माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३६२ ) माधवनिदान ।
( ३६२ ) माधवनिदान । ज्वराद्या व्याधयः सर्वे महतां ये पुरेरिताः ॥ बालदेहेऽपि ते तद्वज्ज्ञेयाः कुशलैः सदा ॥ १६ ॥ क्षुद्ररोगनिदानमें जो अजगल्ली और अहिपूतना कही हैं सो और ज्वरादिक सर्व रोग जो बडे मनुष्योंके होते हैं अर्थात् जिन रोगोंको पूर्व कहि आये हैं वे सब रोग बालकोंके देहमें भी होते हैं, ऐसे कुशल वैद्योंको जानना चाहिये ॥ सामान्य ग्रहजुष्टके लक्षण । क्षणादुद्विजते बालः क्षणात्त्रस्यति रोदिति ॥ १७ ॥ नखैर्दन्तैर्दारयति धात्रीमात्मानमेव च । ऊर्ध्वं निरीक्षते दन्तान् खादेत्कूजति जृम्भते ॥ १८ ॥ भ्रुवौ क्षिपति दंतोष्ठं फेनं वमति चासकृत् । क्षामोऽतिनिशि जागर्ति शूनांगो भिन्नविट्स्वरः ॥ १९ ॥ मांसशोणितगन्धिश्च न चाश्नाति यथा पुरा । सामान्यग्रहजुष्टानां लक्षणं समुदाहृतम् ॥ २० ॥ कभी क्षणभरमें बालक विह्वल हो जाय कभी क्षणभरमें डरे, रोवे, नख और दांतोंसे अपने शरीर और माताको खसीटे, ऊपरको देखे, दांतोंको चबावे, किल- कारी मारे, जंभाई लेय, भ्रुव ( भौंह ) को तिरछी करे, दांतोंसे होठोंको खाय, बारंबार मुखसे झाग डाले, वह अत्यन्त क्षीण होय, रात्रिमें सोवे नहीं, सूजन होय, मल पतला होय, स्वर बैठ जाय, उसके देहमें रुधिर मांसकीसी बास आवें जितना पहिले खाता होय उतना नहीं खाय, ये सामान्य ग्रहव्याप्त बालकके लक्षण हैं। अब कहते हैं कि, स्कन्दादिक ग्रह पूजाके अर्थ बालकोंको मारे हैं सो चरकमें लिखा है ॥ स्कन्दग्रहगृहीतबालकके लक्षण । एकनेत्रस्य गात्रस्य स्रावः स्पन्दनकंपनम् । अर्द्धदृष्ट्या निरीक्षेत वक्रास्यो रक्तगंधिकः ॥ २१ ॥ दंतान् खादति वित्रस्तः स्तन्यं नैवाभिनंदति । स्कंदग्रहगृहीतानां रोदनं चालपमेव च ॥ २२ ॥ १ धात्रीमात्रोः प्राक्प्रदिष्टोपचाराच्छौचभ्रंशान्मंगलाचारहीनान् । क्लिष्टांस्वांस्तांस्तर्जितांस्ताडितांश्च पूजाहेतोर्हिंस्युरेते कुमारान् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३५३ ) बालकके एक नेत्रसे पानी गिरे और अंगमें स्राव ( पसीना ) बहे, एक ओरका अंग फडके तथा थर थर कांपे, वह बालक आधी दृष्टिसे देखे, मुख टेढा होजाय, रुधिरकीसी दुर्गंध आवे, वह बालक दाँतोंको चबावै, अंग शिथिल होजाय, स्तनको नहीं पीवे और थोडा रोवे, ये स्कन्दग्रह लगे बालकके लक्षण हैं। इस जगह स्कन्दग्रह करके शिवजीके प्रगट करे जो ग्रह हैं उनमेंसे, श्रीशिवपुत्र स्वामिकार्तिकका ग्रहण न करना चाहिये ॥ स्कन्दापस्मारके लक्षण । नष्टसंज्ञो वमेत्फेनं संज्ञान्वानतिरोदिति । पूयशोणितगन्धित्वं स्कंदापस्मारलक्षणम् ॥ २३ ॥ बालक बेसुधि होय, मुखसे झाग डाले, जब होश हो तब रोवे, उसकी देहमें रुधिरकीसी दुर्गंधि आवे इन लक्षणों करके स्कन्दापस्मारके लक्षण जानने ॥ शकुनिग्रहके लक्षण । स्रस्तांगो भयचकितो विहंगगन्धिः संस्रावव्रणपरिपीडितः समन्तात् । स्फोटैश्च प्रचिततनुः सदाहपाकैर्विज्ञेयो भवति शिशुः क्षतः शकुन्या॥ शकुनिग्रहसे पीडित बालकके अंग शिथिल होयँ, भयसे चकित होयँ, उसके अंगमें पक्षीके अंगके समान बास आवे, घाव होकर उसमेंसे लस बहे, सर्व अंगोंमें फोडे उत्पन्न होयँ और ये पकें तथा दाह होय ॥ रेवतीग्रहके लक्षण । व्रणैः स्फोटैश्चितं गात्रं पंकगंधमसृक्स्रवेत् । भिन्नवर्चा ज्वरो दाहो रेवतीग्रहलक्षणम् ॥ २४ ॥ रेवतीग्रहसे पीडित बालकके अंगमें घाव और फोडे होयँ, उनमेंसे रुधिर बहे, उनमें कीचकीसी बास आवे, दस्त होय, ज्वर होय और अंगमें दाह होय ॥ पूतनाग्रहके लक्षण । अतिसारो ज्वरस्तृष्णा तिर्यक्प्रेक्षणरोदनम् । नष्टनिद्रस्तथोद्विग्नः स्रस्तः पूतनया शिशुः ॥ २५ ॥ पूतना ग्रहकी पीडासे बालकको दस्त, ज्वर, प्यास होय, टेढी दृष्टिसे देखे, रोवे, सोवे नहीं, व्याकुल होय, शिथिल होजाय ये लक्षण होते हैं ॥ अंधपूतनाग्रहके लक्षण । छर्दिः कासो ज्वरस्तृष्णा वसागंधोऽतिरोदनम् । स्तन्यद्वेषोऽतिसारश्चाप्यंधपूतनया भवेत् ॥ २७ ॥ १ तदुक्तं हिरण्याक्षेण—संस्रावदाहपाकाद्यैश्चितः स्फोटैर्भयाऽन्वितः । स्रस्तांगो विस्रगंधिः स्याच्छकुन्या पीडितः शिशुः ॥
( ३५४ ) माधवनिदान ।
( ३५४ ) माधवनिदान । अंधपूतना ग्रहकी पीडासे बालकके वमन होय, खांसी, ज्वर, प्यास, चर्बीकीसी दुर्गंध, बहुत रोना,स्तन्य ( छातीको ) मुखसे दाबे नहीं, अतिसार यह लक्षण होते हैं॥ शीतपूतनाग्रहके लक्षण । वेपते कासते क्षीणो नेत्ररोगो विगंधिता । छर्द्यतीसारयुक्तश्च शीतपूतनया शिशुः ॥ २८ ॥ शीतपूतना ग्रहकी पीडासे बालकके मुखकी कांति क्षीण होजावे, उसके नेत्ररोग होय, देहमें दुर्गंध आवे, वमन होय और दस्त होयँ ॥ मुखमण्डिकाग्रहके लक्षण । प्रसन्नवर्णवदनः शिराभिरिव संवृतः । मूत्रगन्धिश्च बह्वाशी मुखमण्डिकया भवेत् ॥ २९ ॥ मुखमंडिका ग्रहकी पीडासे बालकक मुखकी कांति सुंदर होय और देहकी कांति श्रेष्ठ होय, शिराओंमें बँधा देह होजाय, उसके देहमें मूत्रकीसी दुर्गंध आवे यह बालक बहुत भक्षण करे ॥ नैगमेयग्रहके लक्षण । छर्दिःस्यन्दनकण्ठास्यशोषमूर्च्छाविगन्धिताः । ऊर्ध्वं पश्येदशेद्दन्तान्नैगमयेयग्रहं वदेत् ॥ ३० ॥ वमन, कफ, कंठ-मुखका सूखना, मूर्च्छा, दुर्गंध, ऊपरको देखे, दांतोंको चबावे इन लक्षणोंसे नैगमेयग्रहकी बाधा जाननी ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माथुरीभाषाटीकायां बालरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ विषरोगनिदानम् । स्थावरं जंगमं चैव द्विविधं विषमुच्यते । मूलात्मकं तदाद्यं स्यात्परं सर्पादिसम्भवम् ॥ १ ॥ विष दो प्रकारका है-स्थावर और जंगम, तथा मूलात्मक स्थावर और सर्पादि- कोंसे जो प्रगट हो वह जंगम विष होता है ॥ दशाधिष्ठानमाद्यं तु द्वितीयं षोडशाश्रयम् । आद्य अर्थात् स्थावर विष दश जगह रहता है और जंगम विष सोलह जगह रहता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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भाषाटीकासमेत । ( ३५५) मूलं पत्रं फलं पुष्पं त्वक्क्षीरं सार एव च । निर्यासा धातवश्चैव कन्दश्च दशमः स्मृतः ॥ २ ॥ जड, पात, फल, फूल, छाल, दूध, रस, गोंद, धातु और कन्द ये दश स्थावर विष हैं। तहां मूलविष आठ-क्लीतक, अश्ममार गुंज, सुगंध, गर्गर, छकरघाट, विद्युच्छिखा और विजया ये हैं। विषपत्रिका, लम्बावर, दारुक, करम्भ, महाकरंभ ये पांच पत्रविष हैं। कुमुद्वती, वेणुका, करम्भ, महाकरंभ, कर्काटक, रेणुक, खद्यो- तक, चमरी, इभगंधा, सर्पघाती, नन्दन, सारपाकिनी ये बारह फलविष हैं। पत्र, कदंब, वाल्लिज, करम्भ, महाकरम्भ ये पांच पुष्पविष है। अंत्रपाचक, कर्तरीय, सौरीय, ककरघाट, करम्भ, नन्दन, वराटक ये सात त्वचारस (गोंद) के विष हैं, कुमुदघ्नी, स्नुही जालक्षीरी ये तीन दूधके विष हैं। फेणाश्मभस्म और हरिताल ये धातुविष हैं। कालकूट, वत्सनाभ, सर्षपक, पालक, कर्दमक, वैराटक, पुस्तक, भृंगी- विष प्रपौंडरीक, मूलक, हलाहल, महाविष कर्कट ये तेरह कन्दविष हैं। सब मिल- कर स्थावर विष पचपन ( ५५ ) हैं ॥ विषके स्थान । जंगमस्य विषस्योक्तान्यधिष्ठानानि षोडश । समासेन मया यानि विस्तरस्तेषु वक्ष्यते ॥ ३ ॥ जंगम विषके स्थान सोलह हैं, सो मैंने संक्षेपसे कहे हैं, अब विस्तारसे कहता हूँ-दृष्टि, श्वास, दांत, नख, मूत्र, विष्ठा, शुक्र, लार, आर्तव, मुख, संदंश, विशर्द्दित ( पादना ), गुदा, हड्डी, पित्त, शूकशव ये सोलह स्थान हैं। तहां दृष्टि, निःश्वास विष दिव्य है सो दिव्य सर्पादिका जानना । भीम विष दंष्ट्राविष है, बिलाव, कुत्ता, बन्दर, मगर, मेंढक, मच्छी, जलगोधिका, शंबूक (शीप), पचालक, छिप- करी, मोहारकी मक्खी, पीली मक्खी, ततैय्या इनसे आदि ले ये जनावर दंष्ट्रा और नख विषवाले हैं । चिंपिठ, पिच्चटक, कषाय, वासिंग, सर्षप, तोटववर्च, कोड- कौटिल्यक इन जानवरोंके विष्ठा और मूत्रमें विष होता है। इनको लोकप्रसिद्ध नामसे जानना । मूसेके शुक्रमें विष होता है। मकरी आदि जो कीट है सो लूता कहे जाते हैं। इनके लार, मूत्र, विष्ठा, मुख, नख, शुक्र, आर्तव इनमें विष होता है। बिच्छू, विश्वंभर, ततैय्या, राजिलमछली, चिठिंग, समुद्रका बिच्छू इनकी पूंछमें जो कांटा होता है उसमें विष होता है। चित्रशिर, शरावकुर्दि, शतदारुक, आदि- मेदक, शारिकामुख, मुखदंशक इनके मूत्रपुरीषमें विष जानना । मक्खी कणव जोंक इनके मुख और काटनेमें विष है। विषसे मरेहुएकी हड्डी, सर्पकी हड्डी विषेली
( ३५६ ) माधवनिदान ।
( ३५६ ) माधवनिदान । मछली इनकी हड्डीमें विष है। शकुली नामकी मछली रक्तराजी और चरकी नामकी मछली इनके पित्तसें विष हैं। सूक्ष्मतुंड, चेंदि, बहर, कनखजूरा, शुक, मोर, तोता इनके तुंड अर्थात् मुखके अग्रभागमें विष है। कीट और सर्प इनके मरे देहमेंही विष है और जिनकी गणना यहां नहीं की उनको मुखके संदंशवालोंमें जानना। ये जंगमविषके स्थान हैं ॥ जंगमविषके सामान्य लक्षण । निद्रा तन्द्रा क्लमं दाहमपाकं रोमहर्षणम् । शोथं चैवातिसारं च कुरुते जंगमं विषम् ॥ ४ ॥ निद्रा, तन्द्रा, क्लम, दाह, अन्नका न पचना, रोमाञ्च, शोथ और अतिसार ये लक्षण जंगमविषके हैं ॥ स्थावरविषके सामान्य लक्षण । स्थावरं तु ज्वरं हिक्कां दंतहर्षं गलग्रहम् । फेनच्छर्द्यरुचिश्वासं मूर्च्छां च कुरुते भृशम् ॥ ५ ॥ स्थावरविषसे ज्वर, हिचकी, दांतोंका घिसना, गलेका घिरना, झागसे मिली रह, अरुचि, श्वास और अत्यन्त मूर्छा ये लक्षण होते हैं ॥ राजा किंवा कोई दूसरा बडा सेठ साहूकार जिसको समीपके रहनेवाले किसी नौकर चाकरने विष मिलाकर अन्न दिया हो उस विष देनेवालेके ढूंढनेके निमित्त कुछ लक्षण कहता हूँ- इंगितज्ञो मनुष्याणां वाक्चेष्टामुखवैकृतैः । जानीयाद्विषदातारमेतैर्लिङ्गैश्च बुद्धिमान् ॥ ६ ॥ न दद्यात्युत्तरं पृष्टो विवक्षुर्मोहमेति च । अपार्थं बहुसंकीर्णं भाषते चापि मूढवत् ॥ ७ ॥ हसत्यकस्मात्स्फोटयत्यंगुलीं विलिखेन्महीम् । वेपथुश्चास्य भवति त्रस्तश्चान्योन्यमीक्षते ॥ ८ ॥ विवर्णवक्ता क्षामश्च नखैः किंचिच्छिनत्त्यपि । आलभेतासनं दीनः करेण च शिरोरुहम् ॥ वर्तते विपरीतं च विषदाता विचेतनः ॥ ९ ॥ मनुष्यके अभिप्राय जाननेवाले बुद्धिमान् वैद्य बोलने चालने तथा मुखकी चेष्टा इनसे तथा आगे जो कहते हैं इन लक्षणोंसे विषके देनेवाले मनुष्यको जान ले।
भाषाटीकासमेत । ( ३५७)
सो इस प्रकार-जो मनुष्य विष दे उससे कोई बात पूछे तो वह उत्तर न दे और जब बोले तब मोहको प्राप्त हो अर्थात् घबडा जावे तथा कदाचित् बोले भी तो निरर्थक और बहुत अस्पष्ट बोले तथा अकस्मात् हँसे, हाथकी उंगली चटकावे, पृथ्वीमें रेखा काटे, भयसे कांपे और डरकर चारों ओर वारंवार सबकी तरफ देखे, मुखकी चेष्टा जाती रहे और काला होजाय, नखोंसे कुछ तिनका आदि तोडे, गरीबके समान एकही स्थानपर बैठा रहे, माथेपर हाथ फेरे, वारंवार इधर उधर डोल कर बैठजाय, उसका चित्त ठिकाने न रहे तथा उसका चित्त भागनेको चाहे । ये लक्षण विष देनेवालेके जानने और यही लक्षण घोर अपराध करनेवालेके राजा जान लेवे ॥ मूलादिविषोंके लक्षण । उद्वेष्टनं मूलविषैः प्रलापो मोह एव च । जृम्भणं वेपनं श्वासो मोहः पत्रविषेण तु ॥ १० ॥ मुखशोथः फलविषैर्दाहोऽन्नद्वेष एव च । भवत्युपविषैश्छर्दिराध्मानं श्वास एव च ॥ ११ ॥ त्वक्सारनिर्यांसविषैरुपयुक्तैर्भवंति हि । आस्यदौर्गन्ध्यपारुष्यशिरोरुकफसंस्रवाः ॥ १२ ॥ फेनागमः क्षीरविषैर्विद्भेदो गुरुजिह्वता । हृत्पीडनं धातुविषैर्मूर्च्छा दाहश्च तालुनि । प्रायेण कालघातीनि विषाण्येतानि निर्दिशेत् ॥ १३ ॥ मूलविषसे रोगीके हाथ पैरोंमें पीडा और मोह होवे । पत्रविषसे जम्भाई, कंप श्वास और मोह होवे । फलविषसे मुखपर सूजन, दाह, अन्नमें अरुचि होवे । पुष्प- विषसे वमन, अफरा और श्वास होवे । छाल, रस, गोंद-इनसे मुखमें दुर्गन्ध, अंगमें खरदरापन, मस्तकशूल और मुखके मार्ग कफ गिरे । दुग्धविषसे मुखमें झाग आवे, दस्त होय और जीभ जकड जावे । धातुविषसे हृदयमें पीडा होय, मूर्च्छा आवे, तालुएमं दाह होय ये विष बहुधाकरके कालान्तरमें मारनेवाले हों ॥ विषलिप्तशस्त्रहतके लक्षण । सद्यः क्षतं पच्यते तस्य जंतोः स्रवेद्रक्तं पच्यते चाप्यभीक्ष्णम् । कृष्णीभूतं क्लिन्नमत्यर्थपूति क्षतान्मांसं शीर्यते यस्य चापि ॥ १४ ॥ तृष्णा मूर्च्छा ज्वरदाहौ च यस्य दिग्धाहतं मनुजं तं व्यवस्येत् । लिंगान्येतान्येव कुर्यादमित्रैर्व्रणे विषं यस्य दत्तं प्रमादात् ॥ १५ ॥
( ३५८ ) माधवनिदान ।
( ३५८ ) माधवनिदान । जिस पुरुषका जखम तत्काल पकजावे तथा उसमेंसे रुधिर वहै और वारंवार पके तथा उस जखममेंसे काला सडा दुर्गन्धयुक्त ऐसा मांस निकले तथा जिसमें प्यास, मूर्च्छा, ज्वर, दाह ये होवें उसके विषमें बुझे वा लिप्त शस्त्रकी जखम लगी जानना चाहिये । शत्रुओंने कपट करके जिसके व्रणमें विष डालदिया हो उसके भी यही लक्षण हैं ॥ स्थावरविषको कहकर जंगममें सर्पविष ये अतितीक्ष्ण हैं. इसीसे प्रथम सर्पोंकी जाति कहते हैं- वातपित्तकफात्मानो भोगिमण्डलिराजिलाः । यथाक्रमं समाख्याता द्वयन्तरा द्वंद्वरूपिणः ॥ १६ ॥ भोगी मण्डली और राजिल ये सर्प अनुक्रमसे वात, पित्त, कफप्रकृतिके हैं और जो द्वयंतर अर्थात् दो जातिके सर्प और सर्पिणीसे प्रगट हैं वे द्वयंतर कहाते हैं। उनकी प्रकृति द्वंद्वज है अर्थात् जिस जिस प्रकारके सर्प सर्पिणीसे प्रगट हैं उसी उसी प्रकारकी प्रकृति उनकी होती है, जिनके मस्तकपर चक्र, हल, छत्र, स्वास्तिक (सतिया), अंकुश इनका चिह्न हो और जिनका फण करछीके समान चौडा हो और जल्दी चलनेवाले हों उनको भोगी अथवा राजिल सर्प कहते हैं और जो अनेक प्रकारके चकत्तोंसे चित्रविचित्र हों तथा मोटे और मन्द चलनेवाले तथा अग्नि और सूर्यकासा प्रकाश जिनका उनको मण्डली सर्प कहते हैं और जो चिकने और अनेक प्रकारकी रेखा उनके ऊपर नीचे विद्यमान हों उनको राजिल सर्प कहते हैं । इन सर्पोंकी चार जाति हैं । जिनमें मोती, चांदी, सुवर्णकीसी प्रभा होवे और जो नम्र तथा जिनकी देहमें सुगंध आवै वे ब्राह्मण जातिके सर्प हैं और जिनका स्वच्छवर्ण, क्रोधी और जिनके मस्तकपर सूर्य चन्द्रके समान छत्र तथा कमलका चिह्न होवे वे क्षत्रिय जातिके सर्प हैं। काले और हीरेके समान तथा लोहेके वर्ण हों और जिनकी धूआं और कबूतरके समान प्रभा हो वे वैश्यजातिके सर्प हैं। जिनकी देह भैंसा, चीतेके समान हो और जिनकी त्वचा कठोर हो तथा अनेक प्रकारका जिनका वर्ण होवे वे शूद्र- जातिके सर्प हैं। रात्रिके पिछले प्रहरमें राजिल जातिके सर्प विचरते हैं और रात्रिके पहिले तीन पहरोंमें मण्डली जातिक सर्प विचरते हैं और दिनमें दर्वीकर जातिके सर्प बहुधा विचरते हैं। इनमें दर्वीकर जातिके सर्प तरुण हैं और मंडली जातिके वृद्ध, राजिलजातिके मध्यम अवस्थाके हैं। इतनी जातिके सर्प निर्विष जानने। जो नोलेसे हत हैं और बालक तथा जलसे ताडित हैं और कृश, वृद्ध तथा जिनकी कांचली छूट रही हो और डररहे हों ऐसे सर्प विषरहित होते हैं ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३५९ ) अब सर्पोंके भेद कहते हैं- तहां प्रथम दवकिर सर्पोंके भेद कहते हैं-कृष्णसर्प, महाकृष्ण, कृष्णोदर, श्वेत- कपोल, बलाहक, महासर्प, शंखपाल, लोहिताक्ष, गवेधुक, परिसर्प, खंडफण, ककुद- पद्म, महापद्म, दर्भपुष्प, दधिमुख, पुंडरीक, भ्रकुटीमुख, विष्किर, पुष्पामिकीर्ण, गिरिसर्प, ऋतुसर्प, श्वेतोदर, महाशिरा, अलगर्द, आशीविष ये दवकिर जातिके सर्प हैं । आदर्शमंडल, श्वेतमण्डल, रक्तमण्डल, चित्रमण्डल, पृषत, रोध्रपुष्प, मिलिंदक, गोनस, वृद्धगोनस, पनस, महापन्स, वेणुपत्रक, शिशुफ, बभ्रु, कषाय, कलुष, पारा वत, हस्ताभरण, चित्रक, एणीपद ये मण्डली जातिके सर्प हैं । पुण्डरीक, राजिचित्र, अंगुलरांजि, बिन्दुराजि, कर्दमक, तृणतोषुक, संसर्पक, श्वेतहनु, दर्भपुष्प, शक्रक, गोधूमक, किक्कसाद ये राजिल जातिके सर्प हैं। गुलगोली, शूकपत्र, अजगर, दिव्यक, वर्षाहिक, पुष्पशकली, ज्योतीरथ, क्षीरिक, पुष्पक, अहिपताक, अन्धाहिक, गौराह्निक, वृक्षेशय इतने सर्प हीनविष जानने । अब कहते हैं कि, द्वयंतर (वर्णसंकर) सर्पभी तीन प्रकार हैं-माकूली, पोटगल, स्निग्धरांजि । तहां कृष्णसप जातिकी सर्पिणी और गोनसजातिके सर्पसे जो प्रगट हो वह माकुली कहाता है । इसी प्रकार राजिलसर्प और गोनसी जातिकी सर्पिणीसे जो प्रगट सो पोटगलसर्प कहाता है । इसी प्रकार कृष्णसर्प और राजपती जातिकी सर्पिणीसे जो प्रगटहुए सर्प उनको स्निग्धराजी कहते हैं। तहां नाकुलीसर्पमें पिताकासा विष (जहर) होय है और पोटगल स्निग्धराजी इन दोनोंमें माताकासा विष होता है। इन तीनोंके विप- रीततासे दिव्येलक, लोध्रपुष्पक, राजिचित्रक, पोटगल, पुष्पाभिकीर्ण, दर्भपुष्प, वेल्लितक इन सात जातिके सर्प प्रगट होते हैं। इनमें भी प्रथमके तीन सर्पोंमें राजिल सर्पोंकासा विष होता है और शेषोंमें मण्डली सर्पोंकासा जानना। ऐसे सब मिलाकर अस्सी प्रकारके सर्प हैं। इनमें भी जिनके नेत्र, जीभ, मुख, शिर, बडे हों वह पुरुष जानने और छोटे होयँ वह स्त्री जाननी और जिनमें दोनों स्त्री पुरुषके लक्षण मिलते होयँ तथा मन्द विषवाले क्रोधरहित हों उनको नपुंसक जानना ॥ भोगिप्रभृतिसर्पके काटनेपर वातादिकोंके लक्षण । दंशो भोगिकृतः कृष्णः सर्ववातविकारकृत् । पीतो मण्डलिजः शोथो मृदुः पित्तविकारवान् ॥ १७ ॥ राजिलोत्थो भवेद्दंशः स्थिरशोथश्च पिच्छिलः । पाण्डुः स्निग्धोऽतिसान्द्रासृक् सर्वश्लेष्मविकारवान् ॥ १८ ॥ भोगी अथवा राजिल दवकर सर्पके काटनेसे काटनेकी ठौर काली हो और सर्व वातके विकार करे। इसके सुश्रुतमें अवगुण लिखे हैं। मण्डली सर्पके काटनेकी ठौर
( ३६० ) माधवनिदान ।
( ३६० ) माधवनिदान ।
पीली सूजनयुक्त और नरम और पित्तके विकार करें और राजिलका दंश चिकना पीले रंगका वा गाढा तथा उसकी सूजन कठोर होय, उसमें गाढा रुधिर निकले तथा सब प्रकारके कफविकार हों ये लक्षण राजिलसर्पके काटनेके हैं ॥ विशिष्टदेशमें तथा विशिष्टनक्षत्रमें काटनेके असाध्य लक्षण । अश्वत्थदेवतायतनश्मशानवल्मीकसंध्यासु चतुष्पथेषु । याम्ये च दष्टाः परिवर्जनीया ऋक्षे शिरामर्मसु ये च दष्टाः ॥१९॥ पीपलके वृक्षके नीचे, देवताओंके मन्दिरमें, मसानमें, बँबईमें सन्ध्याकाल ( प्रातः और सायंकालकी सन्धि ), चौराहेमें, भरणी नक्षत्रमें, चकारसे आर्द्रा, आश्लेषा, मूल, मघा, कृत्तिका ये नक्षत्रोंमें शिरानाडीके मर्ममें सर्पके काटनेसे मनुष्य बचे नहीं ॥ गर्मी होनेसे विषका जोर होता है उसके लक्षण । दर्वीकराणां विषमाशु हंति सर्वाणि चोष्णे द्विगुणीभवन्ति । दर्वीकर ( नाग ) का विष तत्काल प्राणनाश करे और विष गर्मीके योगसे दुगुना जोर करते हैं ॥ अजीर्णपित्तातपपीडितेषु बालेषु वृद्धेषु बुभुक्षितेषु । क्षीणक्षते मेहिनि कुष्ठदुष्टे रूक्षेऽबले गर्भवतोषु चापि ॥ २० ॥ अजीर्ण पित्त और सूर्यकी घाम इनसे पीडित, बालक, वृद्ध, भूखा, क्षीण होगया हो, उरःक्षती, प्रमेहवाला, कोढी, रूखा, निर्बल और गर्भिणी इनको सर्पके काटनेसे तत्काल मृत्यु हो ॥ सर्पके काटनेसे असाध्य लक्षण । शस्त्रक्षते यस्य न रक्तमस्ति राज्यो लताभिश्च न सम्भवंति । शीताभिरद्भिश्च न रोमहर्षो विषाभिभूतं परिवर्जयेत्तम् ॥ २१ ॥ जिसको विषका अमल चढ गया हो उसके शस्त्रके घाव करनेसे रुधिर निकले नहीं अथवा चाबुक मारनेसे अंगमें उपडे नहीं अथवा शीतल पानी अंगपर डालनेसे रोमांच न हों उस मनुष्यका जहर उतारनेका उद्योग न करें ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । जिह्मं मुखं यस्य च केशशातो नासावसादश्च सकंठभंगः । रक्तः सकृष्णः श्वयथुश्च दंशे हन्वोः स्थिरत्वं च विवर्जनीयः ॥२२॥ जिसका मुख टेढा और स्तब्ध हो जाय, केश ( बाल ) स्पर्श करनेसे टूट २ कर गिर पडें, नाककी हड्डी टेढी हो जाय, नाड नीचेको झुक पडे, ऊंची न होय और
काटनेकी जगह सूजन होय तथा वह दंश स्थान लाल अथवा काला होय तथा
भाषाटीकासमेत । ( ३६१ ) काटनेकी जगह सूजन होय तथा वह दंश स्थान लाल अथवा काला होय तथा स्थिर होय उस रोगीको त्यागदेय ॥ वर्तिर्घना यस्य निरेति वक्त्राद्रक्तं स्रवेदूर्ध्वमधश्च यस्य । दंष्ट्राभिघाताश्चतुरस्य यस्य तं चापि वैद्यः परिवर्जयेत्तु ॥ २३ ॥ उन्मत्तमत्यर्थमुपद्रुतं वा हीनस्वरं चाप्यथवा विवर्णम् । सारिष्टमत्यर्थमवेगिनं च जह्यान्नरं तत्र न कर्म कुर्यात् ॥ २४ ॥ जिसके मुखसे गाढी लारकी बत्ती गिरे और नाक मुखके मार्ग तथा गुदाके मार्गसे रुधिर निकले और जिसके चार दांत लगे होंय उसको त्याग देय, अत्यन्त उन्मत्त हो गया हो अथवा ज्वर अतिसार आदि उपद्रवोंकरके पीडित हो, बोलनेमें असमर्थ हो जिसके देहका वर्ण · काला हो गया हो, नासाभंगादि अरिष्टयुक्त, जिसका वेग ( लहर ) आवे नहीं, ऐसा अथवा विष्ठा मूत्रादि वेगरहित ऐसे विषवाले पुरुषको त्याग देय अर्थात् उसका उपचार चिकित्सा न करे ॥ दूषित विषके लक्षण । जीर्णं विषघ्नौषधिभिर्हतं वा दावाग्निवातातपशोषितं वा । स्वभावतो वा गुणविप्रहीनं विषं हि दूषीविषतामुपैति ॥ २५ ॥ जो विष पुराना हो गया हो अथवा विषकी नाशक औषधसे हतवीर्य होनेसे अथवा दावाग्नि, वायु, गरमी, अग्नि इनसे सूखी हुई अथवा जो स्वभावसे गुणरहित हैं ऐसे स्थावर जंगमात्मक विष दूषीविषताको प्राप्त होते हैं ॥ दूषीविषके उपद्रव । वीर्याल्पभावान्न निपातयेत्तत्कफान्वितं वर्षगणानुबंधि । तेनार्दितो भिन्नपुरीषवर्णो विगंधिवैरस्ययुतः पिपासी ॥ २६ ॥ मूच्छों भ्रमं गद्गदवाग्वमित्तवं विचेष्टमानोऽरतिमाप्नुयाद्वा ॥ २७ ॥ वे दूषीविष अल्पवीर्य होनेसे मारक नहीं होते, किन्तु कफसम्बन्ध होनेसे उष्णादि गुण मन्द होकर बहुत वर्षपर्यंत गर ( विष ) रूप होकर रहते हैं । उस विषसे पीडित हुए पुरुषके दस्त होते हैं उसका वर्ण पलट जाय, उसके मुखसे बुरी दुर्गंध निकले, उसके मुखका स्वाद जाता रहे, प्यास लगे, मूर्च्छा आवे, भ्रम होय, वह बोलते समय अक्षर चबावे, वमन करे, विरुद्ध चेष्टा करे और उसको चैन नहीं पडे ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३६२ ) माधवनिदान।
( ३६२ ) माधवनिदान। स्थानभेदकरके उसके विशिष्ट लक्षण। आमाशयस्थे कफवातरोगी पक्वाशयस्थेऽनिलपित्तरोगी । भवेत्समुद्धस्तशिरोरुहांगो विलूनपक्षस्तु यथा विहंगः ॥ २८ ॥ पूर्वोक्त विष आमाशयमें स्थित होनेसे कफवातजन्य रोग होय और पक्वाशयमें आनेसे वातपित्तजन्य विकार होय तथा उस रोगीके मस्तकके और सब देहके बाल उडकर पंखरहित पक्षी ( पखेरू ) के समान हो जाय ॥ निद्रा गुरुत्वं च विजृम्भणं च विश्लेषहर्षावथवांगमर्दः । ततः करोत्यन्नमदाविपाकावरोचकं मण्डलकोठजन्म ॥ २९ ॥ मांसक्षयं पादकरप्रशोथं मूर्च्छां तथा छर्द्दिमथातिसारम् । दूषीविषं श्वासतृषौ च कुर्य्याज्ज्वरप्रवृद्धिं जठरस्य चापि ॥ ३० ॥ उन्मादमन्यज्जनयेत्तथान्यद्दाहं तथान्यत्क्षपयेच्च शुक्रम् । गाद्गद्यमन्यज्जनयेच्च कुष्ठं तांस्तान्विकारांश्च बहुप्रकारान् ॥ ३१ ॥ दूषीविषके प्रभावसे निद्रा, भारीपन, जंभाई, अंग शिथिल, रोमांच, अंगोंका टूटना ये प्रथम होकर तदनन्तर भोजनके उपरांत हर्ष होना, अन्न पचे नहीं, अरुचि, देहमें चकत्ते तथा गांठ उठें, मांसक्षय, हाथपैरोंमें सूजन, मूर्च्छा, वमन, दस्त, श्वास, प्यास, ज्वर, उदररोग ये विकार होयँ तथा अनेक प्रकारके रोग होयँ सो इस प्रकार-किसीसे उन्माद रोग होय और किसीसे दाह होय, कोई नपुंसकत्व करे और कोई गद्गदवाणी करे, कोई कुष्ठरोग करे और विसर्प विस्फोट आदि अनेक प्रकारके रोग होयँ ॥ दूषीविषकी निरुक्ति । दूषितं देशकालान्नदिवास्वप्नैरभीक्ष्णशः । यस्मात्संदूषयेद्धातूंस्तस्माद्दूषीविषं स्मृतम् ॥ ३२ ॥ देश काल और अन्न और दिवा निद्रा इनसे वारंवार दूषित हुए विष धातु- ओंको दुष्ट करे, इसीसे इसको दूषीविष कहते हैं । दूषीविष दो प्रकारका है- एक कृत्रिम और दूसरा गरसंज्ञक । जो विष पदार्थोंसे बनाया जाय वह कृत्रिम और निर्विष द्रव्योंके संयोगसे होय उसको गर कहते हैं । सो वृद्धकाश्यपने और चरकने लिखा है ॥ १ वृद्धकाश्यपः-संयोगजं तु द्विविधं तृतीयं विषमुच्यते। गरः स्यादविषस्तत्र सविषं कृत्रिमं यतः ॥ २ चरकः-दंष्ट्राविषे मूलविषे सगरे कृत्रिमे विषे । इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३६३ ) इन दोनों विषोंका लक्षण । सौभाग्यार्थं स्त्रियः स्वेदरजोनानांगजान्मलान् । शत्रुप्रयुक्तांश्च गरान्प्रयच्छन्त्यन्नमिश्रितान् ॥ ३३ ॥ तैः स्यात्पाण्डुः कृशोऽल्पाग्निर्ज्वरश्चास्योपजायते । मर्मप्रधमनाध्मानं हस्तयोः शोथलक्षणम् ॥ ३४ ॥ जाठरं ग्रहणीदोषो यक्ष्मगुल्मक्षयज्वराः । एवंविधस्य चान्यस्य व्याधेर्लिङ्गानि निर्दिशेत् ॥ ३५ ॥ घरका अधिकार स्वाधीन करनेको दुष्ट जनोंके कहनेसे पतिको वशीकरण कर- नेके निमित्त स्त्री अपने पतिको पसीना, आर्तव ( रजोदर्शनका रुधिर ) तथा अपनी देहके अनेक अंगोंका मैल अन्नमें मिलाकर खिलाती हैं । अथवा शत्रुकृत विषके प्रयोग अर्थात् वैरी विष अथवा विषके अन्न तथा जलमें मिलाकर खवाय देय, इससे मनुष्य पीला और कृश होय, उसकी अग्नि मन्द होय, सब मर्मोंमें पीडा, पेट फूलजाय, हाथोंमें सूजन, उदररोग, ग्रहणीरोग, राजयक्ष्मा, गुल्म, क्षय, ज्वर इन रोगोंके तथा इसी प्रकारके रोगोंके लक्षण होते हैं । दूषीविषके साध्यादि लक्षण । साध्यमात्मवतः सद्यो याप्यं संवत्सरोषितम् । दूषीविषमसाध्यं तु क्षीणस्याहितसेविनः ॥ ३६ ॥ दूषीविष पेटमें जानेसे तत्काल उपाय करनेसे और रोगी पथ्यसे रहनेसे साध्य है । और वर्ष दिन व्यतीत हो जाय तो याप्य जानना । और क्षीण तथा अपथ्य सेवन करनेवालेके असाध्य होय ॥ लूताविषकी उत्पत्ति । यस्माल्लूनं तृणं प्राप्ता मुनेः प्रस्वेदबिंदवः । तस्माल्लूताः प्रभाष्यन्ते संख्यया तास्तु षोडश ॥ ३७ ॥ विश्वामित्रराजा वसिष्ठकी कामधेनु जबरदस्ती लेकर चला, उस समय वसिष्ठ- जीको क्रोध आया, उससे ललाटमें पसीनेके बिंदु निकले, सो समीप जो कटे तृण गौके चरनेके अर्थ पडे थे उनपर वे बिंदु पडे, इसीसे लूता ( मकडी ) प्रगट हुई, इन मकडियोंकी सोलह जाति हैं । इन सोलहोंके भी दो भेद हैं एक कृच्छ्र- साध्य दूसरी असाध्य ॥
( ३६४ ) माधवनिदान ।
( ३६४ ) माधवनिदान । उनके काटनेके सामान्य लक्षण । ताभिर्दष्टे दंशकोथः प्रवृत्तिः क्षतजस्य च । ज्वरो दाहोऽतिसारश्च गदाः स्युश्च त्रिदोषजाः ॥ ३८ ॥ पिडिका विविधाकारा मण्डलानि महांति च । शोथा महान्तो मृदवो रक्तश्यावाश्चलास्तथा ॥ सामान्यं सर्वलूतानामेतद्दंशस्य लक्षणम् ॥३९॥ उन मकडियोंके काटनेसे वह स्थान सडे और उसमेंसे रुधिर बहे, ज्वर, दाह अतिसार और त्रिदोषज तथा अनेक प्रकारके फोडे, बडे बडे चकत्ते नरम लाल काली नीली और चञ्चल ऐसी सूजन होय इत्यादि लक्षण होते हैं, इस प्रकार सब लूताओंके सामान्य लक्षण जानने ॥ दूषीविषलूताके काटनेके लक्षण । दंशमध्ये तु यत्कृष्णं श्यावं वा जालकावृतम् ॥ ४० ॥ ऊर्ध्वाकृति भृशं पाकं क्लेदकोथज्वरान्वितम् । दूषीविषाभिर्लूताभिस्तं दष्टमिति निर्दिशेत् ॥ ४१ ॥ जिस दंशका मध्यभाग काला अथवा नीला अथवा हरा तथा जालके सदृश ऊंचा होकर शीघ्र पके तथा उसमेंसे दुर्गन्धयुक्त लस बहे, उसमें ज्वर होय उसको दूषीविष अथवा लूताका काटा हुआ जानना । प्राणहरलूताके लक्षण । सर्पाणामेव विण्मूत्रशवकोथसमुद्भवाः । दूषीविषाः प्राणहरा इति संक्षेपतो मताः ॥ ४२ ॥ शोथाः श्वेताऽसिता रक्ताः पीताः सपिडिका ज्वराः । प्राणान्तिकाभिर्जायन्ते दाहहिक्काशिरोग्रहाः ॥ ४३॥ सर्पोंके मलमूत्रसे अथवा मरे हुए सर्पके सडजानेसे जो दूषीविषके कीडे उत्पन्न होयँ वे प्राण हरनेवाले होते हैं, उनका काटा हुआ स्थान सूज जावे तथा वह सफेद काला लाल पीला होय और फुन्सी हो जायँ और रोगीको ज्वर आवे, दाह होय, हिचकी आवे, मस्तकमें शूल होय ॥ दूषीविषाखुलक्षण । आदंशाच्छोणितं पाण्डु मण्डलानि ज्वरोऽरुचिः । लोमहर्षश्च दाहश्चाप्याखुदूषीविषार्दिते ॥ ४४ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३६५ ) विषैले आखु ( मूसे ) के काटनेसे पीला रुधिर निकले, देहमें गोल चकत्ते उठें, ज्वर होय, अरुचि होय, रोमांच और दाह होय, ये मूसेके काटनेके विषपीडित मनुष्यके लक्षण हैं ॥ प्राणहरमूषकविषके लक्षण । मूर्च्छाऽङ्गशोथो वैवर्ण्यं क्लेदो मन्दश्रुतिर्ज्वरः । शिरोगुरुत्वं लालासृक्छर्दिश्वासाध्यमूषकैः ॥ ४५ ॥ जिस मूसेके काटनेसे मूर्च्छा, मूसेके आकार सूजन, देहमें विवर्णता, क्लेद, मन्द सुनाई दे, ज्वर, मस्तक भारी, लार और रुधिर इनकी रद होय ये लक्षण प्राणहर्त्ता मूसेके असाध्य हैं ॥ कृकलास ( सरट ) के काटेके लक्षण । कार्ष्ण्यं श्यावत्वमथवा नानावर्णत्वमेव च । व्यामोहो वर्चसो भेदो दष्टे स्यात्कृकलासकैः ॥ ४६ ॥ सरटके काटनेसे देहका वर्ण काला अथवा नीला हरा तथा अनेक प्रकारका होय तथा उस रोगीको भ्रांति और अतिसार होय ॥ वृश्चिकविषके लक्षण । दहत्यग्निरिवाऽदौ तु भिनत्तीवोर्ध्वमाशु वै । वृश्चिकस्य विषं याति पश्चाद्दंशेऽवतिष्ठति ॥ ४७ ॥ बिच्छूके काटनेसे उस स्थानमें प्रथम अग्निसी चले पीछे ऊपरको चढे पीछे काटनेकी जगह फटनेकीसी पीडा होय ॥ अब कहते हैं कि, विच्छू मन्दविष, मध्य- विष, महाविषके भेदसे तीन प्रकारका है । तिनमें जो गौके गोबरसे प्रगट होय वह मन्दविष हैं और काठ ईंट इनसे प्रगट होय वह मध्यविष हैं और जो सर्पकी सडी देहसे प्रगट होय वह अथवा अन्य विषवाली वस्तुओंसे प्रगट होय वह विच्छू महा- विषवाला होता है, मन्दविषवाले बारह प्रकारके हैं और मध्यविषवाले तीन प्रकारके हैं और महाविषवाले पंद्रह प्रकारके हैं, ऐसे सब मिलकर तीस प्रकारके बिच्छू हैं । कोई आचार्य २७ प्रकारके कहते हैं । कृष्ण, श्याव, कर्बुर ( विचित्रवर्ण ), पीत, गोमूत्राभ, कर्कश, मेचक, श्वेत, लाल, रोमश, शाद्वलाभ, रक्त ये बारह मन्दवीर्य हैं, इनके काटनेसे पीडा, कंप, देहका स्तंभ, काले रुधिरका निकलना इत्यादि रोग होते हैं । रक्तोदर, पित्तोदर, कपिलोदर ये तीन मध्य विषवाले विच्छू हैं, इनके काटनेसे जीभमें सूजन, भोजनका न होना, घोर मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं। श्वेत, चित्र, श्यामल, लोहिताभ, रक्त, श्वेत, रक्तोदर, नीलोदर, रक्त, पीत, नीलपीत, रक्तनील, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १६६ ) माधवनिदान ।
( १६६ ) माधवनिदान । नीलशुक्र, रक्तबभ्रु, एकपर्वा, उपपर्वा ये घोर विषवाले १५ बिच्छू हैं। इनके काट- नेसे सर्पके समान वेग, फोडोंकी उत्पत्ति, भ्रांति, दाह, ज्वर, नाक कान आदिके छिद्रोंसे काला रुधिर निकले इसीसे शीघ्र प्राणत्याग होवे ॥ वृश्चिकविषके असाध्य लक्षण । दष्टोऽसाध्यस्तु हृद्घ्राणरसनोपहतो नरः । मांसैः पतद्भिरत्यर्थं वेदनात जहात्यसून् ॥ ४८ ॥ हृदय, नाक, जीभ इनमें बिच्छूके काटनेसे मांस गले, अत्यन्त वेदना होकर मनुष्य मरे ॥ कणभदष्टके लक्षण । विसर्पः श्वयथुः शूलं ज्वरश्छर्दिरथापि वा । लक्षणं कणभैर्दष्टे दंशश्चैवं विशीर्यते ॥ ४९ ॥ कणभ एक जातिका कीडा होता है उसके काटनेसे विसर्प, सूजन, शूल, ज्वर, वमन ये लक्षण होते हैं और वह काटनेका स्थान गलजाय ॥ अब कहते हैं कि, त्रिकंटक, कुणी, हस्तीकक्ष, अपराजित ये कणभकीडाके चार भेद हैं। इनके काट- नेसे पूर्वोक्त रोग होयँ और अंगोंका टूटना, देहमें भारीपन और काटनेकी ठौर काली होजाय ये लक्षण विशेष होयँ ॥ उच्चिटिंग ( झींगर ) विषके लक्षण । हृष्टरोमोच्चिटिंगेन स्तब्धलिंगो भृशार्तिमान् । दष्टः शीतोदकेनेव सिक्तान्यंगानि मन्यते ॥ ५० ॥ उच्चिटिंगनामक बिच्छूके काटने से देहमें रोमांच होय, लिंग जकड जाय, घोर पीडा होय और सब देहपर शीतल जल मानो डाल दिया है, उच्चिटिंगको सुश्रुत- वाला झींगर कहता है और कोई उष्ट्रधूम कहते हैं परन्तु आतंकदर्पण टीकाकारने बिच्छूका भेद माना है ॥ मंडूक ( मेंडक ) विषके लक्षण । एकदंष्ट्रार्दितः शूनः सरुजः पीतकः सतृट् । छर्दिर्निद्रा च सविषैर्मंडूकैर्दष्टलक्षणम् ॥ ५१ ॥ विषैले मेंडकके काटनेसे उसको एक दांत लगे, उस ठिकाने पीली सूजन होय, दूखे, प्यास, वमन और निद्रा ये लक्षण होयँ ॥ अब कहते हैं कि कृष्णसार, कुहक, हरित, रक्त, यववर्णाभ भुकुटी, कोटिक इन भेदोंसे मेंडक आठ प्रकारका है इनके काटनेसे पूर्वोक्त लक्षण होयँ और खुजली, मुखमें पीले झाग आना, इन CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३६७ ) आठमें भी भ्रुकुटी और कोटिक इन दोनों मेंडकोंके काटनेसे पूर्वोक्त लक्षण होयँ और दाह, मूर्च्छा अत्यन्त होय ये विशेष लक्षण हैं ॥ विषैले मत्स्य ( मछली ) के विषके लक्षण । मत्स्यास्तु सविषाः कुर्युर्दाहं शोथं रुजं तथा । विषैले मछलीके काटनेसे दाह, सूजन और शूल ये होयँ, विषैले मछलीके सत्ता- ईस भेद हैं उनके नाम नहीं लिखे इस लिये कि मिले नहीं ॥ सविषजलौका ( जोंक ) के विषके लक्षण । कण्डूं शोथं ज्वरं मूर्च्छां सविषास्तु जलौकसः ॥ ५२ ॥ विषैले जोंकके काटनेसे खुजली, सूजन, ज्वर और मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं। विषैले जोंक काली, विचित्रवर्णकी, अलगर्दा, इन्द्रायुधा, सामुद्रिका, गोचन्दना इन भेदोंसे छः प्रकारकी है। इनमें भी अंजनचूर्णवर्णा और पृथुशिराके भेदसे काली जोंक दो प्रकारकी है। वर्म्मि मछलीके समान लम्बी छिन्नोन्नत कुक्षिक भेदसे विचित्र- वर्णकी जोंक दो प्रकारकी है। रोमशा, महापाश्र्वा, कृष्णमुखी इन भेदोंसे अल- गर्दा जोंक तीन प्रकारकी है-इन्द्रधनुषके समान ऊपरसे विचित्र होयँ वह इन्द्रा- युधा जोंक है, कुछ सफेद और पीला तथा विचित्रपुष्पके समान चित्रित ये दो भेद सामुद्रिका जोंकके हैं और बैलके अंडकोशके समान नीचेसे दो भाग होवें उसको गोचन्दना कहते हैं ॥ गृहगोधिका ( छिपकली ) के विषके लक्षण । विदाहं श्वयथुं तोदं स्वेदं च गृहगोधिका । छिपकलीके विषसे दाह होय, सूजन, नोंचनेकीसी पीडा और पसीना आवे कोई गृहगोधिकाको भाषामें विषखपरा कहते हैं ॥ शतपदी ( कानखजूरा ) के विषके लक्षण । दंशे स्वेदं रुजं दाहं कुर्याच्छतपदीविषम् ॥ ५३ ॥ कानखजूरेके काटनेसे स्थानमें पसीना आवे, शूल होय और दाह होय ॥ अब जानना चाहिये कि, परुषा, कृष्णा, चित्रा, कपीलिका, पित्तिका, रक्ता, श्वेता, अग्निप्रभा ये शतपदीके आठ भेद हैं। इनमेंसे छः तो पूर्वोक्त लक्षण करती हैं और श्वेता तथा अग्निप्रभा दो जातिकी शतपदीके काटनेसे दाह और मूर्च्छा अधिक होय ये विशेष लक्षण जानना ॥ मशक ( मच्छर वा डांस ) के विषके लक्षण । कण्डूमान्मशकैरीषच्छोथः स्यान्मन्दवेदनः । मच्छर अथवा डांसके काटनेसे किंचित् सूजन होय उसमें खुजली चले तथा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३६८ ) माधवनिदान ।
( ३६८ ) माधवनिदान । थोडी पीडा होय, सामुद्र, परिमण्डल हस्तिमस्तक, कृष्णा, पर्वतीय ये पांच भेद मच्छरोंके हैं ॥ असाध्य मशकक्षतके लक्षण । असाध्यकीटसदृशमसाध्यमशकक्षतम् ॥ ५४ ॥ पर्वतके ऊपर रहनेवाले मच्छर अथवा डांसके काटनेके क्षत असाध्य कीटके समान असाध्य है । असाध्य कीटके विषके लक्षण सुश्रुतमें लिखे हैं सो जान लेने ॥ सविषमक्षिका ( मक्खी ) दंशके लक्षण । सद्यः प्रस्राविणी स्याद्वा दाहमूर्च्छाज्वरान्विता । पिडिका मक्षिकादंशे तासां तु स्थविकाऽसुहृत् ॥ ५५ ॥ विषैले मक्खीके काटनेके ठिकाने काली फुन्सी प्रगट होय, वह तत्क्षण बहने लगे, उस ठिकाने दाह होय और मूर्च्छा, ज्वर होय । इनमें स्थविका नाम मक्खी प्राण- हर्त्री जाननी । मक्खीके छः भेद हैं-जैसे कान्तारिका, कृष्णा, पिंगलिका, मधूलिका, काषायी और स्थविका, इनमें काषायी और स्थविका दो असाध्य हैं ॥ चतुष्पादादिकोंके विषके साधारण लक्षण । चतुष्पद्भिर्द्विपद्भिर्वा नखदन्तविषं च यत् । पूयते पच्यते चापि स्रवति ज्वरयत्यपि ॥ ५६ ॥ व्याघ्रादि चतुष्पाद और वनमनुष्यादि वानरादि द्विपाद इनके नखदांतोंके विषसे सूज आवे, पकजावे, बहे तथा इसके योगसे ज्वर आवे ॥ अब कहते हैं कि, श्रीमाधवाचार्यने विश्वंभरा, अहिंडूका, कण्डूमका, शुकवृन्तादि, पिपीलिका, गोधेरका और सर्षपिका इनके विषका निदान नहीं लिखा परन्तु इनका निदान सुश्रुतमें कहा है सो ग्रन्थकी परिशिष्टमें लिखेंगे ॥ विष उतरगया हो उसके लक्षण । प्रसन्नदोषं प्रकृतिस्थधातुमन्नाभिकांक्षं सममूत्रविट्कम् । प्रसन्नवर्णेन्द्रियचित्तचेष्टं वैद्योऽवगच्छेदविषं मनुष्यम् ॥ ५७ ॥ जिस पुरुषके वातादि दोष निर्मल होयँ, रस रक्तादि धातु निरोग अवस्थामें जैसे होते हैं वैसेही होयँ, अन्न खानेकी इच्छा होय, मलमूत्र जैसे होते हैं वैसे होय शरीरका वर्ण, इन्द्रिय मन और व्यापार ( देहकी चेष्टा ) ये जिसके शुद्ध होयँ उसका विष उतरगया ऐसे वैद्य जाने ॥ इति श्रीमाथुरकुलकमलप्रकाशक श्रीमत्कन्हैयालालपाठकतनयदत्तरामानिर्मित- माधवभावार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां विषरोगनिदानं समाप्तम् ॥ इति माधवनिदानं समाप्तम् ॥
क्लीब ( नपुंसक ) का निदान चरकसे लिखते हैं ॥
श्रीः । परिशिष्ट ( ग्रंथशेष ) । विदित हो कि माधवाचार्य भिषक्शिरोमणिजीने बहुतसे रोगोंके निदान स्वग्रन्थमें नहीं लिखे परन्तु उन रोगोंके निदानोंसे बहुधा वैद्योंको काम पडता है, इसी कारण उन निदानोंको अन्य ग्रन्थोंसे संग्रह करके इस जगह लिखते हैं । प्रथम क्लीब ( नपुंसक ) का निदान चरकसे लिखते हैं ॥ क्लीबके लक्षण । रेतोदोषोद्भवं क्लैब्यं यस्माच्छुद्धैव सिध्यति । अतो वक्ष्यामि ते सम्यगग्निवेश यथातथम् ॥ १ ॥ बीजध्वजोपघाताभ्यां जरया शुक्रसंक्षयात् । वैक्लव्यसम्भवस्तस्य शृणु सामान्यलक्षणम् ॥ २ ॥ क्लैब्य ( नपुंसक होना ) केवल वीर्यके दोषसे होता है, वीर्य शुद्ध होनेसेही उसकी शुद्धि है इसी कारण हे अग्निवेश ! मैं तेरे आगे क्लीबका लक्षण कहता हूं । नपुंसक चार प्रकारके होते हैं, उनको कहते हैं-१ बीजके उपघातसे, २ ध्वजोपघा- तसे, ३ बुढापेसे और ४ शुक्र ( वीर्य ) के क्षय होनेसे जो नपुंसकता प्राप्त होती है उसके सामान्य लक्षणको तू सुन ॥ क्लैब्यके सामान्य लक्षण । संकल्पप्रवणो नित्यं प्रियां वश्यामथापि वा । न याति लिङ्गशैथिल्यात्कदाचिद्याति वा पुमान् ॥ ३ ॥ श्वासार्त्तः स्विन्नगात्रांसो मोघसंकल्पचेष्टितः । म्लानशिश्नश्च निर्बीजः स्यादेतत्क्लैब्यलक्षणम् ॥ ४ ॥ प्रिय और वशीभूत स्त्रीको भी प्राप्त होकर जो पुरुष लिंगकी शिथिलता होनेसे नित्य विषय न करे और कदाचित् करे तो जब कभी करे, वह पुरुष श्वाससे व्याकुल हो, देहमें पसीना होय, निष्फलमनोरथ और चेष्टा ( विषयादि ) होय, लिंग जिसका ढीला और बीजरहित होय ये नपुंसकके सामान्य लक्षण हैं ॥ बीजोपघात क्लीबके लक्षण । सामान्यलक्षणं ह्येतद्विस्तरेण प्रवक्ष्यते । शीतरूक्षाम्लसंक्लिष्ट- विषमासात्म्यभोजनात् ॥ ५ ॥ शोकचिन्ताभयत्रासात्स्त्रीणां चात्यर्थसेवनात् । अभिचारादविस्रम्भाद्रसादीनां च संक्ष- यात् ॥ ६ ॥ वातादीनां च वैषम्याद्विरुद्धाध्यशनाच्छ्रमात् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३७० ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
( ३७० ) माधवनिदानका परिशिष्ट । नारीणामनभिज्ञत्वात्पंचकर्मापचारतः ॥ ७ ॥ बीजोपघातो भवति पाण्डुवर्णः सुदुर्बलः । अल्पप्रजोऽल्पहर्षश्च प्रमदासु भवेन्नरः॥ ८॥ हृत्पांडुरोगतमककामलाश्रमपीडितः । बीजो- पघातजं क्लीब्यं ध्वजभंगकृतं शृणु ॥ ९ ॥ प्रथम जो कहे वे नपुंसकके सामान्य लक्षण हैं, अब उनको विस्तारसे कहता हूं-शीतल, रूक्ष, थोडा खटाई मिलाहुआ तथा विषम असात्म्य ( अहितकारी ) अन्न इत्यादि पदार्थोंके भोजन करनेसे, आदिशब्दसे खट्टा, चरपरा, कसैला पदार्थ खानेसे, शोक ( सोच ), चिन्ता, भय और त्रास तथा अत्यन्त स्त्रीरमण करनेसे, किसी शत्रुका अभिचार ( जादू टोना ) से तथा किसीका विश्वास न करनेसे रसादि धातुओंके क्षीण होनेसे, वातादि दोषोंके बढनेसे, उसी प्रकार विरुद्ध ( क्षीर मत्स्यादि ) भोजन, उपवास ( व्रतादि ) और श्रम करनेसे स्त्रीसुखके न जाननेसे, पञ्चकर्म ( वमन विरेचनादि ) के अपचारसे, बीजोपघात अर्थात् बीजमें किसी प्रकारका विकार होता है उसके होनेसे, बीजका वर्ण पीला होता है तथा देह दुर्बल होजाय, उस पुरुषके सन्तान थोडी हो तथा स्त्रीगमनमें इच्छा न होना, हृदयरोग और पांडुरोग होय, तमक श्वास कामला अनायास श्रम इनसे पीडित होय ये लक्षण बीजोपघात क्लीबके हैं ॥ ध्वजभंगक्लीबकी उत्पत्ति । अत्यम्ललवणक्षारविरुद्धाजीर्णभोजनात् । अत्यम्बुपानाद्वि- षमपिष्टान्नगुरुभोजनात् ॥ १० ॥ दधिक्षीरानूपमांससेवना- दतिकर्शनात् । कन्यानां चैव गमनादयोनिगमनादपि ॥ ११ ॥ दीर्घरोग्रीं चिरोत्सृष्टां तथैव च रजस्वलाम् । दुर्गन्धां दुष्ट- योनिं च तथैव च परिश्रुताम् ॥ १२ ॥ नरस्य प्रमदां मोहा- दतिहर्षात्प्रगच्छतः । चतुष्पदाभिगमनाच्छेफसश्चाभिघा- ततः ॥ १३ ॥ अधावनाद्वा मेद्रस्य शस्त्रदंतनखक्षतात् । काष्ठप्रहारनिश्शेषशूकानां चातिसेवनात् ॥ रेतसश्च प्रती- घाताद्ध्वजभङ्गः प्रवर्त्तते ॥ १४ ॥ अत्यन्त खट्टा, नोनका खार, विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ), अपक्क अन्न भोजन कर- नेसे तथा बहुत जल पीनेसे, विषमान्न और भारी ऐसे पदार्थोंके खानेसे, दही, दूध, जलसमीप रहनेवाले पक्षीका मांस खानेसे, व्याधिकरके कृश होनेसे, कन्याके साथ गमन करनेसे, जिसके योनि नहीं ऐसी स्त्रीके साथ गमन करनेसे अथवा
भाषाटीकासमेत । ( ३७१ ) अयोनिकहिये गुदाभंजन करनेसे तथा जिसकी योनिपर बडे बाल हों और जिस स्त्रीने बहुत दिनोंसे मैथुन करना छोड़दिया हो तथा रजस्वला और जिसकी योनिमें दुर्गंधि आती हो तथा दुष्टयोनि और जिसकी सोमादिरोगोंसे योनि चुचाती हो ऐसी स्त्रियोंसे मैथुन करनेसे तथा उन्मत्त होकर गमन करनेसे और अतिहर्षसे गमन करनेसे तथा चतुष्पाद ( बकरी कुतिया आदि ) से गमन करनेसे तथा लिंगमें किसी प्रकारकी चोट लगनेसे तथा लिंगके न धोनेसे तथा शस्त्र, दांत, नख इन करके घाव होनेसे, लकडी आदिकी चोट लगनेसे, लिंगके पिसजानेसे तथा लिंगके मोटे करनेके निमित्त शूकादि प्रयोग करनेसे अर्थात् इनका अत्यन्त सेवन करनेसे तथा वीर्यके बिगडनेसे मनुष्यके ध्वजभंग अर्थात् लिंग खडा होकर तुरंत मुरझाय यह रोग होता है ॥ इसके लक्षण आगे कहते हैं— ध्वजभंगके लक्षण । श्वयथुर्वेदना मेढ्रे रागश्चैवोपलक्ष्यते ॥ १५ ॥ स्फोटाश्च तीव्रा जायन्ते लिङ्गपाको भवत्यपि ॥ मांसवृद्धिर्भवेच्चापि व्रणाः क्षिप्रं भवन्त्यपि ॥ १६ ॥ पुलाकोदकसंकाशः स्रावः श्यावा- रुणप्रभः । वलयीकुरुते चापि कठिनं च परिग्रहम ॥ १७ ॥ ज्वरस्तृष्णा भ्रमो मूर्च्छा च्छर्दिश्चास्योपजायते । रक्तं कृष्णं स्रवेच्चापि नीलमाविललोहितम् ॥ १८ ॥ अग्निनेव च दग्धस्य तीव्रो दाहः सवेदनः । बस्तौ वृषणयोर्वाऽपि सेवन्यां वंक्षणेषु च ॥ १९ ॥ कदाचित्पिच्छिलो वापि पाण्डुस्रावश्च जायते । श्वयथुश्च भवेन्मंदस्तिमितोऽल्पपरिस्रवः ॥ २० ॥ चिरात्स पाकं व्रजति शीघ्रं वाथ प्रपद्यते । जायन्ते कृमयश्चापि क्लियते पूतिगंधि च ॥ २१ ॥ प्रशीर्यते मणिश्चास्य मेढ्रं मुष्कावथा- पि च । ध्वजभंगकृतं क्लैव्यमित्येतत्समुदाहृतम् । एवं पंच- विधं केचिद् ध्वजभंगं वदंत्यपि ॥ २२ ॥ ध्वजभंगवाले मनुष्यके लिंगपर सूजन हो और लिंगमें पीडा हो तथा लाल हो, उसके ऊपर घोर फोडे होते हैं, तथा लिंगमें पाक हो, मांसकी वृद्धि हो लाल होय तथा लिंगमें फोडे होंय उसमें चावलके मांडके समान और काला लाल स्राव होय कंकणके समान गोल लपेटा होय और उसकी जड कठिन होय, तथा उस पुरुषको ज्वर, प्यास, भ्रम, मूर्च्छा, वमन ये रोग हों तथा लिंगमेंसे काला नीला लोहित और