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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२१५- गरुडपुराणका माहात्म्य

काण्ड ] ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग ४३५

जीवका अन्तिम लक्ष्य मुक्ति है। यह मुक्ति जीवको तभी प्राप्त होती है, जब वह पुर्यष्टक एवं त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका परित्याग कर देता है। यह पुर्यष्टक एक 'कमल' के रूपमें माना गया है। संसारावस्थामें जीव इसी कमलरूपी पुर्यष्टक की कर्णिकामें स्थित रहता है। तीनों गुणों (सत्त्व, रज एवं तम)-की साम्यावस्थारूप प्रकृति ही पुर्यष्टकरूपी कमलकी कर्णिका है। इस पुर्यष्टकरूप कमलके आठ पत्र (दल) हैं। ये हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, सत्व, रज तथा तम। इस प्रतीकात्मक वर्णनका निष्कर्ष यह है कि जीवको मुक्ति प्राप्त करनेके लिये प्रकृतिसे स्वयंको अलग करना अनिवार्य है इस हेतु शब्द आदि विषयोंके प्रति अनासक्त होना होगा।

प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, समाधि और ध्यान—ये छः योगके साधन हैं।

इन्द्रियसंयमसे पापक्षय और पापक्षयसे देवप्रीति सुलभ होती है। देवप्रीति मुक्ति एवं मुक्तिसाधनकी ओर उन्मुख होनेके लिये भी प्रथम एवं अनिवार्य साधन है। योगका मुख्यतम साधन है प्राणायाम। यह दो प्रकारका है—गर्भ और अगर्भ। जप एवं ध्यानयुक्त जो प्राणायाम है, वही गर्भ प्राणायाम है और इससे अतिरिक्त होनेपर अगर्भ प्राणायाम कहा जाता है। जो प्राणायाम छत्तीस मात्रासे युक्त रहता है वही श्रेष्ठ है, जो चौबीस मात्रासे युक्त रहता है वह मध्यम है और जो प्राणायाम बारह* मात्रासे युक्त रहता है वह निम्न है। सदा ॐकारका जप कर प्राणायाम करे। ॐकार परब्रह्मका वाचक है। इस ब्रह्मवाचक ॐकारका परिज्ञान होनेपर वाच्य ब्रह्म प्रसन्न हो जाता है।

'ॐ नमो विष्णवे'—इस षडक्षर और द्वादशाक्षर गायत्रीका जप करना चाहिये। सभी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सांसारिक विषयोंकी ओर रहती है। मनके द्वारा इन प्रवृत्तियोंकी निवृत्तिको ही प्रत्याहार कहा गया है। इन्द्रियोंको अपने विषयोंसे समाहरण कर मनको बुद्धिके साथ प्रत्याहारमें स्थित रखते हुए बारह बार प्राणायाम करनेमें जितना समय लगता है, उतने समयतक ब्रह्ममें मनको निविष्ट करना ही द्वादशधारणात्मक ध्यान है—ऐसा ब्रह्माने कहा है। नियतरूपसे ब्रह्माकारवृत्तिमें जो संतुष्टिका अनुभव होता है, उसीको समाधि कहा जाता है। ध्यान करते-करते यदि मन चञ्चल नहीं होता है, सदा ध्यानमें ही प्रवृत्ति रहती है अर्थात् अभीष्ट प्राप्तितक ध्यानसे निवृत्ति नहीं होती तो इसीका नाम धारणा है। मन यदि ध्येयतत्त्वमें ही आसक्त रहता है अर्थात् ध्येयतत्त्वका ही चिन्तन सदा होता रहता है, अन्य किसी भी पदार्थका भान नहीं होता तो इसीको ध्यान कहा जाता है।

ध्यानपरायण मुनिगण, ध्येय पदार्थका चिन्तन करते-करते जब मन उसी ध्येयमें निश्चल हो जाता है तो इसे ही परम ध्यान कहते हैं। ध्यान करते-करते जब सर्वत्र ध्येयपदार्थ ही दिखायी देने लगे, ध्याता भी ध्येयमय प्रतीत हो और किसी प्रकारका द्वैतज्ञान नहीं रहे तो इस अवस्थाको समाधि कहा जाता है। जिसका मन संकल्परहित होकर इन्द्रियोंके विषयचिन्तनसे विरत हो जाता है तथा ब्रह्ममें लीन हो जाता है, वही समाधिमें स्थित कहा जाता है। जिस योगीका मन आत्मामें अवस्थित परमात्माका ध्यान करते-करते तन्मय हो जाता है, वह योगी समाधिस्थ कहा जाता है। चित्तकी अस्थिरता, भ्रान्ति, दौर्मनस्य और प्रमाद—ये सभी योगियोंके दोष कहे गये हैं, ये योगमें विघ्नकारक हैं।

मनके स्थिर होनेके लिये प्रथम ध्येयके स्थूलस्वरूपका चिन्तन करे, इसके बाद मनके


* मात्राका विवेक योगसूत्रसे प्राणायामकी प्रक्रिया समझनेमें स्पष्ट होगा।

४३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

निश्चल होनेपर तेजःस्वरूप परमात्माके अनुरक्त होकर स्थिर हो जाना चाहिये। जगत्में परमात्माके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, वह परमात्मा ही विश्वरूप है—इस प्रकारका निश्चय कर परमात्मासे अतिरिक्त सभी पदार्थोंको असत् मानकर उनका परित्याग कर देना चाहिये। हृदय-पद्ममें स्थित ॐकाररूपी व्यापक परमब्रह्मका ध्यान करना चाहिये। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञसे रहित तीन मात्रासे युक्त ॐकारका जप करना चाहिये। प्रथम अपने हृदयमें ॐकारस्वरूप प्रधान पुरुषका ध्यान करे। इसके बाद उसके ऊपर कृष्णवर्ण, रक्तवर्ण तथा श्वेतवर्णवाले तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके तीन मण्डलोंका ध्यान कर उनमें जीवात्मा पुरुषका ध्यान करे। मण्डलके ऊपर ऐश्वर्य आदि आठ गुणोंसे युक्त अष्टदल कमलकी भावना की जाती है।

इस कमलकी कर्णिका ज्ञान है, केसर विज्ञान है, नाल वैराग्य है एवं इसका कन्द वैष्णव धर्म है। मुक्तिसाधक व्यक्ति इस हृत्पद्मकी कर्णिकामें स्थित प्रणवरूप ब्रह्मका ध्यान, चेतन निश्चल तथा व्यापक रूपमें करे। इस ॐकारस्वरूप ब्रह्मका ध्यान करते-करते यदि कोई प्राणोंका परित्याग कर देता है तो वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है। योगी देहगत पद्मके मध्यमें हरिको बैठाकर भक्तिभावसे उनका ध्यान करे। कुछ लोग ध्यान-रूपी चक्षुसे—आत्मासे आत्मा (परमात्मा)-को देखते हैं। सांख्यदर्शन-वेत्तालोग प्रकृति-पुरुषके विवेकसे तथा योगवेत्ता योगके प्रभावसे आत्मदर्शन करते हैं। आत्मा ज्ञानरूप है। वास्तवमें ज्ञानका ही माहात्म्य है। ज्ञान ही ब्रह्मका प्रकाशक है और ज्ञान ही भवबन्धनको काटनेवाला है। इसीलिये ध्यान-साधनमें एकचित्तता ही प्रधान योग है। यही योग योगियोंको मुक्ति प्रदान करता है, इसमें संशय नहीं है। यह एकचित्तताका योग आत्मदर्शनमें ही पर्यवसित है।

जो इन्द्रियादिको जीत कर ज्ञानसे प्रदीप्त हो जाता है, परमात्मामें अवस्थित इसी योगीको मुक्त कहा जाता है। आसन, स्थान आदिकी विधियाँ योगकी साधक नहीं होतीं, प्रत्युत ये तो योगसिद्धिमें विलम्ब करनेवाली हैं। ये सब विधियाँ साधनके विस्तार मात्र हैं। शिशुपालने स्मरणाभ्यासके प्रभावसे सिद्धि-लाभ किया था। योगाभ्यास करनेवाले योगीजन आत्मासे आत्माको देखते हैं। योगीजन सभी प्राणियोंमें करुणाभाव, विषयोंके प्रति विद्वेष एवं शिश्न और उदरकी परायणताका परित्याग करते हुए मुक्ति प्राप्त करते हैं। जब योगी मनुष्य इन्द्रियोंसे इन्द्रियोंके विषयका अनुभव नहीं करता, तब काष्ठकी भाँति सुख, दुःखके अनुभवसे अतीत होकर ब्रह्ममें लीन हो जाता है अर्थात् मुक्त हो जाता है।

मेधावी साधक सभी प्रकारके वर्णभेद, सभी प्रकारके ऐश्वर्यभेद एवं सभी अशुभ तथा पापोंको ध्यानाग्निके द्वारा भस्मसात् कर परमगतिको प्राप्त करता है। जैसे काष्ठसे काष्ठमें घर्षण करनेसे अग्निका दर्शन होता है, वैसे ही ध्यानसे परमात्मस्वरूप हरिका दर्शन किया जा सकता है। जब ब्रह्म और परमात्मस्वरूप हरिका दर्शन किया जाता है, जब ब्रह्म और आत्माके एकत्वका ज्ञान होता है तभी योगका उत्कर्ष जानना चाहिये। किसी भी बाह्य उपायसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती, मुक्तिकी प्राप्ति आभ्यन्तरिक यम-नियम आदि उपायोंके द्वारा ही होती है। सांख्यज्ञान, योगाभ्यास और वेदान्तादिके श्रवणसे जो आत्माका प्रत्यक्ष होता है, उसे मुक्ति कहा जाता है। मुक्ति होनेपर अनात्मामें आत्माका और असत्-पदार्थमें सत्-तत्त्वका दर्शन होता है।

(अध्याय २३५)

२१६- वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम

काण्ड ] आत्मज्ञाननिरूपण ४३७

आत्मज्ञाननिरूपण

श्रीभगवान् बोले—हे नारद! अब मैं आत्मज्ञानका तात्त्विक वर्णन करूँगा, सुनिये।

अद्वैत तत्त्व ही सांख्य है और उसमें एकचित्तता ही योग है। जो अद्वैत तत्त्व-योगसे सम्पन्न हैं, वे भवबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। अद्वैत तत्त्वका ज्ञान होनेपर अतीत, वर्तमान और भविष्यके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति सद्‍विचाररूपी कुल्हाड़ीके द्वारा संसाररूपी वृक्षको काटकर ज्ञान-वैराग्यरूपी तीर्थके द्वारा वैष्णव पद प्राप्त करता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—यह तीन प्रकारकी अवस्था ही माया है जो संसारका मूल है। यह माया जबतक रहती है, तबतक संसार ही सत्यमें अवगत होता है। वास्तवमें शाश्वत अद्वैत तत्त्वमें ही सब कुछ प्रविष्ट है। अद्वैत तत्त्व ही परब्रह्म है। यह परब्रह्म नाम-रूप तथा क्रियासे रहित है। यह ब्रह्म ही इस जगत्‌की सृष्टि कर स्वयं उसीमें प्रविष्ट हो जाता है।

'मैं मायातीत चित्पुरुषको जानता हूँ और मैं भी आत्मस्वरूप हूँ।' इस प्रकारका ज्ञान ही मुक्तिका मार्ग है। मोक्ष-लाभके लिये इससे अतिरिक्त अन्य कोई भी उपाय नहीं है*। श्रवण, मनन और ध्यान—ये सभी ज्ञानके साधन हैं। यज्ञ, दान, तपस्या, वेदाध्ययन और तीर्थसेवामात्रसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं होती है। मुक्ति किसी मतसे दान-ध्यानसे तथा किसीके मतसे पूजादि कर्मोंसे होती है। 'कर्म करो' और 'कर्मका त्याग करो'—ये दोनों वचन वेदमें मिलते हैं। निष्कामभावसे यज्ञादि कर्म मुक्तिके लिये होते हैं, क्योंकि निष्कामभावसे अनुष्ठित यज्ञादि अन्तःकरणकी शुद्धिके साधन हैं। ज्ञान प्राप्त होनेपर एक ही जन्ममें मुक्ति प्राप्त हो जाती है। द्वैत (भेद)-भाव रखनेपर तो मुक्ति सम्भव ही नहीं है। कुयोगी भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। किसी कारण योगभ्रष्ट होनेपर योगियोंके कुलमें उत्पत्ति हो सकती है। ऐसी स्थितिमें मुक्ति सम्भव है।

कर्मोंसे भवबन्धन और ज्ञान होनेसे जीवकी संसारसे मुक्ति हो जाती है, इसलिये आत्मज्ञानका आश्रय करना चाहिये। जो आत्मज्ञानसे भिन्न ज्ञान हैं, उनको भी अज्ञान कहा जाता है। जब हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब जीव जीवनकालमें ही अमरत्वकी प्राप्ति कर लेता है, इसमें संशय नहीं है—

यदा सर्वे विमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः।
तदाऽमृतत्वमाप्नोति जीवन्नेव न संशयः॥
(२३६। १२)

व्यापक होनेसे ब्रह्म कैसे जाता है, कौन जाता है और कहाँ जाता है? ऐसे प्रश्नोंके लिये कोई अवसर ही नहीं है। अनन्त होनेके कारण उसका कोई देश नहीं है; अतः किसी भी रूपमें उसकी गति नहीं हो सकती। परब्रह्म अद्वय है, अतः उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। वह ज्ञानस्वरूप है, अतः उसमें जड़ता कैसे हो सकती है? वस्तुतः ब्रह्म आकाशके समान है, इसलिये उसकी गति, अगति और स्थिति आदिका विचार कैसे हो सकता है? जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था मायाके द्वारा कल्पित हैं अर्थात् मिथ्या हैं।

वस्तुमात्रका सार ब्रह्म ही है। तेजोरूप ब्रह्मको एक अखण्ड परम पुण्यरूप समझना चाहिये। जैसे अपनी आत्मा सबको प्रिय है, वैसे ही ब्रह्म सबको प्रिय है क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है। हे महामुने!


* वेदाहमेतं पुरुषं चिद्रूपं तमसः परम्। सोऽहमस्मीति मोक्षाय नान्यः पन्था विमुक्तये॥ (२३६। ६)

४३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

सभी तत्त्वज्ञ ज्ञानको सर्वोच्च मानते हैं, इसलिये चित्तका आलम्बन बोधस्वरूप आत्मा ही है। यह आत्मविज्ञान है। यह पूर्ण है, शाश्वत है। जागते, सोते तथा सुषुप्तावस्थामें प्राप्त होनेवाला सुख पूर्ण सुखरूप ब्रह्मका ही एक क्षुद्र अंश समझना चाहिये। जैसे एक मृण्मय वस्तुका (ज्ञान होनेपर) समस्त मृण्मय पदार्थ जान लिया जाता है।

सर्वत्र व्यास शाश्वत तत्त्व ज्ञानस्वरूप ब्रह्म यदि सदा सर्वत्र सभीके हृदयमें विद्यमान नहीं है तो विस्मृत अर्थका स्मरण नहीं होना चाहिये पर होता है। ऐसी स्थितिमें यह स्मरण किसको होता है, निश्चित ही चेतन तत्त्वको ही होता है। इसे ही आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा आदिके रूपमें स्वीकार किया गया है। चेतनतत्त्वकी सत्ता—अणु, अशरीरी अथवा परम व्यापक तत्त्व—किसी भी रूपमें स्वीकार किया जाय, पर स्वीकार करना ही है; अन्यथा प्राणीको सुख-दुःखका अनुभव नहीं हो सकेगा। चेतनतत्त्व प्राणिमात्रके हृदयमें साक्षीरूपसे सदा विद्यमान है, इसीलिये यह उसकी प्रत्येक चेष्टाको जानता रहता है और इस जानकारीका फल यह है कि प्राणीके शुभाशुभ कर्मका फल यथासमय मिलता रहता है। यह ब्रह्मतत्त्व सत्य, ज्ञान एवं आनन्दरूप है तथा अनन्त है। सत्य ज्ञानसे पृथक् नहीं होता, अनन्ततासे पृथक् आनन्द नहीं है। वास्तवमें प्रत्येक जीव सत्य, आनन्द एवं ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही है। स्वयंको ब्रह्मरूपमें जानकर जीव अपने वास्तविक स्वरूप सर्वज्ञताको प्राप्त कर लेता है। जैसे एक हेममणि (पारस)-से अनन्त लौहराशि हेममय हो जाती है, उसी प्रकार ईश (ब्रह्म)-का ज्ञान होनेपर ज्ञानीके द्वारा सकल विश्व जान लिया जाता है, जैसे अन्धकारदोषके कारण रस्सी अपने सत्यस्वरूपमें नहीं दिखायी देती, वैसे ही व्यामोहसे ग्रस्त जीवको आत्माका दर्शन नहीं होता। जिस प्रकार प्रत्यक्ष होनेपर भी द्रव्य दृष्टि-दोषके कारण सही नहीं दिखायी देता है, अपितु वह कुरूप प्रतीत होता है। उसी प्रकार आकाशकी सरूपताके कारण वह आत्मतत्त्व असत्य एवं पृथक् प्रतीत होता है। जैसे रज्जुमें सर्पका और सीपमें रजतका आभास होता है और मृगमरीचिकामें जलका आभास होता है, उसी प्रकार विष्णुमें जगत्की प्रतीति होती है।

जैसे कोई द्विज ग्रहाविष्ट होनेके कारण 'मैं शूद्र हूँ' ऐसा मानता है और ग्रह-बाधा नष्ट होनेके पश्चात् वही व्यक्ति पुनः ध्यान करता हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है, वैसे ही मायासे आच्छन्न जीव यह 'मैं ही हूँ' ऐसा स्वीकार करता है। मायारूपी अज्ञानके समाप्त हो जानेपर पुनः वह अपने स्वरूपमें 'मैं ही ब्रह्म हूँ' ऐसा मान लेता है। जैसे ग्रहके नाश हो जानेपर उसको माननेवाला प्राणी उसे क्रूर ग्रहके रूपमें देखता है, वैसे ही अपने स्वरूपका दर्शन होनेपर मायाके अभावमें उसकी मायिक पदार्थोंसे विरक्ति हो जाती है।

जैसे संसार-चक्र अनादि है, वैसे ही उसके मूल भगवान्की माया भी अनादि है। इस मायाके सत् और असत् दो रूप हैं। व्यवहार-कालमें वह सत् और परमार्थतः असत् है। मायाके कारण ही अज परमात्मा भी अपनी मायाके आवेशसे जगत्के रूपमें परिणत होता है। मायाकी इच्छासे ही पति-पत्नी आदिके रूपमें यह सम्पूर्ण जगत् कल्पित है। अट्ठाईस तत्त्वोंका यह त्रिगुणात्मक जगत् और चौरासी लाख योनियोंके नर और नारियोंकी आकृति मायाके द्वारा ही रचित है। त्रिगुणात्मक अट्ठाईस तत्त्वोंके रूपमें मायाके द्वारा ही खण्डशः विश्वकी सृष्टि होती है। वस्तुतः नाम, रूप और क्रिया आदि जगत्की सत्ता मध्यमें ही है आदि और अन्तमें नहीं। इसलिये व्यवहार-कालमें सत्य

कांड ] गीतासार ४३९

प्रतीत होनेपर भी परमार्थतः यह मिथ्या है। जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें रथ आदिकी सत्ता प्रतीत होती है, किंतु वहाँ उनका अस्तित्व रहता नहीं है। उसी प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें भी वे समृद्धियाँ उस प्राणीके पास नहीं रहतीं। परमार्थतः जैसे जाग्रत्-अवस्था और स्वप्न-अवस्थाके पदार्थोंका भावाभाव प्रतीत होता है, वैसे ही मायिक पदार्थ भी व्यवहार और परमार्थमें सत्-असत् हैं। स्वप्न तथा जागृतिकी स्थितिमें ऐसा ही इस परम ब्रह्मका अस्तित्व है, किंतु सुषुप्तावस्थामें प्राणीका चित्त निश्चल होता है। सभी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियोंके साथ मन उस आत्माके साथ एकाकारकी स्थितिमें रहता है। अतः उस समय सत्-असत्‌का कुछ भी ज्ञान प्राणीको नहीं होता। इसी निश्चेष्टताको अचल और अद्वैत पद कहते हैं। ऐसा ही उस ब्रह्मका स्वरूप है।

मायाका अस्तित्व अविचारके कारण ही सिद्ध होता है। किंतु विचार करनेपर वह अस्तित्वहीन है। यह ब्रह्मके समान निरन्तर विद्यमान रहती है, ऐसा नहीं है। यह तो मात्र कल्पना है। इस प्रकार उस असत् मायाका आत्मसम्बन्धके कारण सत्यत्व सिद्ध होता है। जो सत्य होता है उसीका अस्तित्व माना जाता है और अस्तित्वके कारण ही पदार्थकी सत्यता स्वीकार की जाती है।

हे नारद! मैं अनन्त हूँ। मेरा ज्ञान भी अनन्त है। मैं अपनेमें पूर्ण हूँ। आत्माके द्वारा अनुभूत अन्तःसुख मैं ही हूँ। सात्त्विक, राजस और तामस गुणसे सम्बन्धित भावोंसे मैं नित्य परे रहता हूँ। मेरी उत्पत्ति अशुद्धतासे नहीं हुई है। मैं शुद्ध हूँ। मैं तो अमृतस्वरूप हूँ। मैं ही ब्रह्म हूँ। मैं प्राणियोंके हृदयमें प्रज्वलित वह ज्योति हूँ, जो दीपकके समान उनके अज्ञानरूपी अन्धकारको विनष्ट करती रहती है। यह आत्मज्ञानकी स्थिति है।

(अध्याय २३६)


गीतासार

श्रीभगवान्‌ने कहा— [हे नारद!] अब मैं गीताका सारतत्त्व कहूँगा, जिसे मैंने पूर्वमें अर्जुनको सुनाया था।

अष्टाङ्गयोगयुक्त और वेदान्तपारङ्गत मनुष्योंके लिये आत्म-कल्याण सम्भव है। आत्म-कल्याण ही परम कल्याण है, उस आत्मज्ञानसे उत्कृष्ट और कुछ भी लाभ नहीं है। आत्मा देहरहित, रूप आदिसे हीन, इन्द्रियोंसे अतीत है। मैं आत्मा हूँ, संसारादि सम्बन्धके कारण मुझे किसी प्रकारका दुःख नहीं है। धूमरहित प्रज्वलित अग्निशिखा जैसे प्रकाश प्राप्त करती है, वैसे ही आत्मा स्वयं प्रदीप्त रहता है। जैसे आकाशमें विद्युत्-अग्निका प्रकाश होता है, वैसे ही हृदयमें आत्माके द्वारा आत्मा प्रकाशित होता है। श्रोत्र आदि इन्द्रियोंको किसी प्रकारका ज्ञान नहीं है। वे स्वयंको भी नहीं जान सकती हैं, परंतु सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, क्षेत्रज्ञ आत्मा ही इन्द्रियोंका दर्शन करता है। जब आत्मा उज्ज्वल प्रदीपके समान हृदयपटलपर प्रकाशित होता है, तब पुरुषोंका पापकर्म नष्ट हो जाता है और ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।

जैसे दर्पणमें दृष्टि डालनेपर अपने द्वारा अपनेको देख सकते हैं, वैसे ही आत्मामें दृष्टि करनेपर इन्द्रियोंको, इन्द्रियोंके विषयोंको तथा पञ्चमहाभूतोंका दर्शन किया जा सकता है। मन, बुद्धि, अहंकार और अव्यक्त पुरुष—इन सभीके ज्ञानके द्वारा संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाना चाहिये। सभी

४४०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

इन्द्रियोंका मनमें अभिनिवेश कर उस मनको अहंकारमें स्थापित करना चाहिये। उस अहंकारको बुद्धिमें, बुद्धिको प्रकृतिमें, प्रकृतिको पुरुषमें एवं पुरुषको परब्रह्ममें विलीन करना चाहिये। इस प्रकार करनेसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारकी ज्ञान-ज्योतिका प्रकाश होता है। इससे वह पुरुष मुक्त हो जाता है। नौ द्वारोंसे युक्त, तीनों गुणोंके आश्रय तथा आकाश आदि पञ्चभूतात्मक और आत्मासे अधिष्ठित इस शरीरको जो ज्ञानी व्यक्ति जान लेता है, वही श्रेष्ठ है और वही क्रान्तदर्शी है। सौ अश्वमेध या हजारों वाजपेय यज्ञ इस ज्ञानयज्ञके सोलहवें अंशके फलको भी प्रदान नहीं कर सकते। (अध्याय २३७)


गीतासार

श्रीभगवान्ने पुनः कहा— हे अर्जुन! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा तथा समाधि—यह अष्टाङ्गयोग मुक्तिके लिये कहा गया है। शरीर, मन और वाणीको सदा सभी प्राणियोंकी हिंसासे निवृत्त रखना चाहिये; क्योंकि अहिंसा ही परम धर्म है और उसीसे परम सुख मिलता है—

कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा॥
हिंसाविरामको धर्मो ह्यहिंसा परमं सुखम्। (२३८।२-३)

सदा सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिये। कभी भी अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये, प्रिय-मिथ्या वचन भी नहीं बोलना चाहिये, यही सनातनधर्म है—

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥ (२३८।४)

चोरीसे या बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है। इसके विपरीत आचरण करना अर्थात् कभी भी चोरी न करना अस्तेय है। स्तेय-कार्य (चोरी) कभी भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि अस्तेय (चोरी न करना) ही धर्मका साधन है—

यच्च द्रव्यापहरणं चौर्याद्वाथ बलेन वा।
स्तेयं तस्यानाचरणमस्तेयं धर्मसाधनम्॥ (२३८।५)

सदा और सभी अवस्थामें कर्म, मन और वाणीके द्वारा मैथुनका परित्याग करना चाहिये। इसीको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्यका ग्रहण न करना ही अपरिग्रह है। प्रयत्नपूर्वक परिग्रहका परित्याग करना चाहिये। शौच दो प्रकारके हैं—बाह्य और आभ्यन्तर। मृत्तिका और जल आदिके द्वारा बाह्य एवं भाव-शुद्धिके द्वारा आभ्यन्तर शौच होता है। यदृच्छालाभ अर्थात् अनायास-प्राप्तिसे संतुष्ट होना ही संतोष है। यह संतोष ही सभी प्रकारके सुखका साधन है। मन और इन्द्रियोंकी जो एकाग्रता है, वही परम तप है। कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंके द्वारा देहका शोषण भी तपस्या है। पुरुषोंकी सत्त्वशुद्धिके लिये जो वेदान्त, शतरुद्रीयका पाठ और 'ॐ'कार आदिका जप है, पण्डितजन उसे स्वाध्याय कहते हैं।

कर्म, मन और वाणीसे हरिकी स्तुति, नाम-स्मरण, पूजादि कार्य और हरिके प्रति अनिश्चला भक्तिको ही ईश्वरका चिन्तन कहा जाता है। स्वस्तिकासन, पद्मासन और अर्धसन आदि आसन कहे गये हैं। अपने शरीरगत वायुका नाम प्राण है। उस वायुके निरोधको प्राणायाम कहा जाता है। हे पाण्डव! इन्द्रियाँ असद्विषयोंमें विचरण करती हैं। उनको विषयोंसे निवारित करना चाहिये।

२१७- मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म, मृत्युसे पूर्वकी स्थिति तथा कर्मविपाकका वर्णन

काण्ड ] ब्रह्मगीतासार ४४१


साधुगण इस प्रकारके इन्द्रिय-निरोधको प्रत्याहार कहते हैं। मूर्त और अमूर्त ब्रह्म-चिन्तनको ध्यान कहा जाता है। योगारम्भके समय मूर्तिमान् और अमूर्तरूपमें हरिका ध्यान करना चाहिये।

तेजोमण्डलके मध्यमें शंख, चक्र, गदा तथा पद्मधारी चतुर्भुज—कौस्तुभचिह्नसे विभूषित, वनमाली, वायुस्वरूप जो ब्रह्म अधिष्ठित है ‘मैं वही हूँ’। इस प्रकार मनका लय करके श्रीहरिको धारण करना ही धारणा है। ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ और ‘ब्रह्म ही मैं हूँ’ इस प्रकार देशालम्बन-रहित अहं और ब्रह्म पदार्थका तादात्म्य रूप ही समाधि है। (अध्याय २३८)


ब्रह्मगीतासार

ब्रह्माजीने कहा— [हे नारद!] अब मैं ब्रह्मगीतासारका वर्णन करूँगा, जिसे जानकर संसारसे मुक्ति हो जाती है।

‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस वाक्यार्थका ज्ञान होनेसे मनुष्योंको मोक्षकी प्राप्ति होती है। मैं और ब्रह्म—इन दो पदोंके अर्थका ज्ञान होनेपर वाक्यका ज्ञान होता है। विद्वानोंने इन पदोंके अर्थको वाच्य तथा लक्ष्य-रूपमें दो प्रकारका स्वीकार किया है। वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थसे मिला-जुला वाक्यार्थ ही शुद्ध वाक्यार्थ है। वेदोंके द्वारा अहं शब्दसे एक प्राणपिण्डात्मक और दूसरा प्रत्यग्-रूप आत्मा गृहीत होता है। अव्यानन्द चैतन्य परोक्षज्ञानके सहित है और प्राण-पिण्डात्मक चैतन्य उसका दूसरा पक्ष है। अहं पदकी लक्षणासे आत्माका अल्पज्ञत्वादि दोषरहित शुद्ध आत्मा अर्थ होता है।

जो प्राणपिण्डात्मक अर्थ है वह उसका दूसरा भाग है। इसमें परोक्ष अर्थात् लक्ष्यार्थको देखनेके पश्चात् जैसे उस अर्थकी स्थिति आती है, वैसे ही ब्रह्मपदसे प्राणपिण्डात्मक अर्थकी प्रतीति होती है। निष्ठा तथा परोक्षता आदि अर्थ-प्रतीतिके जो गुण हैं, उनका परित्याग करके ऐसा अर्थ किया जाता है। अद्वयानन्द चैतन्य इस अर्थकी प्राप्ति तो लक्ष्यार्थ ब्रह्मपदसे ही हो जाती है। अद्वयानन्द चैतन्यको लक्ष्यार्थ रूपमें देखकर ‘मैं ब्रह्म हूँ’—इन दोनों पदार्थोंकी सिद्धि ‘ब्रह्म मैं हूँ’ और ‘मैं ब्रह्म हूँ’—इन दो स्थितियोंमें होती है। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस वाक्यसे स्वानुभूतिका फलार्थ प्राणीको प्राप्त होता है। ऐक्यज्ञान तो निश्चित ही वेदान्तसे होता है। उससे यह अर्थ परे है। ज्ञानसे अज्ञानकी जो निवृत्ति होती है, उस निवृत्तिके बाद प्राणीके चित्तकी लक्ष्यसे जो ऐक्यकी स्थिति उत्पन्न होती है, वही मुक्ति है। (अध्याय २३९)


ब्रह्मगीतासार

श्रीभगवान्ने कहा— [हे पाण्डव!] यह सिद्ध है कि परमात्मा है। उसी परमात्मासे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है, जो इस जगत्-प्रपञ्चकी जन्मदात्री है। तदनन्तर सत्रह तत्त्व उत्पन्न हुए। वाक्, हाथ, पैर, पायु और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा तथा नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान नामक पाँच प्रकारकी वायु है। मन और बुद्धिरूप अन्तःकरण है। मन

४४२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

संदेही होता है और बुद्धि निश्चयात्मिका होती है। इसका स्वरूप सूक्ष्म होता है। आत्माके रूपमें भगवान् हिरण्यगर्भ अन्तःकरणमें विद्यमान रहते हैं, वही जीवात्मा है। इस प्रकार प्रपञ्चसे परे उस महाप्राण परमात्माके द्वारा पञ्चमहाभूतोंसे बने शरीरकी उत्पत्ति होती है। उन्हीं पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतोंसे ब्रह्माण्ड अर्थात् इस जगत्की सृष्टि हुई थी।

पैर आदिसे युक्त शरीर स्थूल शरीर है, यह तो संसारमें प्रसिद्ध ही है। उसके बाद उनमें पञ्चभूत तत्त्व और उनके कार्योंकी जो स्थिति है, वह स्थूल शरीरसे पूर्वका शरीर है। किंतु उसके शरीरसे जो कुछ उत्पन्न होता है, उसको स्थूल ही कहा जाता है। विद्वान् इस प्रकार परमात्मासे स्थित शरीरको तीन प्रकार मानते हैं। स्वतत्त्वके भेदको बतानेवाले भेदवाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' के अनुसार उन दोनों पूर्वस्थूल और स्थूल शरीरमें वह ब्रह्म ही प्रविष्ट रहता है। जलमें सूर्यकी छाया और बेरके समान उस समय उसकी आकृति होती है, जीवस्वरूप वह ब्रह्म उसमें प्राणादि इन शारीरिक तत्त्वोंको धारण करता है। जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थामें किये जानेवाले कार्योंका जो साक्षी है, वही जीव माना गया है।

जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थाओंसे परे वह ब्रह्म अपने निर्गुण स्वभावमें ही रहता है। उस क्रियाशील शरीरके साथ रहने एवं न रहनेकी स्थितिमें भी वह नित्य शुद्ध स्वभाववाला ही है। उसमें कोई विकृति नहीं आती। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी जो तीन अवस्थाएँ हैं, इन अवस्थाओंके कारण वह परमात्मा ही तीन प्रकारका मान लिया जाता है। वह अन्तःकरणमें स्थित रहता है और जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी स्थितिमें इन्द्रियोंकी क्रियाशीलताको देखता हुआ वह विकारयुक्त हो जाता है।

हे अर्जुन! अब मैं फलयुक्त क्रिया और कारककी जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति-अवस्थाका वर्णन करता हूँ, उसको सुनें। इन्द्रियोंके द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन तन्मात्राओंका जब मनुष्यको सत्य-रूपमें ज्ञान होता है, तब उसको मनुष्यकी जाग्रत्-अवस्था कहते हैं। उसको विषयासक्त प्राणीके अन्तःकरणमें जागते हुए संस्कारोंका विश्वास भी कहा जा सकता है। स्वप्न एवं सुषुप्तिकी स्थिति तब होती है, जब विषयापेक्षित कार्यमें लगाये जानेवाले साधनकी चिन्तामें बुद्धि एकाग्र हो जाती है। कारण-अवस्थामें ब्रह्मकी स्थिति है। अतः कालके वशमें होनेके कारण वह जीवात्मा बनकर स्वरूप शरीर स्थित रहता है।

यम-नियमादि अष्टाङ्ग मार्गको यथाक्रम पार करते हुए जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें विद्यमान वह जीव साक्षी-रूपमें सब कुछ देखता है। अतः मनुष्यको समाधि आरम्भ करनेके पूर्व ही उस परम लक्ष्यकी अवधारणा अपने चित्तमें बना लेनी चाहिये।

इसके बाद मुमुक्षुके अन्तःकरणमें कैवल्य अर्थात् उस परमात्माके साक्षात्कारकी अवस्था आ जाती है। अतः मोक्षार्थीको उस स्थितिमें पाञ्चभौतिक शरीरके अंदर फँसे हुए क्षेत्रज्ञ जीवात्माके विषयमें विचारकर उसको शरीरसे पृथक् समझना चाहिये, क्योंकि आत्मतत्त्वको शरीरसे अतिरिक्त न माननेपर ब्रह्मतत्त्वसे साक्षात्कार करनेमें अनेक बाधाएँ होती हैं, अतः उन बाधाओंको दूर करना अपेक्षित है, जो सांसारिक विषय-वासनाओंके क्षेत्रसे उत्पन्न हैं। उस स्थितिमें तो समस्त क्षेत्रको ही शून्य कर देना आवश्यक होता है। यह पाञ्चभौतिक शरीर घट आदिके समान है, जैसे घटके अंदर आकाश है, उस समय वह घटाकाश कहा जाता है। किंतु उस भ्रमको दूर कर दिया जाय तो अपने उस समग्र रूपमें वह दिखायी देता है। वैसी ही स्थिति जीवात्माकी है। अतः पाञ्चभौतिक शरीरसे उस मोक्षकी साधनामें जीवात्माको पृथक् समझना चाहिये। जिसमें वह आबद्ध है, उस क्षेत्रको ही भली प्रकारसे शेष करना अनिवार्य है। जिस प्रकार घट मिट्टीसे पृथक् नहीं है, उसमें समवाय सम्बन्ध होता है। उसी प्रकार कुम्भकारके द्वारा प्रयुक्त चक्र,

काण्ड ] गरुडपुराणका माहात्म्य [ ४४३

चीवर आदिके कार्योंसे भी वह पृथक् नहीं है, किंतु पञ्चीकृत इन भौतिक तत्त्वोंकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत महाभूत परमात्मासे हुई है। अतः कारण अन्तमें वही परमात्मा ही सिद्ध होगा, जो निर्गुण-निराकार अद्वय पञ्चीकृत देहतत्त्वसे परे है। कार्य तो कारणसे पृथक् होता नहीं है। इसलिये कार्य-कारण-सम्बन्धके द्वारा वह बात सिद्ध हो जायगी, जो मुमुक्षुके लिये अपेक्षित है। विद्वज्जन इसी क्रिया-व्यतिरेकके द्वारा सूक्ष्म शरीरकी अवधारणाकी बातको पुष्ट करते हैं।

अपञ्चीकृत महाभूतोंसे सूक्ष्मशरीर पृथक् नहीं है। जैसे आधार पृथ्वीके बिना नहीं होता है, वैसे ही वह पृथ्वी उसके आधारके बिना नहीं रहती है। यह आधार तो तेज अर्थात् अग्नि है, जो वायुके बिना रहता है। वह वायु आकाशके बिना, आकाश उस सत्-मायाच्छिन्न ब्रह्मके बिना और वह मायारहित शुद्ध ब्रह्म आकाशके बिना नहीं रहता है। ध्यानकी ऐसी अवस्थामें पहुँचनेपर ही प्राणीके हृदयमें वह शुद्ध भाव आता है, जो जाग्रत् और स्वप्न आदिकी स्थितिमें उद्भूत नहीं होता, जो प्राप्त हुए आत्मज्ञानके अनुरूप जीवत्वके प्रभावसे मुक्त होता है।

ब्रह्मको नित्य शुद्ध, बुद्ध, सत्य तथा अद्वैत कहा जाता है। वह तत्त्व दो शिष्ट पदोंके बीच स्थित है। उसको ब्रह्मवाचक शब्द 'ॐ'कार कहते हैं। इसमें उकार और अकार दो स्वर एवं मकार एक अनुनासिक व्यञ्जनवर्ण है। इनसे बना हुआ वह पद सामान्य नहीं, अपितु महामन्त्र है, जो अद्वितीय है। 'ब्रह्म मैं हूँ' या 'मैं ब्रह्म हूँ'—ये दोनों वाक्य मनमें ज्ञान और अज्ञान दोनोंको बढ़ानेवाले हैं।

यह आत्मतत्त्व परमज्योतिःस्वरूप है। यह चिदानन्द है। यह सत्य ज्ञान और अनन्त है। यही तत्त्वमसि है। ऐसा वेदोंका भी कथन है। 'मैं ब्रह्म हूँ।' सांसारिक विषयोंसे जो परे रहता है वही मैं निर्लिप्त देव हूँ। जो सर्वत्रगामी परमात्मा है वही मैं हूँ। जो आदित्यस्वरूप देवदेवेश हैं वही मैं हूँ। अरे, मैं तो वही अनादि देवदेवेश्वर परब्रह्म ही हूँ, जिसके आदि और अन्तका ज्ञान किसीको भी नहीं है। यही गीताका सार है। इसीका वर्णन मैंने अर्जुनसे किया था। इसको सुनकर मनुष्य ब्रह्ममें लीन हो सकता है अर्थात् उसको जीवनमुक्ति प्राप्त हो सकती है। (अध्याय २४०)


गरुडपुराणका माहात्म्य

भगवान् हरिने कहा— हे रुद्र! मैंने 'गरुडपुराण'का वह सारभाग आपको सुना दिया, जो भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। यह विद्या, यश, सौन्दर्य, लक्ष्मी, विजय और आरोग्यादिका कारक है। जो मनुष्य इसका पाठ करता है या सुनता है, वह सब कुछ जान जाता है और अन्तमें उसको स्वर्गकी प्राप्ति होती है।

ब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! मैंने मुक्तिप्रदायक ऐसे महापुराणको भगवान् विष्णुसे सुना था।

व्यासजीने कहा— सूतजी! भगवान् विष्णुसे इस महापुण्यदायक गरुडपुराणको सुनकर ब्रह्माजीने दक्षप्रजापति, नारद तथा हम सभीको सुनाया और स्वयं उस परात्पर ब्रह्मका ध्यान करते हुए वे वैष्णव पदको प्राप्त हुए। मैंने भी तुम्हें और तुमने शौनकादिको इस सर्वश्रेष्ठ पुराणको सुनाया, जिसे सुनकर सर्वज्ञ बना व्यक्ति अपने अभीष्टको प्राप्त करके अन्तमें ब्रह्मपदका लाभ लेता है। भगवान् विष्णुने गरुडको सारतमभाग सुनाया था, इसलिये यह गरुडके लिये कथित सारतत्त्व 'गरुडमहापुराण'के नामसे प्रसिद्ध हो गया। यह महासारतत्त्व है। यह प्राणीको धर्म, काम, धन और मोक्षादि सभी फलोंको देनेवाला है।

सूतजीने कहा— हे शौनक! आपको मैंने उस श्रेष्ठतम गरुडमपुराणको सुना दिया है, जिस शुभ पुराणको भगवान् व्यासने ब्रह्मासे सुनकर बहुत

४४४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचारकाण्ड ]

समय पहले मुझको सुनाया था। व्यासरूप भगवान् हरिने प्रारम्भमें जो मात्र एक वेद था, उसे चार भागोंमें विभाजित किया और अष्टादश महापुराणोंकी रचना की। उन पुराणोंको महाराज शुकदेवजीने मुझे सुनाया। हे शौनक ! आपके पूछनेपर इस श्रेष्ठ गरुडपुराणको मैंने मुनियोंके सहित आपको सुनाया।

जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस महापुराणका पाठ करता है, सुनता है अथवा सुनाता है, इसको लिखता है, लिखाता है, ग्रन्थके ही रूपमें इसे अपने पास रखता है तो वह यदि धर्मार्थी है तो उसे धर्मकी प्राप्ति होती है, यदि वह अर्थका अभिलाषी है तो अर्थ प्राप्त करता है। यदि वह कामी है तो उसकी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और यदि वह मोक्ष प्राप्त करनेका इच्छुक है तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है। मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, वह सब इस गरुडमहापुराणको सुननेसे प्राप्त हो जाता है।

जो मनुष्य इस महापुराणका पाठ करता है, वह अपने समस्त अभीष्टको सिद्ध करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इस पुराणके एक श्लोकका एक चरण भी पढ़कर मनुष्य पापरहित हो जाता है। जिस व्यक्तिके घरमें यह महापुराण रहता है, उसको इसी जन्ममें सब कुछ प्राप्त हो जाता है। जिस मनुष्यके हाथमें यह गरुडमहापुराण विद्यमान है, उसके हाथमें ही नीतियोंका कोश है। जो प्राणी इस पुराणका पाठ करता है या इसको सुनता है वह भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त कर लेता है।

इस महापुराणको पढ़ने एवं सुननेसे मनुष्यके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि हो जाती है। इस महापुराणका पाठ करके या इसे सुन करके पुत्रार्थी पुत्र, कामार्थी काम, विद्यार्थी विद्या, विजिगीषु विजय प्राप्त कर लेता है तथा ब्रह्महत्यादिसे युक्त पापीका पाप नष्ट हो जाता है, वन्ध्या स्त्री पुत्र, कन्या सज्जन पति, क्षेमार्थी क्षेम तथा भोग चाहनेवाला भोग प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार मङ्गलकी कामनासे प्रेरित व्यक्ति अपना मङ्गल, गुणोंका इच्छुक व्यक्ति उत्तम गुण, काव्य करनेका अभिलाषी मनुष्य कवित्वशक्ति, सारतत्त्व चाहनेवाला सार, ज्ञानार्थी ज्ञान प्राप्त करता है।

पक्षिश्रेष्ठ गरुडके द्वारा कहा गया यह गरुडमहापुराण धन्य है। यह सबका कल्याण करनेवाला है। जो मनुष्य इस महापुराणके एक भी श्लोकका पाठ करता है, उसकी अकालमृत्यु नहीं होती। इसके मात्र आधे श्लोकका पाठ करनेसे निश्चित ही दुष्ट शत्रुका क्षय होता है। नैमिषारण्यमें ऋषियोंके द्वारा आयोजित यज्ञमें सूतजी महाराजसे इस महापुराणको सुन करके स्वयं शौनक मुनिने उन्हीं गरुडध्वज भगवान् विष्णुकी कृपासे मुक्तिका लाभ प्राप्त किया था। (अध्याय २४१)

॥ गरुडपुराणान्तर्गत आचारकाण्ड समाप्त ॥

धर्मकाण्ड — प्रेतकल्प (उत्तरखण्ड)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प

वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम

श्रीगणेशजीको नमस्कार है। 'ॐ' कारसे युक्त भगवान् वासुदेव हरिको प्रणाम है।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥

भगवान् श्रीनारायण, नरोत्तम नर एवं भगवती श्रीसरस्वती देवीको नमस्कार करके पुराणका वाचन करना चाहिये। जिन भगवान्‌का धर्म ही मूल है, वेद जिनका स्कन्ध है, पुराणरूपी शाखासे जो समृद्ध हैं, यज्ञ जिनके पुष्प हैं, मोक्ष जिनका फल है—ऐसे भगवान् मधुसूदनरूपी कल्पवृक्षकी जय हो।

देवक्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादिक श्रेष्ठ मुनियोंने सुखपूर्वक विराजमान श्रीसूतजी महाराजसे कहा—

हे श्रीसूतजी! आप श्रीवेदव्यासजीकी कृपासे सब कुछ जानते हैं। अतः आप हम सभीके संदेहका निवारण करें। कुछ लोगोंका कहना है कि जिस प्रकार कोई जोंक तिनकेसे तिनकेका सहारा लेकर आगे बढ़ती है, उसी प्रकार शरीरधारी जीव एक शरीरके बाद दूसरे शरीरका आश्रय ग्रहण करता है। दूसरे विद्वानोंका कहना है कि प्राणी मृत्युके पश्चात् यमराजकी यातनाओंका भोग करता है, तदनन्तर उसको दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है—इन दोनोंमें क्या सत्य है? यह हमें बतानेकी कृपा करें।

सूतजीने कहा—हे महाभाग! आप लोगोंने अच्छा प्रश्न किया है। आप लोगोंको संदेह हो यह असम्भव है। आप लोगोंने तो लोकहितसे प्रेरित होकर ही ऐसा प्रश्न किया है। हे विप्रगणो! मैं आप सबके हृदयमें अवस्थित उस संदेहको भगवान् श्रीकृष्ण और गरुडके बीच हुए संवादके द्वारा दूर करूँगा। सर्वप्रथम मैं उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ, जिनका आश्रय लेकर मनुष्य इस भवसागरको एक क्षुद्र नदीकी भाँति अनायास ही पार कर जाते हैं।

४४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

हे मुनियो ! एक बार विनतापुत्र गरुडके हृदयमें इस ब्रह्माण्डके सभी लोकोंको देखनेकी इच्छा हुई। अतः हरिनामका उच्चारण करते हुए उन्होंने सभी लोकोंका भ्रमण किया। पाताल, पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकका भ्रमण करते हुए वे पृथ्वीलोकके दुःखसे अत्यन्त दुःखित एवं अशान्तचित्त होकर पुनः वैकुण्ठलोक वापस आ गये।

वैकुण्ठलोकमें न रजोगुणकी प्रवृत्ति है, न तमोगुणकी ही प्रवृत्ति है, [मृत्युलोकके समान] रजोगुण तथा तमोगुणसे मिश्रित सत्त्वगुणकी भी प्रवृत्ति वहाँ नहीं है। वहाँ केवल शुद्ध सत्त्वगुण ही अवस्थित रहता है। वहाँ माया भी नहीं है, वहाँ किसीका विनाश नहीं होता। वहाँ राग-द्वेष आदि षड्विकार भी नहीं हैं। वहाँ देव और असुर-वर्गद्वारा पूजित श्यामवर्णकी सुन्दर कान्तिसे सुशोभित राजीवलोचन भगवान् विष्णुके पार्षद विराजमान रहते हैं, जिनके शरीर पीतवसन और मनोहारी आभूषणोंसे विभूषित हैं और मणियुक्त स्वर्णके अलङ्करणोंसे सुशोभित हैं। भगवान्‌के वे सभी पार्षद चार-चार भुजाओंसे युक्त हैं। उनके कानोंमें कुण्डल और सिरपर मुकुट है। उनका वक्षःस्थल सुन्दर पुष्पोंकी मालासे सुशोभित है। मनको मोहित करनेवाली अप्सराओंसे युक्त, महात्माओंके चमकते हुए विमानोंकी पंक्तिकी कान्तिसे वे सभी सदा भास्वरित होते रहते हैं। वहाँ नाना प्रकारके वैभवोंसे समन्वित लक्ष्मी प्रसन्नतापूर्वक भगवान् श्रीहरिके चरणोंकी पूजा करती रहती हैं।

गरुडजीने वहाँ देखा कि श्रीहरि झूलेपर विराजमान हैं। सखियोंद्वारा स्तुत्य लक्ष्मीजी झूलेमें स्थित भगवान्‌की स्तुति कर रही हैं। अपने लाल-लाल बड़े-बड़े नेत्रोंसे युक्त प्रसन्नमुख देवोंके अधिपति, श्रीपति, जगत्पति और यज्ञपति भगवान् श्रीहरि अपने नन्द, सुनन्द आदि प्रधान पार्षदोंको देख रहे थे। उनके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और वक्षःस्थल श्रीसे सुशोभित था। वे पीताम्बरसे विभूषित थे। उनकी चार भुजाएँ थीं। प्रसन्नमुद्रामें हँसता हुआ उनका मुख था। बहुमूल्य आसनपर विराजमान वे हरि उस समय अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे आवृत थे। प्रकृति, पुरुष, महत्, अहंकार, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, मन, पञ्चमहाभूत तथा पंचतन्मात्राओंसे निर्मित शरीरवाले अपने ही स्वरूपमें रमण करते हुए उन भगवान् हरिका दर्शन करनेसे विनतासुत गरुडका अन्तःकरण आनन्दविभोर हो उठा। उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रुओंकी धारा बहने लगी। आनन्दमग्न होकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम किया। प्रणाम करते हुए अपने वाहन गरुडको देखकर भगवान् विष्णुने कहा—हे पक्षिन्! आपने इतने दिनोंमें इस जगत्‌की किस भूमिका परिभ्रमण किया है?

गरुडने कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मैंने समस्त त्रिलोकीका परिभ्रमण किया है। उनमें स्थित जगत्‌के सभी स्थावर और जङ्गम प्राणियोंको भी देखा। हे प्रभो! यमलोकको छोड़कर पृथ्वीलोकसे सत्यलोकतक सब कुछ मेरे द्वारा देखा जा चुका है। सभी लोकोंकी अपेक्षा भूर्लोक प्राणियोंसे अधिक परिपूर्ण है। सभी योनियोंमें मानवयोनि ही भोग और मोक्षका शुभ आश्रय है। अतः सुकृतियोंके लिये ऐसा लोक न तो अभीतक बना है और न भविष्यमें बनेगा। देवता लोग भी इस लोककी प्रशंसामें गीत गाते हुए कहते हैं—‘जो लोग पवित्र भारतकी भूमिमें जन्म लेकर निवास करते हैं, वे धन्य हैं। देवता लोग भी स्वर्ग एवं अपवर्गरूप फलकी प्राप्तिके लिये पुनः भारतभूमिमें मनुष्यरूपमें जन्म लेते हैं'—

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गस्य फलार्जनाय भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥
(१।२७)

प्रेतकल्प ] वैकुण्ठलोकका वर्णन एवं प्रेतकल्पका उपक्रम ४४७


हे प्रभो! आप यह बतानेकी कृपा करें कि मृत्युको प्राप्त हुआ प्रेत किस कारण पृथ्वीपर डाल दिया जाता है?

उसके मुखमें पञ्चरत्न<sup></sup> क्यों डाला जाता है? मरे हुए प्राणीके नीचे लोग कुश किसलिये बिछा देते हैं? उसके दोनों पैर दक्षिण दिशाकी ओर क्यों कर दिये जाते हैं? मरनेके समय मनुष्यके आगे पुत्र-पौत्रादि क्यों खड़े रहते हैं? हे केशव! मृत्युके समय विविध वस्तुओंका दान एवं गोदान किसलिये दिया जाता है? बन्धु-बान्धव, मित्र और शत्रु आदि सभी मिलकर क्यों क्षमा-याचना करते हैं? किससे प्रेरित होकर लोग मृत्युकालमें तिल, लोहा, स्वर्ण, कपास, नमक, सप्तधान्य<sup></sup>, भूमि और गौका दान देते हैं? प्राणी कैसे मरता है और मरनेके बाद कहाँ जाता है? उस समय वह आतिवाहिक शरीर (निराधार-रूपमें आत्माको वहन करनेवाले शरीर)-को कैसे प्राप्त करता है? अग्नि देनेवाले पुत्र और पौत्र उसे कन्धेपर क्यों ले जाते हैं? शवमें घृतका लेप क्यों किया जाता है? उस समय एक आहुति देनेकी परम्परा कहाँसे चली है? शवको भूमिस्पर्श किसलिये करवाया जाता है? स्त्रियाँ उस मरे हुए व्यक्तिके लिये क्यों विलाप करती हैं? शवके उत्तर दिशामें 'यमसूक्त'का पाठ क्यों किया जाता है? मरे हुए व्यक्तिको पीनेके लिये जल एक ही वस्त्र धारण करके क्यों दिया जाता है? उस समय सूर्य-बिम्ब-निरीक्षण, पत्थरपर स्थापित यव, सरसों, दूर्वा और नीमकी पत्तियोंका स्पर्श करनेका विधान क्यों है? उस समय स्त्री एवं पुरुष दोनों नीचे-ऊपर एक ही वस्त्र क्यों धारण करते हैं? शवका दाह-संस्कार करनेके पश्चात् उस व्यक्तिको अपने परिजनोंके साथ बैठकर भोजनादि क्यों नहीं करना चाहिये? मरे हुए व्यक्तिके पुत्र दस दिनके पूर्व किसलिये पिण्डोंका दान देते हैं? चबूतरे (वेदी)-पर पके हुए मिट्टीके पात्रमें दूध क्यों रखा जाता है? रस्सीसे बँधे हुए तीन काष्ठ (तिगोड़िया)-के ऊपर रात्रिमें गाँवके चौराहेपर एकान्तमें वर्षपर्यन्त प्रतिदिन दीपक क्यों दिया जाता है? शवका दाह-संस्कार तथा अन्य लोगोंके साथ जल-तर्पणकी क्रिया क्यों की जाती है? हे भगवन्! मृत्युके बाद प्राणी आतिवाहिक शरीरमें चला जाता है, उसके लिये नौ पिण्ड देने चाहिये, इसका क्या प्रयोजन है? किस विधानसे पितरोंको पिण्ड प्रदान करना चाहिये और उस पिण्डको स्वीकार करनेके लिये उनका आवाहन कैसे किया जाय?

हे देव! यदि ये सभी कार्य मरनेके तुरंत बाद सम्पन्न हो जाते हैं तो फिर बादमें पिण्डदान क्यों किया जाता है? पूर्व किये गये पिण्डदानके बाद पुनः पिण्डदान या अन्य क्रियाओंको करनेकी क्या आवश्यकता है? दाह-संस्कारके बाद अस्थि-संचयन और घट फोड़नेका विधान क्यों है? दूसरे दिन और चौथे दिन साग्निक द्विजके स्नानका


१-सोना, चाँदी, मोती, लाजावर्त (लाजवर्द) तथा मूँगा—ये पाँच पञ्चरत्न कहलाते हैं।
२-जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग, चना तथा साँवा—ये सप्तधान्य कहलाते हैं।

२१८- नरकोंका स्वरूप, नरकोंमें प्राप्त होनेवाली विविध यातनाएँ तथा नरकमें गिरनेवाले कर्म एवं जीवकी शुभाशुभ गति

४४८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

विधान क्यों है ? दसवें दिन सभी परिजनोंके साथ शुद्धिके लिये स्नान क्यों किया जाता है ? दसवें दिन तेल एवं उबटनका प्रयोग क्यों किया जाता है। उस तेल और उबटनका प्रयोग भी एक विशाल जलाशयके तटपर होना अपेक्षित है, इसका क्या कारण है ? दसवें दिन पिण्डदान क्यों करना चाहिये ? एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग आदिके सहित पिण्डदान करनेका क्या प्रयोजन है ? पात्र, पादुका, छत्र, वस्त्र तथा अंगूठी आदि वस्तुओंका दान क्यों दिया जाता है ? तेरहवें दिन पददान क्यों दिया जाता है। वर्षपर्यन्त सोलह श्राद्ध क्यों किये जाते हैं तथा तीन सौ साठ सान्नोदक घट क्यों दिये जाते हैं। प्रेततृप्तिके लिये प्रतिदिन अन्नसे भरे हुए एक घटका दान क्यों करना चाहिये।

हे प्रभो ! मनुष्य अनित्य है और समय आनेपर ही वह मरता है, किंतु मैं उस छिद्रको नहीं देख पाता हूँ, जिससे जीव निकल जाता है ? प्राणीके शरीरमें स्थित किस छिद्रसे पृथ्वी, जल, मन, तेज, वायु और आकाश निकल जाते हैं ? हे जनार्दन ! इसी शरीरमें स्थित जो पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच वायु हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं। लोभ, मोह, तृष्णा, काम और अहंकाररूपी जो पाँच चोर शरीरमें छिपे रहते हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं।

हे माधव ! प्राणी अपने जीवनकालमें पुण्य अथवा पाप जो कुछ भी कर्म करता है, नाना प्रकारके दान देता है, वे सब शरीरके नष्ट हो जानेपर उसके साथ कैसे चले जाते हैं। वर्षके समाप्त हो जानेपर भी मरे हुए प्राणीके लिये सपिण्डीकरण क्यों होता है ? उस प्रेतकृत्यमें (सपिण्डन) प्रेतपिण्डका मिलन किसके साथ किस विधिसे होना चाहिये, इसे आप बतानेकी कृपा करें।

हे हरे ! मूर्च्छासे अथवा पतनसे जिनकी मृत्यु होती है, उनके लिये क्या होना चाहिये। जो पतित मनुष्य जलाये गये अथवा नहीं जलाये गये तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य प्राणी हैं, उनके मरनेपर अन्तमें क्या होना चाहिये। जो मनुष्य पापी, दुराचारी अथवा हतबुद्धि हैं, मरनेके बाद वे किस स्थितिको प्राप्त करते हैं ? जो पुरुष आत्मघाती, ब्रह्महत्यारा, स्वर्णादिकी चोरी करनेवाला, मित्रादिके साथ विश्वासघात करनेवाला है, उस महापातकीका क्या होता है ? हे माधव ! जो शूद्र कपिला गौका दूध पीता है अथवा प्रणव महामन्त्रका जप करता है या ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीतको धारण करता है तो मृत्युके बाद उसकी क्या गति होती है ? हे संसारके स्वामी ! जब कोई शूद्र किसी ब्राह्मणीको पत्नी बना लेता है तो उस पापीसे मैं भी डरता हूँ। आप बतायें कि उस पापीकी क्या दशा होती है ? साथ ही उस पापकर्मके फलको बतानेकी भी कृपा करें।

हे विश्वात्मन् ! आप मेरी दूसरी बातपर भी ध्यान दें। मैं कौतूहलवश वेगपूर्वक लोकोंको देखता हुआ सम्पूर्ण जगत्में जा चुका हूँ, उसमें रहनेवाले लोगोंको मैंने देखा है कि वे सभी दुःखमें ही डूब रहे हैं। उनके अत्यन्त कष्टोंको देखकर मेरा अन्तःकरण पीड़ासे भर गया है। स्वर्गमें दैत्योंकी शत्रुतासे भय है। पृथ्वीलोकमें मृत्यु और रोगादिसे तथा अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे लोग दुःखित हैं। पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियोंको मेरे भयसे दुःख बना रहता है*। हे ईश्वर ! आपके इस वैष्णव पद (वैकुण्ठ)-के अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी लोकमें ऐसी निर्भयता नहीं दिखायी देती। कालके वशीभूत इस जगत्की स्थिति स्वप्नकी मायाके समान असत्य है। उसमें भी इस भारतवर्षमें


* पाताललोकमें नागोंको गरुडका भय रहता है।

प्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४४९


रहनेवाले लोग बहुत-से दुःखोंको भोग रहे हैं। मैंने वहाँ देखा है कि उस देशके मनुष्य राग-द्वेष तथा मोह आदिमें आकण्ठ डूबे हुए हैं। उस देशमें कुछ लोग अन्धे हैं, कुछ टेढ़ी दृष्टिवाले हैं, कुछ दुष्ट वाणीवाले हैं, कुछ लूले हैं, कुछ लँगड़े हैं, कुछ काने हैं, कुछ बहरे हैं, कुछ गूँगे हैं, कुछ कोढ़ी हैं, कुछ लोमश (अधिक रोमवाले) हैं, कुछ नाना रोगसे घिरे हैं और कुछ आकाश-कुसुमकी तरह नितान्त मिथ्या अभिमानसे चूर हैं। उनके विचित्र दोषोंको देखकर तथा उनकी मृत्युको देखकर मेरे मनमें जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी है कि यह मृत्यु क्या है? इस भारतवर्षमें यह कैसी विचित्रता है? ऋषियोंसे मैंने पहले ही इस विषयमें सामान्यतः यह सुन रखा है कि जिसकी विधिपूर्वक वार्षिक क्रियाएँ नहीं होती हैं, उसकी दुर्गति होती है। फिर भी हे प्रभो! इसकी विशेष जानकारीके लिये मैं आपसे पूछ रहा हूँ।

हे उपेन्द्र! मनुष्यकी मृत्युके समय उसके कल्याणके लिये क्या करना चाहिये? कैसा दान देना चाहिये। मृत्यु और श्मशान-भूमितक पहुँचनेके बीच कौन-सी विधि अपेक्षित है। चितामें शवको जलानेकी क्या विधि है? तत्काल अथवा विलम्बसे उस जीवको कैसे दूसरी देह प्राप्त होती है, यमलोक (संयमनी नगरी)-को जानेवालेके लिये वर्षपर्यन्त कौन-सी क्रियाएँ करनी चाहिये। दुर्बुद्धि अर्थात् दुराचारी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर उसका प्रायश्चित्त क्या है? पञ्चक आदिमें मृत्यु होनेपर पञ्चकशान्तिके लिये क्या करना चाहिये। हे देव! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों। आप मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं। मैंने आपसे यह सब लोकमङ्गलकी कामनासे पूछा है, मुझे बतानेकी कृपा करें। (अध्याय १)


मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म, मृत्युसे पूर्वकी स्थिति तथा कर्मविपाकका वर्णन

श्रीकृष्णने कहा— हे भद्र! आपने मनुष्योंके हितमें बहुत ही अच्छी बात पूछी है। सावधान होकर इस समस्त और्ध्वदेहिक क्रियाको भलीभाँति सुनें।

हे गरुड! जो सम्यक् रूपसे भेदरहित है, जिसका वर्णन श्रुतियों और स्मृतियोंमें हुआ है, जिसको इन्द्रादि देवता, योगीजन और योगमार्गका चिन्तन करनेवाले विद्वान् नहीं देख सके हैं, जो गुह्यातिगुह्य है, ऐसे उस प्रधान तत्त्वको जिसे मैंने अभीतक किसी अन्यसे नहीं कहा है, तुम मेरे भक्त हो, इसलिये मैं तुम्हें बता रहा हूँ।

हे वैनतेय! इस संसारमें पुत्रहीन व्यक्तिकी गति नहीं है, उसको स्वर्ग प्राप्त नहीं होता है। अतः शास्त्रानुसार यथायोग्य उपायसे पुत्र उत्पन्न करना ही चाहिये। यदि मनुष्यको मोक्ष नहीं मिलता है तो पुत्र नरकसे उसका उद्धार कर देता है। पुत्र और पौत्रको मरे हुए प्राणीको कन्धा देना चाहिये तथा उसका यथाविधान अग्निदाह करना चाहिये। शवके नीचे पृथ्वीपर तिलके सहित कुश बिछानेसे शवकी आधारभूत भूमि उस ऋतुमती नारीके समान हो जाती है, जो प्रसवकी योग्यता रखती है। मृतकके मुखमें पञ्चरत्न डालना बीजवपनके समान है, जिससे आगे जीवकी शुभगतिका निश्चय होता है। जैसे पुष्प (ऋतुकालमें स्त्रियोंका रजोदर्शन) न होनेपर गर्भधारण सम्भव नहीं है, वैसे ही शवभूमि भी तिल-कुश आदिके बिना जीवकी शुभ योनिमें

४५०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

कारण नहीं बन पाती। इसीलिये श्रद्धापूर्वक तिल, कुश, पञ्चरत्न आदिका यथाविधान विनियोग आवश्यक है।

गोबरसे भूमिको सबसे पहले लीपना चाहिये, तदनन्तर उसके ऊपर तिल और कुश बिछाना चाहिये। उसके बाद आतुर व्यक्तिको भूमिपर कुशासनके ऊपर सुला देना चाहिये। ऐसा करनेसे वह प्राणी अपने समस्त पापोंको जला कर पापमुक्त हो जाता है। शवके नीचे बिछाये गये कुशसमूह निश्चित ही मृत्युग्रस्त प्राणीको स्वर्ग ले जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। जहाँ पृथ्वीपर मल-मूत्रादिका लेप (सम्बन्ध) नहीं है वहाँ वह सदा पवित्र है और जहाँ (मल-मूत्रादिका) लेप (सम्बन्ध) है, वहाँ (मल-मूत्रादिका अपसारण करके) गोमयसे लेप करनेपर वह शुद्ध होती है। गोबरसे बिना लिपी हुई भूमिपर सुलाये गये मरणासन्न व्यक्तिमें यक्ष, पिशाच एवं राक्षस-कोटिक क्रूरकर्मी दुष्ट लोग प्रविष्ट हो जाते हैं। मरणासन्नकी मुक्तिके लिये उसे जलसे बनाये गये मण्डलवाली भूमिपर ही सुलाना चाहिये, क्योंकि नित्य-होम, श्राद्ध, पादप्रक्षालन, ब्राह्मणोंकी अर्चा एवं भूमिक मण्डलीकरण मुक्तिके हेतु माने गये हैं। बिना लिपी-पुती मण्डलहीन भूमिपर मरणासन्न व्यक्तिको नहीं सुलाना चाहिये। भूमिपर बनाये गये ऐसे मण्डलमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लक्ष्मी तथा अग्नि आदि देवता विराजमान हो जाते हैं, अतः मण्डलका निर्माण अवश्य करना चाहिये। मण्डलविहीन भूमिपर प्राण-त्याग करनेपर वह चाहे बालक हो, चाहे वृद्ध हो और चाहे जवान हो, उसको अन्य योनि नहीं प्राप्त होती है। हे तार्क्ष्य! उसकी जीवात्मा वायुके साथ भटकती रहती है। उस प्रकारकी वायुभूत जीवात्माके लिये न तो श्राद्धका विधान है और न तो जलतर्पणकी क्रिया ही बतायी गयी है।

हे गरुड! तिल मेरे पसीनेसे उत्पन्न हुए हैं। अतः तिल बहुत ही पवित्र हैं। तिलका प्रयोग करनेपर असुर, दानव और दैत्य भाग जाते हैं। तिल श्वेत, कृष्ण और गोमूत्रवर्णके समान होते हैं। 'वे मेरे शरीरके द्वारा किये गये समस्त पापोंको नष्ट करें।' ऐसी भावना करनी चाहिये। एक ही तिलका दान स्वर्णके बत्तीस सेर तिलके दानके समान है। तर्पण, दान एवं होममें दिया गया तिलका दान अक्षय होता है। कुश मेरे शरीरके रोमोंसे उत्पन्न हुए हैं और तिलकी उत्पत्ति मेरे पसीनेसे हुई है। इसीलिये देवताओंकी तृप्तिके लिये मुख्यरूपसे कुशकी और पितरोंकी तृप्तिके लिये तिलकी आवश्यकता होती है। देवताओं और पितरोंकी तृप्ति विश्वके लिये उपजीव्य (रक्षक) होनेके कारण विश्वकी तृप्तिमें हेतु है। अतः अपसव्य आदि श्राद्धकी जो विधियाँ बतायी गयी हैं, उन्हीं विधियोंके अनुसार मनुष्यको ब्रह्मा, देवदेवेश्वर तथा पितृजनोंको संतृप्त करना चाहिये। अपसव्य आदि होकर [तिलका उपयोग करनेसे] ब्रह्मा, पितर और देवेश्वर तृप्त होते हैं। अपसव्य होकर कर्म करनेसे पितरोंकी संतृप्ति होती है²।


१-यहाँ मण्डलका तात्पर्य है—जलसे प्रोक्षणके बाद जलसे गोलाकार रेखा बना देना और चौक आदि पूरना।
२-मम स्वेदसमुद्भूतास्तिलास्तार्थ्य पवित्रकाः। असुरा दानवा दैत्या विद्रवन्ति तिलैस्तथा ॥
तिलाः श्वेतास्तिला कृष्णास्तिला गोमूत्रसंनिभाः। दहन्तु ते मे पापानि शरीरेण कृतानि वै ॥
एक एव तिलो दत्तो हेमद्रोणतिलैः समः। तर्पणे दानहोमेषु दत्तो भवति चाक्षयः ॥
दर्भा रोमसमुद्भूतास्तिलाः स्वेदेषु नान्यथा। देवता दानवास्तृप्ताः श्राद्धेन पितरस्तथा ॥
प्रयोगविधिना ब्रह्मा विश्वं चाप्युपजीवनात्। अपसव्यादितो ब्रह्मा पितरो देवदेवताः ॥
तेन ते पितरस्तृप्ता अपसव्ये कृते सति। (२।१६-२१)

प्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४५१


कुशके मूलभागमें ब्रह्मा, मध्यभागमें विष्णु तथा अग्रभागमें शिवको जानना चाहिये; ये तीनों देव कुशमें प्रतिष्ठित माने गये हैं। हे पक्षिराज ! ब्राह्मण, मन्त्र, कुश, अग्नि और तुलसी—ये बार-बार समर्पित होनेपर भी पर्युषित नहीं माने जाते, कभी निर्माल्य अर्थात् बासी नहीं होते। इनका पूजामें बारम्बार प्रयोग किया जा सकता है। हे खगेन्द्र ! तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु तथा एकादशीव्रत—ये पाँचों संसारसागरमें डूबते हुए लोगोंको नौकाके समान पार कराते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ ! विष्णु, एकादशीव्रत, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गौ—ये छह इस असार-संसारमें लोगोंको मुक्ति प्रदान करनेके साधन हैं, यह षट्पदी कहलाती है—

दर्भमूले स्थितो ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दनः ॥
दर्भाग्रे शंकरं विद्यात् त्रयो देवाः कुशे स्मृताः।
विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर ॥
नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः।
तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग ॥
पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां नृणाम्।
विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः ॥
असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी।
(२। २१—२५)

जैसे तिलकी पवित्रता अतुलनीय होती है, उसी प्रकार कुश और तुलसी भी अत्यन्त पवित्र होते हैं। ये तीनों पदार्थ मरणासन्न व्यक्तिको दुर्गतिसे उबार लेते हैं*। दोनों हाथोंसे कुश उखाड़ना चाहिये और उसे पृथ्वीपर रखकर जलसे प्रोक्षित करना चाहिये तथा मृत्युकालमें मरणासन्नके दोनों हाथोंमें रखना चाहिये। जिसके हाथोंमें कुशाएँ हैं और जो कुशसे परिवेष्टित कर दिया जाता है, वह मन्त्रहीन होनेपर (उसकी समन्त्रक क्रियाएँ न हो पायी हों, तब) भी विष्णुलोकको प्राप्त करता है। इस असार संसारसागरमें भूमिको गोबरसे लीपकर उसपर मृत मनुष्यको सुलानेसे और कुशासनपर स्थित करनेसे तथा विशुद्ध अग्निमें दाह करनेसे उसके समस्त पापोंका नाश हो जाता है।

लवण और उसका रस दिव्य (उत्तम लोकका प्रापक) है, वह प्राणियोंकी समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। लवणके बिना अन्न-रस उत्कट अर्थात् न अभिव्यक्त होते हैं और न सुस्वादु होते हैं। इसीलिये लवण-रस पितरोंको प्रिय होता है और स्वर्गको प्रदान करनेवाला है। यह लवण-रस भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुआ है। इस बातको जाननेवाले योगीजन, लवणके साथ दान करनेको कहते हैं। इस पृथ्वीपर यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री तथा शूद्र वर्णके आतुर व्यक्तिके प्राण न निकलते हों तो उसके लिये स्वर्गका द्वार खोलनेके लिये लवणका दान देना चाहिये।

हे पक्षीन्द्र ! अब मृत्युके स्वरूपको विस्तारपूर्वक सुनें। मृत्यु ही काल है, उसका समय आ जानेपर जीवात्मासे प्राण और देहका वियोग हो जाता है। मृत्यु अपने समयपर आती है। मृत्युकष्टके प्रभावसे प्राणी अपने किये कर्मोंको एकदम भूल जाता है। हे गरुड ! जिस प्रकार वायु मेघमण्डलोंको इधर-उधर खींचता है, उसी प्रकार प्राणी कालके वशमें रहता है। सात्त्विक, राजस और तामस—ये सभी भाव कालके वशमें हैं। प्राणियोंमें वे कालके अनुसार अपने-अपने प्रभावका विस्तार करते हैं। हे सर्पहन्ता गरुड ! सूर्य, चन्द्र, शिव, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, औषधि, आठों वसु, नदी, सागर और भाव-अभाव—ये सभी कालके अनुसार यथासमय उद्भूत होते हैं, बढ़ते हैं, घटते


* तिलाः पवित्रमतुलं दर्भाश्चापि तुलस्यथ ॥
निवारयन्ति चैतानि दुर्गतिं यान्तमातुरम् ॥ (२। २५-२६)

४५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

[बायाँ स्तम्भ]

हैं और मृत्युके उपस्थित होनेपर कालके प्रभावसे विनष्ट हो जाते हैं।

हे पक्षिन्! जब मृत्यु आ जाती है तो उसके कुछ समय पूर्व दैवयोगसे कोई रोग प्राणीके शरीरमें उत्पन्न हो जाता है। इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं और बल, ओज तथा वेग शिथिल हो जाता है। हे खग! प्राणियोंको करोड़ों बिच्छुओंके एक साथ काटनेका जो अनुभव होता है, उससे मृत्युजनित पीड़ाका अनुमान करना चाहिये। उसके बाद ही चेतनता समाप्त हो जाती है, जड़ता आ जाती है। तदनन्तर यमदूत उसके समीप आकर खड़े हो जाते हैं और उसके प्राणोंको बलात् अपनी ओर खींचना शुरू कर देते हैं। उस समय प्राण कण्ठमें आ जाते हैं। मृत्युके पूर्व मृतकका रूप बीभत्स हो उठता है। वह फेन उगलने लगता है। उसका मुँह लारसे भर जाता है। उसके बाद शरीरके भीतर विद्यमान रहनेवाला वह अङ्गुष्ठ-परिमाणका पुरुष हाहाकार करता हुआ तथा अपने घरको देखता हुआ यमदूतोंके द्वारा यमलोक ले जाया जाता है।

मृत्युके समय शरीरमें प्रवाहित वायु प्रकुपित होकर तीव्र गतिको प्राप्त करता है और उसीकी शक्तिसे अग्नितत्त्व भी प्रकुपित हो उठता है। बिना ईंधनके प्रदीप्त ऊष्मा प्राणीके मर्मस्थानोंका भेदन करने लगती है, जिसके कारण प्राणीको अत्यन्त कष्टकी अनुभूति होती है। परंतु भक्तजनों एवं भोगमें अनासक्त जनोंकी अधोगतिका निरोध करनेवाला उदान नामक वायु ऊर्ध्वगतिवाला हो जाता है।

जो लोग झूठ नहीं बोलते, जो प्रीतिका भेदन नहीं करते, आस्तिक और श्रद्धावान् हैं, उन्हें सुखपूर्वक मृत्यु प्राप्त होती है। जो काम, ईर्ष्या और द्वेषके कारण स्वधर्मका परित्याग न करे,


[दायाँ स्तम्भ]

सदाचारी और सौम्य हो, वे सब निश्चित ही सुखपूर्वक मरते हैं।

जो लोग मोह और अज्ञानका उपदेश देते हैं, वे मृत्युके समय महान्धकारमें फँस जाते हैं। जो झूठी गवाही देनेवाले, असत्यभाषी, विश्वासघाती और वेदनिन्दक हैं, वे मूर्च्छारूपी मृत्युको प्राप्त करते हैं। उनको ले जानेके लिये लाठी एवं मुद्गरसे युक्त दुर्गन्धसे भरपूर एवं भयभीत करनेवाले दुरात्मा यमदूत आते हैं। ऐसी भयंकर परिस्थिति देखकर प्राणीके शरीरमें भयवश कम्पन होने लगता है। उस समय वह अपनी रक्षाके लिये अनवरत माता-पिता और पुत्रको यादकर करुण-क्रन्दन करता है। उस क्षण प्रयास करनेपर भी ऐसे जीवके कण्ठसे एक शब्द भी स्पष्ट नहीं निकलता। भयवश प्राणीकी आँखें नाचने लगती हैं। उसकी साँस बढ़ जाती है और मुँह सूखने लगता है। उसके बाद वेदनासे आविष्ट होकर वह अपने शरीरका परित्याग करता है और उसके बाद ही वह सबके लिये अस्पृश्य एवं घृणायोग्य हो जाता है।

हे गरुड! इस प्रकार मैंने यथाप्रसंग मृत्युका

प्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४५३


स्वरूप सुना दिया। अब आपके उस दूसरे प्रश्नका उत्तर जो बड़ा ही विचित्र है, उसे सुना रहा हूँ। हे पक्षिराज! पूर्वजन्ममें किये गये भाँति-भाँतिके भोगोंको भोगता हुआ प्राणी यहाँ भ्रमण करता रहता है। देव, असुर और यक्ष आदि योनियाँ भी प्राणीके लिये सुखप्रदायिनी हैं। मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियाँ अत्यन्त दुःखदायिनी हैं। हे खगेश्वर! प्राणीको कर्मका फल तारतम्यसे इन योनियोंमें प्राप्त होता है। अब मैं इसी प्रसंगमें आपसे कर्मविपाकका वर्णन भी करूँगा।

हे गरुड! प्राणी अपने सत्कर्म एवं दुष्कर्मके फलोंकी विविधताका अनुभव करनेके लिये इस संसारमें जन्म लेता है। जो महापातकी ब्रह्महत्यादि महापातकजन्य अत्यन्त कष्टकारी रौरवादि नरकलोकोंका भोग भोगकर कर्मक्षयके बाद पुनः इस पृथ्वीपर जिन लक्षणोंसे युक्त होकर जन्म लेते हैं, उन लक्षणोंको आप मुझसे सुनें।

हे खगेन्द्र! ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले महापातकीको मृग, अश्व, सूकर और ऊँटकी योनि प्राप्त होती है। स्वर्णकी चोरी करनेवाला कृमि, कीट और पतंग-योनिमें जाता है, गुरुपत्नीके साथ सहवास करनेवालेका जन्म क्रमशः—तृण, लता और गुल्म-योनिमें होता है। ब्रह्मघाती क्षयरोगका रोगी, मद्यपी विकृतदन्त, स्वर्णचोर कुनखी और गुरुपत्नीगामी चर्मरोगी होता है। जो मनुष्य जिस प्रकारके महापातकियोंका साथ करता है, उसे भी उसी प्रकारका रोग होता है। प्राणी एक वर्षपर्यन्त पतित व्यक्तिका साथ करनेसे स्वयं पतित हो जाता है। परस्पर वार्तालाप करने तथा स्पर्श, निःश्वास, सहयान, सहभोज, सहआसन, याजन, अध्यापन तथा योनि-सम्बन्धसे मनुष्योंके शरीरमें पाप संक्रमित हो जाते हैं*। दूसरेकी स्त्रीके साथ सहवास करने और ब्राह्मणका धन चुरानेसे मनुष्यको दूसरे जन्ममें अरण्य तथा निर्जन देशमें रहनेवाले ब्रह्मराक्षसकी योनि प्राप्त होती है। रत्नकी चोरी करनेवाला निकृष्ट योनिमें जन्म लेता है। जो मनुष्य वृक्षके पत्तोंकी और गन्धकी चोरी करता है, उसे छछुंदरकी योनिमें जाना पड़ता है। धान्यकी चोरी करनेवाला चूहा, यान चुरानेवाला ऊँट तथा फलकी चोरी करनेवाला बंदरकी योनिमें जाता है। बिना मन्त्रोच्चारके भोजन करनेपर कौआ, घरका सामान चुरानेवाला गिद्ध, मधुकी चोरी करनेपर मधुमक्खी, फलकी चोरी करनेपर गिद्ध, गायकी चोरी करनेपर गोह और अग्निकी चोरी करनेपर बगुलेकी योनि प्राप्त होती है। स्त्रियोंका वस्त्र चुरानेपर श्वेत कुष्ठ और रसका अपहरण करनेपर भोजन आदिमें अरुचि हो जाती है। काँसेकी चोरी करनेवाला हंस, दूसरेके धनका हरण करनेवाला अपस्मार रोगसे ग्रस्त होता है तथा गुरुहन्ता क्रूरकर्मा बौना और धर्मपत्नीका परित्याग करनेवाला शब्दवेधी होता है। देवता और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाला, दूसरेका मांस खानेवाला पाण्डुरोगी होता है। भक्ष्य और अभक्ष्यका विचार न रखनेवाला अगले जन्ममें गण्डमाला नामक महारोगसे पीड़ित होता है। जो दूसरेकी धरोहरका अपहरण करता है, वह काना होता है। जो स्त्रीके बलपर इस संसारमें जीवन-यापन करता है, वह दूसरे जन्ममें लँगड़ा होता है। जो मनुष्य पतिपरायणा अपनी पत्नीका परित्याग करता है, वह दूसरे जन्ममें दुर्भाग्यशाली होता है। अकेला मिष्टान्न खानेवाला वातगुल्मका रोगी होता है। कोई व्यक्ति यदि किसी ब्राह्मणपत्नीके साथ सहवास करे तो शृगाल, शय्याका हरण करनेवाला दरिद्र, वस्त्रका हरण करनेवाला पतंग होता है। मात्सर्य-दोषसे युक्त होनेपर प्राणी जन्मान्ध, दीपक


* संलापस्पर्शनिःश्वाससहयानाशनासनात्। याजनाध्यापनाद्यौनात् पापं संक्रमते नृणाम्॥ (२।६५)

४५४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

![किये हुए अशुभ कर्मोंका फल]

किये हुए अशुभ कर्मोंका फल