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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
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आज यह तुम्हारे बाणोंके मार्गमें आ पहुँचा है। इसे तुम अपनी सफलता समझो; अन्यथा राज्यकी अभिलाषा रखनेवाला राजा दुर्योधन तुम्हारे साथ युद्धभूमिमें कैसे उतर सकता था? ।। ६ ।।

दिष्ट्या त्विदानीं सम्प्राप्त एष ते बाणगोचरम् । यथायं जीवितं जह्यात् तथा कुरु धनंजय ।। ७ ।।

धनंजय! सौभाग्यवश यह दुर्योधन इस समय तुम्हारे बाणोंके पथमें आ गया है। तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे यह अपने प्राणोंको त्याग दे ।। ७ ।।

ऐश्वर्यमदसम्मूढो नैष दुःखमुपेयिवान् । न च ते संयुगे वीर्यं जानाति पुरुषर्षभ ।। ८ ।।

पुरुषरत्न! ऐश्वर्यके घमंडमें चूर रहनेवाले इस दुर्योधनने कभी कष्ट नहीं उठाया है। यह युद्धमें तुम्हारे बल-पराक्रमको नहीं जानता है ।। ८ ।।

त्वां हि लोकास्त्रयः पार्थ ससुरासुरमानुषाः । नोत्सहन्ते रणे जेतुं किमुतैकः सुयोधनः ।। ९ ।।

पार्थ! देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक भी रणक्षेत्रमें तुम्हें जीत नहीं सकते। फिर अकेले दुर्योधनकी तो औकात ही क्या है? ।। ९ ।।

स दिष्ट्या समनुप्राप्तस्तव पार्थ रथान्तिकम् । जह्येनं त्वं महाबाहो यथा वृत्रं पुरंदरः ।। १० ।।

कुन्तीकुमार! सौभाग्यकी बात है कि यह तुम्हारे रथके निकट आ पहुँचा है। महाबाहो! जैसे इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था, उसी प्रकार तुम भी इस दुर्योधनको मार डालो ।। १० ।।

एष ह्यनर्थे सततं पराक्रान्तस्तवानघ । निकृत्या धर्मराजं च द्यूते वञ्चितवानयम् ।। ११ ।।

अनघ! यह सदा तुम्हारा अनर्थ करनेमें ही पराक्रम दिखाता आया है। इसने धर्मराज युधिष्ठिरको जूएमें छल-कपटसे ठग लिया है ।। ११ ।।

बहूनि सुनृशंसानि कृतान्येतेन मानद । युष्मासु पापमतिना अपापेष्वेव नित्यदा ।। १२ ।।

मानद! तुमलोग कभी इसकी बुराई नहीं करते थे, तो भी इस पापबुद्धि दुर्योधनने सदा तुमलोगोंके साथ बहुत-से क्रूरतापूर्ण बर्ताव किये हैं ।। १२ ।।

तमनार्यं सदा क्रुद्धं पुरुषं कामचारिणम् । आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि पार्थविचारयन् ।। १३ ।।

पार्थ! तुम युद्धमें श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय ले बिना किसी सोच-विचारके, सदा क्रोधमें भरे रहनेवाले इस स्वेच्छाचारी दुष्ट पुरुषको मार डालो ।। १३ ।।

निकृत्या राज्यहरणं वनवासं च पाण्डव । परिक्लेशं च कृष्णाया हृदि कृत्वा पराक्रमम् ।। १४ ।।

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पाण्डुनन्दन! दुर्योधनने छलसे तुमलोगोंका राज्य छीन लिया है, तुम्हें जो वनवासका कष्ट भोगना पड़ा है तथा द्रौपदीको जो दुःख और अपमान उठाना पड़ा है—इन सब बातोंको मन-ही-मन याद करके पराक्रम करो ॥ १४ ॥

दिष्ट्यैष तव बाणानां गोचरे परिवर्तते ।
प्रतिघाताय कार्यस्य दिष्ट्या च यततेऽग्रतः ॥ १५ ॥

सौभाग्यसे ही यह दुर्योधन तुम्हारे बाणोंकी पहुँचके भीतर चक्कर लगा रहा है। यह भी भाग्यकी बात है कि यह तुम्हारे कार्यमें बाधा डालनेके लिये सामने आकर प्रयत्नशील हो रहा है ॥ १५ ॥

दिष्ट्या जानाति संग्रामे योद्धव्यं हि त्वया सह ।
दिष्ट्या च सफलाः पार्थ सर्वे कामा ह्यकामिताः ॥ १६ ॥

पार्थ! भाग्यवश समरांगणमें तुम्हारे साथ युद्ध करना यह अपना कर्तव्य समझता है और भाग्यसे ही न चाहनेपर भी तुम्हारे सारे मनोरथ सफल हो रहे हैं ॥ १६ ॥

तस्माज्जहि रणे पार्थ धार्तराष्ट्रं कुलाधमम् ।
यथेन्द्रेण हतः पूर्वं जम्भो देवासुरे मृधे ॥ १७ ॥

कुन्तीकुमार! जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने देवासुर-संग्राममें जन्मका वध किया था, उसी प्रकार तुम रणक्षेत्रमें कुलकलंक धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको मार डालो ॥ १७ ॥

अस्मिन् हते त्वया सैन्यमनाथं भिद्यतामिदम् ।
वैरस्यास्यास्त्ववभृथो मूलं छिन्धि दुरात्मनाम् ॥ १८ ॥

इसके मारे जानेपर अनाथ हुई इस कौरव-सेनाका संहार करो, दुरात्माओंकी जड़ काट डालो, जिससे इस वैररूपी यज्ञका अन्त होकर अवभृथस्नानका अवसर प्राप्त हो ॥ १८ ॥

संजय उवाच

तं तथेत्यब्रवीत् पार्थः कृत्यरूपमिदं मम ।
सर्वमन्यदनादृत्य गच्छ यत्र सुयोधनः ॥ १९ ॥

संजय कहते हैं—राजन्! तब कुन्तीकुमार अर्जुनने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'यह मेरे लिये सबसे महान् कर्तव्य प्राप्त हुआ है। अन्य सब कार्योंकी अवहेलना करके आप वहीं चलिये, जहाँ दुर्योधन खड़ा है ॥ १९ ॥

येनैतद् दीर्घकालं नो भुक्तं राज्यमकण्टकम् ।
अप्यस्य युधि विक्रम्य छिन्द्यां मूर्धानमाहवे ॥ २० ॥

'जिसने दीर्घकालतक हमारे इस अकंटक राज्यका उपभोग किया है, मैं युद्धमें पराक्रम करके उस दुर्योधनका मस्तक काट डालूँगा ॥ २० ॥

अपि तस्य ह्यनर्हायाः परिक्लेशस्य माधव ।
कृष्णायाः शक्नुयां गन्तुं पदं केशप्रधर्षणे ॥ २१ ॥

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‘माधव! जो क्लेश भोगनेके योग्य नहीं है, उस द्रौपदीका केश पकड़कर जो उसे अपमानित किया गया है, उसका बदला इस दुर्योधनको मारकर ही चुका सकता हूँ॥ २१ ॥
(अप्यहं तानि दुःखानि पूर्ववृत्तानि माधव ।
दुर्योधनं रणे हत्वा प्रतिमोक्ष्ये कथंचन ॥)
‘श्रीकृष्ण! समरांगणमें दुर्योधनका वध करके मैं किसी प्रकार उन सभी दुःखोंसे छुटकारा पा जाऊँगा, जो पूर्वकालमें भोगने पड़े हैं’।
इत्येवंवादिनौ कृष्णौ हृष्टौ श्वेतान् हयोत्तमान् ।
प्रेषयामासतुः संख्ये प्रेप्सन्तौ तं नराधिपम् ॥ २२ ॥
इस प्रकारकी बातें करते हुए उन दोनों कृष्णोंने युद्धस्थलमें राजा दुर्योधनको अपना लक्ष्य बनानेके लिये हर्षपूर्वक अपने उत्तम सफेद घोड़ोंको उसकी ओर बढ़ाया ॥ २२ ॥
तयोः समीपं सम्प्राप्य पुत्रस्ते भरतर्षभ ।
न चकार भयं प्राप्ते भये महति मारिष ॥ २३ ॥
आर्य! भरतभूषण! आपके पुत्रने उन दोनोंके समीप पहुँचकर महान् भयका अवसर प्राप्त होनेपर भी भय नहीं माना ॥ २३ ॥
तदस्य क्षत्रियास्तत्र सर्व एवाभ्यपूजयन् ।
यदर्जुनहृषीकेशौ प्रत्युद्यातौ न्यवारयत् ॥ २४ ॥
अपने सामने आये हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनको दुर्योधनने जो रोक दिया, उसके इस कार्यकी वहाँ सभी क्षत्रियोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २४ ॥
ततः सर्वस्य सैन्यस्य तावकस्य विशाम्पते ।
महानादो ह्यभूत् तत्र दृष्ट्वा राजानमाहवे ॥ २५ ॥
प्रजानाथ! युद्धस्थलमें राजा दुर्योधनको उपस्थित देख आपकी सारी सेनामें महान् सिंहनाद होने लगा ॥ २५ ॥
तस्मिन् जनसमुन्नादे प्रवृत्ते भैरवे सति ।
कदर्थीकृत्य ते पुत्रः प्रत्यमित्रमवारयत् ॥ २६ ॥
जिस समय वह भयंकर जन-कोलाहल हो रहा था उसी समय आपके पुत्रने अपने शत्रुको कुछ भी न समझकर आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ २६ ॥
आवारितस्तु कौन्तेयस्तव पुत्रेण धन्विना ।
संरम्भमगमद् भूयः स च तस्मिन् परंतपः ॥ २७ ॥
आपके धनुर्धर पुत्र दुर्योधनद्वारा रोके जानेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुन पुनः उसके ऊपर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ २७ ॥
तौ दृष्ट्वा पतिसंरब्धौ दुर्योधनधनंजयौ ।
अभ्यवैक्षन्त राजानो भीमरूपाः समन्ततः ॥ २८ ॥

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दुर्योधन तथा अर्जुनको परस्पर कुपित देख भयंकर नरेशगण सब ओर खड़े हो चुपचाप देखने लगे ॥ २८ ॥ दृष्ट्वा तु पार्थं संरब्धं वासुदेवं च मारिष । प्रहसन्नेव पुत्रस्ते योद्धुकामः समाह्वयत् ॥ २९ ॥ आर्य! अर्जुन और श्रीकृष्णको अत्यन्त रोषमें भरे देख आपके पुत्रने जोर-जोरसे हँसते हुए ही युद्धकी इच्छासे उन दोनोंको ललकारा ॥ २९ ॥ ततः प्रहृष्टो दाशार्हः पाण्डवश्च धनंजयः । व्यक्रोशेतां महानादं दध्मतुश्चाम्बुजोत्तमौ ॥ ३० ॥ तब हर्षमें भरे हुए श्रीकृष्ण और पाण्डुनन्दन अर्जुनने बड़े जोरसे सिंहनाद किया और अपने उत्तम शंखोंको बजाया ॥ ३० ॥ तौ हृष्टरूपौ सम्प्रेक्ष्य कौरवेयास्तु सर्वशः । निराशाः समपद्यन्त पुत्रस्य तव जीविते ॥ ३१ ॥ उन दोनोंको हर्षोल्लाससे परिपूर्ण देख सम्पूर्ण कौरव-सैनिक आपके पुत्रके जीवनसे निराश हो गये ॥ शोकमापुः परे चैव कुरवः सर्व एव ते । अमन्यन्त च पुत्रं ते वैश्वानरमुखे हुतम् ॥ ३२ ॥ अन्य सब कौरव भी शोकमग्न हो गये और आपके पुत्रको आगके मुखमें होम दिया गया—ऐसा मानने लगे ॥ ३२ ॥ तथा तु दृष्ट्वा योद्धास्ते प्रहृष्टौ कृष्णपाण्डवौ । हतो राजा हतो राजेत्यूचिरे च भयार्दिताः ॥ ३३ ॥ श्रीकृष्ण और अर्जुनको इस प्रकार हर्षमग्न देख आपके समस्त सैनिक भयसे पीड़ित हो ऐसा कहते हुए कोलाहल करने लगे कि 'हाय! राजा दुर्योधन मारे गये, मारे गये' ॥ ३३ ॥ जनस्य संनिनादं तु श्रुत्वा दुर्योधनोऽब्रवीत् । व्येतु वो भीरहं कृष्णौ प्रेषयिष्यामि मृत्यवे ॥ ३४ ॥ लोगोंका वह आर्तनाद सुनकर दुर्योधन बोला—'तुमलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये। मैं इन दोनों कृष्णोंको मृत्युके घर भेज दूँगा' ॥ ३४ ॥ इत्युक्त्वा सैनिकान् सर्वान् जयापेक्षी नराधिपः । पार्थमाभाष्य संरम्भादिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥ अपने सम्पूर्ण सैनिकोंसे ऐसा कहकर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजा दुर्योधनने कुन्तीकुमारको सम्बोधित करके क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा— ॥ ३५ ॥ पार्थ यच्छिक्षितं तेऽस्त्रं दिव्यं पार्थिवमेव च । तद् दर्शय मयि क्षिप्रं यदि जातोऽसि पाण्डुना ॥ ३६ ॥

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‘पार्थ! यदि तुम पाण्डुके बेटे हो तो तुमने जो लौकिक एवं दिव्य अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है, उन सबको मेरे ऊपर शीघ्र दिखाओ ।। ३६ ।।
यद् बलं तव वीर्यं च केशवस्य तथैव च ।
तत् कुरुष्व मयि क्षिप्रं पश्यामस्तव पौरुषम् ।। ३७ ।।
‘तुममें और श्रीकृष्णमें जो बल और पराक्रम हो, उसे मेरे ऊपर शीघ्र प्रकट करो। हम देखते हैं कि तुममें कितना पुरुषार्थ है ।। ३७ ।।
अस्मत्परोक्षं कर्माणि कृतानि प्रवदन्ति ते ।
स्वामिसत्कारयुक्तानि यानि तानीह दर्शय ।। ३८ ।।
‘हमारे परोक्षमें लोग स्वामीके सत्कारसे युक्त तुम्हारे किये हुए जिन कर्मोंका वर्णन करते हैं, उन्हें यहाँ दिखाओ' ।। ३८ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनवचने
द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनवचनविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०२ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३९ श्लोक हैं)

१०३-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

त्र्यधिकशततमोऽध्यायः

दुर्योधन और अर्जुनका युद्ध तथा दुर्योधनकी पराजय

संजय उवाच

एवमुक्त्वार्जुनं राजा त्रिभिर्मर्मातिगैः शरैः ।
अभ्यविध्यन्महावेगैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! अर्जुनसे ऐसा कहकर राजा दुर्योधनने तीन अत्यन्त वेगशाली मर्मभेदी बाणोंद्वारा उन्हें बींध डाला और चार बाणोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ १ ॥

वासुदेवं च दशभिः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ।
प्रतोदं चास्य भल्लेन छित्त्वा भूमावपातयत् ॥ २ ॥
इसी प्रकार दस बाण मारकर उसने श्रीकृष्णकी भी छाती छेद डाली और एक भल्लसे उनके चाबुकको काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ २ ॥

तं चतुर्दशभिः पार्थश्चित्रपुङ्खैः शिलाशितैः ।
अविध्यत् तूर्णमव्यग्रस्ते चाभ्रश्यन्त वर्मणि ॥ ३ ॥
तब व्यग्रतारहित अर्जुनने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए विचित्र पंखवाले चौदह बाणोंद्वारा तुरंत उसे घायल किया; परंतु उनके वे बाण दुर्योधनके कवचपर जाकर फिसल गये ॥ ३ ॥

तेषां नैष्फल्यमालोक्य पुनर्नव च पञ्च च ।
प्राहिणोन्निशितान् बाणांस्ते चाभ्रश्यन्त वर्मणः ॥ ४ ॥
उन्हें निष्फल हुआ देख अर्जुनने पुनः चौदह तीखे बाण चलाये; परंतु वे भी कवचसे फिसल गये ॥ ४ ॥

अष्टाविंशांस्तु तान् बाणानस्तान् विप्रेक्ष्य निष्फलान् ।
अब्रवीत् परवीरघ्नः कृष्णोऽर्जुनमिदं वचः ॥ ५ ॥
अर्जुनके चलाये हुए उन अट्ठाईस बाणोंको निष्फल हुआ देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्रीकृष्णने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

अदृष्टपूर्वं पश्यामि शिलानामिव सर्पणम् ।
त्वया सम्प्रेषिताः पार्थ नार्थं कुर्वन्ति पत्रिणः ॥ ६ ॥
'पार्थ! आज तो मैं प्रस्तरखण्डोंके चलनेके समान ऐसी बात देख रहा हूँ, जिसे पहले कभी नहीं देखा था। तुम्हारे चलाये हुए बाण तो कोई काम नहीं कर रहे हैं ॥ ६ ॥

कच्चिद् गाण्डीवजः प्राणस्तथैव भरतर्षभ ।

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मुष्टिश्च ते यथापूर्वं भुजयोश्च बलं तव ॥ ७ ॥ 'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे गाण्डीव-धनुषकी शक्ति पहले-जैसी ही है न? तुम्हारी मुट्ठी एवं बाहुबल भी पूर्ववत् हैं न? ॥ ७ ॥ न वा कच्चिदयं कालः प्राप्तः स्यादद्य पश्चिमः । तव चैवास्य शत्रोश्च तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ८ ॥ 'आज तुम्हारी और तुम्हारे इस शत्रुकी अन्तिम भेंटका समय नहीं आया है क्या? मैं जो पूछता हूँ, उसका उत्तर दो ॥ ८ ॥ विस्मयो मे महान् पार्थ तव दृष्ट्वा शरानिमान् । व्यर्थान् निपतितान् संख्ये दुर्योधनरथं प्रति ॥ ९ ॥ 'कुन्तीनन्दन! आज युद्धस्थलमें दुर्योधनके रथके पास निष्फल होकर गिरे हुए तुम्हारे इन बाणोंको देखकर मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है ॥ ९ ॥ वज्राशनिसमा घोराः परकायावभेदिनः । शराः कुर्वन्ति ते नार्थं पार्थ काद्य विडम्बना ॥ १० ॥ 'पार्थ! वज्र और अशनिके समान भयंकर तथा शत्रुओंके शरीरको विदीर्ण कर देनेवाले तुम्हारे वे बाण आज कुछ काम नहीं कर रहे हैं, यह कैसी विडम्बना है?' ॥ १० ॥

अर्जुन उवाच

द्रोणेनैषा मतिः कृष्ण धार्तराष्ट्रे निवेशिता । अभेद्या हि ममास्त्राणामेषा कवचधारणा ॥ ११ ॥ अर्जुन बोले— श्रीकृष्ण! मेरा तो यह विश्वास है कि दुर्योधनको द्रोणाचार्यने अभेद्य कवच बाँधकर उसमें यह अद्भुत शक्ति स्थापित कर दी है। यह कवचधारणा मेरे अस्त्रोंके लिये अभेद्य है ॥ ११ ॥ अस्मिन्नन्तर्हितं कृष्ण त्रैलोक्यमपि वर्मणि । एको द्रोणो हि वेदैतदहं तस्माच्च सत्तमात् ॥ १२ ॥ श्रीकृष्ण! इस कवचके भीतर तीनों लोकोंकी शक्ति संनिहित है। एकमात्र आचार्य द्रोण ही इस विद्याको जानते हैं और उन्हीं सद्गुरुसे सीखकर मैं भी इसे जान पाया हूँ ॥ १२ ॥ न शक्यमेतत् कवचं बाणैर्भेत्तुं कथंचन । अपि वज्रेण गोविन्द स्वयं मघवता युधि ॥ १३ ॥ इस कवचको किसी प्रकार बाणोंद्वारा विदीर्ण नहीं किया जा सकता। गोविन्द! युद्धस्थलमें साक्षात् देवराज इन्द्र अपने वज्रसे भी इसका विदारण नहीं कर सकते ॥ १३ ॥ जानंस्त्वमपि वै कृष्ण मां विमोहयसे कथम् । यद् वृत्तं त्रिषु लोकेषु यच्च केशव वर्तते ॥ १४ ॥ तथा भविष्यद् यच्चैव तत् सर्वं विदितं तव ।

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न त्विदं वेद वै कश्चिद् यथा त्वं मधुसूदन ।। १५ ।। श्रीकृष्ण! आप यह सब कुछ जानते हुए भी मुझे मोहमें कैसे डाल रहे हैं? केशव! तीनों लोकोंमें जो बात हो चुकी है, जो हो रही है तथा जो कुछ आगे होनेवाली है, वह सब आपको विदित है। मधुसूदन! इसे आप जैसा जानते हैं, वैसा दूसरा कोई नहीं जानता है ।। १४-१५ ।। एष दुर्योधनः कृष्ण द्रोणेन विहितामिमाम् । तिष्ठत्यभीतवत् संख्ये बिभ्रत् कवचधारणाम् ।। १६ ।। श्रीकृष्ण! द्रोणाचार्यके द्वारा विधिपूर्वक धारण करायी हुई इस कवचधारणाको ग्रहण करके यह दुर्योधन युद्धस्थलमें निर्भय-सा खड़ा है ।। १६ ।। यत्त्वत्र विहितं कार्यं नैष तद् वेत्ति माधव । स्त्रीवदेष बिभर्त्येतां युक्तां कवचधारणाम् ।। १७ ।। माधव! इसे धारण करनेपर जिस कर्तव्यके पालनका विधान किया गया है, उसे यह नहीं जानता है। जैसे स्त्रियाँ गहने पहन लेती हैं, उसी प्रकार यह दूसरेके द्वारा दी हुई इस कवचधारणाको अपनाये हुए है ।। १७ ।। पश्य बाह्वोश्च मे वीर्यं धनुषश्च जनार्दन । पराजयिष्ये कौरव्यं कवचेनापि रक्षितम् ।। १८ ।। जनार्दन! अब आप मेरी भुजाओं और धनुषका बल देखिये। मैं कवचसे सुरक्षित होनेपर भी दुर्योधनको पराजित कर दूँगा ।। १८ ।। इदमङ्गिरसे प्रादाद् देवेशो वर्म भास्वरम् । तस्माद् बृहस्पतिः प्राप ततः प्राप पुरंदरः ।। १९ ।। देवेश्वर! ब्रह्माजीने यह तेजस्वी कवच अंगिराको दिया था। उनसे बृहस्पतिजीने प्राप्त किया था। बृहस्पतिजीसे वह इन्द्रको मिला ।। १९ ।। पुनर्ददौ सुरपतिर्मह्यं वर्म ससंग्रहम् । दैवं यद्यस्य वर्मैतद् ब्रह्मणा वा स्वयं कृतम् ।। २० ।। नैनं गोप्स्यति दुर्बुद्धिमद्य बाणहतं मया । फिर देवराज इन्द्रने विधि एवं रहस्यसहित वह कवच मुझे प्रदान किया। यदि दुर्योधनका यह कवच देवताओंद्वारा निर्मित हो अथवा स्वयं ब्रह्माजीका बनाया हुआ हो तो भी आज मेरे बाणोंद्वारा मारे गये इस दुर्बुद्धि दुर्योधनको यह बचा नहीं सकेगा ।। २० १/२ ।।

संजय उवाच

एवमुक्त्वार्जुनो बाणमभिमन्त्र्य व्यकर्षयत् ।। २१ ।। मानवास्त्रेण मानार्हस्तीक्ष्णावरणभेदिना ।

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**संजय कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर माननीय अर्जुनने कठोर आवरणका भेदन करनेवाले मानवास्त्रसे अपने बाणोंको अभिमन्त्रित करके धनुषकी डोरीको खींचा॥ २१ १/२॥

विकृष्यमाणांस्तेनैव धनुर्मध्यगतान् छरान्॥ २२॥
तानस्यास्त्रेण चिच्छेद द्रौणिः सर्वास्त्रघातिना।
धनुषके बीचमें रखकर अर्जुनके द्वारा खींचे जानेवाले उन बाणोंको अश्वत्थामाने सर्वास्त्रघातक अस्त्रके द्वारा काट डाला॥ २२ १/२॥

तान् निकृत्तानिषून् दृष्ट्वा दूरतो ब्रह्मवादिना॥ २३॥
न्यवेदयत् केशवाय विस्मितः श्वेतवाहनः।
ब्रह्मवादी अश्वत्थामाके द्वारा दूरसे ही काट दिये गये उन बाणोंको देखकर श्वेतवाहन अर्जुन चकित हो उठे और श्रीकृष्णको सूचित करते हुए बोले—॥ २३ १/२॥

नैतदस्त्रं मया शक्यं द्विः प्रयोक्तुं जनार्दन॥ २४॥
अस्त्रं मामेव हन्याद्धि हन्याच्चापि बलं मम।
‘जनार्दन! इस अस्त्रका मैं दो बार प्रयोग नहीं कर सकता; क्योंकि ऐसा करनेपर यह मुझे ही मार डालेगा और मेरी सेनाका भी संहार कर देगा’॥ २४ १/२॥

ततो दुर्योधनः कृष्णौ नवभिर्नवभिः शरैः॥ २५॥
अविध्यत रणे राजन् शरैराशीविषोपमैः।
राजन्! इसी समय दुर्योधनने रणक्षेत्रमें विषधर सर्पके समान भयंकर नौ-नौ बाणोंसे श्रीकृष्ण और अर्जुनको घायल कर दिया॥ २५ १/२॥

भूय एवाभ्यवर्षच्च समरे कृष्णपाण्डवौ॥ २६॥
शरवर्षेण महता ततोऽहृष्यन्त तावकाः।
चक्रुर्वादित्रनिनादान् सिंहनादरवांस्तथा॥ २७॥
उसने समरभूमिमें बड़ी भारी बाण-वर्षा करके श्रीकृष्ण और पाण्डुकुमार धनंजयपर पुनः बाणोंकी झड़ी लगा दी। इससे आपके सैनिक बड़े प्रसन्न हुए। वे बाजे बजाने और सिंहनाद करने लगे॥ २६-२७॥

ततः क्रुद्धो रणे पार्थः सृक्किणी परिसंलिहन्।
नापश्यच्च ततोऽस्याङ्गं यन्न स्याद् वर्मरक्षितम्॥ २८॥
तदनन्तर युद्धस्थलमें कुपित हुए अर्जुन अपने मुँहके कोने चाटने लगे। उन्होंने दुर्योधनका कोई भी ऐसा अंग नहीं देखा, जो कवचसे सुरक्षित न हो॥ २८॥

ततोऽस्य निशितैर्बाणैः सुमुक्तैरन्तकोपमैः।
हयांश्चकार निर्देहानुभौ च पार्ष्णिसारथी॥ २९॥
तदनन्तर अर्जुनने अच्छी तरह छोड़े हुए कालोपम तीखे बाणोंद्वारा दुर्योधनके चारों घोड़ों और दोनों पृष्ठ-रक्षकोंको मार डाला॥ २९॥

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धनुुरस्याच्छिनत् तूर्णं हस्तावापं च वीर्यवान् ।
रथं च शकलीकर्तुं सव्यसाची प्रचक्रमे ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् पराक्रमी सव्यसाची अर्जुनने तुरंत ही उसके धनुष और दस्तानेको काट दिया और रथको टूक-टूक करना आरम्भ किया ॥ ३० ॥

दुर्योधनं च बाणाभ्यां तीक्ष्णाभ्यां विरथीकृतम् ।
आविध्यद्धस्ततलयोरुभयोर्जुनस्तदा ॥ ३१ ॥
उस समय पार्थने रथहीन हुए दुर्योधनकी दोनों हथेलियोंमें दो पैने बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥

प्रयत्नज्ञो हि कौन्तेयो नखमांसान्तरेषुभिः ।
स वेदनाभिराविग्नः पलायनपरायणः ॥ ३२ ॥
उपायको जाननेवाले कुन्तीकुमारने अपने बाणोंद्वारा दुर्योधनके नखोंके मांसमें प्रहार किया। तब वह वेदनासे व्याकुल हो युद्धभूमिसे भाग चला ॥ ३२ ॥

तं कृच्छ्रामापदं प्राप्तं दृष्ट्वा परमधन्विनः ।
समापेतुः परीप्सन्तो धनंजयशरार्दितम् ॥ ३३ ॥
धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए दुर्योधनको भारी विपत्तिमें पड़ा हुआ देख श्रेष्ठ धनुर्धर योद्धा उसकी रक्षाके लिये आ पहुँचे ॥ ३३ ॥

तं रथैर्बहुसाहस्रैः कल्पितैः कुञ्जरैर्हयैः ।
पदात्योधैश्च संरब्धैः परिवव्रुर्धनंजयम् ॥ ३४ ॥
उन्होंने कई हजार रथों, सजे-सजाये हाथियों, घोड़ों तथा रोषमें भरे हुए पैदल सैनिकोंद्वारा अर्जुनको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३४ ॥

अथ नार्जुनगोविन्दौ न रथो वा व्यदृश्यत ।
अस्त्रवर्षेण महता जनौघैश्चापि संवृतौ ॥ ३५ ॥
उस समय बड़ी भारी बाण-वर्षा और जनसमुदायसे घिरे हुए अर्जुन, श्रीकृष्ण और उनका रथ—इनमेंसे कोई भी दिखायी नहीं देता था ॥ ३५ ॥

ततोऽर्जुनोऽस्त्रवीर्येण निजघ्ने तां वरूथिनीम् ।
तत्र व्यङ्गीकृताः पेतुः शतशोऽथ रथद्विपाः ॥ ३६ ॥
तब अर्जुन अपने अस्त्र-बलसे उस कौरव-सेनाका विनाश करने लगे। वहाँ सैकड़ों रथ और हाथी अंग-भंग होनेके कारण धराशायी हो गये ॥ ३६ ॥

ते हता हन्यमानाश्च न्यगृह्णंस्तं रथोत्तमम् ।
स रथस्तम्भितस्तस्थौ क्रोशमात्रे समन्ततः ॥ ३७ ॥
उन हताहत होनेवाले कौरव-सैनिकोंने उत्तम रथी अर्जुनको आगे बढ़नेसे रोक दिया। वे जयद्रथसे एक कोसकी दूरीपर चारों ओरसे रथसेनाद्वारा घिरे हुए खड़े थे ॥ ३७ ॥

ततोऽर्जुनं वृष्णिवीरस्त्वरितो वाक्यमब्रवीत् ।

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धनुर्विस्फारयात्यर्थमहं ध्मास्यामि चाम्बुजम् ॥ ३८ ॥ तब वृष्णिवीर श्रीकृष्णने तुरंत ही अर्जुनसे कहा—‘तुम जोर-जोरसे धनुषको खींचो और मैं अपना शंख बजाऊँगा’ ॥ ३८ ॥

ततो विस्फार्य बलवद् गाण्डीवं जघ्निवान् रिपून् । महता शरवर्षेण तलशब्देन चार्जुनः ॥ ३९ ॥ यह सुनकर अर्जुनने बड़े जोरसे गाण्डीव धनुषको खींचकर हथेलीके चटचट शब्दके साथ भारी बाण-वर्षा करते हुए शत्रुओंका संहार आरम्भ किया ॥ ३९ ॥

पाञ्चजन्यं च बलवान् दध्मौ तारेण केशवः । रजसा ध्वस्तपक्ष्मान्ताः प्रस्विन्नवदनो भृशम् ॥ ४० ॥ बलवान् केशवने उच्च स्वरसे पांचजन्य शंख बजाया। उस समय उनकी पलकें धूलधूसरित हो रही थीं और उनके मुखपर बहुत-सी पसीनेकी बूँदें छा रही थीं ॥ ४० ॥

(तेनाच्युतोष्ठयुगपूरितमारुतेन शंखान्तरोदरविवृद्धविनिःसृतेन । नादेन सासुरवियत्सुरलोकपाल- मुद्विग्नमीश्वर जगत् स्फुटतीव सर्वम् ॥) तस्य शङ्खस्य नादेन धनुषो निःस्वनेन च । निःसत्त्वाश्च ससत्त्वाश्च क्षितौ पेतुस्तदा जनाः ॥ ४१ ॥ ‘नरेश्वर! भगवान् श्रीकृष्णके दोनों ओठोंसे भरी हुई वायु शंखके भीतरी भागमें प्रवेश करके पुष्ट हो जब गम्भीर नादके रूपमें बाहर निकली, उस समय असुरलोक (पाताल), अन्तरिक्ष, देवलोक और लोकपालोंसहित सम्पूर्ण जगत् भयसे उद्विग्न हो विदीर्ण होता-सा जान पड़ा। उस शंखकी ध्वनि और धनुषकी टंकारसे उद्विग्न हो निर्बल और सबल सभी शत्रु-सैनिक उस समय पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४१ ॥

तैर्विमुक्तो रथो रेजे वाय्वीरित इवाम्बुदः । जयद्रथस्य गोप्तारस्ततः क्षुब्धाः सहानुगाः ॥ ४२ ॥ उनके घेरेसे मुक्त हुआ अर्जुनका रथ वायुसंचालित मेघके समान शोभा पाने लगा। इससे जयद्रथके रक्षक सेवकोंसहित क्षुब्ध हो उठे ॥ ४२ ॥

ते दृष्ट्वा सहसा पार्थं गोप्तारः सैन्धवस्य तु । चक्रुर्नादान् महेष्वासाः कम्पयन्तो वसुंधराम् ॥ ४३ ॥ जयद्रथकी रक्षामें नियुक्त हुए महाधनुर्धर वीर सहसा अर्जुनको देखकर पृथ्वीको कँपाते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४३ ॥

बाणशब्दरवांश्चोग्रान् विमिश्रान् शङ्खनिःस्वनैः । प्रादुश्चक्रुर्महात्मानः सिंहनादरवानपि ॥ ४४ ॥

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उन महामनस्वी वीरोंने शंखध्वनिसे मिले हुए बाणजनित भयंकर शब्दों और सिंहनादको भी प्रकट किया ।। ४४ ।। तं श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां समुत्थितम् । प्रदध्मतुः शङ्खवरौ वासुदेवधनंजयौ ॥ ४५ ॥ आपके सैनिकोंद्वारा किये हुए उस भयंकर कोलाहलको सुनकर श्रीकृष्ण और अर्जुनने अपने श्रेष्ठ शंखोंको बजाया ।। ४५ ।। तेन शब्देन महता पूरितेयं वसुंधरा । सशैला सार्णवद्वीपा सपाताला विशाम्पते ॥ ४६ ॥ प्रजानाथ! उस महान् शब्दसे पर्वत, समुद्र, द्वीप और पातालसहित यह सारी पृथ्वी गूँज उठी ।। ४६ ।। स शब्दो भरतश्रेष्ठ व्याप्य सर्वा दिशो दश । प्रतिसस्वान तत्रैव कुरुपाण्डवयोर्र्बले ॥ ४७ ॥ भरतश्रेष्ठ! वह शब्द सम्पूर्ण दसों दिशाओंमें व्याप्त होकर वहीं कौरव-पाण्डव सेनाओंमें प्रतिध्वनित होता रहा ।। तावका रथिनस्तत्र दृष्ट्वा कृष्णधनंजयौ । सम्भ्रमं परमं प्राप्तास्त्वरमाणा महारथाः ॥ ४८ ॥ आपके रथी और महारथी वहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनको उपस्थित देख बड़े भारी उद्वेगमें पड़कर उतावले हो उठे ।। अथ कृष्णौ महाभागौ तावका वीक्ष्य दंशितौ । अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धास्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४९ ॥ आपके योद्धा कवच धारण किये महाभाग श्रीकृष्ण और अर्जुनको आया हुआ देख कुपित हो उनकी ओर दौड़े, यह एक अद्भुत-सी बात हुई ।। ४९ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनपराजयो त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधन-पराजयविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०३ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं)

१०४-

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चतुरधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनका कौरव महारथियोंके साथ घोर युद्ध

संजय उवाच

तावका हि समीक्ष्यैवं वृष्ण्यन्धककुरूत्तमौ ।
प्रागत्वरन् जिघांसन्तस्तथैव विजयः परान् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! आपके सैनिक इस प्रकार वृष्णि और अन्धकवंशके श्रेष्ठ पुरुष श्रीकृष्ण तथा कुरुकुलरत्न अर्जुनको आगे देखकर उनका वध करनेकी इच्छासे उतावले हो उठे। इसी प्रकार अर्जुन भी शत्रुओंके वधकी अभिलाषासे शीघ्रता करने लगे ॥ १ ॥

सुवर्णचित्रैर्वैयाघ्रैः स्वनवद्भिर्महारथैः ।
दीपयन्तो दिशः सर्वा ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥ २ ॥
वे कौरव-सैनिक व्याघ्रचर्मसे आच्छादित सुवर्णजटित और गम्भीर घोष करनेवाले प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी विशाल रथोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥ २ ॥

रुक्मपुङ्खैश्च दुष्प्रेक्ष्यैः कार्मुकैः पृथिवीपते ।
कूजद्भिरतुलान् नादान् कोपितैस्तुरगैरिव ॥ ३ ॥
पृथ्वीपते! वे सोनेके पंखवाले दुर्लक्ष्य बाणों और क्रोधमें भरे हुए घोड़ोंके समान अनुपम टंकारध्वनि करनेवाले धनुषोंके द्वारा भी समस्त दिशाओंमें दीप्ति बिखेर रहे थे ॥ ३ ॥

भूरिश्रवाः शलः कर्णो वृषसेनो जयद्रथः ।
कृपश्च मद्रराजश्च द्रौणिश्च रथिनां वरः ॥ ४ ॥
ते पिबन्त इवाकाशमश्वैरष्टौ महारथाः ।
व्यराजयन् दश दिशो वैयाघ्रैर्हेमचन्द्रकैः ॥ ५ ॥
भूरिश्रवा, शल, कर्ण, वृषसेन, जयद्रथ, कृपाचार्य, मद्रराज शल्य तथा रथियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा—ये आठ महारथी व्याघ्रचर्मद्वारा आच्छादित तथा सुवर्णमय चन्द्रचिह्नोंसे विभूषित अश्वोंद्वारा आकाशको पीते हुए-से दसों दिशाओंको सुशोभित कर रहे थे ॥ ४-५ ॥

ते दंशिताः सुसंरब्धा रथैर्मेघौघनिःस्वनैः ।
समावृण्वन् दश दिशः पार्थस्य निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
कौलूतका हयाश्चित्रा वहन्तस्तान् महारथान् ।
व्यशोभन्त तदा शीघ्रा दीपयन्तो दिशो दश ॥ ७ ॥

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रोषमें भरे हुए उन कवचधारी वीरोंने मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले रथों और पैने बाणोंद्वारा अर्जुनकी दसों दिशाओंको आच्छादित कर दिया। कुलूतदेशके विचित्र एवं शीघ्रगामी घोड़े उस समय उन महारथियोंके वाहन बनकर दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ।। ६-७ ।।

आजानेयैर्महावेगैर्नानादेशसमुत्थितैः ।
पर्वतीयैर्नदीजैश्च सैन्धवैश्च हयोत्तमैः ।। ८ ।।
कुरुयोधवरा राजंस्तव पुत्रं परीप्सवः ।
धनंजयरथं शीघ्रं सर्वतः समुपाद्रवन् ।। ९ ।।

राजन्! नाना देशोंमें उत्पन्न महान् वेगशाली आजानेय³, पर्वतीय³ (पहाड़ी), नदीज³ (दरियाई) तथा सिंधुदेशीय उत्तम घोड़ोंद्वारा आपके पुत्रकी रक्षाके लिये उत्सुक हुए श्रेष्ठ कौरवयौद्धा सब ओरसे शीघ्र ही अर्जुनके रथपर टूट पड़े ।। ८-९ ।।

ते प्रगृह्य महाशङ्खान् दध्मुः पुरुषसत्तमाः ।
पूरयन्तो दिवं राजन् पृथिवीं च ससागराम् ।। १० ।।

नरेश्वर! उन पुरुषप्रवर योद्धाओंने समुद्रसहित पृथ्वी और आकाशको शब्दोंसे व्याप्त करते हुए बड़े-बड़े शंख लेकर बजाये ।। १० ।।

तथैव दध्मतुः शङ्खौ वासुदेवधनंजयौ ।
प्रवरौ सर्वदेवानां सर्वशङ्खवरौ भुवि ।। ११ ।।

इसी प्रकार सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन भूतलके समस्त शंखोंमें उत्तम अपने दिव्य शंख बजाने लगे ।। ११ ।।

देवदत्तं च कौन्तेयः पाञ्चजन्यं च केशवः ।
शब्दस्तु देवदत्तस्य धनंजयसमीरितः ।। १२ ।।
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिशश्चैव समावृणोत् ।

कुन्तीकुमार अर्जुनने देवदत्त नामक शंख बजाया और श्रीकृष्णने पांचजन्य। धनंजयके बजाये हुए देवदत्तका शब्द पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हो गया ।। १२ ½ ।।

तथैव पाञ्चजन्योऽपि वासुदेवसमीरितः ।। १३ ।।
सर्वशब्दानतिक्रम्य पूरयामास रोदसी ।

इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके बजाये हुए पांचजन्यने भी सम्पूर्ण शब्दोंको दबाकर अपनी ध्वनिसे पृथ्वी और आकाशको भर दिया ।। १३ ½ ।।

तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे नादसंकुले ।। १४ ।।
भीरूणां त्रासजनने शूराणां हर्षवर्धने ।
प्रवादितासु भेरीषु झर्झरिष्वानकेषु च ।। १५ ।।

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मृदङ्गेष्वपि राजेन्द्र वाद्यमानेष्वनेकशः ।
महारथाः समाख्याता दुर्योधनहितैषिणः ॥ १६ ॥
अमृष्यमाणास्तं शब्दं क्रुद्धाः परमधन्विनः ।
नानादेश्या महीपालाः स्वसैन्यपरिरक्षिणः ॥ १७ ॥
अमर्षिता महाशङ्खान् दध्मुर्वीरा महारथाः ।
कृते प्रतिकरिष्यन्तः केशवस्यार्जुनस्य च ॥ १८ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार जब वहाँ भयंकर शब्द व्याप्त हो गया, जो कायरोंको डराने और शूरवीरोंके हर्षको बढ़ानेवाला था, जब मेरी, झाँझ, ढोल और मृदंग आदि अनेक प्रकारके बाजे बजने और बजाये जाने लगे, उस समय दुर्योधनका हित चाहनेवाले विख्यात महारथी उस शब्दको न सह सकनेके कारण कुपित हो उठे। वे नाना देशोंमें उत्पन्न वीर, महारथी, महाधनुर्धर महीपाल, जो अपनी सेनाका संरक्षण कर रहे थे, अमर्षमें भरकर बड़े-बड़े शंख बजाने लगे; वे श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रत्येक कार्यका बदला चुकानेको उद्यत थे ॥ १४—१८ ॥
बभूव तव तत् सैन्यं शङ्खशब्दसमीरितम् ।
उद्विग्नरथनागाश्वमस्वस्थमिव वा विभो ॥ १९ ॥
प्रभो! आपकी वह सेना शंखके शब्दसे व्याप्त होनेके कारण अस्वस्थ-सी दिखायी देती थी। उसके हाथी, घोड़े और रथी सभी उद्विग्न हो उठे थे ॥ १९ ॥
तत् प्रविद्धमिवाकाशं शूरैः शङ्खविनादितम् ।
बभूव भृशमुद्विग्नं निर्घातैरिव नादितम् ॥ २० ॥
शूरवीरोंने शंखध्वनिसे आकाशको विद्ध-सा कर डाला। वह वज्रकी गड़गड़ाहटसे व्याप्त-सा होकर अत्यन्त उद्वेगजनक हो गया ॥ २० ॥
स शब्दःसुमहान् राजन् दिशः सर्वा व्यनादयत् ।
त्रासयामास तत् सैन्यं युगान्त इव सम्भृतः ॥ २१ ॥
राजन्! प्रलयकालके समान सब ओर फैला हुआ वह महान् शब्द सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने और आपकी सेनाको डराने लगा ॥ २१ ॥
ततो दुर्योधनोऽष्टौ च राजानस्ते महारथाः ।
जयद्रथस्य रक्षार्थं पाण्डवं पर्यवारयन् ॥ २२ ॥
तदनन्तर दुर्योधन तथा आठ महारथी नरेशोंने जयद्रथकी रक्षाके लिये अर्जुनको घेर लिया ॥ २२ ॥
ततो द्रौणिस्त्रिसप्तत्या वासुदेवमताडयत् ।
अर्जुनं च त्रिभिर्भल्लैर्ध्वजमश्वांश्च पञ्चभिः ॥ २३ ॥
उस समय अश्वत्थामाने भगवान् श्रीकृष्णको तिहत्तर बाण मारे, तीन भल्लोंसे अर्जुनको चोट पहुँचायी और पाँचसे उनके ध्वज एवं घोड़ोंको घायल कर दिया ॥ २३ ॥

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तमर्जुनः पृषत्कानां शतैः षड्भिरताडयत् ।
अत्यर्थमिव संक्रुद्धः प्रतिविद्धे जनार्दने ॥ २४ ॥
श्रीकृष्णके घायल हो जानेपर अर्जुन अत्यन्त कुपित हो उठे। उन्होंने छः सौ बाणोंद्वारा अश्वत्थामाको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २४ ॥

कर्णं च दशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं त्रिभिस्तथा ।
शल्यस्य सशरं चापं मुष्टौ चिच्छेद वीर्यवान् ॥ २५ ॥
फिर पराक्रमी अर्जुनने दस बाणोंसे कर्णको और तीन बाणोंद्वारा वृषसेनको घायल करके राजा शल्यके बाणसहित धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला ॥ २५ ॥

गृहीत्वा धनुरन्यत् तु शल्यो विव्याध पाण्डवम् ।
भूरिश्रवास्त्रिभिर्बाणैर्हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ २६ ॥
तब शल्यने दूसरा धनुष हाथमें लेकर पाण्डुपुत्र अर्जुनको बींध डाला। भूरिश्रवाने सानपर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तीन बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया ॥ २६ ॥

कर्णो द्वात्रिंशता चैव वृषसेनश्च सप्तभिः ।
जयद्रथस्त्रिसप्तत्या कृपश्च दशभिः शरैः ॥ २७ ॥
मद्रराजश्च दशभिर्विव्याधुः फाल्गुनं रणे ।
फिर कर्णने बत्तीस, वृषसेनने सात, जयद्रथने तिहत्तर, कृपाचार्यने दस तथा मद्रराज शल्यने भी दस बाण मारकर रणक्षेत्रमें अर्जुनको बींध डाला ॥ २७ १/२ ॥

ततः शराणां षष्ट्या तु द्रौणिः पार्थमवाकिरत् ॥ २८ ॥
वासुदेवं च विंशत्या पुनः पार्थं च पञ्चभिः ।
तत्पश्चात् अश्वत्थामाने अर्जुनपर साठ बाण बरसाये, फिर श्रीकृष्णको बीस और अर्जुनको भी पाँच बाण मारे ॥ २८ १/२ ॥

प्रहसंस्तु नरव्याघ्रः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ॥ २९ ॥
प्रत्यविध्यत् स तान् सर्वान् दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
तब श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, उन श्वेतवाहन पुरुषसिंह अर्जुनने जोर-जोरसे हँसते और हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए उन सबको बींधकर बदला चुकाया ॥ २९ १/२ ॥

कर्णं द्वादशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं त्रिभिः शरैः ॥ ३० ॥
शल्यस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे व्यकृन्तत ।
कर्णको बारह और वृषसेनको तीन बाणोंसे घायल करके राजा शल्यके बाणसहित धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे पुनः काट डाला ॥ ३० १/२ ॥

सौमदत्तिं त्रिभिर्विद्ध्वा शल्यं च दशभिः शरैः ॥ ३१ ॥
शितैरग्निशिखाकारैर्द्रौणिं विव्याध चाष्टभिः ।
इसके बाद भूरिश्रवाको तीन और शल्यको दस बाणोंसे बींधकर अग्निकी ज्वालाके समान आकारवाले आठ तीखे बाणोंद्वारा अश्वत्थामाको घायल कर दिया ॥

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गौतमं पञ्चविंशत्या सैन्धवं च शतेन ह ॥ ३२ ॥
पुनर्द्रोणिं च सप्तत्या शराणां सोऽभ्यताडयत् ।
तत्पश्चात् कृपाचार्यको पचीस, जयद्रथको सौ तथा अश्वत्थामाको पुनः उन्होंने सत्तर बाण मारे ॥ ३२ १/२ ॥
भूरिश्रवास्तु संक्रुद्धः प्रतोदं चिच्छिदे हरेः ॥ ३३ ॥
अर्जुनं च त्रिसप्तत्या बाणानामाजघान ह ॥ ३४ ॥
भूरिश्रवाने कुपित होकर श्रीकृष्णका चाबुक काट डाला और अर्जुनको तिहत्तर बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३३-३४ ॥
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैस्तानरीन् श्वेतवाहनः ।
प्रत्यषेधद् द्रुतं क्रुद्धो महावातो घनानिव ॥ ३५ ॥
तदनन्तर जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार श्वेतवाहन अर्जुनने कुपित हो सैकड़ों तीखे बाणोंद्वारा उन शत्रुओंको तुरंत पीछे हटा दिया ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि संकुलयुद्धे चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥


<u>१.</u> आजानेयका लक्षण इस प्रकार है—गुड़गन्धाः काये ये सुश्लक्ष्णाः कान्तितो जितक्रोधाः । सारयुता जितेन्द्रियाः क्षुत्तृडाहितं चापि नो दुःखम् ।। जानन्त्याजानेया निर्दिष्टा वाजिनो धीरैः । अर्थात् जिनके शरीरसे गुड़की-सी गन्ध आती हो, जो कान्तिसे अत्यन्त चिकने और चमकीले जान पड़ते हों, क्रोधको जीत चुके हों, बलवान् और जितेन्द्रिय हों तथा भूख-प्यासके कष्टका अनुभव न करते हों, उन घोड़ोंको धीर पुरुषोंने ‘आजानेय’ कहा है।
<u>२.</u> पर्वतीय घोड़ोंका लक्षण यों होना चाहिये—वाहास्तु पर्वतीया बलान्विताः स्निग्धकेशाश्च वृत्तखुरा दृढ़पादा महाजवास्तेऽतिविख्याताः । अर्थात् अत्यन्त विख्यात ‘पर्वतीय’ घोड़े बलवान् होते हैं, उनके बाल चिकने, टाप गोल, पैर सुदृढ़ और वेग महान् होते हैं।
<u>३.</u> नदीज या दरियाई घोड़ोंका लक्षण इस प्रकार है—अश्वाः सकर्णिकाराः क्वचन नदीतीरजाः समुद्दिष्टाः । पूर्वार्धेषूद्ग्राः पश्चार्धे चानताः किंचित् । कहीं नदीके तटपर उत्पन्न हुए कनेरयुक्त अश्व ‘नदीज’ कहलाते हैं। वे आगेके आधे शरीरसे ऊँचे और पिछले आधे शरीरसे कुछ नीचे होते हैं।

अर्जुन तथा कौरव-महारथियोंके ध्वजोंका वर्णन और नौ महारथियोंके साथ अकेले अर्जुनका युद्ध

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पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुन तथा कौरव-महारथियोंके ध्वजोंका वर्णन और नौ महारथियोंके साथ अकेले अर्जुनका युद्ध

धृतराष्ट्र उवाच

ध्वजान् बहुविधाकारान् भ्राजमानानति श्रिया ।
पार्थानां मामकानां च तान् ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! मेरे तथा कुन्तीके पुत्रोंके जो नाना प्रकारके ध्वज अत्यन्त शोभासे उद्भासित हो रहे थे, उनका मुझसे वर्णन करो ॥ १ ॥

संजय उवाच

ध्वजान् बहुविधाकारान् शृणु तेषां महात्मनाम् ।
रूपतो वर्णतश्चैव नामतश्च निबोध मे ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! उन महामनस्वी वीरोंके जो नाना प्रकारकी आकृतिवाले ध्वज फहरा रहे थे, उनका रूप-रंग और नाम मैं बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २ ॥

तेषां तु रथमुख्यानां रथेषु विविधा ध्वजाः ।
प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र ज्वलिता इव पावकाः ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! उन श्रेष्ठ महारथियोंके रथोंपर भाँति-भाँतिके ध्वज प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी दिखायी देते थे ॥ ३ ॥

काञ्चनाः काञ्चनापीडाः काञ्चनस्रगलंकृताः ।
काञ्चनानीव शृङ्गाणि काञ्चनस्य महागिरेः ॥ ४ ॥
वे ध्वज सोनेके बने थे। उनके ऊपरी भागको सुवर्णसे ही सजाया गया था। सोनेकी ही मालाओंसे वे अलंकृत थे। अतः सुवर्णमय महापर्वत सुमेरुके स्वर्णमय शिखरोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ४ ॥

अनेकवर्णा विविधा ध्वजाः परमशोभनाः ।
ते ध्वजाः संवृतास्तेषां पताकाभिः समन्ततः ॥ ५ ॥
नानावर्णविरागाभिः शुशुभुः सर्वतो वृताः ।
वे परम शोभासम्पन्न अनेक प्रकारके बहुरंगे ध्वज सब ओरसे नाना रंगकी पताकाओंद्वारा घिरकर बड़ी शोभा पाते थे ॥ ५ ½ ॥

पताकाश्च ततस्तास्तु श्वसनेन समीरिताः ॥ ६ ॥
नृत्यमाना व्यदृश्यन्त रङ्गमध्ये विलासिकाः ।

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उनकी वे पताकाएँ वायुसे संचालित हो रंगमंचपर नृत्य करनेवाली विलासिनियोंके समान दिखायी देती थीं ॥ इन्द्रायुधसवर्णाभाः पताका भरतर्षभ ।। ७ ।। दोधूयमाना रथिनां शोभयन्ति महारथान् । भरतश्रेष्ठ! इन्द्रधनुषके समान प्रभाव़ाली फहराती हुई पताकाएँ रथियोंके विशाल रथोंकी शोभा बढ़ाती थीं ।। सिंहलाङ्गूलमुग्रास्यं ध्वजं वानरलक्षणम् ।। ८ ।। धनंजयस्य संग्रामे प्रत्यदृश्यत भैरवम् । उस संग्राममें अर्जुनका भयंकर ध्वज वानरके चिह्नसे सुशोभित दिखायी देता था। उस वानरकी पूँछ सिंहके समान थी और उसका मुख बड़ा ही उग्र था ।। ८ १/२ ।। स वानरवरो राजन् पताकाभिरलंकृतः ।। ९ ।। त्रासयामास तत् सैन्यं ध्वजो गाण्डीवधन्वनः । राजन्! श्रेष्ठ वानरसे सुशोभित तथा पताकाओंसे अलंकृत गाण्डीवधारी अर्जुनका वह ध्वज आपकी उस सेनाको भयभीत किये देता था ।। ९ १/२ ।। तथैव सिंहलाङ्गूलं द्रोणपुत्रस्य भारत ।। १० ।। ध्वजाग्रं समपश्याम बालसूर्यसमप्रभम् । भारत! इसी प्रकार हमलोगोंने द्रोणपुत्र अश्वत्थामा-के श्रेष्ठ ध्वजको प्रातःकालीन सूर्यके समान अरुण कान्तिसे प्रकाशित देखा था। उसमें सिंहकी पूँछका चिह्न था ।। १० १/२ ।। काञ्चनं पवनोद्धूतं शक्रध्वजसमप्रभम् ।। ११ ।। नन्दनं कौरवेन्द्राणां द्रौणेर्लक्ष्म समुच्छ्रितम् । अश्वत्थामाका इन्द्रध्वजके समान प्रकाशमान सुवर्णमय ऊँचा ध्वज वायुकी प्रेरणासे फहराता हुआ कौरव-नरेशोंका आनन्द बढ़ा रहा था ।। ११ १/२ ।। हस्तिकक्ष्या पुनर्हैमी बभूवाधिरथेर्ध्वजः ।। १२ ।। आहवे खं महाराज ददृशे पूरयन्निव । अधिरथपुत्र कर्णका ध्वज हाथीकी सुवर्णमयी रस्सीके चिह्नसे युक्त था। महाराज! वह संग्राममें आकाशको भरता हुआ-सा दिखायी देता था ।। १२ १/२ ।। पताका काञ्चनी स्रग्वी ध्वजे कर्णस्य संयुगे ।। १३ ।। नृत्यतीव रथोपस्थे श्वसनेन समीरिता । युद्धस्थलमें कर्णके ध्वजपर सुवर्णमयी मालासे विभूषित पताका वायुसे आन्दोलित हो रथकी बैठकपर नृत्य-सा कर रही थी ।। १३ १/२ ।। आचार्यस्य तु पाण्डूनां ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।। १४ ।।

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गोवृषो गौतमस्यासीत् कृपस्य सुपरिष्कृतः । स तेन भ्राजते राजन् गोवृषेण महारथः ॥ १५ ॥ त्रिपुरघ्नरथो यद्वद् गोवृषेण विराजता । पाण्डवोंके आचार्य, तपस्वी ब्राह्मण, गौतमगोत्रीय कृपाचार्यके ध्वजपर एक बैलका सुन्दर चिह्न अंकित था। राजन्! उनका वह विशाल रथ उस वृषभचिह्नसे बड़ी शोभा पा रहा था; ठीक उसी तरह, जैसे त्रिपुरनाशक महादेवजीका रथ सुन्दर वृषभचिह्नसे शोभायमान होता था ॥ १४-१५ १/२ ॥

मयूरो वृषसेनस्य काञ्चनो मणिरत्नवान् ॥ १६ ॥ व्याहरिष्यन्निवातिष्ठत् सेनाग्रमुपशोभयन् । वृषसेनका मणिरत्नविभूषित सुवर्णमय ध्वज मयूर-चिह्नसे युक्त था। वह मयूर सेनाके अग्रभागकी शोभा बढ़ाता हुआ इस प्रकार खड़ा था, मानो बोल देगा ॥ १६ १/२ ॥

तेन तस्य रथो भाति मयूरेण महात्मनः ॥ १७ ॥ यथा स्कन्दस्य राजेन्द्र मयूरेण विराजता । राजेन्द्र! जैसे स्वामी स्कन्दका रथ सुन्दर मयूर-चिह्नसे शोभित होता है, उसी प्रकार महामना वृषसेनका रथ उस मयूरचिह्नसे शोभा पा रहा था ॥ १७ १/२ ॥

मद्रराजस्य शल्यस्य ध्वजाग्रेऽग्निशिखामिव ॥ १८ ॥ सौवर्णीं प्रतिपश्याम सीतामप्रतिमां शुभाम् । मद्रराज शल्यकी ध्वजाके अग्रभागमें हमने अग्निशिखाके समान उज्ज्वल, सुवर्णमय, अनुपम तथा शुभ लक्षणोंसे युक्त एक सीता (हलसे भूमिपर खींची हुई रेखा) देखी थी ॥ १८ १/२ ॥

सा सीता भ्राजते तस्य रथमास्थाय मारिष ॥ १९ ॥ सर्वबीजविरूढेव यथा सीता श्रिया वृता । माननीय नरेश! जैसे खेतमें हलकी नोकसे बनी हुई रेखा सभी बीजोंके अंकुरित होनेपर शोभासम्पन्न दिखायी देती है, उसी प्रकार मद्रराजके रथका आश्रय ले वह सीता (हलद्वारा बनी हुई रेखा) बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १९ १/२ ॥

वराहः सिन्धुराजस्य राजतोऽभिविराजते ॥ २० ॥ ध्वजाग्रेऽलोहितार्काभो हेमजालपरिष्कृतः । सिन्धुराज जयद्रथकी ध्वजाके अग्रभागमें उज्ज्वल सूर्यके समान श्वेत कान्तिमान् और सोनेकी जालीसे विभूषित चाँदीका बना हुआ वराहचिह्न अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ २० १/२ ॥

शुशुभे केतुना तेन राजतेन जयद्रथः ॥ २१ ॥ यथा देवासुरे युद्धे पुरा पूषा स्म शोभते ।