माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ४२ ) माधवनिदान ।
( ४२ ) माधवनिदान । इस ज्वरमें वैद्य औषधी न दे, अपक्व ज्वरमें औषधि देनेसे ज्वरकी वृद्धि होती है और शोधन तथा शमन औषध देनेसे विषमज्वरको करे हैं ॥ ज्वरके दश उपद्रव । श्वासो मूर्च्छाऽरुचिस्तृष्णा छर्द्यतीसारविङ्ग्रहः । हिक्का श्वासोऽङ्गदाहश्च ज्वरस्योपद्रवा दश ॥ ६० ॥ भावप्रकाशके मतसे दश उपद्रवोंको कहते हैं-श्वास, मूर्च्छा, अरुचि, प्यास, वमन, अतीसार, मलका रुकना, हिचकी, खांसी, देहमें दाह ये ज्वरके दश उपद्रव हैं ॥ पच्यमान ज्वरके लक्षण । ज्वरवेगोऽधिका तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ ६१ ॥ ज्वरका वेग, अधिक प्यास, प्रलाप, भ्रम, मलकी प्रवृत्ति, उपस्थित वमनसी मालूम होय ये पच्यमान ज्वरके लक्षण हैं ॥ पक्वज्वर किंवा निरामज्वरके लक्षण । क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् । दोषप्रवृत्तिरुत्साहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ ६२ ॥ भूखका लगना, देहका कृश होना, अंगोंका हलकापना, मन्द ज्वरका आना, अधोवायुकी प्रवृत्ति होना, मनमें उत्साहका होना ये निरामज्वरके लक्षण जानने ॥ ग्रन्थांतरसे जीर्णज्वरके लक्षण । त्रिःसप्ताहे व्यतीते तु ज्वरो यस्तनुतां गतः । प्लीहाग्निसार्द कुरुते स जीर्णज्वर उच्यते ॥ ६३ ॥ २१ दिवस व्यतीत होनेपर जो ज्वर बारीक हो देहमें रहे जिससे प्लीहा अर्थात् तापातिल्ली रोग और मन्दाग्नि होवे उसको जीर्णज्वर कहते हैं ॥ साध्यज्वरके लक्षण । बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वरः साध्योऽनुपद्रवः । बलवान् पुरुषके थोडे दोषयुक्त और श्वास आदि उपद्रव करके रहित जो ज्वर हो वह साध्य जानना । असाध्यज्वरके लक्षण । हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः । ज्वरः प्राणान्तकृद्यश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशनः ॥ ६४ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu..Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ४३ ) जो ज्वर बहुत प्रबल कारणोंसे उत्पन्न भया हो और जिसमें सम्पूर्ण लक्षण मिलते हों वह ज्वर प्राणोंका हरण करनेवाला जानना और जो ज्वर प्रगट होते ही चिकित्सा करते २ इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट कर दे अर्थात् अन्धा बहिरा इत्यादि वह भी ज्वर असाध्य जानना ॥ ज्वरः क्षीणस्य शूनस्य गम्भीरो दैर्घ्यरात्रिकः । असाध्यो बलवान् यश्च केशसीमन्तकृज्ज्वरः ॥ ६५ ॥ जो पुरुष ज्वरसे क्षीण पडगया हो अथवा सूजन जिसके देहमें आगई हो वह असाध्य है और जिसके ज्वर धातुके भीतर हो अथवा अन्तर्वेगज्वर अथवा जिसमें वातादि दोषोंका निश्चय न होसके और बहुत दिनतक रहनेवाला ज्वर असाध्य होता है और ज्वर बलवान् हो तथा जिसमें रोगी अपने हाथसे केशों ( बालों ) की सीमन्त आदि रचना करे वह ज्वर असाध्य है ॥ गम्भीरज्वरके लक्षण । गम्भीरस्तु ज्वरो ज्ञेयो ह्यन्तर्दाहेन तृष्णया । आनद्धत्वेन चात्यर्थं श्वासकासोद्गमेन च ॥ ६६ ॥ अन्तर्दाह, प्यास, दोष अर्थात् विरुद्ध दोषके बढनेसे मलके रुकनेसे तथा श्वास खांसीके उत्पन्न होनेसे गम्भीर ज्वर जानना ॥ दूसरे असाध्यज्वरके लक्षण । आरम्भाद्विषमो यस्य यस्य वा दैर्घ्यरात्रिकः । क्षीणस्य चातिरूह्क्षस्य गम्भीरो हन्ति मानवम् ॥ ६७ ॥ विसंज्ञस्ताम्यते यस्तु शेते निपतितोऽपि वा । शीतार्दितोऽन्तरुष्णश्च ज्वरेण म्रियते नरः ॥ ६८ ॥ जो ज्वर प्रगट होते ही विषम पड जांय और जो ज्वर बहुत दिनसे आया करे और क्षीण तथा अतिरूक्ष देहवाले पुरुषके जो गम्भीर ज्वर हो वह मृत्युकारक होता है और जो बेहोश होकर मोहको प्राप्त हो तथा गिरकर जिससे उठा न जाय पडाही रहे अथवा बाहरी शीत लगे और देहके भीतर दाह हो ऐसे ज्वरवाला पुरुष मरजावे ॥ और असाध्य लक्षण । यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि संघातशूलवान् । वक्त्रेण चैवो- च्छ्वसिति तं ज्वरो हन्ति मानवम् ॥ ६९ ॥ हिक्काश्वासतृषा- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ४४ ) माधवनिदान ।
( ४४ ) माधवनिदान । युक्तं मूढं विभ्रान्तलोचनम् । संततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षप- यति ज्वरः ॥ ७०॥ हतप्रभेन्द्रियं क्षाममरोचकनिपीडितम् । गम्भीरतीक्ष्णवेगात्तं ज्वरितं परिवर्जयेत् ॥ ७१ ॥ जिसके देहमें रोमांच खडे रहें, लालनेत्र हों, हृदयमें गांठ होनेसे जैसी पीडा हो वैसा हो और संघात इस पदका यह अर्थ करते हैं कि, नाना प्रकारका शूल हो मुखके द्वारा श्वास ले वह ज्वर रोगी मनुष्यको मार डाले । हिचकी श्वास प्यास इन करके व्याप्त हो, मोहयुक्त हो चलायमान नेत्र हों, निरंतर श्वास ले ऐसे लक्षणयुक्त मनुष्यको ज्वर मार डालता है। इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट होनेसे और शरीरकी कांति निस्तेज होनेसे अथवा इन्द्रिय ( नाक कान नेत्र ) ये नष्ट हो जावें, देह कृश हो जावे, अरुचिसे अत्यंत पीडित हो “अरोचकनिपीडितम्” इसका इस जगह जैज्जटने दो पाठ लिखे हैं एक तो— “दुरात्मानमुपद्रुतम्” इसका अर्थ यह है कि, दुष्ट अंतःकरण होवे और उपद्रवयुक्त होवे । दूसरा पाठ यह है कि “दुरात्मभिरुपद्रुतम्” अर्थात् राक्षसादि- करके युक्त हो तथा अतिघोर अन्तर्वेग करके परिपीडित हो ऐसे ज्वरवान् पुरुषको वैद्य छोडदेवे। इसी जगह कई एक टीकाकारोंने जो असाध्यलक्षण लिखे हैं सो आतंक- दर्पण तथा मधुकोश टीकासे लिखे हैं वे सब वाग्भट और हारीतके कालज्ञान देख- नेसे निश्चय हो जायँगे सो लेवे, इस जगह हम ग्रन्थ बढनेके भयसे नहीं लिखते ॥ ज्वरमुक्तिके पूर्वरूप । दाहः स्वेदो भ्रमस्तृष्णा कम्पो विड्भिदसंज्ञिता । कूजनं चातिवैगन्ध्यमाकृतिर्ज्वरमोक्षणे ॥ ७२ ॥ दाह, पसीना, भ्रम, प्यास, कंप, मलका पतला होना, संज्ञाका नाश होना, गूंजे, देहमें अत्यंत दुर्गंध आवे ये लक्षण ज्वर छोडता है तब होते हैं. शंका--क्यों जी ! दोष ( वात पित्त कफ ) नाशके बिना रोगकी निवृत्ति होय नहीं और जब दोष क्षीण होगये तो उस दाहादिलक्षण कैसे करते हैं ? उत्तर--इसका कारण यह है कि, कोई एक वस्तुका ऐसा स्वभाव है कि क्षीण होनेके समयमें अपनी शक्तिको दिखाती है जैसे दीपकमें तेल नहीं रहे और थोडी देर बलकर शांत हो जाता है ऐसेही जब दोष शांत होनेको होते हैं तब अपनी शक्ति दाहादिकोंको दिखाते हैं । अथवा दूसरा उत्तर यह है कि, जैसे बंदर वृक्षकी डालीको हिलायकर दूसरे स्थानपर चलाजाता है परन्तु वह वृक्षकी डाली बहुत देरपर्यंत हिला करती है इसी प्रकार ज्वर गयेपर भी उसके असरसे दाहादिक रहते हैं यह लक्षण दाहसे आदि ले त्रिदोष ज्वरके शांत होनेके समय होते हैं और सब ज्वरोंमें नहीं होते और ज्वरमें केवल पसीने ही आते हैं यह भालुकी आचार्यका मत है ॥
इति ज्वरनिदानम् ॥
भाषाटीकासमेत । ( ४६ ) ज्वरमुक्तिके लक्षण । स्वेदो लघुत्वं शिरसः कण्डूः पाको मुखस्य च । क्षवथुश्चान्नकांक्षा च ज्वरमुक्तस्य लक्षणम् ॥ ७३ ॥ इति ज्वरनिदानम् ॥ पसीने आवें, देह हलका हो, मस्तकमें खुजली चले, मुखका पाक अर्थात् होठोंमें पपडी पडजाय, छींक आवे, भोजन करनेकी इच्छा हो ये लक्षण ज्वरमुक्तके हैं ॥ प्रसंगवशाज्ज्वरमुक्तलक्षणं ग्रन्थान्तरे- देहो लघुर्व्यपगतक्लममोहतापः पाको मुखे करणसौष्ठवमव्यथत्वम् । स्वेदः क्षवः प्रकृतियोगिमनोऽन्नलिप्सा कण्डूश्च मूर्ध्नि विगतज्वरलक्षणानि ॥ १ ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायां ज्वरनिदानं समाप्तम् ॥ इंग्रेजी मतानुसार ज्वर निदान । ज्वरको इंग्रेजीमें ( Fever ) फीवर कहते हैं उसकी उत्पत्ति । १--शरदी । शरदी पडनेसे मनुष्यका सब देह रोमांचबद्ध होजाय तब पसीनेका निकलना रुकजाय इस हेतुसे देहका जो अवगुण सो देहके बाहर नहीं निकले इसीसे देह हलका नहीं होय और वही देहका अवगुण ज्वररोगको प्रगट करता है । इस ज्वरको सामान्य ज्वर कहते हैं। अथवा देह अतिगरमीसे पीडित होय उस समय किसी कारणसे शीतल करे तो शरदी होती है अथवा किसी अतिपरिश्रम करनेसे मनुष्यके देहसे पसीने निकलें उस समय हवामें बैठे अथवा हवामें शयन करनेसे शरदी होती है अथवा रातमें मैदानमें सोनेसे अथवा रातमें शीतलपवनके लगनेसे पसीना नहीं निकले इस हेतुसे शरदी होय अथवा गीला कपडा ओढकर बैठनेसे वा सोनेसे शरदी होय है इन कारणोंसे शरदी होय वह शरदी अनेक प्रकारके ज्वरोंकी उत्पत्ति करे है ॥
( ४६ ) माधवनिदान ।
( ४६ ) माधवनिदान । २--मन्दवायु । जिस समय पृथ्वीमें वर्षाका अथवा और प्रकार जल सूखे उसमें घास पत्ता सड़- जावें तब इनसे मन्द वायु अथवा बाष्प उत्पन्न होय तिसके द्वारा अनेक प्रकारके ज्वर प्रगट होवें, विशेषकरके आमज्वरकी अधिक उत्पत्ति होय इसीसे जलाशयस्थान तालाब आदि और झील खाल इन स्थानोंमें मन्दवायु अधिक होता है इससे नाना प्रकारके ज्वर प्रगट होयँ, यह हवा सोताके जलसे उत्पन्न नहीं होय है किन्तु जिस जगह थोडा जल होय जैसे तलैया आदि उसमें घाम लगनेसे जल पक्व होकर गन्ध वायुको अधिक उत्पन्न करे है यह वायु दिनमें सूर्य्यकी किरणसे बहुत हल्की होकर ऊपरको उठे इसीसे यह बड़ा नुकसान करनेवाली होती है और सन्ध्या तथा रात्रिमें यह वायु शीतल होनेसे नीचे उतर सर्व साधारण मनुष्योंको नुकसान करनेवाली होती है और हवाओंसे यह हवा अधिक भारी होती है, घरके किंवाड लगानेसे यह हवा घरके भीतर कम जाती है इसीसे घरके किंवाड देकर मसेरी जिसको पूर्वके लोग बहुधा रखते हैं यह कपडेकी बनी हुई होती है इसमें सोना चाहिये ॥ ३--गरिष्ठ भोजन । जो मनुष्य भारी द्रव्य भोजन करे तब उसके वह पचै नहीं और पेटमें पीडा करे उस पीडाके होनेसे ज्वर उत्पन्न होय, विशेषकरके यह ज्वर बालकोंके होता है ॥ अनेकप्रकारके ज्वरोंके लक्षण । नाडी और श्वास जल्दी चले, मस्तकमें पीडा होय, त्वचा शुष्क और गरम होय प्रलाप होय अथवा न होय पेशाब लाल उतरे, जीभ मलीन होय, शरीरमें सदा ज्वर रहाकरे कभी कम होजाय कभी जियादह हो जाय ॥ कुंकुमज्वरके लक्षण । श्वास लेते समय मन्द मन्द पीडा होय, खांसी हो, कफ कुछ नीले रंगका गिरे, ज्वर अल्प होय, वक्षस्थलमें पीडा होय, खांखते समय श्वास जल्दी चले, नाडी कुछ कुछ थोडी और शीघ्र चले, त्वचा सदैव थोडी गरम रहे; जिस समय रोगकी वृद्धि होय, स्वासके चलनेसे पीडा होय और अधिक पीडा होय उस रोगके आरम्भमें कफ नहीं निकले किन्तु दो तीन दिनके बाद कफसमेत निकल पडे उस रोगीका हल्दीके समान पीला वर्ण होय, कभी कभी जलके सदृश वर्ण होय इस रोगकी विशेषता होनेसे कफ पतला होजाय, यह रोग अत्यन्त बढकर पचनेको होय तब कफका शाकके समान रंग हो अथवा काले रंगका और दुर्गन्धयुक्त होय बहुत शरदी पडनेसे इसकी उत्पत्ति होती है ॥ यकृत वा कलेजाइज्वरके लक्षण । दहने पाँसूमैं पीडा होय, शरीरमें थोडा ज्वर होय तथा आहारमें अरुचि होय जीभ मलिन, नेत्र पीले होयँ, मल मिट्टीके रंगका अथवा सफेद तथा काला होय और कठिन, पेशाब लाल होय ॥
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अथातिसारनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ४७ ) अथातिसारनिदानम् । पित्तज्वरमें अतिसार होता है तथा ज्वरको और अतिसारको अन्योन्य उपद्रव होनेसे ज्वरके अनन्तर अतिसार रोगको कहते हैं- गुर्वतिस्निग्धतीक्ष्णोष्णद्रवस्थूलातिशीतलैः । विरुद्धाध्यशना- जीर्णेर्विषमैश्चातिभोजनैः ॥ १ ॥ स्नेहाद्यैरतियुक्तैश्च मिथ्यायुक्तै- र्विषैर्भयैः । शोकदुष्टाम्बुमद्यातिपानैः सात्म्यर्तुपर्ययैः ॥ २ ॥ जलाभिरमणैर्वेगविघातैः कृमिदोषतः । नृणां भवत्यतीसारो लक्षणं तस्य वक्ष्यते ॥ ३ ॥ प्रमाणसे अधिक भोजन करनेसे अथवा स्वभावसे भारी पदार्थ जैसे उड़द आदिक खानेसे और अतिचिकनी अतितीखी अतिगरम अत्यन्त पतली स्थूल अर्थात् जिसके अवयव कठिन हों जैसे लड्डू, घेवर, गूंझा इत्यादि और अत्यन्त शीतल स्पर्शसे तथा वीर्यसे विरुद्ध जैसे क्षीर मत्स्य इत्यादिक, अध्यशन कहिये पूर्व दिनका भोजन परिपाक नहीं होय और उसपर भोजन करना, अन्नके बिना पके, नित्य भोजनके समयको त्यागकर और समय थोडा वा बहुत ऐसे भोजनोंके करनेसे स्नेह स्वेद आदि पंचकर्मसे, अत्यन्त योगके करनेसे वा थोडे योग करनेसे स्थावरादिक दूषीविषके खानेसे, भयसे, सोच करनेसे, अतिदुष्ट जलके पीनेसे तथा अतिमद्यके पीनेसे सात्म्य और ऋतुके पलटनेसे, जलमें अतिक्रीडा करनेसे, मल मूत्र आदि वेगोंको रोकनेसे, कृमिरोगके उपद्रवसे अथवा कृमिजनित वातादिकके कोपसे मनुष्योंको अतिसार रोग होता है, इन लक्षणोंसे यह निदान यथासम्भव वातादि- दोषोंका जानना । आगे अतिसारके लक्षण कहते हैं ॥ अतिसाररोगकी संप्राप्ति । संशम्यापां धातुरग्निं प्रवृद्धो वर्चोमिश्रो वायुनाऽधः प्रणुन्नः । सार्यैतातीवातिसारं तमाहुर्व्याधिं घोरं षड्विधं तं वदन्ति । एकैकशः सर्वशश्चापि दोषैः शोकेनान्यः षष्ठ आमेन चोक्तः ॥ ४॥ पूर्वोक्त कुपथ्यसे अत्यन्त दुष्ट हुए शरीरमें रस, जल, मूत्र, स्वेद, मेद, कफ, पित्त, रुधिर इत्यादि जलरूप धातु अग्निको मन्द कर और वही जल मलमिश्रित १ तदुक्तं चरके-“ भुक्तं पूर्वाह्णशेषे तु पुनरध्यशनं मतम् । “ २ बहुतोकमकाले च तज्ज्ञेयं विषमाशनम् ॥”
( ४८ ) माधवनिदान ।
( ४८ ) माधवनिदान ।
हो पवनका प्रेरित गुदाके मार्गसे बारंबार नीचेको बहुत उतरे तिसको अतिसार कहते हैं । यह भयंकर अतिसार रोग ६ प्रकारका है-वातका १, पित्तका २, कफका ३, ४ सन्निपातका, ५ शोकका और ६ आमातिसार ऐसे छःप्रकारका अतिसार है । द्वंद्वज अतिसार व्याधिस्वभावकरके नहीं होते, चरकमें आमातिसार नहीं कहा । भय और शोकसे दो कहकर संख्या पूरी करी है। और आमातिसारको सन्निपाताति- सारके अन्तर्गत कहा है ॥ यहां माधवाचार्यने भयातिसारकी वातज अतिसारमें गणना करी है ॥ अतिसारके पूर्वरूप । हृन्नाभिपा यूदरकुक्षितोदगात्रावसादानिलसन्निरोधाः । विट्सङ्ग आध्मानमथाविपाको भविष्यतस्तस्य पुरःसराणि॥५॥ हृदय, नाभि, गुदा, पेट, कूख इनमें पीडा हो, शरीरमें फूटनी हो, गुदाका पवन रुकजाय, मलका अवरोध हो अफरा हो और अन्न पचे नहीं ये लक्षण- अतिसाररोग के पूर्वरूपके होते हैं ॥ वातातिसारके लक्षण । अरुणं फेनिलं रूक्षमल्पमल्पं मुहुर्मुहुः । शकृदामं सरुक्शब्दं मारुतेनातिसार्यते ॥ ६ ॥ कुछ ललाईको लिये, झाग मिला तथा रूखा, थोडा थोडा बारम्बार आम मिला हुआ दस्त उतरे और शूल चले तथा मल उतरते समय शब्द होवे तो वाता- तिसार जानना ॥ पित्तातिसारके लक्षण । पित्तात्पीतं नीलमालोहितं वा तृष्णामूर्च्छादाहपाकोपपन्नम् । पित्तसे पीला काला और धूसरे रंगका मल उतरता है तथा तृष्णा मूर्च्छा और सम्पूर्ण शरीर तथा गुदामें दाह होती है, गुदा प चजाती है ये लक्षण पित्तातिसारके हैं ॥ कफातिसारके लक्षण । शुक्लं सांद्रं सकफं श्लेष्मयुक्तं विस्रं शीतं हृष्टरोमा मनुष्यः ॥ ७ ॥ कफातिसारवाले पुरुषका मल सफेद, गाढा, चिकना, कफमिश्रित, दुर्गंधयुक्त और शीतल उतरता है तथा रोम खडे होजाते हैं ये लक्षण कफातिसारके जानने ॥ सन्निपातातिसारके लक्षण । वराहस्नेहमांसाम्बुसदृशं सर्वरूपिणम् । कृच्छ्रसाध्यमतीसारं विद्याद्दोषत्रयोद्भवम् ॥ ८ ॥
भाषाटीकासमेत। (४९) सूकरकी चरबीसदृश अथवा मांसके धोये हुए पानीके सदृश और वातादि त्रिदोषोंके जो लक्षण कहे हैं उन लक्षणसंयुक्त हो ऐसा यह त्रिदोषजनित अतिसार कष्टसाध्य जानना ॥ शोकातिसारके लक्षण । तैस्तैर्भावैः शोचतोऽल्पाशनस्य बाष्पोष्मा वै वह्निमाविश्य जन्तोः । कोष्ठं गत्वा क्षोभयेत्तस्य रक्तं तच्चाधस्तात्काकणन्तीप्रकाशम् ॥ निर्गच्छेद्वै विडूविमिश्रं ह्यविड़वा निर्गन्धं वा गन्धवद्वातिसारः ॥ ९॥ जिस पुरुषके पुत्र, मित्र, स्त्री, धन इनका नाश होजावे वह उसी उसी वस्तुका शोच करे इसीसे क्षुधा मन्द होनेसे धातुक्षय होय, ऐसे प्राणीके बाष्प (नेत्र नासा गले आदिसे जो शोकद्वारा जल गिरे सो) और ऊष्मा कहिये शोकजन्य देह- तेज ये दोनों बाष्पोष्मा कोठेमें प्राप्त हो अग्निको मन्द कर रुधिरको कुपित करे तब यह रुधिर चिरमिटीके रंगसदृश हुआ गुदाके मार्ग होकर मलयुक्त अथवा मलरहित निकले तथा गन्धयुक्त अथवा गन्धरहित दस्त उतरे उसको शोकातिसार कहते हैं, इसी प्रकार भयातिसार भी जान लेना ॥ शोकातिसारके कृच्छ्रसाध्यत्व लक्षण । शोकोत्पन्नो दुश्चिकित्स्योऽतिमात्रं रोगो वैद्यैः कष्ट एष प्रदिष्टः॥१०॥ शोकसे उत्पन्न हुआ जो अतिसार वह चिकित्सा करनेमें बहुत कठिन है कारण कि, शोक शांत हुए बिना केवल औषधोंसे शांति नहीं होती इससे वैद्योंने यह कष्ट- साध्य कहा है ॥ आमातिसारके लक्षण । अन्नाजीर्णात्प्रद्रुताः क्षोभयन्तः कोष्ठं दोषा धातुसङ्घान्मलांश्च । नानावर्णं नैकशः सारयन्ति शूलोपेतं षष्ठमेनं वदन्ति ॥ ११ ॥ अन्नके न पचनेसे दोष (वात पित्त कफ) अपने मार्गको छोडकर कोठेमें प्राप्त हो कोठेको दूषित कर रक्तादि धातु और पुरीषादि मलको बारबार गुदाके मार्गसे बाहर निकाले और इसका रंग अनेक प्रकारका हो तथा शूलयुक्त दस्त उतरे इसको छठा आमातिसार वैद्य कहते हैं। शंका-प्रथम कहि आये हैं कि, अति- सार रोग छः प्रकारका होता है, पुनः- "षष्ठमेनं वदन्ति" यह पद क्यों धरा ? उत्तर- यह पद नियमके अर्थ माधवाचार्यने सुश्रुतके मतसे संग्रह किया है। हमारे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ५० ) माधवनिदान ।
( ५० ) माधवनिदान । मतमें छठा अतिसार आमज है जो भयसे उत्पन्न हुआ और आचार्य मानते हैं वह, हम नहीं मानते अतएव ‘ षष्ठमेनं ’ पुनः कहा है क्योंकि भयादि अतिसारोंका वात पित्त कफ अतिसारोंके अन्तर्गतत्व है ॥ आमके लक्षण । संसृष्टमेभिर्दोषैस्तु न्यस्तमप्स्ववसीदति । पुरीषं भृशदुर्गन्धि पिच्छिलं चामसंज्ञितम् ॥ १२ ॥ पूर्व कहे वातादि अतिसारोंके मिलेहुए लक्षणसंयुक्त जो मल वह जलमें गेर- नेसे डूब जाता है, क्योंकि आम वातजमें भारी है और उसमें बहुत दुर्गंध आती है तथा अत्यन्त गाढा होता है उसकी आमसंज्ञा है ॥ पक्व लक्षण । एतान्येव तु लिङ्गानि विपरीतानि यस्य वै । लाघवं च विशेषेण तस्य पक्वं विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥ और ऊपरके श्लोकसे विपरीत लक्षण होवे अर्थात् शरीर हलका हो तथा मल जलमें डूबे नहीं और दुर्गंधरहित हो, बबूलरहित हो उस रोगीका मल पक्व हुआ जाने ॥ असाध्य लक्षण । पक्वं जाम्बवसङ्काशं यकृत्पिण्डनिभं तनु । घृततैलवसामज्जावेस- वारपयोदधि ॥ १४ ॥ मांसधावनतोयाभं कृष्णं नीलारुण- प्रभम् । मेचकं कर्बुरं स्निग्धं चन्द्रकोपगतं घनम् ॥ १५॥ कुणपं मातुलुङ्गाभं दुर्गन्धं कुथितं बहु । तृष्णादाहारुचिश्वासहिक्कापा- र्श्वास्थिशूलिनम् ॥ १६॥ संमूर्च्छारतिसंमोहयुक्तं पक्ववलीगुदम् । प्रलापयुक्तं च भिषग् वर्जयेदातिसारिणम् ॥ १७ ॥ पके जामुनके रंगसदृश काला और चिकना तथा काला और लोहित रंग पतला घृत तेल चरबी मज्जा वेशंवार दूध दही और मांसके धोनेसे जैसा जल निकले है ऐसा रंग हो, काजलके रंगसमान अथवा नीलमिश्रित अरुण रंग अर्थात् पपैथा पक्षीके पंखके रंगसमान अथवा खंजन पक्षीके वर्णसदृश तथा अनेक रंगका चिकना मोरकी चंद्रिकाके सदृश रंग, दृढ, मुरदाकीसी दुर्गंध युक्त, मस्तककी मज्जाके समान १ बेशवार नाम—मांसमेंसे हड्डी निकाल और कूटकर दही दूध काली मिरच डालकर जो पदार्थ बनाते हैं तत्सदृश रंग हो ।
भाषाटीकासमेत । ( ५१ ) गन्धयुक्त बुरी दुर्गन्धके समान, प्यास, दाह, अरुचि, श्वास, हिचकी, पसवाडोंके हाडोंमें पीडा, मनको मोह और इंद्रियोंको मोह, अरति ये लक्षण होयँ तथा गुदाके आंटोंका पकना अनर्थ भाषण करे ऐसे अतिसारी रोगीको वैद्य छोडदे ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । असंवृतगुदं क्षीणं दुराध्मानमुपद्रुतम् । गुदे पक्के गतोष्माणमतिसारिणमुत्सृजेत् ॥ १८ ॥ जिसकी गुदाका दस्तके पिछाडी संकोच न होवे, क्षीण पुरुष, अत्यन्त अफरा- युक्त अथवा “ दुरात्मानं ” ऐसा भी पाठान्तर है अर्थात् जिसकी इंद्रिय वश न होवे तथा अतिसारके शोथादिक उपद्रव करके युक्त और गुदाके स्थानमें पाककर्त्ता पकानेवाला पित्त विद्यमान होते हुए जिसकी देहमें गरमीसी नहीं दीखे अर्थात् देह शीतल हो अथवा जिसकी अग्नि नष्ट होजावे ऐसे अतिसारी रोगीको वैद्य त्याग देवे॥ अतिसारके उपद्रव । शोथं शूलं ज्वरं तृष्णां श्वासकासमरोचकम् । छर्दिं मूर्च्छां च हिक्कां च दृष्ट्वाऽतीसारिणं त्यजेत् ॥ १९ ॥ सूजन, शूल, ज्वर, तृषा, श्वास, खांसी, अरुचि, वमन, मूर्च्छा, हिचकी ऐसे लक्षण जिस रोगीमें होयँ उसको वैद्य छोड दे ॥ असाध्य लक्षण । श्वासशूलपिपासार्त्तं क्षीणं ज्वरनिपीडितम् । विशेषेण नरं वृद्धमतिसारो विनाशयेत् ॥ २० ॥ श्वास, शूल, प्यास इनसे पीडित, क्षीण, ज्वरसे पीडित और वृद्ध मनुष्यके ये लक्षण होयँ तो यह अतिसाररोग मनुष्यको विनाश करे ॥ रक्तातिसारके लक्षण । पित्तकृन्ति यदात्यर्थं द्रव्याण्यश्नाति पैत्तिके । तदोपजायतेऽभीक्ष्णं रक्तातीसार उल्बणः ॥ २१ ॥ पित्तातिसारवाला पुरुष अथवा पित्तातिसार होनेवाला पुरुष जब पित्त करने- वाली वस्तु अधिक और निरन्तर भोजन करे तब भयंकर रक्तातिसार प्रगट होता है । इसके लाल काले पीले आदि रंग वातादि दोषोंके दूषित होनेसे होते हैं, ये भी पित्तातिसारके भेद हैं ॥
( ५२ ) माधवनिदान ।
( ५२ ) माधवनिदान । प्रवाहिकाकी सम्प्राप्ति । वायुः प्रवृद्धो निचितं बलासं नुदत्यधस्तादहिताशनस्य । प्रवाहतोऽल्पं बहुशो मलाक्तं प्रवाहिकां तां प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥२२॥ अपथ्य सेवन करनेवाले पुरुषके कुपित हुई जो वात सो संचित हुए कफकों मलसंयुक्त करके बारम्बार गुदाके मार्गसे बाहर निकाले और मरोडाके साथ पीडा हो, थोडा मल कई दफा निकले इसको प्रवाहिका कहते हैं। प्रवाहिका और अति- सार इन दोनोंका एक साधर्म्य है इसीसे अतिसार रोगमें प्रवाहिका कही है। परन्तु अतिसारमें अनेक प्रकारके द्रव धातु निकलते हैं और प्रवाहिकामें केवल कफ निक- लता है. इतना भेद है। इसमें “निचितं बलासम्” यह जो पद कहा अर्थात् कफसे मिलकर सो यह केवल कफका तो उपलक्षण है अर्थात् कफके कहनेसे पित्त और रुधिर भी जानना। भोजने इस रोगका नाम विवसी कहा है, पराशरऋषिने इसको अन्तरग्रन्थी कहा है,हारीत ऋषिने निश्वारक कहा है,कोई आचार्य निर्वाहिका कहते हैं॥ प्रवाहिकाके वातादि भेदकरके लक्षण । प्रवाहिका वातकृता सशूला पित्तात्सदाहा सकफा कफाच्च । सशोणिता शोणितसम्भवा च ताः स्नेहरूक्षप्रभवा मतास्तु। तासामतीसारवदादिशेच्च लिङ्गं क्रमं चामविपक्वतां च॥२३॥ वातकी प्रवाहिकामें शूल होता है, पित्तकी दाहयुक्त, कफकी कफयुक्त और रक्तसे रक्तयुक्त होती है। यह चिकने और रूखे पदार्थ भोजन करनेसे होती है अर्थात् चिकने पदार्थसे कफकी, रूखे पदार्थसे वातकी, तु-शब्द करके तीक्ष्ण और खट्टेपदार्थसे क्रमसे पित्तकी और रुधिरकी होती है ऐसे जानना। इस प्रवाहिकाके लक्षणक्रम आम और पक्वावस्था यह अतिसार निदानके सदृश जानना ॥ अतिसार चला गया होय उसके लक्षण । यस्योच्चारं विना मूत्रं सम्यग्वायुश्च गच्छति । दीप्ताग्नेर्लघुकोष्ठस्य स्थितस्तस्योदरामयः ॥ २४ ॥ जिस मनुष्यको मूत्र करते समय दस्त न होय और अपानवायु जिसकी शुद्ध निकले और अग्नि देदीप्यमान होवे, कोठा हलका होवे उस मनुष्यका अतिसार गया जानिये ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकाया- मतिसाररोगः समाप्तः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ ग्रहणीनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । (५३) अथ ग्रहणीनिदानम् । ग्रहणीकी सम्प्राप्ति । अतिसारे निवृत्तेऽपि मन्दाग्नेरहिताशिनः । भूयः संदूषितो वह्निर्ग्रहणीमभिदूषयेत् ॥ १ ॥ पहले मनुष्यके अतिसाररोग होकर जाता रहा होय फिर उस मनुष्यके कुपथ्य करनेसे मन्द हुई जो अग्नि पुरुषके उदरमें रहनेवाली जो पित्तधरानामक छठी कला जिसको ग्रहणी कहते हैं उसको बिगाड, अपिशब्द करके अतिसार न भया होय तो भी अपने कारण करके पूर्वोक्त ग्रहणीको बिगाडकर ग्रहणीरोगको प्रगट करे यह सूचना करी। कोई आचार्य ऐसे कहते हैं कि, अतिसार न गया होय, बीचमें ही ग्रहणीरोग होता है। "मन्दाग्नि" इस पद करकेयह सूचना करी कि, जिस पुरुषकी अग्नि तीक्ष्ण है वह कुपथ्य भी करे तथापि कुछ अवगुण नहीं होय, अन्नको ग्रहण करे है इसीसे इसको ग्रहणी कहे हैं, इसीसे ग्रहणी बिगडनेसे अन्नका परिपाक अच्छे प्रकार नहीं होय अर्थात् बारम्बार आम मिश्रित मल गुदाके मार्गसे गिरता है ॥ ग्रहणीरोगकी सम्प्राप्तिपूर्वक सामान्य लक्षण । एकैकशः सर्वशश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः । सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥ २ ॥ पक्वं वा सरुजं पूति मुहुर्बद्धं मुहुर्द्रवम् । ग्रहणीरोगमाहुस्तमायुर्वेदविदो जनाः ॥ ३ ॥ अत्यन्त कुपित हुए पृथक् १ दोष ( वात, पित्त, कफ ) और सर्व दोष मिलकर ग्रहणीको दुष्ट करें सो ग्रहणी दुष्ट होकर भोजन किये हुए पदार्थको कच्चा अथवा पक्का गुदाके मार्ग होकर निकाले और पीडा होय तथा उस मलमें दुर्गंध आवे, वादीसें पतला मल और पित्तसे गाढा दस्त बारम्बार होवे और कभी कफसे पानी सरीखा अधोवायुयुक्त निकले इसको आयुर्वेदके जाननेवाले वैद्य ग्रहणीरोग कहते हैं ॥ ग्रहणीके पूर्वरूप । पूर्वरूपं तु तस्येदं तृष्णाऽलस्यं बलक्षयः । विदाहोऽन्नस्य पाकश्च चिरात्कायस्य गौरवम् ॥ ४ ॥ प्यास, आलसक, बलनाश, अन्नका दाह ( पाकके समय अग्निसि जले ) और अन्नका पाक देरमें होय, देह भारी होय, यह ग्रहणीरोगका पूर्वरूप है ॥ १ यथाह चरके-" अग्न्यधिष्ठानमन्त्रस्य ग्रहणाद्ग्रहणी मता । नाभेरुपरि सा ह्यग्निबले- नस्तम्भबृंहिता । अपक्वं धारयत्यन्नं पक्वं सृजति चाप्यधः ॥"
( ५४ ) माधवनिदान ।
( ५४ ) माधवनिदान । वातग्रहणीका निदान । कटुतिक्तकषायातिरूक्षसंदुष्टभोजनैः । प्रमितानशनात्यध्ववेग- निग्रहमैथुनैः ॥ मारुतः कुपितो वह्निं संछाद्य कुरुते गदान् ॥५॥ कड़ुआ, तीखा, कसैला, अतिरूखा और संयोगविरुद्ध ऐसे भोजनसे तथा थोडे भोजनसे, उपवाससे, बहुत चलनेसे, मलमूत्रादि वेगोंके रोकनेसे, अत्यन्त मैथुनसे कुपित भई जो वात सो अग्निको कुपित कर रोगोंको प्रगट करे हैं ॥ वातजसंग्रहणीका रूप । तस्यान्नं पच्यते दुःखं शुक्तपाकं खराङ्गता ॥ ६ ॥ कंठास्यशोषः क्षुत्तृष्णा तिमिरं कर्णयोः स्वनः । पार्श्वोरुवंक्षणग्रीवारुगभीक्ष्णं विषूचिका ॥ ७ ॥ हृत्पीडाकार्श्यदौर्बल्यं वैरस्यं परिकर्तिका । गृद्धिः सर्वरसानां च मनसः स्पंदनं तथा ॥ ८ ॥ जीर्णे जीर्यति चाध्मानं भुक्तं स्वास्थ्यमुपैति च । स वातगुल्महृद्रोगप्लीहा- शङ्की च मानवः ॥ ९ ॥ चिराद्दुःखं द्रवं शुष्कं तन्वामं शब्द- फेनवत् । पुनः पुनः सृजेद्वर्चः कासश्वासार्दितोऽनिलात् ॥ १० ॥ उस वातग्रहणीवालेके अन्न दुःखसे पचे, अन्नका पाक खट्टा होय, अंगमें कर्क- शता ( यह वायुको त्वचाके चिकनापन सोखनेसे होता है ), कण्ठ मुखका सूखना, भूख, प्यास लगे, मन्द दीखे, कानोंमें शब्द हो, पसवाडे जांघ पेडू और कन्थामें पीडा होवे, विषूचिका हो अर्थात् दोनों द्वारसे कच्चे अन्नकी प्रवृत्ति होवे, हृदय दुखे, देह दुबला होजाय, जीभका स्वाद जाता रहे, गुदामें कतरनीकीसी पीडा हो, मीठेसे आदि ले सर्व रसोंके खानेकी इच्छा, मनमें ग्लानि, अन्न पचने उपरांत पेटका फूलना, भोजन करनेसे स्वस्थता, पेटमें गोला, हृद्रोग, तापतिल्लीकीसी शंका, वातके योगसे खांसी, श्वाससे पीडित, बहुत देरमें बडे कष्टसे कभी पतला कभी गाढा थोडा शब्द और झाग मिला वारम्वार दस्त हो जाय ॥ पित्तग्रहणीके लक्षण । कट्वजीर्णविदाह्यम्लक्षाराद्यैः पित्तमुल्बणम् । आप्लावयेद्धन्त्य- नलं जलं तप्तमिवानलम् ॥११॥ सोऽजीर्णं नीलपीताभं पीताभः सार्यते द्रवम् । संधूमोद्गारहृत्कण्ठदाहारुचितृडर्दितः ॥ १२ ॥ १ पृष्ट्यम्लोद्गार इत्यापि पाठः। दुर्गन्ध डकार तथा खट्टी डकार आवे ।
भाषाटीकासमेत । ( ५५ ) जो पुरुष कटु, अजीर्ण, मिरच आदि तीखी, दाहकारक (वंश, करीलकी कोंपल) आदि, खट्टी, खारी (ओंगा आदिका खार) आदिशब्दसे नोनका गरम पदार्थ इन कारणोंसे कुपित हुआ जो पित्त सो जठराग्निको ऐसे बुझा देता है जैसे तप्तजल अग्निको शांत कर देता है और पित्तकी ग्रहणीसे पीली कान्तिवाला पुरुष कच्चा तथा नीले पीले रंगके मलको निकाले तथा धूमयुक्त डकार आवे, हृदय और कंठमें दाह होवे, अरुचि और प्यास करके पीडित होवे, ये पित्तकी संग्रहणीके लक्षण हैं ॥ कफग्रहणीकी उत्पत्ति । गुर्वातिस्निग्धशीतादिभोजनादतिभोजनात् । भुक्तमात्रस्य च स्वप्नाद्धन्त्यग्निं कुपितः कफः ॥ १३ ॥ तस्यान्नं पच्यते दुःखं हृल्लासच्छर्द्यरोचकाः । आस्योपदेहमाधुर्यकासष्ठीवनपीनसाः ॥ १४ ॥ हृदयं मन्यते स्त्यानमुदरं स्तिमितं गुरु । दुष्टो मधुर उद्गारः सदनं स्त्रीष्वहर्षणम् ॥ १५ ॥ भिन्नामश्लेष्म- संसृष्टगुरुवर्चःप्रवर्तनम् । अकृशस्यापि दौर्बल्यमालस्यं च कफात्मके ॥ १६ ॥ भारी, अत्यन्त चिकना, शीतल आदि पदार्थके खानेसे अतिभोजनसे तथा भोजन करके दिनमें सोनेसे इन कारणोंसे कुपित हुआ कफ जठराग्निको शांत करे तब इसका खाया अन्न कष्टसे पचे, हृदयमें पीडा हो, वमन, अरुचि, मुख कफसे लिपासा तथा मुखका मीठा रहना, खांसी, कफ थूके, पीनस (जुखाम) हो, हृदय पानीसे भरासदृश हो, पेट भारी और जड हो, दुष्ट और मीठी डकार आवे, अग्नि शांत हो स्त्रीरमणमें अरुचि, पतला आम कफ मिला और भारी ऐसा मल निकले, बल विना शरीर पुष्ट दीखे, आलस्य बहुत आवे ये कफकी ग्रहणीके लक्षण हैं ॥ त्रिदोषकी ग्रहणीके लक्षण । पृथग्वातादिनिर्दिष्टहेतुलिङ्गसमागमे । त्रिदोषं लक्षयेद्देवं तेषां वक्ष्यामि भेषजम् ॥ १७ ॥ वातादि तीनों दोषोंके जो लक्षण कह आये हैं वे सब जिसमें मिलते होंयँ उसको त्रिदोषकी ग्रहणी जानिये “तेषां भेषजम्” यह पद केवल पादपूरणार्थ लिखा है ॥ (संग्रहणी लक्षण । अन्नकूजनमालस्यं दौर्बल्यं सदनं तथा । द्रवं शीतं घनं स्निग्धं सकटीवेदनं शकृत् ॥ १ ॥ आमं बहु सपैच्छिल्यं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ५६ ) माधवनिदान ।
( ५६ ) माधवनिदान । सशब्दं मन्दवेदनम् । पक्षान्मासादशाहाद्वा नित्यं वाप्यथ मुञ्चति ॥ २ ॥ दिवा प्रकोपो भवति रात्रौ शान्तिं व्रजेच्च सा । दुर्विज्ञेया दुश्चिकित्स्या चिरकालानुबन्धिनी ॥ सा भवे- दामवातेन संग्रहग्रहणी मता ॥ ३ ॥ आंतोंमें शब्द होना, आलसक, दुर्बलता, शरीरमें पीडा तथा पतला ठण्डा कुछ गाढा चिकना दस्त होवे दस्त होते समय कमरमें दर्द होवे । पन्द्रह दिन अथवा एक महीना अथवा दस दिन बाद हमेशा बहुत आम रेसादार शब्दसहित मन्द २ पीडासे निकले वह भी आम दिनमें अधिक निकले और रातमें शांतिको प्राप्त हो । दुःखसे जानने योग्य दुःखसे चिकित्सा करने योग्य बहुत समयतक रहनेवाली होवे । ऋषियोंने आम और वातसे संगृहीतको संग्रहणी कहा है ॥ स्वपतः पार्श्वयोः शूलं गलज्जलघटीध्वनिः । तं वदन्ति घटीयन्त्रमसाध्यं ग्रहणीगदम् ॥ ४ ॥ सोतेहुए मनुष्यके दोनों पसवाडोंमें शूल तथा निगलते हुए जलकी चेष्टाके समान शब्द हो उस ग्रहणी रोगको घटीयन्त्र कहते हैं और वह असाध्य है ॥ ) दोषं सामं निरामं च विद्यादत्रातिसारवत् ॥ १८ ॥ जैसे अतिसारमें मलका जलमें डूबने आदि लक्षणोंसे आम और उसके विप- रीत होनेसे निरामता ( यकृत् ) जानी जाती है उसी प्रकार ग्रहणीरोगमें भी जाननी चाहिये ॥ लिङ्गैरैसाध्यो ग्रहणीविकारो यैस्तैरतीसारगदो न सिध्येत् । वृद्धस्य नूनं ग्रहणीविकारो हत्वा तनूमेव निवर्तते च ॥ १९ ॥ जिन " पक्वं जाम्बवसंकाशम् " इत्यादि लक्षणोंसे अतिसाररोग असाध्य होजाता है उन्हीं लक्षणोंसे ग्रहणीरोग भी असाध्य होजाता है अर्थात् जो अतिसारके असाध्य लक्षण हैं वे ही ग्रहणीरोगके असाध्य लक्षण समझने चाहिये । और वृद्ध मनुष्यका ग्रहणीरोग तो शरीरको नाश करके ही दूर होता है ॥ बालके ग्रहणी साध्या यूनि कृच्छ्रा समीरिता । वृद्घे त्वसाध्या विज्ञेया मतं धन्वन्तरेरिदम् ॥ २० ॥ बच्चेके हुआ ग्रहणीरोग साध्य होता है और जवान पुरुषके ग्रहणीरोग कृच्छ्रसाध्य होता है और वृद्धके असाध्य जानना चाहिये, यह धन्वन्तरिजीका मत है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (५७) डाक्टरीमतके अनुसार परीक्षा व कारण । आमसे मिला मल उतरे, दस्त होते समय गुदा शब्द करे ऐसे एक महीना अथवा अधिक दिवस पर्यंत पीडा हो ॥ कारण-भारी द्रव्यके खानेसे अथवा देहके दुर्बल होनेसे मनुष्यके संग्रहणीरोग होता है ॥ इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां ग्रहणीरोगः समाप्तः ॥
अर्शोरोगनिदानम् । अतिसार ग्रहणी और अर्शका परस्पर सम्बन्ध है इससे ग्रहणीरोगके पीछे अर्शोरोग कहते हैं- संख्या रूप सम्प्राप्ति । पृथग्दोषैः समस्तैश्च शोणितात् सहजानि च । अर्शांसि षट्प्रकाराणि विद्याद्गुदवलित्रये ॥ १ ॥ पृथक् पृथक् दोषोंसे ३, समस्त दोष मिलकर १, रुधिरसे १ और सहज १ ऐसे छः प्रकारका अर्श ( बवासीर ) रोग है यह रोग गुदाकी तीन वलीके भीतर हो । गुदामें प्रवाहिणी विसर्जनी संवरणी यह तीन वली ( आँटे ) हैं ॥ सम्प्राप्तिपूर्वके अर्शका रूप । दोषास्त्वङ्मांसमेदांसि संदूष्य विविधाकृतीन् । मांसाङ्कुरानपानादौ कुर्वन्त्यर्शांसि तान् जगुः ॥ २ ॥ वातादि दोष त्वचा, मांस और मेदा इनको और उस ठिकानेके रुधिरको दूषित कर अपान (गुदा) में अनेक प्रकारकी आकृतिके मांसके अंकुर उत्पन्न करे अर्थात् मस्से प्रगट करे उसको बवासीर कहते हैं। आदिशब्दसे नाक, नेत्र, नाभिमें भी जानना, यह मत सुश्रुतका है। कायचिकित्सक तो गुदामें जो होय उसे बवासीर १ मनुष्यकी गुदामें तीन आंटे हैं एक ऊपर, एक नीचे क बीचमें। ऊपरके आंटेका नाम प्रवाहिणी है सो मल पवन आदिको बाहर काढे, बीचका आंटा मल पवनको बाहर पटक दे इसका नाम विसर्जनी है, तीसरा नीचेका आँटा मल पवन निकले पीछे ज्योंका त्यों गुदाको करदे तिसका नाम संवरणी है॥ २ गुदा साढे चार अंगुलकी होती है और गुदाके अवयवभूत तीन वली शंखके आवर्त समान प्रवाहिणी, विसर्जनी, संवरणीनामवाली ऊपर २ ही स्थित हैं। उसमें गुदाका ओष्ठ आधा अंगुलका होता है गुदोष्ठसे ऊपर प्रवाहिणी एक अंगुलकी और विसर्जनी डेढ अंगुलकी और संवरणीभी डेढ अंगुलकी होती है, इसी प्रकारसे गुदाका प्रमाण साढे चार अंगुलका होता है ।
( ५८ ) माधवनिदान ।
( ५८ ) माधवनिदान । कहते हैं, जो नासिका आदिमें होय उसको अधिमांस कहते हैं, क्योंकि नासिका आदिमें जो बवासीर होती है उसमें पूर्वरूपके लक्षण नहीं मिलते हैं ॥ वातकी बवासीरके कारण । कषायकटुतिक्तानि रूक्षशीतलघूनि च । प्रमिताल्पाशनं तीक्ष्णं मद्यं मैथुनसेवनम् ॥ ३ ॥ लंघनं देशकालौ च शीतौ व्यायाम- कर्म च । शोको वातातपस्पर्शं हेतुर्वातार्शसां मतः ॥ ४ ॥ कसैला, कडुवा, तीखा, रूखा, शीतल और अतिलघु ऐसे पदार्थोंके खानेसे तथा अति थोडा खानेसे, भोजनकालके उल्लंघन करनेसे, तीव्र मद्यके पान करनेसे, अत्यन्त मैथुन ( स्त्रीसंग ) करनेसे, उपवास, शीतदेश और शीतकाल ( हेमन्तादिकृतु ) दंड कसरतसे, शोकसे, हवा घाममें डोलनेसे ये वातकी बवासीर होनेके कारण हैं ॥ पित्तकी बवासीरके कारण । कट्वम्ललवणोष्णानि व्यायामाग्न्यातपश्रमाः । देशकालावाशिशिरौ क्रोधो मद्यमसूयनम् ॥ ५ ॥ विदाहि तीक्ष्णमुष्णं च सर्वं पानान्नभेषजम् । पित्तोल्वणानां विज्ञेयः प्रकोप हेतुर्शसाम् ॥ ६ ॥ तीखा, खट्टा, लवणका, गरम ऐसे पदार्थोंसे, दण्ड कसरतसे, अग्निके समीप तथा घाममें रहनेसे, श्रम, गरम देश ( मारवाड आदि ) और उष्णकाल अर्थात् ग्रीष्मऋतु, क्रोध, मद्यपान, परद्रव्य देखकर जलना, दाहकारक, तीखी, गरम वस्तुका पीना, अन्नका और गरम औषधिका सेवन ये सब पित्ताधिक बवासीरके कारण हैं ॥ कफकी बवासीरके कारण । मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च । अव्यायामदिवास्वप्न- शय्यासनसुखे रतिः ॥ ७ ॥ प्राग्वातसेवा शीतौ च देशकाला- वचिन्तनम् । श्लेष्मोल्वणानामुद्दिष्टमेतत्कारणमर्शसाम् ॥ ८ ॥ मीठा, चिकना, शीतल, खारी, खट्टा, भारी ऐसे भोजनसे, व्यायामके न करनेसे, दिनमें सोनेसे, सेज, गद्दी इनके सेवन करनेसे, पूर्वकी हवा खानेसे, शीतल देश, शीतकाल, चिन्तारहित होनेसे ये कफकी बवासीर होनेके हेतु हैं ॥ द्वंद्वज बवासीरके कारण । हेतुलक्षणसंसर्गाद्विद्याद्द्वन्द्वोल्वणानि च । दो दो दोषोंके कारण और लक्षण मिले तो द्वंद्वजबवासीर हुई है ऐसे जाने ॥
भाषाटीकासमेत । ( ५९ ) त्रिदोषकी बवासीरके कारण । सर्वो हेतुस्त्रिदोषाणां सहजैर्लक्षणैः समम् ॥ ९ ॥ पृथक् वातादि बवासीरके जो कारण कहे हैं वे सर्व त्रिदोषकी बवासीरके कारण हैं, और जो सहज अर्शके अर्थात् सहज बवासीरके लक्षण सो भी इसके लक्षण जानने ॥ वातकी बवासीरके लक्षण । गुदाङ्कुरा बह्वनिलाः शुष्काश्चिमिचिमान्विताः । म्लानाः श्यावारुणाः स्तब्धा विशदाः परुषाः खराः ॥ १० ॥ मिथो विसदृशा वक्रास्तीक्ष्णा विस्फुटिताननाः । बिंबिकर्कन्धु- खर्जूरकार्पासीफलसंनिभाः ॥ ११ ॥ केचित्कदम्बपुष्पाभाः केचित्सिद्धार्थकोपमाः । शिरःपार्श्वासकट्यूरूंवक्षणाभ्यधिक- व्यथाः ॥ १२ ॥ क्षवथूद्गारविष्टंभहृद्ग्रहारोचकप्रदाः । कास- श्वासाग्निवैषम्यकर्णनादभ्रमावहाः ॥ १३ ॥ तैरात्तो ग्रथितं स्तोकं सशब्दं सप्रवाहिकम् । रुक्फेनापिच्छानुगतं विबद्ध- मुपवेश्यते ॥ १४ ॥ कृष्णत्वङ्नखविण्मूत्रनेत्रवक्त्रश्च जायते । गुल्मप्लीहोदराष्ठीलासंभवस्तत एव च ॥ १५ ॥ वाताधिक्यसे गुदाके अंकुर सूखे (स्रावरहित) चिमचिम पीडायुक्त मुरझाये हुए, काले, लाल, टेढे, विशद, कर्कश, खरदरे, एकसे न होय, बांके, तीखे, फटे मुखके, कन्दूरी, बेर, खजूर, कपासके फलसदृश होय, कोई कदंबके फूल समान हों, कोई सरसोंके सदृश हों, शिर, पसवाडे, कन्धा, कमर, जांघ, पेडू इनमें अधिक पीडा हो, छींक, डकार, दस्तका न होना, हृदय पकडासा मालूम हो, अरुचि, खांसी, श्वास, अग्निका विषम होना अर्थात् कभी अन्न पचे, कभी नहीं पचे, कानोंमें शब्द होय, भ्रम होय उस बवासीरसे पीडित मनुष्यके पत्थरके समान, थोडा शब्दयुक्त १. अथ सहजाशोलक्षणम् । यथाच सुश्रुतः- "दुर्दर्शनानि परुषारुणपांडूनि दारुणान्त- मुखानि तैरुपद्रुतः कृशोऽल्पभुक् शिरासततगात्रोऽल्पप्रजः क्षीणरेताः क्षामस्वरः क्रोधनोऽल्पामि- र्घ्राणशिरोऽक्षिश्रवणरोगवान् सततमन्त्रकूजनाटोपहृदयोपलेपारोचकप्रभृतिभिः पीड्यते ।" दुःखसे देखने योग्य (बहुत छोटे होनेसे) अथवा भयंकर दर्शन और खरदरे लाल पीले वर्णवाले कठिन और भीतर मुखवाले मस्सों उपद्रवसे युक्त मनुष्य दुबला थोडा भोजन करने- वाला शिराओंसे व्याप्त शरीर (सब शरीरपर दीखें) अल्प सन्तान, क्षीण शुक्र, बैठी हुई आवाज, क्रोध, मन्दाग्नि, नाक शिर नेत्र कानोंके रोगवाला, निरन्तर आंतोंमें शब्द, अफरा, हृदयका भारीपन, अरुचि आदिसे पीडित होता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ६० ) माधवनिदान ।
( ६० ) माधवनिदान । और वातकी प्रवाहिकाके लक्षणसंयुक्त शूल, झाग, चिकटा इन लक्षण संयुक्त हौले हौले दस्त होयँ उस मनुष्यकी त्वचाका रंग तथा नख, विष्ठा, मूत्र, नेत्र, मुख ये काले होयँ, गोला तापतिल्ली ( उदररोग ) अष्ठीला ( वातकी गाँठ ) इन रोगोंके उपद्रव इस वातकी बवासीरमें होते हैं ॥ पित्तकी बवासीरके लक्षण । पित्तोत्तरा नीलमुखा रक्तपीताः सितप्रभाः । तन्वस्रस्राविणो विस्रास्तनवो मृदवः श्लथाः ॥ १६ ॥ शुकजिह्वायकृत्खण्ड- जलौकावक्त्रसन्निभाः । दाहपाकज्वरस्वेदतृण्मूर्च्छाऽरुचि- मोहदाः ॥ १७ ॥ सोष्माणो द्र्वनीलोष्णपीतरक्तामवर्चसः । यवमध्या हरितपीतहारिद्रत्वङ्नखादयः ॥ १८ ॥ मस्सोंका मुख नीला, लाल, पीला और सफेदाई लिये होवे उन मस्सोंमेंसे महीन धारसे रुधिर चुवाय और रुधिरकी वास आवे, महीन और कोमल तथा शिथिल हों और उनका आकार तोतेकी जीभ कलेजा और जोंकके मुखके समान हो और देहमें दाह हो, गुदाका पकना, ज्वर, पसीना, प्यास, मूर्च्छा, अरुचि और मोह ये होवें और हाथके स्पर्श करनेसे गरम मालूम होवे और जिसके मलका द्रव नीला, पीला, लाल, गरम, आमसंयुक्त होय, जबके समान बीचमें मोटे हों और जिसकी त्वचा, नख नेत्रादिक हरे पीले हरतालके समान और हलदीके समान होवे ये लक्षण पित्ताधिक बवासीरके हैं ॥ कफकी बवासीरके लक्षण । श्लेष्मोल्वणा महामूला घना मन्दरुजः सिताः । उत्सन्नो- पचिताः स्निग्धाः स्तब्धा वृत्तगुरुस्थिराः ॥१९॥ पिच्छिलाः स्तिमिताः श्लक्ष्णाः कण्ड्वाढ्याः स्पर्शनाप्रियाः । करीर- पनसास्थ्याभास्तथा गोस्तनसन्निभाः॥ २०॥ वंक्षणानाहिनः पायुवस्तिनाभिविकारिणः । सश्वासकासहृल्लासप्रसेकारुचि- पीनसाः ॥ २१ ॥ मेहकृच्छ्रशिरोजाड्यशिशिरज्वरकारिणः। क्लैब्याग्निमार्दवच्छर्दिरानप्रायविकारदाः ॥ २२ ॥ वसाभाः १ "सामान्यतो बवासीरो रीही खूनी द्विधा भवेत् । खूनी ह्यपि च वातस्य विना कोपं न संभवेत् ॥ १ ॥" इति यवनशास्त्रे । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत। ( ६१ ) सकफप्रायपुरीषाः सप्रवाहिकाः । न स्रवन्ति न भिद्यन्ते पाण्डुस्निग्धत्वगादयः ॥ २३ ॥ कफकी बवासीरके लक्षण ये हैं, जैसे कि, गुदाके मस्से महामूल ( दूर धातुके प्रति जानेवाले ), एक दूसरेसे मिले हुए, मन्द पीडाके करनेवाले, सफेद, लम्बे, मोटे, चिकने, करडे, गोल, भारी, स्थिर, गाढे, कफसे लिपटे, मणिके समान स्वच्छ, खुजली बहुत होय और प्यारी लगे, करील कटहर इनके कांटेके समान होयं, दाखके सदृश होयं, पेडूमें अफरा करनेवाले, गुदा, मूत्रस्थान और नाभि इनमें पीडा करने- वाले, श्वास, खांसी, खाली ओकारी, लारका टपकना, अरुचि, पीनस इनको करने- वाले, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, मस्तकका भारी होना, शीतज्वर, नपुंसकपना, अग्निका मन्द होना, वमनका और आम जिनमें बहुत ऐसे अतिसार, संग्रहणी आदि रोगके करने- वाले वसा ( चर्बी ) और कफ मिला दस्त होवे, प्रवाहिका उत्पन्न करनेवाले और मस्सोंमेंसे रुधिर न निकले, गाढा मल होनेसे भी मस्से न फूटें और शरीरका रंग पीला और चिकना होय ये कफकी बवासीरके लक्षण हैं ॥ सन्निपातके और सहज बवासीरके लक्षण । सर्वैः सर्वात्मकान्याहुर्लक्षणैः सहजानि च । जो पूर्व वातादि तीनों दोषोंकी बवासीरोंके लक्षण कहे सो सब मिलते हों उसको सन्निपातकी बवासीर जाननी और यही लक्षण सहज बवासीरके हैं ॥ रक्तार्शके लक्षण । रक्तोल्वणा गुदे कीलाः पित्ताकृतिसमन्विताः ॥ २४ ॥ वटप्ररोहसदृशा गुञ्जाविद्रुमसंनिभाः । तेऽत्यर्थं दुष्टमुष्णं च गाढविट्कप्रपीडिताः ॥ २५ ॥ स्रवन्ति सहसा रक्तं तस्य चातिप्रवृत्तितः । भेकाभः पीड्यते दुःखैः शोणितक्षय- संभवः ॥ २६ ॥ हीनवर्णबलोत्साहो हतौजाः कलुषेन्द्रियः । विट् श्यावं कठिनं रूक्षमधोवायुर्न गच्छति ॥ २७ ॥ गुदाके मस्सोंका रंग चिरमिटीके समान होवे अथवा बटके अंकुरसे हो और पित्तकी बवासीरके लक्षण जिसमें मिलते हों, मूँगाके सदृश हों और दस्त कठिन उतरनेसे मस्से दबें तब उन मस्सोंमेंसे दुष्ट और गरमागरम रुधिर पडे और रुधि- रके बहुत पडनेसे वर्षाऋतुके मेंडकके समान पीला रंग होजाय, रुधिरके निकलनेसे जो प्रगट त्वचाका कठोरपना, नाडीका शिथिलपना और खट्टी वस्तु तथा शीतकी