ने ईश्वर पूजा करने की मनौती मानी। इसके पश्चात सभा का काम बन्द हुआ। लोग दूसरे कार्यों का सँभाल करने लगे। उधर गंगकी और ही हालत थी। उसने विचार किया कि

अकबर बीरबल विनोद १६०

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अकबर बीरबल विनोद १६० जो काम मुझेही करना जरूरी है उसमें व्यर्थ आगा पीछा करना उचित नहीं। मैं इस कार्य को आज ही सम्पादन करूँगा। यह राजदरबार है। गुप्तचर बराबर लगे रहते हैं, कहीं यह सुराख बेगमों को लग गई तो फिर काम होना असम्भव हो जायगा। वे बादशाह को ऐसी गुप्त कोठरी में छिपा देंगी कि वहाँ तक मेरा पहुँचना ही कठिन हो जायगा। फिर एक कवि की ऐसी युक्ति भी है— "काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होयगो, बहुरि करोगे कब ॥" गंग का ऐसा विचार करना झूठा नहीं था वह बेगमों के नस नस से वाकिफ था, दूसरें स्त्रियों के भेद भावों का पूर्ण ज्ञाता भी था। प्रातःकाल ही अपने कार्य साधन का निश्चित कर जब अर्ध रात्रि का अमला आया तो अपनी पोशाक बदल कर भयावनी सूरत बना ली। दिन मे ही एक काला बुरका और एक हाथ भर की ऊँची काली टोपी सिलवा कर दुरुस्त करवा लिये था। जब मध्य रात्रि आई तो बुरका और टोपी को धारण कर हाथ में एक मोटा सा लट्ठ बाँध घर से बाहर निकला। एक हाथ में माला भी लटक रही थी। उसने अपनी सूरत राक्षस की बनाई थी। रास्ते में लोगों से साक्षात्कार न हो जाय इस भय से हटता बढ़ता निर्धारित स्थान की तरफ अग्रसर हुआ। जनाने बाग के द्वार पर पहुँच कर आगा पीछा सोचने लगा। उसके मनमें यह समाई कि अगर सदर फाटक से चलता हूँ तो निश्चय है कि पहरे वालों से मुठभेड़ हो जायगी। अतएव गुप्तद्वार से चलने में ही कल्याण

१६१ अकबल बीरबल विनोद

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[header] १६१ अकबल बीरबल विनोद

दीख पड़ता है। तदर्थ उसने गुप्त द्वार का ही आश्रय लिया। रात्रि का चतुर्थ पहर था-लुकते छिपते वह एक ऐसी जगह जा पहुँचा जहाँ से हल्का प्रकाश बाहर को आ रहा था। बादशाह पाखाने से निवृत्त होकर दातून कर रहा था, उसके चारों तरफ बारांगनाओं की चौकी थी। बादशाह का आनन्द उपभोग देखकर गंग चकरा गया। और मन ही मन सोचा-"भला ऐसा कौन त्यागी होगा जो ऐसा इन्द्रभवन का उपभोग त्यागकर दुनिया के बखेडों में फँसकर जीवन व्यतीत करेगा। किसीके आनन्द में बाधा पहुँचाने से बड़ा प्राश्चित लगता है, परन्तु क्या करूँ मैं तो कतंव्य की बेड़ी पहन चुका हूँ, मुझे तो उसका निर्वाह करना ही पड़ेगा। फलदाता ईश्वर है उसे जो पसन्द होगा करेगा। ऐसा संकल्प विकल्प कर अपने मनको भली-भाँति पक्का कर लिया फिर खिड़की के समीप पहुँच कर एक गहरी लल- कार देकर बोला-"ऐ बादशाह ! तू अभी तक अपने को मनुष्य समझकर अचेत पड़ा है; परन्तु बाहर के लोग तुझे घोड़े और गदहे की उपाधि वितरण कर रहे हैं, क्या तुझे इसका भी कभी ध्यान आता है, मौका है अब भी सँभल जा।" इतना कहना था कि वह बड़ी तेजी से निकल भागा, उसके भागने की गति इतनी तेज थी कि चाहे कोई कितना ही दौड़ाक क्यों न होता परन्तु उसका हाथ नहींमार सकताथा। बादशाह भीतर से पुकार कर बोले-"अरे कोई है, इस नालायक को अभी जान से मार डालो।" बादशाह को गंग ऐसा प्रख्यात कवि का शब्द ज्ञात था उसकी आवाज से उसने गंगका होना

गंग प्राण लेकर भागा तो सही परन्तु फिर भी चौकीदारों

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निश्चत किया और उसके कहने का भावार्थ भी उनकी समझ में आ गया, लेकिन यहाँ कौन आकर बोल गया यह उनके मन में स्थिर न हो सका। वह भली भाँति से जानते थे कि इस स्थानपर आने में पशु पक्षी तक भयभीत होते हैं भला कोई मनुष्य कैसे आ सकता है। उधर विचारा गंग प्राण लेकर भागा तो सही परन्तु फिर भी चौकीदारों की हद से बाहर नहीं जा सका; आखिरश पकड़ा ही गया। चौकीदारों ने देखा कि यह तो कविवर गंग हैं, इनका यहाँ आना मतलब से खाली न होगा। अगर कोई चोर घुसा होता तो हम उसे मार डालते; परन्तु इनको मारना उल्टे हम लोगों का प्राण घातक होगा। वे उसे सजीव छोड़ दिये। विचारा गंग कैद कर लिया गया, बादशाह क्रोध से तम तमाया हुआ महल से बाहर निकला, बेगमों ने हरचन्द उन्हें रोकने की कोशिश की परन्तु किसी की एक न सुनी। कवि गंग की घोड़े और गदहे वाली उपमा उनके मनमें उबल रही थी। बेगमों को अपने दरबारियों की इस हरकत पर बड़ी नाराजगो हुई और वे उन्हें लाखों प्रकार की बददुआयें देने लगीं। अन्त में यह जानकर उन्हें कुछ तसल्ली हुई कि जिसने हम लोगों के रंग में भंग डालकर बादशाह को बाहर निकाला है उसका प्राणदण्ड की सजा मिलेगी और आज से सबपर विदित हो जायगा कि ऐसा कर्म करने वाले की कैसी दुर्गति होती है। दरबारियों का जब बादशाह का बेगमों के फन्दे से छूटना और कवि गंग पर आई विपत्ति का समाचार मिला तो हर्ष और शोक दोनों को एक साथ ही प्राप्त हुए।

१६३ अकबर बीरबल विनोद

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१६३ अकबर बीरबल विनोद बादशाह बाहर निकलने के दूसरे ही दिन सारे नगर में अपने प्रगट होने का ढिंढोरा पिटवा दिया जिससे प्रजावर्ग में आनन्द की वर्षा होने लगी और अत्याचार यानी बगावत करने की इच्छा करने वालों को भय उत्पन्न होगया । दरबार के समय नगर के हर एक विभाग से दरबारी गण और प्रजावर्ग के लोग आ आ कर दरबार को भरने लगे। बादशाह क्रोधोन्मुख सिंहासन पर आ बिराजे । इतने दिनों के पश्चात आज बादशाह को लोगों ने सिंहासन पर आरूढ़ देखा । लोग बादशाह को सलाम कर करीने से अपनी २ जगहों पर जा बैठे । बादशाह से रुख मिलाने की किसी में शाहस न थी, सबका सिर नीचे को झुका हुआ था । इसी बीच सिपाही लोग गंग कवि को रात्रि वाली पोशाक में बांधकर दरबार में ले आये । गंग को प्रोत्साहन देकर भेजने वाले दीवान प्रभृत सभी दरबारियों ने गंग के निराले ढंग को देखा । वे मनही मन ईश्वरसे उसकी खैर मनाते हुए सुअवसर की प्रतीक्षा करने लगे । वे तन मन से उसकी जीवन रक्षा करने के लिये तत्पर थे । बादशाह गंगको न पहचान कर बोले—"मैं क्या देख रहा हूँ; क्या यह कोई प्रेत वा पिशाच तथा भूत तोनहीं है ?" तब गंग कवि को सुअवसर मिला और वह बधा बँधा झुक कर बादशाह को सलाम किया । सलाम करते समय उसकी लम्बी टोपी जमीन पर गिर पड़ी जिससे उसका चेहरा साफ साफ दिखाई पड़ने लगा । बादशाह गंग को देखकर पहचान गये और बोले-"गंग ! तुमने किस अधिकार से १३

अकबरबीरबल विनोद १६४

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अकबरबीरबल विनोद १६४ रात्रि के समय मेरे जनाने महल में प्रवेश किया था ? तुम्हारा कसूर प्राण दण्ड पाने का है।" गंग लाचार था, उसने अपने मुख से कुछ भी उत्तर न दिया। बादशाह की आज्ञा पातेही वधिक उसे कतल करने के लिये म्यान से तलवार निकाल कर सामने आये । गंग अपनी अन्तिम घड़ियाँ गिनने लगा; फिर उसका ध्यान उन दरबारियों की तरफ गया जिनकी कृपा से वह इस दशा को प्राप्त हुआ था। वह बारी बारी सबके मुख की तरफ फिरकर देखा। इशारे से हरचन्द लोगों को अपनी सहायता के लिये प्रोत्साहित किया; परन्तु प्राण जाने के भय से सहायता करने की कौन कहे कोई सिर उठाकर उसकी तरफ देखा तक नहीं। बादशाह गंगकी सारी हरकतों का मनोमन निरी- क्षण कर रहे थे; आखिरकार उनसे न रहा गया और गंग से बोले- "गंग ! तू आज यह कौन सा ढोंग निकाला है दरबार है या तमाशे का घर । गंग से रहा न गया; कल की सभा के परामर्श दाताओं की काली करतूत उसे सूल की तरह बेध रही थी। अभी कल्ह तो वे उसे विमानारूढ़ कर सदेह स्वर्ग पहुँचाने पर तुले हुए थे और आज किसी के मुख में छेद ही नहीं दिखाई पड़ता। ऐसा प्रतीत होता है कि अगली बातों से इन्हें कुछ भी परिचय नहीं है। जब मुझे काल के गाल में जाना ही है तो इन्हें भी विश्वासघात का मजा चखाकर जाना चाहिये ताकि सबको आगे के लिये मेरा सबक याद रहे। कवि गंग दरबारियों की तरफ हाथ का इशारा करके बोला- "पृथ्वीनाथ ! इन्हीं दरबारियों की काली करतूतों के

१६५ अकबर बीरबलविनोद

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१६५ अकबर बीरबलविनोद कारण आज मैं इस दुर्गति को प्राप्त हुआ हूँ, इसमें इन सबों का सारा अपराध है। फिर उसने सब के सामने प्राइवेट सभा का होना और उसमें लोगों का उसे उभार कर भेजना आदि २ बातें एक एक कर कहना शुरू किया । गंग कवि की बातों से बादशाह को बड़ा कौतूहल हो रहा था, इस पर तो वे खिलखिला कर हँस पड़े जब कि गंग द्वारा उसे मालूम हुआ कि दरबारी लोग कलह की सभामें उसे बचाने का कस्ट करके अब मुँह से चूँ तक नहीं बोलते । बादशाह ज्यों ज्यों गंग कवि से उसकी कहानी सुनते गये त्यों त्यों उनके क्रोध में कमी आती गई। अन्त में वे प्रसन्न होकर गंग कवि के प्राणदण्ड की सजा रद्द करदी और उसके कर्त्तव्यों को उपकार की दृष्टिसे किया जाना समझ कर उसे अच्छी पारितोषिक प्रदान किये । बादशाह ने कहा- “देखो कविवर ! मेरी बातें गठिया कर रखलो; जो लोग मधुर भाषी होते हैं वे कभी भी अपने वादे के सच्चे नहीं निक- लते । इसलिये किसी की मीठी मीठी बातें सुनकर उसके फेर में तबतक नहीं आना चाहिये जबतक कि उसका दिली भाव न समझ में आ जाय ।” बादशाह को अपने दरबारियों की धूर्तता से कुछ खेद सा उत्पन्न हो गया था इसलिये उनकी तरफ इशारा करके बोले- “आप लोगों ने इस विचारे वृद्ध को मरने के लिये तो भले ही उसका कर काम निकाल लिया, परन्तु उसके छुड़ाने का किसी ने कुछ भी प्रयास नहीं किया क्या तुम्हें यही करना यथोचित था।”