हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
विषयानुक्रमणिका. ( १३ ) विषय. पृष्ठ. विषय. पृष्ठ. तृतीयज्वरलक्षण .... .... २०३ अतीसारका लक्षण .... .... २१२ चातुर्थिकज्वरलक्षण.... .... ” ज्वरातिसार.... .... .... २१३ बेलाज्वरादिकका लक्षण .... २०४ अतीसारकी चिकित्सा .... ” भूतादिकसे उपजे रोग .... ” ज्वरातिसारके ऊपर उत्पलषट्क .... ” निदिग्धिकादि काथ.... .... ” शुं log्य्यादिकाथ.. .... .... २१४- गुडपिप्पली .... .... २०५ पाठादिकाथ .... .... ” लघुपंचमूलकाथ .... .... ” शुंठ्यादिपाचन .... .... ” जीर्णज्वरपर पटोलादि काथ .... ” वत्सकादिकाथ .... .... ” विषमज्वरका औषध.... .... ” पंचमूलीकाथ. .... .... ” चातुर्थिक ज्वरका उपाय .... ” उत्पलादिपाचन .... .... २१५. चातुर्थिकपर नस्य .... .... २०६ उशीरादिकाथ .... .... ” विषमज्वरपर लशुनकल्क .... ” जंब्वादिस्वरस .... .... ” विषमज्वरपर अष्टांगधूप .... ” काकमाचीका प्रयोग.... .... २१६ वेलाज्वरआदिकोंका उपाय .... ” जंबूट्वगादिका अवलेह .... ” ज्वरनाशक हनुमानका पूजन .... २०७ अतीसारका पूर्वरूप.... .... ” ज्वरनाशक मंत्र .... .... ” वातातिसारका लक्षण और चिकित्सा .... ” चारवर्णवाले ज्वरोंके चिह्न .... २०८ अतीसारका पाचनकल्क .... २१७ ब्राह्मण ज्वर ..... ” बालकादि कल्क ..... .... ” क्षत्रिय ज्वर ..... ” शालिपर्ण्यादि पानक .... ” वैश्य ज्वर .... .... ” तिंदुकादिरसपानक..... .... ” शूद्र ज्वर .... .... ” कुटजपुटपाक .... .... २१८ ब्राह्मणज्वरका लक्षण और शांति .... ” पित्तातिसारका लक्षण और चिकित्सा .... ” क्षत्रियज्वरका लक्षण और शांति.... २०९ शालिपर्ण्यादि पान .... .... २१९ वैश्यज्वरका लक्षण और शांति .... ” दशमूलका काथ .... .... ” शूद्रज्वरका लक्षण और शांति .... २१० धान्यपंचकादि काथ .... .... ” सर्वरोगोंपर उपचार .... ” शाल्मलीमूलकल्क .... .... ” ज्वरवालेको पथ्य आहारादि .... ” कफातिसार लक्षण .... ” ज्वरवालेको अपथ्य.... .... २११ कफातिसारकी चिकित्सा .... २२० ज्वरमुक्तोंका वर्तना.... .... ” त्र्यूषणादिक पाचन.... .... ” अतीसारचिकित्सा .... .... २१२ कालिङ्गादि कल्क .... .... ”
( १४ ) हारीतसंहिता- विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. वत्सकादि क्वाथ .... .... २२० | गुल्मचिकित्सा .... .... २२९ रक्तातिसारका लक्षण .... " | गुल्मके भेद .... .... २३० धान्यादि क्वाथ .... .... २२१ | गुल्मके निदान .... .... " दाड़िमादि क्वाथ .... .... " | यकृद्गुल्मका लक्षण .... .... २३१ गुड़बिल्वादियोग .... .... " | शुंठादिचूर्ण .... .... " वत्सकावलेह .... .... " | क्षारामृत .... .... " कुटजादि चूर्ण .... .... " | यकृद्रोगपर पाचन .... .... २३२ सन्निपातके अतिसारका लक्षण और | यकृद्गुल्मपथ्य .... .... २३३ चिकित्सा .... .... " | निंबादिक्वार्थ .... .... " कुटजाष्टक .... .... २२२ | सौराष्ट्रीकादिक्वाथ .... .... " अमृतवटक .... .... " | धवादिक्वाथ .... .... " बिल्वादि चूर्ण .... .... २२३ | कदलीजलपानक .... .... " गुदाके निकसनेको बंध करनेकी | विजोरा आदिक पान .... २३४ चिकित्सा .... .... " | खारका सेवन .... .... " अतीसारविशेषता .... २२४ | आमाजीर्णका उपाय .... " अतीसारका भेद संग्रहणीरोगका | दिवास्वापविधान .... .... " निदान और चिकित्सा .... " | हरीतक्यादि अंजन विषूचीपर .... २३५ ग्रहणीके प्रकार .... .... २२५ | रास्नादिभक्षण .... .... " ग्रहणीका उपद्रव तथा गुल्मादिकोंकी | स्वेदका उपयोग .... .... " संप्राप्ति .... .... " | गंधकादिकभक्षण .... .... " गुल्मसंज्ञक ग्रहणीरोगका लक्षण .... २२६ | कृमिरोगके प्रकार और तिन्होंके भेद .... " वातकी संग्रहणीका लक्षण .... " | जूमकी उत्पत्ति .... .... २३६ पित्तकी संग्रहणीका लक्षण .... " | कृमि उत्पन्न होनेका कारण .... " कफकी संग्रहणीका लक्षण .... " | छःप्रकारके अंतर्गत कृमि .... २३७ सन्निपातकी संग्रहणीका लक्षण .... " | कृमिरोगका लक्षण .... .... " वातग्रहणीका पाचन .... .... २२७ | सूचीमुखकृमिका लक्षण .... .... " पित्तग्रहणीका पाचन .... " | धान्यांकुरकृमिका लक्षण .... २३८ शुंठाद्यमृतप्राशन .... .... " | हारीतका प्रश्न .... .... " अभयावलेह .... .... २२८ | आत्रेयजीका उत्तर .... .... " द्राक्षादि पिण्डी .... .... २२९ | कृमिपातनका औषध .... .... २३९
विषयानुक्रमणिका. (१६) विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. कृमिनष्टकरनेकी औषध .... २४९ | बृहद्विङ्गु चूर्ण .... .... २५१ मंदाग्नि आदि अग्नियोंके निदान | पित्तशूलचिकित्सा .... .... " और चिकित्सा .... .... २५० | दाड़िमादिचूर्ण .... .... २५२ चार प्रकारके अग्निका लक्षण .... " | जीवंत्यादि घृत .... .... " चार प्रकारके अग्निका परिणाम विशेष २४१ | पित्तशूलका दूसरा उपचार .... " जठराग्निकी चिकित्सा .... २४२ | पित्तशूलमें भोजन .... .... " विषमाग्निकी चिकित्सा .... " | कफशूलचिकित्सा .... .... " तीक्ष्णाग्निकी चिकित्सा .... " | बिल्वादि क्वाथ .... .... २५३ हरीतक्यादिवटी .... .... २४३ | मातुलुंगादि रस .... .... " यवानी खांडवचूर्ण .... .... २४४ | तुबरादि चूर्ण .... .... " अरोचक चिकित्सा.... .... " | एरंडादि क्वाथ .... .... " शूलनिदान .... २४५ | वातपित्तशूलचिकित्सा.. .... २५४ वातशूलकी उत्पत्ति .... .... " | दुरालभादि कल्क .... " पित्तशूलनिदान .... .... २४६ | वातकफशूलचिकित्सा .... " कफशूलकी उत्पत्ति .... .... " | दार्वादि क्वाथ .... .... " द्विदोषजशूलकी उत्पत्ति .... २४७ | त्रिदोषशूलचिकित्सा .... .... " दशप्रकारके शूल .... .... " | सर्वशूलपर उपाय .... .... २५५ शूलोंकी साध्यासाध्यपरीक्षा .... " | शंखक्षार .... .... " शूलोंकी संख्या और पृथकरण .... " | सामान्यसे सब शूलोंकी चिकित्सा .... " वातशूलका लक्षण .... .... २४८ | चित्रकादि मोदक .... .... " पित्तशूलका लक्षण .... .... " | यवान्यादि चूर्ण .... .... २५६ कफशूलका लक्षण .... .... " | हिंग्वादिगुटी .... .... " द्वंद्वजशूलका कारण .... .... " | शूलरोगके उपद्रव .... .... " सब प्रकारके शूलोंकी चिकित्सा .... २४९ | शूलमें पथ्यापथ्य .... .... २५७ शूल तथा गुल्मपर हिंग्वादि क्वाथ .... " | पांडुरोगचिकित्सा .... .... " वातशूलपर हिंग्वादि क्वाथ .... " | पांडुरोगका निदान .... .... २५८ सैंधवादि चूर्ण .... .... २५० | पांडुरोगका पूर्वरूप .... .... " हिंग्वादि चूर्ण .... .... " | वातपांडुका लक्षण .... .... " तुंबुरु आदि चूर्ण .... .... " | पित्तपाण्डुका लक्षण .... .... " एरंडादि क्वाथ .... .... " | कफपांडुका लक्षण .... .... २५९
( १६ ) हारीतसंहिता-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| त्रिदोषजपांडुका लक्षण .... | २६९ | रसवृद्धिकारक औषध .... | २६९ |
| मट्टीखानेसे हुए पांडुका लक्षण .... | ,, | मेदोवृद्धिकारक औषध .... | ,, |
| लोहचूर्णवटी .... | २६० | अस्थिवृद्धिकारक औषध .... | ,, |
| शुंठादिमिश्रित लोहचूर्ण .... | ,, | शुक्रवृद्धिकारक औषध .... | ,, |
| मंडूकवटी .... | ,, | बलादि चूर्ण .... | २७० |
| वज्रमण्डूकवटक .... | २६१ | च्यवनप्राशनामक अवलेह .... | २७१ |
| दूसरा वज्रमण्डूकवटक .... | ,, | अगस्ति हरीतकी पाक .... | २७३ |
| अमृतवटक .... | २६२ | बलाक्वाथ .... | २७४ |
| पांडुरोगका पथ्यापथ्य .... | २६३ | पिप्पलीवर्धमान .... | ,, |
| क्षयरोगकी चिकित्सा .... | ,, | शिलाजतुचूर्ण .... | २७५ |
| क्षयरोगमें पापरूपी कारण .... | २६४ | जीवंत्यादि घृत .... | ,, |
| क्षयरोगके हेतु .... | ,, | पिप्पली आदि घृत .... | २७६ |
| क्षयरोगके प्रकार .... | २६५ | पंचकोल आदि घृत .... | ,, |
| वातक्षयका निदान .... | ,, | पाराशरघृत .... | २७७ |
| वातक्षयका लक्षण .... | ,, | बला आदि घृत .... | ,, |
| वातक्षयमें सेव्यपदार्थ .... | ,, | चन्दनादि तैल .... | २७८ |
| पित्तक्षयके हेतु .... | ,, | राजयक्ष्मारोगका निदान .... | २७९ |
| पित्तक्षयकी चिकित्सा .... | २६६ | राजयक्ष्माके लक्षण .... | ,, |
| कफक्षयका कारण .... | ,, | राजयक्ष्माका इलाज .... | २८० |
| कफक्षयका लक्षण .... | ,, | राजयक्ष्मावालेकी आयुष्यमर्यादा .... | ,, |
| कफक्षयकी चिकित्सा .... | ,, | अमृतप्राशन घृत .... | २८१ |
| त्रिदोषजक्षयकी चिकित्सा .... | ,, | तालकान्त्रातक .... | २८२ |
| धातु रस आदि सात ७ प्रकारके क्षयरोगके लक्षण .... | ,, | गुडूच्यादि चूर्ण .... | ,, |
| क्षयरोगपर पथ्यापथ्य .... | ,, | ||
| रसक्षयका लक्षण .... | २६७ | रक्तपित्तका निदान और चिकित्सा .... | २८३ |
| मांसक्षयका लक्षण .... | ,, | रक्तपित्तके उपद्रव .... | २८५ |
| मेदःक्षयका लक्षण .... | ,, | रक्तपित्तका लक्षण .... | ,, |
| अस्थिक्षयका लक्षण .... | ,, | रक्तपित्तकी चिकित्सा .... | २८६ |
| वीर्यक्षयका लक्षण .... | २६८ | ऊर्ध्वरक्तका उपाय .... | ,, |
| रसरक्त वृद्धिकारक औषध .... | ,, | वासादि क्वाथ .... | ,, |
विषयानुक्रमणिका. (१७) विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. निंबक्वाथ अथवा अडूसाका काथ .... २८६ | गुदामें अर्शका स्थान .... ३०० वासाकी प्रशंसा .... ,, | अर्शकी चिकित्साका प्रकार .... ,, तालीस चूर्ण .... २८७ | अर्शरोगके उपद्रव .... ,, अडूसाका काथ और कल्क .... ,, | असाध्यअर्श .... ३०१ नासामवृत्तरुधिरचिकित्सा .... २८८ | पाचनक्वाथ .... ,, हारितालकादि नस्य .... ,, | कल्कयोग .... ,, आम्रादि नस्य .... ,, | पत्रकादिक्वाथ .... ,, पलांड्वादि नस्य .... २८९ | पिप्पल्यादि योग .... ३०२ वासादि पानक .... ,, | वार्ताकयोग .... ,, दाडिमादि रस .... ,, | भल्लातकचतुष्टय .... ,, मुखमें प्रवृत्त हुए रुधिरकी चिकित्सा ,, | कल्याणनामकलवण .... ,, दाडिमपुष्पादि नस्य .... ,, | भल्लातक वटक .... ३०३ शतावरीघृत .... २९१ | प्राणदेनेवाला मोदक .... ,, मृद्वीका आदि घृत .... ,, | कांकायन गुटिका .... ३०४ कूष्मांडायवलेह .... २९२ | लवणोत्तमादि .... ३०५ अन्य कूष्माण्डका अवलेह .... २९३ | एलादिगुटिका .... ,, खंडखाद्यरसायन .... ,, | अर्शनाशकचतुःसम मोदक .... ,, रक्तातिसारचिकित्सा .... २९५ | त्रिकटुकाद्यमोदक .... ,, योनिप्रवाहचिकित्सा .... ,, | मरिचाद्यमोदक .... ३०६ अर्शचिकित्सा .... २९६ | सूरणपिंड .... ,, अर्शके प्रकार .... ,, | भीमवटक .... ,, वातार्शके हेतु और संप्राप्ति .... २९७ | चव्याद्यघृत .... ३०७ पित्तार्शका हेतु .... ,, | पिप्पल्याद्यतैल .... ,, कफार्शका हेतु .... ,, | मुस्ताद्यवटक .... ३०८ वातार्शका लक्षण .... २९८ | भल्लातकगुड़ .... ३०९ पित्तार्शका लक्षण .... ,, | अन्यभल्लातकगुड़ .... ,, कफार्शका लक्षण .... ,, | भल्लातकावलेह .... ३१० त्रिदोषार्शका लक्षण .... ,, | रक्त बवासीरकी चिकित्सा .... ३११ गुदरोगलक्षण .... ,, | वर्तियोग .... ३१२ अर्शके स्थान .... २९९ | देवादाल्यादिलेप .... ,,
१. प्रथम स्थान: परिभाषा, ऋतुचर्या व दिनचर्या स्थान
( १८ ) हारीतसंहिता-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| अर्शरोगपर शस्त्रादिकर्म | ३१२ | वात आदि दोषोंसे उपजी तृषाके क्रमसे लक्षण | ३२६ |
| अर्शरोगमें पथ्य | ३१३ | त्रिदोषकी तृषाका लक्षण | ,, |
| अथ खांसीकी चिकित्सा | ३१४ | अन्यतृषाओंके लक्षण | ,, |
| कासरोगके हेतु | ,, | असाध्य तृष्णाका लक्षण | ३२७ |
| कासरोगकी संप्राप्ति | ३१५ | वातकी तृषाकी चिकित्सा | ,, |
| कासरोगके प्रकार | ,, | पित्तकी तृषाकी चिकित्सा | ,, |
| वातसे उपजी खांसीका लक्षण | ३१६ | कफकी तृषाकी चिकित्सा | ३२८ |
| पित्तसें उपजी खांसीके लक्षण | ,, | त्रिदोषकी तृषाकी चिकित्सा | ,, |
| कफकी खांसीके लक्षण | ,, | तालुशोषकी चिकित्सा | ३२९ |
| त्रिदोषकी खांसीके लक्षण | ,, | दाड़िमकोल | ,, |
| क्षतजखांसीके लक्षण | ,, | तृष्णाआदिकोंकी साधारण चिकित्सा | ,, |
| रक्तकी खांसीके लक्षण | ३१७ | मूर्च्छाकी संप्राप्ति | ३३० |
| सबप्रकारकी खांसीयोंके लक्षण | ,, | मूर्च्छाका लक्षण | ३३१ |
| वातकी खांसीकी चिकित्सा | ३१८ | वातज आदि मूर्च्छालक्षण | ,, |
| कट्फल आदि औषध | ,, | पित्तज मूर्च्छालक्षण | ,, |
| द्राक्षादि औषध | ३१९ | कफजमूर्च्छा | ३३२ |
| बालकादिकल्क | ,, | सन्निपातजमूर्च्छा | ,, |
| मुस्तादिचूर्ण | ,, | रक्तगंधजमूर्च्छा | ,, |
| पित्तकी खांसीकी चिकित्सा | ,, | मद्यादिजन्यमूर्च्छा | ३३२ |
| लघुतालीस आदि औषध | ३२० | मूर्च्छा, भ्रम, निद्रा और तन्द्रा इन्होंका हेतु | ,, |
| बृहत्तालीसाद्य औषध | ३२१ | मूर्छाकी चिकित्सा | ३३३ |
| छर्दिलक्षण | ,, | रक्तमूर्च्छा आदिकोंका उपाय | ,, |
| वातछर्दीकी चिकित्सा | ३२२ | नष्टसंज्ञमूर्च्छितकी चिकित्सा | ३३४ |
| पित्तकी छर्दीकी चिकित्सा | ३२३ | मूर्च्छा, मद, भ्रम इन्होंकी चिकित्सा | ,, |
| कफकी छर्दीकी चिकित्सा | ३२४ | मूर्च्छादिकोंके साधारण उपाय | ,, |
| एलादिचूर्ण | ,, | निद्राचिकित्सा | ३३५ |
| छर्दीकी शमनक्रिया | ,, | मदात्ययचिकित्सा | ३३६ |
| छर्दरोगमें पथ्यापथ्य | ३२५ | वातादिदोषजन्य मदात्यय | ३३७ |
| तृषा और तालुशोषकी संप्राप्ति | ,, |
विषयानुक्रमणिका. (१९)
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| मदात्ययकी चिकित्सा | .... ३३७ | सोलह प्रकारके समान वायुके कोप | ३५१ |
| सुपारीके मदका निदान और चिकित्सा | ३३८ | सोलह प्रकारके अपान वायुके लक्षण | ,, |
| कोदूं आदिसे उपजे मदात्ययकी चिकित्सा | " " | अर्दित अर्थात् लकुआके लक्षण | ,, |
| दाहकी संप्राप्ति आदिक | .... " | द्वंदज अर्दितका लक्षण | .... ३५२ |
| दाहकी चिकित्सा | .... ३३९ | असाध्य अर्दित | .... ,, |
| मृगीरोगकी संप्राप्ति आदिक | .... ३४० | अपान आदिक वातोंकी चिकित्सा | ३५३ |
| मृगी रोगकी चिकित्सा | .... ३४१ | स्नेहन नामक घृत | .... " |
| कूष्मांडलेह | .... " | निरूहण बस्ति | .... ,, |
| कूष्मांड घृत | .... " | पाचन तथा शमनका कथन | .... ३५४ |
| दीपघृत | .... ३४२ | सर्वांगवायुकी चिकित्सा | .... ,, |
| ब्राह्मीघृत | .... ,, | रसोतक योग | .... ३५५ |
| अन्य उपाय | .... ,, | वातको शमन करनेवाले काथ | .... " |
| त्र्यूषणादि गुटिका | .... ,, | बला आदिक औषध | .... ३५६ |
| चंदनादि चूर्ण | .... ३४३ | बलाआदितैल | .... ३५८ |
| द्राक्षावलेह | .... ३४४ | भृंगराजतैल | .... ,, |
| अन्य उपाय | .... ३४५ | आमपाककी चिकित्सा | .... ३५९ |
| उन्मादनिदान | : ,, | नारायणनामकतैल | .... ३६० |
| वातव्याधिचिकित्सा तहां सोलह प्रकारकी शिरोगत प्राणवायुका प्रकोप | .... ३४६ | आमवातचिकित्सा | .... ३६१ |
| विष्टंभी आमके लक्षण | .... ३६२ | ||
| गुल्मीआमका लक्षण | .... ,, | ||
| सोलह प्रकारके उदान वायुके कोप | ३४७ | स्नेही आमके लक्षण , | ,, |
| व्यानवायुके कोपके लक्षण | .... ३४८ | आमके लक्षण | .... ३६३ |
| समानवायुका प्रकोप | .... ,, | पकाम और सर्वांगआमके लक्षण | ,, |
| आक्षेपक वायुका लक्षण तथा अपतन्त्रक वायुके लक्षण | .... ३४९ | पाचनविधि | .... ३६४ |
| आमवातरोगको शमनकरनेवाली औषध | .... ३६५ | ||
| अप्रतानक वायुका प्रकोप | .... ,, | ||
| एकांग वायु | .... ३५० | आमवातमें वर्ज्य | .... ३६७ |
| एकांग पक्षघात वायु | .... ,, | गृध्रसीवातका निदान और लक्षण | ,, |
| तूनी तथा प्रतितूनी वायु | .... ,, | गृध्रसीवातकी चिकित्सा | .... ३६८ |
| व्यानवायुके कोपका लक्षण | .... ,, | वातरक्तका निदान और लक्षण | .... ३६९ |
(२०) हारीतसंहिता-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| वातरक्तकी चिकित्सा | ३६९ | प्रमेहके लक्षण .... | ३८५ |
| अम्लपित्तका निदान | ३७० | प्रमेहचिकित्सा .... | ३८६ |
| अम्लपित्तकी चिकित्सा .... | ,, | प्रमेहपिटिकाकी चिकित्सा .... | ३८८ |
| शोफचिकित्सा | ३७१ | प्रमेहमें पथ्यापथ्य .... | ३८९ |
| पुनर्नवादिकाथ | ३७३ | पीतप्रमेहपर हरिद्रादिकाथ | ३९० |
| अन्य उपाय .... | ,, | पित्तप्रमेहपर कमलादि काथ .... | ,, |
| गुल्मनिदान और लक्षण | ३७४ | आमलक्यादिचूर्ण .... | ,, |
| गुल्मचिकित्सा | ३७५ | खादिरादि चूर्ण .... | ,, |
| शुंठ्यादि काथ .... | ,, | कुष्ठादि चूर्ण.... .... | ३९१ |
| स्नेह विधि .... | ,, | मूत्रकृच्छ्रचिकित्सा .... | ,, |
| शुंठ्यादि पानक .... | ३७६ | मूत्ररोधचिकित्सा .... | ३९२ |
| विरूक्षण .... | ,, | मूत्रकृच्छ्रका कारण .... | ३९३ |
| वातगुल्मपाचन .... | ३७७ | मूत्रकृच्छ्रपर उपाय | ,, |
| पित्तगुल्म तथा कफके गुल्मका पाचन | ,, | अश्मरी अर्थात् पथरी रोगकी | |
| वातके गुल्ममें जुलाब .... | ,, | चिकित्सा .... | ३९५ |
| पित्तके गुल्ममें जुलाब .... | ३७८ | अश्मरीरोगपर चिकित्सा .... | ३९६ |
| कफगुल्मपर विरेचन .... | ,, | एलादि काथ .... | ,, |
| क्षारपान .... | ३७९ | गोक्षुरकादि चूर्ण .... | ,, |
| अजमोदादि औषध .... | ,, | अन्य उपाय .... | ३९७ |
| हिंग्वादिचूर्ण .... | ,, | वृषणचिकित्सा .... | ,, |
| पित्तगुल्मोदरचिकित्सा .... | ३८० | वृषण वृद्धिपर चिकित्सा .... | ३९८ |
| कफके गुल्मकी चिकित्सा .... | ,, | विसर्प रोगकी चिकित्सा .... | ३९९ |
| वातकफके गुल्मकी चिकित्सा.... | ३८१ | उपसर्ग चिकित्सा .... | ४०१ |
| सन्निपातके गुल्मकी चिकित्सा.... | ,, | मसूरिकाकी चिकित्सा .... | ४०२ |
| शोथचिकित्सा .... | ३८२ | व्रणचिकित्सा .... | ४०४ |
| शोथरोगमें वर्ज्य .... | ,, | जात्यादिघृत .... | ४०७ |
| रक्तगुल्ममें पाचन .... | ३८३ | श्लीपदरोगका निदान तथा लक्षण | ,, |
| रक्तगुल्ममें पथ्य .... | ,, | अर्बुदरोगकी चिकित्सा .... | ४०८ |
| जलोदरका निदान तथा लक्षण.... | ३८४ | क्षत तथा गंडमाला रोगका निदान | |
| जलोदररोगकी चिकित्सा .... | ,, | और लक्षण .... | ४०९ |
विषयानुक्रमणिका. ( २१ ) विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. लूतागंडमाला चिकित्सा .... ४१० | कुंकुमादिघृत .... ४२५ कुष्ठचिकित्सा .... ४१२ | भ्रूदोषलक्षण .... ४२६ कुष्ठोंके सामान्यभेद और लक्षण .... ४१३ | भ्रूदोषकी चिकित्सा .... ” कुष्ठोंके नाम ... ” | नासारोगलक्षण .... ४२७ कपाल व उदुंबर कुष्ठलक्षण .... ” | नासारोगचिकित्सा .... ४२८ मंडलकुष्ठ तथा गजचर्मकुष्ठका लक्षण ” | इंद्रलुप्तरोगका लक्षण .... ” गोजिह्वककुष्ठलक्षण .... ४१४ | इंद्रलुप्तरोगकी चिकित्सा .... ४२९ विपादिकाकुष्ठलक्षण .... ” | कर्णरोगलक्षण .... ४३० वातादिजन्यकुष्ठका लक्षण .... ” | कर्णरोगकी चिकित्सा .... ४३१ रक्तस्थकुष्ठ .... ४१५ | नेत्ररोगके लक्षण .... ४३२ मांसस्थ मेदस्थ तथा अस्थिस्थकुष्ठ ” | नेत्ररोगकी चिकित्सा .... ४३३ मज्जास्थ तथा शुक्रस्थ कुष्ठ .... ” | नेत्रके फूलेकी चिकित्सा .... ४३४ कुष्ठचिकित्सा .... ” | नेत्रपटलका लक्षण .... ४३५ शुंण्ठ्यादि क्वाथ .... ४१६ | नेत्रपटलचिकित्सा .... ” गुडूच्यादि क्वाथ .... ४१७ | नेत्ररोगमें वर्ज्य .... ४३६ कुष्ठरोगमें लेपविधि .... ” | मुखरोगकी चिकित्सा .... ” खदिरादि क्वाथ .... ४१८ | ओष्ठरोगकी चिकित्सा .... ” आरग्वधादि क्वाथ .... ” | दंतरोगलक्षण .... ४३७ खदिरादिघृतपानक .... ” | दंतरोगचिकित्सा .... ” भल्लातकतैल .... ४१९ | जिह्वारोगलक्षण .... ४३८ तिलतैल .... ” | जिह्वारोगचिकित्सा .... ” हरिद्रादितैल .... ” | गलगंडरोगके लक्षण .... ४३९ निंबादिघृत .... ” | गलगंडरोगकी चिकित्सा .... ” पांडुरकुष्ठकी चिकित्सा .... ४२० | गलशुंडिकारोगके लक्षण .... ४४० अथ शालाक्यतंत्र .... ४२१ | गलशुंडिकारोगकी चिकित्सा .... ” शिरोरोगचिकित्सा .... ” | नपुंसकके लक्षण .... ४४१ षट्बिंदुनामकतैल .... ४२४ | शुक्रवृद्धिके उपाय .... ४४२ बिंदुत्रयतैल .... ४२५ | विदार्यादि औषध .... ४४३ कुष्ठादिघृत .... ” | शुक्रवृद्धिमें वर्जित पदार्थ .... ” लाक्षादितैल .... ” | वंध्यारोगके लक्षण .... ४४४
( २२ ) हारीतसंहिता-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| वंध्यारोगके दूरकरनेवाले औषध .... | ४४५ | बालकोंके पूतनाका दोष .... | ४६१ |
| त्रिदोषदूषितरजकी चिकित्सा .... | ,, | भूतविद्या .... | ४६४ |
| पित्तदूषितरजकी चिकित्सा .... | ४४६ | ग्रहदोषनाशक धूप .... | ४६७ |
| कफदूषितरजकी चिकित्सा .... | ,, | भूतेश्वरमंत्र .... | ,, |
| स्त्रियोंके गर्भार्थ पथ्य .... | ४४७ | आवेश मंत्र .... | ४६८ |
| गर्भोपचारविधि .... | ,, | विषतंत्र .... | ,, |
| चलितगर्भचिकित्सा .... | ४४९ | मुखसिंचन मंत्र .... | ४६९ |
| गर्भोपद्रवचिकित्सा .... | ४५० | कानमें जपनेके वास्ते मंत्र .... | ,, |
| मधुकादि कल्क .... | ४५१ | विषशमन औषध .... | ४७० |
| गर्भोपद्रवमें उपचारकी शिक्षा .... | ४५२ | जंगमविषकी चिकित्सा .... | ४७१ |
| मूढगर्भचिकित्सा .... | ,, | विषबंधनमंत्र .... | ,, |
| मृतगर्भका लक्षण .... | ४५३ | लेप .... | ४७२ |
| वातिकमूढगर्भचिकित्सा .... | ,, | मंत्र .... | ४७३ |
| पैत्तिकमूढगर्भचिकित्सा .... | ,, | भिन्न अर्थात् शस्त्रादिसे टूटे- | |
| कफजमूढगर्भचिकित्सा .... | ,, | हुएकी चिकित्सा .... | ,, |
| रक्तपित्तजमूढगर्भचिकित्सा .... | ४५४ | भिन्नअस्थिकी चिकित्सा .... | ४७४ |
| मूढगर्भमें शस्त्रचिकित्सा .... | ,, | शल्योद्धारचिकित्सा .... | ४७५ |
| उत्पत्तिके उपायके वास्ते मंत्र और औषध | ४५५ | अस्थिभग्नकी चिकित्सा .... | ४७६ |
| सुखसे बालक होनेके यत्न .... | ,, | घृष्टहाड़की चिकित्सा .... | ४७७ |
| मन्त्र .... | ,, | आस्फालित हाड़की चिकित्सा .... | ४७८ |
| यंत्र .... | ४५६ | अभिघात अर्थात् चोट लगी हुईकी | |
| मंत्र .... | ,, | चिकित्सा .... | ,, |
| सूतिकारोगकी चिकित्सा .... | ,, | अग्निदग्ध चिकित्सा .... | ४७९ |
| स्त्रीके दूध बढ़ानेके उपाय .... | ४५७ | धूमपानचिकित्सा .... | ४८० |
| बालरोगनिदान और चिकित्सा .... | ४५८ | ||
| उत्फुल्लरोगकी चिकित्सा .... | ४५९ | इति तृतीयस्थानं समाप्तम् । | |
| बालरोगचिकित्साके अन्य उपाय .... | ,, | ||
| बालकोंकी वृद्धिको बढ़ानेवाले औषध | ४६० | अथ चतुर्थस्थानम् । | |
| बालकोंकी वाणीको करनेवाले औषध | ४६१ | तुलामानविधि.... .... | ४८१ |
| बालकोंके अपस्माररोगकी चिकित्सा | ,, | अन्यमत .... | ,, |
विषयानुक्रमणिका. (२३) विषय. पृष्ठ. | विषयः पृष्ठ. तैलपाकविधि .... .... ४८३ | त्रिफलाकाथ .... ४९१ निरूहबस्तिकर्मविधि .... ४८४ | हरडेके कल्प और वर्णोंका भेद ४९४ स्वेदनविधि .... .... ४८५ | रसोनकल्प .... ४९६ रक्तावसेच फस्त खुलानेकी विधि ४८६ | लहुसुनके गुण .... ४९८ रक्तलक्षण .... ... ४८७ | पेयरसोनविधि .... " जलौकाविचारविधि .... " | गुग्गुलकल्प .... ५०० इन्द्रायुधके लक्षण .... .... " | इति पञ्चमस्थानं समाप्तम् । रोहिणीके लक्षण .... .... " | अथ षष्ठं शारीरस्थानम् । कालिका जोखके लक्षण .... ४८८ | धूम्रा जोखके लक्षण .... .... " | शारीराध्याय .... ५०३ जोख लगवानेका क्रम .... " | नपुंसक तथा अपत्ययुग्मका विचार ५०७ इति चतुर्थस्थानं समाप्तम् । | नपुंसकका विचार .... " अथ पंचमं कल्पस्थानम् । | गर्भका विवर्णन .... ५०८ हरीतकीका कल्प .... ४८९ | परिशिष्टाध्याय .... ५११ इति हारीतसंहिताविषयानुक्रमणिका समाप्ता ।
(४५) विषयानुक्रमणिका
पृ. विषय । पृ. विषय १२४ .... अजापुच्छी । १४० .... पीतिकापुष्प ४२५ .... अपामार्ग विशेष परीक्षा । १४१ .... पीतिकाफलिकाफलानि १२६ .... एकमुण्डि । .... .... पिच्छिलद्रु १२७ .... लघु विष्णुकान्ता । १४४ .... गिरि पिप्पलीका फल प्रकार .... .... रोहितकद्वयम् । १४५ .... .... पिप्पला .... .... कनककुङ्कुम । .... .... पिप्पलीमूलभेद .... प्रकारान्तर रस .... .... .... मूल के प्रकार .... गन्धकशोधन दुग्ध द्वारा .... .... .... मूल ओषधि .... .... पृश्निपर्णि । १४६ .... लघुत्व संपादे प्रकारान्तर .... वलीपलितहर रस प्रकार । .... .... रस सिन्दूर गुण .... .... मान्दी द्रवण । .... .... विष द्रवीकरण प्रकार .... .... मान्दी द्रावण । .... प्रकारान्तर रससिन्दूर गुण १३२ .... लवणद्रावण । १४९ .... प्रकारान्तर सैन्धव द्रवण .... .... .... । १५३ .... विष द्रावणक्रिया .... रससिन्दूरनिर्गमनक्रियाविधानम् ती ... (चित्र / Floral Motif)
श्रीगणेशाय नमः । अथ हारीतसंहिता । भाषाटीकासमेता । ॥ प्रथमोऽध्यायः १. मंगलाचरण । नत्वा शिवं परमतत्त्वकलाविरूढं ज्ञानामृतैकचटुलं परमात्मरूपम् ॥ रागादिरोगशमनं दमनं स्मरस्य शश्वत्क्षपाधिपधरं त्रिगुणात्मरूपम् ॐ ॥ १ ॥ श्रीमद्देवीपदद्वन्द्वं प्रत्यूहव्यूहनाशनम् । तन्नमामि नतिर्य्यस्य वितरत्युत्तमां मतिम् ॥ १ ॥ शिवसहायपुत्रेण रविदत्तेन धीमता । हारीतसंहिताभाषाटीका रम्या विरच्यते ॥ २ ॥ परमतत्त्व रूप कलाको उत्पन्न करनेवाले, ज्ञानरूपी अमृतसे सुन्दर परमात्मरूप राग आदि रोगोंको शांत, कामदेवको दग्ध, निरंतर चन्द्रमाको मस्तकमें धारण करनेवाले, त्रिगुणात्मस्वरूप महादेवजीको प्रणाम करके ( यह हारीतसंहितानामक ग्रन्थ करता हूं ) ॥ १ ॥ २ ॥ आत्रेयहारीतसंवाद । हिमवदुत्तरे कूले सिद्धगन्धर्वसेविते॥शान्ते मृगगणाकीर्णे नाना- पादपशोभिते ॥ २ ॥ तत्रस्थं तपसा युक्तं तरुणादित्यतेजसम् ॥ शुद्धस्फटिकवच्छुभ्रं भूतिभूषितविग्रहम् ॥ ३ ॥ जटाजूटाटवी- मूलेऽषितं शुभ्रकुण्डलम् ॥ आत्रेयं बहुशिष्यैस्तु राजितं तपसा- न्वितम् ॥४॥ पप्रच्छ शिष्यो हारीतः सर्वज्ञानमिदं महत् ॥५॥
पादटिप्पणी (Footnotes): १ 'विरूढोऽङ्कुरिते जाते' इति मेदिनी । २ 'चटुलः सुन्दरेऽभियाम्'इत्यमरः। * संहितां करोमीति शेषेणान्वयः ।
( २ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित, बाधाओंसे रहित, मृगोंके समूहसे व्याप्त और अनेक प्रकारके वृक्षोंसे शोभित हिमालयपर्वतके उत्तर कूल पर बैठे ॥ २ ॥ तरुण सूर्यके समान तेजवाले, तपसे युक्त शुद्ध हुए बिल्लौरी पत्थरके समान श्वेत और भूतिसे भूषित शरीर ॥ ३ ॥ जटाजूटरूपी वनके मूलमें बसनेवाले श्वेतकुंडलोंको धारण किये और बहुतसे शिष्योंसे शोभित, तपस्वी आत्रेयजी महाराजसे ॥ ४ ॥ हारीत नामके शिष्यने इस सम्पूर्ण महाज्ञानको पूछा ॥ ५ ॥ हारीत उवाच ॥ भवन् गुणगणाधार आयुर्वेदविदां वर ॥ विनयाद्विनीतोऽहं पृच्छामि मुनिपुङ्गव ॥ ६॥ कथं रोगसमुत्प- त्तिरुत्पन्नो ज्ञायते कथम्॥ उपचारः प्रचारश्च कथं वा सिद्धिम- च्छति ॥७॥ एतत्सम्यक्परिज्ञानं कथयस्व महामुने ॥ एवं पृष्टो महाचार्यो हारीतेन महात्मना ॥ प्रत्युवाच ऋषिः पुत्रं प्रहस्योत्फुल्ललोचनः ॥ ८ ॥ हारीत बोले-हे पूज्य ! हे गुणोंके समूहके आधार ! हे आयुर्वेदके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ ! हे मुनियोंमें उत्तम ! अशिक्षित मैं विनयसे पूछता हूँ ॥ ६ ॥ कैसे रोगकी उत्पत्ति होती है ? उत्पन्न हुआ रोग कैसे जाना जाता है ? रोगकी चिकित्सा और पथ्य कैसे होता है ? और वही रोग कैसे सिद्धिको प्राप्त होता है ? ॥ ७ ॥ हे महामुने ! इस परिज्ञानको अच्छी तरह कहो । इस प्रकार महात्मा हारीतसे पूछे गये खिले हुए नेत्रवाले महा आचार्य आत्रेयजी हँसकर शिष्य हारीतसे बोले ॥ ८ ॥ आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ॥ चिकित्साशास्त्रकुशल वैद्यविद्याविचक्षण ॥ ९ ॥ आयुर्वेदमपा- रन्तु श्लोकानां लक्षसंख्यया ॥ कथं तस्य परिज्ञानं कालेनाल्पेन पुत्रक ॥ १० ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! हे महाप्राज्ञ ! हे सर्वशास्त्रोंमें कुशल ! हे चिकित्साशा- स्त्रमें कुशल ! हे वैद्योंकी विद्याके जाननेवाले ! ॥ ९ ॥ हे पुत्र ! श्लोकोंकी लक्ष संख्यासे युक्त आयुर्वेद अपार है । उसका परिज्ञान थोड़े समयमें कैसे हो सकता है ? ॥ १० ॥ अल्पायुषोऽल्पवक्तारः स्वल्पशास्त्रविशारदाः ॥ अल्पावधारणे शक्ताः कलौ जाता इमे नराः ॥ ११ ॥ अल्पः कलियुगश्चायं नरोपद्रवकारणम् ॥ कथं पुत्र प्रवक्ष्यामि विस्तरेण तवा- गमम् ॥ १२ ॥
अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( ३ ) अल्प आयुवाले और अल्प बोलनेवाले और स्वल्प अर्थात् थोड़े शास्त्रको जाननेवाले और थोड़ा धारण करनेवाले अर्थात् अल्पबुद्धि ये मनुष्य कलियुगमें उत्पन्न होते हैं ॥ ११ ॥ यह कलियुग भी अल्परूप है परंतु मनुष्योंके उपद्रवोंका कारण है इसलिये हे पुत्र ! विस्तारसे तुमसे वैद्यक शास्त्र कैसे कहूँ ॥ १२ ॥ यस्य श्रवणकालो यो याति चान्तश्च पुत्रक ! ॥ तस्माच्चाल्पत- रेणाऽपि वक्ष्यामि शृणु साम्प्रतम् ॥ १३ ॥ चतुर्विंशसहस्रैस्तु मयोक्ता चाद्यसंहिता ॥ तथा द्वादशसाहस्री द्वितीया संहिता मता ॥ १४ ॥ तृतीया षट्सहस्रैस्तु चतुर्थी त्रिभिरेव च ॥ १५ ॥ पञ्चमी द्विकपञ्चशतैः प्रोक्ताः पञ्चात्र संहिताः ॥ तस्माच्चाल्पत- रेणापि वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ १६ ॥ जिस वैद्यकके सुननेका जो समय है वह तत्काल ही समाप्त हो जाता है अर्थात् दिन जाते देर नहीं लगता इसलिये इस समय मैं तुमसे संक्षेप ही में कहूँगा, सुनो ॥ १३ ॥ मैंने चौबीस हजार श्लोकोंसे युक्त प्रथम संहिता कही है और तैसे ही बारह हजार श्लोकोंसे संयुक्त दूसरी संहिता कही है ॥ १४ ॥ और तैसे ही छः हजार श्लोकोंसे युक्त तीसरी संहिता कही है और तीन हजार श्लोकोंसे संयुक्त चौथी संहिता कही है ॥ १५ ॥ और डेढ़ हजार अर्थात् पंद्रहसौ श्लोकोंसे संयुक्त पाँचवीं संहिता कही है। ऐसे पांच संहिता मैने कही हैं इसलिये हे पुत्र ! मैं संक्षेपसे कहूँगा तुम सुनो ? ॥ १६ ॥ येन विज्ञानमात्रेण गदवेदविदो भवेत् ॥ किमत्र बहुनोक्तेन चा- ल्पसारे विशारद ॥ १७ ॥ येन धर्मार्थसौख्यं च तद्धि कर्म समाचरेत् ॥ येन संजायते श्रेयो येन कीर्तिमहत्सुखम् ॥ १८ ॥ तत्कर्म नितरां साध्यं जनानन्दविधायकम् ॥ १९ ॥ जिसके जानने मात्रसे आयुर्वेदको जाननेवाला मनुष्य हो जाता है, हे विशारद ! अल्प,आयु, बुद्धि और बलवाले इस कलिमें अधिक कहनेसे लाभ ही क्या ? ॥ १७॥ जिस कर्मसे धर्म, अर्थ और सुख प्राप्त हो, जिससे कल्याण हो और जिससे कीर्ति तथा महा आनन्द प्राप्त हो वही कर्म करे ॥ १८ ॥ वह कर्म अवश्य करे जो मनुष्योंको आनन्द देनेवाला है ॥ १९ ॥ १ इस संहितामें १०३ अध्याय और ३९१७ श्लोक हैं। मेरी समझमें यह ३ हजार श्लोकवाली संहिता है । १५ वें इसी श्लोकके अनुकूल इस संहितामें सैकड़ों श्लोक एक या दो चरणके हो श्लोक पूर्ण माने गये हैं। वही सब मिलकर ९१७ हो गये हैं । इनमें भी बहुत कुछ सुधारने योग्य सुधारे गये हैं ।
( ४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- एकं शास्त्रं वैद्यमध्यात्म कं वा सौख्यं चैकं यत्सुखं व तपो वा ॥ वन्द्यश्चैको भूपतिर्वा यतिर्वा एकं कर्म श्रेयसं वा यशो वा ॥२०॥ बहुतरमुपचारात् सारमाधारलोके जननमतिसुखानां वर्द्धनं श्रेयसां वा ॥ विगतकलुषभावा चोज्ज्वला कीर्त्तिमूर्त्तिर्न खलु कुटिलतास्याः श्रूयते लोकवृन्दैः ॥ २१ ॥ एक ही शास्त्र ठीक है, वैद्यक अथवा वेदांत और सुख भी एक ही ठीक है, भोग अथवा तप, वंदनाके योग्य भी एक ही ठीक है, राजा अथवा संन्यासी, कर्म भी एक ही ठीक है, कल्याण अथवा यश ॥ २० ॥ इस संसारमें चिकित्सा करनेसे अपने और दूसरोंके सुखोंको देनेवाला, कल्याणके बढ़ानेवाला बहुत सा लाभ होता है । कलुषतासे हीन, उज्ज्वल कीर्ति प्राप्त होती है । उसकी कुटिलता मनुष्योंके द्वारा कहीं नहीं सुनी जाती ॥ २१ ॥ आयुर्वेदमिदं सम्यङ् न देयं यस्य कस्यचित् ॥ २२ ॥ नाभ- क्तायाप्यशान्ताय न मूर्खाय न चाधमे ॥ शान्ते देयं न देयं स्यात् सर्वथा नाधमेऽधने ॥ २३ ॥ अच्छी तरहसे यह आयुर्वेद हर एक मनुष्यको नहीं देना चाहिये ॥२२॥ अभक्त, शान्त, मूर्ख और नीचको कभी न दे । शान्त पुरुषको दे। नीचप्रकृति और कंगालको न देना चाहिये॥२३॥ धर्मिष्ठः कुहनाविर्वाजतमनाः शान्तः शुचिः शुद्धधीर्धीरो- ऽभीरुविवेकसारहृदयो विद्याविलासोज्ज्वलः॥प्राज्ञो रोगगणप्र- चारनिपुणोऽलुब्धः सदा तोषधृगित्थं सर्वगुणाकरो नृपजनैः पूज्यः सदा रोगवित् ॥ २४ ॥ धर्ममें स्थित, कपटसे वर्जित मन, शांत, पवित्र, शुद्धःबुद्धि, धीर, निर्भय, विवेकके सारसे संयुक्त हृदय, विद्याके आनंदसे प्रकाशित, पंडित, रोगोंके समूहके प्रचारमें, निपुण, निर्लोभी, सब कालमें संतोषको धारनेवाला और सब गुणोंका खजाना वैद्य राजालोगोंका पूज्य होता है ॥२४॥ दृष्ट्वा यथा मृगपतिं गजयूथनाथः संशुष्कमानमदबिन्दुकपोल धारस्त्यक्त्वा वनं व्रजति चाकुलमानसेन दृष्ट्वा तथा गद्गजौ १ 'नद्याग्निः कुहना लोभान्मिथ्येर्यापथकल्पना' इत्यमरः । लोभात् परधनाद्यभिलाषात् या मिथ्येर्या- पथकल्पना दंभेन ध्यानमौनादिसंपादनं सा कुहनेत्यमरविवेके महेश्वरः ।
अ० १] भाषाटीकासमेता । (५) भिषजं प्रयाति ॥२५॥ यद्वत्तमोवृतमिदं भुवनं मयूखैः प्राका- श्यमाशु कुरुते सकलं रविस्तु ॥ तद्वत्सुवैद्य उपलभ्य रुजो- ऽतिनाशं शीघ्रं करोति गदिनं गदमुक्तभारम् ॥ २६ ॥ जैसे सिंहको देखके हस्तियोंके समूहके स्वामीकी मदबिंदुओंकी धारा गंडस्थलमें ही सूख जाती है और वह हाथी उस वनको त्याग व्याकुल मन करके भागता है तैसे वैद्यको देख कर रोगरूपी गजराज गमन करता है ॥ २५॥ जैसे अन्धकारसे आच्छादित इस समस्त संसार- को सूर्य अपनी किरणोंसे प्रकाशित कर देता है तैसे ही सुवैद्य रोगको नाशकर रोगीको रोगके भारसे छुड़ा देता है ॥ २६ ॥ लुब्धः क्रूरः१ शठजठरको मद्यपश्चालसश्चाधीरो भीरुर्विकलहृदयो हीनकर्मार्थमन्दः॥ शास्त्रज्ञाताऽप्यविदितगदज्ञानपाखण्डखण्डो वर्ज्यो वैद्यः प्रबलमतिभिर्भूमिपैर्वा सुदूरात् ॥ २७ ॥ लोभी, हिंसक, शठ, कठोर, मदिरा पीनेवाला, आलसी, अधीर, डरनेवाला, विकल हृदय, हीनकर्मवाला, कंगाल, वैद्यक न जाननेवाला, पाखंडी ऐसा वैद्य यदि अन्यशास्त्रोंके जाननेवाला भी हो तो भी उसको अच्छी बुद्धिवाले राजाओंको दूर रखना चाहिये ॥ २७ ॥ वैद्यशास्त्रपठनविधि । अद्रुतं चाप्यशङ्कञ्च नात्युच्चं नीचमेव च ॥ यः पठेच्छास्त्रमि- त्यञ्च शास्त्राप्तिस्तस्य दृश्यते ॥ २८ ॥ चर्वणं गिलनं चापि कम्पितं श्वसितं तथा॥नीचोच्चं चैव गम्भीरं वर्जयेत्पाठकेनतु२९ जो विचार विचार कर बे खौफ न अति उच्चस्वरमें न अति नीचस्वरमें पढ़ता है, उसे शास्त्रकी प्राप्ति होती है ॥ २८ ॥ चाबना, निगलना, काँपना, अतिश्वास लेना, नीचापना, ऊँचापना और गंभीरपना विद्यार्थीको छोड़ देना चाहिये ॥ २९ ॥ अनध्याये न शास्त्रस्य नोत्सवे यज्ञकर्मसु ॥ जातके सूतके चाथ पठनं न विधीयते ॥३०॥चतुर्दश्यष्टमीदर्शप्रतिपत्पूर्णिमास्तथा॥ वर्ज्याः पञ्च इमाः पाठे मुनिभिः परिकीर्तिताः ॥ ३१ ॥ अकाले दुर्दिने गर्जे दिग्दाहे भूमिकम्पने ॥ शास्त्रपाठस्तथा वर्ज्यो ग्रहणे १ 'नृशंसो धातुकः क्रूरः' इत्यमरः ।
( ६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने० चन्द्रसूर्य्ययोः॥३२॥अनध्याया द्वादशैते प्रोक्ताः शृणु तु पुत्रक॥ गुरुपीडासमुत्पन्ने नृपे संपीडितेऽथवा ॥ ३३ ॥ आहवे जीवस- म्पाते प्रदोषे वाऽथवा पुनः ॥ राष्ट्रपीडासमुत्पन्ने न कुर्य्याच्छा- स्त्रपाठनम् ॥३४॥ एतैस्तु पठितं शास्त्रं न स्वार्थे सिद्धिसाध- कम् ॥ न श्रेयसे न माङ्गल्ये नोपकारे सुखावहम् ॥ ३५ ॥ अनध्याय, उत्सव, यज्ञकर्म, जन्मका सूतक और मृतसूतकमें शास्त्रको नहीं पढ़ना चाहिये ॥ ३० ॥ चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, प्रतिपदा, पूर्णिमा ये पाचों तिथियां मुनिजनोंने पढ़नेमें वर्जी हैं ॥३१॥ अकाल, दुर्दिन, गङ्गर्जना, दिग्दाह, भूमिकंप अर्थात् भूचाल, चंद्रमाका ग्रहण और सूर्यके ग्रहणमें शास्त्रका पढ़ना वर्जित है ॥ ३२ ॥ हे पुत्र ! बारह अनध्याय कहे हैं, तुम सुनो । गुरुके पीडा उत्पन्न होनेपर, राजाके पीडित होनेपर ॥३३॥ युद्ध, जीवोंके मरनेपर, प्रदोष, देशके दुःखित होनेपर ॥ ३४ ॥ इन अनध्यायोंमें पठित किया शास्त्र अपने प्रयोजनमें सिद्धिको नहीं देता और कल्याणको नहीं करता और मंगलको नहीं देता और उपका- रमें सुखको नहीं देता ॥ ३५ ॥ एवं ज्ञात्वा पठति निपुणो वैद्यविद्यानिधानं श्रेयस्तस्य प्रतिदिन मसौ वाञ्छितार्थं प्रपद्येत् ॥ कीर्त्तिः सौख्यं भवति नितरां तस्य लोकप्रशंसा पूज्यो राज्ञां सततमपि वै जायते स्वार्थसिद्धिः॥३६॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे वैद्यगुणदोषशास्त्रपठनवि- धिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ ऐसे जानके जो कुशल वैद्य शास्त्रका पठन करता है उसको कल्याण मिलता है और नित्यप्रति मनोवांछित प्रयोजन प्राप्त होता है और उस वैद्यको नित्यप्रति सुख होता है, संसारमें कीर्ति और प्रशंसा प्राप्त होती है और अपने प्रयोजनकी सिद्धि होती है और ऐसे पठन करने- वाला पंडित राजा लोगों करके निरंतर पूजनेके योग्य है ॥ ३६ ॥ इति बेरीनिवासि-बुध- शिवसहायतनयवैद्यरविदत्तशास्त्रि-अनुवादित-हारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने वैद्यगुणदोष- शास्त्रपठनविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (७) द्वितीयोऽध्यायः २. चिकित्सासंग्रह । आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि शास्त्रस्यास्य समुच्चयम् ॥ आयुर्वेदसमुत्पत्तिं सर्वशास्त्रार्थसंग्रहम् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-इस पहिले अध्यायको कहकर अब दूसरे अध्यायमें इस शास्त्रके समुच्चय आयुर्वेदकी समुत्पत्ति और सब शास्त्रोंके अर्थके संग्रहको कहूंगा ॥ १ ॥ अष्टौ चात्र चिकित्साश्च तिष्ठन्ति भिषजां वर ॥ ता वक्ष्यामि समासेन चिकित्साश्च पृथक्पृथक् ॥ २ ॥ हे वैद्योंमें श्रेष्ठ ! इस ग्रन्थमें आठ प्रकारकी चिकित्सायें स्थित हैं, सम्पूर्णतासे उन्हें और भांति भांतिकी चिकित्सायें कहूँगा ॥ २ ॥ संग्रहस्य प्रवक्ष्यामि प्रथमं चान्नपानकम् ॥ अरिष्टं च द्वितीयं स्यात्तृतीय च चिकित्सितम् ॥३॥ कल्पं चतुर्थकं प्रोक्तं सूत्र- स्थानन्तु पञ्चमम् ॥ षष्ठं चात्र शरीरं स्यादित्यायुर्वेदकारकाः ॥४॥ शल्यशालाक्यकायाश्च तथा बालचिकित्सितम् ॥ अगदं विषतन्त्रञ्च भूतविद्या रसायनम् ॥ वाजीकरणमेवेति चिकित्सा चाष्टधा स्मृता ॥५॥ वैद्यागमेषु सर्वेषु प्रोक्तं श्रेष्ठमिदं महत् ॥ तथा चाष्टौ चिकित्सायां वदन्ति वेदविज्जनाः ॥ ६ ॥ संग्रहके अन्नपानामक प्रथमस्थान, अरिष्ट नामवाले दूसरे स्थान और चिकित्सित नामवाले तीसरे स्थानको कहूंगा ॥ ३॥ कल्प नामवाला चौथा स्थान है, सूत्रस्थान पाँचवाँ है, शारीर- स्थान छठा है ऐसा आयुर्वेदको करनेवाले कहते हैं ॥ ४ ॥ शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, बालचिकित्सित, अगद, विषतंत्र, भूतविद्या, रसायन, वाजीकरण इसतरह चिकित्सा आठ प्रकारसे कही है॥५॥ वैद्योंके सब ग्रन्थोंमें यह उत्तम और बड़ा ग्रन्थ माना है तथा आयुर्वेदज्ञोंने चिकित्सा में यह आठ प्रकारकी चिकित्सा श्रेष्ठ कही है ॥ ६ ॥ यन्त्रशस्त्राग्निक्षाराणामौषधं पथ्यमेव च ॥ स्वेदनं मर्दनं चैव कथितान्युपकारिणाम् ॥ ७ ॥ यंत्रकर्म, शस्त्रकर्म, अग्निकर्म, क्षारकर्म, औषध, पथ्य, स्वेदन और मर्दन यह आठ श्रेष्ठ चिकित्सायें उपकार करनेवाली चिकित्साओंमें श्रेष्ठ कही गयी है ॥ ७ ॥
एतैर्वैद्यकशास्त्रस्य सारो भवति सर्वतः ॥ ८ ॥ इन्हीं आठोंसे वैद्यक शास्त्रका सब ओरसे काम निकल आता है ॥ ८ ॥ अथ शल्यतन्त्र । यन्त्रशास्त्रार्थबन्धैस्तु येन चोद्ध्रियते भिषक् ॥ तच्च शल्योद्धरणकं प्रोच्यते वैद्यकागमे ॥ नाराचवालवल्लीभिर्भल्लैः कुन्तैश्च तोमरैः ॥ ९ ॥ शिलाग्निभिन्नगात्रस्य तत्र सार्यादिशल्यकम् ॥ १० ॥ तत्प्रतीकारकरणं तच्च शल्यचिकित्सितम् ॥ तथा बाणसमु- द्दिष्टतृणपांशुकृमीकचम् ॥ रक्तवस्तु तथा पेशी पूयं शेषान्तरेऽपि यत् ॥ ११॥ तच्छल्यमिति जानीयाल्लोष्ठकाष्ठविभिन्नकम्॥ १२॥ वैद्य यंत्र, शस्त्रार्थबन्धनोंसे तथा जिस शल्यसे रोगको दूर करता है, वैद्यक शास्त्रमें उसे शल्यो- द्धरण कहा जाता है । बाण, केश, वल्ली, भल्ली, कुन्त और तोमरोंसे शिला और अग्निसे भिन्न गात्रवाले पुरुषके शरीरमें प्राप्त शल्यके निकालनेका उपाय करना शल्यचिकित्सा कहलाता है॥९॥१०॥ और बाण अर्थात् तीरका उद्देश लेके कहा हुआ तृण, फांस, कीड़ा, बाल, आदि लाल चीज, मांसकी पेशी, राद और शेष अन्तरमें जो कुछ हो और लोहा, लकड़ी आदि जो है इन सबोंको शल्य जानना वह शल्यतंत्र है॥ ११॥ १२॥ अथ शालाक्य । शिरोरोंगा नेत्ररोगा कर्णरोगा विशेषतः ॥ भ्रूकण्ठशंखमन्यासु ये रोगाः सम्भवन्ति हि ॥ १३ ॥ तेषां प्रतीकारकमे नासावर्त्य- ञ्जनानि च ॥ अभ्यङ्गं मुखगण्डूषक्रियाशालाक्यनामिका॥ १४॥ इति शालाक्यं नाम ॥ अथ शालाक्य तंत्रका लक्षण-शिरके रोग, नेत्रोंके रोग, कानके रोग और विशेष करके भ्रुकुटी, कनपटी और कंधामें उत्पन्न जो रोग ॥ १३ ॥ उनके दूर करनेके लिये जो नस्यकर्म, अंजन, अभ्यंग अर्थात् मालिस, गंडूष अर्थात् कुल्ले करना आदि क्रिया ये सब शालाक्य कहलाते हैं ॥ १४ ॥ अथ कायचिकित्सा । कषायचूर्णगुटिकाः पञ्चानां शोधनानि च ॥ कोष्ठामयानां शमनी क्रिया कायचिकित्सितम् ॥ १५ ॥ १-( श्लो० १३ ) मन्याग्रीवायाः पश्चाद्देशस्थाशिरा ( मु०घ० )