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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

सूक्त-७१ देवता—इंद्र

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वयं शूरैभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम्. सासह्वाम पृतन्यतः.. (२०) हे इंद्र! हमारे वीरों की कोई हिंसा न कर सके. हम अपने वीरों को साथ ले कर उन शत्रुओं को भी वश में कर लें जो सेना साथ ले कर हम पर आक्रमण करते हैं. (२०) सूक्त-७१ देवता—इंद्र महाँ इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे. द्यौर्न प्रथिना शवः.. (१) श्रेष्ठ और महान इंद्र महिमा वाले हैं. उन का पराक्रम आकाश के समान विशाल हो. (१) समोहे वा य आशत नरस्तोकस्य सनितौ. विप्रासो वा धियायवः.. (२) जो मनुष्य युद्ध की कामना करते हैं, वे अपने पुत्रों के साथ भी युद्ध करने लगते हैं. (२) यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्र इव पिन्वते. उर्वीरापो न काकुदः.. (३) सोमरस पीने वाले इंद्र की कोख ककुद अर्थात् ठाट वाले बैल तथा अधिक जल को धारण करने वाले सागर के समान बढ़ जाती है. (३) एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (४) इंद्र को गौ प्रदान करने वाली धरती हवि देने वाले यजमान के लिए उस वृक्ष की शाखा के समान हो जाती है, जिस पर पके हुए फल लगे होते हैं. (४) एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (५) हे इंद्र! जो यजमान तुम्हें हवि देता है, उस के निमित्त तुम्हारे रक्षा साधन सदा प्रस्तुत रहते हैं. (५) एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (६) इंद्र जब सोमरस पीते हैं, उस समय स्तोम, उक्थ और शस्त्र नाम वाले मंत्र उन के लिए प्रसन्न करने वाले होते हैं. (६) इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः. महां अभिष्टिरोजसा.. (७) हे इंद्र! यहां अर्थात् हमारे यज्ञ में आओ. सोमयागों में सोमरस पीने के कारण उत्पन्न तुम्हारा हर्षपूर्ण ओज हमारे लिए अभीष्ट और महान है. (७) एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने. चक्रिं विश्वानि चक्रये.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे अध्वर्युजनो! तुम उक्थ मंत्र बोलते हुए सोमरस को चमसों के द्वारा मिलाओ. यह सोम निचुड़ जाने पर इंद्र को प्रसन्न करता है. (८) मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभि स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे. सचैषु सवनेष्वा.. (९) हे सुंदर ठुड्डी वाले इंद्र! तुम सोमयागों में हर्षवर्धक सोमरस को पी कर हर्ष प्राप्त करो. (९) असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत. अजोषा वृषभं पतिम्.. (१०) जिस प्रकार कामना करने वाली स्त्रियां उस पति के पास जाती हैं जो उन में गर्भाधान कर सकता है, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां तुम्हें प्राप्त होती हैं. (१०) सं चोदय चित्रमर्वाग् राध इन्द्र वरेण्यम्. असदित् ते विभु प्रभु.. (११) हे इंद्र! हमारी ओर उस धन को आने की प्रेरणा दो जो वरण करने योग्य, सुंदर और सत्य को धारण करने वाला हो. (११) अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः तुविद्युम्न यशस्वतः.. (१२) हे इंद्र! तुम हमें महान, यशस्वी और ऐश्वर्य वाला होने की प्रेरणा दो. (१२) सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत्. विश्वायुर्धेह्यक्षितम्.. (१३) हे इंद्र! हमें वह यज्ञ प्रदान करो जो गायों से युक्त, हवियों से संपन्न तथा पूर्ण आयु को देने वाला हो. (१३) अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युम्नं सहस्रसातमम्. इन्द्र ता रथिनीरिषः.. (१४) हे इंद्र! सहस्रों मनुष्यों द्वारा सेवन करने वाले धन तथा रथ वाली सेनाओं को हमें प्रदान करो. (१४) वसोरिन्द्रं वसुपतिं गीर्भिर्गृणन्त ऋग्मियम्. होम गन्तारमूतये.. (१५) हम धन के स्वामी, वसुओं के ईश्वर, ऋग्वेद के द्वारा प्रशंसित इंद्र की साधनों से पूजा करते हैं. (१५) सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरिः. इन्द्राय शूषमर्चति.. (१६) महान इंद्र के लिए सोमयाग में हर बार सोमरस निचोड़े जाने पर शत्रु भी इंद्र के बल की प्रशंसा करते हैं. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-७२ देवता—इंद्र

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सूक्त-७२ देवता—इंद्र विश्वेषु हि त्वा सवनेषु तुञ्जते समानमेकं वृषमण्यवः पृथक् स्वः सनिष्यवः पृथक्. तं त्वा नावं न पर्षणिं शूषस्य धुरि धीमहि. इन्द्रं न यज्ञैश्चितयन्त आयव स्तोमेभिरिन्द्रमायवः.. (१) हे इंद्र! फलों की वर्षा की याचना करने वाले, भांतिभांति के स्वर्गों की कामना करने वाले तथा प्रातः, मध्याह्न और सायं सवनों में तुम्हारी ही प्रार्थना करते हैं. जिस प्रकार नौका अन्न के पूलों से भरी होती है, उसी प्रकार हम बल धारण के लिए नियुक्त करते हैं. हम इंद्र को प्रसन्न करने की इच्छा से अपने स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं. (१) वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्वो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त इन्द्र निःसृजः. यद् गव्यन्ता द्वा जना स्व १ र्यन्ता समूहसि. आविष्करिक्रद् वृषणं सचाभुवं वज्रमिन्द्र सचाभुवम्.. (२) हे इंद्र! अन्न की कामना करने वाले दंपती गोदान के अवसर पर तुम्हारा ध्यान करते हैं तथा तुम से फल देने की प्रार्थना करते हैं. तुम स्वर्ग में जाने वाले व्यक्तियों को जानते हो. तुम्हारा वर्षा करने में सहायक वज्र तुम्हारे हाथ में प्रकट होता है. (२) उतो नो अस्या उषसो जुषेत ह्य १ र्कस्य बोधि हविषो हवीमभिः स्वर्षाता हवीमभिः. यदिन्द्र हन्तवे मृधो वृषा वज्रिचिकेतसि. आ मे अस्य वेधसो नवीयसो मन्म श्रुधि नवीयसः.. (३) हम स्वर्ग प्राप्ति की कामना से सूर्य को प्रकट करने वाली उषा को हवि प्रदान करते हैं. हे वर्षणशील इंद्र! तुम युद्ध के इच्छुक शत्रुओं का संहार करने के लिए अपना वज्र हाथ में लेते हो. मैं ने जिन नवीन स्तोत्रों की रचना की है, तुम उन्हें सुनो. (३) सूक्त-७३ देवता—इंद्र तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि. त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधा ऽ सि.. (१) हे वीर इंद्र! यज्ञ के सभी सवन तुम्हारे निमित्त हों. तुम्हारे निमित्त ही मैं उन मंत्रों का पाठ करता हूं. तुम सब के पोषक एवं आह्वान के योग्य हो. (१) नू चिन्नु तोन्यमानस्य दस्मोदश्रुवन्ति महिमानमुग्र. ebook converter DEMO Watermarks*

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न वीर्यमिन्द्र ते न राध:.. (२) हे इंद्र! तुम उग्र हो. तुम्हारा सुंदर रूप, शक्ति, धन और महिमा को दूसरा कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता. (२) प्र वो महे महिवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम्. विशः पूर्वीः प्र चरा चर्षणिप्राः.. (३) हे यजन करने वालो! तुम अपनी हवियों के द्वारा इंद्र को प्रसन्न करो. इंद्र मनुष्यों को मन चाहे फल प्रदान करते हैं. हे इंद्र! तुम मेरे हवि रूप अन्न का सेवन करो. (३) यदा वज्रं हिरण्यमिदथा रथं हरी यमस्य वहतो वि सूरिभिः. आ तिष्ठति मघवा सनश्रुत इन्द्रो वाजस्य दीर्घश्रवसस्पतिः.. (४) इंद्र के हरे रंग के घोड़े इंद्र के स्वर्णिम वज्र को एवं रथ बंधी रस्सियों के सहारे रथ को खींचते हैं. उस अवसर पर अत्यधिक तेज वाले इंद्र उस रथ पर बैठते हैं. (४) सो चिन्नु वृष्टिर्यूथ्या ३ स्वा सचां इन्द्रः श्मश्रूणि हरिताभि प्रष्णुते. अव वेति सुक्ष्यं सुते मधूदिद्धूनोति वातो यथा वनम्.. (५) सोमरस के निचोड़े जाने पर इंद्र हमारे यज्ञ मंडप में आते हैं. वायु जिस प्रकार वन को कंपित करता है, इंद्र उसी प्रकार मेघ को कंपित कर देते हैं. (५) यो वाचा विवाचो मृध्रवाचः पुरू सहस्राशिवा जघान. तत्तदिदस्य पौंस्यं गृणीमसि पितेव यस्तविषीं वावृधे शवः.. (६) इंद्र दुष्कर्म करने वालों का वध करते हैं एवं विकृत वाणी वालों की वाणी को मधुरता प्रदान करते हैं. पिता जिस प्रकार बल की वृद्धि करता है, इंद्र उसी प्रकार अपने भक्तों का बल बढ़ाते हैं. ऐसे पराक्रमी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (६) सूक्त-७४ देवता—इंद्र यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (१) हे सोमरस का पान करने वाले इंद्र! हमारे हजारों की संख्या वाले घोड़े, गायों और शुभ्रियों के अमृत होने की बात कहो; क्योंकि तुम अमृतत्व को प्राप्त कर चुके हो. (१) शिप्रिन् वाजानां पते शचीवस्तव दंसना. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे धन के स्वामी इंद्र! तुम शत्रुओं को दंड देने में समर्थ हो. तुम अपनी उसी सामर्थ्य को हमारे सहस्रों अश्वों, गायों और शुभ्रियों को प्रदान करो. (२) नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तमबुध्यमाने. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (३) हे इंद्र! मुझे मेरे दोनों नेत्रों के द्वारा निद्रा प्रदान करो. हमारी हजारों गायों आदि को भी निद्रा प्रदान करो. (३) ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (४) हे अधिक धन के स्वामी इंद्र! तुम हमारी हजारों गायों, घोड़ों आदि को धन से भरो. हम जागृत रहें और हमारे शत्रु निद्रा के वश में हो जाएं. (४) समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापया ऽ मुया. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (५) हे इंद्र! तुम पाप वृत्ति वाले राक्षसों का वध कर दो. तुम हमारी गायों आदि को दूसरों का नाश करने की शक्ति प्रदान करो. (५) पताति कुण्डृणाच्या दूरं वातो वनादधि. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (६) वायु बवंडर के द्वारा जंगल से दूर प्रस्थान करती हैं. हे इंद्र! हमारे गौ आदि पशुओं के श्रेष्ठ होने की बात कहो. (६) सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (७) हे इंद्र! कृकदाश्व को नष्ट करो तथा परिकोश को हटाओ. हमारे अश्व, गौ आदि प्राणियों से तुम परिकोश को दूर करो. (७) सूक्त-७५ देवता—इंद्र वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्यवो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त इन्द्र निःसृज. यद् गव्यन्ता द्वा जना स्व १ र्यन्ता समूहसि. आविष्करिक्रद् वृषणं सचाभुवं वज्रमिन्द्र सचाभुवम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे इंद्र! गोदान के अवसर पर अन्न की कामना करने वाले पतिपत्नी तुम्हारा ध्यान करते हुए तुम्हें फल देने के लिए आकर्षित करते हैं. तुम स्वर्ग को गमन करने वाले दोनों पति और पत्नी को जानते हो. उस समय तुम अपने वर्षणशील और सहायक वज्र को प्रकट करते हो. (१) विदुष्टे अस्य वीर्यस्य पूरवः पुरो यदिन्द्र शारदीरवातिरः सासहानो अवातिरः. शासस्तमिन्द्र मर्त्यमयज्युं शवसस्पते. महीममुष्णाः पृथिवीमिमा अपो मन्दसान इमा अपः.. (२) इंद्र शरद ऋतु की वस्तुओं में प्रकट हो कर शत्रुओं को बारबार व्यथित करते हैं. इंद्र के बल को मनुष्य जानते हैं. हे इंद्र! जो मृत्युलोक वासी तुम्हारा पूजन नहीं करते, उन पर तुम शासन करो तथा इन जलों और पृथ्वी की वृद्धि करो. (२) आदित् ते अस्य वीर्यस्य चकिरनन्मदेषु वृषन्नुशिजो यदाविथ सखीयतो यदाविथ. चकर्थ कारमेभ्यः पृतनासु प्रवन्तवे. ते अन्यामन्यां नद्यं सनिषणत श्रवस्यन्तः सनिषणत... (३) हे धन समर्थ जलो! हम तुम्हारे वीर्य का वर्णन करते हैं. इंद्र के उन्मत्त होने पर तुम ही उन की रक्षा करते हो. तुम सेनाओं में सेवा योग्य कर्म के करने वाले हो. तुम नदियों के आश्रय में रहो तथा अन्न प्रदान करते हुए सब के स्नान के साधन बनो. (३) सूक्त-७६ देवता—इंद्र वने न वा यो न्यधायि चाकंछुचिर्वां स्तोमो भुरणावजीगः. यस्येदिन्द्रः पुरुदिनेषु होता नृणां नर्यो नृतमः क्षपावान्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम देवताओं का भरणपोषण करने वाले हो. यह निर्दोष तथा इंद्र की कामना करने वाला स्तोत्र हैं. इंद्र इस की कामना बहुत दिनों से करते हैं. वे इंद्र मनुष्यों के श्रेष्ठ सोमरस को प्राप्त करने वाले हैं. यह स्तोत्र अर्थात् मंत्र समूह उन्हीं की ओर अग्रसर होता है. (१) प्र ते अस्या उषसः प्रापरस्या नृतौ स्याम नृतमस्य नृणाम्. अनु त्रिशोकः शतमवह्नन्नृन् कुत्सेन रथो यो असत् ससवान्.. (२) हम वीरों में श्रेष्ठ इंद्र के विश्वास पात्र सेवक रहें तथा दूसरी उषा को भी पार करें. त्रिलोक ऋषि ने हमें सैकड़ों उषाएं प्राप्त कराईं. कुत्स ऋषि ने संसार रूपी रथ को अन्न से युक्त किया. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

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कस्ते मद इन्द्र रन्त्यो भूद् दुरो गिरो अभ्यु१ग्रो वि धाव. कद् वाहो अवांगुप मा मनीषा आ त्वा शक्यामुपमं राधो अन्नैः.. (३) हे इंद्र! हमें वह स्तोम अर्थात् मंत्र समूह कौन देगा जो तुम्हें प्रसन्न कर सके? कौन सा अश्व तुम्हें मेरे पास लाएगा? तुम मेरा स्तोम सुनने के लिए आओ. तुम उपमेय हो, मैं तुम्हें हवियों द्वारा प्रसन्न करने में सफलता प्राप्त करूंगा. (३) कदु द्युम्नमिन्द्र त्वावतो नॄन् कया धिया करसे कन्न आगन्. मित्रो न सत्य उरुगाय भृत्या अन्ने समस्य यदसन्मनीषाः.. (४) हे इंद्र! तुम किस बुद्धि से अपने आश्रितों को यशस्वी बनाते हो? तुम महान कीर्ति वाले हो, इसलिए सच्चे साथ के समय इस यज्ञ को अन्न की वृद्धि से संपन्न करो. (४) प्रेर्य सूरो अर्थं न पारं ये अस्य कामं जनिधा इव ग्मन्. गिरश्च ये ते तुविजात पूर्वीर्नर इन्द्र प्रतिशिक्षन्त्यन्नैः.. (५) हे इंद्र! जो रश्मियां इस यजमान की इच्छा पूर्ति के लिए माता के समान मिलती हैं, उन रश्मियों में हमें अर्थ के समान पार करो. पवन देव इसे अन्न प्रदान करें. हे इंद्र! तुम अपनी प्राचीन स्तुतियां इस की बुद्धि में लाओ. (५) मात्रे नु ते सुमिते इन्द्र पूर्वी द्यौर्मज्मना पृथिवी काव्येन. वराय ते घृतवन्तः सुतासः स्वाद्मन् भवन्तु पीतये मधूनि.. (६) हे इंद्र! घृत मिला हुआ सोमरस तुम्हारे लिए उत्तम स्वाद वाला प्रतीत हो. पृथ्वी और आकाश अपने में समर्थ एवं उत्तम काव्य रचना के लिए उत्तम बुद्धि वाला हो. (६) आ मध्वो अस्मा असिचन्नमत्रमिन्द्राय पूर्णं स हि सत्यराधाः. स वावृधे वरिमन्ना पृथिव्या अभि क्रत्वा नर्यः पौंस्यैश्च.. (७) इंद्र के लिए यह पात्र मधुर रस से पूर्ण किया गया है. वे इंद्र अपने बल से ही पृथ्वी पर प्रबुद्ध होते हैं तथा सत्य के द्वारा उन्हीं की पूजा होती है. (७) व्यानळिन्द्रः पृतनाः स्वोजा आस्मै यतन्ते सख्याय पूर्वीः. आ स्मा रथं न पृतनासु तिष्ठ यं भद्रया समुत्या चोदयासे.. (८) इंद्र का बल श्रेष्ठ है. इंद्र सेनाओं में व्याप्त होते हैं. अनगिनत वीर इन के मैत्रीभाव की कामना करते हैं. हे इंद्र! तुम जिस सुमति के द्वारा प्रेरणा देते हो, रथ के समान उसी सुमति से तुम हमारे वीरों में व्याप्त होओ. (८) सूक्त-७७ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

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आ सत्यो यातु मघवां ऋजीषी द्रवन्त्वस्य हरय उप नः. तस्मा इदन्धः सुषुमा सुदक्षमभिपित्वं करते गृणानः.. (१) इंद्र के घोड़े हमारी ओर आएं. धन के स्वामी, सत्य के प्रति निष्ठा रखने वाले एवं सोमपायी इंद्र यहां आगमन करें. स्तुति करने वाला विद्वान् इसी कारण स्नान आदि कर्म कर रहा है तथा हम सोम का संस्कार कर रहे हैं. (१) अव स्य शूराध्वनो नान्ते ऽ स्मिन् नो अद्य सवने मन्दध्यै. शंसात्युक्थमुशनेव वेधाश्चिकितुषे असुर्यार्य मन्म.. (२) हे वीर इंद्र! हमारे इस यज्ञ को प्राप्त करो तथा अपना मार्ग हमारे समीप बनाओ. ये विद्वान् उशना अर्थात् शुक्राचार्य के समान इंद्र के हेतु उक्थ अर्थात् मंत्रों के समूह का उच्चारण करते हैं. (२) कविर्न निण्यं विदथानि साधन् वृषा यत् सेकं विपिपानो अर्चात्. दिव इत्था जीजनत् सप्त कारूनह्ना चिच्चक्रुर्वयुना गृणन्तः.. (३) इंद्र फलों के वर्षक अर्थात् सब को यज्ञ का फल देने वाले हैं. ये वर्षा के जल के द्वारा पृथ्वी को शस्यों अर्थात् फसलों से संपन्न बनाते हुए आगमन करें. ऋत्विज् यज्ञ कार्य कर रहा है. सात स्तोता शोभन स्तोत्रों द्वारा इंद्र की स्तुति कर रहे हैं. (३) स्व १ र्यद् वेदि सुदृशीकमकैर्महि ज्योति रुरुचुर्यद्ध वस्तोः. अन्धा तमांसि दुधिता विचक्षे नृभ्यश्चकार नृतमो अभिष्टौ.. (४) इन मंत्रों के द्वारा दर्शनीय स्वर्ग का ज्ञान होता है. ये मंत्र सूर्य को प्रकाशित करते हैं तथा इन मंत्रों के द्वारा सूर्य रूपी इंद्र दूर से भी अंधकार को हटा देते हैं. अतिशय शक्तिशाली इंद्र कामनाओं की वर्षा करते हैं. (४) ववक्ष इन्द्रो अमितमृजीष्यु १ भे आ पप्रौ रोदसी महित्वा. अतश्चिदस्य महिमा वि रेच्यभि यो विश्वा भुवना बभूव.. (५) सोमरस पीने वाले इंद्र असीमित धन हमारी ओर भेजते हैं. इंद्र सभी लोकों में व्याप्त होने के कारण महिमा वाले हैं. उन्हीं इंद्र की महिमा पृथ्वी और आकाश को पूर्ण करती है. (५) विश्वानि शुक्नो नर्याणि विद्वानपो रिरेच सखिभिर्निकामैः. अश्यानं चिद् ये बिभिदुर्वरोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः.. (६) स्वेच्छा से चलने वाले मेघों के द्वारा इंद्र देव ने हितकारी जलों की वृद्धि की है. ये जल अपने शब्द से पाषाणों को भी तोड़ देते हैं तथा इच्छा होने पर गोचर भूमि पर छा जाते हैं. ebook converter DEMO Watermarks*

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(६) अपो वृत्रं वव्रिवांसं पराहन् प्रावत् ते वज्रं पृथिवी सचेताः. प्राणसि समुद्रियाण्यैनोः पतिर्भवञ्छवसा शूर धृष्णो.. (७) हे इंद्र! यह पृथ्वी सावधानी से तुम्हारे वज्र की रक्षा करती है. यही समुद्र की भी रक्षिका है. रोकने वाले वृत्र को जलों ने छिन्नभिन्न कर दिया है. हे इंद्र! तुम अपने बल के द्वारा ही पृथ्वी के स्वामी हो. (७) अपो यदद्रिं पुरुहूत दर्दराविर्भुवत् सरमा पूर्व्यं ते. स नो नेता वाजमा दर्षि भूरिं गोत्रा रुजन्नङ्गिरोभिर्गृणानः.. (८) हे इंद्र! तुम अनेक यजमानों के द्वारा बुलाए जा चुके हो. तुम जिस जल को हमें प्रदान करते हो, वह जल तुरंत प्रकट हो कर बहने लगता है. तुम अंगिरसों द्वारा स्तुति किए गए मेघों को चीरते हुए हमें अपरिमित अन्न प्रदान करते हो. (८) सूक्त-७८ देवता—इंद्र तद् वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने. शं यद् गवे न शाकिने.. (१) हे स्तोता! सोमरस का संस्कार हो जाने पर इंद्र देव की स्तुति करो, जिस से वे हम सोमरस देने वालों के लिए गौ के समान कल्याणकारी हों. (१) न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः. यत् सीमुप श्रवद् गिरः.. (२) ये इंद्र यदि हमारी स्तुतियों को सुन लेते हैं तो गौ से युक्त अन्न देने में विलंब नहीं करते. (२) कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत. शचीभिरप नो वरत्... (३) हे इंद्र! तुम वृत्र राक्षस का वध करने वाले हो तथा सभी को अपरिमित अन्न देते हो. तुम गौ से सुशोभित स्थान पर आ कर हम को बल से पूर्ण बनाओ. (३) सूक्त-७९ देवता—इंद्र इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा. शिक्षा णो अस्मिन् पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि.. (१) हे इंद्र! जिस प्रकार पिता अपने पुत्र को इच्छित वस्तु प्रदान करता है, उसी प्रकार तुम भी हमें हमारी मनचाही वस्तुएं प्रदान करो. हे पुरुहूत! इस संसार यात्रा में तुम हमें इच्छित ebook converter DEMO Watermarks*

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पदार्थ प्रदान करो, जिस से हम दीर्घजीवी हो कर इस लोक में सुखों का अनुभव करें. (१) मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो ३ मा ऽ शिवासो अव क्रमुः. त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपो ऽ ति शूर तरामसि.. (२) हे वीर इंद्र! हम पर आधियों और व्याधियों का आक्रमण न हो. अमंगलमय वाणियां तथा पाप हम पर आक्रमण न करें. हम तुम्हारी कृपा प्राप्त कर के सेवकों वाले बनें तथा सदा सफलतापूर्वक यज्ञ करते रहें. (२) सूक्त-८० देवता—इंद्र इन्द्रं ज्येष्ठं न आ भरं ओजिष्ठं पपुरि श्रवः. येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओभे सुशिप्र प्राः.. (१) हे इंद्र! तुम अपने महान और ओजस्वी धन से हमें संपन्न बनाओ. हे वज्रधारी इंद्र! तुम ने अपने जिस धन से आकाश तथा पृथ्वी को पूर्ण किया है, वही धन हमें प्रदान करो. (१) त्वामुग्रमवसे चर्षणीसहं राजन् देवेषु हूमहे. विश्वा सु नो विथुरा पिब्दना वसोऽमित्रान् सुषहान् कृधि.. (२) हे इंद्र! तुम उग्र हो. तुम हमारे भय के सभी कारणों को दूर करो तथा हमें शत्रुओं को वश में करने वाले बल से संपन्न बनाओ. हम अपनी रक्षा के हेतु तुम्हारा आह्वान करते हैं. (२) सूक्त-८१ देवता—इंद्र यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः. न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (१) हे इंद्र! हे प्रभु! सैकड़ों आकाश और पृथ्वी भी यदि तुम्हारी समानता करना चाहें, तब भी तुम्हारे समान महान नहीं हो सकते. (१) आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन् विश्वा शविष्ठ शवसा. अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिंचिंत्राभिरूतिभिः.. (२) हे वज्रधारी इंद्र! हमारे गोचर स्थान में अपने रक्षा साधनों के द्वारा हमारी रक्षा करो तथा अपनी महिमा से हमारी वृद्धि करो. (२) सूक्त-८२ देवता—इंद्र यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय. ebook converter DEMO Watermarks*

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स्तोतारमिद् दिधिषेय रदावसो न पापत्वाय रासीय.. (१) हे इंद्र! मैं तुम्हारे समान प्रभुत्व प्राप्त करूं तथा स्तुति करने वालों को धन देने वाला बनूं, पाप कर्म करने वाले धनी मुझे व्यथित न करें. (१) शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे. नहि त्वदन्यन्मघवन् न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन.. (२) हे इंद्र! मैं जहां से चाहूं, वहीं से धन प्राप्त कर सकूं. जो मुझ से उत्कृष्ट होना चाहे, उसे मैं स्वर्ण का दंड दूं. हे इंद्र! मुझे इस प्रकार की शक्ति देने वाला तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन रक्षक हो सकता है? (२) सूक्त-८३ देवता—इंद्र इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत्. छर्दैर्यच्छ मघवद्भ्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः.. (१) हे इंद्र! मुझे मंगलकारी घर दो तथा हिंसा करने वाली शक्तियों को यहां से दूर भगाओ. (१) ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया. अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव.. (२) हे इंद्र! तुम्हारे जो बल शत्रुओं को संतप्त करते और मारते हैं, तुम अपने उन्हीं बलों से हमारे शरीरों की रक्षा करो. (२) सूक्त-८४ देवता—इंद्र इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः. अण्वीभिस्तना पूतासः.. (१) हे इंद्र! यहां आओ. यह तैयार किया गया सोमरस तुम्हारे लिए ही है. (१) इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः. उप ब्रह्माणि वाघतः.. (२) हे इंद्र! ये विद्वान् ब्राह्मण तुम्हें अपने से श्रेष्ठ स्वीकार करते हैं. इन मंत्रों से संपन्न ब्राह्मणों और सोमरस वाले ऋत्विजों के समीप आओ. (२) इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः. सुते दधिष्व नश्चनः.. (३) हे इंद्र! तुम अश्वों के स्वामी हो, इसलिए हमारे स्तोत्रों को सुनने के लिए हमारे समीप शीघ्र आओ तथा हमारे तैयार सोमरस के पास अपने अश्वों को रोको. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-८५ देवता—इंद्र

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सूक्त-८५ देवता—इंद्र मा चिदन्यद् वि शंसत सखायो मा रिषण्यत. इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत.. (१) हे स्तोताओ! तुम अन्य किसी देवता का आश्रय मत लो. तुम किसी अन्य देवता की स्तुति मत करो. हे तैयार किए गए सोमरस वाले होताओ! तुम इंद्र की स्तुति करते हुए बारबार उक्थों का गान करो. (१) अवक्रक्षिणं वृषभं यथा ऽ जुरं गा न चर्षणीसहम्. विद्वेषणं संवननोभयंकरं मंंहिष्ठमुभयाविनम्.. (२) इंद्र सांड़ के समान घूमने वाले, संघर्षशील, अवकक्षी, शत्रुओं के द्वेषी, अजर, अतिशय महिमाशाली, सेवा के योग्य तथा दोनों लोकों के रक्षक हैं. (२) यच्चिद्धि त्वा जना इमे नाना हवन्त ऊतये. अस्माकं ब्रह्मेदमिन्द्र भूतु ते ऽ हा विश्वा च वर्धनम्.. (३) हे इंद्र! तुम्हारा संरक्षण पाने के लिए बहुत से पुरुष तुम्हें बुलाते हैं. हमारा यह स्तोत्र भी तुम्हारी वृद्धि करने वाला है. (३) वि तर्तूर्यन्ते मघवन् विपश्चितो ऽ र्यो विपो जनानाम्. उप क्रमस्व पुरुरूपमा भर वाजं नेदिष्ठमूतये.. (४) हे इंद्र! तुम यहां शीघ्र आ कर विशाल रूप धारण करो. इन विद्वान् मनुष्यों और यजमानों की उंगलियां शीघ्रताकारी हैं. तुम हमारे पालन के लिए अन्न हमारे समीप लाओ तथा हमें प्रदान करो. (४) सूक्त-८६ देवता—इंद्र ब्रह्मणा ते ब्रह्मयुजा युनज्मि हरी सखाया सधमाद आशू. स्थिरं रथं सुखमिन्द्राधितिष्ठन् प्रजानन् विद्वां उप याहि सोमम्.. (१) हे इंद्र! मैं कर्मवान मंत्रों के द्वारा तुम्हारे रथ में अश्वों को जोड़ता हूं. हे विद्वान् इंद्र! इस सुखदायक रथ पर चढ़ कर तुम हमारे इस सोमरस के पास आओ. (१) सूक्त-८७ देवता—इंद्र, बृहस्पति अध्वर्यवो ऽ रुणं दुग्धमंशुं जुहोतन वृषभाय क्षितीनाम्. गौराद् वेदीयां अवपानमिन्द्रो विश्वाहेद्याति सुतसोममिच्छन्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे अध्वर्युजनो! इंद्र पृथ्वी पर वर्षा करने वाले हैं. उन इंद्र के लिए सोमरस के दूध रूप अंश की आहुति दो. ये इंद्र सोमरस की कामना करते हुए यज्ञ में आते हैं. (१) यद् दधिषे प्रदिवि चार्वन्नं दिवेदिवे पीतिमदस्य वक्षि. उत हृदोत मनसा जुषाण उशन्निन्द्र प्रस्थितान् पाहि सोमान्.. (२) हे इंद्र! तुम आकाश में उत्तम अन्न धारण करते हो तथा यज्ञ आदि के अवसर पर सोमरस का पान करते हो. तुम सोमरस की कामना करते हुए इस यज्ञ की रक्षा करो. (२) जज्ञानः सोमं सहसे पपाथ प्र ते माता महिमानमुवाच. एन्द्र पप्राथोर्व १ न्तरिक्षं युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ.. (३) हे इंद्र! तुम प्रकट होते ही सोमरस की ओर जाते हो. तुम ने संग्राम में विजय प्राप्त कर के देवताओं को धन दिया. तुम विशाल अंतरिक्ष में गमन करते हो. यह अंतरिक्ष तुम्हारी कामना का बखान करता है. (३) यद् योधया महतो मन्यमानान् साक्षाम तान् बाहुभिः शाशदानान्. यद्वा नृभिर्वृत इन्द्राभियुध्यास्तं त्वयाजिं सौश्रवसं जयेम.. (४) हे इंद्र देव! अहंकार से भरे हुए तथा अपनेआप को बड़ा मानते हुए शत्रुओं के साथ जब हम युद्ध करें, तब हम अपनी भुजाओं से ही हिंसक शत्रुओं को नष्ट करने में समर्थ हों. आप यदि कभी अन्न अथवा यश पाने के लिए स्वयं युद्ध करें, तब हम आपके सहयोगी बनकर विजय प्राप्त करें. (४) प्रेन्द्रस्य वोचं प्रथमा कृतानि प्र नूतना मघवा या चकार. यदेददेवीरसहिष्ट माया अथाभवत् केवलः सोमो अस्य.. (५) हे इंद्र! तुम हमारे वीरों को साथ ले कर हमारे शत्रुओं से संग्राम करो. हम तुम्हारी शक्ति से इस संग्राम में विजय प्राप्त करते हुए यशस्वी बनें. तुम अपनी जिन भुजाओं से बड़ेबड़ों से युद्ध करते हो, हम भी उन भुजाओं के समान बल से युक्त हों. (५) तवेदं विश्वमभितः पशव्यं १ यत् पश्यसि चक्षसा सूर्यस्य. गवामसि गोपविरेक इन्द्र भक्षीमहि ते प्रयतस्य वस्वः.. (६) हे इंद्र! मैं तुम्हारे नए एवं पुराने कर्मों का वर्णन करता हूं. तुम ने राक्षसी मायाओं का सामना किया है, इस कारण सोमरस तुम्हारा ही हो गया है. (६) बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य. धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-८८ देवता—बृहस्पति

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हे बृहस्पति! हे इंद्र! तुम दोनों ही दिव्य तथा पार्थिव धनों के स्वामी हो. तुम अपनी रक्षक शक्तियों के द्वारा हमारी रक्षा करते हुए हम स्तुति कर्ताओं को धन प्रदान करो. (७) सूक्त-८८ देवता—बृहस्पति यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान् बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण. तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम्.. (१) जिन बृहस्पति ने अपने घोष से पृथ्वी के छोर को भी स्तंभित किया, प्राचीन ऋषि उन का बारबार ध्यान करते हैं. वे बृहस्पति प्रसन्न करने वाली जिह्वा के स्वामी हैं. विद्वान् ब्राह्मण बृहस्पति को प्रथम स्थान देते हैं. (१) धुनेतयः सुप्रकेतं मदन्तो बृहस्पते अभि ये नस्ततस्रे. पृषन्तं सृप्रमदब्धमूर्वं बृहस्पते रक्षतादस्य योनिम्.. (२) हे बृहस्पति! जो ऋत्विज् तुम्हें हमारी ओर आकर्षित करते हैं उन गमनशील, अहिंसक तथा घृत की बूंदें धारण करने वाले ऋत्विजों की तुम रक्षा करो. (२) बृहस्पते या परमा परावदत आ त ऋतस्पृशो नि षेदुः. तुभ्यं खाता अवता अद्रिदुग्धा मध्व श्रोतन्त्यभितो विरप्शम्.. (३) हे बृहस्पति! मृत का स्पर्श करने वाले ऋत्विज् तुम्हारी रक्षा साधनों वाली महान रक्षा के निमित्त बैठे हुए, पर्वतों से एकत्र किए हुए उत्तम मधु की तुम पर वर्षा करते हैं. (३) बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योमन्. सप्तास्यस्तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिरधमत् तमांसि.. (४) बृहस्पति महान ज्योतिष चक्र से परम व्योम में आविर्भूत अर्थात् प्रकट होते हैं. वे बृहस्पति सप्त रश्मि वाले बन कर अंधकार को मिटा देते हैं. (४) स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण. बृहस्पतिरुस्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद् वावशतीरुदाजत्.. (५) ऋचा वाले गणों के द्वारा वे बृहस्पति मेघों को चीरते हैं. वे हव्य से प्रेरित हो कर इच्छा करने वाली गायों को प्राप्त होते हैं और बारबार शब्द करते हैं. (५) एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः. बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (६) हे बृहस्पति! हम सुंदर और वीर संतानों से संपन्न धन के स्वामी बनें. हम उन बृहस्पति ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-८९ देवता—इंद्र

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की हवियों और नमस्कारों के द्वारा पूजा करते हैं. (६) सूक्त-८९ देवता—इंद्र अस्तेव सु प्रतरं लायमस्यन् भूषन्निव प्र भरा स्तोममस्मै. वाचा विप्रास्तरत वाचमर्यो नि रामय जरितः सोम इन्द्रम्.. (१) हे ब्राह्मणो! तुम इंद्र के लिए स्तोमों का गान करो. तुम मंत्र रूप वाणी के पार जाओ. हे स्तुति करने वालो! तुम इंद्र को सोमरस से युक्त बनाओ. (१) दोहेन गामुप शिक्षा सखायं प्र बोधय जरितर्जरिमिन्द्रम्. कोशं न पूर्णं वसुना न्युष्ट्मा च्यावय मघदेयाय शूरम्.. (२) हे स्तोताओ! वाणी तुम्हारी मित्र है. उस का दोहन करो तथा जो इंद्र शत्रुओं को क्षीण करते हैं, उन्हें बुलाओ. जो सोमरस धन से युक्त कोष के समान शुद्ध है, उसे इंद्र के लिए तैयार करो. (२) किमङ्ग त्वा मघवन् भोजमाहुः शिशीहि मा शिशयं त्वा शृणोमि. अप्रस्वती मम धीरस्तु शक्र वसुविदं भगमिन्द्रा भरा नः.. (३) हे इंद्र! तुम भोक्ता हो. तुम शत्रुओं को क्षीण कर देते हो. तुम मुझे क्षीण मत करना. तुम मुझे धन प्राप्त करने वाला सौभाग्य दो. मेरी बुद्धि कर्मों की ओर अग्रसर हो. (३) त्वां जना ममसत्येष्विन्द्र संतस्थाना वि ह्वयन्ते समीके. अत्रा युजं कृणुते यो हविष्मान्नासुन्वता सख्यं वष्टि शूरः.. (४) हे इंद्र! मेरे पुरुष तुम्हीं को बुलाते हैं. जो वीर तुम्हारी मित्रता की कामना करते हैं तथा हवि वाला अनुष्ठान करते हैं, वे सोमरस का संस्कार भी करते हैं. (४) धनं न स्पन्द्रं बहुलं यो अस्मै तीव्रान्सोमाँ आसुनोति प्रयस्वान्. तस्मै शत्रून्सुतुकान् प्रातरह्वो नि स्वघ्नान् युवति हन्ति वृत्रम्.. (५) हवि धारण करने वाला जो पुरुष इंद्र के निमित्त सोमरस का संस्कार नहीं करता, उस का धन सरकता जाता है. इंद्र उसे अपने शत्रुओं में सम्मिलित कर के उस पर वज्र का प्रहार करते हैं. (५) यस्मिन् वयं दधिमा शंसमिन्द्रे यः शिश्राय मघवा काममस्मे. आराच्चित् सन् भयतामस्य शत्रुर्न्‍यस्मै द्युम्ना जन्या नमन्ताम्.. (६) जो इंद्र हमारी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं, जिन इंद्र की हम प्रशंसा करते हैं, उन इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

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के समीप आते ही शत्रु भयभीत हो जाते हैं. संसार के सभी प्राणी इंद्र को नमस्कार करते हैं. (६) आराच्छत्रुमप बाधस्व दूरमुग्रो यः शम्बः पुरुहूत तेन. अस्मे धेहि यवमद् गोमदिन्द्र कृधी धियं जरित्रे वाजरत्नाम्.. (७) हे इंद्र! तुम अपने उग्र वज्र से पास के अथवा दूर के शत्रु को व्यथित करो. तुम हम को अन्न वाली बुद्धि प्रदान करते हुए अन्न तथा पशुओं से पूर्ण धन में प्रतिष्ठित करो. (७) प्र यमन्तर्वृषसवासो अग्मन् तीव्राः सोमा बहुलान्तास इन्द्रम्. नाह दामानं मघवा नि यंसन् नि सुन्वते वहति भूरि वामम्.. (८) जिन इंद्र के समीप तीव्र स्वाद वाला सोमरस गमन करता है, वे इंद्र धन की बाधक रस्सी को रोकते हैं तथा सोम का संस्कार करने वाले स्तोता को असीमित धन प्रदान करते हैं. (८) उत प्रहामतिदीवा जयति कृतमिव श्वघ्नी वि चिनोति काले. यो देवकामो न धनं रुणद्धि समित् तं रायः सृजति स्वधाभिः.. (९) अक्षक्रीड़ा में कुशल मनुष्य अपने विरोधी को जुए में हरा देता है, क्योंकि वह कृत नाम के पासे को ही खोजता है. वह खिलाड़ी इंद्र की कामना करता हुआ उस जीते हुए धन को व्यर्थ होने से रोकता है और इंद्र के कार्य में लगता है. इंद्र उसे स्वधाओं वाला बनाते हैं. (९) गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन वा क्षुधं पुरुहूत विश्वे. वयं राजसु प्रथमा धनान्वरिष्ट सो वृजनीभिर्जयेम.. (१०) हे इंद्र! दरिद्रता के कारण प्राप्त हुई दुर्बुद्धि को हम पशुओं के द्वारा लांघ जाएं तथा अन्न से अपनी भूख शांत करें. जुए में प्रतिपक्षी खिलाड़ी से जीतते हुए हम राजाओं में स्थित उत्कृष्ट धन को बल संपन्न पासों से प्राप्त करें. (१०) बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः. इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु.. (११) जो शत्रु हमारे वध रूप पाप की इच्छा करता है, बृहस्पति देवता उस से चारों दिशाओं में हमारी रक्षा करें. वे हमें हमारे अन्न की अपेक्षा उत्कृष्ट बनाएं. (११) सूक्त-९० देवता—बृहस्पति यो अद्रिभित् प्रथमजा ऋतावा बृहस्पतिराङ्गिरसो हविष्मान्. द्विबर्हज्मा प्राघर्मसत् पिता न आ रोदसी वृषभो रोरवीति.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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प्रथम प्रकट होने वाले, मेघों को चीरने वाले, सत्यभाषी आंगिरस अर्थात् अंगिरा गोत्र वाले बृहस्पति हवि प्राप्त करने के अधिकारी हैं. वे पालन कर्ता, आकाश और पृथ्वी में शब्द करने वाले, दो बर्हों अर्थात् मोर के पंखों से सुशोभित, धर्म का पालन करने वाले और वर्षा करने वाले हैं. (१) जनाय चिद् य ईवत उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार. घ्नन् वृत्राणि वि पुरो दर्देरीति जयं छत्रूंरमित्रान् पृत्सु साहन्.. (२) देवहूति में संतान को उत्पन्न करने वाले एवं मनुष्यों को प्राप्त होने वाले बृहस्पति मेघों को खंडित करें. वे वृत्र के नगर का विनाश करते हैं. वे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हुए सेनाओं का सामना करते हैं. (२) बृहस्पतिः समजयद वसूनि महो व्रजान् गोमतो देव एषः. अपः सिषासन्त्स्व १ रप्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमर्कैः.. (३) बृहस्पति ने गायों से भरी हुई विशाल गोशालाओं तथा धनों पर विजय प्राप्त कर ली है. वे जल देने के लिए स्वर्ग पर चढ़ते हैं तथा मंत्रों के द्वारा शत्रुओं को नष्ट कर देते हैं. (३) सूक्त-९१ देवता—बृहस्पति इमां धियं सप्तशीर्णीं पिता न ऋतप्रजातां बृहतीमविन्दत्. तुरीयं स्विज्जनयद् विश्वजन्यो ऽ यास्य उक्थमिन्द्राय शंसन्.. (१) बृहस्पति ने सत्य के द्वारा उत्पन्न सात सिरों वाली बुद्धि को प्राप्त किया है. विश्व से उत्पन्न अयास्य ने इंद्र से कह कर तुरीय को उत्पन्न कराया. (१) ऋतं शंसन्त ऋजु दीध्याना दिवसपुत्रासो असुरस्य वीराः. विप्रं पदमङ्गिरसो दधाना यज्ञस्य धाम प्रथमं मनन्त.. (२) सत्य कथन द्वारा प्राण के वीर्य से उत्पन्न हुए अंगिरा यज्ञशाला में प्रथम अर्थात् उत्तम समझे जाते हैं. (२) हंसैरिव सखिभिर्वावदद्भिरश्मन्मयानि नहना व्यस्यन्. बृहस्पतिरभिकनिक्रदद् गा उत प्रास्तौदुच्च विद्वां अगायत.. (३) गर्जन करने वाले मेघों का उद्घाटन करते हुए बृहस्पति स्तुति करते हैं. इसी कारण वे विद्वान् समझे जाते हैं. (३) अवो द्वाभ्यां पर एकया गा गुहा तिष्ठन्तीरनृतस्य सेतौ. बृहस्पतिस्तमसि ज्योतिरिच्छन्नुदुस्रा आकर्वि हि तिस्र आवः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

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पहले दो से, फिर एक से हृदय रूपी गुफा में स्थित वाणियों को बाहर निकालते हुए तथा अंधकार में प्रकाश की कामना करने वाले बृहस्पति प्रकाशों को प्रकट करते हैं. (४) विभिद्या पुरं शयथेमपाचीं निस्त्रीणि साकमुदधेरकृन्तत्. बृहस्पतिरुषसं सूर्यं गामर्कं विवेद स्तनयन्निव द्यौ:.. (५) बृहस्पति पुर का विनाश कर के पश्चिम दिशा में सोते हैं. वे सागर के भागों का त्याग नहीं करते तथा आकाश में कड़कते हुए उषा, सूर्य तथा सत्य गौ को प्राप्त करते हैं. (५) इन्द्रो वलं रक्षितारं दुघानां करेणेव वि चकती रवेण. स्वेदाञ्जिभिराशिरमिच्छमानो ऽ रोदयत् पणिमा गा अमुष्णात्.. (६) इंद्र कामधेनुओं के पालक मेघ को छिन्नभिन्न कर देते हैं. उन्होंने दधि की इच्छा से गायों को चुराने वाले पणियों को व्यथित किया था. (६) स ईं सत्येभिः सखिभिः शुचद्भिर्गोधायसं वि धनसैरदर्दः. ब्रह्मणस्पतिर्वृषभिर्वराहैर्घर्मस्वेदेभिर्द्रविणं व्यानट्.. (७) इंद्र धन देने वाले तथा धरती को पुष्ट करने वाले मेघों को विदीर्ण करते हैं. ब्रह्मणस्पति आपस में टकराने वाले मेघों के द्वारा धन में व्याप्त होते हैं. (७) ते सत्येन मनसा गोपर्तिं गा इयानास इषणयन्त धीभिः. बृहस्पतिर्मिथोअवद्यपेभिरुदुस्रिया असृजत स्वयुग्भिः.. (८) ये मेघ बैलों और गायों के समीप जाने की कामना करते हुए अपनी वृद्धियों के द्वारा उन्हें प्राप्त करते हैं. शब्द का पालन करते हुए बृहस्पति मेघों के द्वारा गायों से संयुक्त होते हैं. (८) तं वर्धयन्तो मतिभिः शिवाभिः सिंहमिव नानदतं सधस्थे. बृहस्पतिं वृषणं शूरसातौ भरेभरे अनु मदेम जिष्णुम्.. (९) उस युद्ध में सिंह के समान गर्जन करने वाले बृहस्पति को हम अपनी उत्तम बुद्धियों से बढ़ाते हैं. (९) यदा वाजमसनद् विश्वरूपमा द्यामरुक्षदुत्तराणि सद्म. बृहस्पतिं वृषणं वर्धयन्तो नाना सन्तो बिभ्रतो ज्योतिरासा.. (१०) बृहस्पति देव जिस समय संसार से संबंधित सभी हव्यों का सेवन करते हैं. तब वे आकाश के ऊपर जा कर उत्तम लोकों में प्रतिष्ठा पाते हैं. उस समय शक्ति संपन्न बृहस्पति देव को शेष सभी देव अपने वचनों से उत्साह प्रदान करते हैं. कामनाओं को पूर्ण करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*

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बृहस्पति को शेष देव अलगअलग दिशाओं में रहते हुए भी उन्नति प्रदान करते हैं. (१०) सत्यामाशिषं कृणुता वयोद्यै कीरिं चिद्द्यावथ स्वेभिरेवैः. पश्चा मृधो अप भवन्तु विश्वास्तद् रोदसी शृणुतं विश्वमिन्वे.. (११) अन्न के पोषक कारणों के आशीर्वाद को सत्य करते हुए बृहस्पति स्तुतिकर्ता के रक्षक बनें. हे द्यावा पृथ्वी! तुम अग्नि संबंधी ऋचाओं का उच्चारण सुनो. जितने भी युद्ध हैं, वे सब तुम्हारी कृपा से समाप्त हो जाएं. (११) इन्द्रो मह्ना महतो अर्णवस्य वि मूर्धानमभिनदर्बुदस्य. अहन्नहिमरिणात् सप्त सिन्धून् देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः.. (१२) इंद्र अपनी महिमा के द्वारा मेघ का मस्तक काट देते हैं. वे मेघ पर प्रहार कर के सात नदियों को प्रकट करते हैं. हे आकाश और पृथ्वी! तुम हमारा पोषण करने वाले बनो. (१२) सूक्त-९२ देवता—इंद्र अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्.. (१) हे स्तोता! मैं गायों के स्वामी इंद्र को जिस प्रकार प्राप्त कर सकूं, तुम उसी प्रकार उन का पूजन करो. (१) आ हरयः ससृजिरे ऽ रुषीरधि बर्हिषि. यत्राभि संनवामहे.. (२) जिन कुशों पर हम इंद्र का पूजन कर रहे हैं, उन पर इंद्र के घोड़े उनके रथ को पहुंचाएं. (२) इन्द्राय गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु. यत् सीमुपह्वरे विदत्.. (३) जब गाएं इंद्र के लिए दूध दुहाती हैं, तब इंद्र सभी ओर से मधुर सोमरसों को प्राप्त करते हैं. (३) उद् यद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि. मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे.. (४) ऊपर जो वृत्र राक्षस का हनन करने वाला स्वर्ग है, उस में हम इंद्र के साथ गमन करें. हम इक्कीस बार मधु को पी कर इंद्र की मित्रता प्राप्त करें. (४) अर्चत प्रार्चत प्रियमैधासो अर्चत. अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे स्तोताओ! तुम इंद्र का पूजन श्रेष्ठ रीति से करो. अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए तुम इंद्र का पूजन करो. (५) अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्पणत्. पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम्.. (६) जब हमारे मंत्र इंद्र के प्रति गमन करते हैं तो कलश शब्द करता है. उस समय पीले रंग का पदार्थ गमन करता हुआ धनुष की प्रत्यंचा के समान शब्द करता है. (६) आ यत् पतन्त्येन्यः सुदुघा अनपस्फुरः. अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे.. (७) हे स्तोताओ! श्वेत वर्ण की जो गाएं हैं, उन में स्थित अविनाशी पदार्थ को ग्रहण करते हुए इंद्र के पीने के लिए सोमरस लाओ. (७) अपादिन्द्रो अपादग्निर्विश्वे देवा अमत्सत. वरुण इदिह क्षयत् तमापो अभ्यनूषत वत्सं संशिश्वरीरिव.. (८) इस पदार्थ को अग्नि, इंद्र ने तथा विश्वे देवों ने पी लिया है. हे जलो! संशिश्वरी के पुत्र के समान वरुण की स्तुति करो. (८) सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः. अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव.. (९) हे वरुण! तुम्हारे पास सात नदियां हैं. जिस प्रकार जल नगर के बाहर निकलता हैं. उसी प्रकार तुम इन सात नदियों से जल प्रवाहित करो. (९) यो व्यतीँरफाणयत् सुयुक्ताँ उप दाशुषे. तक्वो नेता तदिद् वपुरुपमा यो अमुच्यत.. (१०) हवि दाता के लिए जो नेता उत्तम युक्तियों का प्रयोग करते हैं, उन की उपमा उन का शरीर ही है. तात्पर्य यह है कि कोई अन्य उन के समान नहीं है. (१०) अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः. भिनत् कनीन ओदनं पच्यमानं परो गिरा.. (११) भार को संभालने वाले इंद्र सभी शत्रुओं को वश में करते हैं. मंत्र से पकते हुए ओदन को कठिन होते हुए भी उन्होंने उस का भेदन किया. (११) अर्भको न कुमारको ऽ धि तिष्ठन्नवं रथम्. स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुकृतम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*