महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः
शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
कथं मृदौ कथं तीक्ष्णे महापक्षे च पार्थिव ।
आदौ वर्तेत नृपतिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! पृथ्वीपते! जिसका पक्ष प्रबल और महान् हो, वह शत्रु यदि कोमल स्वभावका हो तो उसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये और यदि वह तीक्ष्ण स्वभावका हो तो उसके साथ पहले किस तरहका बर्ताव करना राजाके लिये उचित है, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा—'युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष बृहस्पति और इन्द्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
बृहस्पतिं देवपतिरभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
उपसंगम्य पप्रच्छ वासवः परवीरहा ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले देवराज इन्द्रने बृहस्पतिजीके पास जा उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा ॥ ३ ॥
इन्द्र उवाच
अहितेषु कथं ब्रह्मन् प्रवर्तेयमतन्द्रितः ।
असमुच्छिद्य चैवैतान् नियच्छेयमुपायतः ॥ ४ ॥
**इन्द्र बोले—**ब्रह्मन्! मैं आलस्यरहित हो अपने शत्रुओंके प्रति कैसा बर्ताव करूँ? उन सबका समूलोच्छेद किये बिना ही उन्हें किस उपायसे वशमें करूँ? ॥ ४ ॥
सेनयोर्व्यतिषङ्गेण जयः साधारणो भवेत् ।
किंकुर्वाणं न मां जह्याज्ज्वलिता श्रीःप्रतापिनी ॥ ५ ॥
दो सेनाओंमें परस्पर भिड़न्त हो जानेपर विजय दोनों पक्षोंके लिये साधारण-सी वस्तु हो जाती है (अमुक पक्षकी ही जीत होगी, यह नियम नहीं रह जाता)। अतः मुझे क्या
करना चाहिये, जिससे शत्रुओंको संताप देनेवाली यह समुज्ज्वल राज्यलक्ष्मी मुझे कभी न छोड़े ॥ ५ ॥ ततो धर्मार्थकामानां कुशलः प्रतिभानवान् । राजधर्मविधानज्ञः प्रत्युवाच पुरंदरम् ॥ ६ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर धर्म, अर्थ और कामके प्रतिपादनमें कुशल, प्रतिभाशाली तथा राजधर्मके विधानको जाननेवाले बृहस्पतिने इन्द्रको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ६ ॥ बृहस्पतिरुवाच न जातु कलहेनेच्छेन्नियन्तुमपकारिणः । बालैरासेवितं ह्येतद् यदमर्षो यदक्षमा ॥ ७ ॥ **बृहस्पतिजी बोले—**राजन्! कोई भी राजा कभी कलह या युद्धके द्वारा शत्रुओंको वशमें करनेकी इच्छा न करे। असहनशीलता अथवा क्षमाको छोड़ना, यह बालकों या मूर्खोंद्वारा सेवित मार्ग है ॥ ७ ॥ न शत्रुर्विवृतः कार्यो वधमस्याभिकाङ्क्षता । क्रोधं भयं च हर्षं च नियम्य स्वयमात्मनि ॥ ८ ॥ शत्रुके वधकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह क्रोध, भय और हर्षको अपने मनमें ही रोक ले तथा शत्रुको सावधान न करे ॥ ८ ॥ अमित्रमुपसेवेत विश्वस्तवदविश्वसन् । प्रियमेव वदेन्नित्यं नाप्रियं किंचिदाचरेत् ॥ ९ ॥ भीतरसे विश्वास न करते हुए भी बाहरसे विश्वस्त पुरुषकी भाँति अपना भाव प्रदर्शित करते हुए शत्रुको सेवा करे। सदा उससे प्रिय वचन ही बोले, कभी कोई अप्रिय बर्ताव न करे ॥ ९ ॥ विरमेच्छुष्कवैरेभ्यः कण्ठायासांश्च वर्जयेत् । यथा वैतंसिको युक्तो द्विजानां सदृशस्वनः ॥ १० ॥ तान् द्विजान् कुरुते वश्यांस्तथा युक्तो महीपतिः । वश चोप नयेच्छत्रून् निहन्याच्च पुरंदर ॥ ११ ॥ पुरंदर! सूखे वैरसे अलग रहे, कण्ठको पीड़ा देनेवाले वाद-विवादको त्याग दे। जैसे व्याध अपने कार्यमें सावधानीके साथ संलग्न हो पक्षियोंको फँसानेके लिये उन्हींके समान बोली बोलता है और मौका पाकर उन पक्षियोंको वशमें कर लेता है, उसी प्रकार उद्योगशील राजा धीरे-धीरे शत्रुओंको वशमें कर ले। तत्पश्चात् उन्हें मार डाले ॥ १०-११ ॥ न नित्यं परिभूयारीन् सुखं स्वपिति वासव । जागत्र्येव हि दुष्टात्मा संकरेऽग्निरिवोत्थितः ॥ १२ ॥
इन्द्र! जो सदा शत्रुओंका तिरस्कार ही करता है, वह सुखसे सोने नहीं पाता। वह दुष्टात्मा नरेश बाँस और घास-फूसमें प्रज्वलित हो चट-चट शब्द करनेवाली आगके समान सदा जागता ही रहता है ॥ १२ ॥
न संनिपातः कर्तव्यः सामान्ये विजये सति ।
विश्वास्यैवोपसन्नार्थो वशे कृत्वा रिपुः प्रभो ॥ १३ ॥
प्रभो! जब युद्धमें विजय एक सामान्य वस्तु है (किसीको भी वह मिल सकती है), तब उसके लिये पहले ही युद्ध नहीं करना चाहिये, अपितु शत्रुको अच्छी तरह विश्वास दिलाकर वशमें कर लेनेके पश्चात् अवसर देखकर उसके सारे मनसूबेको नष्ट कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
सम्प्रधार्य सहामात्यैर्मन्त्रविद्भिर्महात्मभिः ।
उपेक्ष्यमाणोऽवज्ञातो हृदयेनापराजितः ॥ १४ ॥
अथास्य प्रहरेत् काले किंचिद्विचलिते पदे ।
दण्डं च दूषयेदस्य पुरुषैराप्तकारिभिः ॥ १५ ॥
शत्रुके द्वारा उपेक्षा अथवा अवहेलना की जानेपर भी राजा अपने मनमें हिम्मत न हारे। वह मन्त्रियोंसहित मन्त्रवेत्ता महापुरुषोंके साथ कर्त्तव्यका निश्चय करके समय आनेपर जब शत्रुकी स्थिति कुछ डाँवाडोल हो जाय, तब उसपर प्रहार करे और विश्वासपात्र पुरुषोंको भेजकर उनके द्वारा शत्रुकी सेनामें फूट डलवा दे ॥
आदिमध्यावसानज्ञः प्रच्छन्नं च विधारयेत् ।
बलानि दूषयेदस्य जानन्नेव प्रमाणतः ॥ १६ ॥
राजा शत्रुके राज्यकी आदि, मध्य और अन्तिम सीमाको जानकर गुप्तरूपसे मन्त्रियोंके साथ बैठकर अपने कर्तव्यका निश्चय कर तथा शत्रुकी सेनाकी संख्या कितनी है, इसको अच्छी तरह जानते हुए ही उसमें फूट डलवानेकी चेष्टा करे ॥ १६ ॥
भेदेनोप्रदानेन संसृजेदौषधैस्तथा ।
न त्वेवं खलु संसर्गं रोचयेदरिभिः सह ॥ १७ ॥
राजाको चाहिये कि वह दूर रहकर गुप्तचरोंद्वारा शत्रुकी सेनामें मतभेद पैदा करे। घूस देकर लोगोंको अपने पक्षमें करनेकी चेष्टा करे अथवा उनके ऊपर विभिन्न औषधोंका प्रयोग करे; परंतु किसी तरह भी शत्रुओंके साथ प्रकटरूपसे साक्षात् सम्बन्ध स्थापित करनेकी इच्छा न करे ॥ १७ ॥
दीर्घकालमपीक्षेत निहन्यादेव शात्रवान् ।
कालाकाङ्क्षी हि क्षपयेद् यथा विश्रम्भमाप्नुयुः ॥ १८ ॥
अनुकूल अवसर पानेके लिये कालक्षेप ही करता रहे। उसके लिये दीर्घ कालतक भी प्रतीक्षा करनी पड़े तो करे, जिससे शत्रुओंको भलीभाँति विश्वास हो जाय। तदनन्तर मौका पाकर उन्हें मार ही डाले ॥ १८ ॥
न सद्योऽरीन् विहन्याच्च द्रष्टव्यो विजयो ध्रुवः ।
न शल्यं वा घटयति न वाचा कुरुते व्रणम् ॥ १९ ॥
राजा शत्रुओंपर तत्काल आक्रमण न करे। अवश्यम्भावी विजयके उपायपर विचार करे। न तो उसपर विषका प्रयोग करे और न उसे कठोर वचनोंद्वारा ही घायल करे ॥ १९ ॥
प्राप्ते च प्रहरेत् काले न च संवर्तते पुनः ।
हन्तुकामस्य देवेन्द्र पुरुषस्य रिपून् प्रति ॥ २० ॥
देवेन्द्र! जो शत्रुको मारना चाहता है, उस पुरुषके लिये बारंबार मौका हाथमें नहीं लगता; अतः जब कभी अवसर मिल जाय, उस समय उसपर अवश्य प्रहार करे ॥
यो हि कालो व्यतिक्रामेत् पुरुषं कालकांक्षिणम् ।
दुर्लभः स पुनस्तेन कालः कर्मचिकीर्षुणा ॥ २१ ॥
समयकी प्रतीक्षा करनेवाले पुरुषके लिये जो उपयुक्त अवसर आकर भी चला जाता है, वह अभीष्ट कार्य करनेकी इच्छावाले उस पुरुषके लिये फिर दुर्लभ हो जाता है ॥ २१ ॥
ओजश्च जनयेदेव संगृह्णन् साधुसम्मतम् ।
अकाले साधयेन्मित्रं न च प्राप्ते प्रपीडयेत् ॥ २२ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर अपने बलको सदा बढ़ाता रहे। जबतक अनुकूल अवसर न आये, तबतक अपने मित्रोंकी संख्या बढ़ावे और शत्रुको भी पीड़ा न दे; परंतु अवसर आ जाय तो शत्रुपर प्रहार करनेसे न चूके ॥ २२ ॥
विहाय कामं क्रोधं च तथाहंकारमेव च ।
युक्तो विवरमन्विच्छेदहितानां पुनः पुनः ॥ २३ ॥
काम, क्रोध तथा अहंकारको त्यागकर सावधानीके साथ बारंबार शत्रुओंके छिद्रोंको देखता रहे ॥ २३ ॥
मार्दवं दण्ड आलस्यं प्रमादश्च सुरोत्तम ।
मायाः सुविहिताः शक्र सादयन्त्यविचक्षणम् ॥ २४ ॥
सुरश्रेष्ठ इन्द्र! कोमलता, दण्ड, आलस्य, असावधानी और शत्रुओंद्वारा अच्छी तरह प्रयोग की हुई माया—ये अनभिज्ञ राजाको बड़े कष्टमें डाल देते हैं ॥ २४ ॥
निहत्यैतानि चत्वारि मायां प्रति विधाय च ।
ततः शक्नोति शत्रूणां प्रहर्तुमविचारयन् ॥ २५ ॥
कोमलता, दण्ड, आलस्य और प्रमाद—इन चारोंको नष्ट करके शत्रुको मायाका भी प्रतीकार करे। तत्पश्चात् वह बिना विचारे शत्रुओंपर प्रहार कर सकता है ॥ २५ ॥
यदैकैकेन शक्येत गुह्यं कर्तुं तदाचरेत् ।
यच्छन्ति सचिवा गुह्यं मिथो विश्रावयन्त्यपि ॥ २६ ॥
राजा अकेला ही जिस गुप्त कार्यको कर सके, उसे अवश्य कर डाले; क्योंकि मन्त्रीलोग कभी-कभी गुप्त विषयको प्रकाशित कर देते हैं और नहीं तो आपसमें ही एक-दूसरेको सुना देते हैं ॥ २६ ॥ अशक्यमिति कृत्वा वा ततोऽन्यैः संविदं चरेत् । ब्रह्मदण्डमदृष्टेषु दृष्टेषु चतुरङ्गिणीम् ॥ २७ ॥ जो कार्य अकेले करना असम्भव हो जाय, उसीके लिये दूसरोंके साथ बैठकर विचार-विमर्श करे। यदि शत्रु दूरस्थ होनेके कारण दृष्टिगोचर न हो तो उसपर ब्रह्मदण्डका प्रयोग करे और यदि शत्रु निकटवर्ती होनेके कारण दृष्टिगोचर हो तो उसपर चतुरङ्गिणी सेना भेजकर आक्रमण करे ॥ २७ ॥ भेदं च प्रथमं युञ्ज्यात् तूष्णीं दण्डं तथैव च । काले प्रयोजयेद् राजा तस्मिंस्तस्मिंस्तदा तदा ॥ २८ ॥ राजा शत्रुके प्रति पहले भेदनीतिका प्रयोग करे। तत्पश्चात् वह उपयुक्त अवसर आनेपर भिन्न-भिन्न शत्रुके प्रति भिन्न-भिन्न समयमें चुपचाप दण्डनीतिका प्रयोग करे ॥ २८ ॥ प्रणिपातं च गच्छेत काले शत्रोर्बलीयसः । युक्तोऽस्य वधमन्विच्छेदप्रमत्तः प्रमाद्यतः ॥ २९ ॥ यदि बलवान् शत्रुसे पाला पड़ जाय और समय उसीके अनुकूल हो तो राजा उसके सामने नतमस्तक हो जाय और जब वह शत्रु असावधान हो, तब स्वयं सावधान और उद्योगशील होकर उसके वधके उपायका अन्वेषण करे ॥ २९ ॥ प्रणिपातेन दानेन वाचा मधुरया ब्रुवन् । अमित्रमपि सेवेत न च जातु विशङ्कयेत् ॥ ३० ॥ राजाको चाहिये कि वह मस्तक झुकाकर, दान देकर तथा मीठे वचन बोलकर शत्रुं का भी मित्रके समान ही सेवन करे। उसके मनमें कभी संदेह न उत्पन्न होने दे ॥ ३० ॥ स्थानानि शङ्कितानां च नित्यमेव विवर्जयेत् । न च तेष्वाश्वसेद् राजा जाग्रतीह निराकृताः ॥ ३१ ॥ जिन शत्रुओंके मनमें संदेह उत्पन्न हो गया हो, उनके निकटवर्ती स्थानोंमें रहना या आना-जाना सदाके लिये त्याग दे। राजा उनपर कभी विश्वास न करे; क्योंकि इस जगत्में उसके द्वारा तिरस्कृत या क्षतिग्रस्त हुए शत्रुगण सदा बदला लेनेके लिये सजग रहते हैं ॥ ३१ ॥ न ह्यतो दुष्करं कर्म किंचिदस्ति सुरोत्तम । यथा विविधवृत्तानामैश्वर्यममराधिप ॥ ३२ ॥ देवेश्वर! सुरश्रेष्ठ! नाना प्रकारके व्यवहारचतुर लोगोंके ऐश्वर्यपर शासन करना जितना कठिन काम है, उससे बढ़कर दुष्कर कर्म दूसरा कोई नहीं है ॥ ३२ ॥ तथा विविधवृत्तानामपि सम्भव उच्यते ।
यतते योगमास्थाय मित्रामित्रं विचारयेत् ॥ ३३ ॥ वैसे भिन्न-भिन्न व्यवहारचतुर लोगोंके ऐश्वर्यपर भी शासन करना तभी सम्भव बताया गया है, जब कि राजा मनोयोगका आश्रय ले सदा इसके लिये प्रयत्नशील रहे और कौन मित्र है तथा कौन शत्रु; इसका विचार करता रहे ॥ ३३ ॥
मृदुमप्यवमन्यन्ते तीक्ष्णादुद्विजते जनः । मा तीक्ष्णो मा मृदुर्भूस्त्वं तीक्ष्णो भव मृदुर्भव ॥ ३४ ॥ मनुष्य कोमल स्वभाववाले राजाका अपमान करते हैं और अत्यन्त कठोर स्वभाववालेसे भी उद्विग्न हो उठते हैं; अतः तुम न कठोर बनो, न कोमल। समय-समयपर कठोरता भी धारण करो और कोमल भी हो जाओ ॥ ३४ ॥
यथा वप्रे वेगवति सर्वतः सम्प्लुतोदके । नित्यं विवरणाद् बाधस्तथा राज्यं प्रमाद्यतः ॥ ३५ ॥ जैसे जलका प्रवाह बड़े वेगसे बह रहा हो और सब ओर जल-ही-जल फैल रहा हो, उस समय नदीतटके विदीर्ण होकर गिर जानेका सदा ही भय रहता है। उसी प्रकार यदि राजा सावधान न रहे तो उसके राज्यके नष्ट होनेका खतरा बना रहता है ॥ ३५ ॥
न बहूनभियुञ्जीत यौगपद्येन शात्रवान् । साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन च पुरंदर ॥ ३६ ॥ एकैकमेषां निष्पिष्य शिष्टेषु निपुणं चरेत् । न तु शक्तोऽपि मेधावी सर्वानैवारभेन्नृपः ॥ ३७ ॥ पुरंदर! बहुत-से शत्रुओंपर एक ही साथ आक्रमण नहीं करना चाहिये। साम, दान, भेद और दण्डके द्वारा इन शत्रुओंमेंसे एक-एकको बारी-बारीसे कुचलकर शेष बचे हुए शत्रुको पीस डालनेके लिये कुशलतापूर्वक प्रयत्न आरम्भ करे। बुद्धिमान् राजा शक्तिशाली होनेपर भी सब शत्रुओंको कुचलनेका कार्य एक ही साथ आरम्भ न करे ॥ ३६-३७ ॥
यदा स्यान्महती सेना हयनागरथाकुला । पदातियन्त्रबहुला अनुरक्ता षडङ्गिनी ॥ ३८ ॥ यदा बहुविधां वृद्धिं मन्येत प्रतिलोमतः । तदा विवृत्य प्रहरेद् दस्यूनामविचारयन् ॥ ३९ ॥ जब हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई और बहुत-से पैदलों तथा यन्त्रोंसे सम्पन्न, छः-* अंगोंवाली विशाल सेना स्वामीके प्रति अनुरक्त हो, जब शत्रुकि अपेक्षा अपनी अनेक प्रकारसे उन्नति होती जान पड़े, उस समय राजा दूसरा कोई विचार मनमें न लाकर प्रकटरूपसे डाकू और लुटेरोंपर प्रहार आरम्भ कर दे ॥ ३८-३९ ॥
न सामदण्डोपनिषत् प्रशस्यते । न मार्दवं शत्रुषु यात्रिकं सदा । न सस्यघातो न च संकरक्रिया
न चापि भूयः प्रकृतेर्विचारणा ॥ ४० ॥ शत्रुके प्रति सामनीतिका प्रयोग अच्छा नहीं माना जाता, बल्कि गुप्तरूपसे दण्डनीतिका प्रयोग ही श्रेष्ठ समझा जाता है। शत्रुओंके प्रति न तो कोमलता और न उनपर आक्रमण करना ही सदा ठीक माना जाता है। उनकी खेतीको चौपट करना तथा वहाँके जल आदिमें विष मिला देना भी अच्छा नहीं है। इसके सिवा, सात प्रकृतियोंपर विचार करना भी उपयोगी नहीं है (उसके लिये तो गुप्त दण्डका प्रयोग ही श्रेष्ठ है) ॥ ४० ॥
मायाविभेदानुपसर्जनानि तथैव पापं न यशःप्रयोगात् । आप्तैर्मनुष्यैरुपचारयेत पुरेषु राष्ट्रेषु च सम्प्रयुक्तान् ॥ ४१ ॥ राजा विश्वस्त मनुष्योंद्वारा शत्रुके नगर और राज्यमें नाना प्रकारके छल और परस्पर वैर-विरोधकी सृष्टि कर दे। इसी तरह छद्मवेषमें वहाँ अपने गुप्तचर नियुक्त कर दे; परंतु अपने यशकी रक्षाके लिये वहाँ अपनी ओरसे चोरी या गुप्त हत्या आदि कोई पापकर्म न होने दे ॥ ४१ ॥
पुरापि चैषामनुसृत्य भूमिपाः पुरेषु भोगानखिलान् जयन्ति । पुरेषु नीतिं विहितां यथाविधि प्रयोजयन्तो बलवृत्रसूदन ॥ ४२ ॥ बल और वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्र! पृथ्वीका पालन करनेवाले राजालोग पहले इन शत्रुओंके नगरोंमें विधिपूर्वक व्यवहारमें लायी हुई नीतिका प्रयोग करके दिखावें। इस प्रकार उनके अनुकूल व्यवहार करके वे उनकी राजधानीमें सारे भोगोंपर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४२ ॥
प्रदाय गूढानि वसूनि राजन् प्रच्छिद्य भोगानवधाय च स्वान् । दुष्टान् स्वदोषैरिति कीर्तयित्वा पुरेषु राष्ट्रेषु च योजयन्ति ॥ ४३ ॥ देवराज! राजा अपने ही आदमियोंके विषयमें यह प्रचार कर देते हैं कि 'ये लोग दोषसे दूषित हो गये हैं; अतः मैंने इन दुष्टोंको राज्यसे बाहर निकाल दिया है। ये दूसरे देशमें चले गये हैं। ऐसा करके उन्हें वह शत्रुओंके राज्यों और नगरोंका भेद लेनेके कार्यमें नियुक्त कर देते हैं। ऊपरसे तो वे उनकी सारी भोग-सामग्री छीन लेते हैं; परंतु गुप्तरूपसे उन्हें प्रचुर धन अर्पित करके उनके साथ कुछ अन्य आत्मीय जनोंको भी लगा देते हैं ॥ ४३ ॥
तथैव चान्यैरपि शास्त्रवेदिभिः स्वलंकृतैः शास्त्रविधानदृष्टिभिः ।
सुशिक्षितैर्भाष्यकथाविशारदैः
परेषु कृत्यामुपधारयेच्च ॥ ४४ ॥
इसी तरह अन्यान्य शास्त्रज्ञ शास्त्रीय विधिके ज्ञाता सुशिक्षित तथा भाष्यकथाविशारद विद्वानोंको वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके उनके द्वारा शत्रुओंपर कृत्याका प्रयोग करावे ॥ ४४ ॥
इन्द्र उवाच
कानि लिङ्गानि दुष्टस्य भवन्ति द्विजसत्तम ।
कथं दुष्टं विजानीयामेतत् पृष्टो वदस्व मे ॥ ४५ ॥
इन्द्रने पूछा—‘द्विजश्रेष्ठ! दुष्टके कौन-कौन-से लक्षण हैं? मैं दुष्टको कैसे पहचानूँ? मेरे इस प्रश्नका मुझे उत्तर दीजिये ॥ ४५ ॥
बृहस्पतिरुवाच
परोक्षमगुणानाह सद्गुणानभ्यसूयते ।
परैर्वा कीर्त्यमानेषु तूष्णीमास्ते पराङ्मुखः ॥ ४६ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**देवराज! जो परोक्षमें किसी व्यक्तिके दोष-ही-दोष बताता है, उसके सद्गुणोंमें भी दोषारोपण करता रहता है और यदि दूसरे लोग उसके गुणोंका वर्णन करते हैं तो जो मुँह फेरकर चुप बैठ जाता है, वही दुष्ट माना जाता है ॥ ४६ ॥
तूष्णीम्भावेऽपि विज्ञेयं न भेदं भवति कारणम् ।
निःश्वासं चोष्ठसंदंशं शिरसश्च प्रकम्पनम् ॥ ४७ ॥
चुप बैठनेपर भी उस व्यक्तिकी दुष्टताको इस प्रकार जाना जा सकता है। निःश्वास छोड़नेका कोई कारण न होनेपर भी जो किसीके गुणोंका वर्णन होते समय लंबी-लंबी साँस छोड़े, ओठ चबाये और सिर हिलाये, वह दुष्ट है ॥ ४७ ॥
करोत्यभीक्ष्णं संसृष्टमसंसृष्टश्च भाषते ।
अदृष्टितो न कुरुते दृष्टो नैवाभिभाषते ॥ ४८ ॥
जो बारंबार आकर संसर्ग स्थापित करता है, दूर जानेपर दोष बताता है, कोई कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके भी आँखसे ओझल होनेपर उस कार्यको नहीं करता है और आँखके सामने होनेपर भी कोई बातचीत नहीं करता, उसके मनमें भी दुष्टता भरी है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ४८ ॥
पृथगेत्य समश्नाति नेदमद्य यथाविधि ।
आसने शयने याने भावा लक्ष्या विशेषतः ॥ ४९ ॥
जो कहींसे आकर साथ नहीं, अलग बैठकर खाता है और कहता है, आजका जैसा भोजन चाहिये, वैसा नहीं बना है (वह भी दुष्ट है)। इस प्रकार बैठने, सोने और चलने-फिरने आदिमें दुष्ट व्यक्तिके दुष्टतापूर्ण भाव विशेषरूपसे देखे जाते हैं ॥ ४९ ॥
आर्तिरार्ते प्रिये प्रीतिरेतावन्मित्रलक्षणम् ।
विपरीतं तु बोद्धव्यमरिलक्षणमेव तत् ॥ ५० ॥
यदि मित्रके पीड़ित होनेपर किसीको स्वयं भी पीड़ा होती हो और मित्रके प्रसन्न रहनेपर उसके मनमें भी प्रसन्नता छायी रहती हो तो यही मित्रके लक्षण हैं। इसके विपरीत जो किसीको पीड़ित देखकर प्रसन्न होता और प्रसन्न देखकर पीड़ाका अनुभव करता है तो समझना चाहिये कि यह शत्रुके लक्षण हैं ॥ ५० ॥
एतान्येव यथोक्तानि बुध्येथास्त्रिदशाधिप ।
पुरुषाणां प्रदुष्टानां स्वभावो बलवत्तरः ॥ ५१ ॥
देवेश्वर! इस प्रकार जो मनुष्योंके लक्षण बताये गये हैं, उनको समझना चाहिये। दुष्ट पुरुषोंका स्वभाव अत्यन्त प्रबल होता है ॥ ५१ ॥
इति दुष्टस्य विज्ञानमुक्तं ते सुरसत्तम ।
निशम्य शास्त्रतत्त्वार्थं यथावदमरेश्वर ॥ ५२ ॥
सुरश्रेष्ठ! देवेश्वर! शास्त्रके सिद्धान्तका यथावत् रूपसे विचार करके ये मैंने तुमसे दुष्ट पुरुषकी पहचान करानेवाले लक्षण बताये हैं ॥ ५२ ॥
भीष्म उवाच
स तद्वचः शत्रुनिबर्हणे रत-
स्तथा चकारावितथं बृहस्पतेः ।
चचार काले विजयाय चारिहा
वशं च शत्रूननयत् पुरंदरः ॥ ५३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! शत्रुओंके संहारमें तत्पर रहनेवाले शत्रुनाशक इन्द्रने बृहस्पतिजीका वह यथार्थ वचन सुनकर वैसा ही किया। उन्होंने उपयुक्त समयपर विजयके लिये यात्रा की और समस्त शत्रुओंको अपने अधीन कर लिया ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥
* हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, कोश और धनी वैश्य—ये सेनाके छः अंग हैं।
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यदि राजा धर्मात्मा हो और उद्योग करते रहनेपर भी धन न पा सके, उस अवस्थामें यदि मन्त्री उसे कष्ट देने लगें और उसके पास खजाना तथ
चतुरधिकशततमोऽध्यायः
राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश
युधिष्ठिर उवाच
धार्मिकोऽर्थानसम्प्राप्य राजामात्यैः प्रबाधितः ।
च्युतः कोशाच्च दण्डाच्च सुखमिच्छन् कथं चरेत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यदि राजा धर्मात्मा हो और उद्योग करते रहनेपर भी धन न पा सके, उस अवस्थामें यदि मन्त्री उसे कष्ट देने लगें और उसके पास खजाना तथा सेना भी न रह जाय तो सुख चाहनेवाले उस राजाको कैसे काम चलाना चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्रायं क्षेमदर्शीय इतिहासोऽनुगीयते ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें यह क्षेमदर्शीका इतिहास जगत्में बार-बार कहा जाता है। उसीको मैं तुमसे कहूँगा। तुम ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥
क्षेमदर्शी नृपसुतो यत्र क्षीणबलः पुरा ।
मुनिं कालकवृक्षीयमाजगामेति नः श्रुतम् ।
तं पप्रच्छानुसंगृह्य कृच्छ्रामापदमास्थितः ॥ ३ ॥
हमने सुना है कि प्राचीनकालमें एक बार कोसलराजकुमार क्षेमदर्शीको बड़ी कठिन विपत्तिका सामना करना पड़ा। उसकी सारी सैनिक-शक्ति नष्ट हो गयी। उस समय वह कालकवृक्षीय मुनिके पास गया और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उसने उस विपत्तिसे छुटकारा पानेका उपाय पूछा ॥ ३ ॥
राजोवाच
अर्थेषु भागी पुरुष ईहमानः पुनः पुनः ।
अलब्ध्वा मद्विधो राज्यं ब्रह्मन् किं कर्तुमर्हति ॥ ४ ॥
राजाने इस प्रकार प्रश्न किया— ब्रह्मन्! मनुष्य धनका भागीदार समझा जाता है; किंतु मेरे-जैसा पुरुष बार-बार उद्योग करनेपर भी यदि राज्य न पा सके तो उसे क्या करना चाहिये? ॥ ४ ॥
अन्यत्र मरणाद् दैन्यादन्यत्र परसंश्रयात् ।
क्षुद्रादन्यत्र चाचारात् तन्ममाचक्ष्व सत्तम ॥ ५ ॥ साधुशिरोमणे! आत्मघात करने, दीनता दिखाने, दूसरोंकी शरणमें जाने तथा इसी तरहके और भी नीच कर्म करनेकी बात छोड़कर दूसरा कोई उपाय हो तो वह मुझे बताइये ॥ ५ ॥
व्याधिना चाभिपन्नस्य मानसेनेतरेण वा । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च त्वद्विधः शरणं भवेत् ॥ ६ ॥ जो मानसिक अथवा शारीरिक रोगसे पीड़ित है, ऐसे मनुष्यको आप-जैसे धर्मज्ञ और कृतज्ञ महात्मा ही शरण देनेवाले होते हैं ॥ ६ ॥
निर्विद्यति नरः कामान्निर्विद्य सुखमेधते । त्यक्त्वा प्रीतिं च शोकं च लब्ध्वा बुद्धिमयं वसु ॥ ७ ॥ मनुष्यको जब कभी विषय-भोगोंसे वैराग्य होता है, तब विरक्त होनेपर वह हर्ष और शोकको त्याग देता है तथा ज्ञानमय धन पाकर नित्य सुखका अनुभव करने लगता है ॥ ७ ॥
सुखमर्थाश्रयं येषामनुशोचामि तानहम् । मम ह्यर्थाः सुबहवो नष्टाः स्वप्न इवागताः ॥ ८ ॥ जिनके सुखका आधार धन है, अर्थात् जो धनसे ही सुख मानते हैं, उन मनुष्योंके लिये मैं निरन्तर शोक करता हूँ; क्योंकि मेरे पास धन बहुत था, परंतु वह सब सपनेमें मिली हुई सम्पत्तिकी तरह नष्ट हो गया ॥ ८ ॥
दुष्करं बत कुर्वन्ति महतोऽर्थांस्त्यजन्ति ये । वयं त्वेतान् परित्यक्तुमसतोऽपि न शक्नुमः ॥ ९ ॥ मेरी समझमें जो अपनी विशाल सम्पत्तिको त्याग देते हैं वे अत्यन्त दुष्कर कार्य करते हैं। मेरे पास तो अब धनके नामपर कुछ नहीं है, तो भी मैं उसका मोह नहीं छोड़ पाता हूँ ॥ ९ ॥
इमामवस्थां सम्प्राप्तं दीनमार्तं श्रिया च्युतम् । यदन्यत् सुखमस्तीह तद् ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ॥ १० ॥ ब्रह्मन्! मैं राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट, दीन और आर्त होकर इस शोचनीय अवस्थामें आ पड़ा हूँ। इस जगत्में धनके अतिरिक्त जो सुख हो, उसीका मुझे उपदेश कीजिये ॥ १० ॥
कौसल्येनैवमुक्तस्तु राजपुत्रेण धीमता । मुनिः कालकवृक्षीयः प्रत्युवाच महाद्युतिः ॥ ११ ॥ बुद्धिमान् कोसलराजकुमारके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी कालकवृक्षीय मुनिने इस तरह उत्तर दिया ॥ ११ ॥
मुनिरुवाच
पुरस्तादेव ते बुद्धिरियं कार्या विजानता ।
अनित्यं सर्वमेवैतदहं च मम चास्ति यत् ॥ १२ ॥
**मुनि बोले—**राजकुमार! तुम समझदार हो; अतः तुम्हें पहलेसे ही अपनी बुद्धिके द्वारा ऐसा ही निश्चय कर लेना उचित था। इस जगत्में 'मैं' और 'मेरा' कहकर जो कुछ भी समझा या ग्रहण किया जाता है, वह सब अनित्य ही है ॥ १२ ॥
यत् किंचिन्मन्यसेऽस्तीति सर्वं नास्तीति विद्धि तत् ।
एवं न व्यथते प्राज्ञः कृच्छ्रामप्यापदं गतः ॥ १३ ॥
तुम जिस किसी वस्तुको ऐसा मानते हो कि 'यह है' वह सब पहलेसे ही समझ लो कि 'नहीं है' ऐसा समझनेवाला विद्वान् पुरुष कठिन-से-कठिन विपत्तिमें पड़नेपर भी व्यथित नहीं होता ॥ १३ ॥
यद्धि भूतं भविष्यं च सर्वं तन्न भविष्यति ।
एवं विदितवेद्यस्त्वमधर्मेभ्यः प्रमोक्ष्यसे ॥ १४ ॥
जो वस्तु पहले थी और होगी, वह सब न तो थी और न होगी ही। इस प्रकार जानने योग्य तत्त्वको जान लेनेपर तुम सम्पूर्ण अधर्मोंसे छुटकारा पा जाओगे ॥ १४ ॥
यच्च पूर्वं समाहारे यच्च पूर्वं परे परे ।
सर्वं तन्नास्ति ते चैव तज्ज्ञात्वा कोऽनुसंज्वरेत् ॥ १५ ॥
जो वस्तु पहले बहुत बड़े समुदायके अधीन (गणतन्त्र) रह चुकी है तथा जो एकके बाद दूसरेकी होती आयी है, वह सबकी सब तुम्हारी भी नहीं है; इस बातको भलीभाँति समझ लेनेपर किसको बारंबार चिन्ता होगी? ॥ १५ ॥
भूत्वा च न भवत्येतदभूत्वा च भविष्यति ।
शोके न ह्यस्ति सामर्थ्यं शोकं कुर्यात् कथंचन ॥ १६ ॥
यह राजलक्ष्मी होकर भी नहीं रहती और जिनके पास नहीं होती, उनके पास आ जाती है; परंतु शोककी सामर्थ्य नहीं है कि वह गयी हुई सम्पत्तिको लौटा लावे; अतः किसी तरह भी शोक नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥
क्व नु तेऽद्य पिता राजन् क्व नु तेऽद्य पितामहः ।
न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेऽपि च ॥ १७ ॥
राजन्! बताओ तो सही, तुम्हारे पिता आज कहाँ हैं? तुम्हारे पितामह अब कहाँ चले गये? आज न तो तुम उन्हें देखते हो और न वे तुम्हें देख पाते हैं ॥ १७ ॥
आत्मनोऽध्रुवतां पश्यंस्तांस्त्वं किमनुशोचसि ।
बुद्ध्या चैवानुबुद्ध्यस्व ध्रुवं हि न भविष्यसि ॥ १८ ॥
यह शरीर अनित्य है, इस बातको तुम देखते और समझते हो, फिर उन पूर्वजोंके लिये क्यों निरन्तर शोक करते हो? जरा बुद्धि लगाकर विचार तो करो, निश्चय ही एक दिन तुम भी नहीं रहोगे ॥ १८ ॥
अहं च त्वं च नृपते सुहृदः शत्रवश्च ते ।
अवश्यं न भविष्यामः सर्वं च न भविष्यति ॥ १९ ॥
नरेश्वर! मैं, तुम, तुम्हारे मित्र और शत्रु—ये हम सब लोग एक दिन नहीं रहेंगे। यह सब कुछ नष्ट हो जायेगा ॥ १९ ॥
ये तु विंशतिवर्षा वै त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः ।
अर्वागेव हि ते सर्वे मरिष्यन्ति शरच्छतात् ॥ २० ॥
इस समय जो बीस या तीस वर्षकी अवस्थावाले मनुष्य हैं, ये सभी सौ वर्षके पहले ही मर जायँगे ॥ २० ॥
अपि चेन्महतो वित्तान्न प्रमुच्येत पूरुषः ।
नैतन्ममेति तन्मत्वा कुर्वीत प्रियमात्मनः ॥ २१ ॥
ऐसी दशामें यदि मनुष्य बहुत बड़ी सम्पत्तिसे न बिछुड़ जाय तो भी उसे 'यह मेरा नहीं है' ऐसा समझकर अपना कल्याण अवश्य करना चाहिये ॥ २१ ॥
अनागतं यन्न ममेति विद्या-
दतिक्रान्तं यन्न ममेति विद्यात् ।
दिष्टं बलीय इति मन्यमाना-
स्ते पण्डितास्तत्सतां स्थानमाहुः ॥ २२ ॥
जो वस्तु भविष्यमें मिलनेवाली है, उसे यही माने कि 'वह मेरी नहीं है' तथा जो मिलकर नष्ट हो चुकी हो, उसके विषयमें भी यही भाव रखे कि 'वह मेरी नहीं थी।' जो ऐसा मानते हैं कि 'प्रारब्ध ही सबसे प्रबल है,' वे ही विद्वान् हैं और उन्हें सत्पुरुषोंका आश्रय कहा गया है ॥ २२ ॥
अनाढ्याश्चापि जीवन्ति राज्यं चाप्यनुशासति ।
बुद्धिपौरुषसम्पन्नास्त्वया तुल्याधिका जनाः ॥ २३ ॥
न च त्वमिव शोचन्ति तस्मात् त्वमपि मा शुचः ।
किं न त्वं तैनरैः श्रेयांस्तुल्यो वा बुद्धिपौरुषैः ॥ २४ ॥
जो धनाढ्य नहीं हैं, वे भी जीते हैं और कोई राज्यका शासन भी करते हैं उनमेंसे कुछ तुम्हारे समान ही बुद्धि और पौरुषसे सम्पन्न हैं तथा कुछ तुमसे बढ़कर भी हो सकते हैं; परंतु वे भी तुम्हारी तरह शोक नहीं करते। अतः तुम भी शोक न करो। क्या तुम बुद्धि और पुरुषार्थमें उन मनुष्योंसे श्रेष्ठ या उनके समान नहीं हो? ॥ २३-२४ ॥
राजोवाच
यादृच्छिकं सर्वमासीत् तद् राज्यमिति चिन्तये ।
ह्रियते सर्वमेवेदं कालेन महता द्विज ॥ २५ ॥
राजाने कहा— ब्रह्मन्! मैं तो यही समझता हूँ कि वह सारा राज्य मुझे स्वतः अनायास ही प्राप्त हो गया था और अब महान् शक्तिशाली कालने यह सब कुछ छीन लिया है॥ २५॥
तस्यैव ह्रियमाणस्य स्रोतसेव तपोधन।
फलमेतत् प्रपश्यामि यथालब्धेन वर्तयन्॥ २६॥
तपोधन! जैसे जलका प्रवाह किसी वस्तुको बहा ले जाता है, उसी प्रकार कालके वेगसे मेरे राज्यका अपहरण हो गया। उसीके फलस्वरूप मैं इस शोकका अनुभव करता हूँ, और जैसे-तैसे जो कुछ मिल जाता है, उसीसे जीवन-निर्वाह करता हूँ॥ २६॥
मुनिरुवाच
अनागतमतीतं च याथातथ्यविनिश्चयात्।
नानुशोचेत कौसल्य सर्वार्थेषु तथा भव॥ २७॥
मुनिने कहा— कोसलराजकुमार! यथार्थ तत्त्वका निश्चय हो जानेपर मनुष्य भविष्य और भूतकालकी किसी भी वस्तुके लिये शोक नहीं करता। इसलिये तुम भी सभी पदार्थोंके विषयमें उसी तरह शोकरहित हो जाओ॥ २७॥
अवाप्यान् कामयन्नर्थान् नानवाप्यान् कदाचन।
प्रत्युत्पन्नाननुभवन् मा शुचस्त्वमनागतान्॥ २८॥
मनुष्य पानेयोग्य पदार्थोंकी ही कामना करता है। अप्राप्य वस्तुओंकी कदापि नहीं। अतः तुम्हें भी जो कुछ प्राप्त है, उसीका उपभोग करते हुए अप्राप्त वस्तुके लिये कभी चिन्तन नहीं करना चाहिये॥ २८॥
यथालब्धोपपन्नाथैंस्तथा कौसल्य रंस्यसे।
कच्चिच्छुद्धस्वभावेन श्रिया हीनो न शोचसि॥ २९॥
कोसलनरेश! क्या तुम दैववश जो कुछ मिल जाय, उसीसे उतने ही आनन्दके साथ रह सकोगे, जैसे पहले रहते थे। आज राजलक्ष्मीसे वंचित होनेपर भी क्या तुम शुद्ध हृदयसे शोकको छोड़ चुके हो?॥ २९॥
पुरस्ताद् भूतपूर्वत्वाद्वीनभाग्यो हि दुर्मतिः।
धातारं गर्हते नित्यं लब्धार्थश्च न मृष्यते॥ ३०॥
जब पहले सम्पत्ति प्राप्त होकर नष्ट हो जाती है, तब उसीके कारण अपनेको भाग्यहीन माननेवाला दुर्बुद्धि मनुष्य सदा विधाताकी निन्दा करता है और प्रारब्धवश प्राप्त हुए पदार्थोंसे उसे संतोष नहीं होता है॥ ३०॥
अनर्हानपि चैवान्यान्मन्यते श्रीमतो जनान्।
एतस्मात् कारणादेतद् दुःखं भूयोऽनुवर्तते॥ ३१॥
वह दूसरे धनी मनुष्योंको धनके अयोग्य मानता है। इसी कारण उसका यह ईर्ष्याजनक दुःख सदा उसके पीछे लगा रहता है ॥ ३१ ॥ ईर्ष्याभिमानसम्पन्ना राजन् पुरुषमानिनः । कच्चित् त्वं न तथा राजन् मत्सरी कोसलाधिप ॥ ३२ ॥ राजन्! अपनेको पुरुष माननेवाले बहुत-से मनुष्य ईर्ष्या और अहंकारसे भरे होते हैं। कोसलनरेश! क्या तुम ऐसे ईर्ष्यालु तो नहीं हो? ॥ ३२ ॥ सहस्व श्रियमन्येषां यद्यपि त्वयि नास्ति सा । अन्यत्रापि सतीं लक्ष्मीं कुशला भुञ्जते सदा ॥ ३३ ॥ अभिनिष्यन्दते श्रीर्हि सत्यपि द्विषतो जनम् । यद्यपि तुम्हारे पास लक्ष्मी नहीं है तो भी तुम दूसरोंकी सम्पत्ति देखकर सहन करो; क्योंकि चतुर मनुष्य दूसरोंके यहाँ रहनेवाली सम्पत्तिका भी सदा उपभोग करते हैं और जो लोगोंसे द्वेष रखता है, उसके पास सम्पत्ति हो तो भी वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ॥ श्रियं च पुत्रपौत्रं च मनुष्या धर्मचारिणः । योगधर्मविदो धीराः स्वयमेव त्यजन्त्युत ॥ ३४ ॥ योगधर्मको जाननेवाले धर्मात्मा धीर मनुष्य अपनी सम्पत्ति तथा पुत्र-पौत्रोंका भी स्वयं ही त्याग कर देते हैं ॥ (त्यक्तं स्वायम्भुवे वंशे शुभेन भरतेन च । नानारत्नसमाकीर्णं राज्यं स्फीतमिति श्रुतम् ॥ तथान्यैर्भूमिपालैश्च त्यक्तं राज्यं महोदयम् । त्यक्त्वा राज्यानि सर्वे च वने वन्यफलाशनाः ॥ गताश्च तपसः पारं दुःखस्यान्तं च भूमिपाः ।) बहुसंकुसुकं दृष्ट्वा विधित्सासाधनेन च । तथान्ये संत्यजन्त्येव मत्वा परमदुर्लभम् ॥ ३५ ॥ स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न हुए शुभ आचार-विचारवाले राजा भरतने नाना प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न अपने समृद्धिशाली राज्यको त्याग दिया था, यह बात मेरे सुननेमें आयी है इसी प्रकार अन्य भूमिपालोंने भी महान् अभ्युदयशाली राज्यका परित्याग किया है। राज्य छोड़कर वे सब-के-सब भूपाल वनमें जंगली फल-मूल खाकर रहते थे। वहीं वे तपस्या और दुःखके पार पहुँच गये। धनकी प्राप्ति निरन्तर प्रयत्नमें लगे रहनेसे होती है, फिर भी वह अत्यन्त अस्थिर है, यह देखकर तथा इसे परम दुर्लभ मानकर भी दूसरे लोग उसका परित्याग कर देते हैं ॥ ३५ ॥ त्वं पुनः प्राज्ञरूपः सन् कृपणं परितप्यसे । अकाम्यान् कामयानोऽर्थान् पराधीनानुपद्रवान् ॥ ३६ ॥
परंतु तुम तो समझदार हो, तुम्हें मालूम है, भोग प्रारब्धके अधीन और अस्थिर हैं, तो भी नहीं चाहनेयोग्य विषयोंको चाहते हो और उनके लिये दीनता दिखाते हुए शोक कर रहे हो ॥ ३६ ॥ तां बुद्धिमुपजिज्ञासुस्त्वमेवैतान् परित्यज । अनर्थांश्चार्थरूपेण ह्यर्थांश्चानर्थरूपिणः ॥ ३७ ॥ तुम पूर्वोक्त बुद्धिको समझनेकी चेष्टा करो और इन भोगोंको छोड़ो, जो तुम्हें अर्थके रूपमें प्रतीत होनेवाले अनर्थ हैं; क्योंकि वास्तवमें समस्त भोग अनर्थस्वरूप ही हैं ॥ ३७ ॥ अर्थायैव हि केषांचिद् धननाशो भवत्युत । आनन्त्यं तत्सुखं मत्वा श्रियमन्यः परीप्सति ॥ ३८ ॥ इस अर्थ या भोगके लिये ही कितने ही लोगोंके धनका नाश हो जाता है। दूसरे लोग सम्पत्तिको अक्षय सुख मानकर उसे पानेकी इच्छा करते हैं ॥ ३८ ॥ रममाणः श्रिया कश्चिन्नान्यच्छ्रेयोऽभिमन्यते । तथा तस्येहमानस्य समारम्भो विनश्यति ॥ ३९ ॥ कोई-कोई मनुष्य तो धन-सम्पत्तिमें इस तरह रम जाता है कि उसे उससे बढ़कर सुखका साधन और कुछ जान ही नहीं पड़ता है। अतः वह धनोपार्जनकी ही चेष्टामें लगा रहता है। परंतु दैववश उस मनुष्यका वह सारा उद्योग सहसा नष्ट हो जाता है ॥ ३९ ॥ कृच्छ्राल्लब्धमभिप्रेतं यदि कौसल्य नश्यति । तदा निर्विद्यते सोऽर्थात् परिभग्नक्रमो नरः ॥ ४० ॥ (अनित्यां तां श्रियं मत्वा श्रियं वा कः परीप्सति ।) कोसलनरेश! बड़े कष्टसे प्राप्त किया हुआ वह अभीष्ट धन यदि नष्ट हो जाता है तो उसके उद्योगका सिलसिला टूट जाता है और वह धनसे विरक्त हो जाता है। इस प्रकार उस सम्पत्तिको अनित्य समझकर भी भला कौन उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करेगा? ॥ ४० ॥ धर्ममेकेऽभिपद्यन्ते कल्याणाभिजना नराः । परत्र सुखमिच्छन्तो निर्विद्येयुश्च लौकिकात् ॥ ४१ ॥ उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए कुछ ही मनुष्य ऐसे हैं, जो धर्मकी शरण लेते हैं और परलोकमें सुखकी इच्छा रखकर समस्त लौकिक व्यापारसे उपरत हो जाते हैं ॥ ४१ ॥ जीवितं संत्यजन्त्येके धनलोभपरा जनाः । न जीवितार्थं मन्यन्ते पुरुषा हि धनादृते ॥ ४२ ॥ कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो धनके लोभमें पड़कर अपने प्राणतक गँवा देते हैं। ऐसे मनुष्य धनके सिवा जीवनका दूसरा कोई प्रयोजन ही नहीं समझते ॥ ४२ ॥ पश्य तेषां कृपणतां पश्य तेषामबुद्धिताम् । अध्रुवे जीविते मोहादर्थदृष्टिमुपाश्रिताः ॥ ४३ ॥
देखो, उनकी दीनता और देख लो उनकी मूर्खता, जो इस अनित्य जीवनके लिये मोहवश धनमें ही दृष्टि गड़ाये रहते हैं ॥ ४३ ॥ संचये च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते । संयोगे च वियोगान्ते को नु विप्रणयेन्मनः ॥ ४४ ॥ जब संग्रहका अन्त विनाश ही है, जब जीवनका अन्त मृत्यु ही है और जब संयोगका अन्त वियोग ही है, तब इनकी ओर कौन अपना मन लगायेगा? ॥ ४४ ॥ धनं वा पुरुषो राजन् पुरुषं वा पुनर्धनम् । अवश्यं प्रजहात्येव तद् विद्वान् कोऽनुसंज्वरेत् ॥ ४५ ॥ राजन्! चाहे मनुष्य धनको छोड़ता है, चाहे धन ही मनुष्यको छोड़ देता है। एक दिन अवश्य ऐसा होता है। इस बातको जाननेवाला कौन मनुष्य धनके लिये चिन्ता करेगा? ॥ ४५ ॥ (अन्यत्रोपनता ह्यापत् पुरुषं तोषयत्युत । तेन शान्तिं न लभते नाहमेवेति कारणात् ॥) दूसरोंपर पड़ी हुई आपत्ति मूर्ख मनुष्यको संतोष प्रदान करती है। वह समझता है कि मैं उस संकटमें नहीं पड़ा हूँ। इस भेददृष्टिके कारण ही उसे कभी शान्ति नहीं मिलती ॥ अन्येषामपि नश्यन्ति सुहृदश्च धनानि च । पश्य बुद्ध्या मनुष्याणां राजन्नापद्मात्मनः ॥ ४६ ॥ राजन्! दूसरोंके भी धन और सुहृद् नष्ट होते हैं; अतः तुम बुद्धिसे विचारकर देखो कि दूसरे मनुष्योंके समान ही तुम्हारी अपनी आपत्ति भी है ॥ ४६ ॥ नियच्छ यच्छ संयच्छ इन्द्रियाणि मनो गिरम् । प्रतिषेद्धा न चाप्येषु दुर्बलेष्वहितेष्वपि ॥ ४७ ॥ इन्द्रियोंको संयममें रखो, मनको वशमें करो और वाणीका संयम करके मौन रहा करो। ये मन, वाणी और इन्द्रियाँ दुर्बल हों या अहितकारक, इन्हें विषयोंकी ओर जानेसे रोकनेवाला अपने सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ प्राप्तिस्तृष्टेषु भावेषु व्यपकृष्टेष्वसम्भवः । प्रज्ञानतृप्तो विक्रान्तस्त्वद्विधो नानुशोचति ॥ ४८ ॥ सारे पदार्थ जब संसर्गमें आते हैं, तभी दृष्टिगोचर होते हैं। दूर हो जानेपर उनका दर्शन सम्भव नहीं हो पाता। ऐसी स्थितिमें ज्ञान और विज्ञानसे तृप्त तथा पराक्रमसे सम्पन्न तुम्हारे-जैसा पुरुष शोक नहीं करता है ॥ अल्पमिच्छन्नचपलो मृदुर्दान्तः सुनिश्चितः । ब्रह्मचर्योपपन्नश्च त्वद्विधो नैव शोचति ॥ ४९ ॥ तुम्हारी इच्छा तो बहुत थोड़ी है। तुममें चपलताका दोष भी नहीं है। तुम्हारा हृदय कोमल और बुद्धि एक निश्चयपर डटी रहनेवाली है तथा तुम जितेन्द्रिय होनेके साथ ही
ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न भी हो; अतः तुम्हारे-जैसे पुरुषको शोक नहीं करना चाहिये ॥ ४९ ॥ न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि । नृशंसवृत्तिं पापिष्ठां दुष्टां कापुरुषोचिताम् ॥ ५० ॥ तुमको हाथमें कपाल लेकर भीख माँगनेवालोंकी तथा निर्दय पुरुषोंकी उस कपटभरी वृत्तिकी इच्छा नहीं करनी चाहिये, जो अत्यन्त पापपूर्ण, अनेक दोषोंसे दूषित तथा कायरोंके ही योग्य है ॥ ५० ॥ अपि मूलफलाजीवो रमस्वैको महावने । वाग्यतः संगृहीतात्मा सर्वभूतदयान्वितः ॥ ५१ ॥ तुम मूल-फलसे जीवन-निर्वाह करते हुए विशाल वनमें अकेले ही विचरण करो। वाणीको संयममें रखकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें करो और सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति दयाभाव बनाये रखो ॥ ५१ ॥ सदृशं पण्डितस्यै तदीषादन्तेन दन्तिना । यदेको रमतेऽरण्येष्वारण्ये नैव तुष्यति ॥ ५२ ॥ तुम-जैसे विद्वान् पुरुषके योग्य कार्य तो यह है कि वनमें ईषाके समान बड़े-बड़े दाँतवाले जंगली हाथीके साथ अकेला विचरे और जंगलके ही पत्र, पुष्प तथा फल-मूल खाकर संतुष्ट रहे ॥ ५२ ॥ महाह्रदः संक्षुभित आत्मनैव प्रसीदति । (इत्थं नरोऽप्यात्मनैव कृतप्रज्ञः प्रसीदति ।) एतदेवंगतस्याहं सुखं पश्यामि जीवितुम् ॥ ५३ ॥ जैसे क्षुब्ध हुआ महान् सरोवर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार विशुद्ध बुद्धिवाला मनुष्य क्षुब्ध होनेपर भी निर्मल हो जाता है। अतः राजकुमार! इस अवस्थामें तुम्हारा इस रूपमें आ जाना; अर्थात् तुम्हारे मनमें ऐसे विशुद्ध भावका उदय होना शुभ है। इस प्रकारके जीवनको ही मैं सुखमय समझता हूँ ॥ ५३ ॥ असम्भवे श्रियो राजन् हीनस्य सचिवादिभिः । दैवे प्रतिनिविष्टे च किं श्रेयो मन्यते भवान् ॥ ५४ ॥ राजन्! तुम्हारे लिये अब धन-सम्पत्तिकी कोई सम्भावना नहीं है। तुम मन्त्री आदिसे भी रहित हो गये हो तथा दैव भी तुम्हारे प्रतिकूल ही है, ऐसी अवस्थामें तुम अपने लिये किस मार्गका अवलम्बन अच्छा समझते हो? ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५८ १/२ श्लोक हैं)
कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः
कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन
मुनिरुवाच
अथ चेत् पौरुषं किंचित् क्षत्रियात्मनि पश्यसि ।
ब्रवीमि तां तु ते नीतिं राज्यस्य प्रतिपत्तये ॥ १ ॥
मुनिने कहा— राजकुमार! यदि तुम अपनेमें कुछ पुरुषार्थ देखते हो तो मैं तुम्हें राज्यकी प्राप्तिके लिये एक नीति बता रहा हूँ ॥ १ ॥
तां चेच्छक्नोषि निर्मातुं कर्म चैव करिष्यसि ।
शृणु सर्वमशेषेण यत् त्वां वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ २ ॥
यदि तुम उसे कार्यरूपमें परिणत कर सको, उसके अनुसार ही सारा कार्य करो तो मैं उस नीतिका यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ। तुम वह सब पूर्णरूपसे सुनो ॥ २ ॥
आचरिष्यसि चेत् कर्म महतोऽर्थानवाप्स्यसि ।
राज्यं राज्यस्य मन्त्रं वा महतीं वा पुनः श्रियम् ॥ ३ ॥
अथैतद् रोचते राजन् पुनर्ब्रूहि ब्रवीमि ते ।
यदि तुम मेरी बतायी हुई नीतिके अनुसार कार्य करोगे तो तुम्हें पुनः महान् वैभव, राज्य, राज्यकी मन्त्रणा और विशाल सम्पत्तिकी प्राप्ति होगी। राजन्! यदि मेरी यह बात तुम्हें रुचती हो तो फिरसे कहो, क्या मैं तुमसे इस विषयका वर्णन करूँ? ॥ ३ ½ ॥
राजोवाच
ब्रवीतु भगवान्नीतिमुपपन्नोऽस्म्यहं प्रभो ॥ ४ ॥
अमोघोऽयं भवत्वद्य त्वया सह समागमः ।
राजाने कहा— प्रभो! आप अवश्य उस नीतिका वर्णन करें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आपके साथ जो समागम प्राप्त हुआ है, यह आज व्यर्थ न हो ॥ ४ ½ ॥
मुनिरुवाच
हित्वा दम्भं च कामं च क्रोधं हर्षं भयं तथा ॥ ५ ॥
अप्यमित्राणि सेवस्व प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।
मुनिने कहा— राजन्! तुम दम्भ, काम, क्रोध, हर्ष और भयको त्यागकर हाथ जोड़, मस्तक झुकाकर शत्रुओंकी भी सेवा करो ॥ ५ ½ ॥
तमुत्तमेन शौचेन कर्मणा चाभिधारय ॥ ६ ॥