ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
by महर्षि वेदव्यास
५५- श्रीकृष्णद्वारा नन्दजीको ज्ञानोपदेश, लोकनीति, लोकमर्यादा तथा लौकिक सदाचारसे सम्बन्ध रखनेवाले विविध विधि-निषेधोंका वर्णन, कुसङ्ग और कुलटाकी निन्दा, सती और भक्तकी प्रशंसा, शिवलिङ्ग-पूजन एवं शिवकी महत्ता
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६६५
ऐश्वर्ययुक्त, श्रीसम्पन्न, श्रीनिवास, श्रीबीज एवं श्रीनिकेतन श्यामसुन्दर श्रीवल्लभको मन्द मुस्कानके साथ देखा। देखते ही उसके दोनों हाथ जुड़ गये। वह भक्तिसे विनीत हो गयी और सहसा चरणोंमें सिर रखकर उसने प्रणाम किया। साथ ही उनके श्याम मनोहर अङ्गमें चन्दन लगाया। श्रीकृष्णके जो सखा थे, उनके अङ्गोंमें भी चन्दनका अनुलेपन किया। फिर चन्दनका सुवर्णमय पात्र हाथमें लिये श्रेष्ठ दासीने बारंबार परिक्रमा करके श्रीकृष्णको प्रणाम किया। श्रीकृष्णकी दृष्टि पड़ते ही वह सहसा अनुपम शोभासे सम्पन्न तथा रूप और यौवनसे लक्ष्मीके समान रमणीय हो गयी। आगमें तपाकर शुद्ध की हुई स्वर्णप्रतिमाके समान दीप्तिमती हो उठी। सुन्दर वस्त्र और रत्नोंके आभूषण उसके अङ्गोंकी शोभा बढ़ाने लगे। वह बारह वर्षकी अवस्थावाली कुमारी कन्याके समान धन्या और मनोहारिणी प्रतीत होने लगी। बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित श्रेष्ठतम हारसे उसका वक्षःस्थल उद्भासित हो उठा। वह गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चलने लगी। रत्नोंके मञ्जीर उसके चरणोंकी शोभा बढ़ाने लगे। सिरपर केशोंकी बँधी हुई वेणी मालतीकी मालासे आवेष्टित थी, जो सुन्दर और गोलाकार दिखायी देती थी। उसने ललाटमें सिन्दूरकी बेंदी लगा रखी थी, जो अनारके फूलकी भाँति लाल थी। उस बेंदीके ऊपर कस्तूरी और चन्दनके भी बिन्दु थे। उस सुन्दरीने अपने हाथमें रत्नमय दर्पण ले रखा था। श्रीनिवास हरि उसे आश्वासन देकर आगे बढ़ गये। वह कृतार्थ हो प्रसन्नतापूर्वक अपने घर गयी, मानो लक्ष्मी अपने धामको जा रही हो। उसने अपने घरको देखा। वह लक्ष्मीके निवास-मन्दिरकी भाँति मनोहर हो गया था। उसमें रत्नमयी शय्या बिछी थी तथा उस भवनका निर्माण श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे हुआ था। रत्नोंकी दीपमालाएँ अपनी प्रभासे उस गृहको उद्भासित कर रही थीं। उस भवनमें सब ओर रत्नमय दर्पण लगे थे, जो उसकी भव्यताको बढ़ा रहे थे। सिन्दूर, वस्त्र, ताम्बूल, श्वेत चँवर और माला लिये दास-दासियोंके समुदाय उस दिव्य भवनको घेरकर खड़े थे। मुने! सुन्दरी कुब्जा मन, वाणी और शरीरसे श्रीहरिके चरणोंके ही चिन्तन और समाराधनमें लगी थी। वह निरन्तर यही सोचती रहती थी कि कब श्रीहरिका शुभागमन होगा और कब मैं उनके मनोहर मुखचन्द्रके दर्शन पाऊँगी। उसे सारा जगत् सदा श्रीकृष्णमय दिखायी देता था। करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्य-लीलासे सुशोभित श्यामसुन्दर पलभरके लिये भी उसे भूलते नहीं थे।
कुब्जाको बिदा करनेके पश्चात् श्रीकृष्णने एक मनोहर मालीको देखा, जो मालाओंका समूह लिये राजभवनकी ओर जा रहा था। उसने भी श्रीकान्तको देख पृथ्वीपर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया और अपनी सारी मालाएँ परमात्मा श्रीकृष्णको अर्पित कर दीं। श्रीकृष्ण उसे अत्यन्त दुर्लभ दास्यभावका वरदान दे मालाएँ पहनकर उस सुन्दर राजमार्गपर आगे बढ़ गये। तदनन्तर उन्हें एक धोबी दिखायी दिया, जो वस्त्रोंका गट्ठर लिये
६६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जा रहा था। वह बड़ा बलवान् और अहंकारी था तथा यौवनके मदसे उन्मत्त हो सदा उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव किया करता था। महामुने! श्रीकृष्णने उससे विनयपूर्वक वस्त्र माँगा। उसने वस्त्र तो उन्हें दिया नहीं, उलटे कठोर बातें सुनायीं।
**धोबी बोला—**ओ मूढ़! तू गोप-जनोंका लाड़ला है। यह वस्त्र गायके चरवाहोंके योग्य नहीं है; अत्यन्त दुर्लभ और राजाओंके ही उपयोगमें आने योग्य है।
धोबीकी यह बात सुनकर मधुसूदन हँसे। बलदेव, अक्रूर और गोपगण भी हँसने लगे। श्रीकृष्णने एक ही तमाचेमें उस धोबीका काम तमाम करके कपड़ोंका वह गट्ठर ले लिया और सखाओंसहित उन्होंने अपनी रुचिके अनुसार वस्त्र धारण किये। वह रजकराज (धोबियोंका सरदार) दिव्य देह धारण करके श्रीकृष्ण-पार्षदोंसे वेष्टित रत्नमय विमानद्वारा गोलोकको चला गया। उसका वह दिव्य शरीर अक्षय यौवनसे युक्त, जरा और मृत्युका निवारक, श्रेष्ठ पीताम्बरसे सुशोभित, मन्द मुस्कानसे विलसित, श्यामकान्तिसे कमनीय और मनोहर था। गोलोकमें पहुँचकर वह भी वहाँके पार्षदोंमें एक पार्षद हो गया। वहाँ अपने मनको वशमें रखकर वह नित्य-निरन्तर श्रीकृष्णके शुभागमनका चिन्तन करता रहा। उधर मथुरामें सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। तब श्रीकृष्णकी आज्ञा लेकर अक्रूर अपने घरको गये और श्रीकृष्ण भी नन्द एवं बलदेव आदिके साथ आनन्दपूर्वक किसी वैष्णवके घर गये, जो कपड़ा बुननेका व्यवसाय करता था। उसने अपना सर्वस्व भगवान्को समर्पित कर रखा था। उस भक्तने श्रीनिवासको प्रणाम करके उनका पूजन किया और भगवान्ने उसको अपना वह दास्यभाव प्रदान किया जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वहाँ उत्तम मिष्टान्न भोजन करके सब लोग पलंगपर सो गये। तदनन्तर श्रीकृष्ण कुब्जाके घर पधारे। उसने स्वागत किया। भगवान्ने उसको बताया—'प्रिये! श्रीरामावतारके समय तुमने मेरे लिये तप किया था; अतः अब मुझसे मिलकर जरा-मृत्युरहित और अत्यन्त दुर्लभ मेरे परमधाम गोलोकको जाओ।' इसी समय गोलोकसे एक रत्ननिर्मित रथ वहाँ आया और कुब्जा दिव्य देह धारण करके उसीके द्वारा गोलोकको चली गयी। मुने! वह वहीं चन्द्रमुखी गोपी हो गयी और कितनी ही गोपियाँ उसकी परिचारिका हुईं।
भगवान् नन्दनन्दन भी क्षणभर कुब्जाके यहाँ ठहरकर पुनः अपने निवास-मन्दिरमें लौट आये, जहाँ नन्दजी सानन्द विराजमान थे। उधर भयविह्वल कंसने रातको नींद आ जानेपर दुःखद दुःस्वप्न देखा, जो उसकी मृत्युका सूचक था। उसने देखा, सूरज आकाशसे गिरकर पृथ्वीपर पड़ा है और उसके चार खण्ड हो गये हैं। मुने! इसी तरह चन्द्रमण्डल भी आकाशसे भूमिपर गिरकर दस खण्डोंमें विभक्त दिखायी दिया। उसने कुछ ऐसे पुरुष देखे, जिनकी आकृति विकृत थी। वे हाथोंमें रस्सी लिये नंग-धड़ंग दिखायी देते थे। एक विधवा शूद्री दृष्टिगोचर हुई, जो नंगी थी और
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६६७
जिसकी नाक कटी हुई थी। वह हँसती थी। उसने चूनेका तिलक लगा रखा था और उसके सफेद और काले केश ऊपरकी ओर उठे थे। वह एक हाथमें तलवार और दूसरेमें खप्पर लिये हुए थी। उसकी जीभ लपलपा रही थी और उसके गलेमें मुण्डमाला पड़ी थी। उसके सिवा कंसने गदहा, भैंस, बैल, सूअर, भालू, कौआ, गीध, कङ्क, वानर, सफेद कुत्ता, घड़ियाल, सियार, भस्मपुञ्ज, हड्डियोंका ढेर, ताड़का फल, केश, कपास, बुझे अङ्गार (कोयले), उल्का, चितापर चढ़ा हुआ मुर्दा, कुम्हार और तेलीके चक्र, टेढ़ी-मेढ़ी कौड़ी, मरघट, अधजला काठ, सूखा काठ, कुश, तृण, चलता हुआ धड़, मुर्देका चिल्लाता हुआ मस्तक, आगसे जला हुआ स्थान, भस्म-युक्त सूखा तालाब, जली मछली, लोहा, दावानलसे जलकर बुझे हुए वन, गलित कोढ़से युक्त नंगा शूद्र, शिखा खोले और अत्यन्त रोषसे भरकर शाप देते हुए ब्राह्मण एवं गुरु, अधिक कुपित हुए संन्यासी, योगी एवं वैष्णव मनुष्य देखे। ऐसा दुःस्वप्न देख कंसकी नींद खुल गयी और उसने माता, पिता, भाई तथा पत्नीसे वह सब कह सुनाया। पत्नी प्रेमसे विह्वल होकर रोने लगी।
कंसने रङ्गभूमिमें दर्शकोंके बैठनेके लिये मञ्च बनवाये और सभाके द्वारपर हाथीको खड़ा कर दिया। हाथीके साथ ही पहलवान और जुझारू सेना भी स्थापित कर दी। तत्पश्चात् धनुर्यज्ञका मङ्गल-कृत्य आरम्भ किया। सभा बनवायी। पुण्यदायक स्वस्तिवाचन एवं मङ्गलपाठ कराया तथा योगयुक्त पुरोहितको यत्नपूर्वक आवश्यक कार्यके अनुष्ठानमें नियुक्त किया। राजा कंस हाथमें विलक्षण तलवार ले रमणीय मञ्चपर जा बैठा। मल्लयुद्धके लिये उस कलामें निपुण योद्धाको नियुक्त किया। आमन्त्रित श्रेष्ठ राजाओं, ब्राह्मणों, मुनीश्वरों, सुहृद्वर्गके लोगों, धर्मात्मा पुरुषों तथा युद्धकुशल पुरुषोंको यथास्थान बैठाया।
नारद! इसी समय बलरामके साथ भगवान् श्रीकृष्ण रङ्गभूमिमें आये और महादेवजीके धनुषको लीलापूर्वक बीचसे ही तोड़ डाला। धनुष टूटनेकी भयंकर आवाजसे सारी मथुरापुरी बहरी-सी हो गयी। कंसको बड़ा दुःख हुआ और देवकीनन्दन श्रीकृष्ण हर्षसे खिल उठे। द्वारवर्ती मल्लसहित हाथीका वध करके वे सभामें उपस्थित हुए। योगीजनोंने उन्हें साक्षात् परमात्मदेव परमेश्वरके रूपमें देखा। वे अपने हृदयकमलमें जिस स्वरूपका ध्यान करते थे, वही उन्हें बाहर दृष्टिगोचर हुआ। राजाओंकी दृष्टिमें वे सर्वशासक दण्डधारी राजेन्द्र थे। माता-पिताने उनको स्तनपान करनेवाले दुधमुँहे बालकके रूपमें देखा। कामिनियोंकी दृष्टिमें वे करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्य-लीला धारण करनेवाले रसिकशेखर थे। कंसने कालपुरुष समझा और उसके भाइयोंने शत्रु। मल्लोंने अपनी मृत्युका स्थान माना और यादवोंने उनको प्राणोंके समान प्रिय देखा।
श्रीकृष्णने सभामें बैठे हुए मुनियों, ब्राह्मणों तथा माता, पिता एवं गुरुजनोंको नमस्कार किया। फिर वे हाथमें सुदर्शनचक्र लिये राजमञ्चके निकट गये। मुने! उन्होंने कंसको भक्तके रूपमें देखा।
५६- जिनके दर्शनसे पुण्यलाभ और जिनके अनुष्ठानसे पुनर्जन्मका निवारण होता है, उन वस्तुओं और सत्कर्मोंका वर्णन तथा विविध दानोंके पुण्यफलका कथन
६६८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
भक्तोंके तो वे जीवनबन्धु ही हैं। कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक कंसको मञ्चसे खींच लिया और लीलासे ही उसको मार डाला। उस समय राजा कंसको सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णमय दिखायी दे रहा था। मृत्युके पश्चात् उसके निकट हीरेके हारोंसे विभूषित रत्नमय विमान आ पहुँचा और वह दिव्य रूप धारण करके समृद्धिशाली हो उस विमानसे विष्णुधाममें जा पहुँचा। मुने ! कंसका उत्कृष्ट तेज श्रीकृष्णके चरणारविन्दमें प्रविष्ट हो गया। उसका और्ध्वदैहिक संस्कार एवं सत्कार करके श्रीहरिने ब्राह्मणोंको धनका दान किया। इसके बाद राज्य एवं राजाका छत्र बुद्धिमान् उग्रसेनको सौंप दिया। चन्द्रवंशी उग्रसेन पुनः यादवोंके 'राजेन्द्र' हो गये।
कंसकी माता, पत्नियाँ, पिता, बन्धु-बान्धव, मातृवर्गकी स्त्रियाँ, बहिन तथा भाइयोंकी स्त्रियाँ भी विलाप करने लगीं। वे बोलीं—'राजेन्द्र ! उठो, राजसिंहासनपर बैठकर हमें दर्शन दो। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त चराचर प्राणियोंका आधारभूत जो असंख्य विश्व हैं, उन सबकी जो स्वयं ही लीलापूर्वक सृष्टि करते हैं; ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म, सूर्य तथा गणेश आदि देवता, मुनीन्द्रवर्ग और देवेन्द्रगण जिनका दिन-रात ध्यान करते हैं; वेद और सरस्वती भयभीत हो जिनका स्तवन करती हैं; प्रकृतिदेवी भी हर्षसे उल्लसित हो जिनके गुण गाती हैं; जो प्रकृतिसे परे, प्राकृतस्वरूप, स्वेच्छामय, निरीह, निर्गुण, निरञ्जन, परात्परतर ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, नित्यज्योतिःस्वरूप, भक्तोंपर अनुग्रहके लिये ही दिव्य देह धारण करनेवाले, नित्यानन्दमय, नित्यरूप तथा नित्य अविनाशी शरीर धारण करनेवाले हैं; वे ही मायापति भगवान् गोविन्द भूतलका भार उतारनेके लिये मायासे गोपबालकके वेषमें अवतीर्ण हुए हैं। वे सर्वेश्वर प्रभु जिसे मारते हैं, उसकी रक्षा कौन पुरुष कर सकता है ? इसी प्रकार वे सर्वात्मा श्रीहरि जिसकी रक्षा करते हों उसे मारनेवाला भी कोई नहीं है*।'
महामुने ! ऐसा कहकर सब लोग चुप हो गये। परिवारके लोगोंने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें सब प्रकारका धन दिया। सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी पिताके निकट गये और उनकी बेड़ी-हथकड़ी काटकर उन्होंने माता और पिता दोनोंको बन्धनसे मुक्त किया। तत्पश्चात् उन देवेश्वरने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर माता-पिताको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और भक्तिसे मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति की।
श्रीभगवान् बोले—जो पुरुष पिता और माताका तथा विद्यादाता एवं मन्त्रदाता गुरुका पोषण नहीं करता, वह जीवनभर पापसे शुद्ध नहीं होता। समस्त पूजनीयोंमें पिता वन्दनीय महान् गुरु हैं। परंतु माता गर्भमें धारण एवं पोषण करती है; इसलिये पितासे भी सौगुनी श्रेष्ठ है। माता पृथ्वीके समान क्षमाशीला और सबका समानरूपसे हित चाहनेवाली है; अतः भूतलपर सबके लिये मातासे बढ़कर बन्धु दूसरा कोई नहीं है। साथ ही यह भी सच है कि विद्यादाता और मन्त्रदाता गुरु मातासे भी बहुत बढ़-चढ़कर आदरके योग्य हैं। वेदके अनुसार गुरुसे बढ़कर वन्दनीय और पूजनीय दूसरा कोई नहीं है।
मुने ! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण और बलरामने माताको प्रणाम किया। फिर माता-पिताने भी उन दोनोंको आदरपूर्वक गोदमें बिठा लिया और उन्हें उत्तम मिष्ठान्न भोजन कराया। नन्द और ग्वालबालोंको भी बड़े आदरसे खिलाया। बच्चोंका मङ्गल-कृत्य कराया और उसके उपलक्ष्यमें भी बहुत-से ब्राह्मणोंको जिमाया। उस समय वसुदेवने प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया। (अध्याय ७१-७२)
* स यं हन्ति च सर्वेशो रक्षिता तस्य कः पुमान्। स यं रक्षति सर्वात्मा तस्य हन्ता न कोऽपि च॥
(७२। १०५)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६६९
श्रीकृष्णका नन्दको अपना स्वरूप और प्रभाव बताना; गोलोक, रासमण्डल और राधा-सदनका वर्णन; श्रीराधाके महत्त्वका प्रतिपादन तथा उनके साथ अपने नित्य सम्बन्धका कथन और दिव्य विभूतियोंका वर्णन
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर शोकसे आतुर और पुत्रवियोगसे कातर हो फूट-फूटकर रोते हुए चेष्टाशून्य पिता नन्दको श्रीकृष्ण और बलरामने आध्यात्मिक आदि दिव्य योगोंद्वारा सानन्द समझाना आरम्भ किया।
श्रीभगवान् बोले—बाबा! प्रसन्नतापूर्वक मेरी बात सुनो। शोक छोड़ो और हर्षको हृदयमें स्थान दो। मैं जो ज्ञान देता हूँ, इसे ग्रहण करो। यह वही ज्ञान है, जिसे पूर्वकालमें मैंने पुष्करमें ब्रह्मा, शेष, गणेश, महेश (शिव), दिनेश (सूर्य), मुनीश और योगीशको प्रदान किया था। यहाँ कौन किसका पुत्र, कौन किसका पिता और कौन किसकी माता है? यह पुत्र आदिका सम्बन्ध किस कारणसे है? जीव अपने पूर्वकृत कर्मसे प्रेरित हो इस संसारमें आते और परलोकमें जाते हैं। कर्मके अनुसार ही उनका विभिन्न स्थानोंमें जन्म होता है। कोई जीव अपने शुभकर्मसे प्रेरित हो योगीन्द्रोंके कुलमें जन्म लेता है और कोई राजरानियोंके पेटसे उत्पन्न होता है। कोई ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या अथवा शूद्राओंके गर्भसे जन्म ग्रहण करता है; किसी-किसीकी उत्पत्ति पशु, पक्षी आदि तिर्यक् योनियोंमें होती है। सब लोग मेरी ही मायासे विषयोंमें आनन्द लेते हैं और देहत्यागकालमें विषाद करते हैं। बान्धवोंके साथ बिछोह होनेपर भी लोगोंको बड़ा कष्ट होता है। संतान, भूमि और धन आदिका विच्छेद मरणसे भी अधिक कष्टदायक प्रतीत होता है। मूढ़ मनुष्य ही सदा इस तरहके शोकसे ग्रस्त होता है; विद्वान् पुरुष नहीं। जो मेरा भक्त है, मेरे भजनमें लगा है, मेरा यजन करता है, इन्द्रियोंको वशमें रखता है, मेरे मन्त्रका उपासक है और निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न रहता है; वह परम पवित्र माना गया है। मेरे भयसे ही यह वायु चलती है, सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन प्रकाशित होते हैं, इन्द्र भिन्न-भिन्न समयोंमें वर्षा करते हैं, आग जलाती है और मृत्यु सब जीवोंमें विचरती है। मेरा भय मानकर ही वृक्ष समयानुसार पुष्प और फल धारण करता है। वायु बिना किसी आधारके चलती है। वायुके आधारपर कच्छप, कच्छपके आधारपर शेष और शेषके आधारपर पर्वत टिके हुए हैं। पंक्तिबद्ध विद्यमान सात पाताल पर्वतोंके सहारे स्थित हैं। पातालोंसे जल सुस्थिर है और जलके ऊपर पृथ्वी टिकी हुई है। पृथ्वी सात स्वर्गोंकी आधारभूमि है। ज्योतिश्चक्र अथवा नक्षत्रमण्डल ग्रहोंके आधारपर स्थित हैं; परंतु वैकुण्ठ बिना किसी आधारके ही प्रतिष्ठित है। वह समस्त ब्रह्माण्डोंसे परे तथा श्रेष्ठ है। उससे भी परे गोलोकधाम है। वह वैकुण्ठधामसे पचास
६७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण करोड़ योजन ऊपर बिना आधारके ही स्थित है। उसका निर्माण दिव्य चिन्मय रत्नोंके सारतत्त्वसे हुआ है। उसके सात दरवाजे हैं। सात सार हैं। वह सात खाइयोंसे घिरा हुआ है। उसके चारों ओर लाखों परकोटे हैं। वहाँ विरजा नदी बहती है। वह लोक मनोहर रत्नमय पर्वत शतशृङ्गसे आवेष्टित है। शतशृङ्गका एक-एक उज्ज्वल शिखर दस-दस हजार योजन लंबा-चौड़ा है। वह पर्वत करोड़ों योजन ऊँचा है। उसकी लंबाई उससे सौगुनी है और चौड़ाई एक लाख योजन है। उसी धाममें बहुमूल्य दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार रासमण्डल है; जिसका विस्तार दस हजार योजन है। वह फूलोंसे लदे हुए पारिजात-वनसे, एक सहस्र कल्पवृक्षोंसे और सैकड़ों पुष्पोद्यानोंसे घिरा हुआ है। वे पुष्पोद्यान नाना प्रकारके पुष्पसम्बन्धी वृक्षोंसे युक्त होनेके कारण फूलोंसे भरे रहते हैं; अतएव अत्यन्त मनोहर प्रतीत होते हैं। उस रासमण्डलमें तीन करोड़ रत्ननिर्मित भवन हैं, जिनकी रक्षामें कई लाख गोपियाँ नियुक्त हैं। वहाँ रत्नमय प्रदीप प्रकाश देते हैं। प्रत्येक भवनमें रत्ननिर्मित शय्या बिछी हुई है। नाना प्रकारकी भोगसामग्री संचित है। रासमण्डलके सब ओर मधुकी सैकड़ों बावलियाँ हैं। वहाँ अमृतकी भी बावलियाँ हैं और इच्छानुसार भोगके सभी साधन उपलब्ध हैं। गोलोकमें कितने गृह हैं, यह कौन बता सकता है? वहाँ केवल राधाका जो सुन्दर, रमणीय एवं उत्तम निवास-मन्दिर है, वह बहुमूल्य रत्ननिर्मित तीन करोड़ भव्य भवनोंसे शोभित है। जिनकी कीमत नहीं आँकी जा सकती, ऐसे रत्नोंद्वारा निर्मित चमकीले खम्भोंकी पंक्तियाँ उस राधाभवनको प्रकाशित करती हैं। वह भवन नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंद्वारा चित्रित है। अनेक श्वेत चामर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। माणिक्य और मोतियोंसे जटित, हीरेके हारोंसे अलंकृत तथा रत्नमय प्रदीपोंसे प्रकाशित राधामन्दिर रत्नोंकी बनी हुई सीढ़ियोंसे अत्यन्त सुन्दर जान पड़ता है। बहुमूल्य रत्नोंके पात्र और शय्याओंकी श्रेणियाँ उस भवनकी शोभा बढ़ाती हैं। तीन खाइयों, तीन दुर्गम द्वारों और सोलह कक्षाओंसे युक्त राधाभवनके प्रत्येक द्वारपर और भीतर नियुक्त हुई सोलह लाख गोपियाँ इधर-उधर घूमती रहती हैं। उन सबके शरीरपर अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र शोभा पाते हैं। वे रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत हैं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान उद्भासित होती है। वे शत-शत चन्द्रमाओंकी मनोरम आभासे सम्पन्न हैं। राधिकाके किंकर भी ऐसे ही और इतने ही हैं। इन सबसे भरा हुआ उस भवनका अन्तःपुर बड़ा सुन्दर लगता है। उस भवनका आँगन बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित है। वह राधाभवन अत्यन्त मनोहर, अमूल्य रत्नमय खम्भोंके समुदायसे सुशोभित, फल-पल्लवसंयुक्त, रत्ननिर्मित मङ्गल- कलशोंसे अलंकृत और रत्नमयी वेदिकाओंसे विभूषित है। सुन्दर एवं बहुमूल्य रत्नमय दर्पण उसकी शोभा बढ़ाते हैं। अमूल्य रत्नोंसे निर्मित वह सुन्दर सदन सब भवनोंमें श्रेष्ठ है। वहाँ श्रीराधारानी रत्नमय सिंहासनपर विराजमान होती हैं। लाखों गोपियाँ उनकी सेवामें रहती हैं। वे करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न हैं। श्वेत चम्पाके समान उनकी गौर कान्ति है। वे बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित आभूषणोंसे विभूषित हैं। अमूल्य रत्नजटित वस्त्र पहने, बायें हाथमें रत्नमय दर्पण तथा दाहिनेमें सुन्दर रत्नमय कमल धारण करती हैं। उनके ललाटमें अनारके फूलकी भाँति लाल और अत्यन्त मनोहर सिन्दूर शोभित होता है। उसके साथ ही कस्तूरी और चन्दनके सुन्दर बिन्दु भी भालदेशका सौन्दर्य बढ़ाते हैं। वे सिरपर बालोंका चूड़ा धारण करती हैं, जो मालतीकी मालासे अलंकृत होता है। ऐसी राधा गोलोकमें गोपियोंद्वारा सेवित होती हैं। उनकी सेवामें रहनेवाली गोपियाँ भी
५७- सुस्वप्न-दर्शनके फलका विचार
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७१
उन्हींके समान हैं। वे हाथमें श्वेत चँवर लिये रहती हैं और बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित आभूषणोंसे विभूषित होती हैं। समस्त देवियोंमें श्रेष्ठ वे राधा ही मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। वे सुदामके शापसे इस समय भूतलपर वृषभानुनन्दिनीके रूपमें अवतीर्ण हुई हैं। मेरे साथ उनका अब सौ वर्षोंतक वियोग रहेगा। पिताजी! इन्हीं सौ वर्षोंकी अवधिमें मैं भूतलका भार उतारूँगा। तदनन्तर निश्चय ही श्रीराधा, तुम, माता यशोदा, गोप, गोपीगण, वृषभानुजी, उनकी पत्नी कलावती तथा अन्य बान्धवजनोंके साथ मैं गोलोकको चलूँगा। बाबा! यही बात तुम प्रसन्नतापूर्वक मैया यशोदासे भी कह देना। महाभाग! शोक छोड़ो और व्रजवासियोंके साथ व्रजको लौट जाओ। मैं सबका आत्मा और साक्षी हूँ। सम्पूर्ण जीवधारियोंके भीतर रहकर भी उनसे निर्लिप्त हूँ। जीव मेरा प्रतिबिम्ब है; यही सर्वसम्मत सिद्धान्त है। प्रकृति मेरा ही विकार है अर्थात् वह प्रकृति भी मैं ही हूँ। जैसे दूधमें धवलता होती है। दूध और धवलतामें कभी भेद नहीं होता। जैसे जलमें शीतलता, अग्निमें दाहिका शक्ति, आकाशमें शब्द, भूमिमें गन्ध, चन्द्रमामें शोभा, सूर्यमें प्रभा और जीवमें आत्मा है; उसी प्रकार राधाके साथ मुझको अभिन्न समझो। तुम राधाको साधारण गोपी और मुझे अपना पुत्र न जानो। मैं सबका उत्पादक परमेश्वर हूँ और राधा ईश्वरी प्रकृति है*।
बाबा! मेरी सुखदायिनी विभूतिका वर्णन सुनो, जिसे पहले मैंने अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीको बताया था। मैं देवताओंमें श्रीकृष्ण हूँ। गोलोकमें स्वयं ही द्विभुजरूपसे निवास करता हूँ और वैकुण्ठमें चतुर्भुज विष्णुरूपसे। शिवलोकमें मैं ही शिव हूँ। ब्रह्मलोकमें ब्रह्मा हूँ। तेजस्वियोंमें सूर्य हूँ। पवित्रोंमें अग्नि हूँ। द्रव-पदार्थोंमें जल हूँ। इन्द्रियोंमें मन हूँ। शीघ्रगामियोंमें समीर (वायु) हूँ। दण्ड प्रदान करनेवालोंमें मैं यम हूँ। कालगणना करनेवालोंमें काल हूँ। अक्षरोंमें अकार हूँ। सामोंमें साम हूँ, चौदह इन्द्रोंमें इन्द्र हूँ। धनियोंमें कुबेर हूँ। दिक्पालोंमें ईशान हूँ। व्यापक तत्त्वोंमें आकाश हूँ। जीवोंमें सबका अन्तरात्मा हूँ। आश्रमोंमें ब्रह्मतत्त्वज्ञ संन्यास आश्रम हूँ। धनोंमें मैं सर्वदुर्लभ बहुमूल्य रत्न हूँ। तैजस पदार्थोंमें सुवर्ण हूँ। मणियोंमें कौस्तुभ हूँ। पूज्य प्रतिमाओंमें शालग्राम तथा पत्तोंमें तुलसीदल हूँ। फूलोंमें पारिजात, तीर्थोंमें पुष्कर, वैष्णवोंमें कुमार, योगीन्द्रोंमें गणेश, सेनापतियोंमें स्कन्द, धनुर्धरोंमें लक्ष्मण, राजेन्द्रोंमें राम, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, मासोंमें मार्गशीर्ष, ऋतुओंमें वसन्त, दिनोंमें रविवार, तिथियोंमें एकादशी, सहनशीलोंमें पृथ्वी, बान्धवोंमें माता, भक्ष्य वस्तुओंमें अमृत, गौसे प्रकट होनेवाले खाद्यपदार्थोंमें घी, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, कामधेनुओंमें सुरभि, नदियोंमें पापनाशिनी गङ्गा, पण्डितोंमें पाण्डित्यपूर्ण वाणी, मन्त्रोंमें प्रणव, विद्याओंमें उनका बीजरूप तथा खेतसे पैदा होनेवाली वस्तुओंमें धान्य हूँ। फलवान् वृक्षोंमें पीपल, गुरुओंमें मन्त्रदाता गुरु, प्रजापतियोंमें कश्यप, पक्षियोंमें गरुड़, नागोंमें अनन्त (शेषनाग), नरोंमें नरेश, ब्रह्मर्षियोंमें भृगु, देवर्षियोंमें नारद, राजर्षियोंमें जनक, महर्षियोंमें शुक, गन्धर्वोंमें चित्ररथ, सिद्धोंमें कपिलमुनि, बुद्धिमानोंमें बृहस्पति, कवियोंमें शुक्राचार्य, ग्रहोंमें शनि, शिल्पियोंमें विश्वकर्मा, मृगोंमें मृगेन्द्र, वृषभोंमें शिववाहन नन्दी, गजराजोंमें ऐरावत, छन्दोंमें गायत्री, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें वेद, जलचरोंमें उनका राजा वरुण, अप्सराओंमें उर्वशी, समुद्रोंमें जलनिधि, पर्वतोंमें सुमेरु, रत्नवान् शैलोंमें हिमालय, प्रकृतियोंमें देवी पार्वती तथा देवियोंमें लक्ष्मी हूँ।
मैं नारियोंमें शतरूपा, अपनी प्रियतमाओंमें
* यथा जीवस्तथात्मानं तथैव राधया सह। त्यज त्वं गोपिकाबुद्धिं राधायां मयि पुत्रताम्॥
अहं सर्वस्य प्रभवः सा च प्रकृतीश्वरी। (७३। ५० १/२)
| ६७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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राधिका तथा साध्वी स्त्रियोंमें निश्चय ही वेदमाता सावित्री हूँ। दैत्योंमें प्रह्लाद, बलिष्ठोंमें बलि, ज्ञानियोंमें भगवान् नारायण ऋषि, वानरोंमें हनुमान्, पाण्डवोंमें अर्जुन, नागकन्याओंमें मनसा, वसुओंमें द्रोण, बादलोंमें द्रोण, जम्बूद्वीपके नौ खण्डोंमें भारतवर्ष, कामियोंमें कामदेव, कामुकी स्त्रियोंमें रम्भा और लोकोंमें गोलोक हूँ, जो समस्त लोकोंमें उत्तम और सबसे परे है। मातृकाओंमें शान्ति, सुन्दरियोंमें रति, साक्षियोंमें धर्म, दिनके क्षणोंमें संध्या, देवताओंमें इन्द्र, राक्षसोंमें विभीषण, रुद्रोंमें कालाग्निरुद्र, भैरवोंमें संहारभैरव, शङ्खोंमें पाञ्चजन्य, अङ्गोंमें मस्तक, पुराणोंमें भागवत, इतिहासोंमें महाभारत, पाञ्चरात्रोंमें कपिल, मनुओंमें स्वायम्भुव, मुनियोंमें व्यासदेव, पितृपत्नियोंमें स्वधा, अग्निप्रियाओंमें स्वाहा, यज्ञोंमें राजसूय, यज्ञपत्नियोंमें दक्षिणा, अस्त्र-शस्त्रज्ञोंमें जमदग्निनन्दन महात्मा परशुराम, पौराणिकोंमें सूत, नीतिज्ञोंमें अङ्गिरा, व्रतोंमें विष्णुव्रत, बलोंमें दैवबल, ओषधियोंमें दूर्वा, तृणोंमें कुश, धर्मकर्मोंमें सत्य, स्नेहपात्रोंमें पुत्र, शत्रुओंमें व्याधि, व्याधियोंमें ज्वर, मेरी भक्तियोंमें दास्य-भक्ति, वरोंमें वर, आश्रमोंमें गृहस्थ, विवेकिय़ोंमें संन्यासी, शस्त्रोंमें सुदर्शन और शुभाशीर्वादोंमें कुशल हूँ।
ऐश्वर्योंमें महाज्ञान, सुखोंमें वैराग्य, प्रसन्नता प्रदान करनेवालोंमें मधुर वचन, दानोंमें आत्मदान, संचयोंमें धर्मकर्मका संचय, कर्मोंमें मेरा पूजन, कठोर कर्मोंमें तप, फलोंमें मोक्ष, अष्ट सिद्धियोंमें प्राकाम्य, पुरियोंमें काशी, नगरोंमें काञ्ची, देशोंमें वैष्णवोंका देश और समस्त स्थूल आधारोंमें मैं ही महान् विराट् हूँ। जगत्में जो अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ हैं; उनमें मैं परमाणु हूँ। वैद्योंमें अश्विनीकुमार, भेषजोंमें रसायन, मन्त्रवेत्ताओंमें धन्वन्तरि, विनाशकारी दुर्गुणोंमें विषाद, रागोंमें मेघ-मल्लार, रागिनियोंमें कामोद, मेरे पार्षदोंमें श्रीदामा, मेरे बन्धुओंमें उद्धव, पशुजीवोंमें गौ, वनोंमें चन्दन, पवित्रोंमें तीर्थ और निःशंकोंमें वैष्णव हूँ; वैष्णवसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है। विशेषतः वह जो मेरे मन्त्रकी उपासना करता है, सर्वश्रेष्ठ है। मैं वृक्षोंमें अंकुर तथा सम्पूर्ण वस्तुओंमें उनका आकार हूँ। समस्त भूतोंमें मेरा निवास है, मुझमें सारा जगत् फैला हुआ है। जैसे वृक्षमें फल और फलोंमें वृक्षका अंकुर है, उसी प्रकार मैं सबका कारणरूप हूँ; मेरा कारण दूसरा नहीं है। मैं सबका ईश्वर हूँ; मेरा ईश्वर दूसरा कोई नहीं है। मैं कारणका भी कारण हूँ। मनीषी पुरुष मुझे ही सबके समस्त बीजोंका परम कारण बताते हैं। मेरी मायासे मोहित हुए पापीजन मुझे नहीं जान पाते हैं। मैं सब जन्तुओंका आत्मा हूँ; परंतु दुर्बुद्धि और दुर्भाग्यसे वञ्चित पापग्रस्त जीव मुझ अपने आत्माका भी आदर नहीं करते। जहाँ मैं हूँ, उसी शरीरमें सब शक्तियाँ और भूख-प्यास आदि हैं; मेरे निकलते ही सब उसी तरह निकल जाते हैं, जैसे राजाके पीछे-पीछे उसके सेवक। व्रजराज नन्दजी! मेरे बाबा! इस ज्ञानको हृदयमें धारण करके व्रजको जाओ और राधा तथा यशोदा मैयाको इसका उपदेश दो।
इस ज्ञानको भलीभाँति समझकर नन्दजी अपने अनुगामी व्रजवासियोंके साथ व्रजको लौट गये। वहाँ जाकर उन्होंने उन दोनों नारीशिरोमणियोंसे उस ज्ञानकी चर्चा की। नारद! वह महाज्ञान पाकर सब लोगोंने अपना शोक त्याग दिया। श्रीकृष्ण यद्यपि निर्लिप्त हैं, तथापि मायाके स्वामी हैं; इसलिये मायासे अनुरक्त जान पड़ते हैं। यशोदाजीने पुनः नन्दरायजीको माधवके पास भेजा। उनकी प्रेरणासे फिर आकर नन्दजीने ब्रह्माजीके द्वारा किये गये सामवेदोक्त स्तोत्रसे परमानन्दस्वरूप नन्दनन्दन माधवकी स्तुति की। तत्पश्चात् वे पुत्रके सामने खड़े हो बार-बार रोदन करने लगे। (अध्याय ७३)
५८- श्रीकृष्णके द्वारा नन्दको आध्यात्मिक ज्ञानका उपदेश, बाईस प्रकारकी सिद्धि, सिद्धमन्त्र तथा अदर्शनीय वस्तुओंका वर्णन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७३
श्रीकृष्णद्वारा नन्दजीको ज्ञानोपदेश, लोकनीति, लोकमर्यादा तथा लौकिक सदाचारसे सम्बन्ध रखनेवाले विविध विधि-निषेधोंका वर्णन, कुसङ्ग और कुलटाकी निन्दा, सती और भक्तकी प्रशंसा, शिवलिङ्ग-पूजन एवं शिवकी महत्ता
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! भगवान् श्रीकृष्ण परमानन्दमय परिपूर्णतम प्रभु हैं। भक्तोंपर अनुग्रहके लिये व्याकुल रहनेवाले परम परमात्मा हैं। पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण हुए वे भगवान् निर्गुण, प्रकृतिसे परे तथा परात्पर हैं। ब्रह्मा, शिव और शेष भी उनके चरणोंकी वन्दना करते हैं। नन्दजीकी स्तुति सुनकर वे जगदीश्वर बहुत संतुष्ट हुए। नन्द बाबा विरहज्वरसे कातर हो गोकुलसे उनके पास आये थे।
श्रीभगवान्ने कहा—'बाबा! शोक और भ्रमको छोड़ो तथा व्रजको लौट जाओ। वहाँ जाकर सबको आनन्दित करो। मैं जो परम सत्य ज्ञान बता रहा हूँ, इसे सुनो। यह ज्ञान शोकग्रन्थिका उच्छेद करनेवाला है।'
यों कह पञ्चभूतोंका वर्णन करते हुए श्रीहरिने नन्द बाबाको उत्तम ज्ञानका उपदेश दिया और अन्तमें कहा—'तात! मेरे भक्तोंका कहीं अमङ्गल नहीं होता। मेरा सुदर्शनचक्र प्रतिदिन उनकी सब ओरसे रक्षा करता है। मेरी यह बात यशोदा मैयासे, गोपियोंसे और गोपगणोंसे कहो। उन सबके साथ शोकको त्याग दो। अच्छा अब घरको जाओ।' यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण यादवोंकी सभामें चुप हो गये। तब आनन्दमग्न नन्दने पुनः उनसे पूछा।
नन्द बोले—परमानन्दस्वरूप गोविन्द! मैं मूढ़ हूँ और तुम वेदोंके उत्पादक हो। मुझे ऐसा लौकिक ज्ञान बताओ, जिससे तुम्हारे चरणोंको प्राप्त कर सकूँ।
नन्दजीकी यह बात सुनकर सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें श्रुतिदुर्लभ आह्निक-कृत्यसम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया।
श्रीभगवान् बोले—तात! मैं तुम्हें वह परम अद्भुत ज्ञान प्रदान करता हूँ, जो वेदोंमें अत्यन्त गोपनीय और पुराणोंमें अत्यन्त दुर्लभ है, कुलटा स्त्रियाँ मोक्ष-मार्गके द्वारको ढकनेके लिये अर्गलाएँ हैं, भ्रम और मायाकी सुन्दर भूमियाँ हैं; उनपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। व्रजराज! असाध्वी स्त्रियाँ हरिभक्तिके विरुद्ध होती हैं। वे नाशकी बीजरूपा हैं। उनपर विश्वास करना कदापि उचित नहीं है। प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर रातमें पहने हुए कपड़ोंको त्याग दे और हृदय-कमलमें इष्टदेवका तथा ब्रह्मरन्ध्रमें परम गुरुका चिन्तन करे। मन-ही-मन उनका चिन्तन करके प्रातःकालिक कृत्य पूर्ण करनेके पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष निश्चय ही निर्मल जलमें स्नान करे। कर्मका उच्छेद करनेवाला भक्त कोई कामना या संकल्प नहीं करता। वह स्नान करके भगवान्का स्मरण करता और संध्या करके घरको लौट जाता है। दरवाजेपर दोनों पैर धोकर वह घरमें प्रवेश करे और धुले हुए दो वस्त्र (धोती-चादर) धारण करके मोक्षके कारणभूत मुझ परमात्माका ही पूजन करे। शालग्राम, मणि, यन्त्र, प्रतिमा, जल, ब्राह्मण, गौ तथा गुरुमें सामान्यरूपसे मेरी स्थिति मानकर इनमें कहीं भी मेरी पूजा करनी चाहिये। कलशमें, अष्टदल कमलमें तथा चन्दननिर्मित पात्रमें भी मेरी पूजा की जा सकती है। सर्वत्र पूजनके समय आवाहन करे; परंतु शालग्राम-शिलामें और जलमें पूजा करनी हो तो आवाहन न करे। मन्त्रके अनुरूप ध्यानका श्लोक पढ़कर मेरा ध्यान करनेके पश्चात् व्रती पुरुष षोडशोपचारकी
६७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सामग्री क्रमशः अर्पित करे और भक्तिभावसे मूलमन्त्रद्वारा पूजा करे। मेरे साथ ही प्रथम आवरणमें श्रीदामा, सुदामा, वसुदामा, वीरभानु और शूरभानु—इन पाँच गोपोंका पूजन करे। तत्पश्चात् सुनन्द, नन्द, कुमुद और सुदर्शन—इन पार्षदोंका; लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, राधा, गङ्गा और पृथ्वी—इन देवियोंका; गुरु, तुलसी, शिव, कार्तिकेय और विनायकका तथा नवग्रहों और दस दिक्पालोंका सब दिशाओंमें विद्वान् पुरुष पूजन करे। सबसे पहले विघ्न-निवारणके लिये गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती—इन छः देवताओंका पूजन करना चाहिये। ये वेदोक्त देवता कर्मबन्धनको काटनेवाले और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। विघ्नोंके नाशके लिये गणेशका, रोगनिवारणके लिये सूर्यका, अभीष्टकी प्राप्ति तथा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये अग्निका, मोक्षके निमित्त विष्णुका, ज्ञानदानके लिये शिवका तथा बुद्धि और मुक्तिके लिये विद्वान् पुरुष पार्वतीका पूजन करे। तीन बार पुष्पाञ्जलि देकर उन-उन देवताओंके स्तोत्र और कवचका पाठ करे। गुरुका वन्दन और पूजन करनेके पश्चात् देवताको प्रणाम करे। नित्यकर्म करके देवपूजनके पश्चात् सुखपूर्वक यथाप्राप्त कार्य करनेका विधान है। यह नित्यकर्म वेदवर्णित है। इसका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषकी आत्मशुद्धि होती है।
बुद्धिमान् पुरुष मल-मूत्र, गुह्याङ्ग, स्त्रियोंके अङ्ग, कटाक्ष और हास्य आदि न देखे; क्योंकि ये सब विनाशके बीज हैं। उनका रूप सदा ही विपत्तिका कारण है। दिनमें अपनी स्त्रीके साथ भी समागम न करे; क्योंकि दिनमें स्त्री-सहवास करनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है; नेत्रों और कानोंमें पीड़ा होती है। जब आकाशमें एक ही तारा उगा हो, उस समय उधर नहीं देखना चाहिये; अन्यथा रोगोंका भय प्राप्त होता है। यदि उस एक तारेको देख ले तो देवताओंका दर्शन और भगवान्का स्मरण करके सात बार नारदजीका नाम जपे। अस्तके समय सूर्य और चन्द्रमाको न देखे; क्योंकि उस समय उन्हें देखनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है। कृष्णपक्षमें खण्डित चन्द्रमाके उदयकालमें उसे न देखे; अन्यथा रोग होता है। जलमें सूर्य और चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब देखनेसे मनुष्यको शोककी प्राप्ति होती है। पराया मैथुन देखनेसे भाईका वियोग होता है; इसलिये उसे न देखे। पापीके साथ एक जगह सोना, बैठना, भोजन करना और घूमना-फिरना निषिद्ध है; क्योंकि वह सब नाशका लक्षण है। किसीके साथ बात करने, शरीरको छूने, सोने, बैठने और भोजन करनेसे उन दोनोंके पाप एक-दूसरेमें अवश्य संचरित होते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे तेलका बिन्दु पानीमें पड़नेसे फैल जाता है। हिंसक जन्तुके समीप न जाय; क्योंकि उसके पास जाना दुःखका कारण होता है। दुष्टके साथ मेल-जोल न बढ़ाये; क्योंकि वह शोकप्रद होता है। ब्राह्मणों, गौओं तथा विशेषतः वैष्णवोंकी हिंसा न करे; उनकी हिंसा सर्वनाशका कारण बन जाती है। देवता, देवपूजक, ब्राह्मण और वैष्णवोंके धनका अपहरण न करे; क्योंकि वह धन सर्वनाशका कारण होता है। जो अपने या दूसरेके द्वारा दी हुई ब्राह्मणवृत्तिका अपहरण करता है; वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। ब्राह्मणको देनेके लिये जो दक्षिणा संकल्प की जाती है, वह यदि तत्काल न दे दी जाय तो एक रात बीतनेपर दूनी, एक मास बीतनेपर सौगुनी और दो मास बीतनेपर वह सहस्रगुनी हो जाती है। एक वर्ष बीत जाय तो दाता नरकमें पड़ता है। यदि दाता न दे और मूर्ख गृहीता न माँगे तो दोनों नरकमें पड़ते हैं। दाता रोगी होता है। ब्राह्मणोंकी हिंसा करनेसे अवश्य ही वंशकी हानि होती है। हिंसक मनुष्य धन और लक्ष्मीको खोकर भिखमंगा हो जाता है। देवता और ब्राह्मणको देखकर जो
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७५
मस्तक नहीं झुकाता, वह शोकका भागी होता है। जो गुरुके प्रति भक्तिभाव नहीं रखता, उसे रौरव नरकका कष्ट भोगना पड़ता है।
जो दुराचारिणी मूढा स्त्री साक्षात् श्रीहरिस्वरूप अपने पतिकी ओर नहीं देखती, उलटे उसे डाँट बताती है; वह निश्चय ही कुम्भीपाकमें जाती है। वाणीद्वारा डाँट बतानेके कारण वह कौएकी योनिमें जन्म लेती है। हिंसा करनेसे सूकरी होती है। क्रोध करनेसे सर्पिणी और दर्प दिखानेसे गर्दभी होती है। कुवाक्य बोलनेसे कुक्कुरी और विष देनेसे अन्धी होती है। पतिव्रता स्त्री निश्चय ही पतिके साथ वैकुण्ठधाममें जाती है। जो मूढ़ शिव, पार्वती, गणेश, सूर्य, ब्राह्मण, वैष्णव तथा विष्णुकी निन्दा करता है; वह महारौरव नामक नरकमें गिरता है। पिता, माता, पुत्र, सती पत्नी, गुरु, अनाथा स्त्री, बहिन और पुत्रीकी निन्दा करके मनुष्य नरकगामी होता है। जो क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ब्राह्मणोंके प्रति भक्तिभावसे रहित हैं और भगवद्भक्तिसे भी दूर हैं; वे निश्चय ही नरकमें पकाये जाते हैं। यही दशा पतिभक्तिसे शून्य नराधमा स्त्रियोंकी होती है।
जो ब्राह्मण शालग्रामका चरणामृत पीते और भगवान् विष्णुका प्रसाद खाते हैं वे तीर्थोंको भी पवित्र कर देते हैं। अपनी सौ पीढ़ियोंको तारते और पृथ्वीको भी उबारते हैं। जो भगवान् विष्णुका प्रसाद ग्रहण करता और मछली-मांस नहीं खाता है; वह निश्चय ही पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जो एकादशी और कृष्णजन्माष्टमीका व्रत करते हैं, वे सौ जन्मोंके किये हुए पापसे मुक्त हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं है। बाल्यावस्था, कुमारावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्थामें भी जो-जो पाप बन गये हैं, वे सब भस्म हो जाते हैं। रोगी, अत्यन्त वृद्ध और बालकके लिये उपवासका नियम नहीं है। भक्त ब्राह्मणको द्विगुण भोजनका दान करके दाता शुद्ध हो जाता है। जो उपवासमें समर्थ होकर भी शिवरात्रि तथा श्रीरामनवमीके दिन भोजन करता है; वह महारौरव नरकमें पड़ता है। अमावास्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमीको स्त्री, तैल तथा मांसका सेवन करनेसे मनुष्य चाण्डाल-योनिमें जन्म लेता है। रविवारको काँस्यपात्रमें भोजन न करे। उस दिन मसूरकी दाल, अदरख और लाल रंगका शाक भी न खाय। व्रजेश्वर ! जो ब्राह्मण रजस्वला और वेश्याके हाथका तथा मदिरामिश्रित अन्न खा लेता है; वह निश्चय ही मलभोजी जन्तु होता है। वह उस दिन जो सत्कर्म करता है, उसका फल उसे नहीं मिलता। वह सदा अपवित्र रहता है। उसका अशौच उसके मरनेके बाद ही समाप्त होता है। जिस स्त्रीने अपने जीवनमें चार पुरुषोंके साथ समागम कर लिया; उसे वेश्या समझना चाहिये। वह देवताओं और पितरोंके लिये भोजन बनानेकी अधिकारिणी नहीं है।
जो प्रातःकाल और सायंकालकी संध्योपासना नहीं करता, उसका समस्त द्विजोचित कर्मोंसे शूद्रकी भाँति बहिष्कार कर देना चाहिये। संध्याहीन द्विज नित्य अपवित्र तथा समस्त कर्मोंके लिये अयोग्य होता है। वह दिनमें जो सत्कर्म करता है; उसका फल उसे नहीं मिलता। राममन्त्रसे हीन ब्राह्मण नरकमें पड़ता है। नदीके बीचमें, गड्ढेमें, वृक्षकी जड़में, पानीके निकट, देवताके समीप और खेतीसे भरी हुई भूमिपर समझदार मनुष्य मलत्याग न करे। बाँबीसे निकली हुई, चूहेकी खोदी हुई, पानीके भीतरसे निकाली हुई, शौचसे बची हुई और घरके लीपनेसे प्राप्त हुई मिट्टीको शौचके काममें न ले। जिस मिट्टीमें चींटी आदि प्राणी हों, उसे भी शौचके काममें न ले। व्रजेश्वर ! हल चलानेसे उखड़ी हुई, पौधोंके थालेसे निकाली हुई, जिस खेतमें खेती लहलहा रही हो उसकी मिट्टी, वृक्षकी जड़से खोदकर ली हुई मिट्टी तथा नदीके पेटेसे निकाली हुई मृत्तिका—इन सबको
५९- दुःस्वप्न, उनके फल तथा उनकी शान्तिके उपायका वर्णन
| ६७६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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शौचके काममें त्याग देना चाहिये। कुम्हड़ा काटने या फोड़नेवाली स्त्री और दीपक बुझानेवाले पुरुष कई जन्मोंतक रोगी होते हैं और जन्म-जन्ममें दरिद्र रहते हैं। दीपक, शिवलिङ्ग, शालग्राम, मणि, देवप्रतिमा, यज्ञोपवीत, सोना और शङ्ख—इन सबको भूमिपर न रखे। दिनमें और दोनों संध्याओंके समय जो नींद लेता या स्त्री-सहवास करता है, वह कई जन्मोंतक रोगी और दरिद्र होता है। मिट्टी, राख, गोबर—इसके पिण्डसे या बालूसे भी शिवलिङ्गका निर्माण करके एक बार उसकी पूजा कर लेनेवाला पुरुष सौ कल्पोंतक स्वर्गमें निवास करता है। सहस्र शिवलिङ्गोंके पूजनसे मनुष्यको मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है और जिसने एक लाख शिवलिङ्गोंकी पूजा कर ली है, वह निश्चय ही शिवत्वको प्राप्त होता है। जो ब्राह्मण शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह जीवन्मुक्त होता है और जो शिवपूजासे रहित है, वह ब्राह्मण नरकगामी होता है। जो मनुष्य मेरे द्वारा पूजित प्रियतम शिवकी निन्दा करते हैं, वे सौ ब्रह्माओंकी आयुपर्यन्त नरककी यातना भोगते हैं। समस्त प्रियजनोंमें ब्राह्मण मुझे अधिक प्रिय हैं। ब्राह्मणसे अधिक शंकर प्रिय हैं। मेरे लिये शंकरसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। 'महादेव, महादेव, महादेव'—इस प्रकार बोलनेवाले पुरुषके पीछे-पीछे मैं नामश्रवणके लोभसे फिरता रहता हूँ। शिव नाम सुनकर मुझे बड़ी तृप्ति होती है। मेरा मन भक्तके पास रहता है। प्राण राधामय हैं, आत्मा शंकर हैं। शंकर मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली आद्या नारायणी शक्ति है, जिसके द्वारा मैं सृष्टि करता हूँ, जिससे ब्रह्मा आदि देवता उत्पन्न होते हैं, जिसका आश्रय लेनेसे जगत् विजयी होता है, जिससे सृष्टि चलती है और जिसके बिना संसारका अस्तित्व ही नहीं रह सकता; वह शक्ति मैंने शिवको अर्पित की है।*
(अध्याय ७४-७५)
जिनके दर्शनसे पुण्यलाभ और जिनके अनुष्ठानसे पुनर्जन्मका निवारण होता है, उन वस्तुओं और सत्कर्मोंका वर्णन तथा विविध दानोंके पुण्यफलका कथन
श्रीनन्दने कहा—सर्वेश्वर! जिनके दर्शनसे पुण्य और जिन्हें देखनेसे पाप होता है, उन सबका परिचय दो। यह सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है।
श्रीभगवान् बोले—तात! उत्तम ब्राह्मण, तीर्थ, वैष्णव, देवप्रतिमा, सूर्यदेव, सती स्त्री, संन्यासी, यति, ब्रह्मचारी, गौ, अग्नि, गुरु, गजराज, सिंह, श्वेत अश्व, शुक, कोकिल, खञ्जरीट, हंस, मोर, नीलकण्ठ, शङ्खपक्षी, बछड़ेसहित गाय, पीपलवृक्ष, पति-पुत्रवाली नारी, तीर्थयात्री मनुष्य, प्रदीप, सुवर्ण, मणि, मोती, हीरा, माणिक्य, तुलसी, श्वेत पुष्प, फल, श्वेत धान्य, घी, दही, मधु, भरा हुआ घड़ा, लावा, दर्पण, जल, श्वेत पुष्पोंकी माला, गोरोचन, कपूर, चाँदी, तालाब, फूलोंसे भरी हुई वाटिका, शुक्लपक्षके चन्द्रमा, अमृत, चन्दन, कस्तूरी, कुङ्कुम, पताका, अक्षयवट,
*महादेव महादेव महादेवेति वादिनः। पश्चाद् यामि च संत्रस्तो नामश्रवणलोभतः॥
मनो मे भक्तमूले च प्राणा राधात्मिका ध्रुवम्। आत्मा मे शङ्करस्थानं शिवः प्राणाधिकश्च यः॥
आद्या नारायणी शक्तिः सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी। करोमि च यया सृष्टिं यया ब्रह्मादिदेवताः॥
यया जयति विश्वं च यया सृष्टिः प्रजायते। यया विना जगन्नास्ति मया दत्ता शिवाय सा॥
(७५। ९०-९३)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७७ देववृक्ष, देवालय, देवसम्बन्धी जलाशय, देवताके आश्रित भक्त, देवघट, सुगन्धित वायु, शङ्ख, दुन्दुभि, सीपी, मूँगा, रजत, स्फटिक मणि, कुशकी जड़, गङ्गाजीकी मिट्टी, कुशा, ताँबा, पुराणकी पुस्तक, शुद्ध और बीजमन्त्रसहित विष्णुका यन्त्र, चिकनी दूब, अक्षत, रत्न, तपस्वी, सिद्धमन्त्र, समुद्र, कृष्णसार मृग, यज्ञ, महान् उत्सव, गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोधूलि, गोशाला, गोखुर, पकी हुई खेतीसे भरा खेत, सुन्दर पद्मिनी, श्यामा, सुन्दर वेष, वस्त्र एवं दिव्य आभूषणोंसे विभूषित सौभाग्यवती स्त्री, क्षेमकरी, गन्ध, दूर्वा, अक्षत और तण्डुल, सिद्धान्न एवं उत्तम अन्न- इन सबके दर्शनसे पुण्यलाभ होता है। कार्तिककी पूर्णिमाको राधिकाजीकी शुभ प्रतिमाका पूजन, दर्शन और वन्दन करके मनुष्य जन्मके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार आश्विनमासके शुक्लपक्षकी अष्टमीको हिंगुलामें श्रीदुर्गाजीकी प्रतिमाका तथा शिवरात्रिको काशीमें विश्वनाथजीका दर्शन, उपवास और पूजन करनेसे पुनर्जन्मके कष्टका निवारण हो जाता है। यदि भक्त पुरुष जन्माष्टमीके दिन मुझ बिन्दुमाधवका दर्शन, वन्दन और पूजन कर ले; पौषमासके शुक्लपक्षकी रात्रिमें जहाँ कहीं भी पद्माकी प्रतिमाका दर्शन प्राप्त कर ले; काशीमें एकादशीको उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल स्नानकर अन्नपूर्णाजीका दर्शन कर ले; चैत्रमासकी चतुर्दशीको पुण्यदायक कामरूप देशमें भद्रकाली देवीका दर्शन और वन्दन कर ले; अयोध्यामें श्रीरामनावमीके दिन मुझ रामका पूजन, वन्दन और दर्शन कर ले तथा गयाके विष्णुपदतीर्थमें जो पिण्ड-दान एवं विष्णुका पूजन कर ले तो वह पुरुष अपने पुनर्जन्मके कष्टका निवारण कर लेता है। साथ ही गयातीर्थके श्राद्धसे वह पितरोंका भी उद्धार करता है। यदि प्रयागमें मुण्डन करके और नैमिषारण्यमें उपवास करके मनुष्य दान करे; पुष्कर अथवा बदरिकाश्रम- तीर्थमें उपवास, स्नान, पूजन एवं विग्रहका दर्शन कर ले; बदरिकाश्रममें सिद्धि प्राप्त करके बेरका फल खाय और मेरी प्रतिमाका दर्शन करे; पवित्र वृन्दावनमें झूलते हुए मुझ गोविन्दका दर्शन एवं पूजन करे; भाद्रपदमासमें मञ्चपर आसीन हुए मुझ मधुसूदनका जो भक्त दर्शन, पूजन एवं नमस्कार करे; कलियुगमें यदि मनुष्य रथयात्राके समय भक्तिभावसे रथारूढ़ जगन्नाथका दर्शन, पूजन एवं प्रणाम करे; उत्तरायणकी संक्रान्तिको प्रयागमें स्नान कर ले और वहीं मुझ वेणीमाधवका पूजन एवं नमन करे; कार्तिककी पूर्णिमाको उपवासपूर्वक मेरी शुभ प्रतिमाका दर्शन एवं पूजन कर ले; चन्द्रभागाके निकट माघकी अमावास्या एवं पूर्णिमाको राधासहित मुझ श्रीकृष्णका दर्शन और वन्दन कर ले तथा सेतुबन्धतीर्थमें आषाढ़की पूर्णिमाके दिन यदि कोई उपवासपूर्वक रामेश्वरके दर्शन एवं पूजनका सौभाग्य प्राप्त कर ले तो वह अपने पुनर्जन्मका खण्डन कर लेता है। रामेश्वरमें रातके समय गन्धर्व और किन्नर मनोहर गान करते हैं। साक्षात् माधव रामेश्वरको प्रणाम करनेके लिये वहाँ आते हैं। वहाँ साक्षात् रूपसे निवास करनेवाले सर्वेश्वर चन्द्रशेखरका दर्शन करके मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और अन्तमें श्रीहरिके धामको जाता है। जो उत्तरायणमें कोणार्कतीर्थके भीतर दीनानाथ भगवान् सूर्यका दर्शन एवं उपवासपूर्वक पूजन करता है; वह पुनर्जन्मके कष्टको नष्ट कर देता है। ऋषिगोष्ठ, सुवसन, कलविङ्क, युगन्धर, विस्यन्दक, राजकोष्ठ, नन्दक तथा पुष्पभद्रकतीर्थमें पार्वतीकी प्रतिमा तथा कार्तिकेय, गणेश, नन्दी एवं शंकरका दर्शन करके मनुष्य अपने जन्मको सफल बना लेता है। वहाँ उपवासपूर्वक पार्वती और शिवका दर्शन, पूजन तथा स्तवन करके जो दही खाकर पारणा करता है; उसका जन्म सफल हो जाता है। त्रिकूटपर, मणिभद्रतीर्थमें तथा पश्चिम समुद्रके समीप जो उपवासपूर्वक मेरा दर्शन करके दही खाता है; वह मोक्षका भागी होता है। जो मेरी
६७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण तथा पार्वतीकी प्रतिमाओंमें जीव-चैतन्यका न्यास करके उनका पूजन करता है, जो शिव और दुर्गाके तथा विशेषतः मेरे लिये मन्दिरका निर्माण करता और उन मन्दिरोंमें शिव आदिकी प्रतिमाको स्थापित करता है; वह अपने जन्मको सफल बना लेता है। जो पुष्पोद्यान, शंकु, सेतु, खात (कुआँ आदि) और सरोवरका निर्माण तथा ब्राह्मणको स्थान एवं वृत्ति देकर उसकी स्थापना करता है; उसका जन्म सफल हो जाता है। पिताजी ! ब्राह्मणकी स्थापना करनेसे जो फल होता है; उसे वेद, पुराण, संत, मुनि और देवता भी नहीं जानते। धरतीपर जो धूलिके कण हैं, वे गिने जा सकते हैं; वर्षाकी बूँदें भी गिनी जा सकती हैं; परंतु ब्राह्मणको वृत्ति और स्थान देकर बसा देनेमें जो पुण्यफल होता है; उसकी गणना विधाता भी नहीं कर सकते। ब्राह्मणको जीविका देकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है, सुस्थिर सम्पत्ति पाता है और परलोकमें चारों प्रकारकी मुक्तियोंका भागी होता है। वह मेरी दास्य-भक्तिको पा लेता और वैकुण्ठमें चिरकालतक आनन्द भोगता है। मुझ परमात्माकी तरह उसका भी कभी वहाँसे पतन नहीं होता। जो उत्तम, अनाथ, दरिद्र और पूर्णतः पण्डित ब्राह्मणको सुपात्र देख उसका विवाह कर देता है; उसे निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति होती है। छत्र, चरणपादुका, शालग्राम तथा कन्याके दानका फल पृथ्वीदानके समान माना गया है। हाथीका दान करनेपर उसके रोएँके बराबर वर्षोंतक स्वर्गकी प्राप्ति होती है; यह शास्त्रमें प्रसिद्ध है। गजराजके दानका फल इससे चौगुना माना गया है। श्वेत घोड़ेके दानका पुण्य गजदानसे आधा बताया गया है और अन्य घोड़ोंके दानका फल श्वेत घोड़ेके दानकी अपेक्षा आधा कहा गया है। काली गौके दानका फल गजदानके ही तुल्य है। धेनुदानका फल भी वैसा ही है। सामान्य गोदानका फल उससे आधा कहा गया है। बछड़ा व्यायी हुई गौके दानसे भूमिदानका फल प्राप्त होता है। ब्राह्मणको भोजन कराया जाय तो उससे सम्पूर्ण दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। अन्नदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा। उसमें पात्रकी परीक्षा आवश्यक नहीं है - अन्नदान पानेके सभी अधिकारी हैं। अन्नदानके लिये कहीं किसी कालका भी नियम नहीं है - भूखेको सदा ही अन्न दिया जा सकता है। अन्नदानसे दाताको सतत पुण्यफलकी प्राप्ति होती है और उसे लेनेवाले पात्र (व्यक्ति)-को भी प्रतिग्रहका दोष नहीं लगता। भूतलपर अन्नदान धन्य है, जो वैकुण्ठकी प्राप्तिका हेतु होता है*। जो दरिद्र एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको वस्त्र देता है, उसे शुभ फलकी प्राप्ति होती है। लोहेके दीपमें सोनेकी बत्ती रखकर जो परमात्मा श्रीहरिके लिये घृतसहित उस दीपका दान करता है; वह मेरे धाममें जाता है। फूलकी माला, फल, शय्या, गृह और अन्नके दानसे शुभ फलकी प्राप्ति होती है। इन सभी दानोंसे दीर्घकालतकके लिये श्रेष्ठ लोक प्राप्त होते हैं। यदि इन दानोंका निष्काम भावसे अनुष्ठान हो तो इनसे भगवत्प्राप्ति भी हो सकती है। ब्रजराज ! तुम व्रजभूमिमें जाकर प्रत्येक व्रजमें ब्राह्मणोंको भोजन कराओ। यह मैंने तुम्हें पुण्यवर्धक दानका परिचय दिया है। नीच पुरुषोंके प्रति इसका वर्णन नहीं करना चाहिये। (अध्याय ७६)
- अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति । नात्र पात्रपरीक्षा सा न कालनियमः क्वचित् । अन्नदाने शुभं पुण्यं धातुः पात्रं त्वपातकी ॥ अन्नदानं च धन्यं स्याद्भूभौ वैकुण्ठहेतुकम् । (७६ । ६४-६५१/२)
वर्णन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७९ सुस्वप्न-दर्शनके फलका विचार नन्दजीने पूछा- प्रभो! किस स्वप्नसे कौन- सा पुण्य होता है और किससे मोक्ष एवं सुखकी सूचना मिलती है? कौन-कौन-सा स्वप्न शुभ बताया गया है? श्रीभगवान् बोले-तात! वेदोंमें सामवेद समस्त कर्मोंके लिये श्रेष्ठ बताया गया है। इसी प्रकार कण्वशाखाके मनोहर पुण्यकाण्डमें भी इस विषयका वर्णन है। जो दुःस्वप्न है और जो सदा पुण्यफल देनेवाला सुस्वप्न है, वह सब जैसा पूर्वोक्त कण्वशाखामें बताया गया है; उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। यह स्वप्नाध्याय अधिक पुण्य-फल देनेवाला है। अतः इसका वर्णन करता हूँ। इसका श्रवण करनेसे मनुष्यको गङ्गास्नानके फलकी प्राप्ति होती है। रातके पहले पहरमें देखा गया स्वप्न एक वर्षमें फल देता है। दूसरे पहरका स्वप्न आठ महीनोंमें, तीसरे पहरका स्वप्न तीन महीनोंमें और चौथे पहरका स्वप्न एक पक्षमें अपना फल प्रकट करता है। अरुणोदयकी बेलामें देखा गया स्वप्न दस दिनमें फलद होता है। प्रातःकालका स्वप्न यदि तुरंत नींद टूट जाय तो तत्काल फल देनेवाला होता है। दिनको मनमें जो कुछ देखा और समझा गया है, वह सब अवश्य सपनेमें लक्षित होता है। तात! चिन्ता या रोगसे युक्त मनुष्य जो स्वप्न देखता है, वह सब निःसंदेह निष्फल होता है। जो जडतुल्य है, मल-मूत्रके वेगसे पीड़ित है, भयसे व्याकुल है, नग्न है और बाल खोले हुए है, उसे अपने देखे हुए स्वप्नका कोई फल नहीं मिलता। निद्रालु मनुष्य स्वप्न देखकर यदि पुनः नींद लेने लग जाता है अथवा मूढ़तावश रातमें ही किसी दूसरेसे कह देता है; तब उसे उस स्वप्नका फल नहीं मिलता। किसी नीच पुरुषसे, शत्रुसे, मूर्ख मनुष्यसे, स्त्रीसे अथवा रातमें ही किसी दूसरेसे स्वप्नकी बात कह देनेपर मनुष्यको विपत्ति, दुर्गति, रोग, भय, कलह, धनहानि एवं चोर- भयका सामना करना पड़ता है। व्रजेश्वर ! स्वप्नमें गौ, हाथी, अश्व, महल, पर्वत और वृक्षोंपर चढ़ना, भोजन करना तथा रोना धनप्रद कहा गया है। हाथमें वीणा लेकर गीत गाना खेतीसे भरी हुई भूमिकी प्राप्तिका सूचक होता है। यदि स्वप्नमें शरीर अस्त्र-शस्त्रसे विद्ध हो जाय, उसमें घाव हों, कीड़े हो जायें, विष्ठा अथवा खूनसे शरीर लिस हो जाय तो यह धनकी प्राप्तिका सूचक है। स्वप्नमें अगम्या स्त्रीके साथ समागम भार्याप्राप्तिकी सूचना देनेवाला है। जो स्वप्नमें मूत्रसे भीग जाता, वीर्यपात करता, नरकमें प्रवेश करता, नगर या लाल समुद्रमें घुसता अथवा अमृत पान करता है; वह जगनेपर शुभ समाचार पाता है और उसे प्रचुर धनराशिका लाभ होता है। स्वप्नमें हाथी, राजा, सुवर्ण, वृषभ, धेनु, दीपक, अन्न, फल, पुष्प, कन्या, छत्र, ध्वज और रथका दर्शन करके मनुष्य कुटुम्ब, कीर्ति और विपुल सम्पत्तिका भागी होता है। भरे हुए घड़े, ब्राह्मण, अग्नि, फूल, पान, मन्दिर, श्वेत धान्य, नट एवं नर्तकीको स्वप्नमें देखनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। गोदुग्ध और घीके दर्शनका भी यही फल है। सपनेमें कमलके पत्तेपर खीर, दही, दूध, घी, मधु और स्वस्तिक नामक मिष्टान्न खानेवाला मनुष्य भविष्यमें अवश्य ही राजा होता है। छत्र, पादुका और निर्मल एवं तीखे खड्गकी प्राप्ति धान्य-लाभकी सूचना देती है। खेल-खेलमें ही पानीके ऊपर तैरनेवाला मनुष्य प्रधान होता है। फलवान् वृक्षका दर्शन और सर्पका दंशन धन-प्राप्तिका सूचक है। स्वप्नमें सूर्य और चन्द्रमाके दर्शनसे रोग दूर होता है। घोड़ी, मुर्गी और क्रौञ्चीको देखनेसे भार्याका लाभ होता है।
६८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण स्वप्नमें जिसके पैरोंमें बेड़ी पड़ गयी, उसे प्रतिष्ठा और पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो सपनेमें नदीके किनारे नये अथवा फटे-पुराने कमलके पत्तेपर दही मिला हुआ अन्न और खीर खाता है; वह भविष्यमें राजा होता है। जलौका (जोंक), बिच्छू और साँप यदि स्वप्नमें दिखायी दें तो धन, पुत्र, विजय एवं प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होती है। सींग और बड़ी-बड़ी दाढ़वाले पशुओं, सूअरों और वानरोंसे यदि स्वप्नमें पीडा प्राप्त हो तो मनुष्य निश्चय ही राजा होता और प्रचुर धन-राशि प्राप्त कर लेता है। जो स्वप्नमें मत्स्य, मांस, मोती, शङ्ख, चन्दन, हीरा, शराब, खून, सुवर्ण, विष्ठा तथा फले-फूले बेल और आमको देखता है; उसे धन मिलता है। प्रतिमा और शिवलिङ्गके दर्शनसे विजय और धनकी प्राप्ति होती है। प्रज्वलित अग्निको देखकर मनुष्य धन, बुद्धि और लक्ष्मी पाता है। आँवला और कमल धनप्राप्तिका सूचक है। देवता, द्विज, गौ, पितर और साम्प्रदायिक चिह्नधारी पुरुष स्वप्नमें परस्पर जिस वस्तुको देते हैं; उसका फल भी वैसा ही होता है। श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत अनुलेपनसे सुसज्जित सुन्दरियाँ स्वप्नमें जिस पुरुषका आलिङ्गन करती हैं, उसे सुख और सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है। जो पुरुष स्वप्नमें पीत वस्त्र, पीले पुष्पोंकी माला और पीले रंगका अनुलेपन धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; उसे कल्याणकी प्राप्ति होती है। स्वप्नमें भस्म, रूई और हड्डीको छोड़कर शेष सभी श्वेत वस्तुएँ प्रशंसित हैं और कृष्णा गौ, हाथी, घोड़े, ब्राह्मण तथा देवताको छोड़कर शेष सभी काली वस्तुएँ अत्यन्त निन्दित हैं। रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित दिव्य ब्राह्मणजातीय स्त्री मुस्कराती हुई जिसके घरमें आती है; उसे निश्चय ही प्रिय पदार्थकी प्राप्ति होती है। स्वप्नमें ब्राह्मण देवताका स्वरूप है और ब्राह्मणी देवकन्याका। ब्राह्मण और ब्राह्मणी संतुष्ट हो मुस्कराते हुए स्वप्नमें जिसको कोई फल दें, उसे पुत्र होता है। पिताजी! ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे शुभाशीर्वाद देते हैं, उसे अवश्य ऐश्वर्य प्राप्त होता है। सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिसके घर आ जाय; उसके यहाँ नारायण, शिव और ब्रह्माका प्रवेश होता है; उसे सम्पत्ति, महान् सुयश, पग-पगपर सुख, सम्मान और गौरवकी प्राप्ति होती है। यदि स्वप्नमें अकस्मात् गौ मिल जाय तो भूमि और पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है। स्वप्नमें जिस पुरुषको हाथी सूँड़से उठाकर अपने माथेपर बिठा ले; उसे निश्चय ही राज्य-लाभ होगा। स्वप्नमें संतुष्ट ब्राह्मण जिसे हृदयसे लगाये और फूल हाथमें दे; वह निश्चय ही सम्पत्तिशाली, विजयी, यशस्वी और सुखी होता है। साथ ही उसे तीर्थस्नानका पुण्य प्राप्त होता है। स्वप्नमें तीर्थ, अट्टालिका और रत्नमय गृहका दर्शन हो तो उससे भी पूर्वोक्त फलकी ही प्राप्ति होती है। स्वप्नमें यदि कोई भरा हुआ कलश दे तो पुत्र और सम्पत्तिका लाभ होता है। हाथमें कुडव या आढक लेकर स्वप्नमें कोई वाराङ्गना जिसके घर आती है; उसे निश्चय ही लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जिसके घर पत्नीके साथ ब्राह्मण आता है; उसके यहाँ पार्वतीसहित शिव अथवा लक्ष्मीके साथ नारायणका शुभागमन होता है। ब्राह्मण और ब्राह्मणी स्वप्नमें जिसे धान्य, पुष्पाञ्जलि, मोतीका हार, पुष्पमाला और चन्दन देते हैं तथा जिसे स्वप्नमें गोरोचन, पताका, हल्दी, ईख और सिद्धान्नका लाभ होता है; उसे सब ओरसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। ब्राह्मण और ब्राह्मणी स्वप्नावस्थामें जिसके मस्तकपर छत्र लगाते अथवा श्वेत धान्य बिखेरते हैं या अमृत, दही और उत्तम पात्र अर्पित करते हैं अथवा जो स्वप्नमें श्वेत माला और चन्दनसे अलंकृत हो रथपर बैठकर दही या खीर खाता है; वह निश्चय ही राजा होता है। स्वप्नमें रत्नमय
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६८१
आभूषणोंसे विभूषित आठ वर्षकी कुमारी कन्या जिसपर संतुष्ट हो जाती है और जिस पुण्यात्माको पुस्तक देती है; वह विश्वविख्यात कवीश्वर एवं पण्डितराज होता है। जिसे स्वप्नमें माताकी भाँति वह पढ़ाती है; वह सरस्वती-पुत्र होता है और अपने समयका सबसे बड़ा पण्डित माना जाता है। यदि विद्वान् ब्राह्मण किसीको पिताकी भाँति यत्नपूर्वक पढ़ावे या प्रसन्नतापूर्वक पुस्तक दे तो वह भी उसीके समान विद्वान् होता है। जो स्वप्नमें मार्गपर या जहाँ कहीं भी पड़ी हुई पुस्तक पाता है; वह भूतलपर विख्यात एवं यशस्वी पण्डित होता है। जिसे ब्राह्मण-ब्राह्मणी स्वप्नमें महामन्त्र दें; वह पुरुष विद्वान्, धनवान् और गुणवान् होता है। ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे मन्त्र अथवा शिलामयी प्रतिमा देता है; उसे मन्त्रसिद्धि प्राप्त होती है। यदि ब्राह्मण स्वप्नमें ब्राह्मणसमूहका दर्शन एवं वन्दन करके आशीर्वाद पाता है तो वह राजाधिराज अथवा महान् कवि एवं पण्डित होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिसे संतुष्ट होकर श्वेत धान्ययुक्त भूमि देता है; वह राजा होता है। ब्राह्मण जिसे स्वप्नमें रथपर बिठाकर नाना प्रकारके स्वर्ग दिखाता है; वह चिरंजीवी होता है तथा उसकी आयु एवं सम्पत्तिकी निश्चय ही वृद्धि होती है। सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिस ब्राह्मणको अपनी कन्या देता है; वह सदा धनाढ्य राजा होता है। स्वप्नमें सरोवर, समुद्र, नदी, नद, श्वेत सर्प और श्वेत पर्वतका दर्शन करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो स्वप्नमें अपनेको मरा हुआ देखता है, वह चिरंजीवी होता है। रोगी देखनेपर नीरोग होता है और सुखी देखनेपर निश्चय ही दुःखी होता है। दिव्य नारी जिससे स्वप्नमें कहती है कि आप मेरे स्वामी हैं और वह उस स्वप्नको देखकर तत्काल जाग उठता है तो अवश्य राजा होता है। स्वप्नमें कालिकाका दर्शन करके और स्फटिककी माला, इन्द्र-धनुष एवं वज्रको पाकर मनुष्य अवश्य ही प्रतिष्ठाका भागी होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिससे कहे कि तुम मेरे दास हो जाओ, वह मेरी दास्यभक्ति पाकर वैष्णव हो जाता है। स्वप्नावस्थामें ब्राह्मण शिव और विष्णुका स्वरूप है। ब्राह्मणी लक्ष्मी एवं पार्वतीका प्रतीक है तथा श्वेतवर्णा स्त्री वेदमाता सावित्री, गङ्गा एवं सरस्वतीका रूप है। ग्वालिनका वेष धारण करनेवाली बालिका मेरी राधिका है और बालक बाल-गोपालका स्वरूप है। स्वप्नविज्ञानके जाननेवाले विद्वानोंने इस रहस्यको प्रकाशित किया है। पिताजी ! यह मैंने पुण्यदायक उत्तम स्वप्नोंका वर्णन किया है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ?
(अध्याय ७७)
श्रीकृष्णके द्वारा नन्दको आध्यात्मिक ज्ञानका उपदेश, बाईस प्रकारकी सिद्धि, सिद्धमन्त्र तथा अदर्शनीय वस्तुओंका वर्णन
नन्दजी बोले—जगन्नाथ श्रीकृष्ण ! मैंने अच्छे स्वप्नोंका वर्णन सुना। यह वेदोंका सारभाग तथा लौकिक-वैदिक नीतिका सारतत्त्व है। वत्स ! अब मैं उन स्वप्नोंको सुनना चाहता हूँ, जिन्हें देखनेसे पाप होता है। अथवा जिस कर्मके करनेसे पाप होता है, उसका वर्णन करो। वेदका अनुसरण करनेवाले संतस मनुष्य तुम्हारे मुखसे वेद-शास्त्रोंकी बातें सुनना चाहते हैं; क्योंकि तुम वेदोंके जनक हो और वैदिक सत्पुरुषों, ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों तथा तीनों लोकोंके भी जन्मदाता हो। वत्स ! अपने वियोगसे तुमने मेरे हृदयमें दाह उत्पन्न कर दिया है; किंतु इस समय तुम्हारे मुखारविन्दसे जो प्रमाणभूत वचनामृत सुननेको मिला है, उससे मेरा तन, मन अभिषिक्त
६८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण हो उठा है। तुम्हारा जो चरणकमल सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है तथा ब्रह्मा आदि देवता स्वप्नमें भी जिसका दर्शन नहीं कर पाते हैं; वही आज मेरी आँखोंके सामने है। आजके बाद मुझ पातकीको तुम्हारे चरणारविन्दोंका दर्शन कहाँ मिलेगा ? मेरा यह मलमूत्रधारी शरीर अपने कर्मबन्धनसे बँधा हुआ है। बेटा! अब ऐसा दिन कब प्राप्त होगा, जब कि ब्रह्मा आदि देवताओंके भी स्वामी तुमसे बातचीत करनेका शुभ अवसर मुझ-जैसे पापीको सुलभ होगा ? महेश्वर ! कृपानाथ ! मुझपर कृपा करो। मैंने अपना बेटा समझकर तुम्हारे साथ जो दुर्नीतिपूर्ण व्यवहार किया है; मेरे उस अपराधको क्षमा कर दो। ब्रह्मा, शिव, शेषनाग और मुनि भी तुम्हारे चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं। सरस्वती और श्रुति भी तुम्हारी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाती हैं; फिर मेरी क्या बिसात है? यों कहकर नन्दजी दुःख और शोकसे व्याकुल हो गये। पुत्रवियोगसे विह्वल हो रोते- रोते उन्हें मूर्च्छा आ गयी। यह देख जगत्पति भगवान् श्रीकृष्ण संत्रस्त हो उन्हें यत्नपूर्वक समझाने-बुझाने लगे। उन्होंने नन्दको परम उत्तम आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया। श्रीभगवान्ने कहा- पिताजी ! लोकमें जितने जन्मदाता पिता हैं, उन सबमें तुम्हारा श्रेष्ठ स्थान है। सर्वश्रेष्ठ ब्रजेश्वर ! होशमें आओ और उत्तम कल्याणमय ज्ञान सुनो। यह श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान ज्ञानियोंके लिये भी परम दुर्लभ है। वेद-शास्त्रमें भी गोपनीय कहा गया है। केवल तुम्हींको इसका उपदेश दे रहा हूँ। तात! एकाग्रचित्त हो प्रसन्नतापूर्वक इस ज्ञानको सुनो और इसका मनन करो। इसके अभ्याससे जन्म, मृत्यु और जरारूपी रोगसे छुटकारा मिल जाता है। महाराज ब्रजराज ! सुस्थिर होओ और इस ज्ञानको पाकर शोक- मोहसे रहित एवं परमानन्दमें निमग्न हो अपने व्रजको पधारो। यह समस्त चराचर जगत् जलके बुलबुलेकी भाँति नश्वर है; प्रातःकालिक स्वप्नकी भाँति मिथ्या और मोहका ही कारण है। पाञ्चभौतिक शरीर एवं संसारके निर्माणका हेतु भी मिथ्या एवं अनित्य है। मायासे ही मनुष्य इसे सत्य मान रहा है। वह समस्त कर्मोंमें काम, क्रोध, लोभ और मोहसे वेष्टित है और मायासे सदा मोहित, ज्ञानहीन एवं दुर्बल है। निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, पिपासा, क्षमा, श्रद्धा, दया, लज्जा, शान्ति, धृति, पुष्टि और तुष्टि आदिसे भी वह आवृत है। जैसे वृक्ष काक आदि पक्षियोंका आश्रय है; उसी प्रकार मन, बुद्धि, चेतना, प्राण, ज्ञान और आत्मासहित सम्पूर्ण देवता शरीरका आश्रय लेकर रहते हैं। मैं सर्वेश्वर ही पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ। ब्रह्मा मन हैं, सनातनी प्रकृति बुद्धि हैं, प्राण विष्णु हैं तथा चेतना और उसकी अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। शरीरमें मेरे रहनेसे ही सबकी स्थिति है। मेरे चले जानेपर वे भी सब-के-सब चले जाते हैं। हम सबके त्याग देनेपर शरीर तत्काल गिर जाता है; इसमें संशय नहीं है। उसके पाँचों भूत उसी क्षण समष्टिगत पाँचों भूतोंमें विलीन हो जाते हैं। नाम केवल संकेतरूप है। वह निष्फल और मोहका कारण है। तात ! अज्ञानियोंको ही शरीरके लिये शोक होता है; ज्ञानियोंको किञ्चिन्मात्र भी दुःख नहीं होता। निद्रा आदि जो शक्तियाँ हैं; वे सब प्रकृतिकी कलाएँ हैं। काम, क्रोध लोभ और मोहके साथ जो पाँचवाँ अहंकार है; वे सब अधर्मके अंश हैं। सत्त्व आदि तीन गुण क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा तथा रुद्रके अंश हैं। ज्योतिर्मय शिव ज्ञानस्वरूप हैं और मैं निर्गुण आत्मा हूँ। जब प्रकृतिमें प्रवेश करता हूँ तो मैं सगुण कहा जाता हूँ। विष्णु, ब्रह्मा तथा रुद्र आदि सगुण विषय हैं। मेरे अंशभूत धर्म, शेषनाग, सूर्य और चन्द्रमा आदि विषयी कहे गये हैं। इसी प्रकार समस्त मुनि, मनु तथा देवता आदि मेरे कलांशरूप हैं।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६८३
मैं समस्त शरीरोंमें व्याप्त हूँ; तथापि उनके द्वारा सम्पादित होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंसे निर्लिप्त हूँ। मेरा भक्त जीवन्मुक्त होता है तथा वह जन्म, मृत्यु और जराका निवारण करनेवाला है। भक्त सम्पूर्ण सिद्धोंका स्वामी, श्रीमान्, कीर्तिमान्, विद्वान्, कवि, बाईस प्रकारका सिद्ध और समस्त कर्मोंका निराकरण करनेवाला है। उस सिद्ध भक्तको मैं स्वयं प्राप्त होता हूँ; क्योंकि वह मेरे सिवा दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा ही नहीं करता।
तात! सिद्धियोंका साधन करनेवाला सिद्ध उन सिद्धियोंके ही भेदसे बाईस प्रकारका होता है। मेरे मुखसे उसका परिचय सुनो और सिद्धमन्त्र ग्रहण करो। अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व, कामावसायिता, दूरश्रवण, परकायप्रवेश, मनोयायित्व, सर्वज्ञत्व, अभीष्टसिद्धि, अग्निस्तम्भ, जलस्तम्भ, चिरजीवित्व, वायुस्तम्भ, क्षुत्पिपासानिद्रास्तम्भन (भूख-प्यास तथा नींदका स्तम्भन), वाक्सिद्धि, इच्छानुसार मृत प्राणीको बुला लेना, सृष्टिकरण और प्राणोंका आकर्षण—ये बाईस प्रकारकी सिद्धियाँ हैं। सिद्धमन्त्र इस प्रकार है—'ॐ सर्वेश्वरेश्वराय सर्वविघ्नविनाशिने मधुसूदनाय स्वाहा'। यह मन्त्र अत्यन्त गूढ़ है और सबकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षके समान है। सामवेदमें इसका वर्णन है। यह सिद्धोंकी सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है। इस मन्त्रके जपसे योगी, मुनीन्द्र और देवता सिद्ध होते हैं। सत्पुरुषोंको एक लाख जप करनेसे ही यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। यदि नारायणक्षेत्रमें हविष्यान्नभोजी होकर इसका जप किया जाय तो शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है। तात! तुम काशीके मणिकर्णिकातीर्थमें जाकर इसका जप करो। मैं तुम्हें नारायणक्षेत्र बतलाता हूँ, सुनो। गङ्गाके जलप्रवाहसे चार हाथतककी भूमिको 'नारायणक्षेत्र' कहा है। उसके नारायण ही स्वामी हैं; दूसरा कोई कदापि नहीं है। वहाँ मनुष्यकी मृत्यु होनेपर उसे ज्ञान एवं मुक्तिकी प्राप्ति होती है। वहाँ व्रतके बिना भी मन्त्र-जप करनेसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। व्रजनाथ! व्रजको जाओ और उसे पवित्र करो।
तात! जिनके दर्शनसे पाप होता है; उन्हें बताता हूँ, सुनो। दुःस्वप्न केवल पापका बीज और विघ्नका कारण होता है। गौ और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले कृतघ्न, कुटिल, देवमूर्तिनाशक, माता-पिताके हत्यारे, पापी, विश्वासघाती, झूठी गवाही देनेवाले, अतिथिके साथ छल करनेवाले, ग्राम-पुरोहित, देवता तथा ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले, पीपलका पेड़ काटनेवाले, दुष्ट, शिव और विष्णुकी निन्दा करनेवाले, दीक्षारहित, आचारहीन, संध्यारहित द्विज, देवताके चढ़ावेपर गुजारा करनेवाले और बैल जोतनेवाले ब्राह्मणको देखनेसे पाप लगता है। पति-पुत्रसे रहित, कटी नाकवाली, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाली, पतिभक्तिहीना, विष्णुभक्तिशून्या तथा व्यभिचारिणी स्त्रीके दर्शनसे भी पाप होता है। सदा क्रोधी, जारज, चोर, मिथ्यावादी, शरणागतको यातना देनेवाले, मांस चुरानेवाले, शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मण, ब्राह्मणीगामी शूद्र, सूदखोर द्विज और अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले दुष्ट नराधमको भी देखनेसे पाप लगता है। माता, सौतेली माँ, सास, बहिन, गुरुपत्नी, पुत्रवधू, भाईकी स्त्री, मौसी, बूआ, भांजेकी स्त्री, मामी, परायी नवोढा, चाची, रजस्वला, पितामही और नानी—ये सामवेदमें अगम्या बतायी गयी हैं। सत्पुरुषोंको इन सबकी रक्षा करनी चाहिये। कामभावसे इनका दर्शन और स्पर्श करनेपर मनुष्य ब्रह्महत्याका भागी होता है; अतः दैववश यदि इनकी ओर दृष्टि चली जाय तो सूर्यदेवका दर्शन करके श्रीहरिका स्मरण करे। जो कामनापूर्वक इनपर कुदृष्टि डालते हैं, वे निन्दनीय होते हैं। ब्रजेश्वर! इसलिये शापसे डरे हुए साधु पुरुष
६१- गृहस्थ, गृहस्थ-पत्नी, पुत्र और शिष्यके धर्मका वर्णन, नारियों और भक्तोंके त्रिविध भेद, ब्रह्माण्ड-रचनाके वर्णन-प्रसङ्गमें राधाकी उत्पत्तिका कथन
| ६८४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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इनकी ओर कुदृष्टि नहीं डालते। विद्वान् पुरुष ग्रहणके समय सूर्य और चन्द्रमाको नहीं देखते। प्रथम, अष्टम, सप्तम, द्वादश, नवम और दशम स्थानमें सूर्य हों तो सूर्यका तथा जन्म-नक्षत्रमें और अष्टम एवं चतुर्थ स्थानमें चन्द्रमा हों तो चन्द्रमाका दर्शन नहीं करना चाहिये। भाद्रपदमासके शुक्ल और कृष्णपक्षकी चतुर्थीको उदित हुए चन्द्रमाको नष्टचन्द्र कहा गया है; अतः उसका दर्शन नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुषोंने ऐसे चन्द्रमाका परित्याग किया है। तात! यदि कोई उस दिन जान-बूझकर चन्द्रमाको देखता है तो वह उसे अत्यन्त दुष्कर कलङ्क देता है। यदि कोई मनुष्य अनिच्छासे उक्त चतुर्थीके चन्द्रमाको देख ले तो उसे मन्त्रसे पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिये। ऐसा करनेसे वह तत्काल शुद्ध हो भूतलपर निष्कलङ्क बना रहता है। जलको पवित्र करनेका मन्त्र इस प्रकार है—
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
'सुन्दर सलोने कुमार! इस मणिके लिये सिंहने प्रसेनको मारा है और जाम्बवान्ने उस सिंहका संहार किया है; अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमन्तकमणिपर तुम्हारा ही अधिकार है।'
इस मन्त्रसे पवित्र किया हुआ उत्तम जल अवश्य पीना चाहिये। तात! ये सारी बातें तुम्हें बतायी गयीं। अब तुमसे और क्या कहूँ?
(अध्याय ७८)
दुःस्वप्न, उनके फल तथा उनकी शान्तिके उपायका वर्णन
तदनन्तर सूर्यग्रहण-चन्द्रग्रहणादिके विषयमें कहकर नन्द बाबाके पूछनेपर भगवान् कहने लगे।
**श्रीभगवान् बोले—**नन्दजी! जो स्वप्नमें हर्षातिरेकसे अट्टहास करता है अथवा यदि विवाह और मनोऽनुकूल नाच-गान देखता है तो उसके लिये विपत्ति निश्चित है। स्वप्नमें जिसके दाँत तोड़े जाते हैं और वह उन्हें गिरते हुए देखता है तो उसके धनकी हानि होती है और उसे शारीरिक कष्ट भोगना पड़ता है। जो तेलसे स्नान करके गदहे, ऊँट और भैंसेपर सवार हो दक्षिण दिशाकी ओर जाता है; निःसंदेह उसकी मृत्यु हो जाती है। यदि स्वप्नमें कानमें लगे हुए अड़हुल, अशोक और करवीरके पुष्पको तथा तेल और नमकको देखता है तो उसे विपत्तिका सामना करना पड़ता है। नंगी, काली, नक-कटी, शूद्र-विधवा तथा जटा और ताड़के फलको देखकर मनुष्य शोकको प्राप्त होता है। स्वप्नमें कुपित हुए ब्राह्मण तथा क्रुद्ध हुई ब्राह्मणीको देखनेवाले मनुष्यपर निश्चय ही विपत्ति आती है और लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं। जंगली पुष्प, लाल फूल, भलीभाँति पुष्पोंसे लदा पलाश, कपास और सफेद वस्त्रको देखकर मनुष्य दुःखका भागी होता है। काला वस्त्र धारण करनेवाली काले रंगकी विधवा स्त्रीको हँसती और गाती हुई देखकर मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जिसे स्वप्नमें देवगण नाचते, गाते, हँसते, ताल ठोंकते और दौड़ते हुए दीख पड़ते हैं; उसका शरीर मृत्युका शिकार हो जायगा। जो स्वप्नमें काले पुष्पोंकी माला और कृष्णाङ्गरागसे सुशोभित एवं काला वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; उसकी मृत्यु हो जायगी। जो स्वप्नमें मृगका मरा हुआ छौना, मनुष्यका मस्तक और हड्डियोंकी माला पाता है; उसके लिये विपत्ति निश्चित है। जो ऐसे रथपर, जिसमें गदहे और ऊँट जुते हुए हों, अकेले सवार होता है और उसपर बैठकर फिर जागता है तो निःसंदेह वह मौतका ग्रास बन जाता है। जो अपनेको हवि, दूध, मधु, मट्ठा और गुड़से सराबोर देखता है; वह निश्चय ही