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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
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तं कथं सूतपुत्रं तु भीमोऽयोधयताहवे ॥ ७ ॥ पहले जिस महाबाहु महामना राधानन्दन कर्णके बल-पराक्रमका नित्य चिन्तन करते हुए राजा युधिष्ठिर भयके मारे बहुत वर्षोंतक नींद नहीं लेते थे, उसी सूतपुत्र कर्णके साथ भीमसेनने समरभूमिमें किस तरह युद्ध किया? ॥ ७ ॥

ब्रह्मण्यं वीर्यसम्पन्नं समरेष्वनिवर्तिनम् । कथं कर्णं युधां श्रेष्ठं योधयामास पाण्डवः ॥ ८ ॥ जो ब्राह्मणभक्त, पराक्रमसम्पन्न और समरभूमिमें कभी पीछे न हटनेवाला है, योद्धाओंमें श्रेष्ठ उस कर्णके साथ भीमसेनने किस प्रकार युद्ध किया? ॥ ८ ॥

यौ तौ समीयतुर्वीरौ वैकर्तनवृकोदरौ । कथं तावत्र युध्येतां महाबलपराक्रमौ ॥ ९ ॥ जो वीर पहले आपसमें भिड़ चुके थे, वे ही महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न कर्ण और भीमसेन यहाँ पुनः कैसे युद्धमें प्रवृत्त हुए? ॥ ९ ॥

भ्रातृत्वं दर्शितं पूर्वं घृणी चापि स सूतजः । कथं भीमेन युयुधे कुन्त्या वाक्यमनुस्मरन् ॥ १० ॥ पहले तो सूतपुत्र कर्णने अर्जुनके सिवा अन्य पाण्डवोंके प्रति बन्धुत्व दिखाया था और वह दयालु भी है ही, तथापि कुन्तीके वचनोंको बारंबार स्मरण करते हुए भी उसने भीमसेनके साथ कैसे युद्ध किया? ॥ १० ॥

भीमो वा सूतपुत्रेण स्मरन् वैरं पुरा कृतम् । अयुध्यत कथं शूरः कर्णेन सह संयुगे ॥ ११ ॥ अथवा शूरवीर भीमसेनने पहलेके किये हुए वैरका स्मरण करके सूतपुत्र कर्णके साथ उस रणक्षेत्रमें किस प्रकार युद्ध किया? ॥ ११ ॥

आशास्ते च सदा सूत पुत्रो दुर्योधनो मम । कर्णो जेष्यति संग्रामे समस्तान् पाण्डवानिति ॥ १२ ॥ संजय! मेरा बेटा दुर्योधन सदा यही आशा करता है कि कर्ण संग्राममें समस्त पाण्डवोंको जीत लेगा ॥ १२ ॥

जयाशा यत्र पुत्रस्य मम मन्दस्य संयुगे । स कथं भीमकर्माणं भीमसेनमयोधयत् ॥ १३ ॥ युद्धस्थलमें जिसके ऊपर मेरे मूर्ख पुत्रकी विजयकी आशा लगी हुई है, उस कर्णने भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनके साथ किस प्रकार युद्ध किया? ॥ १३ ॥

यं समासाद्य पुत्रैर्मे कृतं वैरं महारथैः । तं सूततनयं तात कथं भीमो ह्ययोधयत् ॥ १४ ॥ तात! जिसका आश्रय लेकर मेरे पुत्रोंने महारथी पाण्डवोंके साथ वैर ठाना है, उस सूतपुत्र कर्णके साथ भीमसेनने किस प्रकार युद्ध किया? ॥ १४ ॥

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अनेकान् विप्रकारांश्च सूतपुत्रसमुद्भवान् । स्मरमाणः कथं भीमो युयुधे सूतसूनुना ॥ १५ ॥ सूतपुत्रके द्वारा किये गये अनेक अपकारोंको स्मरण करके भीमसेनने उसके साथ किस तरह युद्ध किया? ।। १५ ।। योऽजयत् पृथिवीं सर्वां रथेनैकेन वीर्यवान् । तं सूततनयं युद्धे कथं भीमो ह्ययोधयत् ॥ १६ ॥ जिस पराक्रमी वीरने एकमात्र रथकी सहायतासे सारी पृथ्वीको जीत लिया, उस सूतपुत्रके साथ रणभूमिमें भीमसेनने किस तरह युद्ध किया? ।। १६ ।। यो जातः कुण्डलाभ्यां च कवचेन सहैव च । तं सूतपुत्रं समरे भीमः कथमयोधयत् ॥ १७ ॥ जो जन्मसे ही कवच और कुण्डलोंके साथ उत्पन्न हुआ था, उस सूतपुत्रके साथ समरांगणमें भीमसेनने किस प्रकार युद्ध किया? ।। १७ ।। यथा तयोर्युद्धमभूद् यश्चासीद् विजयी तयोः । तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि संजय ॥ १८ ॥ संजय! उन दोनों वीरोंमें जिस प्रकार युद्ध हुआ और उनमेंसे जिस एकको विजय प्राप्त हुई, उसका वह सब समाचार मुझे ठीक-ठीक बताओ; क्योंकि तुम इस कार्यमें कुशल हो ।। १८ ।।

संजय उवाच

भीमसेनस्तु राधेयमुत्सृज्य रथिनां वरम् । इयेष गन्तुं यत्रास्तां वीरौ कृष्णधनंजयौ ॥ १९ ॥ संजयने कहा—राजन्! भीमसेनने रथियोंमें श्रेष्ठ राधापुत्र कर्णको छोड़कर वहाँ जानेकी इच्छा की जहाँ वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन विद्यमान थे ।। १९ ।। तं प्रयान्तमभिद्रुत्य राधेयः कङ्कपत्रिभिः । अभ्यवर्षन्महाराज मेघो वृष्ट्येव पर्वतम् ॥ २० ॥ महाराज! वहाँसे जाते हुए भीमसेनपर आक्रमण करके राधापुत्र कर्णने उनके ऊपर कंकपत्रयुक्त बाणोंकी उसी प्रकार वर्षा आरम्भ कर दी, जैसे बादल पर्वतपर जलकी वर्षा करता है ।। २० ।। फुल्लता पङ्कजेनेव वक्त्रेण विहसन् बली । आजुहाव रणे यान्तं भीममाधिरथिस्तदा ॥ २१ ॥ बलवान् अधिरथपुत्रने खिलते हुए कमलके समान मुखसे हँसकर जाते हुए भीमसेनको युद्धके लिये ललकारा ।। २१ ।।

कर्ण उवाच

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भीमाहितैस्तव रणे स्वप्नेऽपि न विभावितम् । तद् दर्शयसि कस्मान्मे पृष्ठं पार्थदिदृक्षया ॥ २२ ॥ कर्णने कहा— भीमसेन! तुम्हारे शत्रुओंने स्वप्नमें भी यह नहीं सोचा था कि तुम युद्धमें पीठ दिखाओगे; परंतु इस समय अर्जुनसे मिलनेके लिये तुम मुझे पीठ क्यों दिखा रहे हो? ॥ २२ ॥

कुन्त्याः पुत्रस्य सदृशं नेदं पाण्डवनन्दन । तेन मामभितः स्थित्वा शरवर्षैरवाकिर ॥ २३ ॥ पाण्डवनन्दन! तुम्हारा यह कार्य कुन्तीके पुत्रके योग्य नहीं है। अतः मेरे सम्मुख रहकर मुझपर बाणोंकी वर्षा करो ॥ २३ ॥

भीमसेनस्तदाह्वानं कर्णान्नामर्षयद् युधि । अर्धमण्डलमावृत्य सूतपुत्रमयोधयत् ॥ २४ ॥ कर्णकी ओरसे रणक्षेत्रमें वह युद्धकी ललकार भीमसेन न सह सके। उन्होंने अर्धमण्डल गतिसे घूमकर सूतपुत्रके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ २४ ॥

अवक्रगामिभिर्बाणैरभ्यवर्षन्महायशाः । दंशितं द्वैरथे यत्तं सर्वशस्त्रविशारदम् ॥ २५ ॥ महायशस्वी भीमसेन सम्पूर्ण शस्त्रोंके चलानेमें निपुण, कवचधारी तथा द्वैरथ युद्धके लिये तैयार कर्णके ऊपर सीधे जानेवाले बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २५ ॥

विधित्सुः कलहस्यान्तं जिघांसुः कर्णमक्षिणोत् । हत्वा तस्यानुगांस्तं च हन्तुकामो महाबलः ॥ २६ ॥ कलहका अन्त करनेकी इच्छासे महाबली भीमसेन कर्णको मार डालना चाहते थे और इसीलिये उसे बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत कर रहे थे। वे कर्णको मारकर उसके अनुगामी सेवकोंका भी वध करनेकी इच्छा रखते थे ॥ २६ ॥

तस्मै व्यसृजदुग्राणि विविधानि परंतपः । अमर्षात् पाण्डवः क्रुद्धः शरवर्षाणि मारिष ॥ २७ ॥ माननीय नरेश! शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेन कुपित हो अमर्षवश कर्णपर नाना प्रकारके भयंकर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २७ ॥

तस्य तानीषुवर्षाणि मत्तद्विरदगामिनः । सूतपुत्रोऽस्त्रमायाभिरग्रसत् परमास्त्रवित् ॥ २८ ॥ उत्तम अस्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले सूतपुत्र कर्णने अपने अस्त्रोंकी मायासे मतवाले हाथीके समान मस्तीसे चलनेवाले भीमसेनकी उस बाण-वर्षाको ग्रस लिया ॥ २८ ॥

स यथावन्महाबाहुर्विद्यया वै सुपूजितः । आचार्यवन्महेष्वासः कर्णः पर्यचरद् बली ॥ २९ ॥

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महाबाहु महाधनुर्धर बलवान् कर्ण अपनी विद्याद्वारा आचार्य द्रोणके समान यथावत् पूजित हो रणक्षेत्रमें विचरने लगा ॥ २९ ॥ युध्यमानं तु संरम्भाद् भीमसेनं हसन्निव । अभ्यपद्यत कौन्तेयं कर्णो राजन् वृकोदरम् ॥ ३० ॥ राजन्! क्रोधपूर्वक युद्ध करनेवाले कुन्तीपुत्र भीमसेनकी हँसी उड़ाता हुआ-सा कर्ण उनके सामने जा पहुँचा ॥ ३० ॥ तन्नामृष्यत कौन्तेयः कर्णस्य स्मितमाहवे । युध्यमानेषु वीरेषु पश्यत्सु च समन्ततः ॥ ३१ ॥ तं भीमसेनः सम्प्राप्तं वत्सदन्तैः स्तनान्तरे । विव्याध बलवान् क्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ ३२ ॥ कुन्तीकुमार भीम युद्धस्थलमें कर्णकी उस हँसीको न सह सके। सब ओर युद्ध करते हुए समस्त वीरोंको देखते-देखते बलवान् भीमसेनने कुपित हो सामने आये हुए कर्णकी छातीमें वत्सदन्त नामक बाणोंद्वारा उसी प्रकार चोट पहुँचायी, जैसे महावत महान् गजराजको अंकुशोंद्वारा पीड़ित करता है ॥ ३१-३२ ॥ पुनश्च सूतपुत्रं तु स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । सुमुक्तैश्चित्रवर्माणं निर्बिभेद त्रिसप्तभिः ॥ ३३ ॥ तत्पश्चात् विचित्र कवच धारण करनेवाले सूतपुत्रको सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तथा अच्छी तरह छोड़े हुए इक्कीस बाणोंद्वारा पुनः क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३३ ॥ कर्णो जाम्बूनदैर्जालैः संछन्नान् वातरंहसः । हयान् विव्याध भीमस्य पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥ ३४ ॥ उधर कर्णने भीमसेनके सोनेकी जालियोंसे आच्छादित हुए वायुके समान वेगशाली घोड़ोंको पाँच-पाँच बाणोंसे वेध दिया ॥ ३४ ॥ ततो बाणमयं जालं भीमसेनरथं प्रति । कर्णेन विहितं राजन् निमेषार्धाददृश्यत ॥ ३५ ॥ राजन्! तदनन्तर आधे निमेषमें ही भीमसेनके रथपर कर्णद्वारा बाणोंका जाल-सा बिछाया जाता दिखायी दिया ॥ ३५ ॥ सरथः सध्वजस्तत्र समूतः पाण्डवस्तदा । प्राच्छाद्यत महाराज कर्णचापच्युतैः शरैः ॥ ३६ ॥ महाराज! वहाँ कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उस समय रथ, ध्वज और सारथिसहित पाण्डुनन्दन भीमसेन आच्छादित हो गये ॥ ३६ ॥ तस्य कर्णश्चतुःषष्ट्या व्यधमत् कवचं दृढम् । क्रुद्धश्चाप्यहनत् पार्थं नाराचैर्मर्मभेदिभिः ॥ ३७ ॥

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कर्णने चौंसठ बाण मारकर भीमसेनके सुदृढ़ कवचकी धज्जियाँ उड़ा दीं। फिर कुपित होकर उसने मर्मभेदी नाराचोंसे कुन्तीकुमारको अच्छी तरह घायल किया ।। ३७ ।। ततोऽचिन्त्य महाबाहुः कर्णकार्मुकनिःसृतान् । समाश्लिष्यदसम्भ्रान्तः सूतपुत्रं वृकोदरः ॥ ३८ ॥ महाबाहु भीमसेन कर्णके धनुषसे छूटे हुए उन बाणोंकी कोई परवा न करके बिना किसी घबराहटके सूतपुत्रके इतने समीप पहुँच गये, मानो उससे सटे जा रहे हों ॥ ३८ ॥ स कर्णचापप्रभवानिषूनाशीविषोपमान् । बिभ्रद् भीमो महाराज न जगाम व्यथां रणे ॥ ३९ ॥ महाराज! कर्णके धनुषसे छूटे हुए विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंको अपने शरीरपर धारण करते हुए भीमसेन रणक्षेत्रमें व्यथित नहीं हुए ॥ ३९ ॥ ततो द्वात्रिंशता भल्लैर्निशितैस्तिग्मतेजनैः । विव्याध समरे कर्णं भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ४० ॥ तत्पश्चात् अच्छी तरह तेज किये हुए बत्तीस तीखे भल्लोंसे प्रतापी भीमसेनने समरांगणमें कर्णको भारी चोट पहुँचायी ॥ ४० ॥ अयत्नेनैव तं कर्णः शरैर्भृशमवाकिरत् । भीमसेनं महाबाहुं सैन्धवस्य वधैषिणम् ॥ ४१ ॥ उधर कर्ण जयद्रथके वधकी इच्छावाले महाबाहु भीमसेनपर अनायास ही बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करने लगा ॥ ४१ ॥ मृदुपूर्वं तु राधेयो भीममाजावयोधयत् । क्रोधपूर्वं तथा भीमः पूर्वं वैरमनुस्मरन् ॥ ४२ ॥ राधानन्दन कर्ण तो भीमसेनपर कोमल प्रहार करता हुआ रणभूमिमें उनके साथ युद्ध करता था; परंतु भीमसेन पहलेके वैरको बारंबार स्मरण करते हुए क्रोधपूर्वक उसके साथ जूझ रहे थे ॥ ४२ ॥ तं भीमसेनो नामृष्यदवमानममर्षणः । स तस्मै व्यसृजत् तूर्णं शरवर्षममित्रहा ॥ ४३ ॥ शत्रुओंका नाश करनेवाले अमर्षशील भीमसेन कर्णद्वारा दिखायी जानेवाली कोमलता या ढिलाईको अपने लिये अपमान समझकर उसे सह न सके। अतः उन्होंने भी तुरंत ही उसपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ४३ ॥ ते शराः प्रेषितास्तेन भीमसेनेन संयुगे । निपेतुः सर्वतो वीरे कूजन्त इव पक्षिणः ॥ ४४ ॥ युद्धस्थलमें भीमसेनके द्वारा चलाये हुए वे बाण कूजते हुए पक्षियोंके समान वीर कर्णपर सब ओरसे पड़ने लगे ॥ ४४ ॥ हेमपुङ्खाः प्रसन्नाग्रा भीमसेनधनुश्च्युताः ।

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प्राच्छादयंस्ते राधेयं शलभा इव पावकम् ॥ ४५ ॥ भीमसेनके धनुषसे छूटे हुए चमचमाती हुई धारवाले सुवर्णमय पंखोंसे सुशोभित उन बाणोंने राधानन्दन कर्णको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे पतिंगे आगको आच्छादित कर लेते हैं ॥ ४५ ॥ कर्णस्तु रथिनां श्रेष्ठश्छाद्यमानः समन्ततः । राजन् व्यसृजदुग्राणि शरवर्षाणि भारत ॥ ४६ ॥ भरतवंशी नरेश! इस प्रकार सब ओरसे बाणोंद्वारा आच्छादित होते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने भी भीमपर भयंकर बाण-वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ४६ ॥ तस्य तानशनिप्रख्यानिषून् समरशोभिनः । चिच्छेद बहुभिर्भल्लैरसम्प्राप्तान् वृकोदरः ॥ ४७ ॥ परंतु समरभूमिमें शोभा पानेवाले कर्णके उन वज्रोपम बाणोंको भीमसेनने अपने पास आनेसे पहले ही बहुत-से भल्लोंद्वारा काट गिराया ॥ ४७ ॥ पुनश्च शरवर्षेण छादयामास भारत । कर्णो वैकर्तनो युद्धे भीमसेनमरिंदमः ॥ ४८ ॥ भरतनन्दन! शत्रुओंका दमन करनेवाले सूर्यपुत्र कर्णने युद्धमें पुनः बाण-वर्षा करके भीमसेनको ढक दिया ॥ ४८ ॥ तत्र भारत भीमं तु दृष्टवन्तः स्म सायकैः । समाचिततनुं संख्ये श्वाविधं शललैरिव ॥ ४९ ॥ भारत! उस समय युद्धस्थलमें बाणोंसे चिने हुए शरीरवाले भीमसेनको सब लोगोंने कंटकोंसे युक्त साहीके समान देखा ॥ ४९ ॥ हेमपुङ्खान् शिलाधौतान् कर्णचापच्युतान् शरान् । दधार समरे वीरः स्वरश्मीनिव रश्मिवान् ॥ ५० ॥ वीर भीमसेनने कर्णके धनुषसे छूटे और शिलापर तेज किये हुए सुवर्णपंखयुक्त बाणोंको समरांगणमें अपने शरीरपर उसी प्रकार धारण किया था, जैसे अंशुमाली सूर्य अपने किरणोंको धारण करते हैं ॥ ५० ॥ रुधिरोक्षितसर्वाङ्गो भीमसेनो व्यराजत । समृद्धकुसुमापीडो वसन्तेऽशोकवृक्षवत् ॥ ५१ ॥ भीमसेनका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो रहा था। वे वसन्त-ऋतुमें खिले हुए अधिकाधिक पुष्पोंसे सम्पन्न अशोक वृक्षके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ५१ ॥ तत्तु भीमो महाबाहोः कर्णस्य चरितं रणे । नामृष्यत महाबाहुः क्रोधादुद्वृत्तलोचनः ॥ ५२ ॥ महाबाहु भीमसेन रणभूमिमें विशालबाहु कर्णके उस चरित्रको न सह सके। उस समय क्रोधसे उनके नेत्र घूमने लगे ॥ ५२ ॥

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स कर्णं पञ्चविंशत्या नाराचानां समर्पयत् ।
महीधरमिव श्वेतं गूढपादैर्विषोल्बणैः ॥ ५३ ॥
उन्होंने कर्णपर पचीस नाराच चलाये; उनके लगनेसे कर्ण छिपे हुए पैरोंवाले विषैले सर्पोंसे युक्त श्वेत पर्वतके समान जान पड़ता था ॥ ५३ ॥
पुनरेव च विव्याध षड्भिरष्टाभिरेव च ।
मर्मस्वमरविक्रान्तः सूतपुत्रं तनुत्यजम् ॥ ५४ ॥
फिर देवोपम पराक्रमी भीमने अपने शरीरकी परवा न करनेवाले सूतपुत्रको उसके मर्मस्थानोंमें छः और आठ बाण मारकर घायल कर दिया ॥ ५४ ॥
पुनरन्येन बाणेन भीमसेनः प्रतापवान् ।
चिच्छेद कार्मुकं तूर्णं कर्णस्य प्रहसन्निव ॥ ५५ ॥
इसके बाद हँसते हुए-से प्रतापी भीमसेनने दूसरा बाण मारकर तुरंत ही कर्णके धनुषको काट दिया ॥ ५५ ॥
जघान चतुरश्चाश्वान् सूतं च त्वरितः शरैः ।
नाराचैरर्करश्म्याभैः कर्णं विव्याध चोरसि ॥ ५६ ॥
फिर शीघ्रतापूर्वक बाणोंका प्रहार करके उसके चारों घोड़ों और सारथिको भी मार डाला। साथ ही सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी नाराचोंसे कर्णकी छातीमें भारी आघात किया ॥ ५६ ॥
ते जग्मुर्धरणीमाशु कर्णं निर्भिद्य पत्रिणः ।
यथा जलधरं भित्त्वा दिवाकरमरीचयः ॥ ५७ ॥
जैसे सूर्यकी किरणें बादलोंको भेदकर सब ओर फैल जाती हैं, उसी प्रकार भीमसेनके बाण कर्णके शरीरको छेदकर शीघ्र ही धरतीमें समा गये ॥ ५७ ॥
स वैक्लव्यं महत् प्राप्य छिन्नधन्वा शराहतः ।
तथा पुरुषमानी स प्रत्यपायाद् रथान्तरम् ॥ ५८ ॥
यद्यपि कर्णको अपने पुरुषत्वका बड़ा अभिमान था, तो भी भीमसेनके बाणोंसे घायल हो धनुष कट जानेपर रथहीन होनेके कारण वह बड़ी भारी घबराहटमें पड़ गया और दूसरे रथपर बैठनेके लिये वहाँसे भाग निकला ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि कर्णपराजयो
एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें कर्णकी पराजयविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥

१३२-

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द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेन और कर्णका घोर युद्ध

धृतराष्ट्र उवाच

स्वयं शिष्यो महेशस्य भृगूत्तमधनुर्धरः ।
शिष्यत्वं प्राप्तवान् कर्णस्तस्य तुल्योऽस्त्रविद्यया ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! भृगुवंशशिरोमणि धनुर्धर परशुरामजी साक्षात् भगवान् शंकरके शिष्य हैं तथा कर्ण उन्हींका शिष्यत्व ग्रहण करके अस्त्रविद्यामें उनके समान ही सुयोग्य हो गया था ॥ १ ॥

तद्विशिष्टोऽपि वा कर्णः शिष्यः शिष्यगुणैर्युतः ।
कुन्तीपुत्रेण भीमेन निर्जितः स तु लीलया ॥ २ ॥
अथवा शिष्योचित सद्गुणोंसे सम्पन्न परशुरामका वह शिष्य उनसे भी बढ़-चढ़कर है, तो भी उसे कुन्तीकुमार भीमसेनने खेल-खेलमें ही पराजित कर दिया ॥ २ ॥

यस्मिन् जयाशा महती पुत्राणां मम संजय ।
तं भीमाद् विमुखं दृष्ट्वा किं नु दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥ ३ ॥
संजय! जिसपर मेरे पुत्रोंको विजयकी बड़ी भारी आशा लगी हुई है, उसे भीमसेनसे पराजित होकर युद्धसे विमुख हुआ देख दुर्योधनने क्या कहा? ॥ ३ ॥

कथं च युयुधे भीमो वीर्यश्लाघी महाबलः ।
कर्णो वा समरे तात किमकार्षीत् ततः परम् ।
भीमसेनं रणे दृष्ट्वा ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ ४ ॥
तात! अपने पराक्रमसे सुशोभित होनेवाले महाबली भीमसेनने किस प्रकार युद्ध किया? अथवा कर्णने रणक्षेत्रमें भीमसेनको अग्निके समान तेजसे प्रज्वलित होते देख उसके बाद क्या किया? ॥ ४ ॥

संजय उवाच

रथमन्यं समास्थाय विधिवत् कल्पितं पुनः ।
अभ्ययात् पाण्डवं कर्णो वातोद्धूत इवार्णवः ॥ ५ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! वायुके वेगसे ऊपर उठते हुए समुद्रके समान कर्णने विधिपूर्वक सजाये हुए दूसरे रथपर आरूढ़ होकर पुनः पाण्डुनन्दन भीमपर आक्रमण किया ॥ ५ ॥

क्रुद्धमाधिरथिं दृष्ट्वा पुत्रास्तव विशाम्पते ।
भीमसेनममन्यन्त वैश्वानरमुखे हुतम् ॥ ६ ॥

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प्रजानाथ! उस समय अधिरथपुत्र कर्णको क्रोधमें भरा हुआ देखकर आपके पुत्रोंने यही मान लिया कि भीमसेन अब अग्निके मुखमें दी हुई आहुतिके समान नष्ट हो जायेंगे ॥ ६ ॥ चापशब्दं ततः कृत्वा तलशब्दं च भैरवम् । अभ्यद्रवत राधेयो भीमसेनरथं प्रति ॥ ७ ॥ तदनन्तर धनुषकी टंकार और हथेलीका भयानक शब्द करते हुए राधानन्दन कर्णने भीमसेनके रथपर धावा बोल दिया ॥ ७ ॥ पुनरेव तयो राजन् घोर आसीत् समागमः । वैकर्तनस्य शूरस्य भीमस्य च महात्मनः ॥ ८ ॥ राजन्! शूरवीर कर्ण और महामनस्वी भीमसेन—इन दोनों वीरोंमें पुनः घोर संग्राम छिड़ गया ॥ ८ ॥ संरब्धौ हि महाबाहू परस्परवधैषिणौ । अन्योन्यमीक्षांचक्राते दहन्ताविव लोचनैः ॥ ९ ॥ एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले वे दोनों महाबाहु योद्धा अत्यन्त कुपित हो एक-दूसरेको नेत्रोंद्वारा दग्ध-से करते हुए परस्पर दृष्टिपात करने लगे ॥ ९ ॥ क्रोधरक्तेक्षणौ तीव्रो निःश्वसन्ताविवोरगौ । शूरावन्योन्यमासाद्य ततक्षतुररिंदमौ ॥ १० ॥ उन दोनोंकी आँखें लाल हो गयी थीं। दोनों ही फुफकारते हुए सर्पोंके समान लंबी साँस खींच रहे थे। दोनों ही शत्रुदमन वीर उग्र हो परस्पर भिड़कर एक-दूसरेको बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत करने लगे ॥ १० ॥

अध्याय (पृष्ठ 919)

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भीमसेनके द्वारा कर्णकी पराजय

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व्याघ्राविव सुसंरब्धौ श्येनाविव च शीघ्रगौ । शरभाविव संक्रुद्धौ युयुधाते परस्परम् ॥ ११ ॥ वे दो व्याघ्रोंके समान रोषावेशमें भरकर दो बाजोंके समान परस्पर शीघ्रतापूर्वक झपटते थे तथा अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए दो शरभोंके समान परस्पर युद्ध करते थे ॥ ११ ॥ ततो भीमः स्मरन् क्लेशानक्षद्यूते वनेऽपि च । विराटनगरे चैव दुःखं प्राप्तमरिंदमः ॥ १२ ॥ राष्ट्राणां स्फीतरत्नानां हरणं च तवात्मजैः । सततं च परिक्लेशान् सपुत्रेण त्वया कृतान् ॥ १३ ॥ दग्धुमैच्छच्च यः कुन्तीं सपुत्रां त्वमनागसम् । कृष्णायाश्च परिक्लेशं सभामध्ये दुरात्मभिः ॥ १४ ॥ केशपक्षग्रहं चैव दुःशासनकृतं तथा । परुषाणि च वाक्यानि कर्णेनोक्तानि भारत ॥ १५ ॥ पतिमन्यं परीप्सस्व न सन्ति पतयस्तव । पतिता नरके पार्थाः सर्वे षण्ढतिलोपमाः ॥ १६ ॥ समक्षं तव कौरव्य यदूचुः कौरवास्तदा । दासीभावेन कृष्णां च भोक्तुकामाः सुतास्तव ॥ १७ ॥ यच्चापि तान् प्रव्रजतः कृष्णाजिननिवासिनः । परुषाण्युक्तवान् कर्णः सभायां संनिधौ तव ॥ १८ ॥ तृणीकृत्य यथा पार्थांस्तव पुत्रो ववल्ग ह । विषमस्थान् समस्थो हि संरब्धो गतचेतनः ॥ १९ ॥ बाल्यात् प्रभृति चारिघ्नः स्वानि दुःखानि चिन्तयन् । निरविद्यत धर्मात्मा जीवितेन वृकोदरः ॥ २० ॥ जूआके समय, वनवासकालमें तथा विराटनगरमें जो दुःख प्राप्त हुआ था, उसका स्मरण करके, आपके पुत्रोंने जो पाण्डवोंके राज्यों तथा समुज्ज्वल रत्नोंका अपहरण किया था, उसे याद करके, पुत्रोंसहित आपने पाण्डवोंको जो निरन्तर क्लेश प्रदान किये हैं, उन्हें ध्यानमें लाकर निरपराध कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्रोंको जो आपने जला डालनेकी इच्छा की थी, सभाके भीतर आपके दुरात्मा पुत्रोंने जो द्रौपदीको महान् कष्ट पहुँचाया था, दुःशासनने जो उसके केश पकड़े थे, भारत! कर्णने जो उसके प्रति कठोर वचन सुनाये थे तथा कुरुनन्दन! आपकी आँखोंके सामने ही कौरवोंने जो द्रौपदीसे यह कहा था कि 'कृष्णे! तू दूसरा पति कर ले, तेरे ये पति अब नहीं रहे, कुन्तीके सभी पुत्र थोथे तिलोंके समान निर्वीर्य होकर नरक (दुःख)-में पड़ गये हैं।' महाराज! आपके पुत्र जो द्रौपदीको दासी बनाकर उसका उपभोग करना चाहते थे तथा काले मृगचर्म धारण करके वनकी ओर प्रस्थान करते समय पाण्डवोंके प्रति सभामें आपके समीप ही कर्णने जो कटुवचन सुनाये थे और

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पाण्डवोंको तिनकोंके समान समझकर जो आपका पुत्र दुर्योधन उछलता-कूदता था, स्वयं सुखमयी परिस्थितियोंमें रहते हुए भी जो उस अचेत मूर्खने संकटमें पड़े हुए पाण्डवोंके प्रति क्रोधका भाव दिखाया था, इन सब बातोंको तथा बचपनसे लेकर अबतक आपकी ओरसे प्राप्त हुए अपने दुःखोंको याद करके शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुनाशक धर्मात्मा भीमसेन अपने जीवनसे विरक्त हो उठे थे ॥ १२—२० ॥

ततो विस्फार्य सुमहद्धेमपृष्ठं दुरासदम् ।
चापं भरतशार्दूलस्त्यक्तात्मा कर्णमभ्ययात् ॥ २१ ॥
उस समय भरतवंशके उस सिंहने अपने जीवनका मोह छोड़कर सुवर्णमय पृष्ठभागसे सुशोभित दुर्धर्ष एवं विशाल धनुषकी टंकार करते हुए वहाँ कर्णपर धावा किया ॥ २१ ॥

स सायकमयैर्जालैर्भीमः कर्णरथं प्रति ।
भानुमद्भिः शिलाधौतैर्भानोः प्राच्छादयत् प्रभाम् ॥ २२ ॥
कर्णके रथपर भीमसेनने सानपर चढ़ाकर स्वच्छ किये हुए तेजस्वी बाणोंका जाल-सा बिछाकर सूर्यकी प्रभाको आच्छादित कर दिया ॥ २२ ॥

ततः प्रहस्याधिरथिस्तूर्णमस्य शिलाशितैः ।
व्यधमद् भीमसेनस्य शरजालानि पत्रिभिः ॥ २३ ॥
तब अधिरथपुत्र कर्णने हँसकर शिलापर तेज किये हुए पंखयुक्त बाणोंद्वारा भीमसेनके उन बाण-समूहोंको तुरंत ही छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ २३ ॥

महारथो महाबाहुर्महाबाणैर्महाबलः ।
विव्याधाधिरथिर्भीमं नवभिर्निशितैस्तदा ॥ २४ ॥
महारथी महाबाहु महाबली अधिरथपुत्र कर्णने उस समय नौ तीखे महाबाणोंसे भीमसेनको घायल कर दिया ॥ २४ ॥

स तोत्रैरिव मातङ्गो वार्यमाणः पतत्रिभिः ।
अभ्यधावदसम्भ्रान्तः सूतपुत्रं वृकोदरः ॥ २५ ॥
जैसे मतवाला हाथी अंकुशसे रोका जाय, उसी प्रकार पंखयुक्त बाणोंद्वारा रोके जाते हुए भीमसेन तनिक भी घबराहटमें न पड़कर सूतपुत्र कर्णपर चढ़ आये ॥ २५ ॥

तमापतन्तं वेगेन रभसं पाण्डवर्षभम् ।
कर्णः प्रत्युद्ययौ युद्धे मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥ २६ ॥
जैसे मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथीपर धावा करता है, उसी प्रकार पाण्डवशिरोमणि वेगशाली भीमको वेगपूर्वक आक्रमण करते देख कर्ण भी युद्धस्थलमें उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा ॥ २६ ॥

ततः प्रध्माप्य जलजं भेरीशतसमस्वनम् ।
अक्षुभ्यत बलं हर्षादुद्धूत इव सागरः ॥ २७ ॥

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तदनन्तर कर्णने हर्षपूर्वक सैकड़ों भेरियोंके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले शंखको बजाकर सब ओर गूँजा दिया। इससे पाण्डवोंकी सेनामें विक्षुब्ध समुद्रके समान हलचल पैदा हो गयी ॥ २७ ॥ तदुद्धूतं बलं दृष्ट्वा नागाश्वरथपत्तिमत् । भीमः कर्णं समासाद्य च्छादयामास सायकैः ॥ २८ ॥ हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसे युक्त उस सेनाको विक्षुब्ध हुई देख भीमसेनने कर्णके पास जाकर उसे बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ २८ ॥ अश्वानृक्षसवर्णांश्च हंसवर्णैर्हयोत्तमैः । व्यामिश्रयद् रणे कर्णः पाण्डवं छादयन् शरैः ॥ २९ ॥ उस रणक्षेत्रमें पाण्डुनन्दन भीमको अपने बाणोंसे आच्छादित करते हुए कर्णने रीछके समान रंगवाले अपने काले घोड़ोंको भीमसेनके हंस-सदृश श्वेतवर्णवाले उत्तम घोड़ोंके साथ मिला दिया ॥ २९ ॥ ऋक्षवर्णान् हयान् ककैरिमिश्रान् मारुतरंहसः । निरीक्ष्य तव पुत्राणां हाहाकृतमभूद् बलम् ॥ ३० ॥ रीछके समान रंगवाले और वायुके समान वेगशाली घोड़ोंको श्वेत अश्वोंके साथ मिला हुआ देख आपके पुत्रोंकी सेनामें हाहाकार मच गया ॥ ३० ॥ ते हया बह्वशोभन्त मिश्रिता वातरंहसः । सितासिता महाराज यथा व्योम्नि बलाहकाः ॥ ३१ ॥ महाराज! वायुके समान वेगवाले वे सफेद और काले घोड़े परस्पर मिलकर आकाशमें उठे हुए सफेद और काले बादलोंके समान अधिक शोभा पा रहे थे ॥ ३१ ॥ संरब्धौ क्रोधताम्राक्षौ प्रेक्ष्य कर्णवृकोदरौ । संत्रस्ताः समकम्पन्त त्वदीयानां महारथाः ॥ ३२ ॥ रोषावेशमें भरकर क्रोधसे लाल आँखें किये कर्ण और भीमसेनको देखकर आपके महारथी भयभीत हो काँपने लगे ॥ ३२ ॥ यमराष्ट्रोपमं घोरमासीदायोधनं तयोः । दुर्दर्शं भरतश्रेष्ठ प्रेतराजपुरं यथा ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ! उन दोनोंका संग्राम यमराजके राज्यके समान अत्यन्त भयंकर था। प्रेतराजकी पुरीके समान उसकी ओर देखना अत्यन्त कठिन हो रहा था ॥ ३३ ॥ समाजमिव तच्चित्रं प्रेक्षमाणा महारथाः । नालक्षयन् जयं व्यक्तमेकस्यैव महारणे ॥ ३४ ॥ उस विचित्र-से समाजको देखते हुए महारथियोंने उस महासमरमें निश्चय ही उन दोनोंमेंसे किसी एक ही व्यक्तिकी विजय होती नहीं देखी ॥ ३४ ॥ तयोः प्रैक्षन्त सम्मर्दं संनिकृष्टं महास्त्रयोः ।

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तव दुर्मन्त्रिते राजन् सपुत्रस्य विशाम्पते ॥ ३५ ॥
राजन्! प्रजानाथ! पुत्रोंसहित आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप महान् अस्त्रधारी भीमसेन और कर्णका अत्यन्त निकटसे होनेवाला संघर्ष सब लोग देख रहे थे ॥ ३५ ॥
छादयन्तौ हि शत्रुघ्नावन्योन्यं सायकैः शितैः ।
शरजालावृतं व्योम चक्रातेऽद्भुतविक्रमौ ॥ ३६ ॥
उन दोनों अद्भुत पराक्रमी शत्रुहन्ता वीरोंने एक-दूसरेको तीखे बाणोंसे आच्छादित करते हुए आकाशको बाण-समूहोंसे व्याप्त कर दिया ॥ ३६ ॥
तावन्योन्यं जिघांसन्तौ शरैस्तीक्ष्णैर्महारथौ ।
प्रेक्षणीयतरावास्तां वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ॥ ३७ ॥
पैने बाणोंद्वारा एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छावाले वे दोनों महारथी वीर वर्षा करनेवाले बादलोंके समान अत्यन्त दर्शनीय हो रहे थे ॥ ३७ ॥
सुवर्णविकृतान् बाणान् विमुञ्चन्तावरिंदमौ ।
भास्वरं व्योम चक्राते महोल्काभिरिव प्रभो ॥ ३८ ॥
प्रभो! उन दोनों शत्रुहन्ता वीरोंने सुवर्णनिर्मित बाणोंकी वर्षा करके आकाशको उसी प्रकार प्रकाशमान कर दिया, जैसे बड़ी-बड़ी उल्काओंके गिरनेसे वह प्रकाशित होने लगता है ॥ ३८ ॥
ताभ्यां मुक्ताः शरा राजन् गार्ध्रपत्राश्चकाशिरे ।
श्रेण्यः शरदि मत्तानां सारसानामिवाम्बरे ॥ ३९ ॥
राजन्! उन दोनोंके छोड़े हुए गीधकी पाँखोंवाले बाण शरद्-ऋतुके आकाशमें मतवाले सारसोंकी श्रेणियोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ३९ ॥
संसक्तं सूतपुत्रेण दृष्ट्वा भीममरिंदमम् ।
अतिभारममन्येतां भीमे कृष्णधनंजयौ ॥ ४० ॥
शत्रुदमन भीमसेनको सूतपुत्रके साथ उलझा हुआ देख श्रीकृष्ण और अर्जुनने भीमपर यह बहुत बड़ा भार समझा ॥ ४० ॥
तत्राधिरथिभीमाभ्यां शरैर्मुक्तेर्दृढं हताः ।
इषुपातमतिक्रम्य पेतुरश्वनरद्विपाः ॥ ४१ ॥
उस युद्धस्थलमें कर्ण और भीमसेनके छोड़े हुए बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए घोड़े, मनुष्य और हाथी बाणोंके गिरनेके स्थानको लाँघकर उससे दूर जा गिरते थे ॥ ४१ ॥
पतद्भिः पतितैश्चान्यैर्गतासुभिरनेकणः ।
कृतो राजन् महाराज पुत्राणां ते जनक्षयः ॥ ४२ ॥
राजन्! महाराज! कुछ सैनिक गिर रहे थे, कुछ गिर चुके थे और दूसरे बहुत-से योद्धा प्राणशून्य हो गये थे; उन सबके कारण आपके पुत्रोंकी सेनामें बड़ा भारी नरसंहार हुआ ॥ ४२ ॥

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मनुष्याश्वगजानां च शरीरैर्गतजीवितैः । क्षणेन भूमिः संजज्ञे संवृता भरतर्षभ ॥ ४३ ॥ (आक्रीडमिव रुद्रस्य दक्षयज्ञनिबर्हणे ।) भरतश्रेष्ठ! मनुष्य, घोड़े और हाथियोंके निष्प्राण शरीरोंसे वहाँकी भूमि क्षणभरमें ढक गयी और दक्षयज्ञके संहारकालमें रुद्रकी क्रीड़ाभूमिके समान प्रतीत होने लगी ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमकर्णयुद्धे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेन और कर्णका युद्धविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/३ श्लोक हैं)

१३३-

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त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध

धृतराष्ट्र उवाच

अत्यद्भुतमहं मन्ये भीमसेनस्य विक्रमम् ।
यत् कर्णं योधयामास समरे लघुविक्रमम् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले—संजय! मैं भीमसेनके पराक्रमको अत्यन्त अद्भुत मानता हूँ कि उन्होंने समरांगणमें शीघ्रतापूर्वक पराक्रम दिखानेवाले कर्णके साथ भी युद्ध किया ॥ १ ॥

त्रिदशानपि वा युक्तान् सर्वशस्त्रधरान् युधि ।
वारयेद् यो रणे कर्णः सयक्षासुरमानुषान् ॥ २ ॥
स कथं पाण्डवं युद्धे भ्राजमानमिव श्रिया ।
नातरत् संयुगे पार्थं तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ३ ॥
संजय! जो कर्ण रणक्षेत्रमें युद्धके लिये सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करके सुसज्जित हुए देवताओं तथा यक्षों, असुरों और मनुष्योंका भी निवारण कर सकता है, वह युद्धमें विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित होते हुए-से पाण्डुनन्दन कुन्तीकुमार भीमसेनको कैसे नहीं लाँघ सका? इसका कारण मुझे बताओ ॥ २-३ ॥

कथं च युद्धं सम्भूतं तयोः प्राणदुरोदरे ।
अत्र मन्ये समायत्तो जयो वाजय एव च ॥ ४ ॥
उन दोनोंमें प्राणोंकी बाजी लगाकर किस प्रकार युद्ध हुआ? मैं समझता हूँ कि यहीं उभय पक्षकी जय अथवा विजय निर्भर है ॥ ४ ॥

कर्णं प्राप्य रणे सूत मम पुत्रः सुयोधनः ।
जेतुमुत्सहते पार्थान् सगोविन्दान् ससात्वतान् ॥ ५ ॥
सूत! रणक्षेत्रमें कर्णको पाकर मेरा पुत्र दुर्योधन श्रीकृष्ण तथा सात्यकि आदि यादवोंसहित समस्त कुन्तीकुमारोंको जीतनेका उत्साह रखता है ॥ ५ ॥

श्रुत्वा तु निर्जितं कर्णमसकृद् भीमकर्मणा ।
भीमसेनेन समरे मोह आविशतीव माम् ॥ ६ ॥
समरांगणमें भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनके द्वारा कर्णके बारंबार पराजित होनेकी बात सुनकर मेरे मनपर मोह-सा छा जाता है ॥ ६ ॥

विनष्टान् कौरवान् मन्ये मम पुत्रस्य दुर्नयैः ।
न हि कर्णो महेष्वासान् पार्थान् जेष्यति संजय ॥ ७ ॥

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मेरे पुत्रकी दुर्नीतियोंके कारण मैं समस्त कौरवोंको नष्ट हुआ ही मानता हूँ। संजय! कर्ण कभी महाधनुर्धर कुन्तीकुमारोंको नहीं जीत सकेगा॥ ७॥

कृतवान् यानि युद्धानि कर्णः पाण्डुसुतैः सह ।
सर्वत्र पाण्डवाः कर्णमजयन्त रणाजिरे ॥ ८॥
कर्णने पाण्डुपुत्रोंके साथ जो-जो युद्ध किये हैं, उन सबमें पाण्डवोंने ही रणक्षेत्रमें कर्णको जीता है॥ ८॥

अजेयाः पाण्डवास्तात देवैरपि सवासवैः ।
न च तद् बुध्यते मन्दः पुत्रो दुर्योधनो मम ॥ ९॥
तात! इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी पाण्डवोंपर विजय पाना असम्भव है; परंतु मेरा मूर्ख पुत्र दुर्योधन इस बातको नहीं समझता है॥ ९॥

धनं धनेश्वरस्येव हृत्वा पार्थस्य मे सुतः ।
मधुप्रेप्सुरिवाबुद्धिः प्रपातं नावबुध्यते ॥ १०॥
मेरा पुत्र कुबेरके समान कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके धनका अपहरण करके ऊँचे स्थानसे मधु लेनेकी इच्छावाले मूर्ख मनुष्यके समान पतनके भयको नहीं समझ रहा है॥ १०॥

निकृत्या निकृतिप्रज्ञो राज्यं हृत्वा महात्मनाम् ।
जितमित्येव मन्वानः पाण्डवानवमन्यते ॥ ११॥
वह छल-कपटकी विद्याको जानता है। अतः छलसे ही उन महामनस्वी पाण्डवोंके राज्यका अपहरण करके उसे जीता हुआ मानकर पाण्डवोंका अपमान करता है॥ ११॥

पुत्रस्नेहाभिभूतेन मया चाप्यकृतात्मना ।
धर्मे स्थिता महात्मानो निकृताः पाण्डुनन्दनाः ॥ १२॥
मुझ अकृतात्माने भी पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर सदा धर्मपर स्थित रहनेवाले महात्मा पाण्डवोंको ठगा है॥ १२॥

शमकामः ससोदर्यो दीर्घप्रेक्षी युधिष्ठिरः ।
अशक्त इति मत्वा तु मम पुत्रैर्निराकृतः ॥ १३॥
दूरदर्शी युधिष्ठिर अपने भाइयोंसहित संधिकी अभिलाषा रखते थे; परंतु उन्हें असमर्थ मानकर मेरे पुत्रोंने उनकी बात ठुकरा दी॥ १३॥

तानि दुःखान्यनेकानि विप्रकारांश्च सर्वशः ।
हृदि कृत्वा महाबाहुर्भीमोऽयुध्यत सूतजम् ॥ १४॥
अनेक बार दिये गये उन दुःखों और सम्पूर्ण अपकारोंको मनमें रखकर महाबाहु भीमसेनने सूतपुत्र कर्णके साथ युद्ध किया है॥ १४॥

तस्मान्मे संजय ब्रूहि कर्णभीमौ यथा रणे ।
अयुध्येतां युधि श्रेष्ठौ परस्परवधैषिणौ ॥ १५॥

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अतः संजय! एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले युद्धस्थलके श्रेष्ठ वीर कर्ण और भीमसेनने समरांगणमें जिस प्रकार युद्ध किया, वह सब मुझे बताओ ॥ १५ ॥

संजय उवाच

शृणु राजन् यथावृत्तं संग्रामं कर्णभीमयोः । परस्परवधप्रेप्सुर्वोर्वनकुञ्जरयोरिव ॥ १६ ॥ संजयने कहा—राजन्! कर्ण और भीमसेनके युद्धका यथावत् वृत्तान्त सुनिये। वे दोनों जंगली हाथियोंके समान एक-दूसरेके वधके लिये उत्सुक थे ॥ १६ ॥

राजन् वैकर्तनो भीमं क्रुद्धः क्रुद्धमरिंदमम् । पराक्रान्तं पराक्रम्य विव्याध त्रिंशता शरैः ॥ १७ ॥ राजन्! क्रोधमें भरे हुए सूर्यपुत्र कर्णने कुपित हुए शत्रुदमन पराक्रमी भीमसेनको अपने बल-पराक्रमका परिचय देते हुए तीस बाणोंसे बींध डाला ॥ १७ ॥

महावेगैः प्रसन्नाग्रैः शातकुम्भपरिष्कृतैः । अहनद् भरतश्रेष्ठ भीमं वैकर्तनः शरैः ॥ १८ ॥ भरतश्रेष्ठ! कर्णने चमकते हुए अग्रभागवाले सुवर्णजटित महान् वेगशाली बाणोंद्वारा भीमसेनको घायल कर दिया ॥ १८ ॥

तस्यास्यतो धनुर्भीमश्चकर्त निशितैस्त्रिभिः । रथनीडाच्च यन्तारं भल्लेनापातयत् क्षितौ ॥ १९ ॥ इस प्रकार बाण चलाते हुए कर्णके धनुषको भीमसेनने तीन तीखे बाणोंद्वारा काट डाला और एक भल्ल मारकर सारथिको रथकी बैठकसे नीचे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ १९ ॥

स काङ्क्षन् भीमसेनस्य वधं वैकर्तनो भृशम् । शक्तिं कनकवैदूर्यचित्रदण्डां परामृशत् ॥ २० ॥ तब भीमसेनके वधकी अभिलाषा रखकर कर्णने वेगपूर्वक एक शक्ति हाथमें ली, जिसका डंडा सुवर्ण और वैदूर्यमणिसे जटित होनेके कारण विचित्र दिखायी देता था ॥ २० ॥

प्रगृह्य च महाशक्तिं कालशक्तिमिवापराम् । समुत्क्षिप्य च राधेयः संधाय च महाबलः ॥ २१ ॥ चिक्षेप भीमसेनाय जीवितान्तकरीमिव । वह महाशक्ति दूसरी कालशक्तिके समान प्रतीत होती थी। महाबली राधापुत्र कर्णने जीवनका अन्त कर देनेवाली उस शक्तिको लेकर ऊपर उठाया और उसे धनुषपर रखकर भीमसेनपर चला दिया ॥ २१½ ॥

शक्तिं विसृज्य राधेयः पुरंदर इवाशनिम् ॥ २२ ॥ ननाद सुमहानादं बलवान् सूतनन्दनः ।

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तं च नादं ततः श्रुत्वा पुत्रास्ते हर्षिताऽभवन् ॥ २३ ॥ इन्द्रके वज्रकी भाँति उस शक्तिको छोड़कर बलवान् सूतनन्दन कर्णने बड़े जोरसे गर्जना की। उस समय उस सिंहनादको सुनकर आपके पुत्र बड़े प्रसन्न हुए ॥ २२-२३ ॥

तां कर्णभुजनिर्मुक्तामर्कवैश्वानरप्रभाम् । शक्तिं वियति चिच्छेद भीमः सप्तभिराशुगैः ॥ २४ ॥ कर्णके हाथोंसे छूटकर आकाशमें सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित होनेवाली उस शक्तिको भीमसेनने सात बाणोंसे आकाशमें ही काट डाला ॥ २४ ॥

छित्त्वा शक्तिं ततो भीमो निर्मुक्तोरगसंनिभाम् । मार्गमाण इव प्राणान् सूतपुत्रस्य मारिष ॥ २५ ॥ प्राहिणोत् कृतसंरम्भः शरान् बर्हिणवाससः । स्वर्णपुङ्खान् शिलाधौतान् यमदण्डोपमान् मृधे ॥ २६ ॥ माननीय नरेश! केंचुलसे छूटी हुई सर्पिणीके समान उस शक्तिके टुकड़े-टुकड़े करके फिर भीमसेनने कुपित हो युद्धस्थलमें सूतपुत्र कर्णके प्राणोंकी खोज करते हुए-से सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए, यमदण्डके समान भयंकर, मयूरपंख एवं स्वर्णपंखसे विभूषित बाणोंको उसके ऊपर चलाना आरम्भ किया ॥ २५-२६ ॥

कर्णोऽप्यन्यद् धनुर्गृह्य हेमपृष्ठं दुरासदम् । विकृष्य तन्महच्चापं व्यसृजत् सायकांस्तदा ॥ २७ ॥ तब कर्णने भी सुवर्णमय पीठवाले दूसरे दुर्धर्ष एवं विशाल धनुषको हाथमें लेकर खींचा और बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ २७ ॥

तान् पाण्डुपुत्रश्चिच्छेद नवभिर्नतपर्वभिः । वसुषेणेन निर्मुक्तान् नव राजन् महाशरान् ॥ २८ ॥ राजन्! वसुषेण (कर्ण)-के छोड़े हुए नौ विशाल बाणोंको पाण्डुपुत्र भीमसेनने झुकी हुई गाँठवाले नौ बाणोंद्वारा काट गिराया ॥ २८ ॥

छित्त्वा भीमो महाराज नादं सिंह इवानदत् । तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे ॥ २९ ॥ शार्दूलाविव चान्योन्यमामिषार्थेऽभ्यगर्जताम् । महाराज! भीमसेनने कर्णके बाणोंको काटकर सिंहके समान गर्जना की। वे दोनों बलवान् वीर कभी गायके लिये लड़नेवाले दो साँड़ोंके समान हँकड़ते और कभी मांसके लिये परस्पर जूझनेवाले दो सिंहोंके समान दहाड़ते थे ॥ २९ १/२ ॥

अन्योन्यं प्रजिहीर्षन्तावन्योन्यस्यान्तरैषिणौ ॥ ३० ॥ अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ गोष्ठेष्विव महर्षभौ । वे गोशालाओंमें लड़नेवाले दो बड़े-बड़े साँड़ोंके समान एक-दूसरेपर चोट करनेकी इच्छा रखते हुए अवसर ढूँढ़ते और परस्पर आँखें तरेरकर देखते थे ॥ ३० १/२ ॥

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महागजाविवासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् ॥ ३१ ॥ शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः। जैसे दो विशाल गजराज अपने दाँतोंके अग्रभागोंद्वारा एक-दूसरेसे भिड़ गये हों, उसी प्रकार कर्ण और भीमसेन धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचाते थे॥ ३१ १/२ ॥ निर्दहन्तौ महाराज शस्त्रवृष्ट्या परस्परम् ॥ ३२ ॥ अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ कोपाद् विवृतलोचनौ । प्रहसन्तौ तथान्योन्यं भर्त्सयन्तौ मुहुर्मुहुः ॥ ३३ ॥ शंखशब्दं च कुर्वाणौ युयुधाते परस्परम् । महाराज! वे परस्पर शस्त्रोंकी वर्षा करके एक-दूसरेको दग्ध करते, क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर देखते, कभी हँसते और कभी बारंबार एक-दूसरेको डाँटते एवं शंखनाद करते हुए परस्पर जूझ रहे थे॥ ३२-३३ १/२ ॥ तस्य भीमः पुनश्चापं मुष्टौ चिच्छेद मारिष ॥ ३४ ॥ शङ्खवर्णांश्च तानश्वान् बाणैर्निन्ये यमक्षयम् । सारथिं च तथाप्यस्य रथनीडादपातयत् ॥ ३५ ॥ आर्य! भीमसेनने पुनः कर्णके धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला, शंखके समान श्वेत रंगवाले उसके घोड़ोंको भी बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया और उसके सारथिको भी मारकर रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया॥ ३४-३५॥ ततो वैकर्तनः कर्णश्चिन्तां प्राप दुरत्ययाम् । स च्छाद्यमानः समरे हताश्वो हतसारथिः ॥ ३६ ॥ घोड़े और सारथिके मारे जानेपर समरांगणमें बाणोंद्वारा आच्छादित हुआ सूर्यपुत्र कर्ण दुस्तर चिन्तामें निमग्न हो गया॥ ३६॥ मोहितः शरजालेन कर्तव्यं नाभ्यपद्यत । तथा कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कर्णं दुर्योधनो नृपः ॥ ३७ ॥ वेपमान इव क्रोधाद् व्यादिदेशाथ दुर्जयम् । गच्छ दुर्जय राधेयं पुरो ग्रसति पाण्डवः ॥ ३८ ॥ जहि तूबरकं क्षिप्रं कर्णस्य बलमादधत् । बाणसमूहोंसे मोहित होनेके कारण उसे यह नहीं सूझता था कि अब क्या करना चाहिये। कर्णको इस प्रकार संकटमें पड़ा देख राजा दुर्योधन क्रोधसे काँपने-सा लगा और दुर्जयको आदेश देता हुआ बोला—‘दुर्जय! जाओ। राधानन्दन कर्णको सामने ही पाण्डुपुत्र भीमसेन कालका ग्रास बनाना चाहता है। तुम कर्णका बल बढ़ाते हुए उस बिना दाढ़ी-मूँछके भुंडे भीमसेनको शीघ्र मार डालो'॥ ३७-३८ १/२ ॥ एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा तव पुत्रं तवात्मजः ॥ ३९ ॥