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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

५३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

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५३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) शपथातिक्रमे महतां तपस्विनां मुख्यानां वा प्रातिभाव्यबन्धः प्रतिभूः । तस्मिन् यः परावग्रहसमर्थान् प्रतिभुवो गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते । विपरीतोऽतिसन्धीयते ।

(२) बन्धुमुख्यप्रग्रहः प्रतिग्रहः । तस्मिन् यो दूष्यामात्यं दूष्यापत्यं वा ददाति सोऽतिसन्धत्ते । विपरीतोऽतिसन्धीयते । प्रतिग्रहग्रहणविश्वस्तस्य हि परश्छिद्रेषु निरपेक्षः प्रहरति ।

(३) अपत्यसमाधौ तु । कन्यापुत्रदाने ददत्तु कन्यामतिसन्धत्ते । कन्या ह्यदायादा परेषामेवार्थाय क्लेशाय च । विपरीतः पुत्रः ।

(४) पुत्रयोरपि जात्यं प्राज्ञं शूरं कृतास्त्रमेकपुत्रं वा ददाति, सोऽतिसन्धीयते । विपरीतोऽतिसन्धत्ते । जात्यादजात्यो हि लुप्तदायादसन्तानत्वा-


बीज, चन्दन, घी, सुवर्ण और हिरण्य आदि वस्तुओं को स्पर्श करते हुए 'ये चीजें उस व्यक्ति को नष्ट कर दें, जो इस प्रतिज्ञा का अतिक्रमण करेगा' इस प्रकार शपथ लेकर सन्धि कर लेते थे ।

(१) शपथ का अतिक्रमण कर देने पर बड़े-बड़े तपस्वियों या ग्राममुख्यों को प्रतिभू बनाकर सन्धि करनी चाहिये, क्योंकि किसी भी सन्धि को बनाए रखने का दायित्व इन्हीं लोगों पर निर्भर होता है । प्रतिभू बना कर सन्धि करने वाले राजाओं में वही राजा विशेष लाभ में रहता है, जो प्रतिज्ञा या सन्धि तोड़ने वाले शत्रुओं को दमन करने में समर्थ व्यक्तियों को अपना प्रतिभू बनाता है । और दूसरा राजा अपने शत्रु से निश्चित ही धोखा खाता है ।

(२) किसी दूसरे से, मौखिक प्रतिज्ञा को बनाये रखने के लिए, उस व्यक्ति के भाई, बन्धु या मुख्य पुरुष को लेना प्रतिग्रह कहलाता है । इस प्रकार प्रतिग्रह के द्वारा सन्धि करने वाले राजाओं में वही राजा विशेष लाभ में रहता है, जो अपने राजद्रोही अमात्य या राजद्रोही पुत्र को सन्धि में देता है और दूसरा राजा ऐसी दशा में निश्चित ही धोखा खाता है । क्योंकि लेने वाला तो यह समझता है कि मेरे पास इसके अमात्य आदि हैं । वह मेरे विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता । किन्तु देने वाला, लेने वाले की दुर्बलताओं को पकड़ते ही अपने प्रतिग्रहों की अपेक्षा न करता हुआ तत्काल हमला बोल देता है ।

(३) पुत्र आदि को देकर सन्धि करने वाले राजाओं में वही राजा लाभ में रहता है, जो कि पुत्र और कन्या को दिये जाने के विकल्प में कन्या को भेज देता है, क्योंकि कन्या दाय की अधिकारिणी नहीं होती तथा दूसरों के उपभोग्य होती है, पिता के लिए क्लेश का ही कारण होती है, किन्तु पुत्र दायभागी होता है और पिता के क्लेशों को दूर करने वाला भी ।

(४) पुत्रों को देकर संधि करने वाले राजाओं में वह राजा अवश्य ही धोखा खाता है, जो कि अपने कुलीन, बुद्धिमान्, शूर, अस्त्र-शस्त्रज्ञ अथवा इकलौते पुत्र को

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प्र० १२२-१२३ : अ० १७ ] सन्धिकर्म और सन्धिमोक्ष ५३९

दाधातुं श्रेयान् । प्राज्ञादप्राज्ञो मन्त्रशक्तिलोपात् । शूरादशूर उत्साहशक्ति-
लोपात् । कृतास्त्रदकृतास्त्रः प्रहर्त्तव्यसम्पल्लोपात् । एकपुत्रादनेकपुत्रो
निरपेक्षत्वात् ।
(१) जात्यप्राज्ञयोर्जात्यमप्राज्ञमैश्वर्यप्रकृतिरनुवर्तते । प्राज्ञमजात्यं
मन्त्राधिकारः । मन्त्राधिकारेऽपि वृद्धसंयोगाज्जात्यकः प्राज्ञमतिसन्धत्ते ।
(२) प्राज्ञशूरयोः प्राज्ञमशूरं मतिकर्मणां योगोऽनुवर्तते । शूरमप्राज्ञं
विक्रमाधिकारः । विक्रमाधिकारेऽपि हस्तिनमिव लुब्धकः प्राज्ञः शूरमति-
सन्धत्ते ।
(३) शूरकृतास्त्रयोः शूरमकृतास्त्रं विक्रमव्यवसायोऽनुवर्तते । कृतास्त्र-
मशूरं लक्षलम्भाधिकारः । लक्षलम्भाधिकारेऽपि स्थैर्यप्रतिपत्त्यसम्मोषैः
शूरः कृतास्त्रमतिसन्धत्ते ।


देता है। इसके विपरीत गुण वाले पुत्र को देने वाला राजा लाभ में रहता है। इसलिए समान जातीय पुत्र की अपेक्षा असमानजातीय पुत्र को देना ही अच्छा है, क्योंकि उसकी संतति दायभाग की अधिकारिणी होती है। बुद्धिमान् पुत्र की अपेक्षा बुद्धिहीन पुत्र देना इसलिए अच्छा होता है कि उसमें विवेक-विचार का महत्त्व नहीं होता है। इसलिए शत्रु को वह कोई उपयोगी सुझाव नहीं दे पाता है। शूर पुत्र की अपेक्षा भीरु पुत्र को देना इसलिए श्रेयस्कर है कि उसमें उत्साह नहीं होता है। वह न तो अपना लाभ कर सकता है और न शत्रु की हानि ही। शस्त्रज्ञ चतुर पुत्र की अपेक्षा इससे विपरीत पुत्र को देना इसलिए उचित है कि वह आक्रमण नहीं कर पाता है। इकलौते पुत्र की जगह अनेक पुत्रों में से एक को दे देना इसलिए ठीक है कि उसके बिना भी कार्य चल जाता है।

(१) कुलीन (जात्य) और बुद्धिमान् पुत्रों में से जो पुत्र जात्य, किन्तु बुद्धिहीन होता है, राजसंपति स्वभावतः उसका अनुगमन करती है। और जो पुत्र असमानजातीय किन्तु, बुद्धिमान् होता है, मंत्रशक्ति स्वभावतः उसका अनुगमन करती है। इन दोनों पुत्रों में से मंत्रशक्ति संपन्न होने पर भी अकुलीन प्राज्ञ की अपेक्षा कुलीन अप्राज्ञ ही श्रेष्ठ है; क्योंकि राज्याधिकारी होने पर वह अपने वृद्ध, अनुभवी, एवं बुद्धिमान् पुरुषों की नियुक्ति कर अपनी कमी को पूरी कर लेता है।

(२) इसी प्रकार बुद्धिमान् और शूर पुत्रों में से बुद्धिमान्, किन्तु शूरतारहित पुत्र का, बुद्धिमत्तापूर्वक किये गये कार्य अनुगमन करते हैं। बुद्धिहीन, किन्तु शूर पुत्र पराक्रम के कार्यों को कर सकता है। इन दोनों पुत्रों में से शूर; किन्तु बुद्धिहीन पुत्र के पराक्रमी होने पर भी, उसकी अपेक्षा, पराक्रमहीन बुद्धिमान् पुत्र ही श्रेष्ठ है। जैसे एक बुद्धिमान् शिकारी शक्तिशाली हाथी को अपने वश में कर लेता है वैसे ही बुद्धिमान् पुत्र अपने बुद्धिबल से शूर को भी अपने वश में कर सकता है।

(३) शूर और कृतास्त्र (शस्त्रास्त्रनिपुण) पुत्रों में शस्त्रास्त्र शून्य, किन्तु

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५४०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवां अधिकरण

(१) बह्वेकपुत्रयोर्बहुपुत्र एकं दत्त्वा शेषवृत्तितस्तब्धः सन्धिमतिक्रामति नेतरः। (२) पुत्रसर्वस्वदाने सन्धिश्चेत्पुत्रफलतो विशेषः। समफलयोः शक्तप्रजननतो विशेषः। शक्तप्रजननयोरप्युपस्थितप्रजननतो विशेषः। (३) शक्तिमत्येकपुत्रे तु लुप्तपुत्रोत्पत्तिरात्मानमादध्यात्, न चैकपुत्रमिति। (४) अभ्युच्चीयमानः समाधिमोक्षं कारयेत्। (५) कुमारासन्नाः सत्रिणः कारुशिल्पिव्यञ्जनाः कर्माणि कुर्वाणाः सुरुङ्गया रात्रावुपखानयित्वा कुमारमपहरेयुः। नटनर्तकगायनवादकवाग्जीवनकुशीलवप्लवकसौभिका वा पूर्वप्रणिहिताः परमुपतिष्ठेरन्। ते कुमारं


शूरपुत्र केवल पराक्रम के कार्यों को ही कर सकता है। शूरतारहित, किन्तु शस्त्रास्त्र-निपुण पुत्र अपने लक्ष्य को अच्छी तरह भेदन करने की क्षमता रखता है। इन दोनों में से लक्ष्य को ठीक भेदन करने वाले पराक्रमहीन पुत्र की अपेक्षा पराक्रमी पुत्र ही श्रेष्ठ है, क्योंकि अपनी सतर्कबुद्धि से वह कृतास्त्र को भी अपने वश में कर लेता है।

( १ ) एक पुत्र और अनेक पुत्रों में से अनेक पुत्रों का होना अच्छा है, क्योंकि एक पुत्र को संधि में दिये जाने पर भी बाकी पुत्रों के द्वारा राजा यथावसर संधि को भी तोड़ सकता है; किन्तु जिसका एक ही पुत्र है वह ऐसा नहीं कर सकता है।

( २ ) यदि संधि करने वाले दोनों राजाओं का एक-एक ही पुत्र हो और उनके देने पर ही संधि दृढ़ होती हो तो; उन दोनों में से वही अधिक लाभ में रहता है, जिसके पुत्र का भी पुत्र हो गया हो; क्योंकि पुत्र के अभाव में पौत्र भी सिंहासन पर बैठ सकता है। यदि संधि करने वाले दोनों राजाओं के पुत्र-पौत्र हों तो उनमें से वही अधिक लाभ में है, जिसका पुत्र अभी युवा है। यदि दोनों के पुत्र युवा हों, तो उनमें से उसी को ही अधिक लाभ है, जिसका पुत्र निकट भविष्य में बच्चा पैदा करने की स्थिति में है। निष्कर्ष यह है यथाशक्ति पुत्र न देने का यत्न करना चाहिए।

( ३ ) पुत्र पैदा करने की अथवा राज्यभार को सँभालने की शक्ति रखने वाले यदि एक ही पुत्र का पुत्र हो और उसकी पुत्रोत्पादन की शक्ति जाती रही हो तो अपने ही आप को राजा, संधि पर चढ़ा दे; किन्तु इकलौते पुत्र को कदापि न दे। यहाँ तक संधि को दृढ़ करने के उपायों का निरूपण किया गया।

( ४ ) संधि हो जाने के बाद यदि अपनी शक्ति बढ़ जाय तो दूसरे राजा के यहाँ बंधक में रखे हुए पुत्र को मुक्त करा देना चाहिए।

( ५ ) बन्धक में रखे गए राजपुत्र को छुड़ाने के लिए इन उपायों को काम में लाया जाय : राजपुत्र के निकट गुप्त वेश में रहने वाले बढ़ई, लुहार, सुनार या मिस्त्री तथा अन्य लोग, अपने जिम्मे के कार्यों को करते हुए राजपुत्र के निवास के पास ही एक सुरंग खोदकर रात्रि में वहाँ से उसको लेकर वे भाग जायें। अथवा

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प्र० १२२-१२३ : अ० १७ ] सन्धिकर्म और सन्धिमोक्ष ५४१

परम्परयोपतिष्ठेरन् । तेषामनियतकालप्रवेशस्थाननिर्गमनानि स्थापयेत् । ततस्तद्व्यञ्जनो वा रात्रौ प्रतिष्ठेत । (१) तेन रूपाजीवा भार्याव्यञ्जनाश्च व्याख्याताः । (२) तेषां वा तूर्यभाण्डपेलां गृहीत्वा निर्गच्छेत् । (३) सूदारालिकस्नापकसंवाहकास्तरककल्पकप्रसाधकोदकपरिचारकैर्वा द्रव्यवस्त्रभाण्डपेलाशयनासनसम्भोगैर्निह्रियेत । (४) परिचारकच्छद्मना वा किञ्चिद्रूपवेलायामादाय निर्गच्छेत् । सुरङ्गामुखेन वा निशोपहारेण । तोयाशये वा वारुणं योगमातिष्ठेत् । (५) वैदेहकव्यञ्जना वा पक्वान्नफलव्यवहारेणारक्षिषु रसमवचारयेयुः ।

नट, नर्तक, गायक, वादक, वाग्जीवक ( कथावाचक ) ; कुशीलव, प्लवक ( तलवार आदि का खेल दिखाने वाला ), सौत्रिक ( आकाश में उड़ने वाला ), विजिगीषु के ये आठ प्रकार के गुप्तचर पहिले शत्रु राजा के पास आवें और फिर धीरे-धीरे उसी के यहाँ रहते हुए गिरफ्तार राजकुमार तक पहुँचे । राजकुमार, राजा की अनुमति प्राप्त कर, स्वेच्छया उक्त गुप्तचरों को अपने यहाँ टिकाने तथा आने-जाने की पूरी व्यवस्था करा ले । फिर उन्हीं में से किसी का वेष बनाकर रात्रि के समय बाहर निकल आवे और उन्हीं के साथ अपने देश को पलायन कर दे ।

( १ ) इसी प्रकार वेश्या या पत्नी के रूप में गई गुप्तचर स्त्रियाँ राजकुमार को वहाँ से छुड़ा ले आवें ।

( २ ) अथवा नट, नर्तक आदि के साज-बाजों या आभूषणों की पेटी को उठा कर बाहर निकल आये ।

( ३ ) अथवा सूद ( रसोइया ), आरालिक ( हलवाई ), स्नापक ( स्नान कराने वाला ), संवाहक ( मालिश करने वाला ), आस्तरक ( विस्तार बिछाने वाला ), कल्पक ( नाई ), प्रसाधक ( वस्त्र पहनाने वाला ) और उदक-परिचारक ( जल देनेवाला ); इन लोगों के द्वारा जब कोई भोज्यपदार्थ, पेटी या विस्तर आदि उपयोगी वस्तुयें बाहर ले जाई जाँय तो अवसर पाकर उनके साथ राजकुमार भी बाहर निकल जाय ।

( ४ ) अथवा राजकुमार ही नौकर के बहाने से अन्धकार के समय किसी चीज को लेकर बाहर निकल जाय । अथवा भूतवलि आदि का बहाना कर सुरंग द्वारा बाहर निकल जाय । अथवा नदी, तालाब आदि किसी बड़े जलाशय में वारुणयोग के प्रयोग द्वारा बाहर निकल जाय ।

( ५ ) अथवा व्यापारी के वेष में रहने वाले गुप्तचर किसी पके अन्न में विष मिला कर पहरेदारों को दे दें और जब वे बेहोश हो जाँय तो राजकुमार को लेकर लेकर वे बाहर निकल जाँय ।

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५४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) दैवतोपहारश्राद्धप्रहवणनिमित्तमारक्षिषु मदनयोग्ययुक्तमन्नपानरसं वा प्रयुज्यापगच्छेत् । आरक्षकप्रोत्साहनेन वा । (२) नागरककुशीलवचिकित्सकापूपिकव्यञ्जना वा रात्रौ समृद्धगृहा-ण्यादीपयेयुः । (आरक्षिणां ?) वैदेहकव्यञ्जना वा पण्यसंस्थामादीपयेयुः । (३) अन्यद्वा शरीरं निक्षिप्य स्वगृहमादीपयेदनुपातभयात् । ततः सन्धिच्छेदखातसुरङ्गाभिरपगच्छेत् । (४) काचकुम्भभाण्डभारव्यञ्जनो वा रात्रौ प्रतिष्ठेत । मुण्डजटिलानां प्रवासनान्यनुप्रविष्टो वा रात्रौ तद्व्यञ्जनः प्रतिष्ठेत । विरूपव्याधिकरणारण्यचरच्छद्मनामन्यतमेन वा । प्रेतव्यञ्जनो वा गूढैर्निह्रियेत । प्रेतं वा स्त्रीवेषेणानुगच्छेत् । (५) वनचरव्यञ्जनाश्चैनमन्यतो यान्तमन्यतोऽपदिशेयुः । ततोऽन्यतो गच्छेत् । चक्रचराणां वा शकटवाटैरपगच्छेत् ।

(१) अथवा देवकार्य, पितृकार्य या सहभोज के निमित्त से अन्न या पेय पदार्थों में विष मिला कर पहरेदारों पर प्रयोग कर उन्हें वेहोश बना देने के बाद राजकुमार रात के समय बाहर निकल आवे । अथवा गुप्तचर, राजकुमार को शव के रूप में अर्थी में रख कर बाहर निकल आवे । अथवा किसी मुर्दे के पीछे स्त्री का वेष बनाकर राजकुमार बाहर निकल जाय । अथवा अपनी देख-रेख में पहरेदारों को बहुत-सा धन देने की प्रतिज्ञा से उन्हें सन्तुष्ट कर राजकुमार बाहर निकल आवे ।

(२) अथवा नगर-रक्षक, नट, चिकित्सक और आपूपिक (खोमचा लगाने वाला) के वेष में रात्रि के समय इधर-उधर घूमने वाले गुप्तचर लोग रात में धनी लोगों के घर में आग लगा दें । पहरेदारों तथा व्यापारियों के वेष में दूसरे गुप्तचर भी बाजार तथा दूकानों में आग लगा दें । आग लगने के कारण जब कोलाहल या गड़बड़ हो जाय तो अवसर पाकर राजकुमार बाहर निकल जाय ।

(३) अथवा राजकुमार अपने निवास में आग लगा दे, और वहाँ किसी दूसरे की लाश डलवा दे, जिससे कि शत्रु लोग उस शव को देख कर यह समझ लें कि राजकुमार जल कर मर गया है; अथवा राजकुमार स्वयं ही किसी संधिच्छेद या सुरंग के द्वारा बाहर निकल जाय ।

(४) अथवा लकड़हारों (काचभार), कहारों (कुम्भभार) या साईसों (भाण्डभार) के वेश में राजकुमार रात को बाहर हो जाय । अथवा विजिगीषु राजा अपने मुण्ड तथा जटिलों को जब बाहर भेजे तो राजकुमार भी छिप कर उनमें जा मिले और रात में उन्हीं जैसा वेष बनाकर उनके साथ ही बाहर निकल आये । या औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा अपनी शक्लसूरत को बदल कर या रोगी का वेष बना कर या जंगली भील-कोलों का वेष बनाकर तब निश्चिन्त होकर राजकुमार अपने देश को जा सकेगा ।

(५) राजकुमार के बाहर निकल जाने पर जब विजिगीषु राजा के कर्मचारी

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प्र० १२२-१२३ : अ० १७ ] सन्धिकर्म और सन्धिमोक्ष ५४३

(१) आसन्ने चानुपाते सत्रं वा गृह्णीयात् । सत्राभावे हिरण्यं रसविद्धं वा भक्ष्यजातमुभयतः पन्थानमुत्सृजेत् । ततोऽन्यतोऽगच्छेत् । (२) गृहीतो वा सामादिभिरनुपातमतिसन्दध्यात् । रसविद्धेन वा पथ्यदानेन । (३) वारुणयोगाग्निदाहेषु वा शरीरमन्यदाधाय शत्रुमभियुञ्जीत—पुत्रो मे त्वया हत इति । (४) उपात्तच्छन्नशस्त्रो वा रात्रौ विक्रम्य रक्षिषु । शीघ्रपातैरपसरेद् गूढप्रणिहितैः सह ॥ इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे सन्धिकर्म-सन्धिमोक्षो नाम सप्तदशोऽध्यायः, आदितश्चतुर्दशोत्तरशततमः ।

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उसकी खोज में इधर-उधर दौड़ते फिरें तो जंगल में रहने वाले राजकुमार के पक्ष के लोग उन्हें दूसरा ही रास्ता बता दें । अथवा गाड़ीवानों या गाड़ियों के झुण्ड के साथ-साथ अपने देश की ओर चला जाय ।

( १ ) यदि खोजने वाले लोग बहुत ही नजदीक आ पहुँचें तो वह किसी घने जंगल में छिप जाय । यदि छिपने लायक घना जंगल पास न हो तो हिरण्य अथवा विषयुक्त खाद्य वस्तु रास्ते के दोनों ओर डाल दें; और उस रास्ते को छोड़ कर किसी रास्ते से निकल जाय ।

( २ ) अथवा यदि वह पकड़ ही लिया जाय तो साम, दाम आदि उपायों से धोखा देकर वह उनसे भाग निकले । अथवा उन्हें विषयुक्त खाना देकर मार दे, या मूर्च्छित कर दे और स्वयं भाग जाय ।

( ३ ) पकड़े जाने के डर से छिपे हुए राजकुमार को भगा ले जाने के लिए पूर्वोक्त वारुणयोग तथा अग्निदाहों के अवसरों पर किसी के शव को वहाँ डाल कर विजिगीषु राजा, शत्रु राजा के ऊपर यह अभियोग लगाये कि उसने मेरे पुत्र को मार डाला है । इससे शत्रु राजा भागे हुए राजकुमार को खोजना बन्द कर देगा और राजकुमार बाहर निकल आवे ।

( ४ ) यदि पूर्वोक्त कोई भी उपाय न किया जा सके तो राजकुमार को चाहिए कि वह रात में पहरेदारों पर सशस्त्र हमला कर दे और उन्हें घायल कर या मार कर द्रुतगामी घोड़ों पर सवार अपने गुप्तचरों के साथ वहाँ से निकल भागे ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में सन्धिकर्म-सन्धिमोक्ष नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १२४-१२६मध्यमचरितोदासीनचरित-मण्डलचरितानि
अध्याय १८

(१) मध्यमस्यात्मा तृतीया पञ्चमी च प्रकृती प्रकृतयः । द्वितीया च चतुर्थी षष्ठी च विकतयः । तच्चेदुभयं मध्यमोऽनुगृह्णीयात्, विजिगीषुर्मध्यमानुलोमः स्यात् । न चेदनुगृह्णीयात्प्रकृत्यनुलोमः स्यात् ।

(२) मध्यमश्चेद्विजिगीषोर्मित्रं मित्रभावि लिप्सेत, मित्रस्यात्मनश्च मित्राण्युत्थाप्य मध्यमाच्च मित्राणि भेदयित्वा मित्रं त्रायेत । मण्डलं वा प्रोत्साहयेत्—‘अतिप्रवृद्धोऽयं मध्यमः सर्वेषां नो विनाशाय अभ्युत्थितः सम्भूयास्य यात्रां विहनाम’ इति । तच्चेन्मण्डलमनुगृह्णीयात् मध्यमावग्रहेणात्मानमुपबृंहयेत् । न चेदनुगृह्णीयात्, कोशदण्डाभ्यां मित्रमनुगृह्य ये मध्यमद्वेषिणो राजानः परस्परानुगृहीता वा बहवस्तिष्ठेयुरेकसिद्धा वा

मध्यम चरित, उदासीन चरित और मण्डल चरित

( १ ) मध्यम, स्वयं और तीसरी तथा पाँचवीं प्रकृति ( अर्थात् स्वयं, मित्र और मित्र-मित्र ) ये तीनों मध्यम की प्रकृति कहलाती हैं। इसी प्रकार शत्रु, शत्रु का मित्र और शत्रु के मित्र का मित्र, ये तीनों मध्यम की विकृति कही जाती हैं। मध्यम को चाहिए कि वह इन दोनों प्रकार के राजाओं पर समान अनुग्रह बनाये रखे; और विजिगीषु को चाहिए कि वह सदा मध्यम राजा के अनुकूल बना रहे। यदि मध्यम राजा दोनों प्रकार की प्रकृतियों पर अनुग्रह न कर सके तो आत्मप्रकृति को वह अवश्य ही अपने अनुकूल बनाये रखे।

( २ ) यदि मध्यम राजा विजिगीषु राजा के मित्रभावी-मित्र को अपने अधीन करना चाहे तो उस समय विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने मित्र-राजाओं के मित्रों और अपने मित्र-राजाओं की सहायता करके तथा मध्यम के मित्रों को उनसे फोड़कर अपने मित्र की रक्षा करे। अथवा राजमण्डल को वह मध्यम के विरुद्ध यह कहकर उत्तेजित करे; ‘देखो, अति उन्नत हुआ यह मध्यम राजा हम सब को नष्ट करने पर तुला है। हमको चाहिए कि एक होकर हम इसके आक्रमण को रोकें!’ इस प्रकार उकसाया हुआ राजमण्डल यदि विजिगीषु की सहायता करने के लिए तैयार हो जाय तो उसके सहयोग से मध्यम का निग्रह करके स्वयं को उन्नत बनाये। यदि राजमण्डल विजिगीषु को सहायता देना स्वीकार न करे तो वह धन

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प्र० १२४-१२६ : अ० १८ ] मध्यमौदासीनमण्डल-चरित ५४५

बहवः सिद्धयेयुः परस्पराद्वा शङ्किता नोत्तिष्ठेरन्, तेषां प्रधानमेकमासन्नं वा सामदानाभ्यां लभेत । द्विगुणो द्वितीयं त्रिगुणस्तृतीयम् । एवमभ्युच्चितो मध्यममवगृह्णीयात् । देशकालातिपत्तौ वा सन्धाय मध्यमेन मित्रस्य साचिव्यं कुर्यात् । दूष्येषु वा कर्मसन्धिम् ।
(१) कर्शनीयं वाऽस्य मित्रं मध्यमो लिप्सत, प्रतिस्तम्भयेदेनम्—'अहं त्वा त्रायेय' इत्याकर्षणात् । कर्शितमेनं त्रायेत ।
(२) उच्छेदनीयं वाऽस्य मित्रं मध्यमो लिप्सते, कर्शितमेतं त्रायेत मध्यमवृद्धिभयात् ।
(३) उच्छिन्नं वा भूम्यनुग्रहेण हस्ते कुर्यादन्यत्रापसारभयात् ।


तथा सेना के द्वारा अपने मित्र की सहायता करे। जो बहुत से राजा मध्यम के साथ द्वेष रखते हों; अथवा जो आपस में एक-दूसरे की सहायता करके मध्यम का अनिष्ट करना चाहते हों; या मध्यम के शत्रु विजिगीषु के अनुकूल हो जाने पर सब अनुकूल हो जाँय; अथवा जो परस्पर सम्मिलित विजय-लाभ की इच्छा रखते हुए भी एक-दूसरे के भय से आक्रमण करने के लिए तैयार न हों; या मध्यम के शत्रु-राजाओं में से प्रमुख राजा, या अपने देश के सभी राजाओं को साम, दाम आदि के द्वारा अपने अनुकूल बनाये—इस प्रकार दूसरे राजा की सहायता मिलने से विजिगीषु का बल दुगुना, तीसरे राजा की सहायता मिलने पर तिगुना हो जाता है। इन तरीकों से अपनी शक्ति को बढ़ाकर विजिगीषु, मध्यम को वश में करे। अथवा देश तथा काल के अनुसार विजिगीषु सीधे मध्यम के साथ ही सन्धि कर ले और फिर अपने मित्र-भावी मित्र के साथ उसकी सन्धि करा दे। यदि ऐसा सम्भव न हो तो मध्यम के दूष्य पुरुषों के साथ मिलकर आग लगवा कर या कोई उपद्रव कराके कर्मसंधि करे।

(१) विजिगीषु को दुर्बल बनाने वाले (कर्शनीय) मित्र को यदि मध्यम अपने अधीन करना चाहे तो विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने उस मित्र को सुरक्षा का आश्वासन देकर मध्यम से अभय कर दे। परन्तु यह अभय वचन उसी समय तक रहे जब तक कि मध्यम के द्वारा उसे दुर्बल न बना दे। दुर्बल हो जाने पर विजिगीषु उसकी रक्षा करे।

(२) यदि विजिगीषु को नष्ट करने योग्य मित्र को मध्यम अपने अधीन करना चाहे, तो विजिगीषु अपने उस मित्र की तब रक्षा करे जब वह मध्यम द्वारा अच्छी तरह सता दिया गया हो। उसकी रक्षा इसलिए आवश्यक है कि मध्यम राजा शक्ति प्राप्त कर विजिगीषु को ही न सताने लगे।

(३) अथवा विनष्ट हुए अपने उस मित्र को भूमि देकर वह अपने वश में कर ले, अन्यथा यह सम्भव हो सकता है कि वह शत्रुपक्ष में जाकर मिल जाय।

३५ कौ०

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५४६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवां अधिकरण

( १ ) कर्शनीयोच्छेदनीययोश्चेन्मित्राणि मध्यमस्य साचिव्यकराणि स्युः, पुरुषान्तरेण सन्धियेत । विजिगीषोर्वा तयोर्मित्राण्यवग्रहसमर्थानि स्युः, सन्धिमुपेयात् ।

( २ ) अमित्रं वास्य मध्यमो लिप्सैत, सन्धिमुपेयात् । एवं स्वार्थश्च कृतो भवति, मध्यमस्य प्रियं च ।

( ३ ) मध्यमश्चेत्स्वमित्रं मित्रभावि लिप्सैत, पुरुषान्तरेण सन्दध्यात् । सापेक्षं वा 'नार्हसि मित्रमुच्छेत्तुम्' इति वारयेत् । उपेक्षेत वा—मण्डलमस्य कुप्यतु स्वपक्षवधादिति ।

( ४ ) अमित्रमात्मनो वा मध्यमो लिप्सैत, कोशदण्डाभ्यामेनमहश्यमानोऽनुगृह्णीयात् ।


( १ ) यदि कर्शनीय और उच्छेदनीय राजाओं के दूसरे मित्र भी मध्यम की ही सहायता करते हों तो विजिगीषु को चाहिए कि वह भी अपने अमात्य या राजकुमार को विश्वास के लिए बन्धक में रखकर मध्यम से सन्धि कर ले । यदि विजिगीषु, के कर्शनीय और उच्छेदनीय राजाओं के मित्र मध्यम का मुकाबला करने के लिए तैयार हों तो वह भी मध्यम के साथ सन्धि कर ले ।

( यहाँ तक अपने मित्रों पर अभियोग करने वाले मध्यम के साथ विजिगीषु का क्या व्यवहार होना चाहिए, इसका निरूपण किया गया । विजिगीषु के शत्रुओं पर अभियोग करने वाले मध्यम के साथ विजिगीषु का क्या व्यवहार होना चाहिए, अब इसका निरूपण किया जाता है । )

( २ ) यदि विजिगीषु के किसी शत्रु राजा को मध्यम अपने वश में करना चाहता है तो विजिगीषु को चाहिए कि वह मध्यम के साथ सन्धि कर ले; क्योंकि ऐसा करने से एक तो अपने शत्रु का नाश हो जाने से अपनी कार्यसिद्धि हो जाती है और दूसरे में वह मध्यम का भी प्रिय हो जाता है ।

( ३ ) यदि मध्यम अपने ही किसी मित्रभावी मित्र को वश में करना चाहे तो उस समय विजिगीषु अपने सेनापति आदि को भेज कर मध्यम की सहायता करे । यदि उससे अपनी कार्यसिद्धि होती देखे तो मध्यम को आक्रमण करने से रोके । ऐसा करने से विजिगीषु दूसरे राजाओं का भी विश्वासपात्र हो जाता है । अथवा यह सोच-कर उधर से आँखें फेर ले कि अपने मित्र पर आक्रमण करने वाले मध्यम से सारा राजमण्डल ही कुपित हो जायेगा ।

( ४ ) यदि मध्यम किसी शत्रुराजा को ही अपने अधीन करना चाहे तो विजिगीषु को चाहिये कि कोश तथा सेना द्वारा छिपे तौर पर ही शत्रु की सहायता करे ।

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प्र० १२४-१२६ : अ० १८ ] मध्यमोदासीनमण्डल-चरित ५४७

(१) उदासीनां वा मध्यमो लिप्सत—‘उदासीनाद्भिद्यताम्’ इति मध्यमोदासीनयोर्यो मण्डलस्याभिप्रेतस्तमाश्रयेत । (२) मध्यमचरितेनोदासीनचरितं व्याख्यातम् । उदासीनंश्चेन्मध्यमं लिप्सत, यतः शत्रुमभिसन्दध्यान्मित्रस्योपकारं कुर्यात्, मध्यममुदासीनं वा दण्डोपकारिणं लभेत, ततः परिणमेत । (३) एवमुपगृह्यात्मानमरिप्रकृतिं कर्शयेत् । मित्रप्रकृतिं चोपगृह्णीयात्। (४) सत्यप्यमित्रभावे तस्यानात्मवान् नित्यापकारी शत्रुः शत्रुसहितः पाष्णिग्राहो वा व्यसनी यातव्यो व्यसने वा नेतुर्भियोक्तेत्यरिभाविनः । (५) एकार्थाभिप्रयातः पृथगर्थाभिप्रयातः सम्भूययात्रिकः संहितप्रयाणिकः स्वार्थाभिप्रयातः सामुत्थायिकः कोशदण्डयोरन्यतरस्य क्रेता विक्रेता द्वैधीभाविक इति मित्रभाविनः ।


( १ ) यदि मध्यम किसी उदासीन राजा को वश में करना चाहे तो दोनों की फूट को उचित मानकर वह उन दोनों में जो राजमण्डल का अधिक प्रिय हो उसी से सन्धि करे और उसी की सहायता करे ।

( २ ) मध्यम के ही चरित के समान उदासीन का भी चरित समझ लेना चाहिए । यदि उदासीन राजा किसी मध्यम राजा को अपने अधीन करना चाहे तो विजिगीषु को चाहिए कि इन दोनों में से वह उसके साथ जा मिले, जिसकी सहायता से शत्रु का उच्छेद और मित्र का उपकार हो सके; या इन दोनों को अपनी सैनिक सहायता देकर अपने वश में कर ले ।

( ३ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा अपनी वृद्धि करके शत्रु-प्रकृति का नाश और मित्र-प्रकृति का उपकार करे ।

( ४ ) 'शत्रु' शब्द से कहे जाने वाले सामन्त तीन प्रकार के हैं : १. अमित्रभाव रखने वाला सामन्त शत्रुभावि, २. मित्रभाव रखने वाला सामन्त मित्रभावि और ३. भृत्यभाव रखने वाला सामन्त भृत्यभावि । अजितेन्द्रिय, सदा अपकार करने वाला, शत्रुभाव रखने वाला, विजिगीषु के शत्रु की सहायता करने वाला, पाष्णिग्राह, बन्धु आदि की मृत्यु से दुःखी, यातव्य और विजिगीषु को विपत्ति में फँसा हुआ जान कर उस पर आक्रमण करने वाला सामन्त 'शत्रुभावि' कहलाता है ।

( ५ ) एक ही अर्थसिद्धि के लिए विजिगीषु के साथ चढ़ाई करने वाला, अथवा एक ही भूमि पर दो प्रयोजनों के लिए दोनों का चढ़ाई करना; विजिगीषु की सहमति प्राप्त करके युद्ध करने वाला; विजिगीषु के निमित्त ही चढ़ाई करने वाला; शून्य स्थानों को बसाने के लिए धन और सेना, दोनों में से किसी एक को एक दूसरे के बदले में खरीदने या बेचने वाला सामन्त 'मित्रभावि' कहलाता है ।

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५४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) सामन्तो बलवतः प्रतिघातोऽन्तर्धिः प्रतिवेशो वा बलवतः पार्ष्णिग्राहो वा स्वयमुपनतः प्रतापोपनतो वा दण्डोपनत इति भृत्यभाविनः सामन्ताः । (२) तैर्भूम्येकान्तरा व्याख्याताः । (३) तेषां शत्रुविरोधे यन्मित्रमेकार्थतां व्रजेत् । शक्त्या तदनुगृह्णीयाद्द्विषहेत यया परम् ॥ (४) प्रसाध्य शत्रुं यन्मित्रं वृद्धं गच्छेदवश्यताम् । सामन्तैकान्तराभ्यां तत्प्रकृतिभ्यां विरोधयेत् ॥ (५) तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां भूमिं वा तस्य हारयेत् । यथा वानुग्रहापेक्षं वश्यं तिष्ठेत्तथाचरेत् ॥ (६) नोपकुर्यादमित्रं वा गच्छेद्वयतिकर्शितम् । तदहीनमवृद्धं च स्थापयेन्मित्रमर्थवित् ॥


(१) सामन्त, बलवान् राजा का मुकाबला करने वाला, अन्तर्धि, (मध्यम), प्रतिवेश (पड़ोस), बलवान् राजा पर पीछे से आक्रमण करने वाला (पार्ष्णिग्राह), स्वयं आश्रित (स्वयं उपनत), बल द्वारा आश्रित (प्रतापोपनत) और सेना द्वारा अधिकसामन्त 'भृत्यभावि' कहलाता है।

(२) उक्त तीन प्रकार के सामन्तों के समान ही भूम्येकान्तर (एक देश के व्यवधान से राज्य करने वाले) मित्रराजाओं के भी १. शत्रुभावि २. मित्रभावि और ३. भृत्यभावि, ये तीन भेद समझ लेने चाहिएँ ।

(३) उन भूम्येकांतर मित्रों में से किसी पर यदि शत्रु आक्रमण करे तो उस मित्र के साथ सन्धि करने वाले राजा को इतनी सेना और सहायता पहुँचानी चाहिए, जिससे वह आक्रमणकारी शत्रु का दमन कर सके ।

(४) अपने शत्रु को जीतकर उन्नत हुआ जो मित्र, विजिगीषु के वश में नहीं रहता, किसी भी तरह उसका विरोध, उसके सामन्त और भूम्येकांतर मित्रों एवं उनकी अमात्य-प्रकृति से करा देना चाहिए ।

(५) अथवा उसके बन्धु-बान्धवों द्वारा या नजरबन्द किये उसके पुत्र आदि के द्वारा उसकी भूमि का अपहरण करा देना चाहिए। अथवा अपनी सहायता चाहता हुआ वह जिस तरह भी वश में रह सके, उसी तरह उसके साथ व्यवहार किया जाय।

(६) क्षीण हुआ जो मित्र विजिगीषु की कोई सहायता न कर सके या शत्रु के साथ मिल जाय, तो विजिगीषु को चाहिए कि उसको ऐसी दशा में रखे, जिससे न तो वह उन्नत हो सके और न ही मिटने पावे ।

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प्र० १२४-१२६ : अ० १८] मध्यमोदासीनमण्डल-चरित ५४९

(१) अर्थयुक्त्या चलं मित्रं सन्धि यदुपगच्छति ।
तस्यापगमने हेतुं विहन्यान्न चलेद्यथा ॥

(२) अरिसाधारणं यद्वा तिष्ठेत्तदरितः शठम् ।
भेदयेद् भिन्नमुच्छिन्द्यात्ततः शत्रुमनन्तरम् ॥

(३) उदासीनं च यत्तिष्ठेत्सामन्तैस्तद्विरोधयेत् ।
ततो विग्रहसन्तप्तमुपकारे निवेशयेत् ॥

(४) अमित्रं विजिगीषुं च यत्सञ्चरति दुर्बलम् ।
तद्बलेनानुगृह्णीयाद्यथा स्यान्न पराङ्मुखम् ॥
अपनीय ततोऽन्यस्यां भूमौ वा सन्निवेशयेत् ।
निवेश्य पूर्वं तत्रान्यं दण्डानुग्रहहेतुना ॥

(५) अपकुर्यात्समर्थं वा नोपकुर्याच्चदापदि ।
उच्छिन्द्यादेव तन्मित्रं विश्वस्याङ्कमुपस्थितम् ॥


( १ ) जो चंचल प्रकृति का मित्र लोभवश सन्धि करे, उससे सन्धि बनाये रखने के लिए विजिगीषु को चाहिए कि, सन्धि नष्ट कर देने वाली उसकी अर्थलिप्सा को, स्वयं ही कुछ धन देकर पूरी कर दे, जिससे वह सन्धि न तोड़ सके ।

( २ ) जो धूर्त मित्र विजिगीषु के शत्रु के साथ मिलकर रहता हो, पहिले तो उसके और शत्रु के बीच फूट डालनी चाहिए और फिर उसका उन्मूलन करके शत्रु का भी उन्मूलन कर देना चाहिए ।

( ३ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह उदासीन मित्रों का विरोध सामन्त से करा दे । जब वह लड़ाई में फँस जाय और लड़ाई से बहुत तंग आ जाय तब उसका उपकार कर दे ।

( ४ ) जो दुर्बल मित्र अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए शत्रु और विजिगीषु, दोनों का आश्रय लेना चाहे, विजिगीषु को चाहिए कि ऐसे दुर्बल मित्र को वह सेना आदि की सहायता देकर उपकृत करता रहे, जिससे वह शत्रु पक्ष में न जा मिले । अथवा उसको उसकी भूमि से उठाकर दूसरी भूमि में बसा दे; अथवा जहाँ शत्रु की सहायता का कोई अंदेशा न हो ऐसी अपनी ही भूमि में बसा दे; और उसकी भूमि में, उसके जाने से पूर्व, सेना द्वारा सहायता पहुँचाने के लिए किसी समर्थ व्यक्ति को नियुक्त कर दे ।

( ५ ) जो मित्र विजिगीषु का अपकार करे, या विजिगीषु के ऊपर कोई विपत्ति आने पर समर्थ होकर भी सहायता न करे; विजिगीषु को चाहिए कि ऐसे मित्र को पहिले खूब विश्वास दिलाये और बाद में उसका उच्छेद कर दे ।

५५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

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५५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) मित्रव्यसनतो वाऽरिरुत्तिष्ठेद्योऽनवग्रहः ।
मित्रेणैव भवेत्साध्यश्छादितव्यसनेन सः ॥
(२) अमित्रव्यसनान्मित्रमुत्थितं यद्विरज्यति ।
अरिव्यसनसिद्ध्या तच्छत्रुणैव प्रसिद्ध्यति ॥
(३) वृद्धिं क्षयं च स्थानं च कर्शनोच्छेदनं तथा ।
सर्वोपायान्समादध्यादेतान् यश्चार्थशास्त्रवित् ॥
(४) एवमन्योन्यसंचारं षाड्गुण्यं योऽनुपश्यति ।
स बुद्धिनिगलैर्बद्धैरिष्टं क्रीडति पार्थिवैः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे मध्यमचरितोदासीनचरितमण्डलचरितानि नाम अष्टादशोऽध्यायः, आदितः पञ्चदशोत्तरशततमः ॥
समाप्तमिदं षाड्गुण्यं नाम सप्तममधिकरणम् ।

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(१) यदि विजिगीषु का शत्रु विजिगीषु के मित्र को आपद्ग्रस्त जानकर बिना किसी अवरोध-आक्रमण के उन्नति कर जाय तो अपने मित्र की आपत्ति दूर हो जाने पर उस मित्र के द्वारा ही विजिगीषु शत्रु को वश में करने का यत्न करे ।

(२) जो मित्र अपने शत्रु पर आपत्ति आ जाने से उन्नत होकर विजिगीषु के अनुकूल नहीं रहता, उसे उसके शत्रु की आपत्ति दूर हो जाने पर, उसी के द्वारा वश में किया जाय ।

(३) अर्थशास्त्रज्ञ राजा को उचित है कि वह वृद्धि, क्षय, स्थान, कर्शन, और उच्छेदन तथा साम, दाम आदि सभी उपायों का प्रयोग खूब सोच-विचार कर करे ।

(४) जो राजा इन छह गुणों का विचारपूर्वक प्रयोग करता है, वह निश्चित ही अपनी बुद्धिरूपी श्रृंखला से बाँधे हुए अन्य राजाओं के साथ इच्छानुसार क्रीड़ा कर सकता है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में मध्यमोदासीनमण्डलचरित नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।

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तीसरा खण्ड

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तृतीय प्रकाश

आठवाँ अधिकरण

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आठवाँ अधिकरण

व्यसनाधिकारिक

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प्रकरण १२७
अध्याय १

प्रकृतिव्यसनवर्गः


(१) व्यसनयौगपद्ये सौकर्यतो यातव्यं रक्षितव्यं वेति व्यसनचिन्ता । (२) दैवं मानुषं वा प्रकृतिव्यसनमनयापनयाभ्यां सम्भवति । (३) गुणप्रातिलोम्यमभावः प्रदोषः प्रसङ्गः पीडा वा व्यसनम् । व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनम् । (४) स्वाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्रव्यसनानां पूर्वं पूर्वं गरीय इत्याचार्याः । (५) नेति भारद्वाजः । स्वाम्यमात्यव्यसनयोरमात्यव्यसनं गरीय इति । मन्त्रो मन्त्रफलावाप्तिः कार्यानुष्ठानमायव्ययकर्म दण्डप्रणयनममित्राटवी-


प्रकृतियों के व्यसन और उनका प्रतीकार

( १ ) जब शत्रु और विजिगीषु, दोनों पर एक जैसी विपत्ति आ पड़ी हो और शत्रु पर आक्रमण करने तथा अपनी रक्षा करने, दोनों में समानता दीखती हो, ऐसी दशा में चढ़ाई करनी चाहिए या आत्मरक्षा करनी चाहिए ? यह विचार सामने आता है । इस हेतु इस अध्याय में पहिले व्यसनों का चिंतन किया जाता है ।

( २ ) व्यसन दो प्रकार का है : एक दैव और दूसरा मानुष । अमात्य आदि प्रकृति वर्ग के ये दोनों व्यसन अनय और अपनय के कारण पैदा होते हैं । सन्धि आदि की उचित व्यवस्था न करना अनय और शत्रुओं से पीड़ित होते रहना अपनय कहलाता है ।

( ३ ) गुणों की प्रतिकूलता या अभाव, उनका अनुचित उपयोग, प्रकृतिवर्ग में दोषों की अधिकता, विषयों में अति आसक्ति और शत्रुओं द्वारा पीड़ित होना, ये पाँच प्रकार के व्यसन हैं । 'व्यसन' का शब्दार्थ ही यह है जो कल्याण मार्ग से भ्रष्ट कर दे । अर्थात् जो कार्य राजा को नीचे गिरा दे वही उसके लिए व्यसन है ।

( ४ ) कुछ आचार्यों का मत है कि 'स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र, इनमें पूर्व-पूर्वं की विपत्ति अत्यन्त कष्टकर है ।'

( ५ ) परन्तु आचार्य भारद्वाज का कहना है कि 'यदि स्वामी और अमात्य पर एक साथ व्यसन आ पड़े तो अमात्य का व्यसन ही अधिक भयावह है; क्योंकि प्रत्येक कार्य का विचार, उसके फलाफल की प्राप्ति का चिंतन, आवश्यक कार्यों को करना,

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५५६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

प्रतिषेधो राज्यरक्षणं व्यसनप्रतीकारः कुमाररक्षणमभिषेकश्च कुमाराणा- मायत्तमामात्येषु । तेषामभावे तदभावः । छिन्नपक्षस्येव राज्ञश्चेष्टानाशः । व्यसनेषु चासन्नाः परोपजापाः । वैगुण्ये च प्राणबाधः प्राणान्तिकचरत्वा- द्राज्ञ इति ।

(१) नेति कौटिल्यः । मन्त्रिपुरोहितादिभृत्यवर्गमध्यक्षप्रचारं पुरुष- द्रव्यप्रकृतिव्यसनप्रतीकारमेधनं च राजैव करोति । व्यसनिषु वामात्येषु अन्यानाव्यसनिनः करोति । पूज्यपूजने दूष्यावग्रहे च नित्ययुक्तस्तिष्ठति । स्वामी च सम्पन्नः स्वसम्पद्भिः प्रकृतीः सम्पादयति । स्वयं यच्छीलस्त- च्छीलाः प्रकृतयो भवन्ति । उत्थाने प्रमादे च तदायत्तत्वात् । तत्कूटस्था- नीयो हि स्वामीति ।

(२) अमात्यजनपदव्यसनयोर्जनपदव्यसनं गरीय इति विशालाक्षः ।


आय-व्यय की व्यवस्था, सैन्यसंग्रह, शत्रु तथा आटविकों का प्रतीकार, राज्य की सुरक्षा, विपत्तियों का दमन, राजकुमारों की रक्षा और उनका अभिषेक आदि कार्यों को सम्पन्न करना अमात्यों पर ही निर्भर है । इसलिए राजा की अपेक्षा अमात्य का व्यसन अधिक भयप्रद है । अमात्यों के अभाव में सारे राजकार्य नष्ट हो जाते हैं और परकटे पक्षी के समान राजा के सारे कार्यक्रम ही चौपट हो जाते हैं तथा व्यसनों का लाभ उठा कर शत्रु षड्यन्त्रों का जाल बिछा देते हैं । अमात्यों के व्यसनी या विपरीत हो जाने पर राजाओं के प्राण खतरे में पड़ जाते हैं; क्योंकि अमात्य, राजाओं के प्राण के समान होते हैं ।'

(१) इस मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'मन्त्री, पुरोहित आदि भृत्यवर्ग को, सम्पूर्ण विभागीय अध्यक्षों के कार्य को, अमात्य तथा सेना आदि प्रकृतिवर्ग की विपत्ति को और जनपद, दुर्ग, कोष आदि द्रव्य प्रकृति की विपत्ति को दूर कर उनकी उन्नति के कार्यों को राजा स्वयं सम्पन्न कर सकता है । अमात्य यदि व्यसनी हो गये हों तो उनके स्थान पर राजा अव्यसनी अमात्यों को नियुक्त कर सकता है । राजा ही पूज्य व्यक्तियों का सम्मान और दुष्ट व्यक्तियों का निग्रह कर सकता है । वही अपने राज्योग्य गुणों से अपनी अमात्य प्रकृति को गुणसम्पन्न बना सकता है; क्योंकि राजा स्वयं जिस स्वभाव का होता है उसकी प्रकृतियाँ भी वैसे ही स्वभाव की हो जाती हैं । राजा पर ही उसकी प्रकृतियों का अभ्युदय एवं पतन निर्भर होता है । क्योंकि सातों प्रकार की प्रकृतियों में राजा ही प्रधान होता है, इसलिए मूल प्रकृति राजा का जैसा स्वभाव हो उसकी विकृतियों का भी वैसा ही स्वभाव होता है ।'

(२) आचार्य विशालाक्ष का अभिमत है कि 'अमात्य के व्यसन की अपेक्षा

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प्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृतियों के व्यसन ५५७

कोशो दण्डः कुप्यं विष्टिर्वाहनं निचयाश्च जनपदादुत्तिष्ठन्ते । तेषामभावो जनपदाभावे । स्वाम्यमात्ययोश्चानन्तर इति ।

(१) नेति कौटिल्यः । अमात्यमूलाः सर्वारम्भाः । जनपदस्य कर्मसिद्धयः स्वतः परतश्च योगक्षेमसाधनं व्यसनप्रतीकारः शून्यानिवेशोपचयौ दण्डकरानुग्रहश्चेति ।

(२) जनपददुर्गव्यसनयोर्दुर्गव्यसनमिति पाराशराः । दुर्गे हि कोशदण्डोत्पत्तिरापदि स्थानं च जनपदस्य । शक्तिमत्तराश्च पौरा जानपदेभ्यो नित्याश्चापदि सहाया राज्ञः । जानपदास्त्वमित्रसाधारणा इति ।

(३) नेति कौटिल्यः । जनपदमूला दुर्गकोशदण्डसेतुवार्तारम्भाः । शौर्यं स्थैर्यं दाक्ष्यं बाहुल्यं च जनपदेषु । पर्वतान्तर्द्वीपाश्च दुर्गा नाध्युष्यन्ते जनपदा-


जनपद पर आया हुआ व्यसन अधिक भयावह होता है; क्योंकि कोष, सेना, वस्त्र, लोहा, ताँबा, भृत्यवर्ग, घोड़े, ऊँट, अन्न, घृत आदि जितना भी सामान है, सभी कुछ जनपद से प्राप्त होता है। जनपद विपत्तिग्रस्त होने के कारण उक्त सभी वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं और उसके बाद अमात्य एवं राजा आदि का भी विनाश हो जाता है।'

( १ ) परन्तु कौटिल्य, विशालाक्ष के उक्त मत को नहीं मानता है । वह कहता है कि 'सभी कार्य अमात्यों पर निर्भर होते हैं। दुर्ग तथा कृषि आदि कार्यों की सफलता, राजवंश, अन्तपाल और आटविकों की ओर से योग-क्षेम का साधन, आपत्तियों का प्रतिकार, उपनिवेशों की स्थापना एवं उनकी उन्नति, अपराधियों को दण्ड और राजकर का निग्रह आदि जनपद के सभी कार्य अमात्यों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। इसलिए जनपद की विपत्ति की अपेक्षा अमात्यों की विपत्ति चिंतनीय है' ।

( २ ) आचार्य पराशर के मातावलम्बी विद्वानों का कथन है कि 'जनपद और दुर्ग, इन दोनों के एक साथ विपत्तिग्रस्त हो जाने पर जनपद की अपेक्षा दुर्ग की विपत्ति अधिक भयावह है; क्योंकि कोष और सेना को दुर्ग में ही रखा जाता है। यदि जनपद पर कोई विपत्ति आ जाय तो दुर्ग ही उस समय आश्रय का एकमात्र स्थान होता है। नगर तथा नागरिकों की अपेक्षा दुर्ग अधिक अजेय तथा स्थायी होते हैं और किसी भी विपत्ति में वह सहायक होते हैं। दुर्गों की तुलना में जनपदवासियों को तो शत्रु के समान समझना चाहिए; क्योंकि शत्रु को भी कर आदि देकर वे उसकी सहायता करते हैं। इसलिए जनपद की विपत्ति की अपेक्षा दुर्गों की विपत्ति अधिक चिन्तनीय समझनी चाहिए।'

( ३ ) इस मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'दुर्ग, कोष, सेना, सेतुबन्ध और कृषि आदि कार्य जनपद पर ही निर्भर हैं और शूरता, स्थिरता, चतुरता एवं अधिकता आदि बातें जानपदों ( जनपद के पुरुषों ) में ही हो सकती हैं । यदि