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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
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रथोंसे विभूषित हुई वे दोनों प्रधान एवं सुन्दर सेनाएँ हेमन्तके अन्त (शिशिर)-में उठे हुए वायुयुक्त दो महामेघोंके समान प्रकाशित हो रही थीं ॥ ७ ॥ समेत्य तु महासेने चक्रतुर्वेगमुत्तमम् । जाह्नवीयमुने नद्यौ प्रावृषीवोल्बणोदके ॥ ८ ॥ वे दोनों विशाल सेनाएँ परस्पर भिड़कर विजयके लिये बड़े वेगसे आगे बढ़नेका प्रयत्न करने लगीं; मानो वर्षा-ऋतुमें जलकी बाढ़ आनेसे बड़ी हुई गंगा और यमुना दोनों नदियाँ बड़े वेगसे मिल रही हों ॥ ८ ॥ नानाशस्त्रपुरोवातो द्विपाश्वरथसंवृतः । गदाविद्युन्महारौद्रः संग्रामजलदो महान् ॥ ९ ॥ भारद्वाजानिलोद्धूतः शरधारासहस्रवान् । अभ्यवर्षन्महासैन्यः पाण्डुसेनाग्निमुद्धतम् ॥ १० ॥ उस समय महान् सैन्यदलसे संयुक्त एवं हाथी, घोड़े और रथोंसे भरा हुआ वह संग्राम महान् मेघके समान जान पड़ता था। नाना प्रकारके शस्त्र पूर्ववात (पुरवैया)-के तुल्य चल रहे थे। गदाएँ विद्युत्‌के समान प्रकाशित होती थीं। देखनेमें वह संग्राम-मेघ बड़ा भयंकर जान पड़ता था। द्रोणाचार्य वायुके समान उसे संचालित कर रहे थे तथा उससे बाणरूपी जलकी सहस्रों धाराएँ गिर रही थीं और इस प्रकार वह अग्निके समान उठी हुई पाण्डव-सेनापर सब ओरसे वर्षा कर रहा था ॥ ९-१० ॥ समुद्रमिव घर्मान्ते विशन् घोरो महानिलः । व्यक्षोभयदनीकानि पाण्डवानां द्विजोत्तमः ॥ ११ ॥ जैसे ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें बड़े जोरसे उठी हुई भयंकर वायु महासागरमें क्षोभ उत्पन्न करके वहाँ ज्वारका दृश्य उपस्थित कर देती है, उसी प्रकार विप्रवर द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनामें हलचल मचा दी ॥ ११ ॥ तेऽपि सर्वप्रयत्नेन द्रोणमेव समाद्रवन् । बिभित्सन्तो महासेतुं वार्योघाः प्रबला इव ॥ १२ ॥ पाण्डव-योद्धाओंने भी सारी शक्ति लगाकर द्रोणपर ही धावा किया था; मानो पानीके प्रखर प्रवाह किसी महान् पुलको तोड़ डालना चाहते हों ॥ १२ ॥ वारयामास तान् द्रोणो जलौघमचलो यथा । पाण्डवान् समरे क्रुद्धान् पञ्चालांश्च सकेकयान् ॥ १३ ॥ जैसे सामने खड़ा हुआ पर्वत आती हुई जलराशिको रोक देता है, उसी प्रकार समरांगणमें द्रोणाचार्यने कुपित हुए पाण्डवों, पांचालों तथा केकयोंको रोक दिया था ॥ १३ ॥ अथापरे च राजानः परिवृत्य समन्ततः । महाबला रणे शूराः पञ्चालानन्ववारयन् ॥ १४ ॥

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इसी प्रकार दूसरे महाबली शूरवीर नरेश भी उस युद्धस्थलमें सब ओरसे लौटकर पांचालोंका ही प्रतिरोध करने लगे ।। १४ ।।

ततो रणे नरव्याघ्रः पार्षतः पाण्डवैः सह । संजघानासकृद् द्रोणं बिभित्सुररिवाहिनीम् ।। १५ ।। तदनन्तर रणक्षेत्रमें पाण्डवोंसहित नरश्रेष्ठ धृष्टद्युम्नने शत्रुसेनाके व्यूहका भेदन करनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यपर बारंबार प्रहार किया ।। १५ ।।

यथैव शरवर्षाणि द्रोणो वर्षति पार्षते । तथैव शरवर्षाणि धृष्टद्युम्नोऽप्यवर्षत ।। १६ ।। आचार्य द्रोण धृष्टद्युम्नपर जैसे बाणोंकी वर्षा करते थे, धृष्टद्युम्न भी द्रोणपर वैसे ही बाण बरसाते थे ।। १६ ।।

सनिस्त्रिंशपुरोवातः शक्तिप्रासर्ष्टिसंवृतः । ज्याविद्युच्चापसंह्लादो धृष्टद्युम्नबलाहकः ।। १७ ।। शरधाराश्मवर्षाणि व्यसृजत् सर्वतो दिशम् । निघ्नन् रथवराश्वौघान् प्लावयामास वाहिनीम् ।। १८ ।। उस समय धृष्टद्युम्न एक महामेघके समान जान पड़ते थे। उनकी तलवार पुरवैया हवाके समान चल रही थी। वे शक्ति, प्रास एवं ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। उनकी प्रत्यंचा विद्युत्‌के समान प्रकाशित होती थी। धनुषकी टंकार मेघगर्जनाके समान जान पड़ती थी। उस धृष्टद्युम्नरूपी मेघने श्रेष्ठ रथी और घुड़सवारोंके समूहरूपी खेतीको नष्ट करनेके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें बाणरूपी जलकी धारा और अस्त्र-शस्त्ररूपी पत्थर बरसाते हुए शत्रु-सेनाको आप्लावित कर दिया ।। १७-१८ ।।

यं यमार्ज्छच्छरैर्द्रोणः पाण्डवानां रथव्रजम् । ततस्ततः शरैर्द्रोणमपाकर्षत पार्षतः ।। १९ ।। द्रोणाचार्य बाणोंद्वारा पाण्डवोंकी जिस-जिस रथसेनापर आक्रमण करते थे, धृष्टद्युम्न तत्काल बाणोंकी वर्षा करके उस-उस ओरसे उन्हें लौटा देते थे ।। १९ ।।

तथा तु यतमानस्य द्रोणस्य युधि भारत । धृष्टद्युम्नं समासाद्य त्रिधा सैन्यमभिद्यत ।। २० ।। भारत! युद्धमें इस प्रकार विजयके लिये प्रयत्नशील हुए द्रोणाचार्यकी सेना धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर तीन भागोंमें बँट गयी ।। २० ।।

भोजमेकेऽभ्यवर्तन्त जलसंधं तथापरे । पाण्डवैर्हन्यमानाश्च द्रोणमेवापरे ययुः ।। २१ ।। पाण्डव-योद्धाओंकी मार खाकर कुछ सैनिक कृतवर्माके पास चले गये, दूसरे जलसंधके पास भाग गये और शेष सभी योद्धा द्रोणाचार्यका ही अनुसरण करने लगे ।। २१ ।।

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संघट्टयति सैन्यानि द्रोणस्तु रथिनां वरः ।
व्यधमच्चापि तान्यस्य धृष्टद्युम्नो महारथः ॥ २२ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोण बारंबार अपनी सेनाओंको संगठित करते और महारथी धृष्टद्युम्न उनकी सब सेनाओंको छिन्न-भिन्न कर देते थे ॥ २२ ॥
धार्तराष्ट्रास्तथाभूता वध्यन्ते पाण्डुसृञ्जयैः ।
अगोपाः पशवोऽरण्ये बहुभिः श्वापदैरिव ॥ २३ ॥
जैसे वनमें बिना रक्षकके पशुओंको बहुत-से हिंसक जन्तु मार डालते हैं, उसी प्रकार पाण्डव और सृंजय आपके सैनिकोंका वध कर रहे थे ॥ २३ ॥
कालः स्म ग्रसते योधन् धृष्टद्युम्नेन मोहितान् ।
संग्रामे तुमुले तस्मिन्निति सम्मेनिरे जनाः ॥ २४ ॥
उस भयंकर संग्राममें सब लोग ऐसा मानने लगे कि काल ही धृष्टद्युम्नके द्वारा कौरवयोध्दाओंको मोहित करके उन्हें अपना ग्रास बना रहा है ॥ २४ ॥
कुनृपस्य यथा राष्ट्रं दुर्भिक्षव्याधितस्करैः ।
द्राव्यते तद्वदापन्ना पाण्डवैस्तव वाहिनी ॥ २५ ॥
जैसे दुष्ट राजाका राज्य दुर्भिक्ष, भाँति-भाँतिकी बीमारी और चोर-डाकुओंके उपद्रवके कारण उजाड़ हो जाता है, उसी प्रकार पाण्डव-सैनिकोंद्वारा विपत्तिमें पड़ी हुई आपकी सेना इधर-उधर खदेड़ी जा रही थी ॥ २५ ॥
अर्करश्मिविमिश्रेषु शस्त्रेषु कवचेषु च ।
चक्षूंषि प्रत्यहन्यन्त सैन्येन रजसा तथा ॥ २६ ॥
योद्धाओंके अस्त्र-शस्त्रों और कवचोंपर सूर्यकी किरणें पड़नेसे वहाँ आँखें चौंधिया जाती थीं और सेनासे इतनी धूल उठती थी कि उससे सबके नेत्र बंद हो जाते थे ॥ २६ ॥
त्रिधाभूतेषु सैन्येषु वध्यमानेषु पाण्डवैः ।
अमर्षितस्ततो द्रोणः पञ्चालान् व्यधमच्छरैः ॥ २७ ॥
जब पाण्डवोंके द्वारा मारी जाती हुई कौरव-सेना तीन भागोंमें बँट गयी, तब द्रोणाचार्यने अत्यन्त कुपित होकर अपने बाणोंद्वारा पांचालोंका विनाश आरम्भ किया ॥ २७ ॥
मृद्नतस्तान्यनीकानि निघ्नतश्चापि सायकैः ।
बभूव रूपं द्रोणस्य कालाग्नेरिव दीप्यतः ॥ २८ ॥
पांचालोंकी उन सेनाओंको रौंदते और बाणोंद्वारा उनका संहार करते हुए द्रोणाचार्यका स्वरूप प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता था ॥ २८ ॥
रथं नागं हयं चापि पत्तिंश्च विशाम्पते ।
एकैकेनेषुणा संख्ये निर्बिभेद महारथः ॥ २९ ॥

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प्रजानाथ! महारथी द्रोणने उस युद्धस्थलमें शत्रुसेनाके प्रत्येक रथ, हाथी, अश्व और पैदल सैनिकको एक-एक बाणसे घायल कर दिया ।। २९ ।। पाण्डवानां तु सैन्येषु नास्ति कश्चित् स भारत । दधार यो रणे बाणान् द्रोणचापच्युतान् प्रभो ।। ३० ।। भारत! प्रभो! उस समय पाण्डवोंकी सेनामें कोई ऐसा वीर नहीं था, जो रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए बाणोंको धैर्यपूर्वक सह सका हो ।। ३० ।। तत् पच्यमानमर्केण द्रोणसायकतापितम् । बभ्राम पार्षतं सैन्यं तत्र तत्रैव भारत ।। ३१ ।। भरतनन्दन! सूर्यके द्वारा अपनी किरणोंसे पकायी जाती हुई-सी धृष्टद्युम्नकी सेना द्रोणाचार्यके बाणोंसे संतप्त हो जहाँ-तहाँ चक्कर काटने लगी ।। ३१ ।। तथैव पार्षतेनापि काल्यमानं बलं तव । अभवत् सर्वतो दीप्तं शुष्कं वनमिवाग्निना ।। ३२ ।। इसी प्रकार धृष्टद्युम्नके द्वारा खदेड़ी जाती हुई आपकी सेना भी सब ओरसे आग लग जानेके कारण प्रज्वलित हुए सूखे वनकी भाँति दग्ध हो रही थी ।। ३२ ।। बाध्यमानेषु सैन्येषु द्रोणपार्षतसायकैः । त्यक्त्वा प्राणान् परं शक्त्या युध्यन्ते सर्वतोमुखाः ।। ३३ ।। द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नके बाणोंद्वारा सेनाओंके पीड़ित होनेपर भी सब लोग प्राणोंका मोह छोड़कर पूरी शक्तिसे सब ओर युद्ध कर रहे थे ।। ३३ ।। तावकानां परेषां च युध्यतां भरतर्षभ । नासीत् कश्चिन्महाराज योऽत्याक्षीत् संयुगं भयात् ।। ३४ ।। भरतभूषण! महाराज! वहाँ युद्ध करते हुए आपके और शत्रुओंके योद्धाओंमें कोई ऐसा नहीं था, जिसने भयके कारण युद्धका मैदान छोड़ दिया हो ।। ३४ ।। भीमसेनं तु कौन्तेयं सोदर्याः पर्यवारयन् । विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च महारथः ।। ३५ ।। उस समय विविंशति, चित्रसेन तथा महारथी विकर्ण—इन तीनों भाइयोंने कुन्तीपुत्र भीमसेनको घेर लिया ।। ३५ ।। विन्दानुविन्दावावन्त्यौ क्षेमधूर्तिश्च वीर्यवान् । त्रयाणां तव पुत्राणां त्रय एवानुयायिनः ।। ३६ ।। अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द तथा पराक्रमी क्षेमधूर्ति—ये तीनों ही आपके पूर्वोक्त तीनों पुत्रोंके अनुयायी थे ।। ३६ ।। बाह्लीकराजस्तेजस्वी कुलपुत्रो महारथः । सहसेनः सहामात्यो द्रौपदेयानवारयत् ।। ३७ ।।

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उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए तेजस्वी महारथी बाह्लीकराजने सेना और मन्त्रियोंसहित जाकर द्रौपदी-पुत्रोंको रोका ॥ ३७ ॥

शैब्यो गोवासनो राजा योधैर्दशशतावरैः । काश्यस्याभिभुवः पुत्रं पराक्रान्तमवारयत् ॥ ३८ ॥

शिबिदेशीय राजा गोवासनने कम-से-कम एक सहस्र योद्धा साथ लेकर काशिराज अभिभूके पराक्रमी पुत्रका सामना किया ॥ ३८ ॥

अजातशत्रुं कौन्तेयं ज्वलन्तमिव पावकम् । मद्राणामीश्वरः शल्यो राजा राजानमावृणोत् ॥ ३९ ॥

प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी अजातशत्रु कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरका सामना मद्रदेशके स्वामी राजा शल्यने किया ॥ ३९ ॥

दुःशासनस्त्ववस्थाप्य स्वमनीकममर्षणः । सात्यकिं प्रत्ययौ क्रुद्धः शूरो रथवरं युधि ॥ ४० ॥

अमर्षशील शूरवीर दुःशासनने अपनी भागती हुई सेनाको पुनः स्थिरतापूर्वक स्थापित करके कुपित हो युद्धस्थलमें रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकिपर आक्रमण किया ॥

स्वकेनाहमनीकेन संनद्धः कवचावृतः । चतुःशतैर्महेष्वासैश्चेकितानमवारयम् ॥ ४१ ॥

अपनी सेना तथा चार सौ महाधनुर्धरोंके साथ कवच धारण करके सुसज्जित हो मैंने चेकितानको रोका ॥ ४१ ॥

शकुनिस्तु सहानीको माद्रीपुत्रमवारयत् । गान्धारकैः सप्तशतैश्चापशक्त्यसिपाणिभिः ॥ ४२ ॥

सेनासहित शकुनिने माद्रीपुत्र नकुलका प्रतिरोध किया। उसके साथ हाथोंमें धनुष, शक्ति और तलवार लिये सात सौ गान्धार-देशीय योद्धा मौजूद थे ॥ ४२ ॥

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं मत्स्यमार्च्छताम् । प्राणांस्त्यक्त्वा महेष्वासौ मित्रार्थेऽभ्युद्यतायुधौ ॥ ४३ ॥

अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्दने मत्स्य-नरेश विराटपर आक्रमण किया। उन दोनों महाधनुर्धर वीरोंने प्राणोंका मोह छोड़कर अपने मित्र दुर्योधनके लिये हथियार उठाया था ॥ ४३ ॥

शिखण्डिनं याज्ञसेनिं रुन्धानमपराजितम् । बाह्लीकः प्रतिसंयत्तः पराक्रान्तमवारयत् ॥ ४४ ॥

किसीसे परास्त न होनेवाले पराक्रमी यज्ञसेन-कुमार शिखण्डीको, जो राह रोककर खड़ा था, बाह्लीकने पूर्ण प्रयत्नशील होकर रोका ॥ ४४ ॥

धृष्टद्युम्नं तु पाञ्चाल्यं क्रूरैः सार्धं प्रभद्रकैः । आवन्त्यः सहसौवीरैः क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ४५ ॥

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अवन्तीके एक दूसरे वीरने क्रूर स्वभाववाले प्रभद्रकों और सौवीरदेशीय सैनिकोंके साथ आकर क्रोधमें भरे हुए पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नको रोका।।

घटोत्कचं तथा शूरं राक्षसं क्रूरकर्मिणम्।
अलायुधोऽद्रवत् तूर्णं क्रुद्धमायान्तमाहवे॥ ४६॥

क्रोधमें भरकर युद्धके लिये आते हुए क्रूरकर्मा तथा शूरवीर राक्षस घटोत्कचपर अलायुधने शीघ्रतापूर्वक आक्रमण किया॥ ४६॥

अलम्बुषं राक्षसेन्द्रं कुन्तिभोजो महारथः।
सैन्येन महता युक्तः क्रुद्धरूपमवारयत्॥ ४७॥

पाण्डवपक्षके महारथी राजा कुन्तिभोजने विशाल सेनाके साथ आकर कुपित हुए कौरवपक्षीय राक्षसराज अलम्बुषका सामना किया॥ ४७॥

सैन्धवः पृष्ठतस्त्वासीत् सर्वसैन्यस्य भारत।
रक्षितः परमेष्वासैः कृपप्रभृतिभी रथैः॥ ४८॥

भरतनन्दन! उस समय सिंधुराज जयद्रथ सारी सेनाके पीछे महाधनुर्धर कृपाचार्य आदि रथियोंसे सुरक्षित था॥

तस्यास्तां चक्ररक्षौ द्वौ सैन्धवस्य बृहत्तमौ।
द्रौणिर्दक्षिणतो राजन् सूतपुत्रश्च वामतः॥ ४९॥

राजन्! जयद्रथके दो महान् चक्ररक्षक थे। उसके दाहिने चक्रकी अश्वत्थामा और बायें चक्रकी रक्षा सूतपुत्र कर्ण कर रहा था॥ ४९॥

पृष्ठगोपास्तु तस्यासन् सौमदत्तिपुरोगमाः।
कृपश्च वृषसेनश्च शलः शल्यश्च दुर्जयः॥ ५०॥
नीतिमन्तो महेष्वासाः सर्वे युद्धविशारदाः।
सैन्धवस्य विधायैवं रक्षां युयुधिरे ततः॥ ५१॥

भूरिश्रवा आदि वीर उसके पृष्ठ भागकी रक्षा करते थे। कृप, वृषसेन, शल और दुर्जय वीर शल्य—ये सभी नीतिज्ञ, महान् धनुर्धर एवं युद्धकुशल थे और इस प्रकार सिंधुराजकी रक्षाका प्रबन्ध करके वहाँ युद्ध कर रहे थे॥ ५०-५१॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि संकुलयुद्धे पञ्चनवतितमोऽध्यायः
॥ ९५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥

संजय कहते हैं—राजन्! कौरवों और पाण्डवोंमें जिस प्रकार युद्ध हुआ था, उस आश्चर्यमय संग्रामका मैं वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनिये— ॥ १ ॥

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षण्णवतितमोऽध्यायः

दोनों पक्षोंके प्रधान वीरोंका द्वन्द्व-युद्ध

संजय उवाच

राजन् संग्राममाश्चर्यं शृणु कीर्तयतो मम ।
कुरुणां पाण्डवानां च यथा युद्धमवर्तत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! कौरवों और पाण्डवोंमें जिस प्रकार युद्ध हुआ था, उस आश्चर्यमय संग्रामका मैं वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनिये— ॥ १ ॥

भारद्वाजं समासाद्य व्यूहस्य प्रमुखे स्थितम् ।
अयोधयन् रणे पार्था द्रोणानीकं बिभित्सवः ॥ २ ॥
व्यूहके द्वारपर खड़े हुए द्रोणाचार्यके पास आकर पाण्डवगण उनकी सेनाके व्यूहका भेदन करनेकी इच्छासे रणक्षेत्रमें उनके साथ युद्ध करने लगे ॥ २ ॥

रक्षमाणः स्वकं व्यूहं द्रोणोऽपि सह सैनिकैः ।
अयोधयद् रणे पार्थान् प्रार्थयानो महद् यशः ॥ ३ ॥
द्रोणाचार्य भी महान् यशकी अभिलाषा रखकर अपने व्यूहकी रक्षा करते हुए बहुत-से सैनिकोंको साथ लेकर समरांगणमें कुन्तीपुत्रोंके साथ युद्धमें संलग्न हो गये ॥ ३ ॥

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं दशभिः शरैः ।
आजघ्नतुः सुसंक्रुद्धौ तव पुत्रहितैषिणौ ॥ ४ ॥
आपके पुत्रका हित चाहनेवाले अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्दने अत्यन्त कुपित हो राजा विराटको दस बाण मारे ॥ ४ ॥

विराटश्च महाराज तावुभौ समरे स्थितौ ।
पराक्रान्तौ पराक्रम्य योधयामास सानुगौ ॥ ५ ॥
महाराज! राजा विराट्ने भी समरभूमिमें अनुचरोंसहित खड़े हुए उन दोनों पराक्रमी वीरोंके साथ पराक्रमपूर्वक युद्ध किया ॥ ५ ॥

तेषां युद्धं समभवद् दारुणं शोणितोदकम् ।
सिंहस्य द्विपमुख्याभ्यां प्रभिन्नाभ्यां यथा वने ॥ ६ ॥
जैसे वनमें सिंहका दो मदस्रावी महान् हाथियोंके साथ युद्ध हो रहा हो, उसी प्रकार विराट और विन्द-अनुविन्दमें बड़ा भयंकर संग्राम होने लगा, जहाँ पानीकी तरह खून बहाया जा रहा था ॥ ६ ॥

बाह्लीकं रभसं युद्धे याज्ञसेनिर्महाबलः ।
आजघ्ने विशिखैस्तीक्ष्णैर्घोरै मर्मास्थिभेदिभिः ॥ ७ ॥

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महाबली शिखण्डीने युद्धस्थलमें वेगशाली बाह्लीकको मर्मस्थानों और हड्डियोंको विदीर्ण कर देनेवाले भयंकर तीखे बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ बाह्लीको याज्ञसेनिं तु हेमपुङ्खैः शिलाशितैः । आजघान भृशं क्रुद्धो नवभिर्नतपर्वभिः ॥ ८ ॥ इससे बाह्लीक अत्यन्त कुपित हो उठे। उन्होंने शानपर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखसे युक्त और झुकी हुई गाँठवाले नौ बाणोंद्वारा शिखण्डीको घायल कर दिया ॥ ८ ॥ तद् युद्धमभवद् घोरं शरशक्तिसमाकुलम् । भीरूणां त्रासजननं शूराणां हर्षवर्धनम् ॥ ९ ॥ उन दोनोंके उस युद्धने बड़ा भयंकर रूप धारण किया। उसमें बाणों और शक्तियोंका ही अधिक प्रहार हो रहा था। वह भीरु पुरुषोंके हृदयमें भय और शूरवीरोंके हृदयमें हर्षकी वृद्धि करनेवाला था ॥ ९ ॥ ताभ्यां तत्र शरैर्मुक्त्तैरन्तरिक्षं दिशस्तथा । अभवत् संवृतं सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ॥ १० ॥ उन दोनों भाइयोंके छोड़े हुए बाणोंसे वहाँ आकाश और दिशाएँ—सब कुछ व्याप्त हो गया। कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ १० ॥ शैब्यो गोवासनो युद्धे काश्यपुत्रं महारथम् । ससैन्यो योधयामास गजः प्रतिगजं यथा ॥ ११ ॥ शिबिदेशीय गोवासनने सेनासहित सामने जा काशिराजके महारथी पुत्रके साथ रणक्षेत्रमें उसी प्रकार युद्ध किया, जैसे एक हाथी अपने प्रतिद्वन्द्वी दूसरे हाथीके साथ युद्ध करता है ॥ ११ ॥ बाह्लीकराजः संक्रुद्धो द्रौपदेयान् महारथान् । मनः पञ्चेन्द्रियाणीव शुशुभे योधयन् रणे ॥ १२ ॥ क्रोधमें भरे हुए बाह्लीकराज महारथी द्रौपदीपुत्रोंके साथ रण-क्षेत्रमें युद्ध करते हुए उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे मन पाँचों इन्द्रियोंसे युद्ध करता हुआ सुशोभित होता है ॥ १२ ॥ अयोधयंस्ते सुभृशं तं शरौघैः समन्ततः । इन्द्रियार्था यथा देहं शश्वद् देहवतां वर ॥ १३ ॥ देहधारियोंमें श्रेष्ठ महाराज! द्रौपदीके पुत्र भी चारों ओरसे बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए वहाँ बाह्लीकराजके साथ उसी प्रकार बड़े वेगसे युद्ध करने लगे, जैसे इन्द्रियोंके विषय शरीरके साथ सदा जूझते रहते हैं ॥ १३ ॥ वार्ष्णेयं सात्यकिं युद्धे पुत्रो दुःशासनस्तव । आजघ्ने सायकैस्तीक्ष्णैर्नवभिर्नतपर्वभिः ॥ १४ ॥

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आपके पुत्र दुःशासनने युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले नौ तीखे बाणोंद्वारा वृष्णिवंशी सात्यकिको घायल कर दिया ॥ १४ ॥
सोऽतिविद्धो बलवता महेष्वासेन धन्विना ।
ईषन्मूर्च्छां जगामाशु सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ १५ ॥
बलवान् एवं महान् धनुर्धर दुःशासनके बाणोंसे अत्यन्त बिंध जानेके कारण सत्यपराक्रमी सात्यकिको तुरंत ही थोड़ी-सी मूर्च्छा आ गयी ॥ १५ ॥
समाश्र्वस्तस्तु वार्ष्णेयस्तव पुत्र महारथम् ।
विव्याध दशभिस्तूर्णं सायकैः कङ्कपत्रिभिः ॥ १६ ॥
थोड़ी देरमें स्वस्थ होनेपर सात्यकिने आपके महारथी पुत्र दुःशासनको कंककी पाँखवाले दस बाणोंद्वारा तुरंत ही घायल कर दिया ॥ १६ ॥
तावन्योन्यं दृढं विद्धावन्योन्यशरपीडितौ ।
रेजतुः समरे राजन् पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ १७ ॥
राजन्! वे दोनों एक-दूसरेके बाणोंसे पीड़ित और अत्यन्त घायल हो समरांगणमें दो खिले हुए पलाशके वृक्षोंकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ १७ ॥
अलम्बुषस्तु संक्रुद्धः कुन्तिभोजशरार्दितः ।
अशोभत भृशं लक्ष्म्या पुष्पाढ्य इव किंशुकः ॥ १८ ॥
राजा कुन्तिभोजके बाणोंसे पीड़ित हो अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ राक्षस अलम्बुष फूलोंसे लदे हुए पलाश वृक्षके समान एक विशेष शोभासे सम्पन्न दिखायी देने लगा ॥ १८ ॥
कुन्तिभोजं ततो रक्षो विद्ध्व बहुभिरायसैः ।
अनदद् भैरवं नादं वाहिन्याः प्रमुखे तव ॥ १९ ॥
फिर राक्षसने बहुत-से लोहेके बाणोंद्वारा राजा कुन्तिभोजको घायल करके आपकी सेनाके प्रमुख भागमें बड़ी भयंकर गर्जना की ॥ १९ ॥
ततस्तौ समरे शूरौ योधयन्तौ परस्परम् ।
ददृशुः सर्वसैन्यानि शक्रजम्भौ यथा पुरा ॥ २० ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण सेनाएँ पूर्वकालमें एक-दूसरेसे युद्ध करनेवाले इन्द्र और जम्भासुरके समान समरांगणमें परस्पर जूझते हुए उन दोनों शूरवीरोंको देखने लगीं ॥
शकुनिं रभसं युद्धे कृतवैरं च भारत ।
माद्रीपुत्रौ च संरब्धौ शरैश्चार्दयतां भृशम् ॥ २१ ॥
भारत! क्रोधमें भरे हुए दोनों माद्रीकुमारोंने पहलेसे वैर बाँधनेवाले और युद्धमें वेगपूर्वक आगे बढ़नेवाले शकुनिको अपने बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित किया ॥ २१ ॥
तुमुलः स महान् राजन् प्रावर्तत जनक्षयः ।
त्वया संजनितोऽत्यर्थं कर्णेन च विवर्धितः ॥ २२ ॥

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राजन्! इस प्रकार वह महाभयंकर जनसंहार चालू हो गया, जिसकी परिस्थितिको आपने ही उत्पन्न किया है और कर्णने उसे अत्यन्त बढ़ावा दिया है ।। २२ ।। रक्षितस्तव पुत्रैश्च क्रोधमूलो हुताशनः । य इमां पृथिवीं राजन् दग्धुं सर्वां समुद्यतः ।। २३ ।। महाराज! आपके पुत्रोंने उस क्रोधमूलक वैरकी आगको सुरक्षित रखा है, जो इस सारी पृथिवीको भस्म कर डालनेके लिये उद्यत है ।। २३ ।। शकुनिः पाण्डुपुत्राभ्यां कृतः स विमुखः शरैः । न स्म जानाति कर्तव्यं युद्धे किंचित् पराक्रमम् ।। २४ ।। पाण्डुकुमार नकुल और सहदेवने अपने बाणोंद्वारा शकुनिको युद्धसे विमुख कर दिया। उस समय उसे युद्धविषयक कर्तव्यका ज्ञान न रहा और न कुछ पराक्रमका ही भान हुआ ।। २४ ।। विमुखं चैनमालोक्य माद्रीपुत्रौ महारथौ । ववर्षतुः पुनर्बाणैर्यथा मेघौ महागिरिम् ।। २५ ।। उसे युद्धसे विमुख हुआ देखकर भी महारथी माद्रीकुमार नकुल-सहदेव उसके ऊपर पुनः उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगे, जैसे दो मेघ किसी महान् पर्वतपर जलकी धारा बरसा रहे हों ।। २५ ।। स वध्यमानो बहुभिः शरैः संनतपर्वभिः । सम्प्रायाज्जवनैरश्वैर्द्रोणानीकाय सौबलः ।। २६ ।। झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाणोंकी मार खाकर सुबलपुत्र शकुनि वेगशाली घोड़ोंकी सहायतासे द्रोणाचार्यकी सेनाके पास जा पहुँचा ।। २६ ।। घटोत्कचस्तथा शूरं राक्षसं तमलायुधम् । अभ्ययाद् रभसं युद्धे वेगमास्थाय मध्यमम् ।। २७ ।। इधर घटोत्कचने अपने प्रतिद्वन्द्वी शूर राक्षस अलायुधका जो युद्धमें बड़ा वेगशाली था, मध्यम वेगका आश्रय ले सामना किया ।। २७ ।। तयोर्युद्धं महाराज चित्ररूपमिवाभवत् । यादृशं हि पुरा वृत्तं रामरावणयोर्मृधे ।। २८ ।। महाराज! पूर्वकालमें श्रीराम और रावणके युद्धमें जैसी आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी, उसी प्रकार उन दोनों राक्षसोंका युद्ध भी विचित्र-सा ही हुआ ।। २८ ।। ततो युधिष्ठिरो राजा मद्रराजानमाहवे । विद्ध्वा पञ्चाशता बाणैः पुनर्विव्याध सप्तभिः ।। २९ ।। तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने युद्धमें मद्रराज शल्यको पचास बाणोंसे घायल करके पुनः सात बाणोंद्वारा उन्हें बींध डाला ।। २९ ।। ततः प्रवृत्ते युद्धं तयोरत्यद्भुतं नृप ।

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यथा पूर्वं महत् युद्धं शम्बरामरराजयोः ॥ ३० ॥ नरेश्वर! जैसे पूर्वकालमें शम्बरासुर और देवराज इन्द्रमें महान् युद्ध हुआ था, उसी प्रकार उस समय उन दोनोंमें अत्यन्त अद्भुत संग्राम होने लगा ॥ ३० ॥

विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च तवात्मजः । अयोधयन् भीमसेनं महत्या सेनया वृताः ॥ ३१ ॥ आपके पुत्र विविंशति, चित्रसेन और विकर्ण—ये तीनों विशाल सेनाके साथ रहकर भीमसेनके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्वन्द्वयुद्धे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें द्वन्द्वयुद्धविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 641)

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सप्तनवतितमोऽध्यायः

द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिद्वारा धृष्टद्युम्नकी रक्षा

संजय उवाच

तथा तस्मिन् प्रवृत्ते तु संग्रामे लोमहर्षणे ।
कौरवेयांस्त्रिधाभूतान् पाण्डवाः समुपाद्रवन् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! उस रोमांचकारी संग्रामके होते समय वहाँ तीन भागोंमें बँटे हुए कौरवोंपर पाण्डव-सैनिकोंने धावा किया ॥ १ ॥

जलसंधं महाबाहुं भीमसेनोऽभ्यवर्तत ।
युधिष्ठिरः सहानीकः कृतवर्माणमाहवे ॥ २ ॥
भीमसेनने महाबाहु जलसंधपर आक्रमण किया और सेनासहित युधिष्ठिरने युद्धस्थलमें कृतवर्मापर धावा बोल दिया ॥ २ ॥

किरंस्तु शरवर्षाणि रोचमान इवांशुमान् ।
धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणमभ्यद्रवद् रणे ॥ ३ ॥
महाराज! जैसे प्रकाशमान सूर्य सहस्रों किरणोंका प्रसार करते हैं, उसी प्रकार धृष्टद्युम्नने बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया ॥ ३ ॥

ततः प्रवृत्ते युद्धं त्वरतां सर्वधन्विनाम् ।
कुरूणां पाण्डवानां च संक्रुद्धानां परस्परम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर परस्पर क्रोधमें भरे और उतावले हुए कौरव-पाण्डवपक्षके सम्पूर्ण धनुर्धरोंका आपसमें युद्ध होने लगा ॥ ४ ॥

संक्षये तु तथाभूते वर्तमाने महाभये ।
द्वन्द्वीभूतेषु सैन्येषु युध्यमानेष्वभीतवत् ॥ ५ ॥
द्रोणः पाञ्चालपुत्रेण बली बलवता सह ।
यदक्षिपत् पृषत्कौघांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ६ ॥
इस प्रकार जब महाभयंकर जनसंहार होने लगा और सारे सैनिक निर्भय-से होकर द्वन्द्व-युद्ध करने लगे, उस समय बलवान् द्रोणाचार्यने शक्तिशाली पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध करते हुए जो बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ की, वह अद्भुत-सी प्रतीत होने लगी ॥ ५-६ ॥

पुण्डरीकवनानीव विध्वस्तानि समन्ततः ।
चक्राते द्रोणपाञ्चाल्यौ नृणां शीर्षाण्यनेकशः ॥ ७ ॥

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द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नने मनुष्योंके बहुत-से मस्तक काट गिराये, जो चारों ओर नष्ट होकर पड़े हुए कमलवनोंके समान जान पड़ते थे ॥ ७ ॥ विनिकीर्णानि वीराणामनीकेषु समन्ततः । वस्त्राभरणशस्त्राणि ध्वजवर्मायुधानि च ॥ ८ ॥ चारों ओर सेनाओंमें वीरोंके बहुत-से वस्त्र, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, ध्वज, कवच तथा आयुध छिन्न-भिन्न होकर बिखरे पड़े थे ॥ ८ ॥ तपनीयतनुत्राणाः संसिक्ता रुधिरेण च । संसक्ता इव दृश्यन्ते मेघसंघाः सविद्युतः ॥ ९ ॥ सुवर्णका कवच बाँधे तथा खूनसे लथपथ हुए सैनिक परस्पर सटे हुए बिजलियोंसहित मेघसमूहोंके समान दिखायी देते थे ॥ ९ ॥ कुञ्जराश्वनरानन्ये पातयन्ति स्म पत्रिभिः । तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महारथाः ॥ १० ॥ बहुत-से दूसरे महारथी चार हाथके धनुष खींचते हुए अपने पंखयुक्त बाणोंद्वारा हाथी, घोड़े और पैदल मनुष्योंको मार गिराते थे ॥ १० ॥ असिचर्माणि चापानि शिरांसि कवचानि च । विप्रकीर्यन्त शूराणां सम्प्रहारे महात्मनाम् ॥ ११ ॥ उन महामनस्वी वीरोंके संग्राममें योद्धाओंके खड्ग, ढाल, धनुष, मस्तक और कवच कटकर इधर-उधर बिखरे जाते थे ॥ ११ ॥ उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः । अदृश्यन्त महाराज तस्मिन् परमसंकुले ॥ १२ ॥ महाराज! उस महाभयानक युद्धमें चारों ओर असंख्य कबन्ध खड़े दिखायी देते थे ॥ १२ ॥ गृध्राः कङ्का बकाः श्येना वायसा जम्बुकास्तथा । बहुशः पिशिताशाश्च तत्रादृश्यन्त मारिष ॥ १३ ॥ आर्य! वहाँ बहुत-से गीध, कंक, बगले, बाज, कौए, सियार तथा अन्य मांसभक्षी प्राणी दृष्टिगोचर होते थे ॥ १३ ॥ भक्षयन्तश्च मांसानि पिबन्तश्चापि शोणितम् । विलुम्पन्तश्च केशांश्च मज्जांश्च बहुधा नृप ॥ १४ ॥ नरेश्वर! वे मांस खाते, रक्त पीते और केशों तथा मज्जाको बारंबार नोचते थे ॥ १४ ॥ आकर्षन्तः शरीराणि शरीरावयवांस्तथा । नराश्वगजसंघानां शिरांसि च ततस्ततः ॥ १५ ॥ मनुष्यों, घोड़ों तथा हाथियोंके समूहोंके सम्पूर्ण शरीरों और अवयवों एवं मस्तकोंको इधर-उधर खींचते थे ॥ १५ ॥

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कृतास्त्रा रणदीक्षाभिर्दीक्षिता रणशालिनः । रणे जयं प्रार्थयाना भृशं युयुधिरे तदा ॥ १६ ॥ अस्त्रविद्याके ज्ञाता और युद्धमें शोभा पानेवाले वीर रणयज्ञकी दीक्षा लेकर संग्राममें विजय चाहते हुए उस समय बड़े जोरसे युद्ध करने लगे ॥ १६ ॥ असिमार्गान् बहुविधान् विचेरुः सैनिका रणे । ऋष्टिभिः शक्तिभिः प्रासैः शूलतोमरपट्टिशैः ॥ १७ ॥ गदाभिः परिघैश्चान्यैरायुधैश्च भुजैरपि । अन्योन्यं जघ्निरे क्रुद्धा युद्धरङ्गगता नराः ॥ १८ ॥ समस्त सैनिक उस रणक्षेत्रमें तलवारके बहुत-से पैंतरे दिखाते हुए विचर रहे थे। युद्धकी रंगभूमिमें आये हुए मनुष्य परस्पर कुपित हो एक-दूसरेपर ऋष्टि, शक्ति, प्रास, शूल, तोमर, पट्टिश, गदा, परिघ, अन्यान्य आयुध तथा भुजाओंद्वारा चोट पहुँचाते थे ॥ १७-१८ ॥ रथिनो रथिभिः सार्धमश्वारोहाश्च सादिभिः । मातङ्गा वरमातङ्गैः पदाताश्च पदातिभिः ॥ १९ ॥ रथी रथियोंके, घुड़सवार घुड़सवारोंके, मतवाले हाथी श्रेष्ठ गजराजोंके और पैदल योद्धा पैदलोंके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ १९ ॥ क्षीबा इवान्ये चोन्मत्ता रङ्गेष्विव च वारणाः । उच्चक्रुशुरथान्योन्यं जघ्नुरन्योन्यमेव च ॥ २० ॥ रंगस्थलके समान उस रणक्षेत्रमें अन्य बहुत-से मत्त और उन्मत्त हाथी एक-दूसरेको देखकर चिग्घाड़ते और परस्पर आघात-प्रत्याघात करते थे ॥ २० ॥ वर्तमाने तथा युद्धे निर्मर्यादे विशाम्पते । धृष्टद्युम्नो हयानश्वैर्द्रोणस्य व्यत्यमिश्रयत् ॥ २१ ॥ राजन्! जिस समय वह मर्यादाशून्य युद्ध हो रहा था, उसी समय धृष्टद्युम्नने अपने रथके घोड़ोंको द्रोणाचार्यके घोड़ोंसे मिला दिया ॥ २१ ॥ ते हयाः साध्वशोभन्त मिश्रिता वातरंहसः । पारावतसवर्णाश्च रक्तशोणाश्च संयुगे ॥ २२ ॥ धृष्टद्युम्नके घोड़ोंका रंग कबूतरके समान था और द्रोणाचार्यके घोड़े लाल थे। उस युद्धके मैदानमें परस्पर मिले हुए वे वायुके समान वेगशाली अश्व बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ पारावतसवर्णास्ते रक्तशोणविमिश्रिताः । हयाः शुशुभिरे राजन् मेघा इव सविद्युतः ॥ २३ ॥ राजन्! कबूतरके समान वर्णवाले घोड़े लाल रंगके घोड़ोंसे मिलकर बिजलियोंसहित मेघोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ २३ ॥ धृष्टद्युम्नस्तु सम्प्रेक्ष्य द्रोणमभ्याशमागतम् ।

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असिचर्माददे वीरो धनुरुत्सृज्य भारत ॥ २४ ॥ भारत! वीर धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यको अत्यन्त निकट आया हुआ देख धनुष छोड़कर हाथमें ढाल और तलवार ले ली ॥ २४ ॥

चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म पार्षतः परवीरहा । ईषया समतिक्रम्य द्रोणस्य रथमाविशत् ॥ २५ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले धृष्टद्युम्न दुष्कर कर्म करना चाहते थे। अतः ईषादण्डके सहारे अपने रथको लाँघकर द्रोणाचार्यके रथपर जा चढ़े ॥ २५ ॥

अतिष्ठद् युगमध्ये स युगसंनहनेषु च । जघनार्धेषु चाश्वानां तत् सैन्यान्यभ्यपूजयन् ॥ २६ ॥ वे एक पैर जूएके ठीक बीचमें और दूसरा पैर उस जूएसे सटे हुए (आचार्यके) घोड़ोंके पिछले आधे भागोंपर रखकर खड़े हो गये। उनके इस कार्यकी सभी सैनिकोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २६ ॥

खड्गेन चरतस्तस्य शोणाश्वानधितिष्ठतः । न ददर्शान्तरं द्रोणस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २७ ॥ लाल घोड़ोंपर खड़े हो तलवार घुमाते हुए धृष्टद्युम्नके ऊपर प्रहार करनेके लिये आचार्य द्रोणको थोड़ा-सा भी अवसर नहीं दिखायी दिया। वह अद्भुत-सी बात हुई ॥ २७ ॥

यथा श्येनस्य पतनं वनेष्वामिषगृद्धिनः । तथैवासीदभिसारस्तस्य द्रोणं जिघांसतः ॥ २८ ॥ जैसे वनमें मांसकी इच्छा रखनेवाला बाज झपट्टा मारता है, उसी प्रकार द्रोणको मार डालनेकी इच्छासे उनपर धृष्टद्युम्नका यह सहसा आक्रमण हुआ था ॥ २८ ॥

ततः शरशतेनास्य शतचन्द्रं समाक्षिपत् । द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य खड्गं च दशभिः शरैः ॥ २९ ॥ तदनन्तर द्रोणाचार्यने सौ बाण मारकर द्रुपदकुमारकी ढालको, जिसमें सौ चन्द्राकार चिह्न बने हुए थे, काट गिराया और दस बाणोंसे उनकी तलवारके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ २९ ॥

हयांश्चैव चतुःषष्ट्या शराणां जघ्निवान् बली । ध्वजं छत्रं च भल्लाभ्यां तथा तौ पार्ष्णिसारथी ॥ ३० ॥ बलवान् आचार्यने चौंसठ बाणोंसे धृष्टद्युम्नके चारों घोड़ोंको मार डाला। फिर दो भल्लोंसे ध्वज और छत्र काटकर उनके दोनों पार्श्वरक्षकोंको भी मार गिराया ॥ ३० ॥

अथास्मै त्वरितो बाणमपरं जीवितान्तकम् । आकर्णपूर्णं चिक्षेप वज्रं वज्रधरो यथा ॥ ३१ ॥ तदनन्तर तुरंत ही एक दूसरा प्राणान्तकारी बाण कानतक खींचकर उनके ऊपर चलाया, मानो वज्रधारी इन्द्रने वज्र मारा हो ॥ ३१ ॥

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तं चतुर्दशभिस्तीक्ष्णैर्बाणैश्चिच्छेद सात्यकिः ।
ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्नं व्यमोचयत् ॥ ३२ ॥
उस समय सात्यकिने चौदह तीखे बाण मारकर उस बाणको काट डाला और इस प्रकार आचार्यप्रवरके चंगुलमें फँसे हुए धृष्टद्युम्नको बचा लिया ॥ ३२ ॥

सिंहेनेव मृगं ग्रस्तं नरसिंहेन मारिष ।
द्रोणेन मोचयामास पाञ्चाल्यं शिनिपुङ्गवः ॥ ३३ ॥
पूजनीय नरेश! जैसे सिंहने किसी मृगको दबोच लिया हो, उसी प्रकार नरसिंह द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नको ग्रस लिया था; परंतु शिनिप्रवर सात्यकिने उन्हें छुड़ा लिया ॥ ३३ ॥

सात्यकिं प्रेक्ष्य गोप्तारं पाञ्चाल्यं च महाहवे ।
शराणां त्वरितो द्रोणः षड्विंशत्या समर्पयत् ॥ ३४ ॥
उस महासमरमें सात्यकि धृष्टद्युम्नके रक्षक हो गये, यह देखकर द्रोणाचार्यने तुरंत ही उनपर छब्बीस बाणोंसे प्रहार किया ॥ ३४ ॥

ततो द्रोणं शिनेः पौत्रो ग्रसन्तमपि सृञ्जयान् ।
प्रत्यविध्यच्छितैर्बाणैः षड्विंशत्या स्तनान्तरे ॥ ३५ ॥
तब शिनिके पौत्र सात्यकिने सृञ्जयोंके संहारमें लगे हुए द्रोणाचार्यकी छातीमें छब्बीस तीखे बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३५ ॥

ततः सर्वे रथास्तूर्णं पाञ्चाल्या जयगृद्धिनः ।
सात्वताभिसृते द्रोणे धृष्टद्युम्नमवाक्षिपन् ॥ ३६ ॥
जब द्रोणाचार्य सात्यकिके साथ उलझ गये, तब विजयाभिलाषी समस्त पांचाल रथी तुरंत ही धृष्टद्युम्नको अपने रथपर बिठाकर दूर हटा ले गये ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणधृष्टद्युम्नयुद्धे
सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्धविषयक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 646)

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अष्टनवतितमोऽध्यायः

द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध

धृतराष्ट्र उवाच

बाणे तस्मिन् निकृत्ते तु धृष्टद्युम्ने च मोक्षिते ।
तेन वृष्णिप्रवीरेण युयुधानेन संजय ॥ १ ॥
अमर्षितो महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
नरव्याघ्रः शिनेः पौत्रे द्रोणः किमकरोद् युधि ॥ २ ॥

**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब वृष्णिवंशके प्रमुख वीर युयुधानेने आचार्य द्रोणके उस बाणको काट दिया और धृष्टद्युम्नको प्राणसंकटसे बचा लिया, तब अमर्षमें भरे हुए सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर नरव्याघ्र द्रोणाचार्यने उस युद्धस्थलमें सात्यकिके प्रति क्या किया? ॥ १-२ ॥

संजय उवाच

सम्पद्रुतः क्रोधविषो व्यादितास्यशरासनः ।
तीक्ष्णधारेषुदशनः शितनाराचदंष्ट्रवान् ॥ ३ ॥
संरम्भामर्षताम्राक्षो महोरग इव श्वसन् ।

**संजयने कहा—**महाराज! उस समय क्रोध और अमर्षसे लाल आँखें किये द्रोणाचार्यने फुफकारते हुए महानागके समान बड़े वेगसे सात्यकिपर धावा किया। क्रोध ही उस महानागका विष था, खींचा हुआ धनुष फैलाये हुए मुखके समान जान पड़ता था, तीखी धारवाले बाण दाँतोंके समान थे और तेज धारवाले नाराच दाढ़ोंका काम देते थे ॥ ३ ½ ॥

नरवीरः प्रमुदितः शोणैरश्वैर्महाजवैः ॥ ४ ॥
उत्पतद्भिरिवाकाशे क्रामद्भिरिव पर्वतम् ।
रुक्मपुङ्खाञ्छरानस्यन् युयुधानमुपाद्रवत् ॥ ५ ॥

हर्षमें भरे हुए नरवीर द्रोणाचार्यने अपने महान् वेगशाली लाल घोड़ोंद्वारा, जो मानो आकाशमें उड़ रहे और पर्वतको लाँघ रहे थे, सुवर्णमय पंखवाले बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ युयुधानपर आक्रमण किया ॥ ४-५ ॥

शरपातमहावर्षं रथघोषबलाहकम् ।
कार्मुकाकर्षविक्षेपं नाराचबहुविद्युतम् ॥ ६ ॥
शक्तिखड्गाशनिधरं क्रोधवेगसमुत्थितम् ।
द्रोणमेघमनावार्यं हयमारुतचोदितम् ॥ ७ ॥

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उस समय द्रोणाचार्य अश्वरूपी वायुसे संचालित अनिवार्य मेघके समान हो रहे थे। बाणोंका प्रहार ही उनके द्वारा की जानेवाली महावृष्टि था। रथकी घर्घराहट ही मेघकी गर्जना थी, धनुषका खींचना ही धारावाहिक वृष्टिका साधन था, बहुत-से नाराच ही विद्युत्के समान प्रकाशित होते थे, उस मेघने खड्ग और शक्तिरूपी अशनिको धारण कर रखा था और क्रोधके वेगसे ही उसका उत्थान हुआ था ॥ ६-७ ॥

दृष्ट्वाभिपतन्तं तं शूरः परपुरंजयः ।
उवाच सूतं शैनेयः प्रहसन् युद्धदुर्मदः ॥ ८ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले रणदुर्मद शूरवीर सात्यकि द्रोणाचार्यको अपने ऊपर आक्रमण करते देख सारथिसे जोर-जोरसे हँसते हुए बोले— ॥ ८ ॥

एनं वै ब्राह्मणं शूरं स्वकर्मण्यनवस्थितम् ।
आश्रयं धार्तराष्ट्रस्य राज्ञो दुःखभयापहम् ॥ ९ ॥
शीघ्रं प्रजवितैरश्वैः प्रत्युद्याहि प्रहृष्टवत् ।
आचार्यं राजपुत्राणां सततं शूरमानिनम् ॥ १० ॥
‘सूत! ये शौर्यसम्पन्न ब्राह्मणदेवता अपने ब्राह्मणोचित कर्ममें स्थिर नहीं हैं। ये धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनके आश्रय होकर उसके दुःख और भयका निवारण करनेवाले हैं। समस्त राजकुमारोंके ये ही आचार्य हैं और सदा अपनेको शूरवीर मानते हैं। तुम प्रसन्नचित्त होकर अपने वेगशाली अश्वोंद्वारा शीघ्र इनका सामना करनेके लिये चलो’ ॥ ९-१० ॥

ततो रजतसंकाशा माधवस्य हयोत्तमाः ।
द्रोणस्याभिमुखाः शीघ्रमगच्छन् वातरंहसः ॥ ११ ॥
तदनन्तर चाँदीके समान श्वेत रंगवाले और वायुके समान वेगशाली सात्यकिके उत्तम घोड़े द्रोणाचार्यके सामने शीघ्रतापूर्वक जा पहुँचे ॥ ११ ॥

ततस्तौ द्रोणशैनेयौ युयुधाते परंतपौ ।
शरैरनेकसाहस्रैस्ताडयन्तौ परस्परम् ॥ १२ ॥
फिर तो शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य और सात्यकि एक-दूसरेपर सहस्रों बाणोंका प्रहार करते हुए युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥

इषुजालावृतं व्योम चक्रतुः पुरुषर्षभौ ।
पूरयामासतुर्वीरावुभौ दश दिशः शरैः ॥ १३ ॥
उन दोनों पुरुषशिरोमणि वीरोंने आकाशको बाणोंके समूहसे आच्छादित कर दिया और दसों दिशाओंको बाणोंसे भर दिया ॥ १३ ॥

मेघाविवातपापाये धाराभिरितरेतरम् ।
न स्म सूर्यस्तदा भाति न ववौ च समीरणः ॥ १४ ॥
जैसे वर्षाकालमें दो मेघ एक-दूसरेपर जलकी धाराएँ गिराते हों, उसी प्रकार वे परस्पर बाण-वर्षा कर रहे थे। उस समय न तो सूर्यका पता चलता था और न हवा ही चलती

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थी ।। १४ ।।
इषुजालावृतं घोरमन्धकारं समन्ततः ।
अनाधृष्यमिवान्येषां शूराणामभवत् तदा ।। १५ ।।
चारों ओर बाणोंका जाल-सा बिछ जानेके कारण वहाँ घोर अन्धकार छा गया था। उस समय अन्य शूरवीरोंका वहाँ पहुँचना असम्भव-सा हो गया ।। १५ ।।
अन्धकारीकृते लोके द्रोणशैनेययोः शरैः ।
तयोः शीघ्रास्त्रविदुषोर्द्रोणसात्वतयोस्तदा ।। १६ ।।
नान्तरं शरवृष्टीनां ददृशे नरसिंहयोः ।
शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेकी कलाको जाननेवाले द्रोणाचार्य तथा सात्वतवंशी सात्यकिके बाणोंसे लोकमें अन्धकार छा जानेपर भी उस समय उन दोनों पुरुषसिंहोंकी बाण-वर्षा में कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ।। १६<sup></sup>/<sub></sub> ।।
इषूणां संनिपातेन शब्दो धाराभिघातजः ।। १७ ।।
शुश्रुवे शक्रमुक्तानामशनीनामिव स्वनः ।
बाणोंके परस्पर टकरानेसे उनकी धारोंके आघात-प्रत्याघातसे जो शब्द होता था, वह इन्द्रके छोड़े हुए वज्रास्त्रोंकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी पड़ता था ।।
नाराचैर्व्यतिविद्धानां शराणां रूपमाबभौ ।। १८ ।।
आशीविषविदष्टानां सर्पाणामिव भारत ।
भरतनन्दन! नाराचोंसे अत्यन्त विद्ध हुए बाणोंका स्वरूप विषधर नागोंके डँसे हुए सर्पोंके समान जान पड़ता था ।। १८<sup></sup>/<sub></sub> ।।
तयोर्ज्यातलनिर्घोषः शुश्रुवे युद्धशौण्डयोः ।। १९ ।।
अजस्रं शैलशृङ्गाणां वज्रेणाहन्यतामिव ।
उन दोनों युद्धकुशल वीरोंके धनुषोंकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि ऐसी सुनायी देती थी, मानो पर्वतोंके शिखरोंपर निरन्तर वज्रसे आघात किया जा रहा हो ।।
उभयोस्तौ रथौ राजंस्ते चाश्वास्तौ च सारथी ।। २० ।।
रुक्मपुङ्खैः शरैश्छिन्नाश्चित्ररूपा बभूवुस्तदा ।
राजन्! उन दोनोंके वे रथ, वे घोड़े और वे सारथि सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर उस समय विचित्ररूपसे सुशोभित हो रहे थे ।। २०<sup></sup>/<sub></sub> ।।
निर्मलानामजिह्मानां नाराचानां विशाम्पते ।। २१ ।।
निर्मुक्ताशीविषाभानां सम्पातोऽभूत् सुदारुणः ।
प्रजानाथ! केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान निर्मल और सीधे जानेवाले नाराचोंका प्रहार वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ।। २१<sup></sup>/<sub></sub> ।।
उभयोः पतिते छत्रे तथैव पतितौ ध्वजौ ।। २२ ।।
उभौ रुधिरसिक्ताङ्गावुभौ च विजयैषिणौ ।

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दोनोंके छत्र कटकर गिर गये, ध्वज धराशायी हो गये और दोनों ही विजयकी अभिलाषा रखते हुए खूनसे लथपथ हो रहे थे ।। २२ १/२ ।। स्रवद्भिः शोणितं गात्रैः प्रसुताविव वारणौ ।। २३ ।। अन्योन्यमभ्यविध्येतां जीवितान्तकरैः शरैः । सारे अंगोंसे रक्तकी धारा बहनेके कारण वे दोनों वीर मदवर्षी गजराजोंके समान जान पड़ते थे। वे एक-दूसरेको प्राणान्तकारी बाणोंसे बेध रहे थे ।। २३ १/२ ।। गर्जितोत्कृष्टसंनादाः शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनाः ।। २४ ।। उपारमन् महाराज व्याजहार न कश्चन । महाराज! उस समय गरजने, ललकारने और सिंहनादके शब्द तथा शंखों और दुन्दुभियोंके घोष बंद हो गये थे। कोई बातचीततक नहीं करता था ।। २४ १/२ ।। तूष्णीम्भूतान्यनीकानि योधा युद्धादुपारमन् ।। २५ ।। ददर्श द्वैरथं ताभ्यां जातकौतूहलो जनः । सारी सेनाएँ मौन थीं, योद्धा युद्धसे विरत हो गये थे, सब लोग कौतूहलवश उन दोनोंके द्वैरथ युद्धका दृश्य देखने लगे ।। २५ १/२ ।। रथिनो हस्तिमन्तारो हयारोहाः पदातयः ।। २६ ।। अवैक्षन्ताचलनैत्रैः परिवार्य नरर्षभौ । रथी, महावत, घुड़सवार और पैदल सभी उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंको घेरकर उन्हें एकटक नेत्रोंसे निहारने लगे ।। हस्त्यनीकान्यतिष्ठन्त तथानीकानि वाजिनाम् ।। २७ ।। तथैव रथवाहिन्यः प्रतिव्यूह्य व्यवस्थिताः । हाथियोंकी सेनाएँ चुपचाप खड़ी थीं, घुड़सवार सैनिकोंकी भी यही दशा थी तथा रथसेनाएँ भी व्यूह बनाकर वहाँ स्थिरभावसे खड़ी थीं ।। २७ १/२ ।। मुक्ताविद्रुमचित्रैश्च मणिकाञ्चनभूषितैः ।। २८ ।। ध्वजैराभरणैश्चित्रैः कवचैश्च हिरण्मयैः । वैजयन्तीपताकाभिः परिस्तोमाङ्ककम्बलैः ।। २९ ।। विमलैर्निशितैः शस्त्रैर्हयानां च प्रकीर्णकैः । जातरूपमयीभिश्च राजतीभिश्च मूर्धसु ।। ३० ।। गजानां कुम्भमालाभिर्दन्तवेष्टैश्च भारत । सबलाकाः सखद्योताः सैरावतशतह्रदाः ।। ३१ ।। अदृश्यन्तोष्णपर्याये मेघानामिव वागुराः ।