महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
राजधर्मकी श्रेष्ठताका वर्णन और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद
भीष्म उवाच
चातुराश्रम्यधर्माश्च यतिधर्माश्च पाण्डव ।
लोकवेदोत्तराश्चैव क्षात्रधर्मे समाहिताः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—पाण्डुनन्दन! चारों आश्रमोंके धर्म, यतिधर्म तथा लौकिक और वैदिक उत्कृष्ट धर्म सभी क्षात्रधर्ममें प्रतिष्ठित हैं ॥ १ ॥
सर्वाण्येतानि कर्माणि क्षात्रे भरतसत्तम ।
निराशिषो जीवलोकाः क्षत्रधर्मेऽव्यवस्थिते ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! ये सारे कर्म क्षात्रधर्मपर अवलम्बित हैं। यदि क्षात्रधर्म प्रतिष्ठित न हो तो जगत्के सभी जीव अपनी मनोवाञ्छित वस्तु पानेसे निराश हो जायँ ॥ २ ॥
अप्रत्यक्षं बहुद्वारं धर्ममाश्रमवासिनाम् ।
प्ररूपयन्ति तद्भावमागमैरेव शाश्वतम् ॥ ३ ॥
आश्रमवासियोंका सनातन धर्म अनेक द्वारवाला और अप्रत्यक्ष है, विद्वान् पुरुष शास्त्रोंद्वारा ही उसके स्वरूपका निर्णय करते हैं ॥ ३ ॥
अपरे वचनैः पुण्यैर्वादिनो लोकनिश्चयम् ।
अनिश्चयज्ञा धर्माणांमदृष्टान्ते परे हताः ॥ ४ ॥
अतः दूसरे वक्तालोग जो धर्मके तत्त्वको नहीं जानते, वे सुन्दर युक्तियुक्त वचनोंद्वारा लोगोंके विश्वासको नष्ट कर तब वे श्रोतागण प्रत्यक्ष उदाहरण न पाकर परलोकमें नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं ॥ ४ ॥
प्रत्यक्षं सुखभूयिष्ठमात्मसाक्षिकमच्छलम् ।
सर्वलोकहितं धर्मं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥ ५ ॥
जो धर्म प्रत्यक्ष है, अधिक सुखमय है, आत्माके साक्षित्त्वसे युक्त है, छलरहित है तथा सर्वलोकहितकारी है, वह धर्म क्षत्रियोंमें प्रतिष्ठित है ॥ ५ ॥
धर्माश्रमेऽध्यवसिनां ब्राह्मणानां युधिष्ठिर ।
यथा त्रयाणां वर्णानां संख्यातोपश्रुतिः पुरा ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! जैसे तीनों वर्णोंके धर्मोंका पहले क्षत्रिय-धर्ममें अन्तर्भाव बताया गया है, उसी प्रकार नैष्ठिक ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और यति—इन तीनों आश्रमोंमें स्थित ब्राह्मणोंके धर्मोंका गार्हस्थ्याश्रममें समावेश होता है ॥ ६ ॥
राजधर्मेष्वनुमता लोकाः सुचरितैः सह । उदाहृतं ते राजेन्द्र यथा विष्णुं महौजसम् ॥ ७ ॥ सर्वभूतेश्वरं देवं प्रभुं नारायणं पुरा । जग्मुः सुबहुशः शूरा राजानो दण्डनीतये ॥ ८ ॥ राजेन्द्र! उत्तम चरित्रों (धर्मों) सहित सम्पूर्ण लोक राजधर्ममें अन्तर्भूत हैं। यह बात मैं तुमसे कह चुका हूँ। किसी समय बहुत-से शूरवीर नरेश दण्डनीतिकी प्राप्तिके लिये सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महातेजस्वी सर्वव्यापी भगवान् नारायण देवकी शरणमें गये थे ॥ ७-८ ॥
एकैकमात्मनः कर्म तुलयित्वाऽऽश्रमं पुरा । राजानः पर्युपासन्त दृष्टान्तवचने स्थिताः ॥ ९ ॥ वे पूर्वकालमें आश्रमसम्बन्धी एक-एक कर्मकी दण्डनीतिके साथ तुलना करके संशयमें पड़ गये कि इनमें कौन श्रेष्ठ है? अतः सिद्धान्त जाननेके लिये उन राजाओंने भगवान्की उपासना की थी ॥ ९ ॥
साध्या देवा वसवश्चाश्विनौ च रुद्राश्च विश्वे मरुतां गणाश्च । सृष्टाः पुरा ह्यादिदेवेन देवाः क्षात्रे धर्मे वर्तयन्ते च सिद्धाः ॥ १० ॥ साध्यदेव, वसुगण, अश्विनीकुमार, रुद्रगण, विश्वेदेवगण और मरुद्गण—ये देवता और सिद्धगण पूर्वकालमें आदिदेव भगवान् विष्णुके द्वारा रचे गये हैं, जो क्षात्रधर्ममें ही स्थित रहते हैं ॥ १० ॥
अत्र ते वर्तयिष्यामि धर्ममर्थविनिश्चयम् । निर्मर्यादे वर्तमाने दानवैकार्णवे पुरा ॥ ११ ॥ मैं इस विषयमें तात्त्विक अर्थका निश्चय करनेवाला एक धर्ममय इतिहास सुनाऊँगा। पहलेकी बात है, यह सारा जगत् दानवताके समुद्रमें निमग्न होकर उच्छृंखल हो चला था ॥ ११ ॥
बभूव राजा राजेन्द्र मान्धाता नाम वीर्यवान् । पुरा वसुमतीपालो यज्ञं चक्रे दिदृक्षया ॥ १२ ॥ अनादिमध्यनिधनं देवं नारायणं प्रभुम् । राजेन्द्र! उन्हीं दिनों मान्धाता नामसे प्रसिद्ध एक पराक्रमी पृथ्वीपालक नरेश हुए थे, जिन्होंने आदि, मध्य और अन्तसे रहित भगवान् नारायणदेवका दर्शन पानेकी इच्छासे एक यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ १२ १/२ ॥
स राजा राजशार्दूल मान्धाता परमेश्वरम् ॥ १३ ॥ जगाम शिरसा पादौ यज्ञे विष्णोर्महात्मनः । दर्शयामास तं विष्णू रूपमास्थाय वासवम् ॥ १४ ॥
राजसिंह! राजा मान्धाताने उस यज्ञमें परमात्मा भगवान् विष्णुके चरणोंकी भावनासे पृथ्वीपर मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय श्रीहरिने देवराज इन्द्रका रूप धारण करके उन्हें दर्शन दिया ॥ १३-१४ ॥
स पार्थिवैर्वृतः सद्भिरर्चयामास तं प्रभुम् ।
तस्य पार्थिवसिंहस्य तस्य चैव महात्मनः ।
संवादोऽयं महानासीद् विष्णुं प्रति महाद्युतिम् ॥ १५ ॥
श्रेष्ठ भूपालोंसे घिरे हुए मान्धाताने उन इन्द्ररूपधारी भगवान्का पूजन किया। फिर उन राजसिंह और महात्मा इन्द्रमें महातेजस्वी भगवान् विष्णुके विषयमें यह महान् संवाद हुआ ॥ १५ ॥
इन्द्र उवाच
किमिष्यते धर्मभृतां वरिष्ठ
यद् द्रष्टुकामोऽसि तमप्रमेयम् ।
अनन्तमायामितमन्त्रवीर्यं
नारायणं ह्यादिदेवं पुराणम् ॥ १६ ॥
इन्द्र बोले— धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश! आदिदेव पुराणपुरुष भगवान् नारायण अप्रमेय हैं। वे अपनी अनन्त मायाशक्ति, असीम धैर्य तथा अमित बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं, तुम जो उनका दर्शन करना चाहते हो, उसका क्या कारण है? तुम्हें उनसे कौन-सी वस्तु प्राप्त करनेकी इच्छा है? ॥ १६ ॥
नासौ देवो विश्वरूपो मयापि शक्यो द्रष्टुं ब्रह्मणा वापि साक्षात् । येऽन्ये कामास्तव राजन् हृदिस्था दास्ये चैतांस्त्वं हि मर्त्येषु राजा ॥ १७ ॥ उन विश्वरूप भगवान्को मैं और साक्षात् ब्रह्माजी भी नहीं देख सकते। राजन्! तुम्हारे हृदयमें जो दूसरी कामनाएँ हों, उन्हें मैं पूर्ण कर दूँगा; क्योंकि तुम मनुष्योंके राजा हो ॥ १७ ॥
सत्ये स्थितो धर्मपरो जितेन्द्रियः शूरो दृढप्रीतिरतः सुराणाम् । बुद्ध्या भक्त्या चोत्तमश्रद्धया च ततस्तेऽहं दद्मि वरान् यथेष्टम् ॥ १८ ॥ नरेश्वर! तुम सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय और शूरवीर हो, देवताओंके प्रति अविचल प्रेमभाव रखते हो, तुम्हारी बुद्धि, भक्ति और उत्तम श्रद्धासे संतुष्ट होकर मैं तुम्हें इच्छानुसार वर दे रहा हूँ ॥ १८ ॥
मान्धातोवाच
असंशयं भगवन्नादिदेवं द्रक्ष्यामि त्वाऽहं शिरसा सम्प्रसाद्य । त्यक्त्वा कामान् धर्मकामोह्यरण्य- मिच्छे गन्तुं सत्पथं लोकदृष्टम् ॥ १९ ॥ **मान्धाताने कहा—**भगवन्! मैं आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर आपको प्रसन्न करके आपकी ही दयासे आदिदेव भगवान् विष्णुका दर्शन प्राप्त कर लूँगा, इसमें संशय नहीं है। इस समय मैं समस्त कामनाओंका परित्याग करके केवल धर्मसम्पादनकी इच्छा रखकर वनमें जाना चाहता हूँ; क्योंकि लोकमें सभी सत्पुरुष अन्तमें इसी सन्मार्गका दिग्दर्शन करा गये हैं ॥ १९ ॥
क्षात्राद् धर्माद् विपुलादप्रमेया- ल्लोकाः प्राप्ताः स्थापितं स्वं यशश्च । धर्मो योऽसावादिदेवात् प्रवृत्तो लोकश्रेष्ठं तं न जानामि कर्तुम् ॥ २० ॥ विशाल एवं अप्रमेय क्षात्रधर्मके प्रभावसे मैंने उत्तम लोक प्राप्त किये और सर्वत्र अपने यशका प्रचार एवं प्रसार कर दिया; परंतु आदिदेव भगवान् विष्णुसे जिस धर्मकी प्रवृत्ति हुई है, उस लोकश्रेष्ठ धर्मका आचरण करना मैं नहीं जानता ॥ २० ॥
इन्द्र उवाच
असैनिका धर्मपराश्च धर्मे परां गतिं न नयन्ते ह्ययुक्तम् । क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात् प्रवृत्तः पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ॥ २१ ॥ **इन्द्र बोले—**राजन्! आदिदेव भगवान् विष्णुसे तो पहले राजधर्म ही प्रवृत्त हुआ है। अन्य सभी धर्म उसीके अंग हैं और उसके बाद प्रकट हुए हैं। जो सैनिक शक्तिसे सम्पन्न राजा नहीं हैं, वे धर्मपरायण होनेपर भी दूसरोंको अनायास ही धर्मविषयक परम गतिकी प्राप्ति नहीं करा सकते ॥ २१ ॥
शेषाः सृष्टा ह्यन्तवन्तो ह्यनन्ताः सप्रस्थानाः क्षात्रधर्मा विशिष्टाः । अस्मिन् धर्मे सर्वधर्माः प्रविष्टा- स्तस्माद् धर्मं श्रेष्ठमिमं वदन्ति ॥ २२ ॥ क्षात्रधर्म ही सबसे श्रेष्ठ है। शेष धर्म असंख्य हैं और उनका फल भी विनाशशील है। इस क्षात्रधर्ममें सभी धर्मोंका समावेश हो जाता है, इसलिये इसी धर्मको श्रेष्ठ कहते
हैं ॥ २२ ॥
कर्मणा वै पुरा देवा ऋषयश्चामितौजसः ।
त्राताः सर्वे प्रसह्यारीन् क्षत्रधर्मेण विष्णुना ॥ २३ ॥
पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने क्षात्रधर्मके द्वारा ही शत्रुओंका दमन करके देवताओं तथा अमिततेजस्वी समस्त ऋषियोंकी रक्षा की थी ॥ २३ ॥
यदि ह्यसौ भगवान् नाहनिष्यद्
रिपून् सर्वानसुरानप्रमेयः ।
न ब्राह्मणा न च लोकादिकर्ता
नायं धर्मो नादिधर्मोऽभविष्यत् ॥ २४ ॥
यदि वे अप्रमेय भगवान् श्रीहरि समस्त शत्रुरूप असुरोंका संहार नहीं करते तो न कहीं ब्राह्मणोंका पता लगता, न जगत्के आदिस्रष्टा ब्रह्माजी ही दिखायी देते। न यह धर्म रहता और न आदि धर्मका ही पता लग सकता था ॥ २४ ॥
इमामुर्वीं नाजयद् विक्रमेण
देवश्रेष्ठः सासुरामादिदेवः ।
चातुर्वर्ण्यं चातुराश्रम्यधर्माः
सर्वे न स्युर्ब्राह्मणानां विनाशात् ॥ २५ ॥
देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ आदिदेव भगवान् विष्णु असुरों-सहित इस पृथ्वीको अपने बल और पराक्रमसे जीत नहीं लेते तो ब्राह्मणोंका नाश हो जानेसे चारों वर्ण और चारों आश्रमोंके सभी धर्मोंका लोप हो जाता ॥ २५ ॥
नष्टा धर्माः शतधा शाश्वतास्ते
क्षात्रेण धर्मेण पुनः प्रवृद्धाः ।
युगे युगे ह्यादिधर्माः प्रवृत्ता
लोकज्येष्ठं क्षात्रधर्मं वदन्ति ॥ २६ ॥
वे सदासे चले आनेवाले धर्म सैकड़ों बार नष्ट हो चुके हैं, परंतु क्षात्रधर्मने उनका पुनः उद्धार एवं प्रसार किया है। युग-युगमें आदिधर्म (क्षात्रधर्म)-की प्रवृत्ति हुई है; इसलिये इस क्षात्रधर्मको लोकमें सबसे श्रेष्ठ बताते हैं ॥ २६ ॥
आत्मत्यागः सर्वभूतानुकम्पा
लोकज्ञानं पालनं मोक्षणं च ।
विषण्णानां मोक्षणं पीडितानां
क्षात्रे धर्मे विद्यते पार्थिवानाम् ॥ २७ ॥
युद्धमें अपने शरीरकी आहुति देना, समस्त प्राणियोंपर दया करना, लोकव्यवहारका ज्ञान प्राप्त करना, प्रजाकी रक्षा करना, विषादग्रस्त एवं पीड़ित मनुष्योंको दुःख और कष्टसे छुड़ाना—ये सब बातें राजाओंके क्षात्रधर्ममें ही विद्यमान हैं ॥ २७ ॥
निर्मर्यादाः काममन्युप्रवृत्ता भीता राज्ञो नाधिगच्छन्ति पापम् । शिष्टाश्चान्ये सर्वधर्मोपपन्नाः साध्वाचाराः साधु धर्मं वदन्ति ॥ २८ ॥ जो लोग काम, क्रोधमें फँसकर उच्छृंखल हो गये हैं, वे भी राजाके भयसे ही पाप नहीं कर पाते हैं, तथा जो सब प्रकारके धर्मोंका पालन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं वे राजासे सुरक्षित हो सदाचारका सेवन करते हुए धर्मका सदुपदेश करते हैं ॥ २८ ॥
पुत्रवत् पाल्यमानानि राजधर्मेण पार्थिवैः । लोके भूतानि सर्वाणि चरन्ते नात्र संशयः ॥ २९ ॥ राजाओंसे राजधर्मके द्वारा पुत्रकी भाँति पालित होनेवाले जगत्के सम्पूर्ण प्राणी निर्भय विचरते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २९ ॥
सर्वधर्मपरं क्षात्रं लोकश्रेष्ठं सनातनम् । शश्वदक्षरपर्यन्तमक्षरं सर्वतोमुखम् ॥ ३० ॥ इस प्रकार संसारमें क्षात्रधर्म ही सब धर्मोंसे श्रेष्ठ, सनातन, नित्य, अविनाशी, मोक्षतक पहुँचानेवाला सर्वतोमुखी है ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वर्णाश्रमधर्मकथने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वर्णाश्रमधर्मका वर्णनविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद
इन्द्र उवाच
एवंवीर्यः सर्वधर्मोपपन्नः
क्षात्रः श्रेष्ठः सर्वधर्मेषु धर्मः ।
पाल्यो युष्माभिर्लोकहितैरुदारै-
र्विपर्यये स्याद्भवः प्रजानाम् ॥ १ ॥
इन्द्र कहते हैं—राजन्! इस प्रकार क्षात्रधर्म सब धर्मोंमें श्रेष्ठ और शक्तिशाली है। यह सभी धर्मोंसे सम्पन्न बताया गया है। तुम जैसे लोकहितैषी उदार पुरुषोंको सदा इस क्षात्रधर्मका ही पालन करना चाहिये। यदि इसका पालन नहीं किया जायगा तो प्रजाका नाश हो जायगा ॥ १ ॥
भूसंस्कारं राजसंस्कारयोग-
मभैक्ष्यचर्यां पालनं च प्रजानाम् ।
विद्याद् राजा सर्वभूतानुकम्पी
देहत्यागं चाहवे धर्ममग्र्यम् ॥ २ ॥
समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाले राजाको उचित है कि वह नीचे लिखे हुए कार्योंको ही श्रेष्ठ धर्म समझे। वह पृथ्वीका संस्कार करावे, राजसूय-अश्वमेधादि यज्ञोंमें अवभृथस्नान करे, भिक्षाका आश्रय न ले, प्रजाका पालन करे और संग्रामभूमिमें शरीरको त्याग दे ॥ २ ॥
त्यागं श्रेष्ठं मुनयो वै वदन्ति
सर्वश्रेष्ठं यच्छरीरं त्यजन्तः ।
नित्यं युक्ता राजधर्मेषु सर्वे
प्रत्यक्षं ते भूमिपाला यथैव ॥ ३ ॥
ऋषि-मुनि त्यागको ही श्रेष्ठ बताते हैं। उसमें भी युद्धमें राजालोग जो अपने शरीरका त्याग करते हैं, वह सबसे श्रेष्ठ त्याग है। सदा राजधर्ममें संलग्न रहनेवाले समस्त भूमिपालोंने जिस प्रकार युद्धमें प्राणत्याग किया है, वह सब तुम्हारी आँखोंके सामने है ॥ ३ ॥
बहुश्रुत्या गुरुशुश्रूषया च
परस्परं संहननाद् वदन्ति ।
नित्यं धर्मं क्षत्रियो ब्रह्मचारी
चरेदेको ह्याश्रमं धर्मकामः ॥ ४ ॥
क्षत्रिय ब्रह्मचारी धर्मपालनकी इच्छा रखकर अनेक शास्त्रोंके ज्ञानका उपार्जन तथा गुरुशुश्रूषा करते हुए अकेला ही नित्य ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्मका आचरण करे। यह बात ऋषिलोग परस्पर मिलकर कहते हैं॥
सामान्यार्थे व्यवहारे प्रवृत्ते
प्रियाप्रिये वर्जयन्नेव यत्नात्।
चातुर्वर्ण्यस्थापनात् पालनाच्च
तैस्तैर्योगैर्नियमैरौरसैश्च ॥ ५ ॥
सर्वोद्योगैराश्रमं धर्ममाहुः
क्षात्रं श्रेष्ठं सर्वधर्मोपपन्नम्।
स्वं स्वं धर्मं येन चरन्ति वर्णा-
स्तांस्तान् धर्मानन्यथार्थान् वदन्ति ॥ ६ ॥
जनसाधारणके लिये व्यवहार आरम्भ होनेपर राजा प्रिय और अप्रियकी भावनाका प्रयत्नपूर्वक परित्याग करे। भिन्न-भिन्न उपायों, नियमों, पुरुषार्थों तथा सम्पूर्ण उद्योगोंके द्वारा चारों वर्णोंकी स्थापना एवं रक्षा करनेके कारण क्षात्रधर्म एवं गृहस्थ-आश्रमको ही सबसे श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण धर्मोंसे सम्पन्न बताया गया है; क्योंकि सभी वर्णोंके लोग उस क्षात्र-धर्मके सहयोगसे ही अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं। क्षत्रियधर्मके न होनेसे उन सब धर्मोंका प्रयोजन विपरीत होता है; ऐसा कहते हैं॥ ५-६॥
निर्मर्यादान् नित्यमर्थे निविष्टा-
नाहुस्तांस्तान् वै पशुभूतान् मनुष्यान्।
यथा नीतिं गमयत्यर्थयोगा-
च्छ्रेयस्तस्मादाश्रमात् क्षत्रधर्मः ॥ ७ ॥
जो लोग सदा अर्थसाधनमें ही आसक्त होकर मर्यादा छोड़ बैठते हैं, उन मनुष्योंको पशु कहा गया है। क्षत्रिय-धर्म अर्थकी प्राप्ति करानेके साथ-साथ उत्तम नीतिका ज्ञान प्रदान करता है; इसलिये वह आश्रम-धर्मोंसे भी श्रेष्ठ है॥ ७॥
त्रैविद्यानां या गतिर्ब्राह्मणानां
ये चैवोक्ताश्चाश्रमा ब्राह्मणानाम्।
एतत् कर्म ब्राह्मणस्याहुरग्र्य-
मन्यत् कुर्वञ्छूद्रवच्छस्त्रवध्यः ॥ ८ ॥
तीनों वेदोंके विद्वान् ब्राह्मणोंके लिये जो यज्ञादि कार्य विहित हैं तथा उनके लिये जो चारों आश्रम बताये गये हैं—उन्हींको ब्राह्मणका सर्वश्रेष्ठ धर्म कहा गया है। इसके विपरीत आचरण करनेवाला ब्राह्मण शूद्रके समान ही शस्त्रोंद्वारा वधके योग्य है॥ ८॥
चातुराश्रम्यधर्माश्च वेदधर्माश्च पार्थिव।
ब्राह्मणेनानुगन्तव्या नान्यो विद्यात् कदाचन ॥ ९ ॥
राजन्! चारों आश्रमोंके जो धर्म हैं तथा वेदोंमें जो धर्म बताये गये हैं, उन सबका अनुसरण ब्राह्मणको ही करना चाहिये। दूसरा कोई शूद्र आदि कभी किसी तरह भी उन धर्मोंको नहीं जान सकता ॥ ९ ॥
अन्यथा वर्तमानस्य नासौ वृत्तिः प्रकल्प्यते । कर्मणा वर्धते धर्मो यथाधर्मस्तथैव सः ॥ १० ॥
जो ब्राह्मण इसके विपरीत आचरण करता है, उसके लिये ब्राह्मणोचित वृत्तिकी व्यवस्था नहीं की जाती। कर्मसे ही धर्मकी वृद्धि होती है। जो जिस प्रकारके धर्मको अपनाता है, वह वैसा ही हो जाता है ॥ १० ॥
यो विकर्मस्थितो विप्रो न स सम्मानमर्हति । कर्म स्वं नोपयुञ्जानमविश्वास्यं हि तं विदुः ॥ ११ ॥
जो ब्राह्मण विपरीत कर्ममें स्थित होता है, वह सम्मान पानेका अधिकारी नहीं है। अपने कर्मका आचरण न करनेवाले ब्राह्मणको विश्वास न करने योग्य माना गया है ॥ ११ ॥
एते धर्माः सर्ववर्णेषु लीना उत्क्रष्टव्याः क्षत्रियैरेष धर्मः । तस्माज्ज्येष्ठा राजधर्मा न चान्ये वीर्यज्येष्ठा वीरधर्मा मता मे ॥ १२ ॥
समस्त वर्णोंमें स्थित हुए जो ये धर्म हैं, उन्हें क्षत्रियोंको उन्नतिके शिखरपर पहुँचाना चाहिये। यही क्षत्रियधर्म है, इसीलिये राजधर्म श्रेष्ठ है। दूसरे धर्म इस प्रकार श्रेष्ठ नहीं हैं। मेरे मतमें वीर क्षत्रियोंके धर्मोंमें बल और पराक्रमकी प्रधानता है ॥ १२ ॥
मान्धातोवाच
यवनाः किराता गान्धाराश्चीनाः शबरबर्बराः । शकास्तुषाराः कङ्काश्च पह्लवाश्चान्ध्रमद्रकाः ॥ १३ ॥ पौण्ड्राः पुलिन्दा रमठाः काम्बोजाश्चैव सर्वशः । ब्रह्मक्षत्रप्रसूताश्च वैश्याः शूद्राश्च मानवाः ॥ १४ ॥ कथं धर्मांश्चरिष्यन्ति सर्वे विषयवासिनः । मद्विधैश्च कथं स्थाप्याः सर्वे वै दस्युजीविनः ॥ १५ ॥
**मान्धाता बोले—**भगवन्! मेरे राज्यमें यवन, किरात, गान्धार, चीन, शबर, बर्बर, शक, तुषार, कङ्क, पह्लव, आन्ध्र, मद्रक, पौंड्र, पुलिन्द, रमठ और काम्बोज देशोंके निवासी म्लेच्छगण सब ओर निवास करते हैं, कुछ ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी भी संतानें हैं; कुछ वैश्य और शूद्र भी हैं, जो धर्मसे गिर गये हैं। ये सब-के-सब चोरी और डकैतीसे जीविका चलाते
हैं। ऐसे लोग किस प्रकार धर्मोंका आचरण करेंगे? मेरे-जैसे राजाओंको इन्हें किस तरह मर्यादाके भीतर स्थापित करना चाहिये? ।। १३—१५ ।।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं भगवंस्तद् ब्रवीहि मे ।
त्वं बन्धुभूतो ह्यस्माकं क्षत्रियाणां सुरेश्वर ।। १६ ।।
भगवन्! सुरेश्वर! यह मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझे यह सब बताइये; क्योंकि आप ही हम क्षत्रियोंके बन्धु हैं ।। १६ ।।
इन्द्र उवाच
मातापित्रोर्हि शुश्रूषा कर्तव्या सर्वदस्युभिः ।
आचार्यगुरुशुश्रूषा तथैवाश्रमवासिनाम् ।। १७ ।।
इन्द्रने कहा—राजन्! जो लोग दस्यु-वृत्तिसे जीवन निर्वाह करते हैं, उन सबको अपने माता-पिता, आचार्य, गुरु तथा आश्रमवासी मुनियोंकी सेवा करनी चाहिये ।। १७ ।।
भूमिपानां च शुश्रूषा कर्तव्या सर्वदस्युभिः ।
वेदधर्मक्रियाश्चैव तेषां धर्मो विधीयते ।। १८ ।।
भूमिपालोंकी सेवा करना भी समस्त दस्युओंका कर्तव्य है। वेदोक्त धर्म-कर्मोंका अनुष्ठान भी उनके लिये शास्त्रविहित धर्म है ।। १८ ।।
पितृयज्ञास्तथा कूपाः प्रपाश्च शयनानि च ।
दानानि च यथाकालं द्विजेभ्यो विसृजेत् सदा ।। १९ ।।
पितरोंका श्राद्ध करना, कुआँ खुदवाना, जलक्षेत्र चलाना और लोगोंके ठहरनेके लिये धर्मशालाएँ बनवाना भी उनका कर्तव्य है। उन्हें यथासमय ब्राह्मणोंको दान देते रहना चाहिये ।। १९ ।।
अहिंसा सत्यमक्रोधो वृत्तिदायानुपालनम् ।
भरणं पुत्रदाराणां शौचमद्रोह एव च ।। २० ।।
अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोधशून्य बर्ताव, दूसरोंकी आजीविका तथा बँटवारेमें मिली हुई पैतृक सम्पत्तिकी रक्षा, स्त्री-पुत्रोंका भरण-पोषण, बाहर-भीतरकी शुद्धि रखना तथा द्रोहभावका त्याग करना—यह उन सबका धर्म है ।। २० ।।
दक्षिणा सर्वयज्ञानां दातव्या भूतिमिच्छता ।
पाकयज्ञा महार्हाश्च दातव्याः सर्वदस्युभिः ।। २१ ।।
कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सब प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको भरपूर दक्षिणा देनी चाहिये। सभी दस्युओंको अधिक खर्चवाला पाकयज्ञ करना और उसके लिये धन देना चाहिये ।। २१ ।।
एतान्येवंप्रकाराणि विहितानि पुरानघ ।
सर्वलोकस्य कर्माणि कर्तव्यानीह पार्थिव ।। २२ ।।
निष्पाप नरेश! इस प्रकार प्रजापति ब्रह्माने सब मनुष्योंके कर्तव्य पहले ही निर्दिष्ट कर दिये हैं। उन दस्युओंको भी इनका यथावत् रूपसे पालन करना चाहिये ॥ २२ ॥
मान्धातोवाच
दृश्यन्ते मानुषे लोके सर्ववर्णेषु दस्यवः ।
लिङ्गान्तरे वर्तमाना आश्रमेषु चतुर्ष्वपि ॥ २३ ॥
**मान्धाता बोले—**भगवन्! मनुष्यलोकमें सभी वर्णों तथा चारों आश्रमोंमें भी डाकू और लुटेरे देखे जाते हैं, जो विभिन्न वेश-भूषाओंमें अपनेको छिपाये रखते हैं ॥
इन्द्र उवाच
विनष्टायां दण्डनीत्यां राजधर्मे निराकृते ।
सम्प्रमुह्यन्ति भूतानि राजदौरात्म्यतोऽनघ ॥ २४ ॥
**इन्द्र बोले—**निष्पाप नरेश! जब राजाकी दुष्टताके कारण दण्डनीति नष्ट हो जाती है और राजधर्म तिरस्कृत हो जाता है, तब सभी प्राणी मोहवश कर्तव्य और अकर्तव्यका विवेक खो बैठते हैं ॥ २४ ॥
असंख्याता भविष्यन्ति भिक्षवो लिङ्गिनस्तथा ।
आश्रमाणां विकल्पाश्च निवृत्तेऽस्मिन् कृते युगे ॥ २५ ॥
इस सत्ययुगके समाप्त हो जानेपर नानावेशधारी असंख्य भिक्षुक प्रकट हो जायँगे और लोग आश्रमोंके स्वरूपकी विभिन्न मनमानी कल्पना करने लगेंगे ॥ २५ ॥
अशृण्वानाः पुराणानां धर्माणां परमा गतीः ।
उत्पथं प्रतिपत्स्यन्ते काममन्युसमीरिताः ॥ २६ ॥
लोग काम और क्रोधसे प्रेरित होकर कुमार्गपर चलने लगेंगे। वे पुराणप्रोक्त प्राचीन धर्मोंके पालनका जो उत्तम फल है, उस विषयकी बात नहीं सुनेंगे ॥ २६ ॥
यदा निवर्त्यते पापो दण्डनीत्या महात्मभिः ।
तदा धर्मो न चलते सद्भूतः शाश्वतः परः ॥ २७ ॥
जब महामनस्वी राजालोग दण्डनीतिके द्वारा पापीको पाप करनेसे रोकते रहते हैं, तब सत्स्वरूप परमोत्कृष्ट सनातन धर्मका ह्रास नहीं होता है ॥ २७ ॥
सर्वलोकगुरुं चैव राजानं योऽवमन्यते ।
न तस्य दत्तं न हुतं न श्राद्धं फलते क्वचित् ॥ २८ ॥
जो मनुष्य सम्पूर्ण लोकोंके गुरुस्वरूप राजाका अपमान करता है, उसके किये दान, होम और श्राद्ध कभी सफल नहीं होते हैं ॥ २८ ॥
मानुषाणामधिपतिं देवभूतं सनातनम् ।
देवापि नावमन्यन्ते धर्मकामं नरेश्वरम् ॥ २९ ॥
राजा मनुष्योंका अधिपति, सनातन देवस्वरूप तथा धर्मकी इच्छा रखनेवाला होता है। देवता भी उसका अपमान नहीं करते हैं॥ २९॥ प्रजापतिर्हि भगवान् सर्वं चैवासृजज्जगत्। स प्रवृत्तिनिवृत्त्यर्थं धर्माणां क्षत्रमिच्छति॥ ३०॥ भगवान् प्रजापतिने जब इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की थी, उस समय लोगोंको सत्कर्ममें लगाने और दुष्कर्मसे निवृत्त करनेके लिये उन्होंने धर्मरक्षाके हेतु क्षात्रबलको प्रतिष्ठित करनेकी अभिलाषा की थी॥ ३०॥ प्रवृत्तस्य हि धर्मस्य बुद्ध्या यः स्मरते गतिम्। स मे मान्यश्च पूज्यश्च तत्र क्षत्रं प्रतिष्ठितम्॥ ३१॥ जो पुरुष प्रवृत्त धर्मकी गतिका अपनी बुद्धिसे विचार करता है, वही मेरे लिये माननीय और पूजनीय है; क्योंकि उसीमें क्षात्रधर्म प्रतिष्ठित है॥ ३१॥
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् मरुद्गणवृतः प्रभुः। जगाम भवनं विष्णोरक्षरं शाश्वतं पदम्॥ ३२॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! मान्धाताको इस प्रकार उपदेश देकर इन्द्ररूपधारी भगवान् विष्णु मरुद्गणोंके साथ अविनाशी एवं सनातन परमपद विष्णुधामको चले गये॥ एवं प्रवर्तिते धर्मे पुरा सुचरितेऽनघ। कः क्षत्रमवमन्येत चेतनावान् बहुश्रुतः॥ ३३॥ निष्पाप नरेश्वर! इस प्रकार प्राचीनकालमें भगवान् विष्णुने ही राजधर्मको प्रचलित किया और सत्पुरुषोंद्वारा वह भलीभाँति आचरणमें लाया गया। ऐसी दशामें कौन ऐसा सचेत और बहुश्रुत विद्वान् होगा, जो क्षात्रधर्मकी अवहेलना करेगा?॥ ३३॥ अन्यायेन प्रवृत्तानि निवृत्तानि तथैव च। अन्तरा विलयं यान्ति यथा पथि विचक्षुषः॥ ३४॥ अन्यायपूर्वक क्षत्रिय-धर्मकी अवहेलना करनेसे प्रवृत्ति और निवृत्ति धर्म भी उसी प्रकार बीचमें ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे अन्धा मनुष्य रास्तेमें नष्ट हो जाता है॥ आदौ प्रवर्तिते चक्रे तथैवादिपरायणे। वर्तस्व पुरुषव्याघ्र संविजानामि तेऽनघ॥ ३५॥ पुरुषसिंह! निष्पाप युधिष्ठिर! विधाताका यह आज्ञाचक्र (राजधर्म) आदि कालमें प्रचलित हुआ और पूर्ववर्ती महापुरुषोंका परम आश्रय बना रहा। तुम भी उसीपर चलो। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम इस क्षात्रधर्मके मार्गपर चलनेमें पूर्णतः समर्थ हो॥ ३५॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्रमान्धातृसंवादे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः॥ ६५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और मान्धाताका संवादविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६५ ।।
राजधर्मके पालनसे चारों आश्रमोंके धर्मका फल मिलनेका कथन
षट्षष्टितमोऽध्यायः
राजधर्मके पालनसे चारों आश्रमोंके धर्मका फल मिलनेका कथन
युधिष्ठिर उवाच
श्रुता मे कथिताः पूर्वे चत्वारो मानवाश्रमाः ।
व्याख्यानयित्वा व्याख्यानमेषामाचक्ष्व पृच्छतः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पितामह! आपने मानवमात्रके लिये जो चार आश्रम पहले बताये थे, वे सब मैंने सुन लिये। अब विस्तारपूर्वक इनकी व्याख्या कीजिये। मेरे प्रश्नके अनुसार इनका स्पष्टीकरण कीजिये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
विदिताः सर्व एवेह धर्मास्तव युधिष्ठिर ।
यथा मम महाबाहो विदिताः साधुसम्मताः ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**महाबाहु युधिष्ठिर! साधु पुरुषों-द्वारा सम्मानित समस्त धर्मोंका जैसा मुझे ज्ञान है, वैसा ही तुमको भी है ॥ २ ॥
यत्तु लिङ्गान्तरगतं पृच्छसे मां युधिष्ठिर ।
धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठ तन्निबोध नराधिप ॥ ३ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर! तथापि जो तुम विभिन्न लिङ्गों (हेतुओं) से रूपान्तरको प्राप्त हुए सूक्ष्म धर्मके विषयमें मुझसे पूछ रहे हो, उसके विषयमें कुछ निवेदन कर रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
सर्वाण्येतानि कौन्तेय विद्यन्ते मनुजर्षभ ।
साध्वाचारप्रवृत्तानां चातुराश्रम्यकारिणाम् ॥ ४ ॥
अकामद्वेषयुक्तस्य दण्डनीत्या युधिष्ठिर ।
समदर्शिनश्च भूतेषु भैक्ष्याश्रमपदं भवेत् ॥ ५ ॥
कुन्तीनन्दन! नरश्रेष्ठ! चारों आश्रमोंके धर्मोंका पालन करनेवाले सदाचारपरायण पुरुषोंको जिन फलोंकी प्राप्ति होती है, वे ही सब राग-द्वेष छोड़कर दण्डनीतिके अनुसार बर्ताव करनेवाले राजाको भी प्राप्त होते हैं। युधिष्ठिर! यदि राजा सब प्राणियोंपर समान दृष्टि रखनेवाला है तो उसे संन्यासियोंको प्राप्त होनेवाली गति प्राप्त होती है ॥ ४-५ ॥
वेत्ति ज्ञानविसर्गं च निग्रहानुग्रहं तथा ।
यथोक्तवृत्तेर्धीरस्य क्षेमाश्रमपदं भवेत् ॥ ६ ॥
जो तत्त्वज्ञान, सर्वत्याग, इन्द्रियसंयम तथा प्राणियोंपर अनुग्रह करना जानता है तथा जिसका पहले कहे अनुसार उत्तम आचार-विचार है, उस धीर पुरुषको कल्याणमय गृहस्थाश्रमसे मिलनेवाले फलकी प्राप्ति होती है ॥ ६ ॥
अर्हान् पूजयतो नित्यं संविभागेन पाण्डव ।
सर्वतस्तस्य कौन्तेय भैक्ष्याश्रमपदं भवेत् ॥ ७ ॥
पाण्डुनन्दन! इसी प्रकार जो पूजनीय पुरुषोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ देकर सदा सम्मानित करता है, उसे ब्रह्मचारियोंको प्राप्त होनेवाली गति मिलती है ॥ ७ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणि व्यापन्नानि युधिष्ठिर ।
समभ्युद्धरमाणस्य दीक्षाश्रमपदं भवेत् ॥ ८ ॥
युधिष्ठिर! जो संकटमें पड़े हुए अपने सजातियों, सम्बन्धियों और सुहृदोंका उद्धार करता है, उसे वानप्रस्थ-आश्रममें मिलनेवाले पदकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
लोकमुख्येषु सत्कारं लिङ्गिमुख्येषु चासकृत् ।
कुर्वतस्तस्य कौन्तेय वन्याश्रमपदं भवेत् ॥ ९ ॥
कुन्तीनन्दन! जो जगत्के श्रेष्ठ पुरुषों और आश्रमियोंका निरन्तर सत्कार करता है, उसे भी वानप्रस्थ-आश्रमद्वारा मिलनेवाले फलोंकी प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥
आह्निकं पितृयज्ञांश्च भूतयज्ञान् समानुषान् ।
कुर्वतः पार्थ विपुलान् वन्याश्रमपदं भवेत् ॥ १० ॥
कुन्तीनन्दन! जो नित्यप्रति संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म, पितृश्राद्ध, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ (अतिथि-सेवा)—इन सबका अनुष्ठान प्रचुर मात्रामें करता रहता है, उसे वानप्रस्थाश्रमके सेवनसे मिलनेवाले पुण्यफलकी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥
संविभागेन भूतानामतिथीनां तथार्चनात् ।
देवयज्ञैश्च राजेन्द्र वन्याश्रमपदं भवेत् ॥ ११ ॥
राजेन्द्र! बलिवैश्वदेवके द्वारा प्राणियोंको उनका भाग समर्पित करनेसे, अतिथियोंके पूजनसे तथा देवयज्ञोंके अनुष्ठानसे भी वानप्रस्थ-सेवनका फल प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
मर्दनं परराष्ट्राणां शिष्टार्थं सत्यविक्रम ।
कुर्वतः पुरुषव्याघ्र वन्याश्रमपदं भवेत् ॥ १२ ॥
सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह युधिष्ठिर! शिष्टपुरुषोंकी रक्षाके लिये अपने शत्रुके राष्ट्रोंको कुचल डालनेवाले राजाको भी वानप्रस्थ-सेवनका फल प्राप्त होता है ॥ १२ ॥
पालनात् सर्वभूतानां स्वराष्ट्रपरिपालनात् ।
दीक्षा बहुविधा राजन् सत्याश्रमपदं भवेत् ॥ १३ ॥
समस्त प्राणियोंके पालन तथा अपने राष्ट्रकी रक्षा करनेसे राजाको नाना प्रकारके यज्ञोंकी दीक्षा लेनेका पुण्य प्राप्त होता है। राजन्! इससे वह संन्यासाश्रमके सेवनका फल प्राप्त करता है ॥ १३ ॥
वेदाध्ययननित्यत्वं क्षमाथाचार्यपूजनम् । अथोपाध्यायशुश्रूषा ब्रह्मा श्रमपदं भवेत् ॥ १४ ॥ जो प्रतिदिन वेदोंका स्वाध्याय करता है, क्षमाभाव रखता है, आचार्यकी पूजा करता है और गुरुकी सेवामें संलग्न रहता है, उसे ब्रह्मा श्रम (संन्यास) द्वारा मिलनेवाला फल प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
आह्निकं जपमानस्य देवान् पूजयतः सदा । धर्मेण पुरुषव्याघ्र धर्माश्रमपदं भवेत् ॥ १५ ॥ पुरुषसिंह! जो प्रतिदिन इष्ट-मन्त्रका जप और देवताओंका सदा पूजन करता है, उसे उस धर्मके प्रभावसे धर्माश्रमके पालनका अर्थात् गार्हस्थ्य धर्मके पालनका पुण्यफल प्राप्त होता है ॥ १५ ॥
मृत्युर्वा रक्षणं वेति यस्य राज्ञो विनिश्चयः । प्राणद्यूते ततस्तस्य ब्रह्मा श्रमपदं भवेत् ॥ १६ ॥ जो राजा युद्धमें प्राणोंकी बाजी लगाकर इस निश्चयके साथ शत्रुओंका सामना करता है कि 'या तो मैं मर जाऊँगा या देशकी रक्षा करके ही रहूँगा' उसे भी ब्रह्मा श्रम अर्थात् संन्यास-आश्रमके पालनका ही फल प्राप्त होता है ॥ १६ ॥
अजिह्यमशठं मार्गं वर्तमानस्य भारत । सर्वदा सर्वभूतेषु ब्रह्मा श्रमपदं भवेत् ॥ १७ ॥ भरतनन्दन! जो सदा समस्त प्राणियोंके प्रति माया और कुटिलतासे रहित यथार्थ व्यवहार करता है, उसे भी ब्रह्मा श्रम सेवनका ही फल प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
वानप्रस्थेषु विप्रेषु त्रैविद्येषु च भारत । प्रयच्छतोऽर्थात् विपुलान् वन्याश्रमपदं भवेत् ॥ १८ ॥ भारत! जो वानप्रस्थ, ब्राह्मणों तथा तीनों वेदके विद्वानोंको प्रचुर धन दान करता है, उसे वानप्रस्थ-आश्रमके सेवनका फल मिलता है ॥ १८ ॥
सर्वभूतेष्वनुक्रोशं कुर्वतस्तस्य भारत । आनृशंस्यप्रवृत्तस्य सर्वावस्थं पदं भवेत् ॥ १९ ॥ भरतनन्दन! जो समस्त प्राणियोंपर दया करता है और क्रूरतारहित कर्मोंमें ही प्रवृत्त होता है, उसे सभी आश्रमोंके सेवनका फल प्राप्त होता है ॥ १९ ॥
बालवृद्धेषु कौन्तेय सर्वावस्थं युधिष्ठिर । अनुक्रोशक्रिया पार्थ सर्वावस्थं पदं भवेत् ॥ २० ॥ कुन्तीकुमार युधिष्ठिर! जो बालकों और बूढ़ोंके प्रति दयापूर्ण बर्ताव करता है, उसे भी सभी आश्रमोंके सेवनका फल प्राप्त होता है ॥ २० ॥
बलात्कृतेषु भूतेषु परित्राणं कुरूद्वह । शरणागतेषु कौरव्य कुर्वन् गार्हस्थ्यमावसेत् ॥ २१ ॥
कुरुनन्दन! जिन प्राणियोंपर बलात्कार हुआ हो और वे शरणमें आये हों, उनका संकटसे उद्धार करनेवाला पुरुष गार्हस्थ्य-धर्मके पालनसे मिलनेवाले पुण्यफलका भागी होता है ।। २१ ।। चराचराणां भूतानां रक्षणं चापि सर्वशः । यथार्हपूजां च तथा कुर्वन् गार्हस्थ्यमावसेत् ।। २२ ।। चराचर प्राणियोंकी सब प्रकारसे रक्षा तथा उनकी यथायोग्य पूजा करनेवाले पुरुषको गार्हस्थ्य-सेवनका फल प्राप्त होता है ।। २२ ।। ज्येष्ठानुज्येष्ठपत्नीनां भ्रातृणां पुत्रनप्तृणाम् । निग्रहानुग्रहौ पार्थ गार्हस्थ्यमिति तत् तपः ।। २३ ।। कुन्तीनन्दन! बड़ी-छोटी पत्नियों, भाइयों, पुत्रों और नातियोंको भी जो राजा अपराध करनेपर दण्ड और अच्छे कार्य करनेपर अनुग्रहरूप पुरस्कार देता है, यही उसके द्वारा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन है और यही उसकी तपस्या है ।। साधूनामर्चनीयानां पूजा सुविदितात्मनाम् । पालनं पुरुषव्याघ्र गृहाश्रमपदं भवेत् ।। २४ ।। पुरुषसिंह! पूजनके योग्य सुप्रसिद्ध आत्मज्ञानी साधुओंकी पूजा तथा रक्षा गृहस्थाश्रमके पुण्यफलकी प्राप्ति करानेवाली है ।। २४ ।। आश्रमस्थानि भूतानि यस्तु वेश्मनि भारत । आददीतेह भोज्येन तद् गार्हस्थ्यं युधिष्ठिर ।। २५ ।। भरतनन्दन युधिष्ठिर! जो किसी भी आश्रममें रहनेवाले प्राणियोंको अपने घरमें ठहराकर उनका भोजन आदिसे सत्कार करता है, उस राजाके लिये वही गार्हस्थ्य-धर्मका पालन है ।। २५ ।। यः स्थितः पुरुषो धर्मे धात्रा सृष्टे यथार्थवत् । आश्रमाणां हि सर्वेषां फलं प्राप्नोत्यनामयम् ।। २६ ।। जो पुरुष विधाताद्वारा विहित धर्ममें स्थित होकर यथार्थ रूपसे उसका पालन करता है, वह सभी आश्रमोंके निर्दोष फलको प्राप्त कर लेता है ।। २६ ।। यस्मिन्न नश्यन्ति गुणाः कौन्तेय पुरुषे सदा । आश्रमस्थं तमप्याहुर्नरश्रेष्ठं युधिष्ठिर ।। २७ ।। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जिस पुरुषमें स्थित हुए सद्गुणोंका कभी नाश नहीं होता, उस नरश्रेष्ठको सभी आश्रमोंके पालनमें स्थित बताया गया है ।। २७ ।। स्थानमानं कुले मानं वयोमानं तथैव च । कुर्वन् वसति सर्वेषु ह्याश्रमेषु युधिष्ठिर ।। २८ ।। युधिष्ठिर! जो राजा स्थान, कुल और अवस्थाका मान रखते हुए कार्य करता है, वह सभी आश्रमोंमें निवास करनेका फल पाता है ।। २८ ।।
देशधर्मांश्च कौन्तेय कुलधर्मांस्तथैव च ।
पालयन् पुरुषव्याघ्र राजा सर्वाश्रमी भवेत् ॥ २९ ॥
कुन्तीकुमार! पुरुषसिंह! देशधर्म और कुलधर्मका पालन करनेवाला राजा सभी आश्रमोंके पुण्यफलका भागी होता है ॥ २९ ॥
काले विभूतिं भूतानामुपहारांस्तथैव च ।
अर्हयन् पुरुषव्याघ्र साधूनामाश्रमे वसेत् ॥ ३० ॥
नरव्याघ्र नरेश! जो समय-समयपर सम्पत्ति और उपहार देकर समस्त प्राणियोंका सम्मान करता रहता है, वह साधु पुरुषोंके आश्रममें निवासका पुण्यफल पा लेता है ॥
दशधर्मगतश्चापि यो धर्मं प्रत्यवेक्षते ।
सर्वलोकस्य कौन्तेय राजा भवति सोऽश्रमी ॥ ३१ ॥
कुन्तीनन्दन! जो राजा मनुप्रोक्त दस धर्मोंमें स्थित होकर भी सम्पूर्ण जगत्के धर्मपर दृष्टि रखता है, वह सभी आश्रमोंके पुण्य-फलका भागी होता है ॥ ३१ ॥
ये धर्मकुशला लोके धर्मं कुर्वन्ति भारत ।
पालिता यस्य विषये धर्मांशस्तस्य भूपतेः ॥ ३२ ॥
भरतनन्दन! जो धर्मकुशल मनुष्य लोकमें धर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे जिस राजाके राज्यमें पालित होते हैं, उस राजाको उनके धर्मका छठा अंश प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
धर्मारामान् धर्मपरान् ये न रक्षन्ति मानवान् ।
पार्थिवाः पुरुषव्याघ्र तेषां पापं हरन्ति ते ॥ ३३ ॥
पुरुषसिंह! जो राजा धर्ममें ही रमण करनेवाले धर्मपरायण मानवोंकी रक्षा नहीं करते हैं, वे उनके पाप बटोर लेते हैं ॥ ३३ ॥
ये चाप्यत्र सहायाः स्युः पार्थिवानां युधिष्ठिर ।
ते चैवांशहराः सर्वे धर्मे परकृतेऽनघ ॥ ३४ ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! जो लोग इस जगत्में राजाओंके सहायक होते हैं, वे सभी उस राज्यमें दूसरोंद्वारा किये गये धर्मका अंश प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३४ ॥
सर्वाश्रमपदेऽप्याहुर्गाहस्थ्यं दीप्तनिर्णयम् ।
पावनं पुरुषव्याघ्र यं धर्मं पर्युपास्महे ॥ ३५ ॥
पुरुषसिंह! शास्त्रज्ञ विद्वान् कहते हैं कि हमलोग जिस गार्हस्थ्य-धर्मका सेवन कर रहे हैं, वह सभी आश्रमोंमें श्रेष्ठ एवं पावन है। उसके विषयमें शास्त्रोंका यह निर्णय सबको विदित है ॥ ३५ ॥
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति मानवः ।
न्यस्तदण्डो जितक्रोधः प्रेत्येह लभते सुखम् ॥ ३६ ॥
जो मानव समस्त प्राणियोंके प्रति अपने समान ही भाव रखता है, दण्डका त्याग कर देता है, क्रोधको जीत लेता है, वह इस लोकमें और मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी सुख पाता
है॥ ३६ ॥ धर्मे स्थिता सत्त्ववीर्या धर्मसेतुवटारका । त्यागवाताध्वगा शीघ्रा नौस्तं संतारयिष्यति ॥ ३७ ॥ राजधर्म एक नौकाके समान है। वह नौका धर्मरूपी समुद्रमें स्थित है। सत्त्वगुण ही उस नौकाका संचालन करनेवाला बल (कर्णधार) है, धर्मशास्त्र ही उसे बाँधनेवाली रस्सी है, त्यागरूपी वायुका सहारा पाकर वह मार्गपर शीघ्रतापूर्वक चलती है, वह नाव ही राजाको संसारसमुद्रसे पार कर देगी॥ ३७ ॥ यदा निवृत्तः सर्वस्मात् कामो योऽस्य हृदि स्थितः । तदा भवति सत्त्वस्थस्ततो ब्रह्म समश्नुते ॥ ३८ ॥ मनुष्यके हृदयमें जो-जो कामनाएँ स्थित हैं, उन सबसे जब वह निवृत्त हो जाता है, तब उसकी विशुद्ध सत्त्वगुणमें स्थिति होती है और इसी समय उसे परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार होता है॥ ३८ ॥ सुप्रसन्नस्तु भावेन योगेन च नराधिप । धर्मं पुरुषशार्दूल प्राप्स्यते पालने रतः ॥ ३९ ॥ नरेश्वर! पुरुषसिंह! चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप योगसे और समभावसे जब अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध एवं प्रसन्न हो जाता है, तब प्रजापालनपरायण राजा उत्तम धर्मके फलका भागी होता है॥ ३९ ॥ वेदाध्ययनशीलानां विप्राणां साधुकर्मणाम् । पालने यत्नमातिष्ठ सर्वलोकस्य चैव ह ॥ ४० ॥ युधिष्ठिर! तुम वेदाध्ययनमें संलग्न रहनेवाले, सत्कर्मपरायण ब्राह्मणों तथा अन्य सब लोगोंके पालन-पोषणका प्रयत्न करो॥ ४० ॥ वने चरन्ति ये धर्ममाश्रमेषु च भारत । रक्षणात् तच्छतगुणं धर्मं प्राप्नोति पार्थिवः ॥ ४१ ॥ भरतनन्दन! वनमें और विभिन्न आश्रमोंमें रहकर जो लोग जितना धर्म करते हैं, उनकी रक्षा करनेसे राजा उनसे सौगुने धर्मका भागी होता है॥ ४१ ॥ एष ते विविधो धर्मः पाण्डवश्रेष्ठ कीर्तितः । अनुतिष्ठ त्वमेनं वै पूर्वदृष्टं सनातनम् ॥ ४२ ॥ पाण्डवश्रेष्ठ! यह तुम्हारे लिये नाना प्रकारका धर्म बताया गया है। पूर्वजोंद्वारा आचरित इस सनातन-धर्मका तुम पालन करो॥ ४२ ॥ चातुराश्रम्यमैकाग्र्यं चातुर्वर्ण्यं च पाण्डव । धर्मं पुरुषशार्दूल प्राप्स्यसे पालने रतः ॥ ४३ ॥ पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! यदि तुम प्रजाके पालनमें तत्पर रहोगे तो चारों आश्रमोंके, चारों वर्णोंके तथा एकाग्रताके धर्मको प्राप्त कर लोगे॥ ४३ ॥