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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
Page 3183Permalink

'जिसके पास पहले राजा लोग बैठकर उसे आनन्द प्रदान करते थे, आज मरकर धरतीपर पड़े उसी वीरके पास गीध बैठे हुए हैं ।। १४ ।। यं पुरा व्यजनै रम्यैरुपवीजन्ति योषितः । तमद्य पक्षव्यजनैरुपवीजन्ति पक्षिणः ॥ १५ ॥ 'पहले जिसके पास खड़ी होकर युवतियाँ सुन्दर पंखे झला करती थीं, आज उसीको पक्षीगण अपनी पाँखोंसे हवा करते हैं ।। १५ ।। एष शेते महाबाहुर्बलवान् सत्यविक्रमः । सिंहेनेव द्विपः संख्ये भीमसेनेन पातितः ॥ १६ ॥ 'यह महाबाहु सत्यपराक्रमी बलवान् वीर दुर्योधन भीमसेनके द्वारा गिराया जाकर युद्धस्थलमें सिंहके मारे हुए गजराजके समान सो रहा है ।। १६ ।। पश्य दुर्योधनं कृष्ण शयानं रुधिरोक्षितम् । निहतं भीमसेनेन गदां सम्मृज्य भारतम् ॥ १७ ॥ 'श्रीकृष्ण! भीमसेनकी चोट खाकर खूनसे लथपथ हो गदा लिये धरतीपर सोये हुए दुर्योधनको अपनी आँखसे देख लो ।। १७ ।। अक्षौहिणीर्महाबाहुर्दश चैकां च केशव । आनयद् यः पुरा संख्ये सोऽनयान्निधनं गतः ॥ १८ ॥ 'केशव! जिस महाबाहु वीरने पहले ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंको जुटा लिया था, वही अपनी अनीतिके कारण युद्धमें मार डाला गया ।। १८ ।। एष दुर्योधनः शेते महेष्वासो महाबलः । शार्दूल इव सिंहेन भीमसेनेन पातितः ॥ १९ ॥ 'सिंहके मारे हुए दूसरे सिंहके समान भीमसेनके हाथों मारा गया यह महाबली महाधनुर्धर दुर्योधन सो रहा है ।। १९ ।। विदुरं ह्यवमत्यैष पितरं चैव मन्दभाक् । बालो वृद्धावमानेन मन्दो मृत्युवशं गतः ॥ २० ॥ 'यह मूर्ख और अभागा बालक विदुर तथा अपने पिताका अपमान करके बड़े-बूढ़ोंकी अवहेलनाके पापसे ही कालके गालमें चला गया है ।। २० ।। निःसपना मही यस्य त्रयोदश समाः स्थिता । स शेते निहतो भूमौ पुत्रो मे पृथिवीपतिः ॥ २१ ॥ 'यह सारी पृथ्वी तेरह वर्षोंतक निष्कण्टकभावसे जिसके अधिकारमें रही है, वही मेरा पुत्र पृथ्वीपति दुर्योधन आज मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा है ।। २१ ।। अपश्यं कृष्ण पृथिवीं धार्तराष्ट्रानुशासिताम् । पूर्णां हस्तिगवाश्वैश्च वार्ष्णेय न तु तच्चिरम् ॥ २२ ॥

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‘वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! मैंने दुर्योधनद्वारा शासित हुई इस पृथ्वीको हाथी, घोड़े और गौओंसे भरी-पूरी देखा था; किंतु वह राज्य चिरस्थायी न रह सका ॥ २२ ॥ तामेवाद्य महाबाहो पश्याम्यन्यानुशासिताम् । हीनां हस्तिगवाश्वेन किं नु जीवामि माधव ॥ २३ ॥ ‘महाबाहु माधव! आज उसी पृथ्वीको मैं देखती हूँ कि वह दूसरेके शासनमें जाकर हाथी, घोड़े और गाय-बैलोंसे हीन हो गयी है; फिर मैं किसलिये जीवन धारण करूँ? ॥ २३ ॥ इदं कष्टतरं पश्य पुत्रस्यापि वधान्मम । यदिमाः पर्युपासन्ते हतान् शूरान् रणे स्त्रियः ॥ २४ ॥ ‘मेरे लिये पुत्रके वधसे भी अधिक कष्ट देनेवाली बात यह है कि स्त्रियाँ रणभूमिमें मारे गये अपने शूरवीर पतियोंके पास बैठी रो रही हैं। इनकी दयनीय दशा तो देखो ॥ २४ ॥ प्रकीर्णकेशां सुश्रोणीं दुर्योधनशुभाङ्कगाम् । रुक्मवेदिनिभां पश्य कृष्ण लक्ष्मणमातरम् ॥ २५ ॥ श्रीकृष्ण! सुवर्णकी वेदीके समान तेजस्विनी तथा सुन्दर कटि-प्रदेशवाली उस लक्ष्मणकी माताको तो देखो, जो दुर्योधनके शुभ-अंकमें स्थित हो केश खोले रो रही है ॥ २५ ॥ नूनमेषा पुरा बाला जीवमाने महीभुजे । भुजावाश्रित्य रमते सुभुजस्य मनस्विनी ॥ २६ ॥ ‘पहले जब राजा दुर्योधन जीवित था, तब निश्चय ही यह मनस्विनी बाला सुन्दर बाहोंवाले अपने वीर पतिकी दोनों भुजाओंका आश्रय लेकर इसी तरह उसके साथ सानन्द क्रीड़ा करती रही होगी ॥ २६ ॥ कथं नु शतधा नेदं हृदयं मम दीर्यते । पश्यन्त्या निहतं पुत्रं पुत्रेण सहितं रणे ॥ २७ ॥ ‘रणभूमिमें वही मेरा पुत्र अपने पुत्रके साथ ही मार डाला गया है, इसे इस अवस्थामें देखकर मेरे इस हृदयके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते? ॥ २७ ॥ पुत्रं रुधिरसंसिक्तमुपजिघ्रत्यनिन्दिता । दुर्योधनं तु वामोरुः पाणिना परिमार्जती ॥ २८ ॥ ‘सुन्दर जाँघोंवाली मेरी सती साध्वी पुत्रवधू कभी खूनसे भीगे हुए अपने पुत्र लक्ष्मणका मुँह सूँघती है तो कभी पति दुर्योधनका शरीर अपने हाथसे पोंछती है ॥ किं नु शोचति भर्तारं पुत्रं चैषा मनस्विनी । तथा ह्यवस्थिता भाति पुत्रं चाप्यभिवीक्ष्य सा ॥ २९ ॥ स्वशिरः पञ्चशाखाभ्यामभिहत्यायतक्षणा । पतत्युरसि वीरस्य कुरुराजस्य माधव ॥ ३० ॥

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'पता नहीं, यह मनस्विनी बहू पुत्रके लिये शोक करती है या पतिके लिये? कुछ ऐसी ही अवस्थामें वह जान पड़ती है। माधव! वह देखो, वह विशाललोचना वधू पुत्रकी ओर देखकर दोनों हाथोंसे सिर पीटती हुई अपने वीर पति कुरुराजकी छातीपर गिर पड़ी है।। २९-३० ।।

पुण्डरीकनिभा भाति पुण्डरीकान्तरप्रभा ।
मुखं विमृज्य पुत्रस्य भर्तुश्चैव तपस्विनी ।। ३१ ।।
'कमलपुष्पके भीतरी भागकी-सी मनोहर कान्तिवाली मेरी तपस्विनी पुत्रवधू जो प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित हो रही है, कभी अपने पुत्रका मुँह पोंछती है तो कभी अपने पतिका ।। ३१ ।।

यदि सत्यागमाः सन्ति यदि वै श्रुतयस्तथा ।
ध्रुवं लोकानवाप्तोऽयं नृपो बाहुबलार्जितान् ।। ३२ ।।
'श्रीकृष्ण! यदि वेद-शास्त्र सत्य हैं तो मेरा पुत्र यह राजा दुर्योधन निश्चय ही अपने बाहुबलसे प्राप्त हुए पुण्यमय लोकोंमें गया है' ।। ३२ ।।

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि दुर्योधनदर्शने सप्तदशोऽध्यायः ।। १७ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें दुर्योधनका दर्शनविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७ ।।

अध्याय (पृष्ठ 3186)

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अष्टादशोऽध्यायः

अपने अन्य पुत्रों तथा दुःशासनको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप

गान्धार्युवाच

पश्य माधव पुत्रान्मे शतसंख्याञ्जितक्लमान् ।
गदया भीमसेनेन भूयिष्ठं निहतान् रणे ॥ १ ॥
गान्धारी बोलीं—माधव! जो परिश्रमको जीत चुके थे, उन मेरे सौ पुत्रोंको देखो, जिन्हें रणभूमिमें प्रायः भीमसेनेने अपनी गदासे मार डाला है ॥ १ ॥

इदं दुःखतरं मेऽद्य यदिमा मुक्तमूर्धजाः ।
हतपुत्रा रणे बालाः परिधावन्ति मे स्नुषाः ॥ २ ॥
सबसे अधिक दुःख मुझे आज यह देखकर हो रहा है कि ये मेरी बालवधुएँ, जिनके पुत्र भी मारे जा चुके हैं, रणभूमिमें केश खोले चारों ओर अपने स्वजनोंकी खोजमें दौड़ रही हैं ॥ २ ॥

प्रासादतलचारिण्यश्चरणैर्भूषणान्वितैः ।
आपन्ना यत् स्पृशन्तीमां रुधिराद्रां वसुन्धराम् ॥ ३ ॥
ये महलकी अट्टालिकाओंमें आभूषणभूषित चरणोंद्वारा विचरण करनेवाली थीं; परंतु आज विपत्तिकी मारी हुई ये इस खूनसे भीगी हुई वसुधाका स्पर्श कर रही हैं ॥ ३ ॥

कृच्छादुत्सारयन्ति स्म गृध्रगोमायुवायसान् ।
दुःखेनार्ता विघूर्णन्त्यो मत्ता इव चरन्त्युत ॥ ४ ॥
ये दुःखसे आतुर हो पगली स्त्रियोंके समान झूमती हुई सब ओर विचरती हैं तथा बड़ी कठिनाईसे गीधों, गीदड़ों और कौओंको लाशोंके पाससे दूर हटा रही हैं ॥ ४ ॥

एषान्या त्वनवद्याङ्गी करसम्मितमध्यमा ।
घोरमायोधनं दृष्ट्वा निपतत्यतिदुःखिता ॥ ५ ॥
यह पतली कमरवाली सर्वाङ्गसुन्दरी दूसरी वधू युद्धस्थलका भयानक दृश्य देखकर अत्यन्त दुःखी हो पृथ्वीपर गिर पड़ती है ॥ ५ ॥

दृष्ट्वा मे पार्थिवसुतामेतां लक्ष्मणमातरम् ।
राजपुत्रीं महाबाहो मनो न ह्युपशाम्यति ॥ ६ ॥
महाबाहो! यह लक्ष्मणकी माता एक भूमिपालकी बेटी है, इस राजकुमारीकी दशा देखकर मेरा मन किसी तरह शान्त नहीं होता है ॥ ६ ॥

भ्रातॄंश्चान्याः पितॄंश्चान्याः पुत्रांश्च निहतान् भुवि ।

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दृष्ट्वा परिपतन्त्येताः प्रगृह्य सुमहाभुजान् ॥ ७ ॥ कुछ स्त्रियाँ रणभूमिमें मारे गये अपने भाइयोंको, कुछ पिताओंको और कुछ पुत्रोंको देखकर उन महाबाहु वीरोंको पकड़ लेती और वहीं गिर पड़ती हैं ॥ ७ ॥

मध्यमानां तु नारीणां वृद्धानां चापराजित । आक्रन्दं हतबन्धूनां दारुणे वैशसे शृणु ॥ ८ ॥ अपराजित वीर! इस दारुण संग्राममें जिनके बन्धु-बान्धव मारे गये हैं, उन अधेड़ और बूढ़ी स्त्रियोंका यह करुणाजनक क्रन्दन सुनो ॥ ८ ॥

रथनीडानि देहांश्च हतानां गजवाजिनाम् । आश्रित्य श्रममोहार्ताः स्थिताः पश्य महाभुज ॥ ९ ॥ महाबाहो! देखो, ये स्त्रियाँ परिश्रम और मोहसे पीड़ित हो टूटे हुए रथोंकी बैठकों तथा मारे गये हाथी-घोड़ोंकी लाशोंका सहारा लेकर खड़ी हैं ॥ ९ ॥

अन्यां चापहृतं कायाच्चारुकुण्डलमुन्नसम् । स्वस्य बन्धोः शिरः कृष्ण गृहीत्वा पश्य तिष्ठतीम् ॥ १० ॥ श्रीकृष्ण! देखो, वह दूसरी स्त्री किसी आत्मीय जनके मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित और ऊँची नासिकावाले कटे हुए मस्तकको लेकर खड़ी है ॥ १० ॥

पूर्वजातिकृतं पापं मन्ये नाल्पमिवानघ । एताभिर्निरवद्याभिर्मया चैवाल्पमेधया ॥ ११ ॥ यदिदं धर्मराजेन पातितं नो जनार्दन । न हि नाशोऽस्ति वार्ष्णेय कर्मणोः शुभपापयोः ॥ १२ ॥ अनघ! मैं समझती हूँ कि इन अनिन्द्य सुन्दरी अबलाओंने तथा मन्द बुद्धिवाली मैंने भी पूर्वजन्मोंमें कोई बड़ा भारी पाप किया है, जिसके फलस्वरूप धर्मराजने हमलोगोंको बड़ी भारी विपत्तिमें डाल दिया है। जनार्दन! वृष्णिनन्दन! जान पड़ता है कि किये हुए पुण्य और पापकर्मोंका उनके फलका उपभोग किये बिना नाश नहीं होता है ॥ ११-१२ ॥

प्रत्यग्रवयसः पश्य दर्शनीयकुचाननाः । कुलेषु जाता ह्रीमत्यः कृष्णपक्ष्मक्षिमूर्धजाः ॥ १३ ॥ हंसगद्गदभाषिण्यो दुःखशोकप्रमोहिताः । सारस्य इव वाशन्त्यः पतिताः पश्य माधव ॥ १४ ॥ माधव! देखो, इन महिलाओंकी नयी अवस्था है। इनके वक्षःस्थल और मुख दर्शनीय हैं। इनकी आँखोंकी बरौनियाँ और सिरके केश काले हैं। ये सब-की-सब कुलीन और सलज्ज हैं। ये हंसके समान गद्गद स्वरमें बोलती हैं; परंतु आज दुःख और शोकसे मोहित हो चहचहाती सारसियोंके समान रोती-बिलखती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी हैं ॥ १३-१४ ॥

फुल्लपद्मप्रकाशानि पुण्डरीकाक्ष योषिताम् । अनवद्यानि वक्त्राणि तापयत्येष रश्मिवान् ॥ १५ ॥

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कमलनयन! खिले हुए कमलके समान प्रकाशित होनेवाले युवतियोंके इन सुन्दर मुखोंको ये सूर्यदेव संतप्त कर रहे हैं ॥ १५ ॥ ईर्षूणां मम पुत्राणां वासुदेवावरोधनम् । मत्तमातङ्गदर्पाणां पश्यन्त्यद्य पृथग्जनाः ॥ १६ ॥ वासुदेव! मतवाले हाथीके समान घमंडमें चूर रहनेवाले मेरे ईर्ष्यालु पुत्रोंकी इन रानियोंको आज साधारण लोग देख रहे हैं ॥ १६ ॥ शतचन्द्राणि चर्माणि ध्वजांश्चादित्यवर्चसः । रौक्माणि चैव वर्माणि निष्कानपि च काञ्चनान् ॥ १७ ॥ शीर्षत्राणानि चैतानि पुत्राणां मे महीतले । पश्य दीप्तानि गोविन्द पावकान् सुहुतानिव ॥ १८ ॥ गोविन्द! देखो, मेरे पुत्रोंकी ये सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे सुशोभित ढालें, सूर्यके समान तेजस्विनी ध्वजाएँ, सुवर्णमय कवच, सोनेके निष्क तथा शिरस्त्राण घीकी उत्तम आहुति पाकर प्रज्वलित हुई अग्नियोंके समान पृथ्वीपर देदीप्यमान हो रहे हैं ॥ १७-१८ ॥ एष दुःशासनः शेते शूरेणामित्रघातिना । पीतशोणितसर्वाङ्गो युधि भीमेन पातितः ॥ १९ ॥ शत्रुघाती शूरवीर भीमसेनने युद्धमें जिसे मार गिराया तथा जिसके सारे अंगोंका रक्त पी लिया, वही यह दुःशासन यहाँ सो रहा है ॥ १९ ॥ गदया भीमसेनेन पश्य माधव मे सुतम् । द्यूतक्लेशाननुस्मृत्य द्रौपदीनोदितेन च ॥ २० ॥ माधव! देखो, द्यूतक्रीड़ाके समय पाये हुए क्लेशोंको स्मरण करके द्रौपदीसे प्रेरित हुए भीमसेनने मेरे इस पुत्रको गदासे मार डाला है ॥ २० ॥ उक्ता ह्यनेन पाञ्चाली सभायां द्यूतनिर्जिता । प्रियं चिकीर्षता भ्रातुः कर्णस्य च जनार्दन ॥ २१ ॥ सहैव सहदेवेन नकुलेनार्जुनेन च । दासीभूतासि पाञ्चालि क्षिप्रं प्रविश नो गृहान् ॥ २२ ॥ जनार्दन! इसने अपने भाई और कर्णका प्रिय करनेकी इच्छासे सभामें जूएसे जीती गयी द्रौपदीके प्रति कहा था कि 'पांचाली! तू नकुल-सहदेव तथा अर्जुनके साथ ही हमारी दासी हो गयी; अतः शीघ्र ही हमारे घरोंमें प्रवेश कर' ॥ २१-२२ ॥ ततोऽहमब्रुवं कृष्ण तदा दुर्योधनं नृपम् । मृत्युपाशपरिक्षिप्तं शकुनिं पुत्र वर्जय ॥ २३ ॥ निबोधैनं सुदुर्बुद्धिं मातुलं कलहप्रियम् । क्षिप्रमेनं परित्यज्य पुत्र शाम्यस्व पाण्डवैः ॥ २४ ॥ न बुद्ध्यसे त्वं दुर्बुद्धे भीमसेनममर्षणम् ।

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वाङ्नाराचैस्तुदंस्तीक्ष्णैरुल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥ २५ ॥
श्रीकृष्ण! उस समय मैं राजा दुर्योधनसे बोली—‘बेटा! शकुनि मौतके फंदेमें फँसा हुआ है। तुम इसका साथ छोड़ दो। पुत्र! तुम अपने इस खोटी बुद्धिवाले मामाको कलहप्रिय समझो और शीघ्र ही इसका परित्याग करके पाण्डवोंके साथ संधि कर लो। दुर्बुद्धे! तुम नहीं जानते भीमसेन कितने अमर्षशील हैं। तभी जलती लकड़ीसे हाथीको मारनेके समान तुम अपने तीखे वाग्बाणोंसे उन्हें पीड़ा दे रहे हो’ ॥ २३—२५ ॥

तानेवं रहसि क्रुद्धो वाक्शल्यानवधारयन् ।
उत्ससर्ज विषं तेषु सर्पो गोवृषभेष्विव ॥ २६ ॥
इस प्रकार एकान्तमें मैंने उन सबको डाँटा था। श्रीकृष्ण! उन्हीं वाग्बाणोंको याद करके क्रोधी भीमसेनने मेरे पुत्रोंपर उसी प्रकार क्रोधरूपी विष छोड़ा है, जैसे सर्प गाय-बैलोंको डँसकर उनमें अपने विषका संचार कर देता है ॥ २६ ॥

एष दुःशासनः शेते विक्षिप्य विपुलौ भुजौ ।
निहतो भीमसेनेन सिंहेनेव महागन्तः ॥ २७ ॥
सिंहके मारे हुए विशाल हाथीके समान भीमसेनका मारा हुआ यह दुःशासन दोनों विशाल हाथ फैलाये रणभूमिमें पड़ा हुआ है ॥ २७ ॥

अत्यर्थमकरोद् रौद्रं भीमसेनोऽत्यमर्षणः ।
दुःशासनस्य यत् क्रुद्धोऽपिबच्छोणितमाहवे ॥ २८ ॥
अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने युद्धस्थलमें क्रुद्ध होकर जो दुःशासनका रक्त पी लिया, यह बड़ा भयानक कर्म किया है ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीवाक्येऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3190)

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एकोनविंशोऽध्यायः

विकर्ण, दुर्मुख, चित्रसेन, विविंशति तथा दुःसहको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप

गान्धार्युवाच

एष माधव पुत्रो मे विकर्णः प्राज्ञसम्मतः ।
भूमौ विनिहतः शेते भीमेन शतधा कृतः ॥ १ ॥
**गान्धारी बोलीं—**माधव! यह मेरा पुत्र विकर्ण, जो विद्वानोंद्वारा सम्मानित होता था, भूमिपर मरा पड़ा है। भीमसेनने इसके भी सौ-सौ टुकड़े कर डाले हैं ॥ १ ॥

गजमध्ये हतः शेते विकर्णो मधुसूदन ।
नीलमेघपरिक्षिप्तः शरदीव निशाकरः ॥ २ ॥
मधुसूदन! जैसे शरत्कालमें काले मेघोंकी घटासे घिरा हुआ चन्द्रमा शोभा पा रहा हो, उसी प्रकार भीमद्वारा मारा गया विकर्ण हाथियोंकी सेनाके बीचमें सो रहा है ॥ २ ॥

अस्य चापग्रहेणैव पाणिः कृतकिणो महान् ।
कथञ्चिच्छिद्यते गृध्रैरात्तुकामैस्तलत्रवान् ॥ ३ ॥
बराबर धनुष लिये रहनेसे इसकी विशाल हथेलीमें घट्टा पड़ गया है। इसके हाथमें इस समय भी दस्ताना बँधा हुआ है; इसलिये इसे खानेकी इच्छावाले गीध बड़ी कठिनाईसे किसी-किसी तरह काट पाते हैं ॥ ३ ॥

अस्य भार्याऽऽमिषप्रेप्सून् गृध्रकाकांस्तपस्विनी ।
वारयत्यनिशं बाला न च शक्नोति माधव ॥ ४ ॥
माधव! उसकी तपस्विनी पत्नी जो अभी बालिका है, मांसलोलुप गीधों और कौओंको हटानेकी निरन्तर चेष्टा करती है; परंतु सफल नहीं हो पाती है ॥ ४ ॥

युवा वृन्दारकः शूरो विकर्णः पुरुषर्षभ ।
सुखोषितः सुखार्हश्च शेते पांसुषु माधव ॥ ५ ॥
पुरुषप्रवर माधव! विकर्ण नवयुवक, देवताके समान कान्तिमान्, शूरवीर, सुखमें पला हुआ तथा सुख भोगनेके ही योग्य था; परंतु आज धूलमें लोट रहा है ॥ ५ ॥

कर्णिनालीकनाराचैर्भिन्नमर्माणमाहवे ।
अद्यापि न जहात्येनं लक्ष्मीर्भरतसत्तमम् ॥ ६ ॥
युद्धमें कर्णी, नालीक और नाराचोंके प्रहारसे इसके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये हैं तो भी इस भरत-भूषण वीरको अभीतक लक्ष्मी (अंगकान्ति) छोड़ नहीं रही है ॥ ६ ॥

एष संग्रामशूरेण प्रतिज्ञां पालयिष्यता ।

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दुर्मुखोऽभिमुखः शेते हतोऽरिगणहा रणे ॥ ७ ॥ जो शत्रुसमूहोंका संहार करनेवाला था, वह दुर्मुख प्रतिज्ञा पालन करनेवाले संग्राम-शूर भीमसेनके हाथों मारा जाकर समरमें सम्मुख सो रहा है ॥ ७ ॥

तस्यैतद् वदनं कृष्ण श्वापदैरर्धभक्षितम् । विभात्यभ्यधिकं तात सप्तम्यामिव चन्द्रमाः ॥ ८ ॥ तात श्रीकृष्ण! इसका यह मुख हिंसक जन्तुओंकेद्वारा आधा खा लिया गया है, इसलिये सप्तमीके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हो रहा है ॥ ८ ॥

शूरस्य हि रणे कृष्ण पश्याननमथेदृशम् । स कथं निहतोऽमित्रैः पांसून् ग्रसति मे सुतः ॥ ९ ॥ श्रीकृष्ण! देखो, मेरे इस रणशूर पुत्रका मुख कैसा तेजस्वी है? पता नहीं, मेरा यह वीर पुत्र किस तरह शत्रुओंके हाथसे मारा जाकर धूल फाँक रहा है? ॥ ९ ॥

यस्याहवमुखे सौम्य स्थाता नैवोपपद्यते । स कथं दुर्मुखोऽमित्रैर्हतो विबुधलोकजित् ॥ १० ॥ सौम्य! युद्धके मुहानेपर जिसके सामने कोई ठहर नहीं पाता था, उस देवलोकविजयी दुर्मुखको शत्रुओंने कैसे मार डाला? ॥ १० ॥

चित्रसेनं हतं भूमौ शयानं मधुसूदन । धार्तराष्ट्रमिमं पश्य प्रतिमानं धनुष्मताम् ॥ ११ ॥ मधुसूदन! देखो, जो धनुर्धरोंका आदर्श था, वही यह धृतराष्ट्रका पुत्र चित्रसेन मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा हुआ है ॥ ११ ॥

तं चित्रमाल्याभरणं युवत्यः शोककर्शिताः । क्रव्यादांसंघैः सहिता रुदत्यः पर्युपासते ॥ १२ ॥ विचित्र माला और आभूषण धारण करनेवाले उस चित्रसेनको घेरकर शोकसे कातर हो रोती हुई युवतियाँ हिंसक जन्तुओंके साथ उसके पास बैठी हैं ॥ १२ ॥

स्त्रीणां रुदितनिर्घोषः श्वापदानां च गर्जितम् । चित्ररूपमिदं कृष्ण विचित्रं प्रतिभाति मे ॥ १३ ॥ श्रीकृष्ण! एक ओर स्त्रियोंके रोनेकी आवाज है तो दूसरी ओर हिंसक जन्तुओंकी गर्जना हो रही है। यह अद्भुत दृश्य मुझे विचित्र प्रतीत होता है ॥ १३ ॥

युवा वृन्दारको नित्यं प्रवरस्त्रीनिषेवितः । विविंशतिरसौ शेते ध्वस्तः पांसुषु माधव ॥ १४ ॥ माधव! देखो, वह देवतुल्य नवयुवक विविंशति, जिसकी सुन्दरी स्त्रियाँ सदा सेवा किया करती थीं, आज विध्वस्त होकर धूलमें पड़ा है ॥ १४ ॥

शरसंकृत्तवर्माणं वीरं विशसने हतम् । परिवार्यासिते गृध्राः पश्य कृष्ण विविंशतिम् ॥ १५ ॥

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श्रीकृष्ण! देखो, बाणोंसे इसका कवच छिन्न-भिन्न हो गया है। युद्धमें मारे गये इस वीर विविंशतिको गीध चारों ओरसे घेरकर बैठे हैं ॥ १५ ॥

प्रविश्य समरे शूरः पाण्डवानामनीकिनीम् ।
स वीरशयने शेते परः सत्पुरुषोचिते ॥ १६ ॥
जो शूरवीर समरांगणमें पाण्डवोंकी सेनाके भीतर घुसकर लोहा लेता था, वही आज सत्पुरुषोचित वीरशय्यापर शयन कर रहा है ॥ १६ ॥

स्मितोपपन्नं सुनसं सुभ्रु ताराधिपोपमम् ।
अतीव शुभ्रं वदनं कृष्ण पश्य विविंशतेः ॥ १७ ॥
श्रीकृष्ण! देखो, विविंशतिका मुख अत्यन्त उज्ज्वल है, इसके अधरोंपर मुसकराहट खेल रही है, नासिका मनोहर और भौंहें सुन्दर हैं। यह मुख चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा है ॥ १७ ॥

एनं हि पर्युपासन्ते बहुधा वरयोषितः ।
क्रीडन्तमिव गन्धर्वं देवकन्याः सहस्रशः ॥ १८ ॥
जैसे क्रीडा करते हुए गन्धर्वके साथ सहस्रों देवकन्याएँ होती हैं, उसी प्रकार इस विविंशतिकी सेवामें बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ रहा करती थीं ॥ १८ ॥

हन्तारं परसैन्यानां शूरं समितिशोभनम् ।
निबर्हणममित्राणां दुःसहं विषहेत कः ॥ १९ ॥
शत्रुकी सेनाओंका संहार करनेमें समर्थ तथा युद्धमें शोभा पानेवाले शूरवीर शत्रुसूदन दुःसहका वेग कौन सह सकता था? ॥ १९ ॥

दुःसहस्यैतदाभाति शरीरं संवृतं शरैः ।
गिरिरात्मगतैः फुल्लैः कर्णिकारैरिवाचितः ॥ २० ॥
उसी दुःसहका यह शरीर बाणोंसे खचाखच भरा हुआ है, जो अपने ऊपर खिले हुए कनेरके फूलोंसे व्याप्त पर्वतके समान सुशोभित होता है ॥ २० ॥

शातकौम्या स्रजा भाति कवचेन च भास्वता ।
अग्निनेव गिरिः श्वेतो गतासुरपि दुःसहः ॥ २१ ॥
यद्यपि दुःसहके प्राण चले गये हैं तो भी वह सोनेकी माला और तेजस्वी कवचसे सुशोभित हो अग्नियुक्त श्वेत पर्वतके समान जान पड़ता है ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीवाक्ये एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥

गान्धारीद्वारा श्रीकृष्णके प्रति उत्तरा और विराटकुलकी स्त्रियोंके शोक एवं विलापका वर्णन

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विंशोऽध्यायः

गान्धारीद्वारा श्रीकृष्णके प्रति उत्तरा और विराटकुलकी स्त्रियोंके शोक एवं विलापका वर्णन

गान्धार्युवाच

अध्यर्धगुणमाहुर्यं बले शौर्ये च केशव ।
पित्रा त्वया च दाशार्ह दृप्तं सिंहमिवोत्कटम् ॥ १ ॥
यो बिभेद चमूमेको मम पुत्रस्य दुर्भिदाम् ।
स भूत्वा मृत्युरन्येषां स्वयं मृत्युवशं गतः ॥ २ ॥
**गान्धारी बोलीं—**दशार्हनन्दन केशव! जिसे बल और शौर्यमें अपने पितासे तथा तुमसे भी डेढ़ गुना बताया जाता था, जो प्रचण्ड सिंहके समान अभिमानमें भरा रहता था, जिसने अकेले ही मेरे पुत्रके दुर्भेद्य व्यूहको तोड़ डाला था, वही अभिमन्यु दूसरोंकी मृत्यु बनकर स्वयं भी मृत्युके अधीन हो गया ॥ १-२ ॥

तस्योपलक्षये कृष्ण कार्ष्णेरमिततेजसः ।
अभिमन्योर्हतस्यापि प्रभा नैवोपशाम्यति ॥ ३ ॥
श्रीकृष्ण! मैं देख रही हूँ कि मारे जानेपर भी अमिततेजस्वी अर्जुनपुत्र अभिमन्युकी कान्ति अभी बुझ नहीं पा रही है ॥ ३ ॥

एषा विराटदुहिता स्नुषा गाण्डीवधन्वनः ।
आर्ता बालं पतिं वीरं दृष्ट्वा शोचत्यनिन्दिता ॥ ४ ॥
यह राजा विराटकी पुत्री और गाण्डीवधारी अर्जुनकी पुत्रवधू सती-साध्वी उत्तरा अपने बालक पति वीर अभिमन्युको मरा देख आर्त होकर शोक प्रकट कर रही है ॥ ४ ॥

तमेषा हि समागम्य भार्या भर्तारमन्तिके ।
विराटदुहिता कृष्ण पाणिना परिमार्जति ॥ ५ ॥
श्रीकृष्ण! यह विराटकी पुत्री और अभिमन्युकी पत्नी उत्तरा अपने पतिके निकट जा उसके शरीरपर हाथ फेर रही है ॥ ५ ॥

तस्य वक्त्रमुपाघ्राय सौभद्रस्य मनस्विनी ।
विबुद्धकमलाकारं कम्बुवृत्तशिरोधरम् ॥ ६ ॥
काम्यरूपवती चैषा परिष्वजति भामिनी ।
लज्जमाना पुरा चैनं माध्वीकमदमूर्च्छिता ॥ ७ ॥
सुभद्राकुमारका मुख प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पाता है। उसकी ग्रीवा शंखके समान और गोल है। कमनीय रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित माननीय एवं मनस्विनी उत्तरा पतिके

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मुखारविन्दको सूँघकर उसे गलेसे लगा रही है। पहले भी यह इसी प्रकार मधुके मदसे अचेत हो सलज्जभावसे उसका आलिंगन करती रही होगी ॥ ६-७ ॥

तस्य क्षतजसंदिग्धं जातरूपपरिष्कृतम् ।
विमुच्य कवचं कृष्ण शरीरमभिवीक्षते ॥ ८ ॥
श्रीकृष्ण! अभिमन्युका सुवर्णभूषित कवच खूनसे रँग गया है। बालिका उत्तरा उस कवचको खोलकर पतिके शरीरको देख रही है ॥ ८ ॥

अवेक्षमाणा तं बाला कृष्ण त्वामभिभाषते ।
अयं ते पुण्डरीकाक्ष सदृशाक्षो निपातितः ॥ ९ ॥
उसे देखती हुई वह बाला तुमसे पुकारकर कहती है, 'कमलनयन! आपके भानजेके नेत्र भी आपके ही समान थे। ये रणभूमिमें मार गिराये गये हैं ॥ ९ ॥

बले वीर्ये च सदृशस्तेजसा चैव तेऽनघ ।
रूपेण च तथात्यर्थं शेते भुवि निपातितः ॥ १० ॥
'अनघ! जो बल, वीर्य, तेज और रूपमें सर्वथा आपके समान थे, वे ही सुभद्राकुमार शत्रुओंद्वारा मारे जाकर पृथ्वीपर सो रहे हैं' ॥ १० ॥

अत्यन्तं सुकुमारस्य राङ्कवाजिनशायिनः ।
कच्चिदद्य शरीरं ते भूमौ न परितप्यते ॥ ११ ॥
(श्रीकृष्ण! अब उत्तरा अपने पतिको सम्बोधित करके कहती है) 'प्रियतम! आपका शरीर तो अत्यन्त सुकुमार है। आप रंकुमृगके चर्मसे बने हुए सुकोमल बिछौनेपर सोया करते थे। क्या आज इस तरह पृथ्वीपर पड़े रहनेसे आपके शरीरको कष्ट नहीं होता है? ॥ ११ ॥

मातङ्गभुजवर्ष्माणौ ज्याक्षेपकठिनत्वचौ ।
काञ्चनाङ्गदिनौ शेते निक्षिप्य विपुलौ भुजौ ॥ १२ ॥
'जो हाथीकी सूँड़के समान बड़ी हैं, निरन्तर प्रत्यंचा खींचनेके कारण रगड़से जिनकी त्वचा कठोर हो गयी है तथा जो सोनेके बाजूबन्द धारण करते हैं, उन विशाल भुजाओंको फैलाकर आप सो रहे हैं ॥ १२ ॥

व्यायम्य बहुधा नूनं सुखसुप्तः श्रमादिव ।
एवं विलपतीमार्ता न हि मामभिभाषसे ॥ १३ ॥
'निश्चय ही बहुत परिश्रम करके मानो थक जानेके कारण आप सुखकी नींद ले रहे हो। मैं इस तरह आर्त होकर विलाप करती हूँ, किंतु आप मुझसे बोलतेतक नहीं हैं ॥ १३ ॥

न स्मराम्यपराधं ते किं मां न प्रतिभाषसे ।
ननु मां त्वं पुरा दूरादभिवीक्ष्याभिभाषसे ॥ १४ ॥
'मैंने कोई अपराध किया हो, ऐसा तो मुझे स्मरण नहीं है, फिर क्या कारण है कि आप मुझसे नहीं बोलते हैं। पहले तो आप मुझे दूरसे भी देख लेनेपर बोले बिना नहीं रहते

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थे ॥ १४ ॥ आर्यामार्य सुभद्रां त्वमिमांश्च त्रिदशोपमान् । पितॄन् मां चैव दुःखार्तां विहाय क्व गमिष्यसि ॥ १५ ॥ ‘आर्य! आप माता सुभद्राको, इन देवताओंके समान ताऊ, पिता और चाचाओंको तथा मुझ दुःखातुरा पत्नीको छोड़कर कहाँ जायँगे?’ ॥ १५ ॥ तस्य शोणितदिग्धान् वै केशानुद्धम्य पाणिना । उत्सङ्गे वक्त्रमाधाय जीवन्तमिव पृच्छति ॥ १६ ॥ जनार्दन! देखो, अभिमन्युके सिरको गोदीमें रखकर उत्तरा उसके खूनसे सने हुए केशोंको हाथसे उठा-उठाकर सुलझाती है और मानो वह जी रहा हो, इस प्रकार उससे पूछती है ॥ १६ ॥ स्वस्त्रीयं वासुदेवस्य पुत्रं गाण्डीवधन्वनः । कथं त्वां रणमध्यस्थं जघ्नुरेते महारथाः ॥ १७ ॥ ‘प्राणनाथ! आप वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके भानजे और गाण्डीवधारी अर्जुनके पुत्र थे। रणभूमिके मध्यभागमें खड़े हुए आपको इन महारथियोंने कैसे मार डाला? ॥ १७ ॥ धिगस्तु क्रूरकर्तॄंस्तान् कृपकर्णजयद्रथान् । द्रोणद्रौणायनी चोभौ यैरहं विधवा कृता ॥ १८ ॥ ‘उन क्रूरकर्मा कृपाचार्य, कर्ण और जयद्रथको धिक्कार है, द्रोणाचार्य और उनके पुत्रको भी धिक्कार है! जिन्होंने मुझे इसी उम्रमें विधवा बना दिया ॥ १८ ॥ रथर्षभाणां सर्वेषां कथमासीत् तदा मनः । बालं त्वां परिवार्यैकं मम दुःखाय जघ्नुषाम् ॥ १९ ॥ ‘आप बालक थे और अकेले युद्ध कर रहे थे तो भी मुझे दुःख देनेके लिये जिन लोगोंने मिलकर आपको मारा था, उन समस्त श्रेष्ठ महारथियोंके मनकी उस समय क्या दशा हुई थी? ॥ १९ ॥ कथं नु पाण्डवानां च पञ्चालानां तु पश्यताम् । त्वं वीर निधनं प्राप्तो नाथवान् सन्ननाथवत् ॥ २० ॥ ‘वीर! आप पाण्डवों और पांचालोंके देखते-देखते सनाथ होते हुए भी अनाथकी भाँति कैसे मारे गये? ॥ दृष्ट्वा बहुभिराक्रन्दे निहतं त्वां पिता तव । वीरः पुरुषशार्दूलः कथं जीवति पाण्डवः ॥ २१ ॥ ‘आपको युद्धस्थलमें बहुत-से महारथियोंद्वारा मारा गया देख आपके पिता पुरुषसिंह वीर पाण्डव अर्जुन कैसे जी रहे हैं? ॥ २१ ॥ न राज्यलाभो विपुलः शत्रूणां च पराभवः । प्रीतिं धास्यति पार्थानां त्वामृते पुष्करेक्षण ॥ २२ ॥

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‘कमलनयन! प्राणेश्वर! पाण्डवोंको जो यह विशाल राज्य मिल गया है, उन्होंने शत्रुओंको जो पराजित कर दिया है, यह सब कुछ आपके बिना उन्हें प्रसन्न नहीं कर सकेगा ॥ २२ ॥
तव शस्त्रजिताँल्लोकान् धर्मेण च दमेन च ।
क्षिप्रमन्वागमिष्यामि तत्र मां प्रतिपालय ॥ २३ ॥
‘आर्यपुत्र! आपके शस्त्रोंद्वारा जीते हुए पुण्यलोकोंमें मैं भी धर्म और इन्द्रिय-संयमके बलसे शीघ्र ही आऊँगी। आप वहाँ मेरी राह देखिये ॥ २३ ॥
दुर्मरं पुनरप्राप्ते काले भवति केनचित् ।
यदहं त्वां रणे दृष्ट्वा हतं जीवामि दुर्भगा ॥ २४ ॥
‘जान पड़ता है कि मृत्युकाल आये बिना किसीका भी मरना अत्यन्त कठिन है, तभी तो मैं अभागिनी आपको युद्धमें मारा गया देखकर भी अबतक जी रही हूँ ॥ २४ ॥
कामिदानीं नरव्याघ्र श्लक्ष्णया स्मितया गिरा ।
पितृलोके समेत्यान्यां मामिवामन्त्रयिष्यसि ॥ २५ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आप पितृलोकमें जाकर इस समय मेरी ही तरह दूसरी किस स्त्रीको मन्द मुसकानके साथ मीठी वाणीद्वारा बुलायेंगे? ॥ २५ ॥
नूनमप्सरसां स्वर्गे मनांसि प्रमथिष्यसि ।
परमेण च रूपेण गिरा च स्मितपूर्वया ॥ २६ ॥
‘निश्चय ही स्वर्गमें जाकर आप अपने सुन्दर रूप और मन्द मुसकानयुक्त मधुर वाणीके द्वारा वहाँकी अप्सराओंके मनको मथ डालेंगे ॥ २६ ॥
प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकानप्सरोभिः समेयिवान् ।
सौभद्र विहरन् काले स्मरेथाः सुकृतानि मे ॥ २७ ॥
‘सुभद्रानन्दन! आप पुण्यात्माओंके लोकोंमें जाकर अप्सराओंके साथ मिलकर विहार करते समय मेरे शुभ कर्मोंका भी स्मरण कीजियेगा ॥ २७ ॥
एतावानिह संवासो विहितस्ते मया सह ।
षण्मासान् सप्तमे मासि त्वं वीर निधनं गतः ॥ २८ ॥
‘वीर! इस लोकमें तो मेरे साथ आपका कुल छः महीनोंतक ही सहवास रहा है। सातवें महीनेमें ही आप वीरगतिको प्राप्त हो गये' ॥ २८ ॥
इत्युक्तवचनामेतामपकर्षन्ति दुःखिताम् ।
उत्तरां मोघसंकल्पां मत्स्यराजकुलस्त्रियः ॥ २९ ॥
इस तरहकी बातें कहकर दुःखमें डूबी हुई इस उत्तराको जिसका सारा संकल्प मिट्टीमें मिल गया है, मत्स्यराज विराटके कुलकी स्त्रियाँ खींचकर दूर ले जा रही हैं ॥ २९ ॥
उत्तरामपकृष्यैनामार्तामार्ततराः स्वयम् ।
विराटं निहतं दृष्ट्वा क्रोशन्ति विलपन्ति च ॥ ३० ॥

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शोकसे आतुर हुई उत्तराको खींचकर अत्यन्त आर्त हुई वे स्त्रियाँ राजा विराटको मारा गया देख स्वयं भी चीखने और विलाप करने लगी हैं ॥ ३० ॥
द्रोणास्त्रशरसंकृत्तं शयानं रुधिरोक्षितम् ।
विराटं वितुदन्त्येते गृध्रगोमायुवायसाः ॥ ३१ ॥
द्रोणाचार्यके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो खूनसे लथपथ होकर रणभूमिमें पड़े हुए राजा विराटको ये गीध, गीदड़ और कौए नोच रहे हैं ॥ ३१ ॥
वितुद्यमानं विहगैर्विराटमसितेक्षणाः ।
न शक्नुवन्ति विहगान् निवारयितुमातुराः ॥ ३२ ॥
विराटको उन विहंगमोंद्वारा नोचे जाते देख कजरारी आँखोंवाली उनकी रानियाँ आतुर हो-होकर उन्हें हटानेकी चेष्टा करती हैं, पर हटा नहीं पाती हैं ॥
आसामातपतप्तानामायासेन च योषिताम् ।
श्रमेण च विवर्णानां वक्त्राणां विप्लुतं वपुः ॥ ३३ ॥
इन युवतियोंके मुखारविन्द धूपसे तप गये हैं, आयास और परिश्रमसे उनके रंग फीके पड़ गये हैं ॥ ३३ ॥
उत्तरं चाभिमन्युं च काम्बोजं च सुदक्षिणम् ।
शिशूनेतान् हतान् पश्य लक्ष्मणं च सुदर्शनम् ॥ ३४ ॥
आयोधनशिरोमध्ये शयानं पश्य माधव ॥ ३५ ॥
माधव! उत्तर, अभिमन्यु, काम्बोजनिवासी सुदक्षिण और सुन्दर दिखायी देनेवाले लक्ष्मण—ये सभी बालक थे। इन मारे गये बालकोंको देखो। युद्धके मुहानेपर सोये हुए परम सुन्दर कुमार लक्ष्मणपर भी दृष्टिपात करो ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीवाक्ये विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥

गान्धारीके द्वारा कर्णको देखकर उसके शौर्य तथा उसकी स्त्रीके विलापका श्रीकृष्णके सम्मुख वर्णन

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एकविंशोऽध्यायः

गान्धारीके द्वारा कर्णको देखकर उसके शौर्य तथा उसकी स्त्रीके विलापका श्रीकृष्णके सम्मुख वर्णन

गान्धार्युवाच

एष वैकर्तनः शेते महेष्वासो महारथः ।
ज्वलितानलवत् संख्ये संशान्तः पार्थतेजसा ॥ १ ॥
गान्धारी बोलीं— श्रीकृष्ण! देखो, यह महाधनुर्धर महारथी वैकर्तन कर्ण कुन्तीकुमार अर्जुनके तेजसे बुझी हुई प्रज्वलित आगके समान युद्धस्थलमें शान्त होकर सो रहा है ॥ १ ॥

पश्य वैकर्तनं कर्णं निहत्यातिरथान् बहून् ।
शोणितौघपरीताङ्गं शयानं पतितं भुवि ॥ २ ॥
माधव! देखो, वैकर्तन कर्ण बहुत-से अतिरथी वीरोंका संहार करके स्वयं भी खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर सोया पड़ा है ॥ २ ॥

अमर्षी दीर्घरोषश्च महेष्वासो महाबलः ।
रणे विनिहतः शेते शूरो गाण्डीवधन्वना ॥ ३ ॥
शूरवीर कर्ण महान् बलवान् और महाधनुर्धर था। यह दीर्घकालतक रोषमें भरा रहनेवाला और अमर्षशील था, परंतु गाण्डीवधारी अर्जुनके हाथसे मारा जाकर यह वीर रणभूमिमें सो गया है ॥ ३ ॥

यं स्म पाण्डवसंत्रासान्मम पुत्रा महारथाः ।
प्रायुध्यन्त पुरस्कृत्य मातङ्गा इव यूथपम् ॥ ४ ॥
शार्दूलमिव सिंहेन समरे सव्यसाचिना ।
मातङ्गमिव मत्तेन मातङ्गेन निपातितम् ॥ ५ ॥
पाण्डुपुत्र अर्जुनके डरसे मेरे महारथी पुत्र जिसे आगे करके यूथपतिको आगे रखकर लड़नेवाले हाथियोंके समान पाण्डव-सेनाके साथ युद्ध करते थे, उसी वीरको सव्यसाची अर्जुनने समरांगणमें उसी तरह मार डाला है, जैसे एक सिंहने दूसरे सिंहको तथा एक मतवाले हाथीने दूसरे मदोन्मत्त गजराजको मार गिराया हो ॥ ४-५ ॥

समेताः पुरुषव्याघ्र निहतं शूरमाहवे ।
प्रकीर्णमूर्धजाः पत्न्यो रुदत्यः पर्युपासते ॥ ६ ॥
पुरुषसिंह! रणभूमिमें मारे गये इस शूरवीरके पास आकर इसकी पत्नियाँ सिरके बाल बिखेरे बैठी हुई रो रही हैं ॥ ६ ॥

उद्विग्नः सततं यस्माद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

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त्रयोदश समा निद्रां चिन्तयन् नाध्यगच्छत ॥ ७ ॥
अनाधृष्यः परैर्युद्धे शत्रुभिर्मघवानिव ।
युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान् हिमवानिव निश्चलः ॥ ८ ॥
स भूत्वा शरणं वीरो धार्तराष्ट्रस्य माधव ।
भूमौ विनिहतः शेते वातभग्न इव द्रुमः ॥ ९ ॥
माधव! जिससे निरन्तर उद्विग्न रहनेके कारण धर्मराज युधिष्ठिरको चिन्ताके मारे तेरह वर्षोंतक नींद नहीं आयी, जो युद्धस्थलमें इन्द्रके समान शत्रुओंके लिये अजेय था, प्रलयंकर अग्निके समान तेजस्वी और हिमालयके समान निश्चल था, वही वीर कर्ण धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके लिये शरणदाता हो मारा जाकर आँधीसे टूटकर पड़े हुए वृक्षके समान धराशायी हो गया है ॥ ७—९ ॥

पश्य कर्णस्य पत्नीं त्वं वृषसेनस्य मातरम् ।
लालप्यमानां करुणं रुदतीं पतितां भुवि ॥ १० ॥
देखो, कर्णकी पत्नी एवं वृषसेनकी माता पृथ्वीपर गिरकर रोती हुई कैसा करुणाजनक विलाप कर रही है? ॥ १० ॥

आचार्यशापोऽनुगतो ध्रुवं त्वां
यदग्रसच्चक्रमिदं धरित्री ।
ततः शरेणापहृतं शिरस्ते
धनंजयेनाहवशोभिना युधि ॥ ११ ॥
'प्राणनाथ! निश्चय ही तुमपर आचार्यका दिया हुआ शाप लागू हो गया, जिससे इस पृथ्वीने तुम्हारे रथके पहियेको ग्रस लिया, तभी युद्धमें शोभा पानेवाले अर्जुनने रणभूमिमें अपने बाणसे तुम्हारा सिर काट लिया' ॥

हाहा धिगेषा पतिता विसंज्ञा
समीक्ष्य जाम्बूनदबद्धकक्षम् ।
कर्णं महाबाहुमदीनसत्त्वं
सुषेणमाता रुदती भृशार्ता ॥ १२ ॥
हाय! हाय! मुझे धिक्कार है। सुवर्ण-कवचधारी उदार हृदय महाबाहु कर्णको इस अवस्थामें देखकर अत्यन्त आतुर हो रोती हुई सुषेणकी माता मूर्च्छित होकर गिर पड़ी ॥ १२ ॥

अल्पावशेषोऽपि कृतो महात्मा
शरीरभक्षैः परिभक्षयद्भिः ।
द्रष्टुं न नः प्रीतिकरः शशीव
कृष्णस्य पक्षस्य चतुर्दशाहे ॥ १३ ॥

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मानव-शरीरका भक्षण करनेवाले जन्तुओंने खा-खाकर महामना कर्णके शरीरको थोड़ा-सा ही शेष रहने दिया है। उसका यह अल्पावशेष शरीर कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके चन्द्रमाकी भाँति देखनेपर हमलोगोंको प्रसन्नता नहीं प्रदान करता है ॥ १३ ॥

सा वर्तमाना पतिता पृथिव्या-
मुत्थाय दीना पुनरेव चैषा ।
कर्णस्य वक्त्रं परिजिघ्रमाणा
रूरूयते पुत्रवधाभितप्ता ॥ १४ ॥

वह बेचारी कर्णकी पत्नी पृथ्वीपर गिरकर उठी और उठकर पुनः गिर पड़ी। कर्णका मुख सूँघती हुई यह नारी अपने पुत्रके वधसे संतप्त हो फूट-फूटकर रो रही है ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि कर्णदर्शनो नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें कर्णका दर्शनविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3201)

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द्वाविंशोऽध्यायः

अपनी-अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए अवन्ती-नरेश और जयद्रथको देखकर तथा दुःशलापर दृष्टिपात करके गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप

गान्धार्युवाच

आवन्त्यं भीमसेनेन भक्षयन्ति निपातितम् ।
गृध्रगोमायवः शूरं बहुबन्धुमबन्धुवत् ॥ १ ॥
**गान्धारी बोलीं—**भीमसेनने जिसे मार गिराया था, वह शूरवीर अवन्तीनरेश बहुतेरे बन्धु-बान्धवोंसे सम्पन्न था; परंतु आज उसे बन्धुहीनकी भाँति गीध और गीदड़ नोच-नोचकर खा रहे हैं ॥ १ ॥

तं पश्य कदनं कृत्वा शूराणां मधुसूदन ।
शयानं वीरशयने रुधिरेण समुक्षितम् ॥ २ ॥
मधुसूदन! देखो, अनेकों शूरवीरोंका संहार करके वह खूनसे लथपथ हो वीरशय्यापर सो रहा है ॥ २ ॥

तं शृगालाश्च कङ्काश्च क्रव्यादाश्च पृथग्विधाः ।
तेन तेन विकर्षन्ति पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ ३ ॥
उसे सियार, कंक और नाना प्रकारके मांसभक्षी जीव-जन्तु इधर-उधर खींच रहे हैं। यह समयका उलट-फेर तो देखो ॥ ३ ॥

शयानं वीरशयने शूरमाक्रन्दकारिणम् ।
आवन्त्यमभितो नार्यो रुदत्यः पर्युपासते ॥ ४ ॥
भयानक मारकाट मचानेवाले इस शूरवीर अवन्तीनरेशको वीरशय्यापर सोया हुआ देख उसकी स्त्रियाँ रोती हुई उसे सब ओरसे घेरकर बैठी हैं ॥ ४ ॥

प्रातिपेयं महेष्वासं हतं भल्लेन बाह्लिकम् ।
प्रसुप्तमिव शार्दूलं पश्य कृष्ण मनस्विनम् ॥ ५ ॥
श्रीकृष्ण! देखो, महाधनुर्धर प्रतीपनन्दन मनस्वी बाह्लिक भल्लसे मारे जाकर सोये हुए सिंहके समान पड़े हैं ॥ ५ ॥

अतीव मुखवर्णोऽस्य निहतस्यापि शोभते ।
सोमस्येवाभिपूर्णस्य पौर्णमास्यां समुद्यतः ॥ ६ ॥
रणभूमिमें मारे जानेपर भी पूर्णमासीको उगते हुए पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति इनके मुखकी कान्ति अत्यन्त प्रकाशित हो रही है ॥ ६ ॥

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पुत्रशोकाभितप्तेन प्रतिज्ञां चाभिरक्षता । पाकशासनिना संख्ये वार्धक्षत्रिनिर्पातितः ॥ ७ ॥ एकादश चमूर्भित्त्वा रक्ष्यमाणं महात्मना । सत्यं चिकीर्षता पश्य हतमेनं जयद्रथम् ॥ ८ ॥ श्रीकृष्ण! पुत्रशोकसे संतप्त हो अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन करते हुए इन्द्रकुमार अर्जुनने युद्धस्थलमें वृद्धक्षत्रके पुत्र जयद्रथको मार गिराया है। यद्यपि उसकी रक्षाकी पूरी व्यवस्था की गयी थी, तब भी अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाने की इच्छावाले महात्मा अर्जुनने ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंका भेदन करके जिसे मार डाला था, वही यह जयद्रथ यहाँ पड़ा है। इसे देखो ॥

सिन्धुसौवीरभर्तारं दर्पपूर्णं मनस्विनम् । भक्षयन्ति शिवा गृध्रा जनार्दन जयद्रथम् ॥ ९ ॥ जनार्दन! सिन्धु और सौवीर देशके स्वामी अभिमानी और मनस्वी जयद्रथको गीध और सियार नोच-नोचकर खा रहे हैं ॥ ९ ॥

संरक्ष्यमाणं भार्याभिरनुरक्ताभिरच्युत । भीषयन्त्यो विकर्षन्ति गहनं निम्नमन्तिकात् ॥ १० ॥ अच्युत! इसमें अनुराग रखनेवाली इसकी पत्नियाँ यद्यपि रक्षामें लगी हुई हैं, तथापि गीदड़ियाँ उन्हें डरवाकर जयद्रथकी लाशको उनके निकटसे गहरे गड्ढेकी ओर खींचे लिये जा रही हैं ॥ १० ॥

तमेताः पर्युपासन्ते रक्ष्यमाणं महाभुजम् । सिन्धुसौवीरभर्तारं काम्बोजयवनस्त्रियः ॥ ११ ॥ ये काम्बोज और यवनदेशकी स्त्रियाँ सिन्धु और सौवीरदेशके स्वामी महाबाहु जयद्रथको चारों ओरसे घेरकर बैठी हैं और वह उन्हींके द्वारा सुरक्षित हो रहा है ॥ ११ ॥

यदा कृष्णामुपादाय प्राद्रवत् केकयैः सह । तदैव वध्यः पाण्डूनां जनार्दन जयद्रथः ॥ १२ ॥ दुःशलां मानयद्भिस्तु तदा मुक्तो जयद्रथः । कथमद्य न तां कृष्ण मानयन्ति स्म ते पुनः ॥ १३ ॥ जनार्दन! जिस दिन जयद्रथ द्रौपदीको हरकर केकयोंके साथ भागा था, उसी दिन यह पाण्डवोंके द्वारा वध्य हो गया था; परंतु उस समय दुःशलाका सम्मान करते हुए उन्होंने जयद्रथको जीवित छोड़ दिया था! श्रीकृष्ण! उन्हीं पाण्डवोंने आज फिर क्यों नहीं उसका सम्मान किया? ॥ १२-१३ ॥

सैषा मम सुता बाला विलपन्ती च दुःखिता । आत्मना हन्ति चात्मानमाक्रोशन्ती च पाण्डवान् ॥ १४ ॥