भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

५५८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ आठवां अधिकरण

भावात् । कर्षकप्राये तु दुर्गव्यसनमायुधीयप्राये तु जनपदे जनपदव्यसनमिति ।

(१) दुर्गकोशव्यसनयोः कोशव्यसनमिति पिशुनः । कोशमूलो हि दुर्गसंस्कारो दुर्गरक्षणं च । दुर्गः कोशादुपजाप्यः परेषां । जनपदमित्रामित्रनिग्रहो देशान्तरितानामुत्साहनं दण्डबलव्यवहारः । कोशमादाय च व्यसने शक्यमपयातुं न दुर्गमिति ।

(२) नेति कौटिल्यः । दुर्गापर्णः कोशो दण्डस्तूष्णींयुद्धं स्वपक्षनिग्रहो दण्डबलव्यवहारः आसारप्रतिग्रहः परचक्राटवीप्रतिषेधश्च । दुर्गाभावे च कोशः परेषां । दृश्यते हि दुर्गवतामनुच्छित्तिरिति ।


जनपद पर ही आपत्ति आ जाय तो नदी और पर्वतों में बने बड़े-बड़े अजेय दुर्ग भी सूने पड़ जाते हैं । इसलिए दुर्ग-व्यसन की अपेक्षा जनपद-व्यसन ही अधिक चिन्ताकर समझना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता जरूर है कि जैसे-जनपदरहित दुर्ग सूने हो जाते हैं वैसे ही दुर्गरहित जनपदों में रहना भी दुष्कर हो जाता है । इसलिए इतना समझ लेना चाहिए कि कृषिप्रधान जनपदों के दुर्गों पर विपत्ति का आना अधिक खतरनाक है । इसी प्रकार आयुधप्रधान देशों पर विपत्ति का आना अधिक भयावह है ।'

( १ ) आचार्य पिशुन ( नारद ) का मत है कि 'दुर्ग और कोष, इन दोनों पर एक साथ ही आई विपत्ति अधिक भयावह है; क्योंकि दुर्ग की मरम्मत एवं उसकी रक्षा कोष पर ही निर्भर है । कोष के बल पर दुर्ग का भी उच्छेद किया जा सकता है । कोष के ही द्वारा जनपद; शत्रु और मित्र आदि सब का निग्रह किया जा सकता है । दूरदेशस्थ राजाओं को भी कोष के ही बल पर सहायता के लिए प्रेरित किया जा सकता है । सैनिक-शक्ति का उपयोग भी कोष पर ही निर्भर है । यदि आकस्मिक आपत्ति टूट पड़े तो भागते समय कोष को भी साथ ले जाया जा सकता है; किन्तु ऐसी दशा में दुर्ग को साथ नहीं ले जाया जा सकता है ।'

( २ ) पिशुन के मत का विरोध करते हुए कौटिल्य का कहना है कि 'कोष और सेना दोनों की रक्षा दुर्ग के द्वारा की जा सकती है । तूष्णींयुद्ध, अपने पक्ष के राजद्रोहियों का निग्रह, सैनिक शक्ति का आश्रय और शत्रु-सेना तथा आटविकों का प्रतीकार सभी कार्य दुर्ग के द्वारा किए जा सकते हैं । दुर्ग के नष्ट हो जाने पर बहुत संभव है कि कोष को भी शत्रु छीन ले; क्योंकि तब उसकी रक्षा का कोई साधन नहीं रह जाता है । ऐसा भी देखा गया है कि जिनके पास पर्याप्त कोष नहीं; किन्तु दुर्जेय दुर्ग है, उनका उच्छेद सहसा नहीं किया जा सकता है । इसलिए कोष की अपेक्षा दुर्ग-व्यसन ही अधिक कष्टकर समझना चाहिए ।'

प्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृतियों के व्यसन ५५९


(१) कोशदण्डव्यसनयोर्दण्डव्यसनम् इति कौणपदन्तः । दण्डमूलो हि मित्रामित्रनिग्रहः परदण्डोत्साहनं स्वदण्डप्रतिग्रहश्च । दण्डाभावे च ध्रुवः कोशविनाशः । कोशाभावे च शक्यः कुप्येन भूम्या परभूमिस्वयंग्रहणेन वा दण्डः पिण्डयितुम् । दण्डवता च कोशः । स्वामिनश्चासन्नवृत्तित्वादमात्य-सधर्मा दण्ड इति ।

(२) नेति कौटिल्यः । कोशमूलो हि दण्डः । कोशाभावे दण्डः परं गच्छति, स्वामिनं वा हन्ति । सर्वाभियोगकरश्च कोशो धर्महेतुः । देशकाल-कार्यवशेन तु कोशदण्डयोरन्यतरः । प्रमाणीभवति । लम्भपालनो हि दण्डः कोशस्य । कोशः कोशस्य दण्डस्य च भवति । सर्वद्रव्यप्रयोजकत्वात्कोश-व्यसनं गरीय इति ।


( १ ) आचार्य कौणपदन्त ( भीष्म ) का कहना है कि कोष और सेना, दोनों के व्यसनों में सेना-व्यसन ही अधिक कष्टकर है; क्योंकि शत्रु तथा मित्र का निग्रह सेना द्वारा ही होता है; दूसरे की सेना को अपनी सेना द्वारा ही कार्य पर नियुक्त किया जा सकता है । अपनी सेना का अधिक संग्रह भी सेना के ही द्वारा किया जा सकता है । अपनी सैनिक शक्ति क्षीण हो जाने पर ही विजिगीषु, शत्रु की अपेक्षा में अपनी सेना को आगे नहीं बढ़ा पाता है । यदि सेना पर विपत्ति पड़ जाय तो निश्चित ही कोष भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं रह जाता है । कोष के अभाव में भी वस्त्राभरण के द्वारा, भूमि के द्वारा, बलात् अपहृत शत्रुद्रव्य के द्वारा सेना का संगठन किया जा सकता है; और तब कोष को भी जमा किया जा सकता है । सदा राजा के समीप रहने के कारण सेना को भी अमात्यों के ही समान उपकारक समझना चाहिए । इसलिए कोष की अपेक्षा सेना-व्यसन अधिक भययुक्त है ।'

( २ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य, कौणपदंत की उक्त दलील को स्वीकार नहीं करते हैं । उनका कहना है कि 'सेना का सारा दारोमदार कोष पर ही निर्भर है । उसके अभाव में या तो सेना शत्रु के अधीन हो जाती है या अपने ही स्वामी का वध कर डालती है । सब सामंतों के साथ सेना ही राजा का विरोध करा सकती है; क्योंकि धन देने पर सभी को वश में किया जा सकता है । लोक में धर्म, अर्थ और काम, इस त्रिवर्ग के साधन का मूल कारण कोष ही है; किन्तु इस संबंध में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि देश, काल तथा कार्य को दृष्टि में रखकर कोष और सेना, दोनों को प्रधान माना जा सकता है, जिनके द्वारा कि विजिगीषु का कार्य सध सके । सेना केवल कोष की रक्षा कर सकती है; किन्तु कोष से दुर्ग और सेना, दोनों की रक्षा हो जाती है । इसलिए सभी दुर्ग आदि द्रव्य प्रकृतियों की

५६०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

(१) दण्डमित्रव्यसनयोर्मित्रव्यसनमिति वातव्याधिः। मित्रमभृतं व्यवहितं च कर्म करोति, पार्ष्णिग्राहमासारममित्रमाटविकं च प्रतिकरोति, कोशदण्डभूमिभिश्चोपकरोति व्यसनावस्थायोगमिति ।

(२) नेति कौटिल्यः। दण्डवतो मित्रं मित्रभावे तिष्ठत्यमित्रो वामित्रभावे। दण्डमित्रयोस्तु साधारणे कार्ये सारतः स्वयुद्धदेशकाललाभाद्विशेषः। शीघ्राभियाने त्वमित्र्राटविकाभ्यन्तरकोपे च न मित्रं विद्यते। व्यसनयौगपद्ये परवृद्धौ च मित्रमर्थयुक्तौ तिष्ठति ।

(३) प्रकृतिव्यसनसम्प्रधारणमुक्तमिति ।

(४) प्रकृत्यवयवानां तु व्यसनस्य विशेषतः।
बहुभावोऽनुरागो वा सारो वा कार्यसाधकः॥
(५) द्वयोस्तु व्यसने तुल्ये विशेषो गुणतः क्षयात्।
शेषप्रकृतिसाद्गुण्यं यदि स्यान्नाभिधेयकम् ॥


प्रयोजनसिद्धि होने के कारण कोष के ऊपर आई हुई विपत्ति को ही गरीयसी समझना चाहिए ।'

( १ ) आचार्य वातव्याधि ( उद्धव ) का मत है कि 'अपनी सेना और अपने मित्र पर एक साथ पड़ी विपत्ति में मित्र पर पड़ी विपत्ति अधिक कष्टकर है; क्योंकि दूर रहता हुआ भी मित्र बिना कुछ लिए विजिगीषु का कार्य करता है और पार्ष्णिग्राह का, पार्ष्णिग्राह के मित्रवल का, शत्रु का तथा आटविक का सदैव प्रतीकार करने के लिए तैयार रहता है। कोष, सेना और भूमि के द्वारा वह बराबर विजिगीषु की मदद करता रहता है। विपत्ति में साथ नहीं छोड़ता है ।'

( २ ) किन्तु कौटिल्य, वातव्याधि के उक्त सिद्धान्त से सहमत नहीं है । उसका कहना है कि 'जिसके पास अच्छा सैन्यबल होता है, उसके मित्र तो मित्र ही बने रहते हैं, किन्तु शत्रु तक भी मित्र बन जाते हैं । सेना और मित्र, इनके साधारण कार्य में लाभ के अनुसार अपने युद्ध, देश और काल की अपेक्षा विशेषता समझनी चाहिए । तत्कालिक आक्रमण पर अथवा शत्रु और आटविकों के द्वारा आभ्यन्तर कोप उत्पन्न करा देने पर मित्र लोग उसका कोई प्रतीकार नहीं करा सकते हैं; बल्कि सेना ही ऐसे अवसरों पर काम आती है । एक साथ विपत्ति आने पर अथवा शत्रु के बढ़ जाने के कारण मित्र ही अर्थ-सिद्धि में सहायक होता है ।'

( ३ ) यहाँ तक प्रकृति-व्यसन का निरूपण किया गया ।

( ४ ) यदि प्रकृति के कुछ अंगों पर विपत्ति आ पड़ी हो तो जिस प्रकृति पर व्यसन पड़ा है उसकी अधिक संख्या, स्वामिभक्ति और विशेष गुणों के अनुसार ही उस विपत्ति को दूर करना चाहिए ।

( ५ ) यदि शत्रु और विजिगीषु दोनों पर एक साथ ही व्यसन आ पड़ा हो तो

प्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृति-व्यसन-वर्ग ५६१

(१) शेषप्रकृतिनाशस्तु यत्रैकव्यसनाद्‌भवेत् । व्यसनं तद्गरीयः स्यात्प्रधानस्येतरस्य वा ॥

इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे प्रकृतिव्यसनवर्गो नाम प्रथमोऽध्यायः,
आदितः षोडशशततमः ।


एक के गुणशाली और दूसरे के गुणहीन होने पर ही विशेषता समझनी चाहिए, किन्तु जिस प्रकृति पर व्यसन है उसके अतिरिक्त शेष सभी प्रकृति यदि अपनी-अपनी अवस्था में शक्तिशाली बनी रहें तो पूर्वोक्त विशेषता नहीं समझनी चाहिए ।

( १ ) यदि एक प्रकृति-व्यसन के कारण शेष प्रकृतियों का भी नाश होता हो, तो वह व्यसन भले ही प्रधान-अप्रधान किसी भी प्रकृति से संबद्ध क्यों न हो, पहिले उसी व्यसन का प्रतीकार करना चाहिए ।

व्यसनाधिकारिक नामक अष्टम अधिकरण में प्रकृतिव्यसनवर्ग नामक पहला अध्याय समाप्त ।


३६ कौ०

प्रकरण १२८# राजराज्ययोर्व्यसनचिन्ता
अध्याय २

(१) राजा राज्यमिति प्रकृतिसंक्षेपः । (२) राज्ञ आभ्यन्तरो बाह्यो वा कोप इति । अहिभयादाभ्यन्तरः कोपो बाह्यकोपात्पापीयान् । अन्तरमात्यकोपश्चान्तःकोपात् । तस्मात्कोशदण्ड-शक्तिमात्मसंस्थां कुर्वीत । (३) द्वैराज्यवैराज्ययोर्द्वैराज्यमन्योन्यपक्षद्वेषानुरागाभ्यां परस्परसंघर्षेण वा विनश्यति । वैराज्यं तु प्रकृतिचित्तग्रहणापेक्षि यथास्थितमन्यैर्भुज्यत इत्याचार्याः । (४) नेति कौटिल्यः । पितापुत्रयोर्भ्रात्रोर्वा द्वैराज्यं तुल्ययोगक्षेमम-मात्यावग्रहं वर्तयेतेति । वैराज्ये तु जीवतः परस्याच्छिद्य 'नैतन्मम' इति


राजा और राज्य के व्यसनों पर विचार

(१) प्रकृति का संक्षिप्त स्वरूप राजा और राज्य है ।

(२) राजा के प्रति राज्य का दो प्रकार से कोप होता है : आभ्यन्तर और बाह्य । घर में रहने वाले साँप की तरह आभ्यन्तर कोप बाह्य कोप की अपेक्षा बहुत ही अनर्थकारी होता है । यह आभ्यन्तर कोप भी दो प्रकार का है : एक अन्तर अमात्य-कोप और दूसरा बाह्य अमात्य-कोप । इन दोनों में अन्तर अमात्य-कोप बहुत ही खतरनाक होता है । इसलिए विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह कोष और सेना की सम्पूर्ण शक्ति को अपने ही हाथ में रखे ।

(३) पूर्वाचार्यों का मत है कि 'द्वैराज्य (जिस राज्य के दो राजा हों) और वैराज्य (जिस राज्य में किसी विजित राजा का शासन हो), इन दोनों में दो राजाओं के पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्य एवं स्पर्धा के कारण द्वैराज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है; किन्तु प्रजा के विचारों के अनुसार चलाये जाने वाला वैराज्य हमेशा अपनी स्थिति को बनाये रखता है ।'

(४) किन्तु कौटिल्य का कहना है 'क्योंकि पिता, पुत्र तथा दो भाइयों में दायभाग सम्बन्धी विरोध के कारण ही द्वैराज्य की स्थापना होती है, जिसमें दोनों शासकों का योग-क्षेम समान होता है; उनके अमात्यों द्वारा दोनों राजाओं का पारस्परिक वैमनस्य शान्त हो सकता है । इस दृष्टि से द्वैराज्य में कोई बड़ा दोष

प्र० १२८ : अ० २ ] राजा और राज्य के व्यसन ५६३

मन्यमानः कर्शयत्यपवाहयति, पण्यं वा करोति, विरक्तं वा परित्यज्यापगच्छतीति । (१) अन्धश्चलितशास्त्रो वा राजेति। अशास्त्रचक्षुरन्धो यत्किंचनकारी दृढाभिनिवेशी परप्रणेयो वा राज्यमन्यायेनोपहन्ति। चलितशास्त्रस्तु यत्र शास्त्राच्चलितमतिर्भवति, शक्यानुनयो भवतीत्याचार्याः। (२) नेति कौटिल्यः—अन्धो राजा शक्यते सहायसम्पदा यत्र तत्र वा पर्यवस्थापयितुमिति। चलितशास्त्रस्तु शास्त्रादन्यथाभिनिविष्टबुद्धिरन्यायेन राज्यमात्मानं चोपहन्तीति। (३) व्याधितो नवो वा राजेति ? व्याधितो राजा राज्योपघातममात्यमूलं प्राणाबाधं वा राज्यमूलमवाप्नोति। नवस्तु राजा स्वधर्मानुग्रहपरिहारदानमानकर्मभिः प्रकृतिरञ्जनोपकारैश्चरतीत्याचार्याः ।

नहीं है। परन्तु वैराज्य में जीवित शत्रु को उच्छिन्न कर, बलपूर्वक उससे राज्य छीन कर, विजिगीषु उसको 'यह मेरा नहीं है' ऐसा मानता हुआ जुर्माना, टैक्स आदि के द्वारा कष्ट पहुँचाता है; अथवा अच्छी रकम लेकर उसे दूसरे के हाथ बेच देता है; या वहाँ की प्रजा को विमुख जानकर सर्वस्व अपहरण कर के वहाँ से चला जाता है।'

(१) अन्धशास्त्र (जिस राजा ने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है) और चलित शास्त्र (शास्त्रों का अध्ययन कर के भी तदनुसार आचरण न करने वाला), इन दोनों राजाओं में से कौन सा राजा प्रजा के लिए अधिक कल्याण-प्रद है ? इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का कहना है कि 'शास्त्ररूपी चक्षुओं से हीन अन्धा राजा बिना विचारे ही कार्य करने वाला, हठबुद्धि, दुष्कर्मरत, या परबुद्धि होकर अन्याय से राज्य को नष्ट कर डालता है। उसकी अपेक्षा चलितशास्त्र राजा को, शास्त्रविरुद्ध आचरण करने पर अनुनय, विनय के द्वारा रोका जा सकता है। इसलिए अन्धशास्त्र से चलितशास्त्र राजा उत्तम है।'

(२) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'अन्धे राजा को अमात्य आदि की हितकर बुद्धि से स्वेच्छया अच्छे मार्ग पर लाया जा सकता है; किन्तु चलितशास्त्र राजा तो शास्त्र-विरुद्ध कार्य करने में अपनी हठ-वादिता के कारण अन्याय से स्वयं को और अपने राज्य को नष्ट कर डालता है।'

(३) बीमार राजा और नये राजा, दोनों में कौन श्रेष्ठ है, इसका निर्णय करते हुए प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'व्याधिग्रस्त राजा अपने अमात्यों के षड्यन्त्र से राज्य को गँवा बैठता है या राज्य के सहित प्राण भी दे बैठता है; किन्तु नया राजा अपने धर्म, अनुग्रह, परिहार और मान आदि कार्यों से लोकप्रियता प्राप्त कर राज्य का संचालन कर सकता है।'

५६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । व्याधितो राजा यथाप्रवृत्तं राजप्रणिधिमनुवर्तयति । नवस्तु राजा 'बलावर्जितं ममेदं राज्यम्' इति यथेष्टमनवग्रहश्चरति । सामुत्थायिकैरवगृहीतो वा राज्योपघातं मर्षयति । प्रकृतिष्वरूढः सुखः समुच्छेत्तुं भवति । व्यधिते विशेषः—पापरोग्यपापरोगी च । (२) नवेऽप्यभिजातोऽनभिजात इति । दुर्बलोऽभिजातो बलवाननभिजातो राजेति । दुर्बलस्याभिजातस्योपजापं दौर्बल्यापेक्षाः प्रकृतयः कृच्छ्रेणोपगच्छन्ति । बलवतश्चानभिजातस्य बलापेक्षाः सुखेन इत्याचार्याः । (३) नेति कौटिल्यः । दुर्बलमभिजातं प्रकृतयः स्वयमुपनमन्ति, जात्यमैश्वर्यप्रकृतिरनुवर्तत इति । बलवतश्चानभिजातस्योपजापं विसंवादयन्ति—अनुरागे सार्वगुण्यमिति ।


(१) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है 'क्योंकि व्याधिग्रस्त राजा पूर्ववत् ही राज्य के व्यापारों को बराबर चलाता रहता है; किन्तु नया राजा तो बल के अभिमान से चूर होकर 'यह मेरा राज्य है' ऐसा समझता हुआ स्वेच्छाचारी बन कर मनमाना शासन करता है। अथवा जब कभी उन्नतिशील साथी राजाओं से घिर जाता है तो राज्य के नाश को चुपचाप देखता रहता है। प्रजा का अनुराग न होने से अनायास ही शत्रुओं के द्वारा उखाड़ दिया जाता है। इसलिए नये राजा की अपेक्षा व्याधिग्रस्त राजा ही श्रेष्ठ है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक विशेष बात ध्यान रखने योग्य यह है कि व्याधिग्रस्त राजा भी दो तरह के हो सकते हैं : एक तो पापरोग (कोढ़) आदि से ग्रस्त और दूसरे अपाप रोग (साधारण रोग) से ग्रस्त । इनमें अपापरोगी राजा के सम्बन्ध में ही उक्त कथन को समझना चाहिए।'

(२) नये राजाओं में भी उच्च कुलीन राजा उत्तम होता है या नीच कुलीन ? उनमें भी उच्च कुल का दुर्बल राजा उत्तम होता है या नीच कुल का बलवान् राजा ? इस सम्बन्ध में प्राचीन आचार्यों का कहना है कि 'कुलीन दुर्बल राजा के अमात्य आदि प्रकृतिजन तथा प्रजाजन बड़ी कठिनाई से उसके वश में रहते हैं। किन्तु नीच कुलोत्पन्न, परन्तु बलवान् राजा के रोबदाब के कारण सम्पूर्ण प्रजा तथा अमात्य आदि उसके वश में हो जाते हैं। इसलिए दुर्बल अभिजात राजा ही श्रेष्ठ है।'

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का उक्त मत के विरुद्ध यह कहना है कि 'जो राजा उच्च कुलोत्पन्न होता है, वह चाहे दुर्बल भी हो, प्रकृतिजन अपने-आप ही उसके सामने झुक जाते हैं; क्योंकि ऐश्वर्य की योग्यता उच्च कुलोत्पन्न राजा का ही अनुगमन करती है। किन्तु बलवान् होने पर भी नीचकुलोत्पन्न राजा के प्रकृतिजन विराग के कारण उसका विरोध करने लगते हैं; क्योंकि अनुराग ही गुणों का आश्रय है।'

प्र० १२८ : अ० २ ] राजा और राज्य के व्यसन ५६५

(१) प्रयासवधातस्सस्यवधो मुष्टिवधात्पापीयान् ।
(२) निराजीवत्वादवृष्टिरतिवृष्टित इति ।
(३) द्वयोर्द्वयोर्व्यसनयोः प्रकृतीनां बलाबलात् ।
पारम्पर्यक्रमेणोक्तं याने स्थाने च कारणम् ॥

इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे राजराज्ययोर्व्यसनचिन्ता नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितोः सप्तदशशततमः ।

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( १ ) खेत में बीज न बोने के कारण अन्नाभाव से जो कष्ट होता है उसकी अपेक्षा बीज बोने के बाद तैयार हुए अनाज का नष्ट हो जाना अधिक पीड़ाकर होता है । क्योंकि सारा परिश्रम ही व्यर्थ चला जाता है ।

( २ ) इसी प्रकार अधिक वृष्टि होने की अपेक्षा वृष्टि का सर्वथा न होना अधिक हानिकर है; क्योंकि जीवन की रक्षा जल पर ही निर्भर होती है ।

( ३ ) इस प्रकार दो भिन्न-भिन्न व्यसनों में प्रकृतियों के वलावल का निरूपण किया जा चुका है । इसका स्पष्टीकरण इस तरह है : विजिगीषु और शत्रु पर व्यसन होने के कारण, यदि शत्रु की अपेक्षा विजिगीषु पर लघु व्यसन हो तो विजिगीषु को चढ़ाई कर देनी चाहिए; और यदि अवस्था इसके विपरीत हो तो विजिगीषु को चुपचाप होकर बैठ जाना चाहिए ।

व्यसनाधिकारिक नामक अष्टम अधिकरण में राजराज्यव्यसनचिन्ता नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १२९पुरुषव्यसनवर्गः
अध्याय ३

(१) अविद्याविनयः पुरुषव्यसनहेतुः। अविनीतो हि व्यसनदोषान्न पश्यति।

(२) तानुपदेक्ष्यामः—कोपजस्त्रिवर्गः, कामजश्चतुर्वर्गः।

(३) तयोः कोपो गरीयान्। सर्वत्र हि कोपश्चरति, प्रायशश्च कोपवशा राजानः प्रकृतिकोपैर्र्हताः श्रूयन्ते, कामवशाः क्षयव्ययनिमित्तमरिव्याधिभिरिति।

(४) नेति भारद्वाजः। सत्पुरुषाचारः कोपः। वैरयातनमवज्ञावधो भीतमनुष्यता च, नित्यश्च कोपसम्बन्धः पापप्रतिषेधार्थः। कामः सिद्धिलाभः। सान्त्वं त्यागशीलता सम्प्रियभावश्च। नित्यश्च कामेन सम्बन्धः कृतकर्मणः फलोपभोगार्थ इति।


सामान्य पुरुषों के व्यसन

(१) अशिक्षित व्यक्ति व्यसनी हो जाते हैं, क्योंकि अशिक्षित व्यक्ति व्यसनों से पैदा होने वाले दोषों को नहीं समझ पाता है।

(२) इस प्रकरण में ऐसे ही व्यसनों तथा व्यसनों से पैदा होने वाले दोषों का निरूपण किया जाता है। कोप से उत्पन्न होने वाले तीन दोष होते हैं, इसीलिए उन्हें त्रिवर्ग कहा गया है। इसी प्रकार काम से उत्पन्न होने वाले चार दोष हैं, इसीलिए उन्हें चतुर्वर्ग कहा गया है।

(३) दोषों को उत्पन्न करने वाले काम और क्रोध दोनों में से क्रोध ही अधिक भयावह होता है, क्योंकि क्रोध का सर्वत्र प्रवेश है। प्रायः ऐसा सुना गया है कि कोप से वशीभूत हुए राजा अपनी प्रकृतियों के कोप से ही मारे गये। इसी प्रकार काम के वशीभूत हुए राजा, सेना तथा कोष के नष्ट हो जाने या शारीरिक शक्ति के नष्ट हो जाने के कारण शत्रुओं तथा व्याधियों के द्वारा मारे गये सुने गये हैं।

(४) इस सिद्धान्त के विपरीत आचार्य भारद्वाज का कथन है 'क्योंकि कोप करना श्रेष्ठ लोगों का आचारधर्म है। कोप से ही शत्रु का प्रतिकार और दूसरे के तिरस्कार का बदला लिया जाता है। क्रोधी पुरुष की बुराई करने से सभी लोग डरते हैं। क्रोध छोड़ा भी नहीं जा सकता है, क्योंकि उसी के द्वारा पापियों का

प्र० १२९ : अ० ३ ] सामान्य पुरुषों के व्यसन ५६७

(१) नेति कौटिल्यः । द्वेष्यता शत्रुवेदनं दुःखासङ्गश्च कोपः । परिभवो द्रव्यनाशः पाटच्चरद्यूतकारलुब्धकगायनवादकैश्चानर्थैः संयोगः कामः । (२) तयोः परिभवाद् द्वेष्यता गरीयसी । परिभूतः स्वैः परैश्चावगृह्यते, द्वेष्यः समुच्छिद्यत इति । द्रव्यनाशाच्छत्रुवेदनं गरीयः, द्रव्यनाशः कोशा-बाधकः, शत्रुवेदनं प्राणाबाधकमिति । अनर्थसंयोगाद् दुःखसंयोगो गरी-यान् । अनर्थसंयोगो मुहूर्त्तप्रीतिकरः, दीर्घक्लेशकरो दुःखानामासङ्ग इति । तस्मात्कोपो गरीयान् । (३) वाक्पारुष्यमर्थदूषणं दण्डपारुष्यमिति । वाक्पारुष्यर्थदूषणयो-


निग्रह होता है। इसी प्रकार काम भी सुख को देनेवाला है और उसी के कारण व्यक्ति में सच्चाई, मधुरता, त्याग और सौम्यता जैसे गुण आ बसते हैं। इसके अतिरिक्त अपने कर्मों का फल भोगने के लिए प्रत्येक पुरुष के लिए काम का अवलंबन आवश्यक भी है।'

( १ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त मत को स्वीकार नहीं करते । उनका कहना है कि 'कोप और काम कदापि गुणों की कोटि में नहीं रखे जा सकते हैं, वे तो अनेक महान् अनर्थों को पैदा करने वाले हैं, कोप के कारण मनुष्य सबका द्वेषी बन जाता है, उसके अनेक शत्रु बन जाते हैं, दुःख उसके शिर पर मँडराया करते हैं, कामी पुरुष का सर्वत्र तिरस्कार होता है, वह धन-नाश करता है, चोर, जुआरी, शराबी आदि अनर्थकारी व्यक्तियों से उसका साथ होता है।'

( २ ) काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले दोषों में से, कामजन्य परिभव ( दोष ) की अपेक्षा क्रोधजन्य द्वेष्यता अधिक हानिकर होती है। तिरस्कृत व्यक्ति अपने या पराये लोगों के द्वारा कभी न कभी अनुगामी बनाया जा सकता है, किन्तु जिससे सभी लोग द्वेष करते हैं वह तो नष्ट ही हो जाता है। इसीलिए तिरस्कृत होने की अपेक्षा द्वेष्य होना अधिक कष्टकर है। द्रव्यनाश हो जाने की अपेक्षा अधिक शत्रुओं का पैदा हो जाना अधिक हानिकर है। द्रव्यनाश होने पर केवल कोष को बाधा पहुँचती है, प्राण सुरक्षित रहते हैं, किन्तु शत्रुओं के बढ़ जाने से प्राण खतरे में पड़ जाते हैं। अनर्थकारी व्यक्तियों से सम्पर्क होने की अपेक्षा दुःखों का संयोग अधिक कष्टकर है। चोर, जुआरी आदि अनर्थकारी व्यक्तियों के सम्बन्ध परिणाम में दुःखदायी होने के बावजूद भी थोड़े समय के लिए प्रसन्न कर देने वाले होते हैं, किन्तु दुःखों का सम्बन्ध लगातार कष्टदायक होता है। इसलिए कामजन्य दोषों की अपेक्षा क्रोधजन्य दोषों को ही अधिक हानिकर समझना चाहिए।

( ३ ) कोपजन्य त्रिवर्ग : वाक्पारुष्य, अर्थदूषण और दण्डपारुष्य, ये कोपज त्रिवर्ग हैं, आचार्य विशालाक्ष के मत से 'वाक्पारुष्य ही अधिक बलवान् है। क्योंकि

५६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवाँ अधिकरण

वाक्पारुष्यं गरीयः इति विशालाक्षः । परुषमुक्तो हि तेजस्वी तेजसा प्रत्यारो- हति, दुरुक्तशल्यं हृदि निखातं तेजःसन्दीपनमिन्द्रियोपतापि च इति । (१) नेति कौटिल्यः । अर्थपूजा वाक्छल्यमपहन्ति, वृत्तिविलोपेस्त्वर्थ- दूषणम् । अदानमादानं विनाशः परित्यागो वा अर्थस्येत्यर्थदूषणम् । (२) अर्थदूषणदण्डपारुष्ययोरर्थदूषणं गरीयः इति पाराशराः । अर्थ- मूलौ धर्मकामौ, अर्थप्रतिबन्धश्च लोको वर्तते, तस्योपघातो गरीयान् इति । (३) नेति कौटिल्यः । सुमहताऽप्यर्थेन न कश्चन शरीरविनाशमिच्छेत् । दण्डपारुष्याच्च तमेव दोषमन्येभ्यः प्राप्नोति । इति कोपजस्त्रिवर्गः । (४) कामजस्तु—मृगया द्यूतं स्त्रियः पानमिति चतुर्वर्गः । तस्य मृग- याद्यूतयोर्मृगया गरीयसी इति पिशुनः स्तेनामित्रव्यालदावप्रस्खलनभय-


अपने तिरस्कार को सहन न करने वाले पुरुष के साथ कठोर वाक्यों का व्यवहार करने पर वह निश्चित ही कठोरभाषी व्यक्ति पर अपने तेज के द्वारा आक्रमण करता है । हृदय में गड़ा हुआ दुर्वचन भीतरी तेज को उभाड़ने वाला और इन्द्रियों को संतप्त करने वाला होता है । इसलिए अर्थदूषण की अपेक्षा वाक्पारुष्य को ही अधिक हानिकर समझना चाहिए ।'

( १ ) किन्तु, विशालाक्ष के मत के विरुद्ध कौटिल्य का कहना है कि 'अर्थ द्वारा की गई पूजा दुर्वचनरूपी शल्य को नष्ट कर देती है, किन्तु वाणी द्वारा की गई पूजा अर्थदूषण को नहीं हटा सकती है, किसी की जीविका मारना ही अर्थदूषण है । प्रिय वचन जीविका के विघात को पूरा नहीं कर सकते हैं । अर्थदूषण चार प्रकार का होता है । १. अदान ( कार्य करने पर भी वेतन न देना ) २. आदान ( दण्ड आदि के द्वारा धन खींच लेना ) ३. विनाश ( देश को पीड़ा पहुँचाना ) और ४. अर्थत्याग ( रक्षा योग्य अर्थ की रक्षा न करना ) ।'

( २ ) आचार्य पराशर के अनुयायियों का कहना है कि 'अर्थदूषण और दण्डपारुष्य में अर्थदूषण ही बलवान् होता है, क्योंकि धर्म, काम और लोकनिर्वाह सभी अर्थ पर निर्भर होते हैं । इसलिए अर्थ का उपघात ( दूषण ) होना अत्यन्त ही आपत्तिजनक है । इसलिए दण्डपारुष्य की अपेक्षा अर्थदूषण को ही बड़ा समझना चाहिए ।'

( ३ ) किन्तु कौटिल्य उक्त मत को युक्तिसंगत नहीं मानता है । उसका कहना है कि 'अत्यधिक धन-प्राप्ति के बदले में कोई भी अपने को नष्ट नहीं करना चाहता है, पुनः दण्डपारुष्य से आत्मरक्षा के लिए वह उतनी ही धन-राशि खर्च करने के लिए तैयार रहता है । इसलिए अर्थदूषण की अपेक्षा दण्डपारुष्य को ही अधिक कष्टकर समझना चाहिए ।' यहाँ तक कोपजन्य त्रिवर्ग का निरूपण किया गया ।

( ४ ) कामजन्य चतुर्वर्ग : मृगया, द्यूत, स्त्री और मदिरापान, ये कामज चार

प्र० १२९ : अ० ३ ] सामान्य पुरुषों के व्यसन ५६९

दिङ्मोहाः क्षुत्पिपासे च प्राणाबाधस्तस्याम् । द्यूते तु जितमेवाक्षविदुषा यथा जयत्सेनदुर्योधनाभ्यामिति ।

(१) नेति कौटिल्यः । तयोरप्यन्यतरपराजयोऽस्तीति नलयुधिष्ठि-राभ्यां व्याख्यातं, तदेव विजितद्रव्यमामिषं, वैरबन्धश्च, सतोऽर्थस्य विप्रति-पत्तिरसच्चार्जनमप्रतिभुक्तनाशो मूत्रपुरीषधारणबुभुक्षादिभिश्च व्याधिलाभ इति द्यूतदोषः । मृगयायां तु व्यायामः श्लेष्मपित्तमेदःस्वेदनाशलश्चले स्थिरे च काये लक्षपरिचयः कोपभयस्थानेहितेषु च मृगाणां चित्तज्ञानमनित्ययानं चेति ।

(२) द्यूतस्त्रीव्यसनयोः कैतवव्यसनम् इति कौणपदन्तः । सातत्येन हि निशि प्रदीपे मातरि च मृतायां दीव्यत्येव कितवः, कृच्छ्रे च प्रतिपृष्टः


दोष है । 'इस कामजन्य चतुर्वर्ग में मृगया और द्यूत, इन दोनों में से मृगया दोष अधिक हानिकर होता है'—ऐसा आचार्य नारद ( पिशुन ) का कहना है । 'क्योंकि मृगया दोष में सर्वथा चोर, शत्रु, सांप, दावाग्नि और गिरने का भय बना रहता है, दिशाओं के भूल जाने से तथा भूख-प्यास से कभी-कभी प्राणान्तक कष्ट भी उपस्थित हो जाता है । परन्तु बढ़िया खिलाड़ी जुए में अवश्य ही विजयी होता है, जैसे जयत्सेन और दुर्योधन ने नल और युधिष्ठिर को जुए में जीत लिया था । इसलिए जुए की अपेक्षा शिकार में अधिक कष्ट है ।'

( १ ) किन्तु उक्त सिद्धान्त के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'मृगया की भांति जुए में भी अनेक दोष हैं । जुआ खेलने वालों में एक की अवश्य ही हार होती है, जैसे नल और युधिष्ठिर जुए में हार गए थे । जुए में जीता हुआ धन पराये मांस की तरह है और हारने वाला जुआरी जीते हुए जुआरी से वैर भी ठान लेता है । धर्मपूर्वक कमाये हुए धन का दुरुपयोग होता है और अधर्मपूर्वक जुए से धन का संग्रह होता है । संग्रह किया हुआ धन फिर जुए में ही गँवा दिया जाता है । जुआ खेलते समय पेशाब, पाखाना और भूख रोकने से अनेक बीमारियां हो जाती हैं । जुए की अपेक्षा मृगया में व्यायाम, कफ-पित्त का नाश, मेदा का न बढ़ना, पसीना निकलने से देह का हल्का होना, चलते हुए या बैठे हुए शरीर पर निशाना बाँधने का अभ्यास होना, क्रोध तथा भय से उत्पन्न होने वाले जंगली जानवरों के चित्त की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं का ज्ञान होना और किसी खास अवसर पर ही मृगया का समय निश्चित होना—ये सब गुण ऐसे हैं, जो द्यूत में असम्भव है ।'

( २ ) आचार्य कौणपदंत का मत है कि 'द्यूत-व्यसन और स्त्री-व्यसन, दोनों में द्यूत-व्यसन अधिक हानिकर है, क्योंकि जुआरी रात में भी दीपक जला कर जुआ खेलता है, माता के मर जाने पर उसकी दाहक्रिया आदि की कुछ भी परवाह न

५७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

कुप्यति। स्त्रीव्यसनेषु तु स्नानप्रतिकर्मभोजनभूमिषु भवत्येव धर्मार्थपरि- प्रश्नः। शक्या च स्त्री राजहिते नियोक्तुम्। उपांशुदण्डेन व्याधिना वा व्यावर्तयितुमवस्त्रावयितुं वा इति।

(१) नेति कौटिल्यः। सप्रत्यादेयं द्यूतम्, निष्प्रत्यादेयं स्त्रीव्यसनम्। अदर्शनं, कार्यनिर्वैदः, कालातिपाटनादनर्थधर्मलोपश्च, तन्त्रदौर्बल्यं, पाना- नुबन्धश्चेति।

(२) स्त्रीपानव्यसनयोः स्त्रीव्यसनम् इति वातव्याधिः। स्त्रीषु हि बालिश्यमनेकविधं निशान्तप्रणिधौ व्याख्यातम्। पाने तु शब्दादीनामिन्द्रि- यार्थानामुपभोगः प्रीतिदानं परिजनपूजनं कर्मश्रमवधश्चेति।

करके जुए में जुटा हुआ रहता है और किसी संकट कालीन स्थिति में उससे जब कोई कुछ कहना चाहता है तो वह कुपित हो जाता है। इसके विपरीत स्त्री-व्यसनी राजा से स्नान के समय वस्त्र पहनते हुए या भोजन आदि के समय धर्म-अर्थ के सम्बन्ध में पूछा तथा बतलाया जा सकता है, जिस स्त्री पर राजा आसक्त हो उसको भी अमात्यों के द्वारा राजा के ध्येय कार्यों की ओर मोड़ा जा सकता है। यदि वह स्त्री अमात्यों का कहना न माने तो उसका उपांशुवध भी कराया जा सकता है। यदि ऐसा भी सम्भव न हो तो विषयुक्त औषधियों से उसमें व्याधि उपजा कर इलाज के बहाने उसको दूसरी जगह भेजा जा सकता है। इसलिए स्त्री-व्यसन की अपेक्षा द्यूत-व्यसन ही अधिक हानिकर है।'

( १ ) किन्तु उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'जुए में जो चीज हार दी जाय उसको फिर जुए में ही जीता जा जा सकता है; किन्तु स्त्री व्यसन में तो जो चीज हाथ से निकल गई उसका वापिस मिलना सम्भव नहीं होता है। स्त्री-व्यसन में आसक्त राजा अपने मन्त्रियों तक से नहीं मिल पाता है, जिसकी वजह से मन्त्रिवर्ग भी राजकार्य की ओर उदासीन हो जाता है और इस प्रकार कुछ समय बाद राजा के अर्थ-धर्म, दोनों ही विलुप्त हो जाते हैं।। इतना ही नहीं, उसका राज्यतन्त्र भी दुर्बल हो जाता है। स्त्री-व्यसन के सहकारी व्यसन मद्यपान, जुआ आदि भी उसके पीछे लग जाते हैं। इसलिए द्यूत-व्यसन की अपेक्षा स्त्री-व्यसन ही अधिक हानिकर समझना चाहिए।

( २ ) आचार्य वातव्याधि के मत से 'स्त्री-व्यसन और मद्यपान, दोनों में से स्त्री-व्यसन ही अधिक कष्टकर है; क्योंकि स्त्रियों में अनेक प्रकार की मूर्खताएँ होती हैं, जिनका वर्णन पीछे निशांतप्रणिधि प्रकरण में किया गया है; यहाँ तक कि वे अपने पतियों के वध करने तक का षड्यन्त्र रच देती हैं। मद्यपान में तो इन्द्रियों के विषयभूत शब्द आदि का ही उपयोग किया जाता है। उससे प्रेम का विस्तार, तथा

प्र० १२९ : अ० ३ ] सामान्य पुरुषों के व्यसन ५७१

(१) नेति कौटिल्यः । स्त्रीव्यसने भवत्यपत्योत्पत्तिरात्मरक्षणं चान्त- र्दारिषु, विपर्ययो वा बाह्येषु, अगम्येषु सर्वोच्छित्तिः । तदुभयं पानव्यसने । पानसम्पत्—संज्ञानाशः अनुन्मत्तस्योन्मत्तत्वमप्रेतस्य प्रेतत्वं कौपीनदर्शनं श्रुतप्रज्ञाप्राणवित्तमित्रहानिः सद्भिर्वियोगोऽनर्थ्यसंयोगस्तन्त्रीगीतनैपुण्येषु चार्थघ्नेषु प्रसङ्ग इति ।

(२) द्यूतमद्ययोद्यूंतमेकेषाम् । पणनिमित्तो जयः पराजयो वा, प्राणिषु निश्चेतनेषु वा पक्षद्वैधेन प्रकृतिकोपं करोति, विशेषतश्च सङ्घानां सङ्घ- धर्मिणां च राजकुलानां द्यूतनिमित्तो भेदः, तन्निमित्तो विनाश इति। असत्प्रग्रहः पापिष्ठतमो व्यसनानां तन्त्रदौर्बल्यादिति ।


तथा परिजनों का सत्कार करने की प्रवृत्ति बढ़ती है और अधिक कार्य करने से उत्पन्न थकावट दूर हो जाती है। इसलिए मद्यपान की अपेक्षा स्त्री-व्यसन अधिक दुःखदायी है।'

( १ ) किन्तु उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'यदि स्त्री-व्यसन अपनी पत्नियों तक ही सीमित है तब तो पुत्रों को पैदा कर उनके द्वारा आत्म-रक्षा होना, यह तो लाभ की ही बात है। यदि वह व्यसन गणिका आदि स्त्रियों में हो तो उससे उक्त लाभ नहीं होता और यदि वह अन्य कुलीन स्त्रियों तक असीमित हो जाय तो उससे राजा का सर्वनाश हो जाता है; इसीलिए बाह्य स्त्रियों और कुलीन स्त्रियों में आसक्ति होने के कारण ही स्त्री-व्यसन को सदोष माना गया है। किन्तु मद्यपान-व्यसन में न तो पुत्र आदि के पैदा होने की कोई सम्भावना है और उसमें सर्वनाश का ही अधिक खतरा रहता है। इसके अतिरिक्त मद्यपान करने से नीचे लिखे अनेक दोष पैदा हो जाते हैं : विवेक-बुद्धि नष्ट हो जाती है; अच्छा व्यक्ति भी उन्मत्त के समान हो जाता है; जीता हुआ भी मरे हुए के समान निश्चेष्ट हो जाता है; उसके गुप्तपापों का पता लग जाता है, उसका शास्त्रज्ञान तथा उसकी संस्कृत बुद्धि, बल, धन और मित्र आदि सभी वस्तुओं का विनाश हो जाता है, सज्जनों की संगति से वह दूर हो जाता है, सर्वदा अनर्थकारी व्यक्तियों से उसका संसर्ग हो जाता है, धन को नष्ट करने वाले गीत, वाद्य आदि में उसकी प्रवृत्ति हो जाती है।'

( २ ) कुछ आचार्यों का कहना है कि 'द्यूत और मद्य, इन दोनों व्यसनों में से द्यूत ही अधिक कष्टकर है, क्योंकि दाव लगाने पर जय तथा पराजय और प्राणी तथा अप्राणी विषयक द्यूतों में परस्पर विरुद्ध दो पक्षों का वैर हो जाने के कारण प्रकृतियों में कोप को पैदा कर देते है और विशेषतः एक साथ रहने वाले एक विचार-बुद्धि के राजकुलों में भी द्यूत के कारण परस्पर मतभेद हो जाता है, जिससे कि उनका विनाश हो जाता है। यह असत्प्रग्रह ( जिस व्यसन में दुर्जनों का सत्कार

५७२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवाँ अधिकरण

(१) असतां प्रग्रहः कामः कोपश्चावग्रहः सताम् ।
व्यसनं दोषबाहुल्यादत्यन्तमुभयं मतम् ॥
(२) तस्मात्कोपं च कामं च व्यसनारम्भमात्मवान् ।
परित्यजेन्मूलहरं वृद्धसेवी जितेन्द्रियः ॥

इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे पुरुषव्यसनवर्गो नाम तृतीयोऽध्यायः;
आदितोऽष्टाविंशतिशततमः ।

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किया जाता है ) अर्थात् मद्यपान व्यसन अन्य सभी व्यसनों में अत्यन्त पापिष्ठ है, क्योंकि उससे सारी राज्य-व्यवस्था दुर्बल हो जाती है ।

( १ ) काम और क्रोध, ये दोनों ही गाने-बजाने का व्यवसाय करने वाले दुर्जनों के सत्कार के हेतु तथा सज्जनों के तिरस्कार के हेतु होते हैं । दोषों की अधिकता के कारण काम-क्रोध को महान् व्यसन माना गया है ।

( २ ) इसलिए धैर्यशाली, वृद्धसेवी और जितेन्द्रिय राजा को चाहिए कि वह, प्राणों तक का नाश करने वाले तथा दुःखोत्पादक काम और क्रोध का सर्वथा परित्याग कर दे ।

व्यसनाधिकारिक नामक आठवें अधिकरण में पुरुषव्यसनवर्ग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥

—: ० :—

प्रकरण १३०-१३२ <br> अध्याय ४# पीडनवर्गः स्तम्भवर्गः कोशसङ्गवर्गश्च

(१) दैवपीडनमग्निरुदकं व्याधिर्दुर्भिक्षं मरक इति ।

(२) अग्न्युदकयोरग्निपीडनमप्रतिकार्यं सर्वदाहि च, शक्योपगमनं तार्यबाधमुदकपीडनमित्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । अग्निर्ग्राममर्धग्रामं वा दहति, उदकवेगस्तु ग्रामशतप्रवाहीति ।

(४) व्याधिदुर्भिक्षयोर्व्याधिः प्रेतव्याधितोपसृष्टपरिचारकव्यायामो-परोधेन कर्माण्युपहन्ति, दुर्भिक्षं पुनरकर्मोपघाति हिरण्यपशुकरदायि च इत्याचार्याः ।


पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग और कोषसंगवर्ग

( १ ) पीडनवर्ग : राष्ट्र पर आने वाली दैवी विपत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं : १. अग्नि २. जल ३. व्याधि ४. दुर्भिक्ष और ५. महामारी ।

( २ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'अग्नि और जल से उत्पन्न होने वाली आपत्तियों में से अग्निजन्य आपत्ति ही अधिक कष्टकर होती है, क्योंकि आग लग जाने पर उसका सरलता से कोई प्रतीकार नहीं किया जा सकता है और आग सब वस्तुओं को जलाकर भस्म कर देती है । किन्तु जल में यह बात नहीं है, क्योंकि शीतल होने से उसका स्पर्श सह्य होता और नौका आदि साधनों के द्वारा उससे अपना काम भी लिया जा सकता है ।'

( ३ ) उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है 'अग्नि किसी एक ही गाँव या आधे ही गाँव को जला सकती है किन्तु जल का प्रवाह एक साथ ही सैकड़ों गाँवों को बहा ले जाता है ।'

( ४ ) पूर्वाचार्यों का कहना है कि 'व्याधि और दुर्भिक्ष इन दोनों में से व्याधि ही अधिक कष्टप्रद होती है, क्योंकि उससे लोग मर जाते हैं, बीमार हो जाते हैं, कृषि आदि कार्य सब ठप हो जाते हैं । परन्तु दुर्भिक्ष के कारण ये सब बाधाएँ नहीं होने पाती । अन्न के अभाव में हिरण्य आदि के द्वारा सरकारी कर चुकाया जा सकता है ।'

५७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवाँ अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः—एकदेशपीडनो व्याधिः शक्यप्रतीकारश्च, सर्वदेश-पीडनं दुर्भिक्षं प्राणिनामजीवनायेति । (२) तेन मरको व्याख्यातः । (३) क्षुद्रकमुख्यक्षययोः क्षुद्रकक्षयः कर्मणामयोगक्षेमं करोति, मुख्य-क्षयः कर्मानुष्ठानोपरोधधर्मा इत्याचार्याः । (४) नेति कौटिल्यः । शक्यः क्षुद्रकक्षयः प्रतिसन्धातुं बाहुल्यात् क्षुद्र-काणां, न मुख्यक्षयः । सहस्रेषु हि मुख्यो भवत्येको न वा सत्त्वप्रज्ञाधिक्या-दाश्रयत्वात् क्षुद्रकाणामिति । (५) स्वचक्रपरचक्रयोः स्वचक्रमतिमात्राभ्यां दण्डकराभ्यां पीडयत्य-शक्यं च वारयितुं, परचक्रं तु शक्यं प्रतियोद्धुमपसारेण सन्धिना वा मोक्ष-यितुमित्याचार्याः । (६) नेति कौटिल्यः । स्वचक्रपीडनं प्रकृतिपुरुषमुख्योपग्रहविघाताभ्यां


( १ ) किन्तु कौटिल्य पूर्वाचार्यों के मत को युक्तिसंगत नहीं मानता है । वह कहता है कि 'व्याधि से किसी एक ही देश की हानि होती है और औषधि आदि के द्वारा उसका प्रतीकार भी किया जा सकता है । किन्तु दुर्भिक्ष के कारण सारा राष्ट्र पीडित हो जाता है और प्राणिमात्र का जीवन संकट में पड़ जाता है ।'

( २ ) इसी प्रकार महामारी के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।

( ३ ) प्राचीन आचार्यों का विचार है कि 'छोटे कर्मचारियों और प्रमुख कार्य-कर्ताओं में से छोटे कर्मचारियों का क्षय होना अधिक हानिकर है, क्योंकि कर्मचारियों के अभाव में कार्यों का योग-क्षेम सिद्ध नहीं होता है । किन्तु प्रमुख कार्यकर्ताओं का क्षय केवल कार्य की निगरानी में ही बाधा डाल सकता है ।

( ४ ) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'छोटे कर्मचारियों की कमी को दूसरी नियुक्तियां कर के पूरा किया जा सकता है, किन्तु प्रमुख कार्यकर्ता हजारों में से एक मिलता है या कभी-कभी वह भी नहीं मिलता, अपने बल-बुद्धि की अधिकता के के कारण छोटे कर्मचारियों का वह आश्रय होता है ।'

( ५ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि स्वचक्र ( अपने देश का विप्लव ) और परचक्र ( दूसरे देश द्वारा विप्लव ), इन दोनों में से स्वचक्र ही अधिक भयङ्कर होता है, क्योंकि वह जुर्माना एवं टैक्स आदि के द्वारा प्रजा को पीड़ित करता है और अपने ही देश का होने के कारण उसका प्रतीकार भी नहीं किया जा सकता है, किन्तु परचक्र का प्रतीकार, उस देश को छोड़ देने से भी किया जा सकता है या कुछ धन देकर भी सन्धि की जा सकती है ।'

( ६ ) किन्तु कौटिल्य का कथन है कि 'स्वचक्र की पीड़ा का प्रतीकार अमात्य

प्र० १३०-१३२ : अ० ४ ] पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग, कोषसंगवर्ग ५७५

शक्यते वारयितुम्, एकदेशं वा पीडयति । सर्वदेशपीडनं तु परचक्रं विलोपघातदाहविध्वंसनापवाहनैः पीडयतीति ।

(१) प्रकृतिराजविवादयोः प्रकृतिविवादः प्रकृतीनां भेदकः पराभियोगानावहति । राजविवादस्तु प्रकृतीनां द्विगुणभक्तवेतनपरिहारकरो भवतीत्याचार्याः ।

(२) नेति कौटिल्यः । शक्यः प्रकृतिविवादः प्रकृतिमुख्योपग्रहेण कलहस्थानापनयनेन वा वारयितुं, विवदमानास्तु प्रकृतयः परस्परसंघर्षेणोपकुर्वन्ति । राजविवादस्तु पीडनोच्छेदनाय प्रकृतीनां द्विगुणव्यायामसाध्य इति ।

(३) देशराजविहारयोर्देशविहारस्त्रैकाल्येन कर्मफलोपघातं करोति, राजविहारस्तु कारुशिल्पिकुशीलववाग्जीवनरूपाजीवावैदेहकोपकारं करोति इत्याचार्याः ।


आदि मुख्य व्यक्तियों को अनुकूल बनाकर या उनका खातमा कर देने पर भी किया जा सकता है । स्वचक्र से किसी एक धन-धान्य सम्पन्न देश को ही पीड़ा पहुँचती है । किन्तु परचक्र के द्वारा तो लूटने, मारने, आग लगाने, अन्य प्रकार से पीड़ा पहुँचाने और अपने देश से निकाल देने आदि द्वारा अनेक प्रकार की पीड़ाएँ सारे राष्ट्र को उठानी पड़ती है ।'

( १ ) आचार्यों का मत है कि 'प्रकृतिविवाद और राजविवाद, इन दोनों में से प्रकृति-विवाद ही अधिक हानिकर होता है, क्योंकि वह अमात्य आदि में परस्पर फूट डालने वाला और शत्रु के कार्यों को सहारा देने वाला होता है । परन्तु राज-विवाद के कारण प्रकृतियों का दुगुना वेतन, भत्ता बढ़ जाता है और प्रजा के सारे कर माफ कर दिये जाते हैं ।'

( २ ) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'अमात्य आदि मुख्य प्रकृतियों को अनुकूल बनाकर और कलह के कारणों को मिटा देने से प्रकृति-विवाद को शान्त किया जा सकता है । दूसरी बात यह भी है कि परस्पर विरुद्ध प्रकृति जन स्पर्धावश राजा का उपकार ही करते हैं । किन्तु प्रजा की सारी शक्ति और सम्पूर्ण समृद्धि राजविवाद में नष्ट हो जाती है । उसको शान्त करने के लिए दुगुना यत्न करना पड़ता है ।'

( ३ ) प्राचीन आचार्यों का कहना है कि 'देश-विहार ( हँसी-खेल में फँसा हुआ देश ) और राजविहार ( हँसी-खेल में फँसा हुआ राजा ), इन दोनों में से देशविहार अधिक हानिकर होता है; क्योंकि प्रजाजनों के खेल-कूद में फँसे रहने के कारण कृषि-कार्यों के क्रम में विघ्न हो जाता है । किन्तु राज-विहार से संबद्ध बढ़ई, सुनार, गाने वाले, भाट, वेश्या और व्यापारी आदि व्यक्तियों का बड़ा भला होता है ।'

५७६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । देशविहारः कर्मश्रमवधार्थमल्पं भक्षयति, भक्षयित्वा च भूयः कर्मसु योगं गच्छति । राजविहारस्तु स्वयं वल्लभैश्च स्वयंग्राहप्रणयपण्यागारकार्योपग्रहैः पीडयति इति । (२) सुभगाकुमारयोः कुमारः स्वयं वल्लभैश्च स्वयंग्राहप्रणयपण्यागारकार्योपग्रहैः पीडयति । सुभगा विलासोपभोगेनेत्याचार्याः । (३) नेति कौटिल्यः । शक्यः कुमारो मंत्रिपुरोहिताभ्यां वारयितुं न सुभगा, बालिश्यादनर्थजनसंयोगाच्चेति । (४) श्रेणीमुख्ययोः श्रेणी बाहुल्यादनवग्रहा स्तेयसाहसाभ्यां पीडयति, मुख्यः कार्यानुग्रहविघाताभ्यामित्याचार्याः ।

( १ ) किन्तु उक्त मत के विरोध में कौटिल्य का कहना है कि 'प्रजाजनों का मनोविनोद थोड़े ही व्यय में हो जाता है और वह मनोविनोद उन्हें ताजगी देकर दुगुने उत्साह से फिर काम करने में जुटा देता है । किन्तु राजविहार में तो स्वयं राजा के द्वारा तथा राजा के प्रिय व्यक्तियों के द्वारा जनपद की इच्छा के विरुद्ध धन की लूट-मार की जाती है । पण्यशाला से तथा अतिरिक्त कार्यों को पूरा करने के लिए रिश्वत आदि से धन लेकर प्रजा को पीड़ित किया जाता है ।'

( २ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'रानी-विहार और युवराज-विहार, इन दोनों में से युवराज-विहार अधिक कष्टकर होता है; क्योंकि युवराज के द्वारा तथा उसके खुशामदी व्यक्तियों के द्वारा जनपद की इच्छा के विरुद्ध धन लेकर पण्यशाला तथा अन्य कार्यों को पूरा करने के लिए रिश्वत लेकर प्रजा को पीड़ित किया जाता है । किन्तु विलास-प्रिय रानी केवल भोग-विलास की सामग्री द्वारा ही प्रजा को पीड़ित करती है ।'

( ३ ) किन्तु कौटिल्य उक्त मत से सहमत नहीं है, उनका कहना है कि 'युवराज को इस प्रकार के अनर्थकारी कार्यों से अमात्य आदि रोक सकते हैं । परन्तु रानियों के सम्बन्ध में यह बात नहीं हो सकती है; क्योंकि उनमें प्रायः मूर्खता अधिक होती है और फिर अनर्थकारी नीच पुरुषों का संसर्ग होने के कारण उन्हें समझाना बहुत कठिन होता है ।'

( ४ ) प्राचीन आचार्यों के मतानुसार 'श्रेणी ( आयुधजीवी तथा कृषिजीवी व्यक्तियों का संघ ) और मुख्य ( प्रधान कर्मचारियों का समूह ), इन दोनों में से श्रेणी पुरुष ही अधिककष्टकर है; क्योंकि वही चोरी डाका आदि से प्रजा को कष्ट पहुँचाते हैं और उनकी संख्या इतनी अधिक होती है कि उन्हें रोका भी नहीं जा सकता है । किन्तु मुख्य पुरुष केवल रिश्वत के मिलने न मिलने के कारण ही कार्यों बनाने-बिगाड़ने के द्वारा प्रजा को तङ्ग करते हैं ।'

प्र० १३०-१३२ : अ० ४ ] पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग, कोषसंगवर्ग ५७७

(१) नेति कौटिल्यः । सुव्यावर्त्या श्रेणी समानशीलव्यसनत्वात्, श्रेणीमुख्यैकदेशोपग्रहेण वा । स्तम्भयुक्तो मुख्यः परप्राणद्रव्योपघाताभ्यां पीडयतीति । (२) सन्निधातृसमाहर्त्रोः सन्निधाता कृतविदूषणात्ययाभ्यां पीडयति । समाहर्ता करणाधिष्ठितः प्रदिष्टफलोपभोगी भवतीत्याचार्याः । (३) नेति कौटिल्यः । सन्निधाता कृतावस्थमन्यैः कोशप्रवेश्यं प्रतिगृह्णाति । समाहर्ता तु पूर्वमर्थमात्मनः कृत्वा पश्चाद् राजार्थं करोति प्रणाशयति वा, परस्वादाने च स्वप्रत्ययश्चरतीति । (४) अन्तपालवैदेहकयोरन्तपालश्चोरप्रसंगदेयात्यादानाभ्यां वणिक्पथं पीडयति । वैदेहकास्तु पण्यप्रतिपण्यानुग्रहैः प्रसाधयन्ति । इत्याचार्याः । (५) नेति कौटिल्यः । अन्तपालः पण्यसम्पातानुग्रहेण वर्तयति । वैदेह-


(१) परन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'श्रेणी पुरुषों को चोरी, डाका आदि से सहज ही में रोका जा सकता है; क्योंकि जहाँ वे चोरी-डाका करते हैं वे लोग भी उन्हीं के स्वभाव एवं व्यवसाय के होते हैं। उनके मुखिया को वश में करके भी उनको चोरी आदि से रोका जा सकता है। परन्तु राजकीय मुख्य पुरुष बड़े अभिमानी होते हैं और वे प्राण तथा धन का अपहरण करके दूसरों को बहुत कष्ट पहुँचाते हैं।'

(२) प्राचीन आचार्य, सन्निधाता और समाहर्त्ता, दोनों में से सन्निधाता को अधिक कष्टकर समझते हैं; क्योंकि वह कार्य बिगाड़कर और प्रजा से अनुचित कर वसूल कर प्रजा को तंग करता है। परन्तु समाहर्त्ता अपने ठीक हिसाब से कार्य करता हुआ नियमित नौकरी को भोगने वाला होता है।

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना कुछ और ही है। उनका कथन है कि 'सन्निधाता तो दूसरे कर्मचारियों द्वारा वसूल किए हुए धन को एकत्र कर कोष में जमा कर देता है। किन्तु समाहर्त्ता पहिले अपनी रिश्वत लेकर फिर राजकर को वसूल करता है। अथवा उसमें से भी कुछ चुरा लेता है और स्वेच्छया सब कुछ करता है।'

(४) प्राचीन आचार्यों के मत से 'अन्तपाल और वैदेहक, इन दोनों में से अन्तपाल ही अधिक कष्टप्रद है; क्योंकि वह चोरों द्वारा राहगीरों को लुटवाता है; रास्ते का टैक्स मनमाना वसूल करता है; और व्यापारिक मार्गों पर चलने वाले पथिकों को अधिक कष्ट पहुँचाता है। परन्तु वैदेहक क्रय-विक्रय पर अधिक लाभ पहुंचा कर देश को व्यापारिक भागों को उन्नत बनाता है।'

(५) इसके विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'अन्तपाल एक साथ लाये

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