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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

अकबर बीरबल विनोद ६०

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अकबर बीरबल विनोद ६० हैं उसके सौवें हिस्सेके बराबर मेरी स्त्री के हाथमें चूड़ियाँ हैं यदि आपको विश्वास न हो तो उन्हें गिनकर अपनी शंका समाधान कर लें।” अधिकतर प्रिय क्या है ? एक दिन बादशाह अपने दरबार में बैठा था और दो वर्षीया शाहजादा सलीम उसकी गोद में सानन्द खेल रहा था। उसकी बाल-चपलता देखकर बादशाह आनन्द-मग्न हो गया और आनन-फानन उसके मनमें यह प्रश्न उपस्थित हुआ— “जीवधारी को अधिकतर प्रिय क्या है ?” बादशाह को चुप देखकर सलीम उसका ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करने के अभिप्राय से तुतला कर कुछ बोला-“उसकी तोतरी बातों ने बादशाह के आनन्द को और भी बढ़ा दिया। आनन्दवश वह अपने मनोगत भावों को दबा न सका और तत्क्षण समस्त दरबारियों की तरफ लक्ष करके पूछा—“इस पृथिवी पर के प्राणियों को अधिकतर प्रिय क्या है ?” दरबारी सोच में पड़ गये ? कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। अन्त में आपस में गोष्ठी करने लगे, परन्तु फिर भी किसी सिद्धांत पर अटल नहीं हुए। बीरबल की अनुप- स्थिति में इन बिचारों पर कभी २ ऐसी विपत्ति आ जाया करती थी। यदि बीरबल प्रस्तुत होता तब तो उनका पौ बारह था। बादशाह भी बीरबल के रहते ऐसी २ बातें किसी दूसरे दरबारी से कभी न पूछता था। आज की सभा में बीरबल

६१ अकबर बीरबल विनोद

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६१ अकबर बीरबल विनोद न था जिस कारण इनके ऊपर ऐसी आफत आई। कुछ देर सोच समझ लेने के बाद सर्वसम्मति मिलाकर एक वृद्ध दरबारी बोला-"पृथिवीनाथ ! अधिकतर प्रिय लड़का होता है।" दरबारियों ने आपस की गोष्ठी से निश्चित किया था कि इस समय बादशाह लड़के को गोद में लिये हुए खिला रहा है अतएव उसके प्रश्न का इशारा लड़के की तरफ ही है। बादशाह उस समय वृद्ध दरबारी का उत्तर स्वीकार कर लिया और सभा बरखास्त हुई। बीरबल राजकीय कार्य से कहीं बाहर गया था दैवात दूसरे ही दिन आ पहुँचा। बादशाह को तो पहले की धुन बँधी हुई थी, बीरबल को सभा में बैठते ही वही प्रश्न उससे भी किया। वह बोला-"गरीबपरवर ! प्राणी को अपना जीव सबसे अधिक प्यारा होता है। इसकी तुलना और किसी से नहीं की जा सकती, चाहे वह अपना कितना ही सगा संबन्धी क्यों न हो ?" तब बादशाह अपने दरबारियों का मान रखने के लिये बीरबल की बात काटकर कहा-"तुम्हारा कहना गल्त है, क्या लड़का प्राण प्यारा नहीं होता ?" तुमको यदि अपने कहने पर अटल विश्वास है तो उसे प्रमाणित कर दिखावो,. बीरबल बादशाह की आज्ञा शिरोधार्य करता हुआ बोला- "पृथिवीनाथ ! बागका एक बड़ा हौज खाली करनेकी बागवान को आज्ञा दी जावे तब तक मैं बाजार से परीक्षा की चीजें लेकर लौट आता हूँ। आप सभासदों सहित बाग में उपस्थित रहें, वहीं पर मैं इस बात को प्रमाणित कर के दिखलाऊँगा। बादशाह की आज्ञा पाकर बागवान ने प्राणपण से परिश्रम

अकबरबीरबल विनोद ६२

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अकबरबीरबल विनोद ६२ करके थोड़ी ही देर में सबसे बड़े हौजको खाली कर सूचना दी। बागमें बैठने के लिये बादशाह की तरफसे समुचित प्रबंध किया गया और वे दरबारियोंके सहित बाग में दाखिल हुए। तब- तक बीरबल भी एक बँदरिये को उसके बच्चे सहित लेकर बाग में आया। बीरबल ने बँदरिया को बच्चे सहित हौज के मध्य भाग में बिठला कर ऊपर से पानी भरने की आज्ञादी। हौज में पानी भरा जाने लगा। पानी क्रमशः हौज के ऊपर चढ़ आया। बँदरिया बराबर अपने बच्चे को ऊपर उठाती गई। यहाँ तक कि बच्चा उसकी पीठ पर बैठ गया और पानी का बढ़ना बराबर जारी रहा। जब पानी बढ़कर उसके गले तक पहुँचा तो वह खड़ी हो गई और अपने बच्चेको अपने हाथ पर रखकर ऊपर उठा लिया। सब लोग इस नजारे को बड़ी गौर से देख रहे थे। बादशाह बीरबल को चिताकर बोला-“क्यों बीरबल ! क्या देखते नहीं हो कि किस प्रकार बँदरिया अपने प्राणों पर खेलकर बच्चे की रक्षा कर रही है, क्या अब भी पुत्र को सर्वोपरि प्रिय मानने को तैयार नहीं हो?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवीनाथ! थोड़ा और ठहर जाइये, अभी बँदरिया के प्राण पर नहीं आई है, थोड़ी देर में आपही फैसला हो जाता है।” अभी बीरबल और बादशाह में उपरोक्त बातें हो रही थीं कि बँदरिये के मुख में पानी भरना शुरू हुआ। पानी भरने के कारण उसका दम घुटने की नौबत आ गई, नाक में पानी भरने लगा, वह अधीर होकर बहने लगी। आखिरकार लाचार हो उसने बच्चे की ममता छोड़ दी और अपना

६३ अकबर बीरबल विनोद

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६३ अकबर बीरबल विनोद प्राण बचाने के लिये एक नया उपाय निकाला। झट बच्चे को पानी में डुबाकर आप स्वयं उसके ऊपर खड़ी हो गई, इस प्रकार उसका मुँह पानी से ऊपर हो गया। बीरबल ने बादशाह को उसे दिखला कर बागवान को पानी रोकने की आज्ञा दी। पानी आना तुरत बन्द हो गया और बँदरिया बच्चे सहित सजीव बाहर निकाल ली गई। बीरबल ने कहा-"पृथिवी नाथ ! आपने प्रत्यक्ष देखा है कि जब तक प्राण बचने की आशा थी तब तक बंदरिया बच्चे का प्राण बचाने की बराबर यत्न करती रही, परन्तु जब उसके ही प्राणों पर आफत आई तो वह बच्चे की जीवन-रक्षा भूल गई, बल्कि स्वयं उसके जान की गाहक होकर अपना प्राण बचाया। बादशाह दरबारियों सहित बीरबल के बुद्धि की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली। ━o*o━ मिश्री के डेली का हीरा। एक दिन रात्रि समय बीरबल किसी कार्यवश नगर से बाहर दूसरे ग्राम को जा रहा था, थोड़ी दूर जाने के बाद उसे एक झोपड़ा दिखाई पड़ा। उस झोपड़े से किसी के रोने की आवाज आ रही थी। अर्धरात्रि के समय फूट २ कर रोने का शब्द सुन बीरबल से न रहा गया। वह झोपड़े के पास जा पहुँचा। दरवाजा बन्द था, बीरबल ने आवाज देकर कई बार पुकारा-"भाई ! अभी इस झोपड़े में कौन आदमी रो रहा था ? उस झोपड़े से एक बुड्ढा मनुष्य बाहर निकला और

अकबर बीरबल विनोद ९४

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अकबर बीरबल विनोद ९४ लड़खड़ाते हुए बोला-“आपको रोने वाले से क्या गरज पड़ी है, मैं ही रो रहा था ?” बीरबल उसे अँधेरे में देखकर भली- भाँति पहचान न सका। वह एक बूढ़ा पुरुष जान पड़ता था। उसके शरीर के चमड़े भूल गये थे। कमर झुककर धनुष्या- कार हो रही थी। बीरबल ने आग्रह पूर्वक उससे ऐसी रात्रि में रोने का कारण पूछा। तब बुड्ढा बोला-“भला आपसे रोने का कारण बत- लाने से मुझे क्या लाभ होगा, नाहक एक अपरिचित आदमी के सामने दुखड़ा रोकर अपनी अमर्यादा क्यों कराऊँ?” बीरबल ने उसकी सहायता करने का बचन दिया, तब वह बुड्ढा बोला- “अच्छा यदि आप सुनना ही चाहते हैं तो सुनें। इस समय मेरी अवस्था सत्तर के लगभग पहुँच चुकी है, ईश्वर ने एक लाल दिया था सो भी चल बसा। घर में मेरी रखवाली वा भरण पोषण करने वाला कोई भी नहीं है, विचारा लड़का कमा कर लाता था उससे हम पिता पुत्रों का भरण-पोषण भलीभाँति हो जाया करता था। मेरे से काम नहीं हो सकता, बड़ी जोर लगाकर भी तीन चार पैसेसे अधिक की मजदूरी नहीं करपाता। महीने में ऐसा एक भी सौभाग्य का दिन नहीं होता, जिस दिन मैं भर पेट भोजन कर चैन की नींद सोऊँ। लड़के की सोच अलग मारे डालती है।' आज तीन दिनों से बराबर फाँका कर रहा हूँ। उदर की ज्वाला अबर्दास्त होने से रो रहा था।” बीरबल ने सोचा-यह अँधेरी रात है, चारो तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा नजर आ रहा है। ऐसी हालत में तत्काल इस

६५ अकबर बीरबल विनोद

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६५ अकबर बीरबल विनोद आदमी की भला मैं क्या सहायता कर सकता हूँ, बेहतर होगा कि कल प्रातःकाल इसे अपने मकान पर बुलाऊँ । उसने प्रकट रूपमें कहा— "चाचा जी ! यह रात्रिका समय है, थोड़ी देर और अपनी झोपड़ी में जाकर आराम कीजिए। तड़के उठकर दीवान- खाने में आना, मेरा नाम बीरबल है।" इतना कहकर बीरबल चला गया और बुड्ढा भी झोपड़ी में पड़ा हुआ सबेरा होने की प्रतीक्षा करने लगा, सारी रात उसको निद्रा न आई । सूर्यो- दय होते ही ठेगता हुआ दीवान के घर पहुँचा । बीरबल ने ने बुड्ढे की बड़ी आवभगत की और अच्छा अच्छा पदार्थ भोजन कराया । जब वह खा पीकर सन्तुष्ट हुआ तो बीरबल कहा-"चाचा जी ! इस समय मैं आपको केवल पन्द्रह दिन का खर्च देकर विदा करता हूँ । इसके बीच मिश्री की एक डेली लेकर उसे हीरे की शक्ल का बनाकर मेरे पास लाना, तब मैं आपको आगे की तरकीब बतलाऊँगा ।" बुड्ढा बीरबल को आशीर्वाद देता हुआ घर लौट गया । आठ दस दिनों के अन्त- र्गत वह एक मिश्री के टुकड़े को खूब घिस छोलकर हीरे के आकार का बनाकर बीरबलके पास ले आया । बीरबल ने उस नकली हीरे को हाथ में लेकर देखा, निसन्देह वह बनावटी हीरा असली हीरेको मात कर रहा था। बीरबलने बूढ़ेसे कहा- "चाचाजी इसको लेकर कल फिर आइयेगा, आपको बादशाह के पास चलना होगा। मैं इसे बादशाह के हाथ बेचकर आपको एक अच्छी रकम दिलाऊँगा । दूसरे दिन बीरबल बुड्ढे चाचा को साथलेकर रोज से पहले ही राज महल में जा पहुँचा । उसे देखकर बादशाह को कुछ

[header: अकबर बीरबल विनोद ६६]

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[header: अकबर बीरबल विनोद ६६]

कारण विशेष जान पड़ा इसलिये उससे पूछा-“क्यों बीरबल आज इतनी जल्दी क्योंकर आना हुआ ?” बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! यह कारीगर एक उत्तम हीरा लेकर मेरे साथ आया है, यह उस हीरे को बेचना चाहता है। मुझे विश्वास है कि यह चीज आपके पसन्द की होगी ।” इतना कहकर उसने हीरे को बादशाह के हाथ में दे दिया । बादशाह ने हीरे को भली-भाँति देखकर कहा-“बीरबल ! हीरा तो लाजवाब है; परन्तु बूढ़े जौहरी से कहो कि इसे लेकर दो घण्टे पश्चात हाजिर होवे ।” बुड्ढा वहाँ से हट गया । तब बादशाह ने बीरबल को उसकी भलीभाँति जाँच कराने की आज्ञा दी । बीरबल इधर उधर घूम फिर कर आ गया और बोला-“पृथ्वीनाथ ! इसके अच्छा होनेमें कोई सन्देह नहीं है। हीरे को आप अपने पास रक्खें ।” बीरबल के इस उत्तर से बादशाह को सन्तोष हुआ और फिर बोला-“हीरे को खरी- दने से पहले और जाँच करा लो ।” बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ ! इस समय हीरे को अपने मुख में रख लीजिये, फिर जाँच होती रहेगी ।” बादशाह ने हीरे को मुख में छिपा लिया । बादशाह की आज्ञानुसार बूढ़े चाचा के आने का समय हुआ और वे ठेंगते २ दरबार में पुनः हाजिर हुए । उसे देख बीरबल ने बादशाह से कहा-“गरीबपरवर ! देखिये वह हीरे वाला वृद्ध भी आन पहुँचा, उसे अब क्या कहकर उत्तर देना होगा ।” बादशाहने बीरबल की तरफ देखकर पूछा-“क्यों बीरबल ! वह हीरा तो मैं ने तुम्हीं को दिया था न ।” बीरबल ने साफ इन्कार कर दिया और बोला-“पृथ्वीनाथ ! उसे तो आपने

अकबर बीरबल विनोद ६७

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अकबर बीरबल विनोद ६७

अपने पास ही रखलिया था।” बादशाह को भी बीरबल की बात सच्ची जान पड़ी, खबर नहीं कि आखिरस उसे रक्खा किस जगह । उसने हीरे का बहुतेरा खोज किया, परन्तु जब कहीं हो तब तो मिले वह तो मुख में गलकर पानी होगया था । लाचार होकर बादशाह बोला-“अच्छा बीरबल ! बुड्ढे व्यो- पारी से उसका मूल्य निश्चित कर लो, परन्तु उससे कोई झकझक न करना।” हुक्म मिलते ही बीरबल ने बूढ़े चाचां से हीरे का मूल्य पूछा। वह बोला-“दीवान जी! हीरे का असली मूल्य दो हजार मुहरें हैं और दो सौ मुहरें मैं नफे में लूँगा।” बीरबल ने कहा-“नहीं तुम्हें नफे में पचास मुहरें ही दी जायँगी। बूढ़ा दुखित मन से बोला-“सरकार ! यदि आपको मुनाफे की दो सौ मोहरें देनीं स्वीकार हों तब तो लेवें, नहीं तो कृपाकर मेरा माल मेरे हवाले करें।” बीरबल मूल्य में कमी कराने के लिये उससे बारबार बना- वटी माथापच्ची करता रहा, अन्त में झुरुलाकर बोला-“बुड्ढे ! इतनी टिरटिर क्यों करता है, अच्छा पचास मोहरें और ले लेना।” परन्तु बूढ़े चाचा तो पक्के गुरु के चेला थे भला वे कब मानने लगे। मुँह बनाकर बोले-“दीवान जी! इस प्रकार मुझ गरीब को क्यों दबाते हैं, मैं दो सौ मुँहरों से एक कौड़ी भी कम न लूँगा।” बादशाह इन दोनों की बड़ी देर की झक झक सुन क्रोधित होकर पूछा-“क्यों बीरबल ! व्योपारी क्या कहता है?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! वह हीरे की लागत दो हजार मुहरें बतलाता है और मुनाफे की दो सौ मुँहरें अलग से माँगता

६८ अकबर बीरबल विनोद

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६८ अकबर बीरबल विनोद है। मैं इसके नफे में कमी करवाता हूँ और केवल एक सौ मुँहरें ही देना चाहता हूँ।” बादशाह ने बीरबल को इशारे से मना किया और उदारतापूर्वक बूढ़े जौहरी को हीरे का मूल्य और दो सौ मुनाफे की मुहरें खजाँची से दिलवा कर विदा किया। वृद्ध की प्रसन्नता बाँसों उछल पड़ी और मनोमन बीरबल को कोटिशः धन्यवाद देता हुआ अपने घर चला गया। शाम को दरबार से अवकाश पाकर जब बीरबल घर पहुँचा तो जौहरी बूढ़े चाचा को प्रस्तुत पाया। बूढ़ा बीरबल को देखकर प्रसन्नता से रोमांचित हो गया और बोला— “आपको और आपकी बुद्धि को धन्य है, दीवान साहब ! आपजो मुझ सरीखे दीनों पर उपकार कर रहे हैं उसका फल ईश्वर आपको हाथों हाथ देगा। मुझे विश्वास हो गया है कि इस पृथ्वी मंडल पर आप ऐसा प्रजापालक दूसरा दीवान नहीं है। उसकी ऐसी अनेकों प्रशंसा की बातें सुनकर उसके सन्तो- षार्थ बीरबल ने कहा-“चाचाजी ! इसमें मेरा क्या उपकार है। यह सब आपको आपकी बुद्धिमानी का प्रतिफल मिला है” बुड्ढा इस पर आवाक हो गया और कोटि कोटि आशीर्बाद देता हुआ अपने घर चला गया। नकली बीरबल जब से बादशाह को बीरबल के मृत्यु का समाचार मिला था तबसे उसके विछोह के कारण बड़ा दलगीर रहता और बराबर

अकबर बीरबल विनोद ६६

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अकबर बीरबल विनोद ६६ उसका शोक मनाया करता था। बादशाह की उदासी मिटाने के लिये लोगों ने बड़ी बड़ी तरकीबें निकालीं, पर दिल की लगन बुरी होती है। जब उपायों से कार्य्य-सिद्धि न हुई तो दरबारियों ने अष्टकौशल कर एक नई युक्ति सोच निकाली और कितने नागरिकों से कानों कान कहलाया कि अभी बीरबल जीवित है। जब इस हौवा से भी बादशाह को सन्तोष नहीं हुआ तो दूर दूर के शहरों तथा दिहातों से बीरबल के जीवित रहने का समाचार आने लगा। लोग कहते थे कि वह लड़ाई से बचकर एक दूसरे शहर में छिप कर बैठा है। एक बार ऐसी घटना घटी कि किसी मनुष्य ने अपने को बीरबल कहकर घोषित किया, परन्तु उसका बादशाह से साक्षात न हो सका, वह आते २ बीच मार्ग में स्वर्गवासी हो गया। बादशाह का मन्तव्य पूरा नहीं हुआ। जीवनपर्यन्त उसे अपने प्रिय मंत्री बीरबल से फिर साक्षात न हो सका। एक गाँव सीड़ी था उसमें इस घटना के दो तीन वर्ष बाद एक द्विजाति कुलोद्भव ने अपने को बीरबल कहकर घोषित किया और लोगों में इस बात का खूब प्रचार किया कि मैं ही बीरबल हूँ। जब पठानों का युद्ध छिड़ा था तो मैं लड़ाई में आहत होकर एक महात्मा की कृपा से जीता-जागता निकल आया। महात्मा ने मेरी बड़ी शुश्रूषा की। जब मैं एक दम चंगा हो गया तो उस साधु से आज्ञा लेकर इस गाँव में आ बसा। उस आदमी की सूरत भी बीरबल से बहुत कुछ मिलती जुलती थी। वह बीरबल के जीवनकाल की सारी

१०० अकबर बीरबल विनोद

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१०० अकबर बीरबल विनोद वातें भलीभाँति स्मरण कर लिया था जिस कारण बीर- बल सम्बन्धी प्रश्न उपस्थित होने पर वह उसका उचित उत्तर देता था । कितने ही लोगों को धोखा हो गया । वे उसे असली बीरबल समझकर बादशाह के पास पहुँचाने आये परन्तु वह रास्ते में ही स्वर्गवासी हो गया । बादशाह उसकी प्रतीक्षा करता रहा । ऐसी ही ऐसी और भी कितनी अफवाहें बादशाहके कान तक पहुँचीं, परन्तु जब उनकी जाँच कराई गई तो सारी बातें झूठी निकलीं । उसके गुप्तचर सच्ची खबर नहीं देते थे जिससे कालान्तर में उनका भेद खुल गया । बादशाह दूतों के ऐसे विश्वासघात करने पर आग बबूला हो गया और उनको कठिन दण्ड दिया । खुदा को अक्ल से पहचान करो बादशाहों की सभा में चित्रकारों के रहने की पुरानी प्रणाली है । अकबर बादशाह के दर्बार में भी नियम-परम्परा के अनुसार कई चित्रकार विद्यमान थे । उनमें एक सर्व- प्रधान था । वह प्रति चित्र के बनवाई में पाँच हजार पुरस्कार लेता था । एक दिन उस चित्रकार के पास एक बड़ा आदमी आया और बोला- "महाशय जी ! मुझे भी अपनी चित्र बनवानी है; यदि आप उसे सर्वांगपूर्ण बना सकेंगे तो मैं आप को पन्द्रह हजार रुपया इनाम दूँगा । चित्रकार सहमत हो गया और दूसरे ही दिन से चित्र बनाना शुरू किया । इस काम के सम्पादन में उसे कई मास का अरसा लगा । जब चित्र उसकी इच्छा नुकूल तय्यार हो गया तो उसे लेकर रईस

अकबर बीरबल विनोद १०१

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अकबर बीरबल विनोद १०१

के पास गया। वह चित्र को लेकर अपने चेहरे से भलीभाँति मिलान किया। उसमें एक स्थानपर ऐब रह गया था। साहूकार ने चित्रकार को उसे दिखलाया। वह विवश होकर दूसरा चित्र बना लाने का बचन देकर खाली हाथ लौट गया और फिर से चित्र बनाना प्रारम्भ किया। इस बार पहले से भी अधिक तत्परता से चित्र तय्यार किया। उसका विश्वास था कि इस मर्तवा साहूकार को चित्र पसंद आजायगा। दूसरे दिन फिर चित्र को लेकर शाहूकार के पास पहुँचा और पुरस्कार का दावो हुआ। भलेमानस ने चित्रका फिर से मिलान किया, फिर भी उसके गोड़ में ऐब रह गया था। इसी प्रकार सेठ और कई बार चित्रकार कोमूर्ख बनाकर लौटा चुका था। मनुष्य अपनी काम- याबी के लिये बार २ परिश्रम करता है, जब करते २ थक जाता है तो उसकी हिम्मत छूट जाती है और फिर उसके किये वह काम नहीं होता। इसी प्रकार वह चित्रकार भी अपनी नाकामयाबी से हताश हो गया और अपनी अपकीर्ति जन समुदाय में बढ़ने के भय से गंगा में डूब मरने का संकल्प किया। जिस समय गंगा तट पर पहुँचकर वह आत्मविसर्जन का उपाय सोच रहा था उसी समय हरेच्छा से बीरबल नामी एक ब्राह्मण का दीन लड़का भी वहाँ उपस्थित था। लड़का चित्रकार के मनोगत भावों को ताड़ गया और उसे ढाढ़स देने के विचारसे पूछा—"महाशय जी ! आप इतना चिन्ताग्रस्त क्यों दिखाई पड़ते हैं, जान पड़ता है चिन्ता रूपी साँपिन ने आपको डस लिया है ? कृपाकर मुझसे अपने दुख का कारण

१०२ \hfill अकबर बीरबल विनोद

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१०२ \hfill अकबर बीरबल विनोद

साफ २ बतलाइये, मैं यथासक्य उसके निवारण का प्रयत्न करूंगा। बालक के ऐसे विनम्र वचनों से चित्रकार की जीवन आशा पुनः जागृत हुई और अपना दुःखद समाचार कहकर सुनाया। लड़का बोला- "आप इस थोड़ी सी बात के लिये इतना अधीर क्यों हो रहे हैं ? धैर्य्य धारण कीजिये, मैं उसका तद्रूप चित्र बना दूँगा और फिर उसे ऐब दिखलाने का अवसर न मिलेगा, केवल थोड़ा और परिश्रम कर मुझसे उसका साक्षात्कार करा दें। चित्रकार लड़के को साथ लेकर उस रईस के पास गया, बीरबल उस रईसको फाँसने के लिये रास्ते में ही एक तरकीब सोच चुका था वह बाजार से एक शीशा खरीदकर अपने साथ लेता गया, चित्रकार को देखकर उक्त रईस ने पूछा- "क्या दूसरा चित्र तय्यार होगया ?" बीरबलने उत्तर दिया- "हाँ तैयार करके लाया है।" चित्रकार आगे बढ़कर रईस को अपना दर्पण दिखलाया। दर्पण में रईस को अपना स्वरूप ठीक ठीक दीख पड़ा, फिर उसे आना कानी करने की कोई दूसरी तरकीब नहीं सूझी; लाचार होकर कौल के अनुसार पन्द्रह हजार रुपये देने पड़े। चित्रकार बीरबल की ऐसी युक्ति से बड़ा सन्तुष्ट हुआ। वह रुपया लेकर घर लौट गया, परन्तु बीरबल रईस का चरण पकड़ कर बोला- "भगवन् ! मैं आपको अब नहीं छोड़ूँगा क्योंकि आप मुझे मनुष्य के रूप में देवता जान पड़ते हैं।" बीरबल की हठधर्मी से विवश होकर देवता ने प्रत्यक्ष होकर दर्शन दिया और उसको बुद्धि बढ़ने का आशीर्वाद दिया। फिर बीरबल को सन्तुष्ट कर देवता अन्तर्ध्यान हो गये। चित्र में

अकबर बीरबल विनोद १०३

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अकबर बीरबल विनोद १०३ बारंबार दोष निकालते देखकर बीरबल ने देवता को पहचान लिया था। उसी समय से लोगों की आँखें खुल गईं और ऐसी जनश्रुति चल पड़ी-“खुदा को अक्ल से पहचान करो।” शीशे में छाया चित्र दिल्ली शहर में एक सनातनी धनवान रहा करता था, उसके कुकृत्यों से अक्सर लोगों को बड़ी तकलीफ होती थी, परन्तु वह धनाढ्य किसी की एक न सुनता। वह हमेशा गुप्त रूप से मनमानी किया करता था, परन्तु ऊपर से बाद- शाह के भयसे भलामानस बना रहता। एक दिन उसे एक नई शरारत सूझी। एक चित्रकार को बुलवाकर उसे अपना चित्र बनाने की आज्ञा दी। उस से पहले ही ऐसी शर्त तय करा ली कि अगर चित्र बनाने में बाल भर भी अन्तर पड़ेगा तो पुरस्कार नहीं दिया जाय। दोनों की आपस में लिखा पढ़ी हो गई। वह घर जाकर बड़ी सावधानी से चित्र बनाने लगा। चित्र बनकर तयार होगया तो उसे लेकर धनवानके पास पहुँचा। जब उसके आने का समाचार नौकरोंने दिया तो वह अपनी सूरत बदल कर उसके सामने आया। उसे देख बिचारा चितेरा दंग हो गया उसके मुख से कोई स्पष्ट उत्तर नहीं निकलत था, लाचार दूसरा चित्र फिर से बना लाने की प्रतिज्ञा कर घर लौट गया। नये स्वरूप का जब दूसरा चित्र बनाकर ले गया तो फिर

१०४. अकबर बीरबल विनोद

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१०४. अकबर बीरबल विनोद उस रईस ने अपना आकार बदल कर उसमें अन्तर दिखलाया। इसी प्रकार चित्रकार ने क्रमशः पाँच चित्र बनाकर तय्यार किया, परन्तु उसकी धूर्तता के कारण कोई चित्र भी उसके चेहरे से न मिल सका । अन्तमें चित्रकार को उसकी ठगी पर सन्देह हो गया और वह उससे अपना पुरस्कार मांगा । रईस उसे फटकारता हुआ बोला-"तू इतना भी समझदारी नहीं रखता, जब मेरे अनुकूल चित्र ही नहीं बना सकता तो फिर पुरस्कार किस बात का लेगा। नाहक इसी विरते पर अपने को चित्रकार बतलाकर लोगों को ठगता है । सीधे यहाँ से चला जा नहीं तो मैं तेरी धूर्तता का भलीभाँति बदला चुका- ऊँगा । गरजे इसी प्रकार दोनों के दर्मियान देर तक तू तू मैं मैं हुई, फल कुछ न निकला । लाचार होकर बिचारा चित्रकार बीरबल की शरण में गया । अपना सारा समाचार कहकर बीरबल को पाँचों चित्रों को दिखलाया । सब बातों को देख सुनकर बीरबल ताड़ गया कि उस रईस ने इस बिचारे को ठगा है । उसको स्वरूप बदलने की विद्या हासिल है, जिस कारण इसे सहल में ही ठग लेता है।" वह बोला-"यदि तुम मेरे कहे अनुसार चलोगे तो तुम्हें अवश्य लाभ होगा । चित्रकार सहमत हो गया। बीरबल ने कहा- "बाजार से एक अच्छा शीशा खरीद लावो फिर दो तीन दिनों के पश्चात उसे लेकर उस रईस के पास जाना । साक्षी के लिये गुप्त रूप से मेरे दो कर्मचारी तुम्हारे साथ रहेंगे । उससे जाकर कहना कि इस बार मैं आपका उत्कृष्ट चित्र खींच लाया हूँ, जब देखने को माँगे

अकबर बीरबल विनोद १०५

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अकबर बीरबल विनोद १०५

तो वही शीशा उसके सामने रख देना, शीशा में वह अपना स्वरूप बदल न सकेगा और इस भाँति आसानी से तुम्हारे काबू में आजायगा। कारण कि दर्पण में उसका तात्कालिक स्वरूप भाषित होगा।" कई दिनों का अन्तर देकर चित्रकार बाजारसे एक हलब्बा शीशा खरीद लाया फिर गुप्तचरों के साथ रईस केघर गया और उससे मिलकर बोला- "महाशयजी ! इस बार मैं बहुत होशि- यारी से आपका चित्र बना लाया हूँ, आशा है कि मेरे इस कठिन परिश्रम से आप खुश होंगे।" ऐसी चोखाई की बातें दर्पण रईस के सामने रख दिया।" धनाड्य बोला-"वाह क्या खूब ! यह मुझे आइना क्यों दिखला रहा है, वह चित्र दिखला जिसकी तू ने अभी इतनी प्रशंसा की है।" चित्रकार ने उत्तर दिया- "महाशय जी ! यही आपका तद्रू प चित्र है।" तब तो रईस के कान खड़े हो गये और वह अपनी ठगी छिपाने के लिये उससे बोला- "तुझे मैंने अपना चित्र बनाने को भला कब कहा था?" चित्रकार ने कहा- "आप बात क्यों पलटते हैं; आपके आर्डर से मैंने बारी बारी पाँच चित्र बना कर दिखलाया; परन्तु हर बार आपने नापसन्द कर मुझे कोरा लौटा दिया। अब इस बार इतनी कतरव्योत कर बना लाया तो नकारने पर कटिवद्ध हुए हो। यह नहीं होने का; मेरे आपके बीच जो शर्ते पहले निश्चित हो चुकीं हैं उसे पूरी कीजिये।" रईस ने देखा कि यह तो अच्छी बला लेकर आया है, इसे मूर्ख बनाकर ठगना चाहिये। वह एकदम नकर गया।

१०६ अकबर बीरबल विनोद

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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सटीक पाठ्य-रूप (transcription) दिया गया है:

१०६ अकबर बीरबल विनोद तब बीरबल के गुप्तचर बोले-“आपको बादशाह के पास चलना पड़ेगा। आपने इससे छः बार चित्र बनवाया और रुपया एक भी नहीं दिया 'अब तुम्हारी ठगी नहीं चलने की।” रईस आँख दिखलाता हुआ उत्तर दिया-“वाह, अच्छे आये? तुम मुझे दरबार में ले जाने वाले कौन होते हो ? तब गुप्तचरों ने अपना असली लिवास खोलकर दिखलाया। रईस का होश ठिकाने आ गया और विवश होकर चित्रकार को रुपये देने पर उतारू हुआ। मामला बढ़ चुका था इसलिये सिपाहियों ने उसे ऐसा न करने दिया और पकड़ कर बीरबल के पास ले गये। बीरबल तो उसके ठगी का हाल पहले ही सुन चुका था, जब वह आया तो उससे बहुतेरा प्रश्न उसी सम्बन्ध का किया; परन्तु वह उन प्रश्नों का एक भी उचित उत्तर न दे सका। बीरबल ने उसे दस मिनट में सोचकर उत्तर देने की आज्ञा दी। फिर भी कुछ न बोला, बोलता कहाँ से कहीं बालू पर भीत उठाई जा सकती है? बीरबल ने सिपाहियों को कोड़े लगाने की आज्ञा दी, वे पास ही में उपस्थित थे। हुक्म पाते ही कोड़ा लेकर आगे आये। कोड़ा देखते ही रईस का होश ठिकाने आ गया और उसने तुरंत अपना दोष स्वीकार कर लिया। बीरबल उसे कठिन दण्ड देकर जेल भेज दिया। —:*:— नया दीवान यह तो किसी से छिपा नहीं है कि बीरबल अकबर का मुँहलगा दीवान था। वह उसको हर प्रकार से मात किये

अकबर बीरबल विनोद १०७.

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अकबर बीरबल विनोद १०७. रहता था। एक दिन बादशाह गुस्से में था। बीरबल उसके मनोगत भावों को ताड़ न सका और बातों २ में उसकी हँसी उड़ाने लगा। बादशाह को उसकी हँसी से मार्मिक वेदना हो रही थी। वह बोला-“बीरबल तुम्हारा मिजाज बहुत बढ़ गया है इसलिये बराबर बेअदबी किया करते हो, अब तुम्हें ऐसा मौका नहीं दिया जायगा। भविष्यमें यदि फिर कोई ऐसा कामकरोगे तो स्मरण रहे कठिन दण्ड के भागी होगे।” बीरबल ने अपनी बात रखने के लिये फिर कोई हँसी की बात निकाली; परन्तु बादशाह ने उसे बीच में ही क्रुद्ध होकर दबा दिया। अब बीरबल को बादशाह का क्रुद्ध होना प्रगट हो गया और वह चुप्पी साध गया । बादशाह बीरबल की बेअदबी से चिढ़ गया था जिसकारण आँखें लाल २ कर बोला-“अब तुम फिर मेरे दरबार में कभी न आना; अभी दरबार से बाहर निकल जाओ।” बीरबल उत्तर देना उचित न समझकर चुपके से वहाँ से ‘सटक सीताराम’ हो गया। यह सोचकर मनमें ढाढ़स किया कि यह तो बादशाहों की गति ही है, जब काल आयेगा तो झख मारेंगे और बुलावेंगे। ऐसी २ बहुतेरी कल्पनाएँ करता हुआ घर पहुँचा और अपने घर वालों को सावधान कर महीनों गुम रहा। न उसकी बुलाहट हुई न फिर गया ही। इधर बादशाह ने एक दूसरा नया दीवान नियुक्त कर लिया। जब बीरबल को बादशाह का रुख बदलते न दिखलाई पड़ा तो वह चुपचाप वायु परिवर्तन करने के लिये नगर से बाहर किसी दूसरे शहर को चला गया। उसका जाना किसी को

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१०८ अकबर बीरबल विनोद मालूम नहीं था । अपना समूचा परिवार दिल्ली में ही छोड़ गया । येनकेन प्रकारेण कई महीना बीत गया, पर न बीरबल को दरबार का समाचार मिला और न बादशाह को बीरबल का ही । नया दीवान बीरबल के टक्कर का नहीं था, इसलिये बाद- शाह का दिल उसपर भलीभाँति जमता न था। वह गुप्तरूप से एक दूसरे दीवान की खोज में था। कितनों की गुप्त छिपे रूप से परीक्षाएँ ली, परन्तु कोई उत्तीर्ण नहीं हुआ। तब लाचार होकर उसे विज्ञापनबाजी करने की धुन सवार हुई, उसने शहर शहर और दिहात २ में यह घोषणा करवा दी कि जो कोई मेरे प्रश्नों का उचित उत्तर देगा वह नया दीवान बनाया जायगा, उत्तर न दे सकने पर उसपर कुछ विचार न किया जायगा । दरबारी लोग दीवान पद के लिये लालायित हो रहे थे; परन्तु परीक्षोत्तीर्ण होना कठिन समझ, उपहास के भय से खामोश रह गये । बादशाह ने अपनी घोषणा में एक मास की निश्चित तिथि निर्धारित की थी । समय अबकरीब आपहुँचा और सभा का आयोजन किया गया। यह सभा दीवान के चुनाव की थी अतएव इसमें आम जनता को जाने का हुक्म नहीं था, केवल दरबार के लोग और कुछ वे लोग सम्मिलित किये गये जो दीवान पद के प्रलोभन से उम्मीदवार बन आये थे । उन उम्मीदवारों में एक आदमी ऐसा आया था जो देखने में बड़ा प्रतिभाशाली जान पड़ता था, उसकी दोनों आँखें बड़ी बड़ी और चमकीली थीं, सिर पर सफेद पगड़ी

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अकबल बीरबल विनोद १०९ बाँधे हुए था, दाढ़ी छाती तक लटक रही थी। उसके कुछ केस काले ओर कुछ सफेद थे। जिससे देखने में अधेड़ जान पड़ता था। बादशाह की आज्ञा से एक परोक्षक बोला-“आज की सभा में जो मनुष्य उत्तीर्ण होगा वह दोवान पद पर नियुक्त किया जायगा। यदि उत्तर देने में भूल होगी तो दुबारा उसकी सुनवाई न होगी। पहला प्रश्न यों है (१) इस भौगोलिक सागर में मोती की सीपियों की गणना क्या है?” मैं ऊपर लिख चुका हूँ कि दीवान पद प्राप्त करने के लिये पाँच उम्मीदवार आये थे सो उनमें चार तो इस प्रश्न को सुनते ही विचार सागर में निमग्न हो गये, परन्तु पाँचवाँ व्यक्ति जो कि साफा बाँधकर आया हुआ था और जिसकी दाढ़ी छातीतक लटक रही थी, उत्तर देने के लिये बड़ा उत्सुक जान पड़ा। बारी बारी सब से उत्तर माँगा गया। किसीने कहा-लाख, किसीने करोड़ और किसीने अरब तक की संख्या बतलाई, परन्तु साफे वाला मनुष्य सबके अन्त में बोला- “सम्पूर्ण मनुष्यों की आँखों की जितनी गणना है उतनी ही सीपियों की भी है।” उसका उत्तर सुनकर चारो तरफ से वाह वाह की ध्वनि आने लगी। बादशाह भी मन में प्रसन्न हुआ। नियमानुसार चारो उम्मीदवार नाकामयाब हो गये एक साफे वाला ही बच रहा। प्रश्नकर्त्ता ने दूसरा प्रश्न किया- “इस शरीर का पहला सुख क्या है?” तब साफे वाले ने कहा-“हेल्थ इज दी रूट आफ हैप्पीनेस” शरीर के लिये स्वस्थ