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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

अथ योनिव्यापत्तिनिदानम् ।

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भाषाटीकासमेत । ( ३४१ ) अथ योनिव्यापत्तिनिदानम् । विंशतिर्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोगसंग्रहे । मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च ॥ १ ॥ जायन्ते बीजदोषाच्च दैवाच्च शृणु ताः पृथक् । रोगसंग्रहमें योनिके बीस रोग हैं वह मिथ्या आहार और मिथ्या विहार करके तथा दुष्ट आर्त्तवसे, बीजदोषसे और दैवकी इच्छासे स्त्रियोंके होते हैं, उनके लक्षण पृथक् पृथक् कहताहूं सुनो ॥ सा फेनिलमुदावर्त्ता रजः कृच्छ्रेण मुञ्चति ॥ २ ॥ वन्ध्यां नष्टार्तवां विद्याद्विप्लुतां नित्यवेदनाम् । परिप्लुतायां भवति ग्राम्यधर्मेण रुग्भृशम् ॥ ३ ॥ वातला कर्कशा स्तब्धा शूलनिस्तोदपीडिता । चतसृष्वपि चाद्यासु भवन्त्यनिलवेदनाः ॥ ४ ॥ जिस योनिसे झाग मिला रुधिर बडे कष्टसे बहे उसको उदावर्त्ता योनि कहते हैं और जिसका आर्त्तव नष्ट हो उसको वंध्या कहते हैं, जिसके निरंतर पीडा हो उसको विप्लुता कहते हैं, जिसके मैथुन करनेमें अत्यन्त पीडा हो उसको परिप्लुता कहते हैं, जो योनि कठोर स्तब्ध होकर शूलतोदयुक्त होवे उसको वातला कहते हैं । स्वस्व- लक्षणसंयुक्ता पित्तला श्लेष्मला योनि भी जाननी चाहिये और पहले जो चार योनि (उदावर्त्ता, वंध्या, विप्लुता, परिप्लुता) कही हैं इनमें वातकी पीडा होती है और वातलामें वातकी पीडा विशेष होती है ॥ सदाहं क्षीयते रक्तं यस्याः सा लोहितक्षया । सवातमुद्विरेद्बीजं वामिनी रजसान्वितम् ॥ ५ ॥ प्रस्रंसिनी भ्रंशते तु क्षोभिता दुष्प्रजायिनी । स्थितं स्थितं हन्ति गर्भं पुत्रघ्नी रक्तसंक्षयात् ॥ ६ ॥ अत्यर्थं पित्तला योनिर्दाहपाकज्वरान्विता । चतसृष्वपि चाद्यासु पित्तलिङ्गोच्छ्रयो भवेत् ॥ ७ ॥

( ३४२ ) माधवनिदान ।

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( ३४२ ) माधवनिदान । जिस योनिसे दाहयुक्त रुधिर बहे उसको लोहितक्षया कहते हैं, जिसमें से रजोयुक्त शुक्र वायु बराबर बहे उसको वामिनी कहते हैं। जो योनि स्थानभ्रष्ट होय उसको प्रस्रंसिनी कहते हैं, जिसमें अंग बाहर निकल आवे और यह विमर्दित करनेसे प्रसव योग नहीं होय हैं, जिस योनिमें रुधिरक्षय होनेसे गर्भ न रहे उसको पुत्रघ्नी कहते हैं, जो योनि अत्यन्त दाह पाक ( पकना ) और ज्वर इन लक्षणों करके संयुक्त होय उसको पित्तला कहते हैं, इनमें पहली जो चार ( रक्तक्षया वामिनी प्रस्रंसिनी और पुत्रघ्नी ) इनमें पित्तके लक्षण अधिक होते हैं और पित्तलामें पित्तके विशेष लक्षण होते हैं और पित्तलामें जो ज्वर, दाह, पाक कहे हैं सो उपलक्षमात्र हैं अर्थात् इनमें नील पीला सफेद आर्तव बहता है यह जानना सो तन्त्रान्तरोंमें लिखा है॥ १ व्यापल्लवणकट्वम्लक्षारार्थैः पित्तजा भवेत् । दाहपाकज्वरोष्णार्तिनीलपीतसितार्तवा ॥ यवनशास्त्रानुसारेण स्त्रीरोगाः। रिहमगर्भाऽऽशयस्तस्य हारं सुयुल्हिभाजतः । वारिदस्तवयाविस्वा हेतवः प्रतिबन्धकाः॥१॥ तत्रापि द्विविधः सादे माहीति परिकीर्तितः । तत्र योगं प्रतीकारं तत्र वैद्यः समाचरेत् ॥ २ ॥ गर्भीरहमकोष्ठस्था सौदी संगमवर्तिनी । गिल्हत्सौदत्तैर्देहज हिर्कत् चापि भृशं भवेत् ॥ ३ ॥ सभवैरि बकतूदेर आमदम् हैज एव च । दाहत्मविश्च शैत्यत्वं लिंगनिर्देश इत्यसौ ॥ ४ ॥ यकसत्संभवेमुष्मिन्वरांगे शोषणं रजः । सूक्ष्मं प्रवर्तते शीतं परं सौदाप्रकोपजम् ॥ ५ ॥ रतूवत्प्रभवेत्विस्मन्मैलानेरिहमुद्भवैत् । हेइद्दारहेजनामैर्यगर्भस्थितिविघातका ॥ ६ ॥ कदाचिद्दैवयोगेन सम्भवेद्गर्भलक्षणम् । मासत्रयोत्तरं पातो ऋतूसंगतो ध्रुवम् ॥ ७ ॥ मनीतेनाशयनव विशेषेत्प्येन संयुता । सुरतावसरे तत्र वेदना विन्नकृद्भवेत् ॥ ८ ॥ सम्भोगानन्तरं नारी वेगादुत्तिष्ठते द्रुतम् । रिहम्भुखान् मनीयातो बहिरेवम्भवोत्पुनः ॥ ९ ॥ अकरत् वंध्यत्वमाख्यातं मिथुनः स्याद्विशग्वरैः । परीक्षणीयं सद्गीत्या प्रतिकार्यं यथायथम्॥१०॥ मनो हैज क्षिपदप्सु भिन्नं भिन्नं च संतरेत् । दूषितं तद्विजानीयात् तहन् शीननदोषलम्॥११॥ रिहवदूपममयो दोषः प्रदरारूपां दृढां रुजम् । औषधीकीचवदनी द्विविधात्रिविधातयथम् ॥१२॥ कस्याश्चिदंगनायास्तु प्रसवे संकटं भवेत् । अष्टमान्मासतस्तस्यै क्षीरं पातुं दिशोद्भिषक् ॥ १३ ॥ परिपाकाऽनुरूपं तद्रजसोद्रेककृन्न च । तद्विकृत्यारिहं दर्द भवेदुष्णेन वारिणा ॥ १४ ॥ जरायुसुयुकबंधेन मृतित्र्भ्रूणस्य योदरे । जमीनमैत तत्प्रोक्तं शूल्यं तुल्यं विघातकृत् ॥ १५ ॥ अचलं जडवत्तिष्ठेत्रार्यसाक्षयकारकम् । इर्वाजस्तस्य कर्त्तव्यो वनिताशर्मणे शनैः ॥ १६ ॥ हिमहस्तपदं तस्या शीतबाया भवेद्भृशम् । मन्दाग्निबलहानिश्चानुत्साहः श्वाससंभवः ॥ १७ ॥ व्यथा गर्भाशयस्था तु मैथुनाऽतिशयात्तथा । भवेद्रजोविकाराश्च प्रसूतेः प्रागनन्तरम् ॥ १८ ॥ दुष्टोपारदुखारोस्याऽऽमभ्रूणं पातयत्यधः । समग्रविग्रहा भावमकालेऽपि च कल्पयेत् ॥ १९ ॥ हूतवा सूतममुख्यं इस्तिकांत्रान्तिरेव च । अबलौ द्वौ हृदाऽऽभावो भवेद्गर्भसमाकृतिः ॥२०॥ प्रदरोग्यः समाख्यातोऽसमयेर्वाक्स्रवमासतः । हजजारी शवद्रक्तः पीतवर्णै विमिश्रितम् ॥ २१ ॥ अन्तर्मुखो व्रणो घोरः सतांगिरिहमत्स्र्मतः। कर्ककारः कठोरः स्याच्छोथतः सचिरंतनात् ॥२२॥ अन्येऽप्यत्र विकारस्य तन्केयाखिन्नकोपजत् । तकियत्चापि तबई विधेया विविधाऽगदैः ॥२३॥ इति ( एते श्लोकाः शुद्धा वा अशुद्धा वेति न शक्ता विवेक्तुं वयम् । )

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भाषाटीकासमेत । ( ३४३ ) अत्यानन्दा न सन्तोषं ग्राम्यधर्मेण गच्छति । कर्णिन्‍यां कर्णिकायोनौ श्लेष्मासृग्भ्यां प्रजायते ॥ ८ ॥ मैथुनाचरणात्पूर्वं पुरुषादतिरिच्यते । बहुशश्चातिचरणा तयोर्बीजं न विन्दति ॥ ९ ॥ श्लेष्मला पिच्छिला योनिः कण्डूयुक्ताऽतिशीतला । चतसृष्वपि चाद्यासु श्लेष्मलिङ्गोच्छ्रयो भवेत् ॥ १० ॥ जो योनि अति मैथुनसे भी सन्तोषको प्राप्त न होवे, उसको अत्यानन्दा कहते हैं, जिसमें कफ रुधिर करके कर्णिका ( कमलके भीतर जो होता है ऐसा मांसकन्द ) हो, उसको कर्णिणी कहते हैं, जो योनि थोडे मैथुनसे पहले स्रवे उसको चरणा कहते हैं अर्थात् जबतक पुरुषको सुख नहीं हो उसके पहलेही द्रवीभूत होकर वीर्यका ग्रहण नहीं करे, जो योनि बहुवार मैथुन करनेसे पुरुषके पीछे द्रवे ( छूटे ) उसको अति- चरणा योनि कहते हैं यह कफजनित हैं ॥ स्राव और पातके लक्षण । आचतुर्थात्ततो मासात्प्रस्रवेद्गर्भविद्रवः । ततः स्थिरशरीरः स्यात्पातः पञ्चमषष्ठयोः ॥ ११ ॥ पांच मास पर्यन्त गर्भ पतली अवस्थामें होनेसे जो स्रवे उसे स्राव कहते हैं और चौथे महीनेसे लेकर पांचवें छठे महीनेपर स्राव और शरीर बननेपर निकले उसे पात कहते हैं ॥ गर्भ अकालमें कैसे गिरे ? इस विषयमें निदानपूर्वक दृष्टान्त । गर्भोऽभिघातविषमाशनपीडनाद्यैः पक्वं द्रुमादिव फलं पतति क्षणेन । अभिघात ( चोट ), विषमाशन ( विषमभोजन ), पीडनादिक इन कारणोंसे जैसे पकाहुआ फल वृक्षसे चोट लगनेसे क्षणभरमें गिरजाता है इसी प्रकार गर्भ अभि- घातादि कारणोंसे गिरता है ॥ प्रसूत होते समय मूढगर्भ कैसे होता है ? उसके लक्षण । मूढःकरोति पवनःखलु मूढगर्भं शूलं च योनिजठरादिषु मूत्रसंगम् १२ मूढ ( कुंठितगति ) वायु गर्भको मूढ ( टेढा ) कर दे और योनि तथा पेट इनमें शूल तथा मूत्रोत्संग उत्पन्न करे ( धीरे धीरे पीडासहित मूत निकले ) ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १४४ ) माधवनिदान ।

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( १४४ ) माधवनिदान । मूढगर्भकी आठ प्रकारकी गति । भुग्नोऽनिलेन विगुणेन ततः स गर्भः संख्यामतीत्य बहुधा समुपैति योनिम् । द्वारं निरुध्य शिरसा जठरेण कश्चित्कश्चि- च्छरीरपरिवर्तितकुब्जदेहः ॥ १३ ॥ एकेन कश्चिदपरस्तु भुजद्वयेन तिर्यग्गतो भवति कश्चिदवाङ्मुखोऽन्यः । पार्श्व- प्रवृत्तगतिरेति तथैव कश्चिदित्यष्टधा गतिरियं ह्यपरा चतुर्धा ॥ १४ ॥ संकीलकः प्रतिखुरः परिघोऽथ बीजस्तेषूर्ध्वबाहु- चरणैः शिरसा च योनिम् । सङ्गी च यो भवति कीलकव- त्सकीलो दृश्यैः खुरैः प्रतिखुरः स हि कायसंगी ॥ १५ ॥ गच्छेद्भुजद्वयशिराः स च बीजकाख्यो योनौ स्थितः स परिघः परिघेण तुल्यः ॥ १६ ॥ विगुण वायुसे गर्भ विपरीत ( टेढा ) होकर अनेक प्रकार करके योनिके द्वारमें आकर अडजाय है, उसकी आठ प्रकारकी संज्ञा है, सो इस प्रकार है-१ कोई गर्भ मस्तकसे योनिके द्वारको बन्द कर देय है, २ कोई पेटसे योनिके मार्गको रोक देय, ३ कोई शरीरके विपरीतपनेसे योनिके मार्गको रोक दे, ४ कोई एक हाथसे योनिके मार्गको रोक दे, ५ कोई मूढगर्भ दोनों हाथोंको बाहर निकालकर योनिके द्वारको रोक दे, ६ कोई गर्भ तिरछा होकर योनिके मार्ग रोक दे, ७ कोई गर्भ मन्था- नाडीके मुडनेसे नीचेको मुख होय, वह योनिके द्वारको रोक दे, ८ उसी प्रकार कोई पार्श्वभंग ( पसवाडेका भंग ) होनेसे योनिके द्वारको रोक दे, इस प्रकार मूढगर्भके आठ प्रकारकी गति है। दूसरी चार प्रकारकी गति और होती है, उसको कहते हैं-१ संकील, २ प्रतिखुर, ३ परिघ, ४ बीज, इनमें जो गर्भ हाथ पैर ऊपरको कर मस्तकसे योनिको कीलके समान रोक दे उसको संकीलक कहते हैं, जिस गर्भके हाथ पैर खुरके सदृश बाहर निकल आवें और शरीर योनिके भीतर अटका रहे उसको प्रतिखुर कहते हैं, जो गर्भ दोनों हाथ और मस्तक आगे करके अटक जाय उसको बीजक कहते हैं और परिघ ( आगड ) के समान योनिमें गर्भ अटक जाय उसको परिघ कहते हैं॥ असाध्य मूढगर्भ और गर्भिणीके लक्षण । अपविद्धशिरा या तु शीतांगी निरपत्रपा । नीलोद्धतशिरा हन्ति सा गर्भं स च तां तथा ॥ १७ ॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३४५ ) जिस गर्भिणीका मस्तक नीचेको हो जाय, देह शीतल होय तथा लज्जा जाती रहे और जिसकी कोखमें हरी नीली शिरा (नस) उठ खडी होयँ तो वह गर्भिणी उस गर्भको और गर्भ उस गर्भिणीको अन्योन्य नाश करते हैं ॥ मृतकगर्भके लक्षण । गर्भास्पन्दनमाधीनां प्रणाशः श्यावपाण्डुता । भवेदुच्छ्वासपूतित्वं शूनतांतर्मृते शिशौ ॥ १८ ॥ गर्भ हले चले नहीं, प्रसव वेदना (पीडा) बन्द होजाय, देह हरी नीली होय और जिसकी श्वासमें दुर्गंध आवे और पेटके भीतर सूजन होय अर्थात् पेटमें आंतोंके फूलनेसे पेट सूज जाय ये गर्भमें बालक मरजाय उसके लक्षण हैं ॥ गर्भमरण हेतु । मानसागन्तुभिर्मातुरुपतापैः प्रपीडितः । गर्भो व्यापद्यते कुक्षौ व्याधिभिश्च प्रपीडितः ॥ १९ ॥ माताके मानसिक तथा आगन्तुक दुःखसे अथवा रोगोंसे गर्भको पीडा हो वह बालक गर्भाशयमें मरजाय ॥ गर्भिणीके दूसरे असाध्य लक्षण । योनिसंवररणं संगः कुक्षौ मक्कल्लमेव च । हन्युः स्त्रियं गूढगर्भो यथोक्ताश्चाप्युपद्रवाः ॥ २० ॥ वायुके योगसे योनिका संकोच, गर्भका अटकना और मक्कल्लशूल (वातरक्तकी पीडा) तथा आक्षेपक, खांसी, श्वासादिक उपद्रव होनेसे वह गर्भिणी बचे नहीं अथवा योनिसंवररणनाम रोग ग्रन्थान्तरोंमें लिखा है सो होय ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां योनिव्यापत्तिनिदानं समाप्तम् ॥ १ वातलान्यन्नपानानि ग्राम्यधर्मं प्रजागरम् । अत्यर्थं सेवमानायां गर्भिण्यां योनिमार्गजः ॥ मातरिश्वा प्रकुपितो योनिद्वारस्य संवृतिम् । कुरुते रुद्धमार्गत्वात्पुनरंतर्गतोऽनिलः॥ निरुणद्ध्या- शयद्वारं पीडयन् गर्भसंस्थितम् । निरुद्धवदनोच्छ्वासो गर्भश्चाशु विपद्यते ॥ विपन्नशूनसर्वाङ्गः सर्वाण्यवयवानि च । उच्छ्वासविरुद्धहृदयां नाशयत्याशु गर्भिणीम् ॥ योनिसंवररणं नाम व्याधि- मेनं प्रचक्षते । अन्तकप्रतिमं घोरं नारभेत चिकित्सितम् ॥ इति ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १४६ ) माधवनिदान ।

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( १४६ ) माधवनिदान । अथ सूतिकारोगनिदानम् । अंगमर्दो ज्वरः कंपः पिपासा गुरुगात्रता । शोथः शूलातिसारौ च सूतिकारोगलक्षणम् ॥ १ ॥ अंगोंका टूटना, ज्वर हो, कंप, प्यास, अंगोंका भारी होना, सूजन तथा शूल और अतिसार ये सूतिकारोगके लक्षण होते हैं ॥ प्रसूतिरोगकी उत्पत्ति । मिथ्योपचारात्संक्लेशाद्विषमाजीर्णभोजनात् । सूतिकायाश्च ये रोगा जायन्ते दारुणास्तु ते ॥ २ ॥ जिस स्त्रीके बालक प्रगट हो चुका हो ऐसी स्त्रीके मिथ्या उपचार करनेसे अथवा संक्लेश (दोषजनक अन्नपानका सेवन अथवा अत्यन्त कोप) अथवा विषमाशन अजीर्ण भोजनादिक करनेसे प्रसूतिरोग होता है वह घोर दुःखदायक है ॥ असाध्य लक्षण । ज्वरातिसारशोथाश्च शूलानाहबलक्षयाः । तन्द्रारुचिप्रसेकाद्याः कफवातामयोद्भवाः ॥ ३ ॥ कृच्छ्रसाध्या हि ते रोगाः क्षीणमांसबलाग्नितः । ते सर्वे सूतिकानाम्ना रोगास्ते चाप्युपद्रवाः ॥ ४ ॥ ज्वर, अतिसार, सूजन, शूल, अफरा और बलक्षय तथा कफ, वातजन्य रोगसे उत्पन्न होनेवाले तन्द्रा, अन्नद्वेष और मुखसे पानीका गिरना इत्यादि विकार, अश- क्तता, अग्नि मंद होनेसे कृच्छ्रसाध्य होता है, इन सब ज्वरादिकोंको प्रसूतिरोग कहते हैं। इन सबमें एक रोग प्रधान होता है बाकीके उपद्रवरूप कहलाते हैं ॥ इति श्रीपंडित दत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां सूतिकारोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ स्तनरोगनिदानम् ।

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भाषाटीकासमेत। (३४७) अथ स्तनरोगनिदानम् । ───◇❁◇─── सक्षीरौ वाप्यदुग्धौ वा दोषः प्राप्य स्तनौ स्त्रियाः । प्रद्रूष्य मांसरुधिरे स्तनरोगाय कल्पते ॥ १ ॥ पञ्चानामपि तेषां हि रक्तजं विद्रधिं विना । लक्षणानि समानानि बाह्यविद्रधिलक्षणैः ॥ २ ॥ वातादि दोष गर्भिणी अथवा प्रसूता स्त्रीके सदुग्ध अथवा अदुग्ध स्तनोंमें प्राप्त हो मांस रक्तको दुष्ट करके स्तनरोग उत्पन्न करे। स्तनरोग वात, पित्त, कफ, सन्निपात, आगंतुजके भेदसे पांच प्रकारके हैं। इन पांचोंके लक्षण रक्तविद्रधिको त्याग कर बाह्यविद्रधिके समान होते हैं, सो विद्रधिनिदान जो पीछे कह आये हैं उससे जानलेना चाहिये ॥ स्तन्य (दूध) के रोग । गुरुभिर्विविधैरन्नैर्दुष्टैर्दोषैः प्रद्रूषितम् । क्षीरं धात्र्याः कुमारस्य नानारोगाय कल्पते ॥ ३ ॥ गुर्वाधिक अनेक प्रकारके अन्नसे दोष (वात पित्त कफ) दुष्ट होकर माताके दूधका नाश करे, उस दुष्टदूधसे बालकके नाना प्रकारके रोग होते हैं ॥ वातादिकसे दूषित दूधके लक्षण । कषायं सलिलप्लावि स्तन्यं मारुतदूषितम् । कट्वम्ललवणं पीतराजिमत्पित्तसंज्ञितम् ॥ ४ ॥ कफदुष्टं घनं तोये निमज्जति सुपिच्छिलम् । द्विलिङ्गं द्वंद्वजं विद्यात्सर्वलिङ्गं त्रिदोषजम् ॥ ५ ॥ जो दुग्ध कसैला अथवा पानीके ऊपर तैरनेवाला होय, उसको वातदूषित जानना तथा जो कडुआ, खट्टा और खारी होकर जिसमें पीली रेखासी प्रतीत होवे उसको पित्तदूषित जानना और जो दूध सघन, चिकनासा होवे और पानीमें डालनेसे नीचेको बैठ जाय, उसको कफसे दुष्ट जानना चाहिये । दो दोषोंकें लक्षण जिसमें मिले उसे द्वंद्वज जाने और जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलें उसे त्रिदोषदूषित जाने ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३४८ ) माधवनिदान ।

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( ३४८ ) माधवनिदान । शुद्धदूधके लक्षण । अदुष्टं चाम्बुनि क्षिप्तमेकीभवति पाण्डुरम् । मधुरं चाविवर्णं च तत्प्रसन्नं विनिर्दिशेत् ॥ ६ ॥ जो दूध पानीमें डालनेसे मिलजाय तथा जो दूध कुछ पीला हो और मीठा होकर बेरंगका न हो उसको शुद्ध जानना ॥ अब कहते हैं कि, स्त्रियोंके दूध दीखे नहीं परंतु होता है, क्योंकि बालक पिया करते हैं, इस बातको शुक्र (वीर्य) का दृष्टान्त देकर कहते हैं- विशस्तेष्वपि गात्रेषु यथा शुक्लं न दृश्यते । सर्वदेहाश्रितत्वाच्च शुक्रलक्षणमुच्यते ॥ ७॥ जैसे सर्व पुरुषोंके देहमें व्याप्त भी है परन्तु देहके काटनेसे भी शुक्र दीखता नहीं है, उसी प्रकार सब स्त्रियोंके देहाश्रित जो दुग्ध है सो भी नहीं दीखता है परन्तु निःसन्देह है सही ॥ “ तदेव चेष्टयुवतेर्दर्शनात्स्मरणादपि । शब्दसंश्रवणात्स्पर्शात्सं हर्षाच्च प्रवर्त्तते ॥ ८ ॥ सुप्रसन्नं मनस्त्वेवं हर्षणे हेतुरुच्यते । आहाररसयोनित्वादेवं स्तन्यमपि स्त्रियाः ॥ ९ ॥ तदेवाऽपत्यसंस्पर्शाद्दर्शनात्स्मरणादपि । ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत्सं प्रवर्त्तते ॥ स्नेहो निरन्तरस्तत्र प्रसवे हेतुरुच्यते ॥ १० ॥ वही शुक्र इष्ट (प्रिय) स्त्रीके देखनेसे, उसका स्मरण (याद) करनेसे उसकी वाणी सुननेसे, स्पर्श (आलिंगन) से भया जो आनन्द उस आनन्दसे प्राप्त होय है, इस जगह मनका प्रसन्न होना यही आनन्दका कारण है । शुक्रकी उत्पत्ति आहा- रसे होती है, सो हेतु स्तन्य (दूध) का जानना, अर्थात् दूध भी जब स्त्री अपने बालकका स्पर्श करे, देखे, उसका स्मरण करे तथा बालकको गोदमें लेनेसे दूध शुक्रके सदृश बढता है, इस जगहभी दूधके उतरनेमें स्नेह (प्यार) ही कारण है'’ यह श्लोक संगृहीत है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां स्तनरोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ बालरोगनिदानम् ।

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भाषाटीकासमेत । ( ३४९ ) अथ बालरोगनिदानम् । ━०००१५००━ त्रिविधः कथितो बालः क्षीरान्नोभयवर्तनः । स्वास्थ्यं ताभ्यामदुष्टाभ्यां दुष्टाभ्यां रोगसंभवः ॥ १ ॥ दूध पीनेवाला और अन्न खानेवाला और दूध अन्न दोनों खानेवाला ऐसे तीन प्रकारके बालक होते हैं, यदि वह अन्न और दूध दुष्ट न होयँ तो बालक निरोग रहे और ये दोनों दुष्ट होयँ तो अनेक रोग होते हैं । वातदूषित दूधके रोग । वातदुष्टं शिशुः स्तन्यं पिबन् वातगदातुरः । क्षामस्वरः कृशांगः स्याद्रुद्धविण्मूत्रमारुतः ॥ २ ॥ जो बालक वातदूषित दूधको पीता है उसके वातके रोग होते हैं, उसका शब्द क्षीण होजाय, शरीर कृश होय और मलमूत्र तथा अधोवायु नहीं उतरे ॥ पित्तदूषित दूधके रोग । स्विन्नो भिन्नमलो बालः कामलापित्तरोगवान् । तृष्णालुरुष्णसर्वांगः पित्तदुष्टं पयः पिबन् ॥ ३ ॥ जो बालक पित्तदूषित दूधको पीवे उसके पसीना आवे, मल पतला हो जाय, कामलारोग होय तथा पित्तके और भी रोग होयँ, प्यासका लगना, सर्वांगमें दाह आदि अनेक रोग होयँ ॥ कफदूषितदूधके रोग । कफदुष्टं पिबन् क्षीरं लालालुः श्लेष्मरोगवान् । निद्रार्दितो जडः शूनः शुक्लाक्षश्छर्दनः शिशुः ॥ ४ ॥ जो बालक कफदूषित दूधको पीवे उसके मुखसे लार बहुत गिरे तथा कफके रोग होयँ, निद्रा आवे, अंग भारी होय, सूजन होय, वमन होय, खुजली चले ॥ बालकोंकी अन्तर्गत पीडा जाननेका उपाय । शिशोस्तीव्रामतीव्रां च रोदनाल्लक्षयेद्रुजम् । स यं स्पृशेद्भृशं देशं यत्र च स्पर्शनाक्षमः ॥ ५ ॥ तत्र विद्याद्रुजं मूर्ध्नि रुजं चाक्षिनिमीलनात् । कोष्ठे विबंधवमथुस्तनदंशांत्रकूजनैः ॥ ६ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३५० ) माधवनिदान ।

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( ३५० ) माधवनिदान । आध्मानपृष्ठनमनजठरोन्नमनैरपि । बस्तौ गुह्ये च विण्मूत्रसङ्गत्रासदिगीक्षणैः ॥ स्रोतांस्यंगानि संधींश्च पश्येद्यत्नान्मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥ बालकोंके रुदन (रोने) से उसके थोडी वा बहुत पीडा जाननी। यह बालक जिस ठिकाने वारंवार हाथ लगावे उस ठिकाने और जिस जगह औरके हाथको न लगाने दे उस ठिकाने उसके पीडा जाननी चाहिये । नेत्रोंके मूँदनेसे मस्तक पीडा जाने, मलावरोध, वमन, स्तन, (छातीको) चबाना तथा पेटका गूंजना, पेटका फूलना तथा पेटका उछलना इन लक्षणोंसे बालकके पेटमें पीडा जाननी । मलमूत्रके रुकने तथा डरनेसे और सर्वत्र देखनेसे इन लक्षणोंसे उसकी बस्ति (मूत्र- स्थान) और गुदामें पीडा जाननी, वैद्य बालकके स्रोत (नाक मुख कान आदि छिद्रों) को, हाथ पैरसे आदिले अवयवों और सन्धियोंको बारम्बार देखे तो रोगका यथार्थ ज्ञान होय ॥ "द्वन्द्वज और सन्निपातज दूषित दुग्धके रोग । द्विलिङ्गं द्वन्द्वजं विद्यात्सर्वलिङ्गं त्रिदोषजे । पूर्वोक्त जो वातादिदूषित दुग्धके लक्षण कहे हैं उनमें दोषके लक्षण मिलनेसे द्वेद्वज रोग जानना और त्रिदोषके लक्षण मिलनेसे सन्निपातका रोग जानना, यह श्लोक प्रक्षिप्त है माधवाचार्यका नहीं है ॥” कुकूणकके लक्षण । कुकूणकः क्षीरदोषाच्छूनामक्षिवर्त्मनि । जायते तेन नेत्रं च कण्डूरं च स्रवेन्मुहुः ॥ ८ ॥ शिशुः कुर्याल्ललाटाक्षिकूटनासाविघर्षणम् । शक्तो नार्कप्रभां द्रष्टुं न वर्त्मोन्मीलनक्षमः ॥ ९॥ कुकूणक यह रोग बालकोंके दूधके दोषसे होता है, इस रोगके होनेसे बाल- कके नेत्रके कोएमें सूजन, नेत्र खुजावे और पानी बहे, नेत्रोंमें कीचड आनेसे वह ललाट, नेत्र और नाकको रगडे, धूपके सामने देखा न जाय, उसके नेत्र खुले नहीं, इसको लौकिकमें कोयस्राव कहते हैं, यह रोग बालकोंके ही होता हैं सो वाग्भटमें लिखा है ॥ १ कुकूणकः शिशोरेव दंतोत्पत्तिनिमित्तजः ।

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भाषाटीकासमेत । ( ३५१ ) पारिगर्भिकके लक्षण । मातुः कुमारो गर्भिण्याः स्तनं प्रायः पिबन्नपि । कासाग्निसादवमथुतंद्राकार्श्यारुचिभ्रमैः ॥ १० ॥ युज्यते कोष्ठवृद्धया च तमाहुः पारिगर्भिकम् । रोगं परिभवाख्यं च दद्यात्तत्राग्निदीपनम् ॥ ११ ॥ बालकके गर्भिणी माताका दूध पीनेसे खांसी, मंदाग्नि, वमन, तन्द्रा, अरुचि, कृशता और भ्रम ये होवें और उसके पेटकी वृद्धि होय, इस रोगको वैद्यगण पारिगर्भिक अथवा परिभव कहते हैं । इस रोगमें अग्निदीपनकर्त्ता औषधि बाल- कको देनी चाहिये ॥ तालुकंटकके लक्षण । तालुमांसे कफः क्रुद्धः कुरुते तालुकंटकम् ॥ १२ ॥ तेन तालुप्रदेशस्य निम्नता मूर्ध्नि जायते । तालुपातः स्तनद्वेषः कृच्छ्रात्पानं शकृद् द्रवम् । तृडक्षिकंठास्यरुजा ग्रीवाधुर्धरता वमिः ॥ १३ ॥ तालुके मांसमें कफ कुपित होकर तालुकंटक रोगको करे, उसके होनेसे तालुके ऊपरका भाग नीचा हो जाय, तथा भीतरसे बालकका तालुआ बिंधजाय, इसीसे बालक स्तन (छाती) को नहीं दावे और पीवेभी तो बडे कष्टसे पीवे, पतला मल होजाय, प्यास लगे, नेत्र कंठ मुख इनमें पीडा होय, लार गिर पडे और जो दूध पीवे उसे डाल दे ॥ महापद्मविसर्पके लक्षण । विसर्पस्तु शिशोः प्राणनाशनो बस्तिशीर्षजः ॥ १४ ॥ पद्मवर्णो महापद्मो रोगो दोषत्रयोद्भवः । शंखाभ्यां हृदयं याति हृदयाद्वा गुदं व्रजेत् ॥ १५ ॥ बालकोंके जो मस्तक और वस्ती (मूत्रस्थान) में विसर्प होय है वह बालकका प्राणनाशक जानना, जो विसर्प कमलके पत्रके समान लाल होय है वह महापद्म रोग त्रिदोषज है, यह कनपटीमें उत्पन्न होकर हृदय पर्यन्त जाता है अथवा हृदयमें होकर गुदापर्यन्त जाता है ॥ और विकार जो बालकोंके होते हैं उनको कहते हैं- क्षुद्ररोगे च कथिते अजगल्ल्यहिपूतने ।

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( ३६२ ) माधवनिदान ।

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( ३६२ ) माधवनिदान । ज्वराद्या व्याधयः सर्वे महतां ये पुरेरिताः ॥ बालदेहेऽपि ते तद्वज्ज्ञेयाः कुशलैः सदा ॥ १६ ॥ क्षुद्ररोगनिदानमें जो अजगल्ली और अहिपूतना कही हैं सो और ज्वरादिक सर्व रोग जो बडे मनुष्योंके होते हैं अर्थात् जिन रोगोंको पूर्व कहि आये हैं वे सब रोग बालकोंके देहमें भी होते हैं, ऐसे कुशल वैद्योंको जानना चाहिये ॥ सामान्य ग्रहजुष्टके लक्षण । क्षणादुद्विजते बालः क्षणात्त्रस्यति रोदिति ॥ १७ ॥ नखैर्दन्तैर्दारयति धात्रीमात्मानमेव च । ऊर्ध्वं निरीक्षते दन्तान् खादेत्कूजति जृम्भते ॥ १८ ॥ भ्रुवौ क्षिपति दंतोष्ठं फेनं वमति चासकृत् । क्षामोऽतिनिशि जागर्ति शूनांगो भिन्नविट्स्वरः ॥ १९ ॥ मांसशोणितगन्धिश्च न चाश्नाति यथा पुरा । सामान्यग्रहजुष्टानां लक्षणं समुदाहृतम् ॥ २० ॥ कभी क्षणभरमें बालक विह्वल हो जाय कभी क्षणभरमें डरे, रोवे, नख और दांतोंसे अपने शरीर और माताको खसीटे, ऊपरको देखे, दांतोंको चबावे, किल- कारी मारे, जंभाई लेय, भ्रुव ( भौंह ) को तिरछी करे, दांतोंसे होठोंको खाय, बारंबार मुखसे झाग डाले, वह अत्यन्त क्षीण होय, रात्रिमें सोवे नहीं, सूजन होय, मल पतला होय, स्वर बैठ जाय, उसके देहमें रुधिर मांसकीसी बास आवें जितना पहिले खाता होय उतना नहीं खाय, ये सामान्य ग्रहव्याप्त बालकके लक्षण हैं। अब कहते हैं कि, स्कन्दादिक ग्रह पूजाके अर्थ बालकोंको मारे हैं सो चरकमें लिखा है ॥ स्कन्दग्रहगृहीतबालकके लक्षण । एकनेत्रस्य गात्रस्य स्रावः स्पन्दनकंपनम् । अर्द्धदृष्ट्या निरीक्षेत वक्रास्यो रक्तगंधिकः ॥ २१ ॥ दंतान् खादति वित्रस्तः स्तन्यं नैवाभिनंदति । स्कंदग्रहगृहीतानां रोदनं चालपमेव च ॥ २२ ॥ १ धात्रीमात्रोः प्राक्प्रदिष्टोपचाराच्छौचभ्रंशान्मंगलाचारहीनान् । क्लिष्टांस्वांस्तांस्तर्जितांस्ताडितांश्च पूजाहेतोर्हिंस्युरेते कुमारान् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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भाषाटीकासमेत । ( ३५३ ) बालकके एक नेत्रसे पानी गिरे और अंगमें स्राव ( पसीना ) बहे, एक ओरका अंग फडके तथा थर थर कांपे, वह बालक आधी दृष्टिसे देखे, मुख टेढा होजाय, रुधिरकीसी दुर्गंध आवे, वह बालक दाँतोंको चबावै, अंग शिथिल होजाय, स्तनको नहीं पीवे और थोडा रोवे, ये स्कन्दग्रह लगे बालकके लक्षण हैं। इस जगह स्कन्दग्रह करके शिवजीके प्रगट करे जो ग्रह हैं उनमेंसे, श्रीशिवपुत्र स्वामिकार्तिकका ग्रहण न करना चाहिये ॥ स्कन्दापस्मारके लक्षण । नष्टसंज्ञो वमेत्फेनं संज्ञान्वानतिरोदिति । पूयशोणितगन्धित्वं स्कंदापस्मारलक्षणम् ॥ २३ ॥ बालक बेसुधि होय, मुखसे झाग डाले, जब होश हो तब रोवे, उसकी देहमें रुधिरकीसी दुर्गंधि आवे इन लक्षणों करके स्कन्दापस्मारके लक्षण जानने ॥ शकुनिग्रहके लक्षण । स्रस्तांगो भयचकितो विहंगगन्धिः संस्रावव्रणपरिपीडितः समन्तात् । स्फोटैश्च प्रचिततनुः सदाहपाकैर्विज्ञेयो भवति शिशुः क्षतः शकुन्या॥ शकुनिग्रहसे पीडित बालकके अंग शिथिल होयँ, भयसे चकित होयँ, उसके अंगमें पक्षीके अंगके समान बास आवे, घाव होकर उसमेंसे लस बहे, सर्व अंगोंमें फोडे उत्पन्न होयँ और ये पकें तथा दाह होय ॥ रेवतीग्रहके लक्षण । व्रणैः स्फोटैश्चितं गात्रं पंकगंधमसृक्स्रवेत् । भिन्नवर्चा ज्वरो दाहो रेवतीग्रहलक्षणम् ॥ २४ ॥ रेवतीग्रहसे पीडित बालकके अंगमें घाव और फोडे होयँ, उनमेंसे रुधिर बहे, उनमें कीचकीसी बास आवे, दस्त होय, ज्वर होय और अंगमें दाह होय ॥ पूतनाग्रहके लक्षण । अतिसारो ज्वरस्तृष्णा तिर्यक्प्रेक्षणरोदनम् । नष्टनिद्रस्तथोद्विग्नः स्रस्तः पूतनया शिशुः ॥ २५ ॥ पूतना ग्रहकी पीडासे बालकको दस्त, ज्वर, प्यास होय, टेढी दृष्टिसे देखे, रोवे, सोवे नहीं, व्याकुल होय, शिथिल होजाय ये लक्षण होते हैं ॥ अंधपूतनाग्रहके लक्षण । छर्दिः कासो ज्वरस्तृष्णा वसागंधोऽतिरोदनम् । स्तन्यद्वेषोऽतिसारश्चाप्यंधपूतनया भवेत् ॥ २७ ॥ १ तदुक्तं हिरण्याक्षेण—संस्रावदाहपाकाद्यैश्चितः स्फोटैर्भयाऽन्वितः । स्रस्तांगो विस्रगंधिः स्याच्छकुन्या पीडितः शिशुः ॥

( ३५४ ) माधवनिदान ।

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( ३५४ ) माधवनिदान । अंधपूतना ग्रहकी पीडासे बालकके वमन होय, खांसी, ज्वर, प्यास, चर्बीकीसी दुर्गंध, बहुत रोना,स्तन्य ( छातीको ) मुखसे दाबे नहीं, अतिसार यह लक्षण होते हैं॥ शीतपूतनाग्रहके लक्षण । वेपते कासते क्षीणो नेत्ररोगो विगंधिता । छर्द्यतीसारयुक्तश्च शीतपूतनया शिशुः ॥ २८ ॥ शीतपूतना ग्रहकी पीडासे बालकके मुखकी कांति क्षीण होजावे, उसके नेत्ररोग होय, देहमें दुर्गंध आवे, वमन होय और दस्त होयँ ॥ मुखमण्डिकाग्रहके लक्षण । प्रसन्नवर्णवदनः शिराभिरिव संवृतः । मूत्रगन्धिश्च बह्वाशी मुखमण्डिकया भवेत् ॥ २९ ॥ मुखमंडिका ग्रहकी पीडासे बालकक मुखकी कांति सुंदर होय और देहकी कांति श्रेष्ठ होय, शिराओंमें बँधा देह होजाय, उसके देहमें मूत्रकीसी दुर्गंध आवे यह बालक बहुत भक्षण करे ॥ नैगमेयग्रहके लक्षण । छर्दिःस्यन्दनकण्ठास्यशोषमूर्च्छाविगन्धिताः । ऊर्ध्वं पश्येदशेद्दन्तान्नैगमयेयग्रहं वदेत् ॥ ३० ॥ वमन, कफ, कंठ-मुखका सूखना, मूर्च्छा, दुर्गंध, ऊपरको देखे, दांतोंको चबावे इन लक्षणोंसे नैगमेयग्रहकी बाधा जाननी ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माथुरीभाषाटीकायां बालरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ विषरोगनिदानम् । स्थावरं जंगमं चैव द्विविधं विषमुच्यते । मूलात्मकं तदाद्यं स्यात्परं सर्पादिसम्भवम् ॥ १ ॥ विष दो प्रकारका है-स्थावर और जंगम, तथा मूलात्मक स्थावर और सर्पादि- कोंसे जो प्रगट हो वह जंगम विष होता है ॥ दशाधिष्ठानमाद्यं तु द्वितीयं षोडशाश्रयम् । आद्य अर्थात् स्थावर विष दश जगह रहता है और जंगम विष सोलह जगह रहता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

भाषाटीकासमेत । ( ३५५) मूलं पत्रं फलं पुष्पं त्वक्क्षीरं सार एव च । निर्यासा धातवश्चैव कन्दश्च दशमः स्मृतः ॥ २ ॥ जड, पात, फल, फूल, छाल, दूध, रस, गोंद, धातु और कन्द ये दश स्थावर विष हैं। तहां मूलविष आठ-क्लीतक, अश्ममार गुंज, सुगंध, गर्गर, छकरघाट, विद्युच्छिखा और विजया ये हैं। विषपत्रिका, लम्बावर, दारुक, करम्भ, महाकरंभ ये पांच पत्रविष हैं। कुमुद्वती, वेणुका, करम्भ, महाकरंभ, कर्काटक, रेणुक, खद्यो- तक, चमरी, इभगंधा, सर्पघाती, नन्दन, सारपाकिनी ये बारह फलविष हैं। पत्र, कदंब, वाल्लिज, करम्भ, महाकरम्भ ये पांच पुष्पविष है। अंत्रपाचक, कर्तरीय, सौरीय, ककरघाट, करम्भ, नन्दन, वराटक ये सात त्वचारस (गोंद) के विष हैं, कुमुदघ्नी, स्नुही जालक्षीरी ये तीन दूधके विष हैं। फेणाश्मभस्म और हरिताल ये धातुविष हैं। कालकूट, वत्सनाभ, सर्षपक, पालक, कर्दमक, वैराटक, पुस्तक, भृंगी- विष प्रपौंडरीक, मूलक, हलाहल, महाविष कर्कट ये तेरह कन्दविष हैं। सब मिल- कर स्थावर विष पचपन ( ५५ ) हैं ॥ विषके स्थान । जंगमस्य विषस्योक्तान्यधिष्ठानानि षोडश । समासेन मया यानि विस्तरस्तेषु वक्ष्यते ॥ ३ ॥ जंगम विषके स्थान सोलह हैं, सो मैंने संक्षेपसे कहे हैं, अब विस्तारसे कहता हूँ-दृष्टि, श्वास, दांत, नख, मूत्र, विष्ठा, शुक्र, लार, आर्तव, मुख, संदंश, विशर्द्दित ( पादना ), गुदा, हड्डी, पित्त, शूकशव ये सोलह स्थान हैं। तहां दृष्टि, निःश्वास विष दिव्य है सो दिव्य सर्पादिका जानना । भीम विष दंष्ट्राविष है, बिलाव, कुत्ता, बन्दर, मगर, मेंढक, मच्छी, जलगोधिका, शंबूक (शीप), पचालक, छिप- करी, मोहारकी मक्खी, पीली मक्खी, ततैय्या इनसे आदि ले ये जनावर दंष्ट्रा और नख विषवाले हैं । चिंपिठ, पिच्चटक, कषाय, वासिंग, सर्षप, तोटववर्च, कोड- कौटिल्यक इन जानवरोंके विष्ठा और मूत्रमें विष होता है। इनको लोकप्रसिद्ध नामसे जानना । मूसेके शुक्रमें विष होता है। मकरी आदि जो कीट है सो लूता कहे जाते हैं। इनके लार, मूत्र, विष्ठा, मुख, नख, शुक्र, आर्तव इनमें विष होता है। बिच्छू, विश्वंभर, ततैय्या, राजिलमछली, चिठिंग, समुद्रका बिच्छू इनकी पूंछमें जो कांटा होता है उसमें विष होता है। चित्रशिर, शरावकुर्दि, शतदारुक, आदि- मेदक, शारिकामुख, मुखदंशक इनके मूत्रपुरीषमें विष जानना । मक्खी कणव जोंक इनके मुख और काटनेमें विष है। विषसे मरेहुएकी हड्डी, सर्पकी हड्डी विषेली

( ३५६ ) माधवनिदान ।

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( ३५६ ) माधवनिदान । मछली इनकी हड्डीमें विष है। शकुली नामकी मछली रक्तराजी और चरकी नामकी मछली इनके पित्तसें विष हैं। सूक्ष्मतुंड, चेंदि, बहर, कनखजूरा, शुक, मोर, तोता इनके तुंड अर्थात् मुखके अग्रभागमें विष है। कीट और सर्प इनके मरे देहमेंही विष है और जिनकी गणना यहां नहीं की उनको मुखके संदंशवालोंमें जानना। ये जंगमविषके स्थान हैं ॥ जंगमविषके सामान्य लक्षण । निद्रा तन्द्रा क्लमं दाहमपाकं रोमहर्षणम् । शोथं चैवातिसारं च कुरुते जंगमं विषम् ॥ ४ ॥ निद्रा, तन्द्रा, क्लम, दाह, अन्नका न पचना, रोमाञ्च, शोथ और अतिसार ये लक्षण जंगमविषके हैं ॥ स्थावरविषके सामान्य लक्षण । स्थावरं तु ज्वरं हिक्कां दंतहर्षं गलग्रहम् । फेनच्छर्द्यरुचिश्वासं मूर्च्छां च कुरुते भृशम् ॥ ५ ॥ स्थावरविषसे ज्वर, हिचकी, दांतोंका घिसना, गलेका घिरना, झागसे मिली रह, अरुचि, श्वास और अत्यन्त मूर्छा ये लक्षण होते हैं ॥ राजा किंवा कोई दूसरा बडा सेठ साहूकार जिसको समीपके रहनेवाले किसी नौकर चाकरने विष मिलाकर अन्न दिया हो उस विष देनेवालेके ढूंढनेके निमित्त कुछ लक्षण कहता हूँ- इंगितज्ञो मनुष्याणां वाक्चेष्टामुखवैकृतैः । जानीयाद्विषदातारमेतैर्लिङ्गैश्च बुद्धिमान् ॥ ६ ॥ न दद्यात्युत्तरं पृष्टो विवक्षुर्मोहमेति च । अपार्थं बहुसंकीर्णं भाषते चापि मूढवत् ॥ ७ ॥ हसत्यकस्मात्स्फोटयत्यंगुलीं विलिखेन्महीम् । वेपथुश्चास्य भवति त्रस्तश्चान्योन्यमीक्षते ॥ ८ ॥ विवर्णवक्ता क्षामश्च नखैः किंचिच्छिनत्त्यपि । आलभेतासनं दीनः करेण च शिरोरुहम् ॥ वर्तते विपरीतं च विषदाता विचेतनः ॥ ९ ॥ मनुष्यके अभिप्राय जाननेवाले बुद्धिमान् वैद्य बोलने चालने तथा मुखकी चेष्टा इनसे तथा आगे जो कहते हैं इन लक्षणोंसे विषके देनेवाले मनुष्यको जान ले।

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भाषाटीकासमेत । ( ३५७)

सो इस प्रकार-जो मनुष्य विष दे उससे कोई बात पूछे तो वह उत्तर न दे और जब बोले तब मोहको प्राप्त हो अर्थात् घबडा जावे तथा कदाचित् बोले भी तो निरर्थक और बहुत अस्पष्ट बोले तथा अकस्मात् हँसे, हाथकी उंगली चटकावे, पृथ्वीमें रेखा काटे, भयसे कांपे और डरकर चारों ओर वारंवार सबकी तरफ देखे, मुखकी चेष्टा जाती रहे और काला होजाय, नखोंसे कुछ तिनका आदि तोडे, गरीबके समान एकही स्थानपर बैठा रहे, माथेपर हाथ फेरे, वारंवार इधर उधर डोल कर बैठजाय, उसका चित्त ठिकाने न रहे तथा उसका चित्त भागनेको चाहे । ये लक्षण विष देनेवालेके जानने और यही लक्षण घोर अपराध करनेवालेके राजा जान लेवे ॥ मूलादिविषोंके लक्षण । उद्वेष्टनं मूलविषैः प्रलापो मोह एव च । जृम्भणं वेपनं श्वासो मोहः पत्रविषेण तु ॥ १० ॥ मुखशोथः फलविषैर्दाहोऽन्नद्वेष एव च । भवत्युपविषैश्छर्दिराध्मानं श्वास एव च ॥ ११ ॥ त्वक्सारनिर्यांसविषैरुपयुक्तैर्भवंति हि । आस्यदौर्गन्ध्यपारुष्यशिरोरुकफसंस्रवाः ॥ १२ ॥ फेनागमः क्षीरविषैर्विद्भेदो गुरुजिह्वता । हृत्पीडनं धातुविषैर्मूर्च्छा दाहश्च तालुनि । प्रायेण कालघातीनि विषाण्येतानि निर्दिशेत् ॥ १३ ॥ मूलविषसे रोगीके हाथ पैरोंमें पीडा और मोह होवे । पत्रविषसे जम्भाई, कंप श्वास और मोह होवे । फलविषसे मुखपर सूजन, दाह, अन्नमें अरुचि होवे । पुष्प- विषसे वमन, अफरा और श्वास होवे । छाल, रस, गोंद-इनसे मुखमें दुर्गन्ध, अंगमें खरदरापन, मस्तकशूल और मुखके मार्ग कफ गिरे । दुग्धविषसे मुखमें झाग आवे, दस्त होय और जीभ जकड जावे । धातुविषसे हृदयमें पीडा होय, मूर्च्छा आवे, तालुएमं दाह होय ये विष बहुधाकरके कालान्तरमें मारनेवाले हों ॥ विषलिप्तशस्त्रहतके लक्षण । सद्यः क्षतं पच्यते तस्य जंतोः स्रवेद्रक्तं पच्यते चाप्यभीक्ष्णम् । कृष्णीभूतं क्लिन्नमत्यर्थपूति क्षतान्मांसं शीर्यते यस्य चापि ॥ १४ ॥ तृष्णा मूर्च्छा ज्वरदाहौ च यस्य दिग्धाहतं मनुजं तं व्यवस्येत् । लिंगान्येतान्येव कुर्यादमित्रैर्व्रणे विषं यस्य दत्तं प्रमादात् ॥ १५ ॥

( ३५८ ) माधवनिदान ।

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( ३५८ ) माधवनिदान । जिस पुरुषका जखम तत्काल पकजावे तथा उसमेंसे रुधिर वहै और वारंवार पके तथा उस जखममेंसे काला सडा दुर्गन्धयुक्त ऐसा मांस निकले तथा जिसमें प्यास, मूर्च्छा, ज्वर, दाह ये होवें उसके विषमें बुझे वा लिप्त शस्त्रकी जखम लगी जानना चाहिये । शत्रुओंने कपट करके जिसके व्रणमें विष डालदिया हो उसके भी यही लक्षण हैं ॥ स्थावरविषको कहकर जंगममें सर्पविष ये अतितीक्ष्ण हैं. इसीसे प्रथम सर्पोंकी जाति कहते हैं- वातपित्तकफात्मानो भोगिमण्डलिराजिलाः । यथाक्रमं समाख्याता द्वयन्तरा द्वंद्वरूपिणः ॥ १६ ॥ भोगी मण्डली और राजिल ये सर्प अनुक्रमसे वात, पित्त, कफप्रकृतिके हैं और जो द्वयंतर अर्थात् दो जातिके सर्प और सर्पिणीसे प्रगट हैं वे द्वयंतर कहाते हैं। उनकी प्रकृति द्वंद्वज है अर्थात् जिस जिस प्रकारके सर्प सर्पिणीसे प्रगट हैं उसी उसी प्रकारकी प्रकृति उनकी होती है, जिनके मस्तकपर चक्र, हल, छत्र, स्वास्तिक (सतिया), अंकुश इनका चिह्न हो और जिनका फण करछीके समान चौडा हो और जल्दी चलनेवाले हों उनको भोगी अथवा राजिल सर्प कहते हैं और जो अनेक प्रकारके चकत्तोंसे चित्रविचित्र हों तथा मोटे और मन्द चलनेवाले तथा अग्नि और सूर्यकासा प्रकाश जिनका उनको मण्डली सर्प कहते हैं और जो चिकने और अनेक प्रकारकी रेखा उनके ऊपर नीचे विद्यमान हों उनको राजिल सर्प कहते हैं । इन सर्पोंकी चार जाति हैं । जिनमें मोती, चांदी, सुवर्णकीसी प्रभा होवे और जो नम्र तथा जिनकी देहमें सुगंध आवै वे ब्राह्मण जातिके सर्प हैं और जिनका स्वच्छवर्ण, क्रोधी और जिनके मस्तकपर सूर्य चन्द्रके समान छत्र तथा कमलका चिह्न होवे वे क्षत्रिय जातिके सर्प हैं। काले और हीरेके समान तथा लोहेके वर्ण हों और जिनकी धूआं और कबूतरके समान प्रभा हो वे वैश्यजातिके सर्प हैं। जिनकी देह भैंसा, चीतेके समान हो और जिनकी त्वचा कठोर हो तथा अनेक प्रकारका जिनका वर्ण होवे वे शूद्र- जातिके सर्प हैं। रात्रिके पिछले प्रहरमें राजिल जातिके सर्प विचरते हैं और रात्रिके पहिले तीन पहरोंमें मण्डली जातिक सर्प विचरते हैं और दिनमें दर्वीकर जातिके सर्प बहुधा विचरते हैं। इनमें दर्वीकर जातिके सर्प तरुण हैं और मंडली जातिके वृद्ध, राजिलजातिके मध्यम अवस्थाके हैं। इतनी जातिके सर्प निर्विष जानने। जो नोलेसे हत हैं और बालक तथा जलसे ताडित हैं और कृश, वृद्ध तथा जिनकी कांचली छूट रही हो और डररहे हों ऐसे सर्प विषरहित होते हैं ॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३५९ ) अब सर्पोंके भेद कहते हैं- तहां प्रथम दवकिर सर्पोंके भेद कहते हैं-कृष्णसर्प, महाकृष्ण, कृष्णोदर, श्वेत- कपोल, बलाहक, महासर्प, शंखपाल, लोहिताक्ष, गवेधुक, परिसर्प, खंडफण, ककुद- पद्म, महापद्म, दर्भपुष्प, दधिमुख, पुंडरीक, भ्रकुटीमुख, विष्किर, पुष्पामिकीर्ण, गिरिसर्प, ऋतुसर्प, श्वेतोदर, महाशिरा, अलगर्द, आशीविष ये दवकिर जातिके सर्प हैं । आदर्शमंडल, श्वेतमण्डल, रक्तमण्डल, चित्रमण्डल, पृषत, रोध्रपुष्प, मिलिंदक, गोनस, वृद्धगोनस, पनस, महापन्स, वेणुपत्रक, शिशुफ, बभ्रु, कषाय, कलुष, पारा वत, हस्ताभरण, चित्रक, एणीपद ये मण्डली जातिके सर्प हैं । पुण्डरीक, राजिचित्र, अंगुलरांजि, बिन्दुराजि, कर्दमक, तृणतोषुक, संसर्पक, श्वेतहनु, दर्भपुष्प, शक्रक, गोधूमक, किक्कसाद ये राजिल जातिके सर्प हैं। गुलगोली, शूकपत्र, अजगर, दिव्यक, वर्षाहिक, पुष्पशकली, ज्योतीरथ, क्षीरिक, पुष्पक, अहिपताक, अन्धाहिक, गौराह्निक, वृक्षेशय इतने सर्प हीनविष जानने । अब कहते हैं कि, द्वयंतर (वर्णसंकर) सर्पभी तीन प्रकार हैं-माकूली, पोटगल, स्निग्धरांजि । तहां कृष्णसप जातिकी सर्पिणी और गोनसजातिके सर्पसे जो प्रगट हो वह माकुली कहाता है । इसी प्रकार राजिलसर्प और गोनसी जातिकी सर्पिणीसे जो प्रगट सो पोटगलसर्प कहाता है । इसी प्रकार कृष्णसर्प और राजपती जातिकी सर्पिणीसे जो प्रगटहुए सर्प उनको स्निग्धराजी कहते हैं। तहां नाकुलीसर्पमें पिताकासा विष (जहर) होय है और पोटगल स्निग्धराजी इन दोनोंमें माताकासा विष होता है। इन तीनोंके विप- रीततासे दिव्येलक, लोध्रपुष्पक, राजिचित्रक, पोटगल, पुष्पाभिकीर्ण, दर्भपुष्प, वेल्लितक इन सात जातिके सर्प प्रगट होते हैं। इनमें भी प्रथमके तीन सर्पोंमें राजिल सर्पोंकासा विष होता है और शेषोंमें मण्डली सर्पोंकासा जानना। ऐसे सब मिलाकर अस्सी प्रकारके सर्प हैं। इनमें भी जिनके नेत्र, जीभ, मुख, शिर, बडे हों वह पुरुष जानने और छोटे होयँ वह स्त्री जाननी और जिनमें दोनों स्त्री पुरुषके लक्षण मिलते होयँ तथा मन्द विषवाले क्रोधरहित हों उनको नपुंसक जानना ॥ भोगिप्रभृतिसर्पके काटनेपर वातादिकोंके लक्षण । दंशो भोगिकृतः कृष्णः सर्ववातविकारकृत् । पीतो मण्डलिजः शोथो मृदुः पित्तविकारवान् ॥ १७ ॥ राजिलोत्थो भवेद्दंशः स्थिरशोथश्च पिच्छिलः । पाण्डुः स्निग्धोऽतिसान्द्रासृक् सर्वश्लेष्मविकारवान् ॥ १८ ॥ भोगी अथवा राजिल दवकर सर्पके काटनेसे काटनेकी ठौर काली हो और सर्व वातके विकार करे। इसके सुश्रुतमें अवगुण लिखे हैं। मण्डली सर्पके काटनेकी ठौर

( ३६० ) माधवनिदान ।

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( ३६० ) माधवनिदान ।

पीली सूजनयुक्त और नरम और पित्तके विकार करें और राजिलका दंश चिकना पीले रंगका वा गाढा तथा उसकी सूजन कठोर होय, उसमें गाढा रुधिर निकले तथा सब प्रकारके कफविकार हों ये लक्षण राजिलसर्पके काटनेके हैं ॥ विशिष्टदेशमें तथा विशिष्टनक्षत्रमें काटनेके असाध्य लक्षण । अश्वत्थदेवतायतनश्मशानवल्मीकसंध्यासु चतुष्पथेषु । याम्ये च दष्टाः परिवर्जनीया ऋक्षे शिरामर्मसु ये च दष्टाः ॥१९॥ पीपलके वृक्षके नीचे, देवताओंके मन्दिरमें, मसानमें, बँबईमें सन्ध्याकाल ( प्रातः और सायंकालकी सन्धि ), चौराहेमें, भरणी नक्षत्रमें, चकारसे आर्द्रा, आश्लेषा, मूल, मघा, कृत्तिका ये नक्षत्रोंमें शिरानाडीके मर्ममें सर्पके काटनेसे मनुष्य बचे नहीं ॥ गर्मी होनेसे विषका जोर होता है उसके लक्षण । दर्वीकराणां विषमाशु हंति सर्वाणि चोष्णे द्विगुणीभवन्ति । दर्वीकर ( नाग ) का विष तत्काल प्राणनाश करे और विष गर्मीके योगसे दुगुना जोर करते हैं ॥ अजीर्णपित्तातपपीडितेषु बालेषु वृद्धेषु बुभुक्षितेषु । क्षीणक्षते मेहिनि कुष्ठदुष्टे रूक्षेऽबले गर्भवतोषु चापि ॥ २० ॥ अजीर्ण पित्त और सूर्यकी घाम इनसे पीडित, बालक, वृद्ध, भूखा, क्षीण होगया हो, उरःक्षती, प्रमेहवाला, कोढी, रूखा, निर्बल और गर्भिणी इनको सर्पके काटनेसे तत्काल मृत्यु हो ॥ सर्पके काटनेसे असाध्य लक्षण । शस्त्रक्षते यस्य न रक्तमस्ति राज्यो लताभिश्च न सम्भवंति । शीताभिरद्भिश्च न रोमहर्षो विषाभिभूतं परिवर्जयेत्तम् ॥ २१ ॥ जिसको विषका अमल चढ गया हो उसके शस्त्रके घाव करनेसे रुधिर निकले नहीं अथवा चाबुक मारनेसे अंगमें उपडे नहीं अथवा शीतल पानी अंगपर डालनेसे रोमांच न हों उस मनुष्यका जहर उतारनेका उद्योग न करें ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । जिह्मं मुखं यस्य च केशशातो नासावसादश्च सकंठभंगः । रक्तः सकृष्णः श्वयथुश्च दंशे हन्वोः स्थिरत्वं च विवर्जनीयः ॥२२॥ जिसका मुख टेढा और स्तब्ध हो जाय, केश ( बाल ) स्पर्श करनेसे टूट २ कर गिर पडें, नाककी हड्डी टेढी हो जाय, नाड नीचेको झुक पडे, ऊंची न होय और