महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१८३-
त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्मको अष्टवसुओंसे प्रस्वापनास्त्रकी प्राप्ति
भीष्म उवाच
ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रणम्य शिरसा तदा ।
ब्राह्मणानां पितॄणां च देवतानां च सर्वशः ॥ १ ॥
नक्तंचराणां भूतानां राजन्यानां विशाम्पते ।
शयनं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तयम् ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजेन्द्र! तदनन्तर मैं रातके समय एकान्तमें शय्यापर जाकर ब्राह्मणों, पितरों, देवताओं, निशाचरों, भूतों तथा राजर्षिगणोंको मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगा ॥ १-२ ॥
जामदग्न्येन मे युद्धमिदं परमदारुणम् ।
अहानि च बहून्यद्य वर्तते सुमहात्ययम् ॥ ३ ॥
आज बहुत दिन हो गये, जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ यह मेरा अत्यन्त भयंकर और महान् अनिष्टकारक युद्ध चल रहा है ॥ ३ ॥
न च रामं महावीर्यं शक्नोमि रणमूर्धनि ।
विजेतुं समरे विप्रं जामदग्न्यं महाबलम् ॥ ४ ॥
परंतु मैं महाबली, महापराक्रमी विप्रवर परशुरामजीको समरभूमिमें युद्धके मुहानेपर किसी तरह जीत नहीं सकता ॥ ४ ॥
यदि शक्यो मया जेतुं जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
दैवतानि प्रसन्नानि दर्शयन्तु निशां मम ॥ ५ ॥
यदि प्रतापी जमदग्निकुमारको जीतना मेरे लिये सम्भव हो तो प्रसन्न हुए देवगण रात्रिमें मुझे दर्शन दें ॥ ५ ॥
ततो निशि च राजेन्द्र प्रसुप्तः शरविक्षतः ।
दक्षिणेनेह पार्श्वेन प्रभातसमये तदा ॥ ६ ॥
ततोऽहं विप्रमुख्यैस्तैर्यैरस्मि पतितो रथात् ।
उत्थापितो धृतश्चैव मा भैरिति च सान्वितः ॥ ७ ॥
त एव मां महाराज स्वप्नदर्शनमेत्य वै ।
परिवार्याब्रुवन् वाक्यं तन्निबोध कुरूद्वह ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! ऐसी प्रार्थना करके बाणोंसे क्षत-विक्षत हुआ मैं रात्रिके अन्तमें प्रभातके समय दाहिनी करवटसे सो गया। महाराज! कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जिन ब्राह्मणशिरोमणियोंने रथसे गिरनेपर मुझे थाम लिया और उठाया था तथा ‘डरो मत’ ऐसा कहकर सान्त्वना दी थी,
उन्हीं लोगोंने मुझे सपनेमें दर्शन दे मेरे चारों ओर खड़े होकर जो बात कही थी, उसे बताता हूँ, सुनो— ॥ ६–८ ॥ उत्तिष्ठ मा भैर्गाङ्गेय न भयं तेऽस्ति किंचन । रक्षामहे त्वां कौरव्य स्वशरीरं हि नो भवान् ॥ ९ ॥ ‘गाङ्गानन्दन! उठो! भयभीत न होओ। तुम्हें कोई भय नहीं है। कुरुनन्दन! हम तुम्हारी रक्षा करते हैं, क्योंकि तुम हमारे ही स्वरूप हो ॥ ९ ॥ न त्वां रामो रणे जेता जामदग्न्यः कथंचन । त्वमेव समरे रामं विजेतो भरतर्षभ ॥ १० ॥ ‘जमदग्निकुमार परशुराम तुम्हें किसी प्रकार युद्धमें जीत नहीं सकेंगे। भरतभूषण! तुम्हीं रणक्षेत्रमें परशुरामपर विजय पाओगे ॥ १० ॥ इदमस्त्रं सुदयितं प्रत्यभिज्ञास्यते भवान् । विदितं हि तवाप्येतत् पूर्वस्मिन् देहधारणे ॥ ११ ॥ प्राजापत्यं विश्वकृतं प्रस्वापं नाम भारत । न हीदं वेद रामोऽपि पृथिव्यां वा पुमान् क्वचित् ॥ १२ ॥ ‘भारत! यह प्रस्वाप नामक अस्त्र है, जिसके देवता प्रजापति हैं। विश्वकर्माने इसका आविष्कार किया है। यह तुम्हें भी परम प्रिय है। इसकी प्रयोगविधि तुम्हें स्वतः ज्ञात हो जायगी; क्योंकि पूर्वशरीरमें तुम्हें भी इसका पूर्ण ज्ञान था। परशुरामजी भी इस अस्त्रको नहीं जानते हैं। इस पृथ्वीपर कहीं किसी भी पुरुषको इसका ज्ञान नहीं है ॥ ११-१२ ॥ तत् स्मरस्व महाबाहो भृशं संयोजयस्व च । उपस्थास्यति राजेन्द्र स्वयमेव तवानघ ॥ १३ ॥ ‘महाबाहो! इस अस्त्रका स्मरण करो और विशेष-रूपसे इसीका प्रयोग करो। निष्पाप राजेन्द्र! यह अस्त्र स्वयं ही तुम्हारी सेवामें उपस्थित हो जायगा ॥ १३ ॥ येन सर्वान् महावीर्यान् प्रशासिष्यसि कौरव । न च रामः क्षयं गन्ता तेनास्त्रेण नराधिप ॥ १४ ॥ ‘कुरुनन्दन! उसके प्रभावसे तुम सम्पूर्ण महापराक्रमी नरेशोंपर शासन करोगे। राजन्! उस अस्त्रसे परशुरामका नाश नहीं होगा ॥ १४ ॥ एनसा न तु संयोगं प्राप्स्यसे जातु मानद । स्वप्स्यते जामदग्न्योऽसौ त्वद्बाणबलपीडितः ॥ १५ ॥ ‘इसलिये मानद! तुम्हें कभी इसके द्वारा पापसे संयोग नहीं होगा। तुम्हारे अस्त्रके प्रभावसे पीड़ित होकर जमदग्नि कुमार परशुराम चुपचाप सो जायँगे ॥ १५ ॥ ततो जित्वा त्वमेवैनं पुनरुत्थापयिष्यसि । अस्त्रेण दयितेनाजौ भीष्म सम्बोधनेन वै ॥ १६ ॥
‘भीष्म! तदनन्तर अपने उस प्रिय अस्त्रके द्वारा युद्धमें विजयी होकर तुम्हीं उन्हें सम्बोधनास्त्रद्वारा पुनः जगाकर उठाओगे ।। १६ ।। एवं कुरुष्व कौरव्य प्रभाते रथमास्थितः । प्रसुप्तं वा मृतं वेति तुल्यं मन्यामहे वयम् ।। १७ ।। ‘कुरुनन्दन! प्रातःकाल रथपर बैठकर तुम ऐसा ही करो; क्योंकि हमलोग सोये अथवा मरे हुएको समान ही समझते हैं ।। १७ ।। न च रामेण मर्तव्यं कदाचिदपि पार्थिव । ततः समुत्पन्नमिदं प्रस्वापं युज्यतामिति ।। १८ ।। ‘राजन्! परशुरामकी कभी मृत्यु नहीं हो सकती; अतः इस प्राप्त हुए प्रस्वाप नामक अस्त्रका प्रयोग करो’ ।। इत्युक्त्वान्तर्हिता राजन् सर्व एव द्विजोत्तमाः । अष्टौ सदृशरूपास्ते सर्वे भासुरमूर्तयः ।। १९ ।। राजन्! ऐसा कहकर वे वसुस्वरूप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अदृश्य हो गये। वे आठों समान रूपवाले थे। उन सबके शरीर तेजोमय प्रतीत होते थे ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि भीष्मप्रस्वापनास्त्रलाभे त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें भीष्मको प्रस्वापनास्त्रका प्राप्तिविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८३ ।।
१८४-
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म तथा परशुरामजीका एक-दूसरेपर शक्ति और ब्रह्मास्त्रका प्रयोग
भीष्म उवाच
ततो रात्रौ व्यतीतायां प्रतिबुद्धोऽस्मि भारत ।
ततः संचिन्त्य वै स्वप्नमवापं हर्षमुत्तमम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—भारत! तदनन्तर रात बीतनेपर जब मेरी नींद खुली, तब उस स्वप्नकी बातको सोचकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १ ॥
ततः समभवद् युद्धं मम तस्य च भारत ।
तुमुलं सर्वभूतानां लोमहर्षणमद्भुतम् ॥ २ ॥
भारत! तदनन्तर मेरा और परशुरामजीका भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो समस्त प्राणियोंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला और अद्भुत था ॥ २ ॥
ततो बाणमयं वर्षं ववर्ष मयि भार्गवः ।
न्यवारयमहं तच्च शरजालेन भारत ॥ ३ ॥
उस समय भृगुनन्दन परशुरामजीने मुझपर बाणोंकी झड़ी लगा दी। भारत! तब मैंने अपने सायकसमूहोंसे उस बाणवर्षाको रोक दिया ॥ ३ ॥
ततः परमसंक्रुद्धः पुनरेव महातपाः ।
ह्यस्तनेन च कोपेन शक्तिं वै प्राहिणोन्मयि ॥ ४ ॥
तब महातपस्वी परशुराम पुनः मुझपर अत्यन्त कुपित हो गये। पहले दिनका भी कोप था ही। उससे प्रेरित होकर उन्होंने मेरे ऊपर शक्ति चलायी ॥ ४ ॥
इन्द्राशनिसमस्पर्शां यमदण्डसमप्रभाम् ।
ज्वलन्तीमग्निवत् संख्ये लेलिहानां समन्ततः ॥ ५ ॥
उसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान भयंकर था। उसकी प्रभा यमदण्डके समान थी और उस संग्राममें अग्निके समान प्रज्वलित हुई वह शक्ति मानो सब ओरसे रक्त चाट रही थी ॥ ५ ॥
ततो भरतशार्दूल धिष्ण्यमाकाशगं यथा ।
स मामभ्यवधीत् तूर्णं जत्रुदेशे कुरूद्वह ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! कुरुकुलरत्न! फिर आकाशवर्ती नक्षत्रके समान प्रकाशित होनेवाली उस शक्तिने तुरंत आकर मेरे गलेकी हँसलीपर आघात किया ॥ ६ ॥
अथास्रमस्रवद् घोरं गिरेर्गैरिकधातुवत् ।
रामेण सुमहाबाहो क्षतस्य छतजेक्षण ॥ ७ ॥
लाल नेत्रोंवाले महाबाहु दुर्योधन! परशुरामजीके द्वारा किये हुए उस गहरे आघातसे भयंकर रक्तकी धारा बह चली। मानो पर्वतसे गैरिक धातुमिश्रित जलका झरना झर रहा हो ॥ ७ ॥
ततोऽहं जामदग्न्याय भृशं क्रोधसमन्वितः ।
चिक्षेप मृत्युसंकाशं बाणं सर्पविषोपमम् ॥ ८ ॥
तब मैंने भी अत्यन्त कुपित हो सर्पविषके समान भयंकर मृत्युतुल्य बाण लेकर परशुरामजीके ऊपर चलाया ॥ ८ ॥
स तेनाभिहतो वीरो ललाटे द्विजसत्तमः ।
अशोभत महाराज सशृङ्ग इव पर्वतः ॥ ९ ॥
उस बाणने विप्रवर वीर परशुरामजीके ललाटमें चोट पहुँचायी। महाराज! उसके कारण वे शिखरयुक्त पर्वतके समान शोभा पाने लगे ॥ ९ ॥
स संरब्धः समावृत्य शरं कालान्तकोपमम् ।
संदधे बलवत् कृष्य घोरं शत्रुनिबर्हणम् ॥ १० ॥
तब उन्होंने भी रोषमें आकर काल और यमके समान भयंकर शत्रुनाशक बाणको हाथमें ले धनुषको बलपूर्वक खींचकर उसके ऊपर रखा ॥ १० ॥
स वक्षसि पपातोग्रः शरो व्याल इव श्वसन् ।
महीं राजंस्ततश्चाहमगमं रुधिराविलः ॥ ११ ॥
राजन्! उनका चलाया हुआ वह भयंकर बाण फुफकारते हुए सर्पके समान सनसनाता हुआ मेरी छातीपर आकर लगा। उससे लहूलुहान होकर मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११ ॥
सम्प्राप्य तु पुनः संज्ञां जामदग्न्याय धीमते ।
प्राहिण्वं विमलां शक्तिं ज्वलन्तीमशनीमिव ॥ १२ ॥
पुनः चेतमें आनेपर मैंने बुद्धिमान् परशुरामजीके ऊपर प्रज्वलित वज्रके समान एक उज्ज्वल शक्ति चलायी ॥ १२ ॥
सा तस्य द्विजमुख्यस्य निपपात भुजान्तरे ।
विह्वलश्चाभवद् राजन् वेपथुश्चैनमाविशत् ॥ १३ ॥
वह शक्ति उन ब्राह्मणशिरोमणिकी दोनों भुजाओंके ठीक बीचमें जाकर लगी। राजन्! इससे वे विह्वल हो गये और उनके शरीरमें कँपकँपी आ गयी ॥ १३ ॥
तत एनं परिष्वज्य सखा विप्रो महातपाः ।
अकृतव्रणः शुभैर्वाक्यैराश्वासयदनेकधा ॥ १४ ॥
तब उनके महातपस्वी मित्र अकृतव्रणने उन्हें हृदयसे लगाकर सुन्दर वचनोंद्वारा अनेक प्रकारसे आश्वासन दिया ॥ १४ ॥
समाश्र्वस्तस्ततो रामः क्रोधामर्षसमन्वितः ।
प्रादुश्चक्रे तदा ब्राह्मं परमास्त्रं महाव्रतः ॥ १५ ॥
तदनन्तर महाव्रती परशुरामजी धैर्ययुक्त हो क्रोध और अमर्षमें भर गये और उन्होंने परम उत्तम ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया ॥ १५ ॥
ततस्तत्प्रतिघातार्थं ब्राह्ममेवास्त्रमुत्तमम् ।
मया प्रयुक्तं जज्वाल युगान्तमिव दर्शयत् ॥ १६ ॥
तब उस अस्त्रका निवारण करनेके लिये मैंने भी उत्तम ब्रह्मास्त्रका ही प्रयोग किया। मेरा वह अस्त्र प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित करता हुआ प्रज्वलित हो उठा ॥ १६ ॥
तयोर्ब्रह्मास्त्रयोरासीदन्तरा वै समागमः ।
असम्प्राप्यैव रामं च मां च भारतसत्तम ॥ १७ ॥
भरतवंशशिरोमणे! वे दोनों ब्रह्मास्त्र मेरे तथा परशुरामजीके पास न पहुँचकर बीचमें ही एक-दूसरेसे भिड़ गये ॥ १७ ॥
ततो व्योम्नि प्रादुरभूत् तेज एव हि केवलम् ।
भूतानि चैव सर्वाणि जग्मुरार्तिं विशाम्पते ॥ १८ ॥
प्रजानाथ! फिर तो आकाशमें केवल आगकी ही ज्वाला प्रकट होने लगी। इससे समस्त प्राणियोंको बड़ी पीड़ा हुई ॥ १८ ॥
ऋषयश्च सगन्धर्वा देवताश्चैव भारत ।
संतापं परमं जग्मुरस्त्रतेजोऽभिपीडिताः ॥ १९ ॥
भारत! उन ब्रह्मास्त्रोंके तेजसे पीड़ित होकर ऋषि, गन्धर्व तथा देवता भी अत्यन्त संतप्त हो उठे ॥ १९ ॥
ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ।
संतप्तानि च भूतानि विषादं जग्मुरुत्तमम् ॥ २० ॥
फिर तो पर्वत, वन और वृक्षोंसहित सारी पृथ्वी डोलने लगी। भूतलके समस्त प्राणी संतप्त हो अत्यन्त विषाद करने लगे ॥ २० ॥
प्रजज्वाल नभो राजन् धूमायन्ते दिशो दश ।
न स्थातुमन्तरिक्षे च शेकुराकाशगास्तदा ॥ २१ ॥
राजन्! उस समय आकाश जल रहा था। सम्पूर्ण दिशाओंमें धूम व्याप्त हो रहा था। आकाशचारी प्राणी भी आकाशमें ठहर न सके ॥ २१ ॥
ततो हाहाकृते लोके सदेवासुरराक्षसे ।
इदमन्तरमित्येवं मोक्तुकामोऽस्मि भारत ॥ २२ ॥
प्रस्वापमस्त्रं त्वरितो वचनाद् ब्रह्मवादिनाम् ।
विचित्रं च तदस्त्रं मे मनसि प्रत्यभात् तदा ॥ २३ ॥
तदनन्तर देवता, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण जगत्में हाहाकार मच गया। भारत! 'यही उपयुक्त अवसर है' ऐसा मानकर मैंने तुरंत ही प्रस्वापनास्त्रको छोड़नेका विचार
किया। फिर तो उन ब्रह्मवादी वसुओंके कथनानुसार उस विचित्र अस्त्रका मेरे मनमें स्मरण हो आया।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परस्परब्रह्मास्त्रप्रयोगे चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परस्पर ब्रह्मास्त्रप्रयोगविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८४ ।।
१८५-
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति
भीष्म उवाच
ततो हलहलाशब्दो दिवि राजन् महानभूत् ।
प्रस्वापं भीष्म मा स्राक्षीरिति कौरवनन्दन ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! कौरवनन्दन! तदनन्तर ‘भीष्म! प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग न करो’ इस प्रकार आकाशमें महान् कोलाहल मच गया ॥ १ ॥
अयुञ्जमेव चैवाहं तदस्त्रं भृगुनन्दने ।
प्रस्वापं मां प्रयुञ्जानं नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
तथापि मैंने भृगुनन्दन परशुरामजीको लक्ष्य करके उस अस्त्रको धनुषपर चढ़ा ही लिया। मुझे प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग करते देख नारदजीने इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
एते वियति कौरव्य दिवि देवगणाः स्थिताः ।
ते त्वां निवारयन्त्यद्य प्रस्वापं मा प्रयोजय ॥ ३ ॥
‘कुरुनन्दन! ये आकाशमें स्वर्गलोकके देवता खड़े हैं। ये सब-के-सब इस समय तुम्हें मना कर रहे हैं, तुम प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग न करो ॥ ३ ॥
रामस्तपस्वी ब्रह्मण्यो ब्राह्मणश्च गुरुश्च ते ।
तस्यावमानं कौरव्य मा स्म कार्षीः कथंचन ॥ ४ ॥
‘परशुरामजी तपस्वी, ब्राह्मणभक्त, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण और तुम्हारे गुरु हैं। कुरुकुलरत्न! तुम किसी तरह भी उनका अपमान न करो’ ॥ ४ ॥
ततोऽपश्यं दिविष्ठान् वै तानष्टौ ब्रह्मवादिनः ।
ते मां स्मयन्तो राजेन्द्र शनकैरिदमब्रुवन् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् मैंने आकाशमें खड़े हुए उन आठों ब्रह्मवादी वसुओंको देखा। वे मुसकराते हुए मुझसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
यथाऽऽह भरतश्रेष्ठ नारदस्तत् तथा कुरु ।
एतद्धि परमं श्रेयो लोकानां भरतर्षभ ॥ ६ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! नारदजी जैसा कहते हैं, वैसा करो। भरतकुलतिलक! यही सम्पूर्ण जगत्के लिये परम कल्याणकारी होगा’ ॥ ६ ॥
ततश्च प्रतिसंहृत्य तदस्त्रं स्वापनं महत् ।
ब्रह्मास्त्रं दीपयांचक्रे तस्मिन् युधि यथाविधि ॥ ७ ॥
तब मैंने उस महान् प्रस्वापनास्त्रको धनुषसे उतार लिया और उस युद्धमें विधिपूर्वक ब्रह्मास्त्रको ही प्रकाशित किया ॥ ७ ॥
ततो रामो हृषितो राजसिंह
दृष्ट्वा तदस्त्रं विनिवर्तितं वै ।
जितोऽस्मि भीष्मेण सुमन्दबुद्धि-
रित्येव वाक्यं सहसा व्यमुञ्चत् ॥ ८ ॥
राजसिंह! मैंने प्रस्वापनास्त्रको उतार लिया है—यह देखकर परशुरामजी बड़े प्रसन्न हुए। उनके मुखसे सहसा यह वाक्य निकल पड़ा कि 'मुझ मन्दबुद्धिको भीष्मने जीत लिया' ॥ ८ ॥
ततोऽपश्यत् पितरं जामदग्न्यः
पितुस्तथा पितरं चास्य मान्यम् ।
ते तत्र चैनं परिवार्य तस्थु-
रूचुश्चैनं सान्त्वपूर्वं तदानीम् ॥ ९ ॥
इसके बाद जमदग्निकुमार परशुरामने अपने पिता जमदग्निको तथा उनके भी माननीय पिता ऋचीक मुनिको देखा। वे सब पितर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले ॥ ९ ॥
पितर ऊचुः
मा स्मैवं साहसं तात पुनः कार्षीः कथंचन ।
भीष्मेण संयुगं गन्तुं क्षत्रियेण विशेषतः ॥ १० ॥
**पितरोंने कहा—**तात! फिर कभी किसी प्रकार भी ऐसा साहस न करना। भीष्म और विशेषतः क्षत्रियके साथ युद्धभूमिमें उतरना अब तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ १० ॥
क्षत्रियस्य तु धर्मोऽयं यद् युद्धं भृगुनन्दन ।
स्वाध्यायो व्रतचर्याथ ब्राह्मणानां परं धनम् ॥ ११ ॥
भृगुनन्दन! क्षत्रियका तो युद्ध करना धर्म ही है; किंतु ब्राह्मणोंके लिये वेदोंका स्वाध्याय तथा उत्तम व्रतोंका पालन ही परम धर्म है ॥ ११ ॥
इदं निमित्ते कस्मिंश्चिदस्माभिः प्रागुदाहृतम् ।
शस्त्रधारणमत्युग्रं तच्चाकार्यं कृतं त्वया ॥ १२ ॥
यह बात पहले भी किसी अवसरपर हमने तुमसे कही थी। शस्त्र उठाना अत्यन्त भयंकर कर्म है; अतः तुमने यह न करनेयोग्य कार्य ही किया है ॥ १२ ॥
वत्स पर्याप्तमेतावद् भीष्मेण सह संयुगे ।
विमर्दस्ते महाबाहो व्यपयाहि रणादितः ॥ १३ ॥
महाबाहो! वत्स! भीष्मके साथ युद्धमें उतरकर जो तुमने इतना विध्वंसात्मक कार्य किया है, यही बहुत हो गया। अब तुम इस संग्रामसे हट जाओ ॥ १३ ॥
पर्याप्तमेतद् भद्रं ते तव कार्मुकधारणम् ।
विसर्जयैतद् दुर्धर्ष तपस्तप्यस्व भार्गव ॥ १४ ॥
एष भीष्मः शान्तनवो देवैः सर्वैर्निवारितः ।
निवर्तस्व रणादस्मादिति चैव प्रसादितः ॥ १५ ॥
रामेण सह मा योत्सीर्गुरुणेति पुनः पुनः ।
न हि रामो रणे जेतुं त्वया न्याय्यः कुरूद्वह ॥ १६ ॥
मानं कुरुष्व गाङ्गेय ब्राह्मणस्य रणाजिरे ।
भृगुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। दुर्धर्ष वीर! तुमने जो धनुष उठा लिया, यही पर्याप्त है। अब इसे त्याग दो और तपस्या करो। देखो, इन सम्पूर्ण देवताओंने शान्तनु-नन्दन भीष्मको भी रोक दिया है। वे उन्हें प्रसन्न करके यह बात कह रहे हैं कि ‘तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ। परशुराम तुम्हारे गुरु हैं। तुम उनके साथ बार-बार युद्ध न करो। कुरुश्रेष्ठ! परशुरामको युद्धमें जीतना तुम्हारे लिये कदापि न्यायसंगत नहीं है। गंगानन्दन! तुम इस समरांगणमें अपने ब्राह्मणगुरुका सम्मान करो’ ॥ १४—१६ १/२ ॥
वयं तु गुरवस्तुभ्यं तस्मात् त्वां वारयामहे ॥ १७ ॥
भीष्मो वसूनामन्यतमो दिष्ट्या जीवसि पुत्रक ।
बेटा परशुराम! हम जो तुम्हारे गुरुजन—आदरणीय पितर हैं। इसलिये तुम्हें रोक रहे हैं। पुत्र! भीष्म वसुओंमेंसे एक वसु हैं। तुम अपना सौभाग्य ही समझो कि उनके साथ युद्ध करके अबतक जीवित हो ॥ १७ १/२ ॥
गाङ्गेयः शान्तनोः पुत्रो वसुरेष महायशाः ॥ १८ ॥
कथं शक्यस्त्वया जेतुं निवर्तस्वेह भार्गव ।
भृगुनन्दन! गंगा और शान्तनुके ये महायशस्वी पुत्र भीष्म साक्षात् वसु ही हैं। इन्हें तुम कैसे जीत सकते हो? अतः यहाँ युद्धसे निवृत्त हो जाओ ॥ १८ १/२ ॥
अर्जुनः पाण्डवश्रेष्ठः पुरंदरसुतो बली ॥ १९ ॥
नरः प्रजापतिर्वीरः पूर्वदेवः सनातनः ।
सव्यसाचीति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ।
भीष्ममृत्युर्यथाकालं विहितो वै स्वयम्भुवा ॥ २० ॥
प्राचीन सनातन देवता और प्रजापालक वीरवर भगवान् नर इन्द्रपुत्र महाबली पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनके रूपमें प्रकट होंगे तथा पराक्रमसम्पन्न होकर तीनों लोकोंमें सव्यसाचीके नामसे विख्यात होंगे। स्वयम्भू ब्रह्माजीने उन्हींको यथासमय भीष्मकी मृत्युमें कारण बनाया है ॥ १९-२० ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्तः स पितृभिः पितॄन् रामोऽब्रवीदिदम् ।
नाहं युधि निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् ॥ २१ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! पितरोंके ऐसा कहनेपर परशुरामजीने उनसे इस प्रकार कहा—'मैं युद्धमें पीठ नहीं दिखाऊँगा। यह मेरा चिरकालसे धारण किया हुआ व्रत है ॥ २१ ॥
न निर्वर्तितपूर्वश्च कदाचिद् रणमूर्धनि ।
निवर्त्यतामापगेयः कामं युद्धात् पितामहाः ॥ २२ ॥
न त्वहं विनिवर्तिष्ये युद्धादस्मात् कथंचन ।
'आजसे पहले भी मैं कभी किसी युद्धसे पीछे नहीं हटा हूँ। अतः पितामहो! आपलोग अपनी इच्छाके अनुसार पहले गंगानन्दन भीष्मको ही युद्धसे निवृत्त कीजिये। मैं किसी प्रकार पहले स्वयं ही इस युद्धसे पीछे नहीं हटूँगा' ॥ २२ ½ ॥
ततस्ते मुनयो राजन्नृचीकप्रमुखास्तदा ॥ २३ ॥
नारदेनैव सहिताः समागम्येदमब्रुवन् ।
निवर्तस्व रणात् तात मानयस्व द्विजोत्तमम् ॥ २४ ॥
राजन्! तब वे ऋचीक आदि मुनि नारदजीके साथ मेरे पास आये और इस प्रकार बोले—'तात! तुम्हीं युद्धसे निवृत्त हो जाओ और द्विजश्रेष्ठ परशुरामजीका मान रखो' ॥
इत्यवोचमहं तांश्च क्षत्रधर्मव्यपेक्षया ।
मम व्रतमिदं लोके नाहं युद्धात् कदाचन ॥ २५ ॥
विमुखो विनिवर्तेयं पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ।
नाहं लोभान्न कार्पण्यान्न भयान्नार्थकारणात् ॥ २६ ॥
त्यजेयं शाश्वतं धर्ममिति मे निश्चिता मतिः ।
तब मैंने क्षत्रियधर्मको लक्ष्य करके उनसे कहा—'महर्षियो! संसारमें मेरा यह व्रत प्रसिद्ध है कि मैं पीठपर बाणोंकी चोट खाता हुआ कदापि युद्धसे निवृत्त नहीं हो सकता। मेरा यह निश्चित विचार है कि मैं लोभसे, कायरता या दीनतासे, भयसे अथवा किसी स्वार्थके कारण भी क्षत्रियोंके सनातन धर्मका त्याग नहीं कर सकता' ॥ २५-२६ ½ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे नारदप्रमुखा नृप ॥ २७ ॥
भागीरथी च मे माता रणमध्यं प्रपेदिरे ।
तथैवात्तशरो धन्वी तथैव दृढनिश्चयः ।
स्थिरोऽहमाहवे योद्धुं ततस्ते राममब्रुवन् ॥ २८ ॥
समेत्य सहिता भूयः समरे भृगुनन्दनम् ।
इतना कहकर मैं पूर्ववत् धनुष-बाण लिये दृढ़ निश्चयके साथ समरभूमिमें युद्ध करनेके लिये डटा रहा। राजन्! तब वे नारद आदि सम्पूर्ण ऋषि और मेरी माता गंगा सब लोग उस रणक्षेत्रमें एकत्र हुए और पुनः एक साथ मिलकर उस समरांगणमें भृगुनन्दन परशुरामजीके पास जाकर इस प्रकार बोले— ॥ २७-२८ ½ ॥
नावनीतं हि हृदयं विप्राणां शाम्य भार्गव ॥ २९ ॥
राम राम निवर्तस्व युद्धादस्माद् द्विजोत्तम ।
अवध्यो वै त्वया भीष्मस्त्वं च भीष्मस्य भार्गव ॥ ३० ॥
‘भृगुनन्दन! ब्राह्मणोंका हृदय नवनीतके समान कोमल होता है; अतः शान्त हो जाओ। विप्रवर परशुराम! इस युद्धसे निवृत्त हो जाओ। भार्गव! तुम्हारे लिये भीष्म और भीष्मके लिये तुम अवध्य हो’ ॥ २९-३० ॥
एवं ब्रुवन्तस्ते सर्वे प्रतिरुध्य रणाजिरम् ।
न्यासयांचक्रिरे शस्त्रं पितरो भृगुनन्दनम् ॥ ३१ ॥
इस प्रकार कहते हुए उन सब लोगोंने रणस्थलीको घेर लिया और पितरोंने भृगुनन्दन परशुरामसे अस्त्र-शस्त्र रखवा दिया ॥ ३१ ॥
ततोऽहं पुनरेवाथ तानष्टौ ब्रह्मवादिनः ।
अद्राक्षं दीप्यमानान् वै ग्रहानष्टाविवोदितान् ॥ ३२ ॥
इसी समय मैंने पुनः उन आठों ब्रह्मवादी वसुओंको आकाशमें उदित हुए आठ ग्रहोंकी भाँति प्रकाशित होते देखा ॥ ३२ ॥
ते मां सप्रणयं वाक्यमब्रुवन् समरे स्थितम् ।
प्रैहि रामं महाबाहो गुरुं लोकहितं कुरु ॥ ३३ ॥
उन्होंने समरभूमिमें डटे हुए मुझसे प्रेमपूर्वक कहा—‘महाबाहो! तुम अपने गुरु परशुरामजीके पास जाओ और जगत्का कल्याण करो’ ॥ ३३ ॥
दृष्ट्वा निवर्तितं रामं सुहृद्वाक्येन तेन वै ।
लोकानां च हितं कुर्वन्नहमप्याददे वचः ॥ ३४ ॥
अपने सुहृदोंके कहनेसे परशुरामजीको युद्धसे निवृत्त हुआ देख मैंने भी लोककी भलाई करनेके लिये उन महर्षियोंकी बात मान ली ॥ ३४ ॥
ततोऽहं राममासाद्य ववन्दे भृशविक्षतः ।
रामश्चाभ्युत्स्मयन् प्रेम्णा मामुवाच महातपाः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर मैंने परशुरामजीके पास जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय मेरा शरीर बहुत घायल हो गया था। महातपस्वी परशुराम मुझे देखकर मुसकराये और प्रेमपूर्वक इस प्रकार बोले— ॥ ३५ ॥
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन् क्षत्रियः पृथिवीचरः ।
गम्यतां भीष्म युद्धेऽस्मिंस्तोषितोऽहं भृशं त्वया ॥ ३६ ॥
'भीष्म! इस जगत्में भूतलपर विचरनेवाला कोई भी क्षत्रिय तुम्हारे समान नहीं है। जाओ, इस युद्धमें तुमने मुझे बहुत संतुष्ट किया है' ॥ ३६ ॥
मम चैव समक्षं तां कन्यामाहूय भार्गवः ।
उक्तवान् दीनया वाचा मध्ये तेषां महात्मनाम् ॥ ३७ ॥
फिर मेरे सामने ही उन्होंने उस कन्याको बुलाकर उन सब महात्माओंके बीच दीनतापूर्ण वाणीमें उससे कहा ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि युद्धनिवृत्तौ पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें युद्धनिवृत्तिविषयक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1177)
भीष्म और परशुरामके युद्धमें नारदजीद्वारा बीच-बचाव
१८६-
षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
अम्बाकी कठोर तपस्या
राम उवाच
प्रत्यक्षमेतल्लोकानां सर्वेषामेव भामिनि ।
यथाशक्त्या मया युद्धं कृतं वै पौरुषं परम् ॥ १ ॥
परशुराम बोले— भामिनि! यह सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखा है कि मैंने (तेरे लिये) पूरी शक्ति लगाकर युद्ध किया और महान् पुरुषार्थ दिखाया है ॥ १ ॥
न चैवमपि शक्नोमि भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् ।
विशेषयितुमत्यर्थमुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ॥ २ ॥
परंतु इस प्रकार उत्तमोत्तम अस्त्र प्रकट करके भी मैं शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मसे अपनी अधिक विशिष्टता नहीं दिखा सका ॥ २ ॥
एषा मे परमा शक्तिरेतन्मे परमं बलम् ।
यथेष्टं गम्यतां भद्रे किमन्यद् वा करोमि ते ॥ ३ ॥
मेरी अधिक-से-अधिक शक्ति, अधिक-से-अधिक बल इतना ही है। भद्रे! अब तेरी जहाँ इच्छा हो, चली जा, अथवा बता, तेरा दूसरा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? ॥ ३ ॥
भीष्ममेव प्रपद्यस्व न तेऽन्या विद्यते गतिः ।
निर्जितो ह्यस्मि भीष्मेण महास्त्राणि प्रमुञ्चता ॥ ४ ॥
अब तू भीष्मकी ही शरण ले। तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है; क्योंकि महान् अस्त्रोंका प्रयोग करके भीष्मने मुझे जीत लिया है ॥ ४ ॥
एवमुक्त्वा ततो रामो विनिःश्वस्य महामनाः ।
तूष्णीमासीत् ततः कन्या प्रोवाच भृगुनन्दनम् ॥ ५ ॥
ऐसा कहकर महामना परशुराम लंबी साँस खींचते हुए मौन हो गये। तब राजकन्या अम्बाने उन भृगुनन्दनसे कहा— ॥ ५ ॥
भगवन्नेवमेवैतद् यथाऽऽह भगवांस्तथा ।
अजेयो युधि भीष्मोऽयमपि देवैरुदारधीः ॥ ६ ॥
'भगवन्! आपका कहना ठीक है। वास्तवमें ये उदारबुद्धि भीष्म युद्धमें देवताओंके लिये भी अजेय हैं ॥
यथाशक्ति यथोत्साहं मम कार्यं कृतं त्वया ।
अनिवार्यं रणे वीर्यमस्त्राणि विविधानि च ॥ ७ ॥
'आपने अपनी पूरी शक्ति लगाकर पूर्ण उत्साहके साथ मेरा कार्य किया है। युद्धमें ऐसा पराक्रम दिखाया है, जिसे भीष्मके सिवा दूसरा कोई रोक नहीं सकता था। इसी प्रकार
आपने नाना प्रकारके दिव्यास्त्र भी प्रकट किये हैं ।। ७ ।। न चैव शक्यते युद्धे विशेषयितुमन्ततः । न चाहमेनं यास्यामि पुनर्भीष्मं कथंचन ।। ८ ।। 'परंतु अन्ततोगत्वा आप युद्धमें उनकी अपेक्षा अपनी विशेषता स्थापित न कर सके। मैं भी अब किसी प्रकार पुनः भीष्मके पास नहीं जाऊँगी ।। ८ ।। गमिष्यामि तु तत्राहं यत्र भीष्मं तपोधन । समरे पातयिष्यामि स्वयमेव भृगूद्वह ।। ९ ।। 'भृगुश्रेष्ठ तपोधन! अब मैं वहीं जाऊँगी, जहाँ ऐसी बन सकूँ कि समरभूमिमें स्वयं ही भीष्मको मार गिराऊँ' ।। ९ ।। एवमुक्त्वा ययौ कन्या रोषव्याकुललोचना । तापस्ये धृतसंकल्पा सा मे चिन्तयती वधम् ।। १० ।। ऐसा कहकर रोषभरे नेत्रोंवाली वह राजकन्या मेरे वधके उपायका चिन्तन करती हुई तपस्याके लिये दृढ़ संकल्प लेकर वहाँसे चली गयी ।। १० ।। ततो महेन्द्रं सह तैर्मुनिभिर्भृगुसत्तमः । यथाऽऽगतं तथा सोऽगान्मामुपामन्त्र्य भारत ।। ११ ।। भारत! तदनन्तर भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी उन महर्षियोंके साथ मुझसे विदा ले जैसे आये थे, वैसे ही महेन्द्र पर्वतपर चले गये ।। ११ ।। ततो रथं समारुह्य स्तूयमानो द्विजातिभिः । प्रविश्य नगरं मात्रे सत्यवत्यै न्यवेदयम् ।। १२ ।। यथावृत्तं महाराज सा च मां प्रत्यनन्दत । पुरुषांश्चादिशं प्राज्ञान् कन्यावृत्तान्तकर्मणि ।। १३ ।। महाराज! तत्पश्चात् मैंने भी ब्राह्मणके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए रथपर आरूढ़ हो हस्तिनापुरमें आकर माता सत्यवतीसे सब समाचार यथार्थरूपसे निवेदन किया। माताने भी मेरा अभिनन्दन किया। इसके बाद मैंने कुछ बुद्धिमान् पुरुषोंको उस कन्याके वृत्तान्तका पता लगानेके कार्यमें नियुक्त कर दिया ।। १२-१३ ।। दिवसे दिवसे ह्यस्या गतिजल्पितचेष्टितम् । प्रत्याहरंश्च मे युक्ताः स्थिताः प्रियहिते सदा ।। १४ ।। मेरे लगाये हुए गुप्तचर सदा मेरे प्रिय एवं हितमें संलग्न रहनेवाले थे। वे प्रतिदिन उस कन्याकी गतिविधि, बोलचाल और चेष्टाका समाचार मेरे पास पहुँचाया करते थे ।। १४ ।। यदैव हि वनं प्रायात् सा कन्या तपसे धृता । तदैव व्यथितो दीनो गतचेता इवाभवम् ।। १५ ।। जिस दिन वह कन्या तपस्याका निश्चय करके वनमें गयी, उसी दिन मैं व्यथित, दीन और अचेत-सा हो गया ।। १५ ।।
न हि मां क्षत्रियः कश्चिद् वीर्येण व्यजयद् युधि ।
ऋते ब्रह्मविदस्तात तपसा संशितव्रतात् ॥ १६ ॥
तात! जो तपस्याके द्वारा कठोर व्रतका पालन करनेवाले हैं, उन ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण परशुरामजीको छोड़कर कोई भी क्षत्रिय अबतक युद्धमें मुझे पराजित नहीं कर सका है॥ १६ ॥
अपि चैतन्मया राजन् नारदेऽपि निवेदितम् ।
व्यासे चैव तथा कार्यं तौ चोभौ मामवोचताम् ॥ १७ ॥
न विषादस्त्वया कार्यों भीष्म काशिसुतां प्रति ।
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तयितुमुत्सहेत् ॥ १८ ॥
राजन्! मैंने यह वृत्तान्त देवर्षि नारद और महर्षि व्याससे भी निवेदन किया था। उस समय उन दोनोंने मुझसे कहा—‘भीष्म! तुम्हें काशिराजकी कन्याके विषयमें तनिक भी विषाद नहीं करना चाहिये। दैवके विधानको पुरुषार्थके द्वारा कौन टाल सकता है?’ ॥ १७-१८ ॥
सा कन्या तु महाराज प्रविश्याश्रममण्डलम् ।
यमुनातीरमाश्रित्य तपस्तेपेऽतिमानुषम् ॥ १९ ॥
महाराज! फिर उस कन्याने आश्रममण्डलमें पहुँचकर यमुनाके तटका आश्रय ले ऐसी कठोर तपस्या की, जो मानवीय शक्तिसे परे है॥ १९॥
निराहारा कृशा रुक्षा जटिला मलपङ्किनी ।
षण्मासान् वायुभक्षा च स्थाणुभूता तपोधना ॥ २० ॥
उसने भोजन छोड़ दिया, वह दुबली तथा रुक्ष हो गयी। सिरपर केशोंकी जटा बन गयी। शरीरमें मैल और कीचड़ जम गयी। वह तपोधना कन्या छः महीनोंतक केवल वायु पीकर ठूँठे काठकी भाँति निश्चलभावसे खड़ी रही॥ २० ॥
यमुनाजलमाश्रित्य संवत्सरमथापरम् ।
उदवासं निराहारा पारयामास भाविनी ॥ २१ ॥
फिर एक वर्षतक यमुनाजीके जलमें घुसकर बिना कुछ खाये-पीये वह भाविनी राजकन्या जलमें ही रहकर तपस्या करती रही॥ २१ ॥
शीर्णपर्णेन चैकेन पारयामास सा परम् ।
संवत्सरं तीव्रकोपा पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठिता ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् तीव्र क्रोधसे युक्त हुई अम्बाने पैरके अँगूठेके अग्रभागपर खड़ी हो अपने-आप झड़कर गिरा हुआ केवल एक सूखा पत्ता खाकर एक वर्ष व्यतीत किया॥
एवं द्वादश वर्षाणि तापयामास रोदसी ।
निवर्त्यमानापि च सा ज्ञातिभिर्नैव शक्यते ॥ २३ ॥
इस प्रकार बारह वर्षोंतक कठोर तपस्यामें संलग्न हो उसने पृथ्वी और आकाशको संतप्त कर दिया। उसके जातिवालोंने आकर उसे उस कठोर व्रतसे निवृत्त करनेकी चेष्टा की; परंतु उन्हें सफलता न मिल सकी ॥ २३ ॥ ततोऽगमद् वत्सभूमिं सिद्धचारणसेविताम् । आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम् ॥ २४ ॥ तत्र पुण्येषु तीर्थेषु साऽऽप्लुताङ्गी दिवानिशम् । व्यचरत् काशिकन्या सा यथाकामविचारिणी ॥ २५ ॥ तदनन्तर वह सिद्धों और चारणोंद्वारा सेवित वत्सदेशकी भूमिमें गयी और वहाँ पुण्यशील तपस्वी महात्माओंके आश्रमोंमें विचरने लगी। काशिराजकी वह कन्या दिन-रात वहाँके पुण्य तीर्थोंमें स्नान करती और अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र विचरती रहती थी ॥ नन्दाश्रमे महाराज तथोलूकाश्रमे शुभे । चवनस्याश्रमे चैव ब्रह्मणः स्थान एव च ॥ २६ ॥ प्रयागे देवयजने देवारण्येषु चैव ह । भोगवत्यां महाराज कौशिकस्याश्रमे तथा ॥ २७ ॥ माण्डव्याश्रमे राजन् दिलीपस्याश्रमे तथा । रामह्रदे च कौरव्य पैलगर्गस्य चाश्रमे ॥ २८ ॥ एतेषु तीर्थेषु तदा काशिकन्या विशाम्पते । आप्लावयत गात्राणि व्रतमास्थाय दुष्करम् ॥ २९ ॥ महाराज! शुभकारक नन्दाश्रम, उलूकाश्रम, च्यवनाश्रम, ब्रह्मस्थान, देवताओंके यज्ञस्थान प्रयाग, देवारण्य, भोगवती, कौशिकाश्रम, माण्डव्याश्रम, दिलीपाश्रम, रामह्रद और पैलगर्गाश्रम—क्रमशः इन सभी तीर्थोंमें उन दिनों काशिराजकी कन्याने कठोर व्रतका आश्रय ले स्नान किया ॥ २६—२९ ॥ तामब्रवीच्च कौरव्य मम माता जले स्थिता । किमर्थं क्लिश्यसे भद्रे तथ्यमेव वदस्व मे ॥ ३० ॥ कुरुनन्दन! उस समय मेरी माता गंगाने जलमें प्रकट होकर अम्बासे कहा—'भद्रे! तू किसलिये शरीरको इतना क्लेश देती है। मुझे ठीक-ठीक बता' ॥ सैनामथाब्रवीद् राजन् कृताञ्जलिरनिन्दिता । भीष्मेण समरे रामो निर्जितश्चारुलोचने ॥ ३१ ॥ कोऽन्यस्तमुत्सहेज्जेतुमुद्यतेषुं महीपतिः । साहं भीष्मविनाशाय तपस्तप्स्ये सुदारुणम् ॥ ३२ ॥ राजन्! तब साध्वी अम्बाने हाथ जोड़कर गंगाजीसे कहा—'चारुलोचने! भीष्मने युद्धमें परशुरामजीको परास्त कर दिया; फिर दूसरा कौन ऐसा राजा है, जो धनुष-बाण
लेकर खड़े हुए भीष्मको युद्धमें परास्त कर सके? अतः मैं भीष्मके विनाशके लिये अत्यन्त कठोर तपस्या कर रही हूँ।। ३१-३२।।
विचरामि महीं देवि यथा हन्यामहं नृपम्।
एतद् व्रतफलं देवि परमस्मिन् यथा हि मे।। ३३।।
‘देवि! मैं इस भूतलपर विभिन्न तीर्थोंमें इसीलिये विचर रही हूँ कि योग्य बनकर मैं स्वयं ही भीष्मको मार सकूँ। भगवति! इस जगत्में मेरे व्रत और तपस्याका यही सर्वोत्तम फल है, जैसा मैंने आपको बताया है’।। ३३।।
ततोऽब्रवीत् सागरगा जिह्मं चरसि भाविनि।
नैष कामोऽनवद्याङ्गि शक्यः प्राप्तुं त्वयाबले।। ३४।।
तब सतरगामिनी गंगानदीने उससे कहा—‘भाविनि! तू कुटिल आचरण कर रही है। सुन्दर अंगोंवाली अबले! तेरा यह मनोरथ कभी पूर्ण नहीं हो सकता।।
यदि भीष्मविनाशाय काश्ये चरसि वै व्रतम्।
व्रतस्था च शरीरं त्वं यदि नाम विमोक्ष्यसि।। ३५।।
नदी भविष्यसि शुभे कुटिला वार्षिकोदका।
दुस्तीर्था न तु विज्ञेया वार्षिकी नाष्टमासिकी।। ३६।।
‘काशिराजकन्ये! यदि भीष्मके विनाशके लिये तू प्रयत्न कर रही है और व्रतमें स्थित रहकर ही यदि तू अपना शरीर छोड़ेगी तो शुभे! तुझे टेढ़ी-मेढ़ी नदी होना पड़ेगा। केवल बरसातमें ही तेरे भीतर जल दिखायी देगा। तेरे भीतर तीर्थ या स्नानकी सुविधा बड़ी कठिनाईसे होगी। तू केवल बरसातकी नदी समझी जायगी। शेष आठ महीनोंमें तेरा पता नहीं लगेगा।।
भीमग्राहवती घोरा सर्वभूतभयङ्करी।
एवमुक्त्वा ततो राजन् काशिकन्यां न्यवर्तत।। ३७।।
माता मम महाभागा स्मयमानेव भाविनी।
कदाचिदष्टमे मासि कदाचिद् दशमे तथा।
न प्राश्नीतोदकमपि पुनः सा वरवर्णिनी।। ३८।।
‘बरसातमें भी भयंकर ग्राहोंसे भरी रहनेके कारण तू समस्त प्राणियोंके लिये अत्यन्त भयंकर और घोरस्वरूपा बनी रहेगी।’ राजन्! काशिराजकी कन्यासे ऐसा कहकर मेरी परम सौभाग्यशालिनी माता गंगा देवी मुसकराती हुई लौट गयीं। तदनन्तर वह सुन्दरी कन्या पुनः कठोर तपस्यामें प्रवृत्त हो कभी आठवें और कभी दसवें महीनेतक जल भी नहीं पीती थी।। ३७-३८।।
सा वत्सभूमिं कौरव्य तीर्थलोभात् ततस्ततः।
पतिता परिधावन्ती पुनः काशिपतेः सुता।। ३९।।
कुरुनन्दन! काशिराजकी वह कन्या तीर्थसेवनके लोभसे वत्सदेशकी भूमिपर इधर-उधर दौड़ती फिरती थी ।।
सा नदी वत्सभूम्यां तु प्रथिताम्बेति भारत ।
वार्षिकी ग्राहबहुला दुस्तीर्था कुटिला तथा ॥ ४० ॥
भारत! कुछ कालके पश्चात् वह वत्सदेशकी भूमिमें अम्बा नामसे प्रसिद्ध नदी हुई, जो केवल बरसातमें जलसे भरी रहती थी। उसमें बहुत-से ग्राह निवास करते थे। उसके भीतर उतरना और स्नान आदि तीर्थकृत्योंका सम्पादन बहुत ही कठिन था। वह नदी टेढ़ी-मेढ़ी होकर बहती थी ॥ ४० ॥
सा कन्या तपसा तेन देहार्धेन व्यजायत ।
नदी च राजन् वत्सेषु कन्या चैवाभवत् तदा ॥ ४१ ॥
राजन्! राजकन्या अम्बा उस तपस्याके प्रभावसे आधे शरीरसे तो अम्बा नामकी नदी हो गयी और आधे अंगसे वत्सदेशमें ही एक कन्या होकर प्रकट हुई ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि अम्बातपस्यायां
षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अम्बाका तपस्याविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥