गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९- पूजानुक्रम-निरूपण
काण्ड ] पूजानुक्रम-निरूपण [ २९
ऊपर धीरे-धीरे घुमानेको 'वाराही मुद्रा' कहते हैं। भगवान् वाराहको सदा ही यह प्रिय है। दोनों मुट्ठियोंको उत्तान रखकर क्रमशः एक-एक अँगुली सीधे खोलते हुए सभीको खोल दे। तदनन्तर उन सभी अँगुलीयोंकी पुनः मुट्ठी बाँध ले। यह 'अङ्गमुद्रा' कहलाती है। साधकको इन मुद्राओंका प्रदर्शन क्रमशः दसों दिक्पालोंके लिये करना चाहिये।
भगवान् वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ देव-स्थानके अधिकारी देव हैं। साधकको—'ॐ अं वासुदेवाय नमः' मन्त्रसे वासुदेव, 'ॐ आं बलाय नमः' मन्त्रसे बलराम, 'ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः' मन्त्रसे प्रद्युम्न तथा 'ॐ अः अनिरुद्धाय नमः' मन्त्रसे अनिरुद्धकी पूजा करनी चाहिये।
ॐकार, तत्सत्, हुं, क्षौं तथा भूः—ये पाँच क्रमशः नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह और महावराहभगवान्के बीजमन्त्र हैं, इसलिये साधक—'ॐ नारायणाय नमः' मन्त्रसे भगवान् नारायण, 'ॐ तत्सद् ब्रह्मणे नमः' मन्त्रसे पद्मयोनि ब्रह्मा, 'ॐ हुं विष्णवे नमः' मन्त्रसे विष्णु, 'ॐ क्षौं नरसिंहाय नमः' मन्त्रसे नरसिंह तथा 'ॐ भूः महावराहाय नमः' मन्त्रसे आदिवराहका पूजन करे।
उपर्युक्त इन नौ देवताओं (वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह तथा महावराह) (नवव्यूह)-का वर्ण क्रमशः श्वेत, अरुण, हरिद्रावत् पीत, नील, श्यामल, लोहित, मेघवत् श्याम, अग्निवत् पीत एवं मधु पिङ्गल है। अर्थात् वासुदेव श्वेत, बलदेव अरुण, प्रद्युम्न हरिद्रावत् पीत, अनिरुद्ध नील, नारायण श्याम, ब्रह्मा रक्ताभ, विष्णु मेघवत् श्याम, नरसिंह अग्निवत् पीत तथा वराहदेव मधु पिङ्गल वर्णकी तेजस्वी आभासे सुशोभित रहते हैं।
'(ॐ) कं टं पं शं' बीजमन्त्रसे गरुड, '(ॐ) जं खं वं' बीजमन्त्रसे सुदर्शन, '(ॐ) षं चं फं षं' बीजमन्त्रसे गदादेवी, '(ॐ) वं लं मं क्षं' बीजमन्त्रसे शङ्ख, '(ॐ) घं ढं भं हं' बीजमन्त्रसे श्रीलक्ष्मी, '(ॐ) गं जं वं शं' बीजमन्त्रसे पुष्टि, '(ॐ) घं वं' बीजमन्त्रसे वनमाला, '(ॐ) दंसं' बीजमन्त्रसे श्रीवत्स और '(ॐ) छं डं पं यं' बीजमन्त्रसे कौस्तुभमणि युक्त हैं। [इसके अतिरिक्त] मैं स्वयं अनन्त (विष्णु) हूँ। ये सभी उस देवाधिदेव विष्णुके अङ्ग हैं।
गरुड कमलके समान लाल, गदा कृष्णवर्ण, पुष्टि शिरीष-पुष्परंगके समान आभासे समन्वित तथा लक्ष्मी सुवर्ण-कान्तिसे सुशोभित हैं। शङ्ख पूर्ण चन्द्रकी कान्तिके समान श्वेत और कौस्तुभमणि नवोदित अरुणके सदृश वर्णवाला है। चक्र सहस्र सूर्योंकी कान्तिके सदृश और श्रीवत्स कुन्द पुष्पके समान श्वेत है। वनमाला पाँच वर्णोंसे युक्त पञ्चवर्णी और अनन्त भगवान् मेघकी भाँति श्याम वर्णका है। जिन अस्त्रोंके रंगोंका वर्णन यहाँ नहीं किया गया है, वे सभी विद्युत्-कान्तिके समान हैं। (भगवान् विष्णुके इन समस्त अङ्गोंको) 'पुण्डरीकाक्ष' नामक विद्यासे अर्घ्य और पाद्यादि समर्पित करने चाहिये। (अध्याय ११)
पूजानुक्रम-निरूपण
**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! देवके पूजनका जो क्रम है, उसके ज्ञानके लिये पूजाविधिके क्रमको कहा जा रहा है। सर्वप्रथम साधकको 'ॐ नमः' मन्त्रसे परमात्माका स्मरण करना चाहिये। तदनन्तर वह 'यं रं वं लम्' इन बीजमन्त्रोंके द्वारा शरीरकी शुद्धि करके 'ॐ नमः' इस मन्त्रसे चतुर्भुज भगवान् विष्णुके रूपमें ही अपनेको मान ले।
तत्पश्चात् करन्यास तथा देहन्यास करे। तदनन्तर हृदयमें योगपीठकी पूजाका विधान है। जिसको इन मन्त्रोंसे करे—
| ३० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
‘ॐ अनन्ताय नमः। ॐ धर्माय नमः। ॐ ज्ञानाय नमः। ॐ वैराग्याय नमः। ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ अधर्माय नमः। ॐ अज्ञानाय नमः। ॐ अवैराग्याय नमः। ॐ अनैश्वर्याय नमः। ॐ पद्माय नमः। ॐ आदित्यमण्डलाय नमः। ॐ चन्द्रमण्डलाय नमः। ॐ वह्निमण्डलाय नमः। ॐ विमलायै नमः। ॐ उत्कर्षिण्यै नमः। ॐ ज्ञानायै नमः। ॐ क्रियायै नमः। ॐ योगायै नमः। ॐ प्रह्व्यै नमः। ॐ सत्यायै नमः। ॐ ईशानायै नमः। ॐ सर्वतोमुख्यै नमः। ॐ साङ्गोपाङ्गाय हरेरासनाय नमः।’
इसके बाद साधक कर्णिकाके मध्यमें ‘अं वासुदेवाय नमः’ कहकर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करके निम्न मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करे—
‘आं हृदयाय नमः। ईं शिरसे नमः। ऊँ शिखायै नमः। ऐं कवचाय नमः। औं नेत्रत्रयाय नमः। अः फट् अस्त्राय नमः।’
तदनन्तर—‘आं सङ्कर्षणाय नमः। अं प्रद्युम्नाय नमः। अः अनिरुद्धाय नमः। ॐ अः नारायणाय नमः। ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः। ॐ हुं विष्णवे नमः। क्षौं नरसिंहाय नमः। भूर्वराहाय नमः।’—इन मन्त्रोंसे संकर्षण आदि व्यूहदेवोंको नमस्कार करे।
तत्पश्चात् साधक निम्न मन्त्रोंसे भगवान् विष्णुके वाहन एवं आयुधादिको नमस्कार करे—
‘कं टं जं शं वैनतेयाय (नमः)। जं खं वं सुदर्शनाय (नमः)। खं चं फं षं गदायै (नमः)। वं लं मं क्षं पाञ्चजन्याय (नमः)। घं ढं भं हं श्रियै (नमः)। गं डं वं शं पुष्ट्यै (नमः)। धं वं वनमालायै (नमः)। दं शं श्रीवत्साय (नमः)। छं डं यं कौस्तुभाय (नमः)। शं शार्ङ्गाय (नमः)। इंड्षुधिभ्यां (नमः)। चं चर्मणे (नमः)। खं खड्गाय (नमः)।
तत्पश्चात् इन बीजमन्त्रोंसे इन्द्रादि दिक्पालोंको नमस्कार करना चाहिये।
(ॐ) लं इन्द्राय सुराधिपतये (नमः)। (ॐ) रं अग्नये तेजोऽधिपतये (नमः)। (ॐ) यमाय धर्माधिपतये (नमः)। (ॐ) क्षं नैर्ऋताय रक्षोऽधिपतये (नमः)। (ॐ) वं वरुणाय जलाधिपतये (नमः)। (ॐ) यों वायवे प्राणाधिपतये (नमः)। (ॐ) धां धनदाय धनाधिपतये (नमः)। (ॐ) हां ईशानाय विद्याधिपतये (नमः)।
इसके बाद क्रमशः पूर्वोक्त इन्द्र आदि दिक्पाल देवताओंके निम्न आयुधोंको प्रणाम करनेका विधान है—
(ॐ) वज्राय (नमः)। (ॐ) शक्त्यै (नमः)। (ॐ) दण्डाय (नमः)। (ॐ) खड्गाय (नमः)। (ॐ) पाशाय (नमः)। (ॐ) ध्वजाय (नमः)। (ॐ) गदायै (नमः)। (ॐ) त्रिशूलाय (नमः)।
इसके बाद भगवान् अनन्त तथा ब्रह्मदेवको इस मन्त्रसे प्रणाम करे—
(ॐ) लं अनन्ताय पातालाधिपतये (नमः)। (ॐ) खं ब्रह्मणे सर्वलोकाधिपतये (नमः)।
अब इसके बाद साधक भगवान् वासुदेवको नमस्कार करनेके लिये द्वादशाक्षर-मन्त्रका प्रयोग करे, साथ ही द्वादशाक्षर-मन्त्रके बीजमन्त्रों और दशाक्षर-मन्त्रके बीज-मन्त्रोंको इस प्रकार नमस्कार करे—
‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।’
ॐ ॐ नमः। ॐ नं नमः। ॐ मों नमः। ॐ ॐ भं नमः। ॐ गं नमः। ॐ वं नमः। ॐ तें नमः। ॐ वां नमः। ॐ सुं नमः। ॐ दें नमः। ॐ वां नमः। ॐ यं नमः। ॐ ॐ नमः। ॐ नं नमः। ॐ मों नमः। ॐ नां नमः। ॐ रां नमः। ॐ यं नमः। ॐ णां नमः। ॐ यं नमः।
द्वादशाक्षर-मन्त्र—ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, दशाक्षरमन्त्र—ॐ नमो नारायणाय नमः तथा
काण्ड ] पूजानुक्रम-निरूपण [ ३१
अष्टाक्षरमन्त्र—ॐ पुरुषोत्तमाय नमः—इन मन्त्रोंका यथाशक्ति जप करके निम्न मन्त्रसे भगवान् पुण्डरीकाक्षको नमस्कार करे—
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।
सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज ॥
हे पुण्डरीकाक्ष ! (कमलनयन) आपको नमस्कार है। हे विश्वके कारणभूत ! आपको मेरा प्रणाम है। हे ब्रह्मण्यदेव ! आपको नमस्कार है। हे महापुरुष ! हे पूर्वज ! आपको मेरा प्रणाम है।
इस प्रकार भगवान् विष्णुकी स्तुति करके साधकको हवन करना चाहिये। तदनन्तर साधक (महापुरुषविद्या नामक) मन्त्रका विधिपूर्वक एक सौ आठ बार जप करके अर्घ्य प्रदान करे और ‘जितं तेन’ (यह स्तोत्र ही महापुरुषविद्या है) इसी स्तोत्रसे उन भगवान् नारायणको बारम्बार प्रणाम करना चाहिये।
तत्पश्चात् [अग्निकी स्थापना करके] साधक उस अग्निदेवकी पूजा करनेके बाद हवन करे। अपने (यथाविहित) बीजमन्त्रसे देवाधिदेव भगवान् विष्णु तथा अङ्गमन्त्रोंके द्वारा अच्युतादि आङ्गिक देवताओंको आहुति प्रदान करे। सबसे पहले मन्त्रविद् साधकको कुण्डमें ॐकारके द्वारा [तीन रेखाओंका] उल्लेखन करना चाहिये और उसके बाद यज्ञकुण्डका अभ्युक्षण* करना चाहिये। तदनन्तर यथाविधि भ्रामणपूर्वक हवनकुण्डमें अग्नि स्थापित करके उत्तम फल आदिसे सविधि उसकी पूजा करनी चाहिये।
पहले साङ्गोपाङ्ग देव ब्रह्मका मनसे ध्यानकर मण्डलमें उन सभीको स्थापित करे। तदनन्तर वह साधक वासुदेव-मन्त्रसे एक सौ आठ बार आहुति दे। तत्पश्चात् वह सङ्कर्षण आदि देवोंके बीजमन्त्रसे उन छः देवोंकी भी पूजा करके अङ्ग देवताओंको तीन-तीन और दिक्पालोंको एक-एक आहुति प्रदान करे। उसके बाद हवन पूर्ण होनेपर साधकको पुनः एकाग्रचित्त स्थित होकर पूर्णाहुति देनी चाहिये।
तदनन्तर वह साधक ‘वाणीसे अतीत उस परमात्मा’ में अपने आत्माको लीन करे और निम्नलिखित मन्त्रसे वासुदेव और उन सभी देवोंका विसर्जन करे—
'गच्छ गच्छ परं स्थानं यत्र देवो निरञ्जनः॥
गच्छन्तु देवताः सर्वाः स्वस्थानस्थितिहेतवे।'
‘हे देवाधिदेव भगवान् वासुदेव! अब आप उस अपने परम स्थानको प्राप्त करें, जहाँपर निर्मल (प्रकाशस्वरूप) परम ब्रह्मका निवास है। अङ्गदेव, सङ्कर्षणादि और इन्द्रादि दिक्पाल! आप सभी देव अपने-अपने स्थानमें निवास करनेके लिये प्रस्थान करें!’
सुदर्शन, श्रीहरि, अच्युत, त्रिविक्रम, चतुर्भुज, वासुदेव, प्रद्युम्न, सङ्कर्षण और पुरुषसे युक्त देवोंका (एक जो समूह है उसे) नवव्यूह माना गया है। इसमें दसवें परम तत्त्वका योग होनेसे यह दशात्मक कहा जाता है। इसी नवव्यूहमें अनिरुद्ध तथा अनन्तका संनिवेश होनेसे यह एकादश व्यूह द्वादशात्मक कहलाता है।
अङ्कित चक्रोंमें उस प्रधान देवकी पूजा करनेपर वह (साधकके) घर आदिकी रक्षा करता है। अतः निम्न मन्त्रोंसे चक्रादिकी पूजा करनी चाहिये—
ॐ चक्राय स्वाहा। ॐ विचक्राय स्वाहा। ॐ सुचक्राय स्वाहा। ॐ महाचक्राय स्वाहा। ॐ असुरान्तकृत् हुं फट्। ॐ हुं सहस्रार हुं फट्।
उपर्युक्त मन्त्रोंसे की गयी पूजा द्वारकाचक्रकी पूजा कही जाती है। इस प्रकार सम्पन्न की गयी चक्रकी पूजा ‘घरमें’ सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली तथा मङ्गलदायिनी है।
(अध्याय १२)
* ‘अभ्युक्षण’ जलके द्वारा पवित्र करनेकी एक शास्त्रीय विधि है।
१०- विष्णुपञ्जरस्तोत्र
| ३२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
विष्णुपञ्जरस्तोत्र¹
श्रीहरिने पुनः कहा— हे रुद्र! अब मैं विष्णुपञ्जर नामक स्तोत्र कहता हूँ। यह स्तोत्र (बड़ा ही) कल्याणकारी है। उसे सुनें—
[मूल संस्कृत श्लोक]
प्रवक्ष्याम्यधुना ह्येतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्।
नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्॥
प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः।
गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभ नमोस्तु ते॥
याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः।
हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम॥
प्रतीच्यां रक्ष मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः।
मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्॥
उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः।
खड्गमादाय चर्माथ अस्त्रशस्त्रादिकं हरे॥
नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः।
पाञ्चजन्यं महाशङ्खमनुघोष्यं च पङ्कजम्॥
प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञशूकर²।
चन्द्रसूर्य समागृह्य खड्गं चान्द्रमसं तथा॥
नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्।
वैजयन्तीं सम्प्रगृह्य श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्॥
वायव्यां रक्ष मां देव हयग्रीव नमोऽस्तु ते।
वैनतेयं समारुह्य त्वन्तरिक्षे जनार्दन॥
मां रक्षस्वाजित सदा नमस्तेऽस्त्वपराजित।
विशालाक्षं³ समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले॥
अकूपार⁴ नमस्तुभ्यं महामीन नमोऽस्तु ते।
करशीर्षाद्यङ्गुलीषु सत्य त्वं बाहुपञ्जरम्॥
कृत्वा रक्षस्व मां विष्णो नमस्ते पुरुषोत्तम।
एतदुक्तं शङ्कराय वैष्णवं पञ्जरं महत्॥
पुरा रक्षार्थमीशान्याः कात्यायन्या वृषध्वज।
नाशयामास सा येन चामरं महिषासुरम्॥
दानवं रक्तबीजं च अन्यांश्च सुरकण्टकान्।
एतज्जपन्नरो भक्त्या शत्रून् विजयते सदा॥
(१३। १—१४)
[हिन्दी अनुवाद]
हे गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप सुदर्शनचक्र लेकर पूर्व दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पद्मनाभ! आपको मेरा नमन है। आप अपनी कौमोदकी गदा धारणकर दक्षिण दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पुरुषोत्तम! आपको मेरा प्रणाम है। आप सौनन्द नामक हल लेकर पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पुण्डरीकाक्ष! आप शातन नामक मुसल हाथमें लेकर उत्तर दिशामें मेरी रक्षा करें। हे जगन्नाथ! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे हरे! आपको मेरा नमस्कार है। आप खड्ग, चर्म (ढाल) आदि अस्त्र-शस्त्र ग्रहणकर ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें। हे दैत्यविनाशक! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे यज्ञवराह (महावराह)! आप पाञ्चजन्य नामक महाशङ्ख और अनुघोष (अनुबोध) नामक पद्म ग्रहणकर अग्निकोणमें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी रक्षा करें। हे दिव्य-शरीर भगवान् नृसिंह! आप सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रके समान चमत्कृत खड्गको धारणकर नैर्ऋत्यकोणमें मेरी रक्षा करें। हे भगवान् हयग्रीव! आपको प्रणाम है। आप वैजयन्ती माला तथा कण्ठमें सुशोभित होनेवाले श्रीवत्स नामक आभूषणसे विभूषित होकर वायुकोणमें मेरी रक्षा करें। हे जनार्दन! आप वैनतेय गरुडपर
१. 'पञ्जर'का अर्थ है—रक्षक। यह विष्णुका स्तोत्र हम सबका रक्षक है, इसलिये 'विष्णुपञ्जरस्तोत्र' कहा जाता है।
२. वामनपुराण अध्याय १७ के अनुसार 'यज्ञशूकर' पाठ उचित है।
३. विशालाक्ष —गरुडवंशविशेष (शब्दकल्पद्रुम)।
४. अकूपार —कूर्मराज (मेदिनीकोश)।
११- ध्यान-योगका वर्णन
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् शंकरद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति
१२- विष्णुसहस्रनाम
सूतजीद्वारा पुराणका प्रवचन
(चित्रान्तर्गत पाठ) गीताप्रेस, गोरखपुर
काशीमरण-मुक्ति
गीताप्रेस, गोरखपुर
गीताप्रेस, गोरखपुर
गरुड-वाहन भगवान् विष्णु
त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश)
गीताप्रेस, गोरखपुर
ॐ
उद्धारकर्ता भगवान्
गीताप्रेस, गोरखपुर
१३- भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण
काम | क्रोध | लोभ
गीताप्रेस, गोरखपुर
सत्त्वगुणी भगवद्धामको प्राप्त होता है, रजोगुणी मनुष्य होता है, तमोगुणी हीन योनियोंको प्राप्त होता है
शुभाशुभ कर्मोंके विधायक धर्मराज और यमराज
१४- मृत्युञ्जय-मन्त्र-जपकी महिमा
काण्ड ] ध्यान-योगका वर्णन ३३
आरूढ होकर अन्तरिक्षमें मेरी रक्षा करें। हे अजित! हे अपराजित! आपको सदैव मेरा प्रणाम है। हे कूर्मराज! आपको नमस्कार है। हे महामीन! आपको नमस्कार है। हे सत्यस्वरूप महाविष्णो! आप अपनी बाहुको पञ्जर (रक्षक)-जैसा स्वीकार करके हाथ, सिर, अङ्गुली आदि समस्त अङ्ग-उपाङ्गसे युक्त मेरे शरीरकी रक्षा करें। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है।
हे वृषध्वज! मैंने प्राचीन कालमें सर्वप्रथम भगवती ईशानी कात्यायनीकी रक्षाके लिये इस विष्णुपञ्जर नामक स्तोत्रको कहा था। इसी स्तोत्रके प्रभावसे उस कात्यायनीने स्वयंको अमर समझनेवाले महिषासुर, रक्तबीज और देवताओंके लिये कण्टक बने हुए अन्यान्य दानवोंका विनाश किया था। इस विष्णुपञ्जर नामक स्तुतिका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जप करता है, वह सदा अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेमें सफल होता है। (अध्याय १३)
ध्यान-योगका वर्णन
श्रीहरिने पुनः कहा—अब मैं भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले योगको कह रहा हूँ। योगियोंके द्वारा ध्यानगम्य जो देव हैं, उन्हें ही ईश्वर कहा जाता है। हे महेश्वर! उनके लिये किये जानेवाले योगको सुनें। यह योग समस्त पापोंका विनाशक है। योगीको आत्मस्वरूप परमात्माकी स्वयंमें इस प्रकार भावना करनी चाहिये—
मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही सभीका ईश्वर हूँ, मैं ही अनन्त हूँ और मैं ही छः ऊर्मियों<sup>१</sup> (शोक, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा एवं पिपासा)-से रहित हूँ। मैं ही वासुदेव हूँ, मैं ही जगन्नाथ और ब्रह्मरूप हूँ। मैं ही समस्त प्राणियोंके शरीरमें स्थित रहनेवाला आत्मा और सर्वदेहविमुक्त परमात्मा हूँ। मैं ही शरीरधर्मसे रहित, क्षर<sup>२</sup> (समस्त प्रपञ्च), अक्षर (कूटस्थ चेतन भोक्ता)-से अतीत, मनके साथ पाँच इन्द्रियोंमें मूल शक्तिरूपसे स्थित मैं स्वयं अतीन्द्रिय (इन्द्रियोंसे अग्राह्य) होता हुआ द्रष्टा, श्रोता एवं घ्राता (गन्ध ग्रहण करनेवाला) हूँ।
मैं इन्द्रियधर्मसे रहित, जगत्का स्रष्टा, नाम और गोत्रसे शून्य, मननशील सबके मनमें स्थित देवता हूँ, किंतु मुझमें मन नहीं है और न तो उसका धर्म ही है। मैं ही विज्ञान<sup>३</sup> तथा ज्ञानस्वरूप<sup>४</sup> हूँ। मैं ही समस्त ज्ञानका आश्रय, बुद्धिरूप गुहामें स्थित प्राणिमात्रका साक्षी (तटस्थ द्रष्टा) तथा सर्वज्ञ और बुद्धिकी अधीनतासे मुक्त हूँ। मैं ही बुद्धिके धर्मोंसे भी शून्य हूँ, मैं ही सर्वस्वरूप, सर्वगतमनस्वरूप और प्राणिमात्रके किसी भी प्रकारके बन्धनसे सर्वथा विनिर्मुक्त तथा प्राणधर्म<sup>५</sup> (बुभुक्षा एवं पिपासा)-से विमुक्त हूँ। मैं ही प्राणियोंका प्राणस्वरूप हूँ, मैं ही महाशान्त, भयशून्य तथा अहंकारादिसे रहित हूँ और अहंकारजन्य विकारोंसे भी मैं रहित हूँ।
मैं जगत्का साक्षी, जगत्का नियन्ता और परमानन्दस्वरूप हूँ। जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति—इन सभी अवस्थाओंमें जगत्का साक्षी होते हुए भी मैं इन अवस्थाओंसे रहित हूँ। मैं ही तुरीय ब्रह्म और विधाता हूँ। मैं ही दृग्रूप<sup>६</sup> हूँ। मैं ही निर्गुण,
१. 'शोकमोहौ जरामृत्यू क्षुत्पिपासे षडूर्मयः' (शब्दकल्पद्रुम)।
२. 'क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते' (गीता १५। १७)-के अनुसार समस्त प्रपञ्च क्षर है। 'अक्षर'का अर्थ कूटस्थ है।
श्रीधरसरस्वतीने 'कूटस्थ'का अर्थ चेतन भोक्ता किया है।
३. 'विज्ञान'—परमार्थज्ञान। ४. 'ज्ञान'—व्यावहारिक ज्ञान। ५. बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य••••• (शब्दकल्पद्रुम)।
६. 'दृग्रूप' का तात्पर्य यह है—समस्त प्रपञ्च द्रष्टा, दृश्य एवं दृष्टि—इन तीनोंमें अन्तर्हित है। परमेश्वर विष्णु ही द्रष्टा हैं, वे ही दृश्य हैं, दृष्टि भी वे ही हैं। यह दृष्टि ही 'दृग्' शब्दसे कही जाती है।
१५- सर्पोंके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र (प्राणेश्वरी विद्या)
| ३४ | संक्षिप्त गरुड़पुराण | [ आचार- |
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मुक्त, बुद्ध, शुद्ध-प्रबुद्ध, अजर, सर्वव्यापी, सत्यस्वरूप एवं शिवस्वरूप परमात्मा हूँ।
इस प्रकार जो विद्वान् इन परमपद-परमेश्वरका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही ईश्वरका सारूप्य प्राप्त कर लेते हैं, इसमें संदेह नहीं है। हे सुव्रत शङ्कर! आपसे ही इस ध्यानयोगकी चर्चा मैंने की है। जो व्यक्ति सदैव इस ध्यानयोगका पाठ (चिन्तन-मनन) करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १४)
विष्णुसहस्रनाम
श्रीरुद्रने पूछा—हे प्रभो! मनुष्य किस मन्त्रका जप करके इस अथाह संसार-सागरसे पार हो सकता है? आप जप करनेयोग्य उस श्रेष्ठ मन्त्रको मुझे बतायें।
श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! परम ब्रह्म, परमात्मा, नित्य, परमेश्वर भगवान् विष्णुकी सहस्रनामसे स्तुति करनेपर मनुष्य भवसागरको पार कर सकता है। हे वृषभध्वज! मैं उस पवित्र, श्रेष्ठतम और जप करनेयोग्य (विष्णु) 'सहस्रनाम' को कहता हूँ। वह समस्त पापोंको विनष्ट करनेवाला स्तोत्र है। आप उसे सावधान होकर सुनें—
ॐ वासुदेवो महाविष्णुर्वामनो वासवो वसुः।
बालचन्द्रनिभो बालो बलभद्रो बलाधिपः॥
बलिबन्धनकृद्देवा वरेण्यो वेदवित् कविः।
वेदकर्ता वेदरूपो वेद्यो वेदपरिप्लुतः॥
वेदाङ्गवेत्ता वेदेशो बलाधारो बलार्दनः।
अविकारो वरेशश्च वरुणो वरुणाधिपः॥
वीरहा च बृहद्वीरो वन्दितः परमेश्वरः।
आत्मा च परमात्मा च प्रत्यगात्मा वियत्परः॥
पद्मनाभः पद्मनिधिः पद्महस्तो गदाधरः (धराधरः)।
परमः परभूतश्च पुरुषोत्तम ईश्वरः॥
पद्मजङ्घः पुण्डरीकः पद्ममालाधरः प्रियः।
पद्माक्षः पद्मगर्भश्च पर्जन्यः पद्मसंस्थितः॥
अपारः परमार्थश्च पराणां च परः प्रभुः।
पण्डितः पण्डितेड्यश्च पवित्रः पापमर्दकः॥
शुद्धः प्रकाशरूपश्च पवित्रः परिरक्षकः।
पिपासावर्जितः पाद्यः पुरुषः प्रकृतिस्तथा॥
प्रधानं पृथिवीपद्मं पद्मनाभः प्रियप्रदः (प्रियंवदः)।
सर्वेशः सर्वगः सर्वः सर्ववित् सर्वदः सुरः (परः)॥
सर्वस्य जगतो धाम सर्वदर्शी च सर्वभृत्।
सर्वानुग्रहकृद्देवः सर्वभूतहृदि स्थितः॥
सर्वपूज्यश्च सर्वाद्यः सर्वदेवनमस्कृतः।
सर्वस्य जगतो मूलं सकलो निष्कलोऽनलः॥
सर्वगोप्ता सर्वनिष्ठः सर्वकारणकारणम्।
सर्वध्येयः सर्वमित्रः सर्वदेवस्वरूपधृक्॥
सर्वाध्यक्षः सुराध्यक्षः सुरासुरनमस्कृतः।
दुष्टानां चासुराणां च सर्वदा घातकोऽन्तकः॥
सत्यपालश्च सन्नाभः सिद्धेशः सिद्धवन्दितः।
सिद्धसाध्यः सिद्धसिद्धः साध्यसिद्धो (सिद्धिंसिद्धः) हृदीश्वरः॥
शरणं जगतश्चैव श्रेयः क्षेमस्तथैव च।
शुभकृच्छोभनः सौम्यः सत्यः सत्यपराक्रमः॥
सत्यस्थः सत्यसङ्कल्पः सत्यवित् सत्य(त्र)दस्तथा।
धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जितः॥
कर्मकर्ता च कर्मैव क्रिया कार्यं तथैव च।
श्रीपतिर्नृपतिः श्रीमान् सर्वस्य पतिरूर्जितः॥
सदेवानां पतिश्चैव वृष्णीनां पतिरीडितः।
पतिर्हिरण्यगर्भस्य त्रिपुरान्तपतिस्तथा॥
पशूनां च पतिः प्रायो वसूनां पतिरेव च।
पतिराखण्डलस्यैव वरुणस्य पतिस्तथा॥
वनस्पतीनां च पतिरनिलस्य पतिस्तथा।
अनलस्य पतिश्चैव यमस्य पतिरेव च॥
कुबेरस्य पतिश्चैव नक्षत्राणां पतिस्तथा।
ओषधीनां पतिश्चैव वृक्षाणां च पतिस्तथा॥
काण्ड ] विष्णुसहस्रनाम ३५
नागानां पतिरर्कस्य दक्षस्य पतिरेव च।
सुहृदां च पतिश्चैव नृपाणां च पतिस्तथा॥
गन्धर्वाणां पतिश्चैव असूनां पतिरुत्तमः।
पर्वतानां पतिश्चैव निम्नागानां पतिस्तथा॥
सुराणां च पतिः श्रेष्ठः कपिलस्य पतिस्तथा।
लतानां च पतिश्चैव वीरुधां च पतिस्तथा॥
मुनीनां च पतिश्चैव सूर्यस्य पतिरुत्तमः।
पतिश्चन्द्रमसः श्रेष्ठः शुक्रस्य पतिरेव च॥
ग्रहाणां च पतिश्चैव राक्षसानां पतिस्तथा।
किन्नराणां पतिश्चैव द्विजानां पतिरुत्तमः॥
सरितां च पतिश्चैव समुद्राणां पतिस्तथा।
सरसां च ( रसानां च ) पतिश्चैव भूतानां च पतिस्तथा॥
वेतालानां पतिश्चैव कूष्माण्डानां पतिस्तथा।
पक्षिणां च पतिः श्रेष्ठः पशूनां पतिरेव च॥
महात्मा मङ्गलो मेयो मन्दरो मन्दरेश्वरः।
मेरुर्माता प्रमाणं च माधवो मलवर्जितः॥
मालाधरो महादेवो महादेवेन पूजितः।
महाशान्तो महाभागो मधुसूदन एव च॥
महावीर्यो महाप्राणो मार्कण्डेयर्षिवन्दितः।
मायात्मा मायया बद्धो मायया तु विवर्जितः॥
मुनिस्तुतो मुनिर्मैत्रो महाना ( रा ) सो महाहनुः।
महाबाहुर्महादान्तो ( महादन्तो ) मरणेन विवर्जितः॥
महावक्त्रो महात्मा च महाकायो महोदरः।
महापादो महाग्रीवो महामानी महामनाः॥
महागतिर्महाकीर्तिर्महारूपो महासुरः।
मधुश्च माधवश्चैव महादेवो महेश्वरः॥
मखेज्यो मखरूपी च माननीया मखेश्वरः (महेश्वरः)।
महावातो महाभागो महेशोऽतीतमानुषः॥
मानवश्चै¹ मनुश्चैव मानवानां प्रियङ्करः।
मृगश्च मृगपूज्यश्च मृगाणां च पतिस्तथा॥
बुधस्य च पतिश्चैव पतिश्चैव बृहस्पतेः।
पतिः शनैश्चरस्यैव राहोः केतोः पतिस्तथा॥
लक्ष्मणो लक्षणश्चैव लम्बौष्ठो ललितस्तथा।
नानालङ्कारसंयुक्तो नानाचन्दनचर्चितः॥
नानारसोज्ज्वलद्वक्त्रो नानापुष्पोपशोभितः।
रामो रमापतिश्चैव सभार्यः² परमेश्वरः॥
रत्नदो रत्नहर्ता च रूपी रूपविवर्जितः।
महारूपोग्ररूपश्च सौम्यरूपस्तथैव च॥
नीलमेघनिभः शुद्धः कालमेघनिभस्तथा।
धूम्रवर्णः पीतवर्णो नानारूपो ( नानावर्णो ) ह्यवर्णकः॥
विरूपो रूपदश्चैव शुक्लवर्णस्तथैव च।
सर्ववर्णो महायोगी यज्ञो ( याज्यो ) यज्ञकृदेव च॥
सुवर्णवर्णांश्चैव सुवर्णाख्यस्तथैव च।
सुवर्णावयवश्चैव सुवर्णः स्वर्णमेखलः॥
सुवर्णस्य प्रदाता च सुवर्णेशस्तथैव ( सुवर्णाशस्तथैव च ) च।
सुवर्णस्य प्रियश्चैव सुवर्णाढ्यस्तथैव च॥
सुपर्णी च महापर्णी सुपर्णस्य च कारणम्।
वैनतेयस्तथादित्य आदिरदिकरः शिवः॥
कारणं महतश्चैव प्रधानस्य च कारणम्।
बुद्धीनां कारणं चैव कारणं मनसस्तथा॥
कारणं चेतसश्चैव अहङ्कारस्य कारणम्।
भूतानां कारणं तद्वत् कारणं च विभावसोः॥
आकाशकारणं तद्वत् पृथिव्याः कारणं परम्।
अण्डस्य कारणं चैव प्रकृतेः कारणं तथा॥
देहस्य कारणं चैव चक्षुषश्चैव कारणम्।
श्रोत्रस्य कारणं तद्वत् कारणं च त्वचस्तथा॥
जिह्वायाः कारणं चैव प्राणस्यैव च कारणम्।
हस्तयोः कारणं तद्वत् पादयोः कारणं तथा॥
वाचश्च कारणं तद्वत् पायोश्चैव तु कारणम्।
इन्द्रस्य कारणं चैव कुबेरस्य च कारणम्॥
यमस्य कारणं चैव ईशानस्य च कारणम्।
यक्षाणां कारणं चैव रक्षसां कारणं परम्॥
नृपाणां कारणं श्रेष्ठं धर्मस्यैव तु कारणम्।
जन्तूनां कारणं चैव वसूनां कारणं परम्॥
१-मानवो मनुजश्चैव०। २-त्रातार्यः पर०।
| ३६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
[प्रथम स्तम्भ]
मनूनां कारणं चैव पक्षिणां कारणं परम्।
मुनीनां कारणं श्रेष्ठं योगिनां कारणं परम्॥
सिद्धानां कारणं चैव यक्षाणां कारणं परम्।
कारणं किन्नराणां च गन्धर्वाणां च कारणम्॥
नदानां कारणं चैव नदीनां कारणम् परम्।
कारणं च समुद्राणां वृक्षाणां कारणं तथा॥
कारणं वीरुधां चैव लोकानां कारणं तथा।
पातालकारणं चैव देवानां कारणं तथा॥
सर्पाणां कारणं चैव श्रेयसां कारणं तथा।
पशूनां कारणं चैव सर्वेषां कारणं तथा॥
देहात्मा चेन्द्रियात्मा च आत्मा बुद्धिस्तथैव च।
मनसश्च तथैवात्मा चात्माहङ्कारचेतसः १॥
जाग्रतः स्वपतश्चात्मा महदात्मा परस्तथा।
प्रधानस्य परात्मा च आकाशात्मा ह्यपां तथा॥
पृथिव्याः परमात्मा च रसस्यात्मा तथैव च।
गन्धस्य परमात्मा च रूपस्यात्मा परस्तथा॥
शब्दात्मा चैव वागात्मा स्पर्शात्मा पुरुषस्तथा।
श्रोत्रात्मा च त्वगात्मा च जिह्वात्मा परमस्तथा॥
घ्राणात्मा चैव हस्तात्मा पादात्मा परमस्तथा।
उपस्थस्य तथैवात्मा पाय्वात्मा परमस्तथा॥
इन्द्रात्मा चैव ब्रह्मात्मा रुद्र (शान्ता) त्मा च मनोस्तथा।
दक्षप्रजापतेरात्मा सत्या (स्त्रष्टा) त्मा परमस्तथा॥
ईशात्मा परमात्मा च रौद्रात्मा मोक्षविद्यतिः।
यलवांश्च तथा यलश्रर्मी खड्गी मुरान्तकः (असुरान्तकः)॥
ह्रीप्रवर्तनशीलश्च यतीनां च हिते रतः।
यतिरूपी च योगी च योगिध्येयो हरिः शितिः॥
संविन्मेधा च कालश्च ऊष्मा वर्षा म (न) तिस्तथा।
संवत्सरो मोक्षकरो मोहप्रध्वंसकस्तथा॥
मोहकर्ता च दुष्टानां माण्डव्यो वडवामुखः।
संवर्तः कालकर्ता च गौतमो भृगुरङ्गिराः॥
अत्रिर्वसिष्ठः पुलहः पुलस्त्यः कुत्स एव च।
याज्ञवल्क्यो देवलश्च व्यासश्चैव पराशरः॥
[द्वितीय स्तम्भ]
शर्मदश्चैव गाङ्गेयो हृषीकेशो बृहच्छ्रवाः।
केशवः क्लेशहन्ता च सुकर्णः कर्णवर्जितः॥
नारायणो महाभागः प्राणस्य पतिरेव च।
अपानस्य पतिश्चैव व्यानस्य पतिरेव च॥
उदानस्य पतिः श्रेष्ठः समानस्य पतिस्तथा।
शब्दस्य च पतिः श्रेष्ठः स्पर्शस्य पतिरेव च॥
रूपाणां च पतिश्चाद्यः खड्गपाणिर्हलायुधः।
चक्रपाणिः कुण्डली च श्रीवत्साङ्कस्तथैव च॥
प्रकृतिः कौस्तुभग्रीवः पीताम्बरधरस्तथा।
सुमुखो दुर्मुखश्चैव मुखेन तु विवर्जितः॥
अनन्तोऽननन्तरूपश्च सुनखः सुरमन्दरः।
सुकपोलो विभुर्जिष्णुर्भ्राजिष्णुश्चैषुषधीस्तथा॥
हिरण्यकशिपोर्हन्ता हिरण्याक्षविमर्दकः।
निहन्ता पूतनायाश्च भास्करान्तविनाशनः॥
केशिनो दलनश्चैव मुष्टिकस्य विमर्दकः।
कंसदालवभेत्ता च चाणूरस्य (धेनुकस्य) प्रमर्दकः॥
अरिष्टस्य निहन्ता च अक्रूरप्रिय एव च।
अक्रूरः क्रूररूपश्च अक्रूरप्रियवन्दितः॥
भगहा भगवान् भानुस्तथा भागवतः स्वयम्।
उद्धवश्चोद्धवस्येशो ह्युद्धवेन विचिन्तितः॥
चक्रधृक् चञ्चलश्चैव चलाचलविवर्जितः।
अहङ्कारोपमश्रितं गगनं पृथिवी जलम्॥
वायुश्चक्षुस्तथा श्रोत्रं जिह्वा च घ्राणमेव च।
वाक्पाणिपादजवनः२ पायूपस्थस्तथैव च॥
शङ्करश्चैव सर्वश्च क्षान्तिदः क्षान्तिकुन्नरः।
भक्तप्रियस्तथा भर्त्ता भक्तिमान् भक्तिवर्धनः॥
भक्तस्तुतो भक्तपरः कीर्तिदः कीर्तिवर्धनः।
कीर्तिर्दीप्तिः क्षमाकान्तिर्भक्तश्चैव दया परा॥
दानं दाता च कर्ता च देवदेवप्रियः शुचिः।
शुचिमान् सुखदो मोक्षः कामश्चार्थः सहस्रपात्॥
सहस्रशीर्षा वैद्यश्च मोक्षद्वारं तथैव च।
प्रजाद्वारं सहस्राक्षः सहस्रकर एव च॥
पादटिप्पणी:
१-बाह्याहंकार०।
२-पाणिपादाविति पा०।
१६- पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि
| काण्ड ] | विष्णुसहस्रनाम | ३७ |
|---|
| शुकश्च ( सुभ्रूः ) सुकिरीटी च सुग्रीवः कौस्तुभस्तथा। | सूक्ष्मश्चैव सुसूक्ष्मश्च स्थूलात्स्थूलतरस्तथा॥ |
| प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च हयग्रीवश्च सूकरः॥ | विशारदो बलाध्यक्षः सर्वस्य क्षोभकस्तथा। |
| मत्स्यः परशुरामश्च प्रह्लादो बलिरेव च। | प्रकृतेः क्षोभकश्चैव महतः क्षोभकस्तथा॥ |
| शरण्यश्चैव नित्यश्च बुद्धो मुक्तः शरीरभृत्॥ | भूतानां क्षोभकश्चैव बुद्धेश्च क्षोभकस्तथा। |
| खरदूषणहन्ता च रावणस्य प्रमर्दनः। | इन्द्रियाणां क्षोभकश्च विषयक्षोभकस्तथा॥ |
| सीतापतिश्च वर्धिष्णुर्भरतश्च तथैव च॥ | ब्रह्मणः क्षोभकश्चैव रुद्रस्य क्षोभकस्तथा। |
| कुम्भेन्द्रजिन्निहन्ता च कुम्भकर्णप्रमर्दनः। | अगम्यश्चक्षुरादेश्च श्रोत्रागम्यस्तथैव च॥ |
| नरान्तकान्तकश्चैव देवान्तकविनाशनः॥ | त्वचा न गम्यः कूर्मश्च जिह्वाग्राह्यस्तथैव च। |
| दुष्टासुरनिहन्ता च शम्बरारिस्तथैव च। | घ्राणेन्द्रियागम्य एव वाचाऽग्राह्यस्तथैव च॥ |
| नरकस्य निहन्ता च त्रिशीर्षस्य विनाशनः॥ | अगम्यश्चैव पाणिभ्यां पदागम्यस्तथैव च। |
| यमलार्जुनभेत्ता च तपोहितकरस्तथा। | अग्राह्यो मनसश्चैव बुद्ध्याऽग्राह्यो हरिस्तथा॥ |
| वादित्रं चैव वाद्यं च बुद्धश्चैव वरप्रदः॥ | अहं बुद्ध्या तथा ग्राह्यश्चेतसा ग्राह्य एव च। |
| सारः सारप्रियः सौरः कालहन्तृनिकृन्तनः। | शङ्खपाणिश्चाव्ययश्च गदापाणिस्तथैव च॥ |
| अगस्त्यो देवलश्चैव नारदो नारदप्रियः॥ | शार्ङ्गपाणिश्च कृष्णश्च ज्ञानमूर्तिः परन्तपः। |
| प्राणोऽपानस्तथा व्यानो रजः सत्त्वं तमः शरत्। | तपस्वी ज्ञानगम्यो हि ज्ञानी ज्ञानविदेव च॥ |
| उदानश्च समानश्च भेषजं च भिषक् तथा॥ | ज्ञेयश्च ज्ञेयहीनश्च ज्ञप्तिश्चैतन्यरूपकः। |
| कूटस्थः स्वच्छरूपश्च सर्वदेहविवर्जितः। | भावो भाव्यो भवकरो भावनो भवनाशनः॥ |
| चक्षुरिन्द्रियहीनश्च वागिन्द्रियविवर्जितः॥ | गोविन्दो गोपतिर्गोपः सर्वगोपीसुखप्रदः। |
| हस्तेन्द्रियविहीनश्च पादाभ्यां च विवर्जितः। | गोपालो गोगतिश्चैव गोमतिर्गोधरस्तथा॥ |
| पायूपस्थविहीनश्च महातापविवर्जितः॥ | उपेन्द्रश्च नृसिंहश्च शौरिश्चैव जनार्दनः। |
| प्रबोधेन विहीनश्च बुद्ध्या चैव विवर्जितः। | आरणेयो बृहद्भानुर्बृहद्दीप्तिस्तथैव च॥ |
| चेतसा विगतश्चैव प्राणेन च विवर्जितः॥ | दामोदरस्त्रिकालश्च कालज्ञः कालवर्जितः। |
| अपानेन विहीनश्च व्यानेन च विवर्जितः। | त्रिसन्ध्यो द्वापरं त्रेता प्रजाद्वारं त्रिविक्रमः॥ |
| उदानेन विहीनश्च समानेन विवर्जितः॥ | विक्रमो दण्ड ( र ) हस्तश्च ह्येकदण्डी त्रिदण्डधृक्। |
| आकाशेन विहीनश्च वायुना परिवर्जितः। | सामभेदस्तथोपायः सामरूपी च सामगः॥ |
| अग्निना च विहीनश्च उदकेन विवर्जितः॥ | सामवेदो ह्यथर्वश्च सुकृतः सुतरूपणः। |
| पृथिव्या च विहीनश्च शब्देन च विवर्जितः। | अथर्ववेदविच्चैव ह्यथर्वाचार्य एव च॥ |
| स्पर्शेन च विहीनश्च सर्वरूपविवर्जितः॥ | ऋग्रूपी चैव ऋग्वेद ऋग्वेदेषु प्रतिष्ठितः। |
| रागेण विगतश्चैव अघेन परिवर्जितः। | यजुर्वेत्ता यजुर्वेदो यजुर्वेदविदेकपात्॥ |
| शोकेन रहितश्चैव वचसा परिवर्जितः॥ | बहुपाच्च सुपाच्चैव तथैव च सहस्रपात्। |
| रजोविवर्जितश्चैव विकारैः षड्भिरेव च। | चतुष्पाच्च द्विपाच्चैव स्मृतिर्नार्यो यमो बली॥ |
| कामेन वर्जितश्चैव क्रोधेन परिवर्जितः॥ | संन्यासी चैव संन्यासश्चतुराश्रम एव च। |
| लोभेन विगतश्चैव दम्भेन च विवर्जितः। | ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः॥ |
| ३८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वर्णस्तथैव च।
शीलदः शीलसम्पन्नो दुःशीलपरिवर्जितः॥
मोक्षोऽध्यात्मसमाविष्टः स्तुतिः स्तोता च पूजकः।
पूज्यो वाक्करणं चैव वाच्यं चैव तु वाचकः॥
वेत्ता व्याकरणं चैव वाक्यं चैव च वाक्यवित्।
वाक्यगम्यस्तीर्थवासी तीर्थस्तीर्थी च तीर्थवित्॥
तीर्थादिभूतः साङ्ख्यश्च निरुक्तं त्वधिदैवतम्।
प्रणवः प्रणवेशश्च प्रणवेन प्रवन्दितः॥
प्रणवेन च लक्ष्यो वै गायत्री च गदाधरः।
शालग्रामनिवासी च शालग्रामस्तथैव च॥
जलशायी योगशायी शेषशायी कुशेशयः।
महीभर्ता च कार्यं च कारणं पृथिवीधरः॥
प्रजापतिः शाश्वतश्च काम्यः कामयिता विराट्।
सम्राट् पूषा तथा स्वर्गो रथस्थः सारथिर्बलम्॥
धनी धनप्रदो धन्यो यादवानां हिते रतः।
अर्जुनस्य प्रियश्चैव ह्यर्जुनो भीम एव च॥
पराक्रमो दुर्विषहः सर्वशास्त्रविशारदः।
सारस्वतो महाभीष्मः पारिजातहरस्तथा॥
अमृतस्य प्रदाता च क्षीरोदः क्षीरमेव च।
इन्द्रात्मजस्तस्य गोप्ता गोवर्धनधरस्तथा॥
कंसस्य नाशनस्तद्वद्धस्तिपो हस्तिनाशनः।
शिपिविष्टः प्रसन्नश्च सर्वलोकार्तिनाशनः॥
मुद्रो मुद्रा करश्चैव सर्वमुद्राविवर्जितः।
देही देहस्थितश्चैव देहस्य च नियामकः॥
श्रोता श्रोतृनियन्ता च श्रोतव्यः श्रवणं तथा।
त्वक्स्थितश्च स्पर्शयित्वा स्पृश्यं च स्पर्शनं तथा॥
रूपद्रष्टा च चक्षुःस्थो नियन्ता चक्षुषस्तथा।
दृश्यं चैव तु जिह्वास्थो रसज्ञश्च नियामकः॥
घ्राणस्थो घ्राणकृद् घ्राता घ्राणेन्द्रियनियामकः।
वाक्स्थो वक्ता च वक्तव्यो वचनं वाङ्नियामकः॥
प्राणिस्थः शिल्पकृच्छिल्पो हस्तयोश्च नियामकः।
पदव्यश्चैव गन्ता च गन्तव्यं गमनं तथा॥
नियन्ता पादयोश्चैव पाद्यभाक् च विसर्गकृत्।
विसर्गस्य नियन्ता च ह्युपस्थस्थः सुखं तथा॥
उपस्थस्य नियन्ता च तदानन्दकरश्च ह।
शत्रुघ्नः कार्तवीर्यश्च दत्तात्रेयस्तथैव च॥
अलर्कस्य हितश्चैव कार्तवीर्यनिकृन्तनः।
कालनेमिर्महानेमिर्मेघो मेघपतिस्तथा॥
अन्नप्रदोऽन्नरूपी च ह्यन्नादोऽन्नप्रवर्तकः।
धूमकृद्धूमरूपश्च देवकीपुत्र उत्तमः॥
देवक्यानन्दनों नन्दो रोहिण्याः प्रिय एव च।
वसुदेवप्रियश्चैव वसुदेवसुतस्तथा॥
दुन्दुभिर्हासरूपश्च पुष्पहासस्तथैव च।
अट्टहासप्रियश्चैव सर्वाध्यक्षः क्षरोऽक्षरः॥
अच्युतश्चैव सत्येशः सत्यायाश्च प्रियो वरः।
रुक्मिण्याश्च पतिश्चैव रुक्मिण्या वल्लभस्तथा॥
गोपीनां वल्लभश्चैव पुण्यश्लोकश्च विश्रुतः।
वृषाकपियर्मो गुह्यो मकुलश्च<sup>१</sup> बुधस्तथा॥
राहुः केतुर्ग्रहो ग्राहो गजेन्द्रमुखमेलकः<sup>२</sup>।
ग्राहस्य विनिहन्ता च ग्रामणी रक्षकस्तथा॥
किन्नरश्चैव सिद्धश्च छन्दः स्वच्छन्द एव च।
विश्वरूपो विशालाक्षो दैत्यसूदन एव च॥
अनन्तरूपो भूतस्थो देवदानवसंस्थितः।
सुषुप्तिस्थः सुषुप्तिश्च स्थानं स्थानान्त एव च॥
जगत्स्थश्चैव जागर्ता स्थानं जागरितं तथा।
स्वप्नस्थः स्वप्नवित् स्वप्नस्थानं स्वप्नस्तथैव च॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तैश्च विहीनो वै चतुर्थकः।
विज्ञानं वेद्यरूपं च जीवो जीवयिता तथा॥
भुवनाधिपतिश्चैव भुवनानां नियामकः।
पातालवासी पातालं सर्वज्वरविनाशनः॥
परमानन्दरूपी च धर्माणां च प्रवर्तकः।
सुलभो दुर्लभश्चैव प्राणायामपरस्तथा॥
प्रत्याहारो धारकश्च प्रत्याहारकरस्तथा।
प्रभा कान्तिस्तथा हार्चिः शुद्धः स्फटिकसंनिभः॥
१-मङ्गलश्च बुध इति पा०। २-गजेन्द्रमुपखेल०।
| काण्ड ] | भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण | ३९ |
|---|
अग्राह्यश्चैव गौरश्च सर्वः शुचिरभीष्टुतः।
वषट्कारो वषड् वौषट् स्वधा स्वाहा रतिस्तथा॥
पक्ता नन्दयिता भोक्ता बोद्धा भावयिता तथा।
ज्ञानात्मा चैव देहात्मा भू (उ) मा सर्वेश्वरेश्वरः॥
नदी नन्दी च नन्दीशो भारतस्तरुनाशनः।
चक्रपः श्रीपतिश्चैव नृपाणां चक्रवर्तिनाम्॥
ईशश्च सर्वदेवानां द्वारकासंस्थितस्तथा।
पुष्करः पुष्कराध्यक्षः पुष्करद्वीप एव च॥
भरतो जनको जन्यः सर्वाकारविवर्जितः।
निराकारो निर्निमित्तो निरांतंको निराश्रयः॥
इति नामसहस्रं ते वृषभध्वज कीर्तितम्।
देवस्य विष्णोरीशस्य सर्वपापविनाशनम्॥
पठन् द्विजश्च विष्णुत्वं क्षत्रियो जयमाप्नुयात्।
वैश्यो धनं सुखं शूद्रो विष्णुभक्तिसमन्वितः॥
हे वृषभध्वज! मैंने सर्वपापविनाशक, जगदीश्वर, देवाधिदेव विष्णुके इस सहस्रनामका जो कीर्तन किया है, इसका पाठ करनेसे ब्राह्मण विष्णुत्व अर्थात् विष्णुस्वरूप, क्षत्रिय विजय, वैश्य धन तथा सुख और शूद्र विष्णुकी भक्ति प्राप्त करता है।
(अध्याय १५)
भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण
रुद्रने कहा— हे शंख-चक्र और गदाको धारण करनेवाले भगवान् हरि! आप पुनः देवदेवेश्वर शुद्धरूप परमात्मा विष्णुके ध्यानका वर्णन करें।
हरिने कहा— हे रुद्र! संसाररूपी वृक्षका विनाश करनेवाले वे हरि ज्ञानरूप, अनन्त, सर्वव्यास, अजन्मा और अव्यय हैं। वे अविनाशी, सर्वत्रगामी, नित्य, महान्, अद्वितीय ब्रह्म हैं। सम्पूर्ण संसारके मूल कारण तथा समस्त चराचरमें गतिमान् परमेश्वर हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयमें निवास करनेवाले तथा सभीके ईश्वर हैं, सम्पूर्ण जगत्का आधार होते हुए भी वे स्वयं निराधार हैं। सभी कारणोंके कारण हैं।
सांसारिक विषयोंकी आसक्तिसे परे उनकी स्थिति है, वे निर्मुक्त हैं। मुक्त योगियोंके ध्येय हैं। वे स्थूल शरीरसे रहित नेत्र, पाणि, पाद, पायु, उपस्थादि समस्त इन्द्रियोंसे विहीन हैं। वे हरि मन एवं मनके धर्म सङ्कल्प-विकल्प आदिसे रहित हैं। वे बुद्धि (भौतिक इन्द्रियविशेष)-से रहित, बुद्धि-धर्म-विवर्जित, अहंकारसे शून्य, चित्तसे अग्राह्य, प्राण-अपान-व्यानादि वायुसे रहित हैं।
हरिने कहा— अब मैं सूर्यकी पूजाका पुनः वर्णन करता हूँ, जो प्राचीन कालमें भृगु ऋषिको सुनायी गयी थी।
'ॐ खखोल्काय नमः'— यह भगवान् सूर्यदेवका मूल मन्त्र है, जो साधकको भोग और मोक्ष प्रदान करता है। (निम्न मन्त्रसे अङ्गन्यास करके साधकको सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये।) यथा—
'ॐ खखोल्काय त्रिदशाय नमः।' 'ॐ विचि ठठ शिरसे नमः।' 'ॐ ज्ञानिने ठठ शिखायै नमः।' 'ॐ सहस्ररश्मये ठठ कवचाय नमः।' 'ॐ सर्वतेजोऽधिपतये ठठ अस्त्राय नमः।' 'ॐ ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ठठ नमः।'
सूर्यका यह मन्त्र साधकके समस्त पापोंका विनाश करनेवाला है। इसे अग्नि-प्राकार मन्त्र भी कहते हैं।
भगवान् सूर्यको प्रसन्न करनेवाला मन्त्र इस प्रकार है, यह सूर्य-गायत्री-मन्त्र कहलाता है—इस मन्त्र-जपके पश्चात् साधकको सूर्य एवं गायत्रीका सकलीकरण करना चाहिये—
| ४० | संक्षिप्त गरुड़पुराण | [ आचार- |
|---|
‘ॐ आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।’
साधकको प्रत्येक दिशा-प्रदिशामें निम्नलिखित दिक्पाल देवोंके लिये प्रणाम निवेदन करना चाहिये—
‘ॐ धर्मात्मने नमः’ पूर्वमें, ‘ॐ यमाय नमः’ दक्षिणमें, ‘ॐ दण्डनायकाय नमः’ पश्चिममें, ‘ॐ दैवताय नमः’ उत्तरमें, ‘ॐ श्यामपिंगलाय नमः’ ईशानमें, ‘ॐ दीक्षिताय नमः’ अग्निकोणमें, ‘ॐ वज्रपाणये नमः’ नैर्ऋत्यकोणमें, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः नमः’ वायुकोणमें।
हे वृषध्वज! साधकको चाहिये कि वह निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे पूर्वादि दिशाओंसे प्रारम्भ करके ईशानकोणतक चन्द्रादि ग्रहोंकी भी पूजा करे—
‘ॐ चन्द्राय नक्षत्राधिपतये नमः।’ ‘ॐ अङ्गारकाय क्षितिसुताय नमः।’ ‘ॐ बुधाय सोमसुताय नमः।’ ‘ॐ वागीश्वराय सर्वविद्याधिपतये नमः।’ ‘ॐ शुक्राय महर्षये भृगुसुताय नमः।’ ‘ॐ शनैश्चराय सूर्यात्मजाय नमः।’ ‘ॐ राहवे नमः।’ ‘ॐ केतवे नमः।’
निम्न तीन मन्त्रोंसे सूर्यदेवको प्रणाम करके उन देवको अर्घ्यादि प्रदान करनेके लिये आवाहित करना चाहिये—
‘ॐ अनूरुकाय नमः।’ ‘ॐ प्रमथनाथाय नमः।’ ‘ॐ बुधाय नमः।’
‘ॐ भगवन्नपरिमितमयूखमालिन् सकलजगत्पते सप्ताश्ववाहन चतुर्भुज परमसिद्धिप्रद विस्फुलिङ्गपिङ्गल तत् एहोहि इदमर्घ्यं मम शिरसि गतं गृह् गृह् तेजोग्ररूपम् अनग्र ज्वल ज्वल ठठ नमः।’
उपर्युक्त मन्त्रसे आवाहित इन अभीष्ट देवका निम्न मन्त्रसे विसर्जन करे—
‘ॐ नमो भगवते आदित्याय सहस्रकिरणाय गच्छ सुखं पुनरागमनाय।’
हे सहस्ररश्मि भगवान् आदित्य! आपके लिये मेरा प्रणाम है। हे कृपालु! आप पुनः आगमनके लिये सुखपूर्वक पधारें।
हरिने कहा—हे रुद्र! मैं पुनः सूर्य-पूजाकी विधिका वर्णन करूँगा, जिसे मैंने पहले कुबेरसे कहा था।
[सूर्यपूजा प्रारम्भ करनेसे पूर्व] एकाग्रचित्त होकर पवित्र स्थानपर कर्णिकायुक्त अष्टदलकमल बनाये। तदनन्तर सूर्यदेवका आवाहन करे। तत्पश्चात् भूमिपर निर्मित कमलदलके मध्यमें यन्त्ररूपी खखोल्क भगवान् सूर्यकी उनके परिकरोंके साथ स्थापना करे तथा उन्हें स्नान कराये।
हे शिव! इसके बाद साधक अग्निकोणमें (अभीष्ट) देवके हृदयकी स्थापना करे। ईशानकोणमें सिरकी स्थापना करके नैर्ऋत्यकोणमें शिखाका विन्यास करे। वह पुनः एकाग्रचित्त होकर पूर्व दिशामें उनके धर्म, वायुकोणमें उनके नेत्र और पश्चिम दिशामें उनके अस्त्रका विन्यास करे।
इसी प्रकार अष्टदलकमलके ईशानकोणमें चन्द्र, पूर्व दिशामें मंगल, अग्निकोणमें बुध, दक्षिण दिशामें बृहस्पति, नैर्ऋत्यकोणमें शुक्र, पश्चिम दिशामें शनि, वायुकोणमें केतु एवं उत्तर दिशामें राहुके पूजनका विधान है। अतः (साधकको इन सभी ग्रहोंकी पूजा करके) द्वितीय कक्षामें साथ ही द्वादश सूर्योंकी पूजा भी करनी चाहिये।
भग, सूर्य, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और विष्णु—ये द्वादश सूर्य कहे गये हैं।
द्वादश सूर्योंकी पूजा करनेके बाद पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि देवोंकी अर्चना करे तथा जया-विजया-जयन्ती एवं अपराजिता शक्तियोंकी और शेष, वासुकि आदि नागोंकी पूजा करे।
(अध्याय १६-१७)