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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

अथ पाण्डुरोगनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । ( ७७ ) अथ पाण्डुरोगनिदानम् । पाण्डुरोगाः स्मृताः पञ्च वातपित्तकफैस्त्रयः । चतुर्थः सन्निपातेन पञ्चमो भक्षणान्मृदः ॥ १ ॥ मलसे प्रगट कृमिरोग पांडु ( पीलिया ) रोगको प्रगट करे है. इसी कारण कृमि- रोगके अनन्तर पांडुरोगका निदान कहते हैं । तहां प्रथम पांडुरोगकी संख्यारूप सम्प्राप्ति कहते हैं-१ वातका, २ पित्तका, ३ कफका, ४ सन्निपातका और ५ माटीके खानेसे पांडुरोग पांच प्रकारका कहा है ॥ पांडुरोगके कारण और सम्प्राप्तिके लक्षण । व्यवायमम्लं लवणानि मद्यं मृदं दिवास्वप्नमतीव तीक्ष्णम् । निषेव्यमाणस्य विदूष्य रक्तं दोषास्त्वचं पाण्डुरतां नयन्ति॥२॥ अति मैथुन, खट्टे पदार्थका भोजन, नोनका पदार्थ खानेसे, बहुत मद्य पीनेसे, मिट्टी खानेसे, दिनमें सोनेसे, अत्यन्त तीखा पदार्थ खानेसे इन कारणोंसे तीनों दोष रुधिरको बिगाड देहकी त्वचाको पीले रंगकी कर देते हैं । इस जगह रुधिरका तो उपलक्षणमात्र है, रक्तके कहनेसे त्वचा मांस इनको दूषित करते हैं यह दृढबलने कहा है । हारीतने रसको दूष्य कहा है दोष नाम वातादिक और दूष्य कहिये रसरक्तादि ॥ पांडुरोगके पूर्वरूप । त्वक्स्फोटनष्ठीवनगात्रसादमृद्भक्षणप्रेक्षणकूटशोथाः । विण्मूत्रपीतत्वमथाविपाको भविष्यतस्तस्य पुरःसराणि ॥ ३ ॥ त्वचाका फटना, मुखसे बारम्बार थूकना, अंगोंका जकडना, मिट्टी खानेकी इच्छा, नेत्रोंपर सूजन, मल, मूत्र पीले हों, अन्नका परिपाक न होय ये लक्षण पांडु- रोग प्रगट होनेवाला होय है तब होते हैं ॥ वातपांडुरोगके लक्षण । त्वङ्‌मूत्रनयनादीनां रूक्षकृष्णारुणात्मता । वातपाण्ड्वामये कम्पतोदानाहभ्रमादयः ॥ ४ ॥ वातके पांडुरोगमें त्वचा, मूत्र, नेत्र इनमें रूखापना कालापना और लाली होती है तथा कंप, सुई छेदनकासा चुभना, अफरा, भ्रम, आदिशब्दसे भेद और शूला- दिक भी होते हैं ॥

(७८) माधवनिदान ।

(७८) माधवनिदान । पित्तजपांडुरोगीके लक्षण । पीतमूत्रशकृन्नेत्रो दाहतृष्णाज्वरान्वितः । भिन्नविट्कोऽतिपीताभः पित्तपाण्डामयी नरः ॥ ५ ॥ पित्तपांडुरोगीके ये लक्षण होते हैं—मल मूत्र और नेत्र पीले हों, दाह, प्यास, ज्वर इनसे पीडित हो, मल पतला हो और उस रोगीके देहकी कांति अत्यन्त पीली होती है ॥ कफपांडुरोगीके लक्षण । कफप्रसेकश्वयथुतन्द्रालस्यातिगौरवैः । पाण्डुरोगः कफाच्छुक्लैस्त्वङ्‌मूत्रनयनाननैः ॥ ६ ॥ मुखसे कफका गिरना, सूजन, तन्द्रा, आलसक शरीरका भारी होना, त्वचा, मूत्र, नेत्र, मुख इनका सफेद होना इन लक्षणोंसे कफका पांडुरोग जानना ॥ सन्निपातयुक्त पांडुरोगके असाध्य लक्षण । ज्वरारोचकहृल्लासच्छर्दितृष्णाक्लमान्वितः । पाण्डुरोगी त्रिभिर्दोषैस्त्याज्यः क्षीणो हतेन्द्रियः ॥ ७ ॥ ज्वर, अरुचि, ओकारी ( उबकाई ), वमन, प्यास और क्लम इतने उपद्रवयुक्त जो त्रिदोषजन्य पांडुरोगी क्षीण होगया हो और जिसकी इंद्रियें अपना अपना विषय ग्रहण करनेकी शक्ति न रखती हों तो उसको वैद्य त्याग दे ॥ मिट्टीखानेसे प्रगट पांडुरोगकी सम्प्राप्ति । मृत्तिकादनशीलस्य कुप्यत्यन्यतमो मलः । कषाया मारुतं पित्तमूपरा मधुरा कफम् ॥८॥ कोपयेन्मृद्रसादींश्च रौक्ष्याद् भुक्तं च रूक्षयेत् । पूरयत्यविपक्कैव स्रोतांसि निरुणद्ध्यपि ॥ ९ ॥ इन्द्रियाणां बलं हत्वा तेजो वीर्यौजसी तथा। पाण्डु- रोगं करोत्याशु बलवर्णाग्निनाशनम् ॥ १० ॥ १ चरकमें लिखा है—सर्वान्नसेविनः सर्वे दुष्टा दोषास्त्रिदोषजम् । त्रिलिंगं संप्रकुर्वन्ति पांडुरोगं सुदुःसहम् ॥ सम्पूर्ण अन्नोंके सेवन करनेवाले पुरुषके तीनों दोष दुष्ट हुए त्रिदोषज पांडुरोगको करते हैं जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हैं उसको सन्निपातका पांडुरोग जानना और वह असाध्य है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (७९) मिट्टी खानेका जिस मनुष्यको अभ्यास पडजाय उसके वातादिक दोष कुपित होवें, कषेली मिट्टीसे वात कुपित होय, खारी मिट्टीसे पित्त और मीठी मिट्टीसे कफ कुपित होवे। फिर वही मिट्टी पेटमें जाकर रसादिक धातुओंको रूखा करे । जब रौक्ष्य गुण प्रगट होजाय तब जो अन्न खाय सो रूखा होजाय । फिर वही मिट्टी पेटमें बिना पके रसको रस बहनेवाली नसोंमें प्राप्त कर उनके मार्गको रोकदे, रसके बहने- वाली नसोंका मार्ग जब रुकजाय तब इन्द्रियोंका बल अर्थात् अपने अपने विषय ग्रहण करनेकी शक्तिका नाश होय, शरीरकी कांति तेज और ओज कहिये सब धातुओंका सार हृदयमें रहता है सो क्षीण होकर पाण्डुरोग प्रगट करे उसमें बल, वर्ण और अग्नि इनका नाश होता है ॥ पांडुके विशेष लक्षण । शूनाक्षिकूटगण्डभ्रूः शूनपन्नाभिमेहनः । कृमिकोष्ठोऽतिसार्येत मलं चासृक्कफान्वितम् ॥ ११ ॥ नेत्र, कपोल, भ्रुकुटी, पैर, नाभि और लिंग इनमें सूजन हो और कोठेमें क्रिमि पडजॉय तथा रुधिर और कफ मिला दस्त उतरे सब पाण्डुरोगोंमें जब पेटमें कृमि पडजॉय हैं तब ये पूर्वोक्त लक्षण होते हैं । यह जैज्जट आचार्यका मत है और कोई कहता है-ये मृत्तिकाजन्य पांडुरोगके लक्षणहैं। क्योंकि, मृत्तिकाजन्य पाण्डुरोगके लक्षण अनन्तर लिखे हैं परन्तु विदेहने तो ये मृत्तिकाजन्य पांडुरोगके लक्षण स्पष्ट कहे हैं ॥ असाध्य पांडुरोगके लक्षण । पाण्डुरोगश्चिरोत्पन्नः खरीभूतो न सिद्ध्यति । कालप्रकर्षा- च्छूनाङ्गो यो वा पीतानि पश्यति ॥ १२ ॥ बद्धालपविट् सह- रितं सकफं योऽतिसार्यते । दीनः श्वेतातिदिग्धाङ्गश्छर्दि- मूर्च्छातृषान्वितः ॥ १३ ॥ स नास्त्यसृक्क्षयाद्यस्तु पाण्डुः श्वेतत्वमाप्नुयात् । पाण्डुदन्तनखो यस्तु पाण्डुनेत्रश्च यो भवेत् ॥ १४॥ पाण्डुसङ्घातदर्शी च पाण्डुरोगी विनश्यति । अन्तेषु शूनं परिहीनमध्यं म्लानं तथा तेषु च मध्यशूनम् ॥ १५ ॥ गुदे च शोफस्यथ मुष्कयोश्च शूनं प्रताम्यं तमसंज्ञकल्पम् । विवर्जयेत्पाण्डुकिनं यशोर्थी तथातिसारज्वरपीडितं च ॥ १६ ॥ बहुत दिनका पांडुरोग बहुत काल बीतनेसे पुराना होजाता है सो अच्छा नहीं होय । अथवा-सब देहमें सूजन आगई होवे और उसको पदार्थ पीले दीखें सो भी

( ८० ) माधवनिदान ।

( ८० ) माधवनिदान । असाध्य है। अथवा-जिस मनुष्यका बँधाहुआ मल थोडा हरे रंगका कफमिश्रित उतरे सो भी असाध्य है । अथवा-जो पुरुष दीन कहिये ग्लानियुक्त हो और जिसकी देहका श्वेत वर्ण हो और वमन, मूर्च्छा, प्यास इनसे पीडित होवे सो पांडु- रोगी नष्ट होवे । अथवा-रुधिरक्षय होनेसे जो पांडुरोग श्वेतत्वको प्राप्त होय सो भी असाध्य है । जिसके दांत, नख और नेत्र पीले होंय वह रोगी असाध्य है । जिसको सब पदार्थ पीलेही पीले दीखें वह रोगी मरे । हाथ, पैर, शिर, इनमें सूजन हो और जिसका मध्य पतला होय ऐसा पांडुरोगी असाध्य है, इससे विपरीत साध्य है। जिस रोगीके देहके मध्यमें सूजन हो और हाथ, पग, शिर ये सूखजायँ तथा गुदा, लिङ्ग इनमें सूजन होय तथा मरेके समान होगया होय ऐसे पांडुरोगीको जिस वैद्यको यशकी इच्छा हो सो त्याग दे । इसी प्रकार अतिसार और ज्वर इनसे पीडित रोगीको वैद्य त्याग देवे परन्तु इस अन्तके श्लोकमें जो “ पाण्डुकिनं ” यह पाठ है। इस जगह पालकिनं ऐसा पाठ कोई आचार्य मानते हैं सो ठीक है क्योंकि ऐसा पढनेसे पांडुरोगकी अवस्था अर्थात् पांडुरोगका भेद जो पालकी है उसके भी लक्षण इस पाठसे आगये । सो सुश्रुतमें लिखा है, इसीका आश्रय लेकर किसी अन्यने भी लिखा है। यथा- अन्ते शूनः कृशो मध्ये त्वथवा गुदशेफसि ॥ शूनो ज्वरातिसाराद्यैर्मृतकल्पस्तु पालकी ॥ १७ ॥ जिस मनुष्यके हाथ पैरोंके ऊपर सूजन और देहका मध्य कृश होगया अथवा गुदा लिंगपर सूजन हो तथा ज्वर अतिसारके मुर्देके समान हो ये लक्षण पालकी रोगके हैं । पांडुरोगका भेद कामला है ॥ कामलाके लक्षण । पाण्डुरोगी तु योऽत्यर्थं पित्तलानि निषेवते । तस्य पित्तमसृङ्मांसं दग्ध्वा रोगाय कल्पते ॥ १८ ॥ हारिद्रनेत्रः स भृशं हारिद्रत्वङ्नखाननः । रक्तपित्तशकृन्मूत्रो भेकवर्णो हतेन्द्रियः ॥ १९ ॥ दाहाविपाकदौर्बल्यसदनारुचिकर्षितः । कामला बहुपित्तेषा कोष्ठशाखाश्रया मता ॥ २० ॥ १ सकामलापालकिपाण्डुरोगः कुम्भाह्वयो लाघविकोऽलसाख्यः । इति ॥

भाषाटीकासमेत । ( ८१ ) जो पाण्डुरोगी अत्यन्त पित्तकारक वस्तुओंके सेवन करे उसके पित्त, रुधिर मांसको जलाय ( दुष्ट कर ) कामलारूप रोग प्रगट करनेको समर्थ होय, उस मनु- ष्यके नेत्र अत्यन्त पीले होयँ, त्वचा, नख और मुख ये पीले होयँ, रक्तपित्तयुक्त मल, मूत्र काले होयँ अथवा पीले होयँ, वह मनुष्य वर्षाऋतुमें मेंढकके समान पीला होवे, इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट होय, दाह, अन्न पचे नहीं, दुर्बलता, अंगग्लानि, अन्नमें अरुचि इनसे पीडित होय. जिसमें पित्त प्रवल है ऐसी यह कामला एक कोष्ठाश्रय और दूसरी शाखा ( रक्तादि धातु ) आश्रित है । जैसे कासरोगसे भी राजयक्ष्मा पैदा होती है और स्वतन्त्र भी होती है उसी प्रकार कामला स्वतन्त्र भी होती है ॥ अब कहते हैं कि, पाण्डुरोगको उपेक्षा करनेसेही कामलादिक होते हैं उसीकी दूसरी अवस्था कुंभकामला है । अथ कुम्भकामलाके लक्षण । कालान्तरात्खरिभूता कृच्छा स्यात्कुम्भकामला । बहुत कालसे पुरानी पडनेसे जो कुंभकामला होवे सो कृच्छ्रसाध्य होती है । कुम्भ कहिये कोष्ठ तद्गत जो कामला उसको कुम्भकामला कहते हैं अर्थात् कोष्ठाश्रय कामला ॥ असाध्य कामलाके लक्षण । कृष्णपीतशकृन्मूत्रो भृशं शूनश्च मानवः । संरक्ताक्षिमखच्छर्दिंविण्मूत्रो यश्च ताम्यति ॥ २१ ॥ जिस मनुष्यका मल काला और मूत्र पीला हो और शरीरपर सूजन विशेष होवे और नेत्र मुख, वमन, मल और मूत्र ये अत्यन्त लाल होयँ, मोह होय वह कामलावान् रोगी बचे नहीं ॥ दाहारुचित्तृडानाहतन्द्रामोहसमन्वितः । नष्टाग्निसंज्ञः क्षिप्रं च कामलावान्विपद्यते ॥ २२ ॥ दूसरे असाध्य लक्षण-दाह, अरुचि, प्यास, अफरा, तन्द्रा इन लक्षणयुक्त तथा मन्दाग्नि और विस्मृतिवान् कामलावाला रोगी तत्काल मरे ॥ १" स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च । हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥"

( ८२ ) माधवनिदान ।

( ८२ ) माधवनिदान । कुम्भकामलाके असाध्य लक्षण । छर्द्यरोचकहृल्लासज्वरक्लमनिपीडितः । नश्यति श्वासकासार्त्तो विड्भेदी कुम्भकामली ॥ २३ ॥ वमन, अरुचि, ओकारीका आना, ज्वर, अनायास श्रम इनसे पीडित तथा श्वास खाँसी इनसे जर्जरित और अतिसारयुक्त ऐसा कुम्भकामलावाला रोगी मरजावे ॥ पाण्डुरोगसे हलीमक रोग प्रगट होता है, सो कहते हैं- यदा तु पाण्डुवर्णः स्याद्धरितः श्यावपीतकः । बलोत्साहक्षयस्तन्द्रा मन्दाग्नित्वं मृदुज्वरः ॥ २४ ॥ स्त्रीष्वहर्षोऽङ्गमर्दश्च दाहस्तृष्णाऽरुचिर्भ्रमः । हलीमकं तदा तस्य विद्यादनिलपित्ततः ॥ २५ ॥ जिस समय पाण्डुरोगीका वर्ण हरा, काला, पीला होय और बल व उत्साह इनका नाश, तन्द्रा, मन्दाग्नि, महीन ज्वर, स्त्रीसंभोगकी इच्छाका नाश, अंगोंका टूटना, दाह, प्यास, अन्नमें अप्रीति और भ्रम ये उपद्रव वातपित्तसे प्रगट हली- मक रोगके हैं ॥ पानकी लक्षण । सन्तापो भिन्नवर्चस्त्वं बहिरन्तश्च पीतता । पाण्डुता नेत्रयोर्यस्य पानकीलक्षणं भवेत् ॥ २६ ॥ सन्ताप कहिये इन्द्रिय, मन इनका ताप, मलका पतला होना, भीतर बाहर पीला हो जावे और नेत्रोंका पीला होना ये पानकी रोगके लक्षण हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां पाण्डुकामलाहलीमकनिदानं समाप्तम् ॥ अथ रक्तपित्तनिदानम् । पाण्डुरोगके सदृश रक्तपित्तको भी पित्तजन्य होनेसे तदनन्तर रक्तपित्तनिदानको कहते हैं- घर्मव्यायामशोकाध्वव्यवायैरतिसेवितैः । तीक्ष्णोष्णक्षारलवणैरम्लैः कटुभिरेव च ॥ १ ॥ १ रक्तं च तत् पित्तं च रक्तपित्तम् । अथवा रक्तं च पित्तं चेत्यनयोः समाहारः रक्तपित्तम्, तस्य निदानम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ८३ ) पित्तं विदग्धं स्वगुणैर्विदहत्याशु शोणितम् । ततः प्रवर्त्तते रक्तमूर्ध्वं वाऽधो द्विधापि वा ॥ २ ॥ ऊर्ध्वं नासाक्षिकर्णास्यैर्मेढूयोनिगुदैर्धः । कुपितं रोमकूपैश्च समस्तैस्तत्प्रवर्त्तते ॥ ३ ॥ धूपमें बहुत डोलनेसे, अति परिश्रम करनेसे, शोकसे, बहुत मार्ग चलनेसे, अति मैथुन करनेसे, मिरच आदि तीखी वस्तु खानेसे, अग्निके तापनेसे जवाखार आदि खारे पदार्थ, नोनसे आदि ले लवणके पदार्थ, खट्टी कडुवी ऐसी वस्तुओंके खानेसे कोपको प्राप्त भया जो पित्त सो अपने तीक्ष्ण द्रव पूति इत्यादि गुणोंसे रुधिरको बिगाडे तब रुधिर ऊपरके अथवा नीचेके मार्ग अथवा दोनों मार्ग होकर प्रवृत्त हो निकले ( ऊपरके मार्ग, नाक, नेत्र मुख इनके द्वारा निकले ) और अधोमार्ग कहिये लिंग गुदा और योनि इनके रास्ते होकर निकले और जब रुधिर अत्यन्त कुपित होय तब दोनों मार्ग और सब रोमछिद्रोंके द्वारा निकले हैं ॥ रक्तपित्तका पूर्वरूप । सदनं शीतकामित्वं कण्ठधूमायनं वमिः । लोहगन्धिश्च निश्वासो भवत्यस्मिन् भविष्यति ॥ ४ ॥ ग्लानि, शीतकी इच्छा, कण्ठसे धूआं निकलना, वमन और तपाये भये लोहेपर जल गेरनेसे जैसी गन्ध आवे ऐसी श्वास लेनेसे गन्धका आना जिस मनुष्यमें इतने लक्षण मिलते होयँ उसको जानना कि, इसके रक्तपित्त प्रगट होवेगा ॥ कफयुक्त रक्तपित्तके लक्षण । सान्द्रं सपाण्डु सस्नेहं पिच्छिलं च कफान्वितम् । सघन, कुछ पीला और कुछ चिकना तथा गाढा ऐसा रक्तपित्त कफमिश्रित जानना॥ वातिक रक्तपित्तके लक्षण । श्यावारुणं सफेनं च तनु रूक्षं च वातिकम् ॥ ५ ॥ नीलवर्ण, लालवर्ण, कुछ झागयुक्त, पतला और रूखा ऐसा रक्तपित्त वातका जानना ॥ पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण । रक्तपित्तं कषायाभं कृष्णं गोमूत्रसंनिभम् । मेचकागारधूमाभमञ्जनाभं च पैत्तिकम् ॥ ६ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ८४ ) माधवनिदान ।

( ८४ ) माधवनिदान । जो रक्तपित्त काढेके रंगसमान हो, काला, गौके मूत्र समान हो अथवा मोरकी चन्द्रिकाके समान नीलवर्ण अर्थात् बैंगनी रंगके सदृश होय, घरके धूएँके सुर्माके समान हो ये पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण हैं । शंका-क्यों जी ! केवल पैत्तिक रक्त- पित्त नहीं हो सके है । कारण इसका यह है कि, जैसे कफके रक्तपित्तका मार्ग कहा है इस प्रकार पैत्तिक रक्तपित्तका नहीं कहा ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु यह मार्ग जो कहा है सो वातकफके लक्षण प्रति नहीं कहा है ॥ द्विदोषजादि रक्तपित्तके लक्षण । संसृष्टलिङ्गं संसर्गात्त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् । ऊर्ध्वगं कफसंसृष्टमधोगं मारुतान्वितम् ॥ ७ ॥ द्विमार्गं कफवाताभ्यामुभाभ्यामनुवर्त्तते । दो दोषके मिलनेसे जो रक्तपित्त होता है उसमें दोनों दोषोंके लक्षण मिलनेसे द्विदोषज जानना और जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों उसको सन्निपातका रक्त पित्त जानना । ऊपरके मार्गसे कफका और नीचेके मार्ग होकर वातका और दोनों- मार्गोंसे जो रक्तपित्त निकले सो वात और कफ इन दोषोंसे प्रगट भया जानना ॥ ऊर्ध्वगादिकोंका साध्यासाध्यविचार । ऊर्ध्वं साध्यमधो याप्यमसाध्यं युगपद्द्रुतम् ॥ ८ ॥ ऊपरके मार्गसे लोही निकले सो साध्य है (क्योंकि कफसे प्रगट है सो कफके रक्तपित्तमें काथ तीखे रस कफपित्तके हरणकर्ता होते हैं ) और नीचेके मार्गसे जिसमें रुधिर गिरे सो याप्य ( साध्यासाध्य ) है इसका कारण यह है कि, पित्तके हरणमें विरेचन मुख्य है और इसपर वातपित्त शमन करनेवाला मधुररस प्रधान वमन देनेसे विरुद्धमार्गी होते हैं अर्थात् ( वेगमात्रका अवरोधक है परन्तु पित्तका हरण करनेवाला नहीं है ) और दोनों मार्गोंसे गिरनेवाला रक्तपित्त असाध्य है कारण इसपर विरुद्ध चिकित्सा करनी पडती है ॥ साध्य होनेके कारण । एकमार्गं बलवतो नातिवेगं नवोत्थितम् । रक्तपित्तं सुखे काले साध्यं स्यान्निरुपद्रवम् ॥ ९ ॥ बलवान् पुरुषके एक मार्ग अर्थात् ऊपरके मार्गसे जाता हो, अतिवेग नहीं हो, १-यदुक्तं चरके “ साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते । विरेचनस्य योग्यत्वाद् बहुत्वाद् भेषजस्य च । विरेचनं हि पित्तस्य जयाय परमौषधम् ॥ ” इत्यादि । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ८५ ) नवीन प्रगट भया हो और हेमन्त शिशिर कालमें प्रगट भया हो और दुर्बलता आदि उपद्रवरहित हो ऐसा रक्तपित्त साध्य होता है ॥ दोषभेदसे साध्यासाध्य लक्षण । एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते । त्रिदोषजमसाध्यं स्यान्मन्दाग्नेरतिवेगितम् ॥ १० ॥ व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत् ॥ ११ ॥ एकदोषका रक्तपित्त साध्य है, द्विदोषका याप्य है और तीनों दोषोंका असाध्य है। मन्दाग्नि अतिवेगसे हो, रोगसे क्षीण देहवालेका, बूढ़े मनुष्यका और जिसका आहार थकगया हो ऐसे मनुष्योंका रक्तपित्त असाध्य होता है ॥ रक्तपित्तके उपद्रव । दौर्बल्यं श्वासकासज्वरवमथुमदाः पाण्डुता दाहमूर्च्छा भुक्ते घोरो विदाहस्त्वधृतिरपि सदा हृद्यतुल्या च पीडा । तृष्णा कोष्ठस्य भेदः शिरसि च तपनं पूतिनिष्ठीवनत्वं भक्तद्वेषाविपाकौ विकृतिरपि भवेद्रक्तपित्तोपसर्गाः ॥ १२ ॥ अशक्तता, श्वास, खांसी, ज्वर, वमन, धतूरेके फल खानेसे जैसी अवस्था हो ऐसी अवस्था, शरीरका पीला वर्ण होजाय, मूर्च्छा, अन्न खानेसे अत्यन्त दाह हो, अधीरपना, सर्वकाल हृदयमें विलक्षण पीडा, प्यास, कोष्ठभेद (अर्थात् मल पतला हो), मस्तकमें पीडा, दुर्गन्धयुक्त थूकना, अन्नमें अरुचि, आहारका परिपाक न होना ये रक्तपित्तके उपद्रव हैं और उसी प्रकार उस रक्तपित्तकी विकृति भी होय है सो आगे-“ मांसप्रक्षालनाभम् ” इत्यादि श्लोककरके कहते हैं ॥ असाध्य लक्षण । मांसप्रक्षालनाभं क्वथितमिव च यत्कर्द्दमाम्भोनिभं वा मेदःपूयास्रकल्पं यकृदिव यदि वा पक्वजम्बूफलाभम् । यत्कृष्णं यच्च नीलं भृशमतिकुणपं यत्र चोक्ता विकारा- स्तद्वर्ज्यं रक्तपित्तं सुरपतिधनुषा यच्च तुल्यं विभाति॥१३॥ जो रक्तपित्त मांस धोये हुए जलके समान हो अथवा सडे पानीके समान अथवा कीचके समान अथवा जलके समान; उसी प्रकार मेद, राध, रुधिर इनके समान अथवा कलेजेके टुकडेके समान अथवा पकी जामुनके समान किंवा काले रंगका किंवा नील कहिये पपैया पक्षीके पंखके समान जिसमें मुरदेकीसी बास आवे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ८६ ) माधवनिदान ।

( ८६ ) माधवनिदान । और जिसमें पूर्वोक्त ( कहे ) श्वासकासादि विकार युक्त हों ऐसा रक्तपित्त वर्जित है और जो रक्तपित्त इन्द्रधनुषके वर्ण समान रंगवाला हो सो भी त्याज्य है अर्थात् ऐसे रक्तपित्तकी वैद्य चिकित्सा न करे ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । येन चोपहतो रक्तं रक्तपित्तेन मानवः । पश्येद दृश्यं वियच्चापि तच्चासाध्यमसंशयम् ॥ १४ ॥ जिस रक्तपित्तने मनुष्यको ग्रस लिया होय वह दृश्य ( घटपटादि ) और वियत ( आकाश ) इनको रक्तवर्णका देखे वह रोगी निःसन्देह असाध्य जानना ॥ लोहितं छर्दयेद्यस्तु बहुशो लोहितेक्षणः । लोहितोद्गारदर्शी च म्रियते रक्तपैत्तिकः ॥ १५ ॥ दूसरे असाध्य लक्षण-जो वारंवार रुधिरकी वमन करे और जिसके लाल नेत्र होयँ तथा डकार भी लाल आवे वह रक्तपित्तवाला रोगी मरजावे ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायां रक्तपित्तनिदानं समाप्तम् ॥ अथ राजयक्ष्मनिदानम् । —⁘⁘⁘⁘— वेगरोधात् क्षयाच्चैव साहसाद्विषमाशनात् । त्रिदोषो जायते यक्ष्मा गदो हेतुचतुष्टयात् ॥ १ ॥ वात, मूत्र, पुरीष आदि वेगोंके रोकनेसे, अतिमैथुन, उपवास, ईर्ष्या, खेद इत्यादिक धातुक्षयके कारणोंसे, बलवान्से वैर करनेसे, विषमाशन कहिये कुस- मय थोडा अथवा बहुत भोजन करनेसे इन चार कारणोंसे तीनों दोषोंके कोपसे मनुष्यके राजयक्ष्मा रोग होता है । वेगका रोकना ही वातकोपका कारण है, यह सत्य है तथापि वातकोपसे अग्नि दुष्ट होकर कफपित्तका कोप होता है, इन चार हेतुओंमें असंख्य हेतुओंका अन्तर्भाव होता है. रसादि धातुओंके शोषणे (सुखाने) से इस रोगको ( शोष ) कहते हैं तथा शरीरमें पाचनादि सर्व क्रियाओंको क्षय करे है इसीसे इस रोगको ( क्षय ) कहते हैं और राजा ( चन्द्र ) इस रोगसे अतिपीडित भया इसीसे इसको ( राजयक्ष्मा ) कहते हैं । यह सुश्रुतका १ संशोषणाद्रसादीनां शोष इत्यभिधीयते । क्रियाक्षयकरत्वाच्च क्षय इत्युच्यते पुनः ॥ राज्ञश्चन्द्रमसो यस्मादभूदेष किलामयः । तस्मात्तं राजयक्ष्मेति केचिदाहुर्मनीषिणः ॥ इति ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ८७ ) आशय है और वाग्भटने इसको सर्व रोगोंका राजा कहा है इसीसे इसको राजयक्ष्मा नाम कहा है । इस श्लोकमें जो कहा है कि, त्रिदोषका एक ही यक्ष्मा रोग प्रगट होता है उसका तात्पर्य यह है कि, तीनों दोषोंके कारणभेदसे अनेक प्रकारका नहीं है सो सुश्रुतमें कहा भी है और इस श्लोकमें “वेगरोधात्” इस पदमें केवल वात, मूत्र, मल इनका ही ग्रहण करना चाहिये, श्रमादिक सबोंका ग्रहण नहीं है, सो चरकमें लिखा है ॥ राजयक्ष्माकी विशिष्टसंप्राप्ति । कफप्रधानैर्दोषैस्तु रुद्धेषु रसवर्त्मसु । अतिव्यवायिनो वापि क्षीणे रेतस्यनन्तराः ॥ क्षीयन्ते धातवः सर्वे ततः शुष्यति मानवः ॥ २ ॥ कफ है प्रधान जिनमें ऐसे जो वातादि दोष तिन करके रसके बहनेवाली नाडि- योंके मार्ग रुक जानेसे (इससे यह सूचना करी कि, रसमार्ग बन्द होनेसे हृदयमें स्थित जो रस उसको बिगाड और उसी स्थानमें विकृति कहिये और प्रकारका स्वरूप करके खांसीके वेगसे मुखमार्ग होकर निकाले) सो चरकमें लिखा भी है । (इससे अनुलोमक्षयं दिखाय अब प्रतिलोमक्षय कैसा होता है उसको कहते हैं-) अथवा अतिमैथुन करनेसे मनुष्यका वीर्य क्षीण होता है, जब शुक्र क्षीण होजाय तब समीपकी धातु क्षीण होयं तब पुरुष सूखने लगता है, जैसे शुक्र क्षीणके अनन्तर मज्जा क्षीण होय, मज्जा क्षीणके अनन्तर हड्डी क्षीण होयं ऐसे पूर्वपूर्व धातु क्षीण हो जायं । शंका--क्यों जी ! रस, रुधिर, मांस, मेदा, हड्डी, मज्जा, शुक्र इनमें क्रमसे प्रत्येक क्षीण होनेसे शुक्रका क्षय होना उचित है, परन्तु कार्यभूत शुक्रका क्षय होनेसे कारणभूत धातुओंका नाश कैसे होता है ? उत्तर--जब शुक्रका क्षय होता है तब वात कुपित होता है, सो तन्त्रान्तरोंमें लिखा है अर्थात् धातुके नष्ट होनेसे पवनको बहनेवाली नाडियोंका मार्ग बन्द होकर वायुको कुपित करे तब वही पवन समीपकी मज्जा धातुको सुखावे तदनंतर हड्डी और उसके पश्चात् मेदा इसी रीतिसे रसपर्यंत धातुओंको सुखावे है, इस जगहपर दृष्टान्त है-जैसे अग्निमें तपायभया लोहका गोला गीली पृथ्वीमें धरनेसे प्रथम समीपकी पृथ्वीके आर्द्रपनेको शोषण करे पीछे दूरका गीलापन शोषण करे उसी रीतिसे यहां जानना चाहिये ॥ १ “एक एव मतः शोषः स.त्रिपातात्मको यतः । उद्रेकात्तत्र लिंगानि दोषाणां निर्मितानि हि॥” इति । २ “ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् । वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः॥” इत्यादि । ३ रससे रुधिर, रुधिरसे मांस, इसी रीतिसे शुक्रपर्यंत धातुओंका क्षय हो सो । ४शुक्रसे रसपर्यंत धातुओंका शोष हो सो। ५ “वायोर्धातुक्षयात् कोपो मार्गस्यावरणेन च” इति॥

( ८८ ) माधवनिदान ।

( ८८ ) माधवनिदान । राजयक्ष्माके पूर्वरूप । श्वासाङ्गसादकफसंस्रवताळुशोषवम्यग्निसादमदपीनसकास- निद्राः । शोषे भविष्यति भवन्ति स चापि जन्तुः शुक्लेक्षणो भवति मांसपरो रिरंसुः ॥३॥ स्वप्नेषु काकशुकशल्लकिनील- कण्ठगृध्रांस्तथैव कपयः कृकलासकाश्च । तं वाहयन्ति स नदीर्विजलाश्च पश्येच्छुष्कांस्तरून् पवनधूमदवार्दितांश्च ॥ ४ ॥ श्वास, हाथ पैरका गलना, कफका थूकना, तालुवेका सूखना, वमन, मंदाग्नि, उन्मत्तता, पीनस, खांसी और निद्रा ये लक्षण धातुशोष होनेवालेके होते हैं और उस मनुष्यके नेत्र सफेद होते हैं और उस मनुष्यकी मांस खानेपर तथा स्त्रीसङ्ग करनेको इच्छा होती है और स्वप्नमें कौआ, तोता, सेह, नीलकंठ ( मोर ), गीध, बन्दर, करकेटा इनपर अपनेको बैठा देखे और जलहीन नदीको देखे तथा पवन, धूल और धूआँ इनसे पीडित ऐसे वृक्ष देखे, चकारसे तृण, केश आदिका गिरना ये होते हैं। ये सब स्वप्न क्षयरोग होनेसे पहिले दीखते हैं, सो चरकमें लिखा है। शंका-क्योंजी ! शुक्रका तो क्षय हो जाता है फिर “ रिरंसुः ” यह पद क्यों धरा ? उत्तर-यह केवल व्याधिके बढनेसे मनके दोषसे जानना चाहिये ॥ त्रिरूपक्षयके लक्षण । अंसपार्श्वाभितापश्च संतापः करपादयोः । ज्वरः सर्वाङ्गगश्चैव लक्षणं राजयक्ष्मणः ॥ ५ ॥ कन्धा और पसवाडोंमें पीडा हो, हाथ पैरमें जलन और सर्व अंगोंमें ज्वर ये राजयक्ष्माके लक्षण हैं, ये तीन लक्षण अवश्य होते हैं ऐसा चरकने कहा है ॥ एकादशरूप षड्रूप और त्रिरूप शोषके लक्षण कहते हैं— स्वरभेदोऽनिलाच्छूलं संकोचश्चांसपार्श्वयोः । ज्वरो दाहोऽतिसारश्च पित्ताद्रक्तस्य चागमः ॥ ६ ॥


१ “पूर्वरूपं प्रतिश्यायो दौर्बल्यं दोषदर्शनम् । अदोषेष्वपि भावेषु काये बीभत्सदर्शनम् ॥ घृणित्वमश्नतश्चापि बलमांसपरिक्षयः । स्त्रीमद्यमांसप्रियता प्रियता चावगुण्ठने ॥ मक्षिकाघृण- केशादितृणानां पतनानि च । प्रायोऽन्नपाने केशानां नखानां चाभिवर्द्धनम् ॥ पतत्रिभिः पतङ्गैश्च श्वापदैश्चापि धर्षणम् । स्वप्ने केशास्थिराशीनां भस्मनश्चाधिरोहणम् ॥ जलाशयानां शैलानां वनानां ज्योतिषामपि । शुष्यतां क्षीयमाणानां पततां चापि दर्शनम् ॥ प्राग्रूपं बहुरूपस्य तज्ज्ञेयं राजयक्ष्मणः ॥” इति । अत्र श्वापदा व्याघ्रादयः ।

भाषाटीकासमेत । (८९)

शिरसः परिपूर्णत्वमभक्तच्छन्द एव च । कासः कण्ठस्य चोद्ध्वंसो विज्ञेयः कफकोपतः ॥ ७ ॥ एकादशभिरेतैर्वा षड्भिर्वापि समन्वितम् । कासातिसारपार्श्वार्तिस्वरभेदारुचिज्वरैः ॥ ८ ॥ त्रिभिर्वा पीडितं लिङ्गैर्ज्वरकासासृगामयैः । जह्याच्छोषार्दितं जन्तुमिच्छन्सुविपुलं यशः ॥ ९ ॥ यह राजयक्ष्मा त्रिदोषसे उत्पन्न है इसमें दोषोंके न्यारे न्यारे मिलाय कर सब ग्यारह रूप हैं, ये व्याधिके प्रभावसे होते हैं। सन्निपातज्वरके सदृश सर्वलक्षण सब दोषोंसे नहीं होते पृथक् पृथक् होते हैं। सो दिखाते हैं-बादीके प्रभावसे स्वरभेद, कन्धे और पसवाडोंमें संकोच और पीडा हो, पित्तसे ज्वर, दाह, अतिसार और मुखसे रुधिरका गिरना और कफके कोपसे मस्तकका भारीपना, अन्नसे द्वेष, खांसी, स्वरभेद ये लक्षण होते हैं, इसमें तीन तो वातसे और चार लक्षण पित्तसे तथा चारही लक्षण कफसे ऐसे सब ग्यारह लक्षणसे अथवा खांसी, अतिसार, पसवाडोंमें पीडा, स्वरभेद, अरुचि और ज्वर इन छः लक्षणोंसे अथवा ज्वर खांसी और रुधिरविकार इन तीन लक्षणोंसे पीडित क्षयीरोगवाले मनुष्य तथा जिसका बल मांस क्षीण होगया हो ऐसे रोगीको यशकी इच्छावाला वैद्य त्याग दे ऐसा रोगी असाध्य है ॥ साध्यासाध्य विचार । सर्वैरधैँस्त्रिभिर्वापि लिङ्गैरैर्वापि बलक्षये । युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा ॥ १० ॥ स्वरभेदादिक जो ग्यारह लक्षण कहे उन सब लक्षणों करके अथवा उनमेंसे आधे अर्थात् छः लक्षणोंसे अथवा तीन लक्षण कहे इनसे युक्त जो क्षयीरोगी बल, मांस क्षीण होनेपर त्याज्य है। यदि बल, मांस जिसका क्षीण न भया हो परन्तु सर्व- लक्षण युक्त भी है तथापि त्याज्य नहीं है, उसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ असाध्य लक्षण । महाशिनं क्षीयमाणमतिसारनिपीडितम् । शूनमुष्कोदरं चैव यक्ष्मिणं परिवर्जयेत् ॥ ११ ॥ जो बहुत भोजन करे परन्तु दिनप्रति क्षीण होता जाय वह असाध्य रोगी है, अतिसार करके अत्यन्त पीडित हो सो रोगी भी असाध्य होता है. क्योंकि क्षय- रोगवालेका जीना मलके आधीन है । जैसे लिखा है-“मलायत्तं बलं पुंसां शुक्रा-

( ९० ) माधवनिदान ।

( ९० ) माधवनिदान । यत्तं तु जीवितम् । तस्माद्यत्नेन संरक्षेद्यक्ष्मिणो मलरेतसी ॥" इति । और जिसके अंडकोश और उदर ये सूज गये हों ऐसा रोगी असाध्य है क्योंकि शोथवाला दस्तके करानेसे अच्छा होता है सो इसपर दस्त कराना वर्जित है । इसीसे ऐसे रोगीको वैद्य त्याग दे ॥ कौनसे रोगीको औषध देना योग्य है ? सो कहते हैं— ज्वरानुबन्धरहितं बलवन्तं क्रियासहम् । उपक्रमेदात्मवन्तं दीप्ताग्निमकृशं नरम् ॥ १२ ॥ जिस क्षय रोगवाले मनुष्यको ज्वरका सम्बन्ध होय नहीं, बलवान्, औषधादि उपचारका सहनेवाला और जिसकी इन्द्रियें बलमें हों तथा जठराग्नि जिसकी दीप्त होय और कृश न हो ऐसे रोगीकी चिकित्सा ( उपचार ) करना चाहिये । इस श्लोकमें "अकृशं" इस पदके धरनेका यह प्रयोजन है कि पुष्टदेहवाला भी क्षय रोगसे हजार दिन बच सके है सोई ग्रन्थान्तरमें लिखो है ॥ असाध्य लक्षण । शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनिपीडितम् । कृच्छ्रेण बहु मेहन्तं यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ॥ १३ ॥ सफेद नेत्र जिसके होगये हों, अन्न जिसको बुरा लगे, ऊर्ध्वश्वाससे पीडित और कष्टसे बहुत मूतनेवाला अर्थात् मल सुखसे उतरे इससे यह दिखाया कि जो आहार खाय सो मल होजाय, जब आहारका मल होगया तब उसके मांस रुधिर इनका क्षय होता है इसीसे यह असाध्य है, शुक्लाक्षादिक ये प्रत्येक अलग २ भी असाध्य हैं ॥ अब कहते हैं, कि अति मैथुनादि करनेसे धातुका क्षय होता है इसीसे क्षयरोग प्रगट होता है ऐसा नहीं किन्तु और भी कारणसे होता है उसको कहते हैं— व्यवायशोकवार्द्धक्यव्यायामाध्वप्रशोषिणः । व्रणोरःक्षतसंज्ञौ च शोषिणौ लक्षणं शृणु ॥ १४ ॥ अति मैथुनसे शोषी, शोक शोषी, वार्द्धक्यशोषी, व्यायामशोषी, मार्गशोषी, व्रण- शोषी और उरःक्षतशोषी इनके न्यारे न्यारे लक्षण कहता हूँ ॥ व्यवायशोषीके लक्षण । व्यवायशोषी शुक्रस्य क्षयलिङ्गैरुपद्रुतः । पाण्डुदेहो यथापूर्वं क्षीयन्ते चास्य धातवः ॥ १५ ॥ १ परं दिनसहस्रं तु यदि जीवति मानवः । सुभिषग्भिरुपक्रान्तस्तरुणः शोषपीडितः ॥ इति ॥

भाषाटीकासमेत । ( ९१ ) व्यवायशोषी ( अति मैथुनसे क्षीण भया ) सुश्रुतके कहे अनुसार शुक्रक्षय- लक्षणोंसे [ शुक्रक्षय होनेसे लिंग और अण्डकोशमें पीडा होय, मैथुन करनेसे अशक्त और बलसे मैथुन करे तो बहुत देरमें शुक्रका स्राव हो और वह स्राव बहुत अल्प होय अथवा रुधिरका स्राव होय ] पीडित होय उसके देहका वर्ण पीला होजाता है और शुक्रसे मज्जा, मज्जासे हड्डी ऐसे उलटे धातु क्षीण हो जाते हैं ॥ शोकशोषीके लक्षण । प्रध्यानशीलः स्त्रस्ताङ्गः शोकशोष्याप तादृशः । शोकशोषी अर्थात् शोचसे जिसको क्षय होय वह चिन्ता करे और हाथ पैर गलने लगें तथा शुक्रक्षयव्यतिरिक्त शोषवान् हो और पाण्डु देह हो ऐसा शोचसे क्षय- वाला पुरुष होता है ॥ जराशोषीके लक्षण । जराशोषी कृशो मन्दवीर्यबुद्धिबलेन्द्रियः ॥ १६ ॥ कंपनोऽरुचिमान् भिन्नकांस्यपात्रहतस्वरः । ष्ठीवति श्लेष्मणा हीनं गौरवारुचिपीडितः ॥ १७ ॥ संप्रस्रुतास्यनासाक्षः शुष्करूक्षमलच्छविः । जरा ( बुढापे ) से शोषवाला मनुष्य कृश होता है, उसके वीर्य बुद्धि बल और इंद्रिय ये मन्द हो जाते हैं, कम्प हो, अन्नमें अरुचि, फूटे कांसीके बासनको लक- डीके बजानेसे जैसा शब्द हो ऐसा शब्द हो, कफरहित बारम्बार थूके अर्थात् कफके निकालनेके वास्ते यत्न करे तथापि कफ नहीं निकले, शरीर भारी रहे, अरु- चिसे पीडित पुनः अरुचिग्रहण विशेषतः द्योतनके वास्ते कहा है। मुख नाक और नेत्र इनसे स्राव हो, मल शुष्क उतरे और देहकी कांति निस्तेज होय ॥ अध्वप्रशोषीके लक्षण । अध्वप्रशोषी स्रस्ताङ्गः संभृष्टपरुषच्छविः । प्रसुप्तगात्रावयवः शुष्कक्लोमग्लाननः ॥ १८ ॥ अध्वप्रशोषी ( अतिमार्ग चलनेसे क्षीण हुआ ) मनुष्यके हाथ पैर शिथिल हो जावें, उसके देहका वर्ण भूञ्जे पदार्थके सदृश और खरदरा होय है, सर्व देहमें प्रसुप्तता, हृदयमें प्यासका स्थान है सो गला और मुख इनका सूखना । शंका-क्योंजी ! जराशोषीके अनन्तर व्यायामशोषीके लक्षण कहने चाहिये पीछे अध्व ( मार्ग )-

( ९२ ) माधवनिदान ।

( ९२ ) माधवनिदान । शोषीके लक्षण कहने चाहिये फिर माधवाचार्यने अध्वशोषीके लक्षण क्यों कहे ? उत्तर-अध्वशोषीके लक्षण इस वास्ते कहे कि व्यायामशोषीके इसके सब लक्षण मिलते हैं । शंका-अच्छा आप ऐसे कहोगे तो व्यायामशोषीमें अध्वशोषीके कौनसे लक्षण नहीं मिलते ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु अध्वशोषीमें उरःक्षत आदि चिह्न नहीं हैं इससे पूर्व अध्वशोषीके लक्षण कहे ॥ व्यायामशोषीके लक्षण । व्यायामशोषी भूयिष्ठमेभिरेव समन्वितः । लिङ्गैरुरःक्षतकृतैः संयुक्तश्च क्षतं विना ॥ १९ ॥ व्यायामशोषी ( अत्यन्त दंडकसरत आदि श्रमसे क्षीण ) मनुष्य विशेष करके अध्वशोषीके लक्षण स्रस्तांगतादियुक्त होता है अर्थात् जो लक्षण अध्वशोषीमें थोडे थोडे होते हैं वे व्यायामशोषीमें अधिक होते हैं और उस मनुष्यके घावके बिनाही उरःक्षतके लक्षण मिलते हैं । उरःक्षतके लक्षण सुश्रुतमें लिखे हैं ॥ तीन कारणोंसे व्रणशोष होय, सो कहते हैं-- रक्तक्षयाद्वेदनाभिस्तथैवाहारयन्त्रणात् । व्रणिनश्च भवेच्छोषः स चासाध्यतमो मतः ॥ २० ॥ रुधिरके क्षयसे, फोडाकी पीडासे तैसे ही आहारके घटनेसे व्रणी पुरुषके जो शोष होय सो अत्यन्त असाध्य जानना ॥ उरःक्षतसे धातुशोष होनेका सम्भव है अतएव शोषप्रकरणमें निदानसहित उरःक्षतरोग कहते हैं-- धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थं भारमुद्वहतो गुरुम् । युध्यमानस्य बलिभिः पततो विषमोच्चतः ॥ २१ ॥ वृषं हयं वा धावन्तं दम्यं चान्यं निगृह्णतः । शिलाकाष्ठाश्मनिर्घातान् क्षिपतो निघ्नतः परान् ॥ २२ ॥ अधीयानस्य वाऽप्युच्चैर्दूरं वा व्रजतो द्रुतम् । महानदीर्वा तरतो हयैर्वा सह धावतः ॥ २३ ॥ सह- सोत्पततो दूरात्तूण वातिप्रनृत्यतः । तथाऽन्यैः कर्मभिः १ "तस्योरसि क्षते रक्तं भूयः श्लेष्मा च गच्छति । कासमानश्छर्दयेच्च पीतरक्तासितारुणम्॥ सन्तप्तवक्षसोऽत्यर्थं दमनात्परिताम्यति । दुर्गन्धोच्छ्वासवदनो भिन्नवर्णस्वरो नरः ॥ " इति

भाषाटीकासमेत । ( ९३ ) क्रूरैर्भृशमभ्याहतस्य च ॥ २४ ॥ ताडिते वक्षसि व्याधि- र्बलवान् समुदीर्यते । स्त्रीषु चातिप्रसक्तस्य रूक्षाल्पप्रमिता- शिनः ॥ २५ ॥ उरो विरुज्यतेऽत्यर्थं भिद्यतेऽथ विभज्यते । प्रपीड्यते तथा पार्श्वे शुष्यत्यङ्गं प्रवेपते ॥ २६॥ क्रमाद्वीर्यं बलं वर्णो रुचिरग्निश्च हीयते । ज्वरो व्यथा मनोदैन्यं विड्भेदोऽग्निवधावपि ॥ २७॥ दुष्टः श्यावोऽथ दुर्गन्धः पीतो विग्रथितो बहुः । कासमानस्य चाभीक्ष्णं कफः सास्रः प्रवर्त्तते ॥ २८ ॥ सक्षतः क्षीयतेऽत्यर्थं तथा शुक्रौजसोः क्षयात् । बहुत तीरंदाजी करनेसे, बहुत भारी वस्तु उठानेसे, बलवान् पुरुषके साथ युद्ध करनेसे, ऊंचे स्थानसे गिरनेसे, बैल, घोडा, हाथी, ऊंट इत्यादिक दौडते हुएको थामनेसे, भारी शिला लकडी पत्थर निर्घात ( अस्त्रविशेष ) इनके फेंकनेसे शत्रुको मारनेवाला, जोरसे वेदादिक शास्त्रको पढनेसे अथवा दूर दिशावर शीघ्र चलकर जानेसे, गंगा यमुनादि महानदीको तरनेवाला, अथवा घोडेके साथ दौडनेवाला, अकस्मात् कला खानेवाला, जल्दी जल्दी बहुत नाचनेसे, इसी प्रकार दूसरे मल्ल- युद्धादि क्रूरकर्म करनेसे, उर ( छाती ) फट जाती है ऐसे पुरुषकी छाती दुखनेसे बलवान् उरःक्षतरूप व्याधि उत्पन्न होय है और बहुत मैथुन करनेसे वा खानेसे तथा छातीमें चोट लगनेसे अत्यंत स्त्रीरमण करनेसे और रूखा थोडा कुसमय और बिना अनुमानका भोजन करनेवालेके-पूर्वोक्त लक्षणयुक्त ऐसे पुरुषका हृदय फटेके सदृश मालूम हो अथवा हृदयके दो टूक कर डाले ऐसा मालूम हो और हृदयमें अत्यन्त पीडा हो और उसके पसवाडोंमें अत्यन्त पीडा हो, अंग सब सूखने लगें तथा थरथर कांपने लगें और शक्ति, मांस, वर्ण, रुचि और अग्नि ये सब क्रमसे घटने लगे, ज्वर रहे, व्यथा हो, मनमें सन्ताप, दीन होजाय, अग्नि मन्द होनेसे दस्त होने लगें और बारंबार खाँसते २ दुष्ट काला अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त पीला गांठके समान बहुत और रुधिर मिला ऐसा कफ गिरे इस प्रकार क्षतरोगी अत्यन्त क्षीण होय सो केवल क्षतसे ही क्षीण हो जाय ऐसा नहीं किन्तु स्त्रीसेवन करनेसे शुक्र और ओज ( सब धातुओंका तेज ) इनका क्षय होनेसे यह मनुष्य क्षीण हो जाता है ॥ उरःक्षतका पूर्वरूप । अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् ॥ २९ ॥ उस उरःक्षतके अप्रगट लक्षणोंको पूर्वरूप कहते हैं ॥

( ९४ ) माधवनिदान ।

( ९४ ) माधवनिदान । क्षतक्षीणके असाध्य लक्षण । उरोरुक्शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः कफे । क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटिग्रहः ॥ ३० ॥ क्षतक्षीण रोगीके हृदयमें पीडा होय, रुधिरकी उलटी करे और विशिष्ट कास अर्थात् पूर्व कहे जो दुष्टश्वासादि लक्षण उन्होंसे युक्त और रुधिरयुक्त मूत्रका उतरना, पसवाडे, पीठ और कमर इनमें पीडा होय ॥ साध्यलक्षण । अल्पलिङ्गस्य दीप्ताग्नेः साध्यो बलवतो नवः । परिसंवत्सरो याप्यः सर्वलिङ्गं विवर्जयेत् ॥ ३१ ॥ जिसमें थोडे लक्षण मिलते हों और जिसकी अग्नि दीप्त हो ऐसे पुरुष बलवान् हो तथा रोग नवा हो तो वह साध्य है और रोगको भये एक वर्ष व्यतीत हो गया हो सो याप्य ( साध्यासाध्य ) है और जिसमें सर्वलक्षण मिलते हों सो असाध्य है उसको वैद्य त्याग दे ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां राजयक्ष्मरोगः समाप्तः ॥ अथ कासनिदानम् । कारण सम्प्राप्ति और निरुक्ति । धूमोपघाताद्रजसस्तथैव व्यायामरूक्षान्ननिषेवणाच्च । विमार्गगत्वादपि भोजनस्य वेगावरोधात्क्षवथोस्तथैव ॥ १ ॥ प्राणो ह्युदानानुगतः प्रदुष्टः संभिन्नकांस्यस्वरतुल्यघोषः । निरेति वक्रात्सहसा सदोषो मनीषिभिः कास इति प्रदिष्टः ॥२॥ नाक मुखमें धूर धूआँ जानेसे, दंडकसरत, रूक्षान्न इनके नित्य सेवन करनेसे, भोजनके कुपथ्यसे, मलमूत्रके रोकनेसे, उसी प्रकार छिक्का अर्थात् छींक आती हुईके रोकनेसे प्राणवायु अत्यन्त दुष्ट होकर और दुष्ट उदानवायुसे मिलकर कफ- पित्तयुक्त अकस्मात् मुखसे बाहर निकले उसका शब्द फूटे कांस्यपात्रके समान हो उसको विद्वान् लोग कास ( खांसी ) कहते हैं ॥ १ कसति शिरः कण्ठादूर्ध्वं गच्छति वायुरिति कासः ।

भाषाटीकासमेत । (९५) पञ्च कासाः स्मृता वातपित्तश्लेष्मक्षतक्षयैः । क्षयायोपेक्षिताः सर्वे बलिनश्चोत्तरोत्तरम् ॥ ३ ॥ वात, पित्त, कफ, क्षत और क्षय ऐसे पांच प्रकारकी खांसी होती है इनकी औषध न करे तो सर्वका क्षयरूप हो जाता है। ये उत्तरोत्तर बलवान् जाननी जैसे वातसे पित्तकी, पित्तसे कफकी, कफसे क्षतकी, क्षतसे क्षयकी खांसी प्रबल है ॥ कासका पूर्वरूप । पूर्वरूपं भवेत्तेषां शूकपूर्णगलास्यता । कण्ठे कण्डूश्च भोज्यानामवरोधश्च जायते ॥ ४ ॥ मुख और गलेमें कांटेसे पडजायँ तथा कण्ठमें खुजली चले, भोजन करा न जाय ये खांसी होनेवालेके लक्षण हैं ॥ वातकी खांसीके लक्षण । हृच्छङ्खसूर्धोदरपार्श्वशूली क्षामाननः क्षीणबलस्वरौजाः । प्रसक्तवेगस्तु समीरणेन भिन्नस्वरः कासति शुष्कमेव ॥ ५ ॥ हृदय, कनपटी, मस्तक, उदर, पसवाडा इनमें शूल चले, मुँह उतर जाय, बल, स्वर, पराक्रम ये क्षीण पडजायँ, वारम्वार खांसीका उठना, स्वरभेद और सूखी खांसी उठे ये वातकी खांसीके लक्षण हैं ॥ पित्तकी खांसीके लक्षण । उरोविदाहज्वरवक्त्रशोषैरभ्यर्दितस्तिक्तमुखस्तृषार्तः । पित्तेन पीतानि वमेत्कटूनि कासेत्स पाण्डुः परिदह्यमानः ॥६॥ पित्तकी खांसीके हृदयमें दाह, ज्वर, मुखका सूखना इनसे पीडित हो, मुख कडुवा रहे, प्यास लगे, पीले रंगकी और कडुवी ऐसी पित्तके प्रभावसे वमन हो खांसीके समय रोगीका पीला वर्ण हो जाय और सब देहमें दाह होय ॥ कफकी खांसीके लक्षण । प्रलिप्यमानेन मुखेन सीदञ्छिरोरुजार्तः कफपूर्णदेहः । अभक्तरुग्गौरवकण्डुयुक्तः कासेद्भृशं सान्द्रकफः कफेन ॥ ७ ॥ कफकी खांसीसे मुख कफसे लिपटा रहे, शिरमें दर्द और सब देह कफसे परि- पूर्ण रहे, अन्नमें अरुचि, शरीर भारी रहे, कण्ठमें खुजली और रोगी बारंबार खांसे, कफकी गांठ थूकनेसे सुख मालूम होय ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ९६ ) माधवनिदान ।

( ९६ ) माधवनिदान । क्षतकासलक्षण । अतिव्यवायभाराध्वयुद्धाश्वगजनिग्रहैः। रूक्षस्योरःक्षतं वायु- र्गृहीत्वा कासमावहेत् ॥ ८ ॥ स पूर्वं कासते शुष्कं ततः ष्ठीवेत् सशोणितम् । कण्ठेन रुजताऽत्यर्थं विरुग्णेनेव चोरसा ॥ ९ ॥ सूचीभिरिव तीक्ष्णाभिस्तुद्यमानेन शूलिना । दुःख- स्पर्शेन शूलेन भेदपीडाभितापिना ॥१०॥ पर्वभेदज्वरश्वास- तृष्णावैस्वर्यपीडितः । पारावत इवाकूजन्कासवेगात्क्षतोद्भवात् १ १ बहुत स्त्रीसंग करनेसे, भारके उठानेसे, बहुत मार्ग चलनेसे, मलयुद्ध ( कुस्ती ) करनेसे, दौडते हुए हाथी घोडेको रोकनेसे इन कारणोंसे रूक्ष पुरुषका हृदय फूट- कर वायुकोप होकर खांसीको प्रगट करे । सो पुरुष प्रथम सूखा खांसे, पीछे रुधिर मिला थुके, कण्ठ अत्यन्त दूखे, हृदय फटे सदृश मालूम हो और तीखी सूईकेसे चुभक्का चलें और उसको हृदयका स्पर्श सुहाय नहीं, दोनों पसवाडोंमें शूल हो, यह वाग्भटका भी मत है तथा दाह हो उस रोगीके गांठ गांठमें पीडा हो, ज्वर, श्वास, प्यास, क्षतजन्य खांसीके वेगसे रोगी कबूतरकी तरह घुंघुं शब्द करे ॥ क्षयकी खांसीके लक्षण । विषमासात्म्यभोज्यातिव्यवायाद्वेगनिग्रहात् । घृणिनां शोचतां नॄणां व्यापन्नेऽग्नौ त्रयो मलाः ॥ १२ ॥ कुपिताः क्षयजं कासं कुर्युर्देहक्षयप्रदम् । स गात्रशूलज्वरदाहमोहान्प्राणक्षयं चापि लभेत कासी ॥ १३ ॥ शुष्यन्विनिष्ठीवति दुर्बलस्तु प्रक्षीणमांसो रुधिरं सपूयम् । तं सर्वलिङ्गं भृशदुश्चिकित्स्यं चिकित्सितज्ञाः क्षयजं वदन्ति ॥ १४ ॥ कुपथ्य और विषमाशनके करनेसे, अति मैथुन, मलमूत्रादिका वेग धारण इनसे, अति दया करनेसे, अति शोक करनेसे अग्नि मन्द होय अर्थात् आहार थक- कर वायु कुपित हो अग्निको नष्ट करे । तब तीनों दोष कोपको प्राप्त हों क्षयजन्य देहकी नाशक ऐसी खांसीको प्रगट करे । तब वह खांसी देहको क्षीण करे, शूल, ज्वर, दाह और मोह ये होयं, तब यह प्राणका नाश करे । सूखी खांसी, रुधिर, मांस, शरीरका सूखजाना, रुधिर और राध थूके इन सर्व लक्षणयुक्त और चिकित्सा करनेमें अतिकठिन ऐसी इस खांसीको वैद्य क्षयज कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA