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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन

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सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद—चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन

कपिल उवाच

वेदाः प्रमाणं लोकानां न वेदाः पृष्ठतः कृताः ।
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ॥ १ ॥
**कपिलने कहा—**स्यूमरश्मे! सम्पूर्ण लोकोंके लिये वेद ही प्रमाण हैं। अतः वेदोंकी अवहेलना नहीं की गयी है। ब्रह्मके दो रूप समझने चाहिये—शब्दब्रह्म (वेद) और परब्रह्म (सच्चिदानन्दघन परमात्मा) ॥ १ ॥
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ।
शरीरमेतत् कुरुते यद् वेदे कुरुते तनुम् ॥ २ ॥
कृतशुद्धशरीरो हि पात्रं भवति ब्राह्मणः ।
आनन्त्यमत्र बुद्धयेदं कर्मणां तद् ब्रवीमि ते ॥ ३ ॥
जो पुरुष शब्दब्रह्ममें पारंगत (वेदोक्त कर्मोंके अनुष्ठानसे शुद्धचित्त हो चुका) है, वह परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। पिता और माता वेदोक्त गर्भाधानकी विधिसे बालकके जिस शरीरको जन्म देते हैं, वे उस बालकके उस शरीरका ही संस्कार करते हैं। इस प्रकार जिसका शरीर वैदिक संस्कारसे शुद्ध हो जाता है, वही ब्रह्मज्ञानका पात्र होता है। अब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हें यह बता रहा हूँ कि कर्म किस प्रकार अक्षय मोक्ष-सुखकी प्राप्ति करानेमें कारण होते हैं॥
अनागममनैतिह्यं प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् ।
धर्म इत्येव ये यज्ञान् वितन्वन्ति निराशिषः ॥ ४ ॥
जो अपना धर्म (कर्तव्य) समझकर बिना किसी प्रकारकी भोगेच्छाके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, उनके उस यज्ञका फल वेद या इतिहासद्वारा नहीं जाना जाता है। वह प्रत्यक्ष है और उसे सब लोग अपनी आँखों देखते हैं ॥ ४ ॥
उत्पन्नत्यागिनोऽलुब्धाः कृपासूयाविवर्जिताः ।
धनानामेष वै पन्थास्तीर्थेषु प्रतिपादनम् ॥ ५ ॥
अनाश्रिताः पापकर्म कदाचित् कर्मयोगिनः ।
मनः संकल्पसंसिद्धा विशुद्धज्ञाननिश्चयाः ॥ ६ ॥
जो प्राप्त हुए पदार्थोंका त्याग सब प्रकारके लालचको छोड़कर करते हैं, जो कृपणता और असूयासे रहित हैं और 'धनके उपयोगका यही सर्वोत्तम मार्ग है' ऐसा समझकर

सत्पात्रोंको दान करते हैं, कभी पापकर्मका आश्रय नहीं लेते तथा सदा कर्मयोगके साधनमें ही लगे रहते हैं, उनके मानसिक संकल्पकी सिद्धि होने लगती है और उन्हें विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परब्रह्मके विषयमें दृढ़ निश्चय हो जाता है ॥ ५-६ ॥
अक्रुध्यन्तोऽनसूयन्तो निरहङ्कारमत्सराः ।
ज्ञाननिष्ठास्त्रिशुक्लाश्च सर्वभूतहिते रताः ॥ ७ ॥
वे किसीपर क्रोध नहीं करते, कहीं दोषदृष्टि नहीं रखते, अहंकार तथा मात्सर्यसे दूर रहते हैं, ज्ञानके साधनोंमें उनकी निष्ठा होती है, उनके जन्म, कर्म और विद्या—तीनों ही शुद्ध होते हैं तथा वे समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ ७ ॥
आसन् गृहस्था भूयिष्ठा अव्युत्क्रान्ताः स्वकर्मसु ।
राजानश्च तथा युक्ता ब्राह्मणाश्च यथाविधि ॥ ८ ॥
पूर्वकालमें बहुत-से ब्राह्मण और राजा ऐसे हो गये हैं, जो गृहस्थ आश्रममें ही रहते हुए अपने-अपने कर्मोंका त्याग न करके उनमें निष्काम भावसे विधिपूर्वक लगे रहे ॥ ८ ॥
समा ह्यार्जवसम्पन्नाः संतुष्टा ज्ञाननिश्चयाः ।
प्रत्यक्षधर्माः शुचयः श्रद्दधानाः परावरे ॥ ९ ॥
वे सब प्राणियोंपर समान दृष्टि रखते थे। सरल, संतुष्ट, ज्ञाननिष्ठ, प्रत्यक्ष फल देनेवाले धर्मके अनुष्ठाता और शुद्धचित्त होते थे तथा शब्दब्रह्म एवं परब्रह्म-दोनोंमें ही श्रद्धा रखते थे ॥ ९ ॥
पुरस्ताद् भावितात्मानो यथावच्चरितव्रताः ।
चरन्ति धर्मं कृच्छ्रेऽपि दुर्गे चैवापि संहताः ॥ १० ॥
संहत्य धर्मं चरतां पुराऽऽसीत् सुखमेव तत् ।
तेषां नासीद् विधातव्यं प्रायश्चित्तं कथंचन ॥ ११ ॥
वे आवश्यक नियमोंका यथावत् पालन करके पहले अपने चित्तको शुद्ध करते थे और कठिनाई तथा दुर्गम स्थानोंमें पड़ जानेपर भी परस्पर मिलकर धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहते थे। संघ-बद्ध होकर धर्मानुष्ठान करनेवाले उन पूर्ववर्ती पुरुषोंको इसमें सुखका ही अनुभव होता था। उन्हें किसी प्रकारका प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती थी ॥ १०-११ ॥
सत्यं हि धर्ममास्थाय दुराधर्षतमा मताः ।
न मात्रामनुरुध्यन्ते न धर्मच्छलमन्ततः ॥ १२ ॥
वे सत्यधर्मका आश्रय लेकर ही अत्यन्त दुर्धर्ष माने जाते थे। लेशमात्र भी पाप नहीं करते थे और प्राणान्तका अवसर उपस्थित होनेपर भी धर्मके विषयमें छलसे काम नहीं लेते थे ॥ १२ ॥
य एव प्रथमः कल्पस्तमेवाभ्याचरन् सह ।
तेषां नासीद् विधातव्यं प्रायश्चित्तं कदाचन ॥ १३ ॥

जो प्रथम श्रेणीका धर्म माना जाता था, उसीका वे सब लोग साथ रहकर आचरण करते थे, अतः उनके सामने कभी प्रायश्चित्त करनेका अवसर नहीं आता था ॥ १३ ॥

तस्मिन् विधौ स्थितानां हि प्रायश्चित्तं न विद्यते ।
दुर्बलात्मन उत्पन्नं प्रायश्चित्तमिति श्रुतिः ॥ १४ ॥
धर्मकी उस उत्तम श्रेणीमें स्थित हुए उन शुद्धचित्त पुरुषोंके लिये प्रायश्चित्त हैं ही नहीं। जिनका हृदय दुर्बल है, उन्हींसे पाप होता है और उन्हींके लिये प्रायश्चित्तका विधान किया गया है—ऐसा सुननेमें आता है ॥ १४ ॥

एवं बहुविधा विप्राः पुराणा यज्ञवाहनाः ।
त्रैविद्यवृद्धाः शुचयो वृत्तवन्तो यशस्विनः ॥ १५ ॥
इस प्रकार बहुत-से ब्राह्मण पूर्वकालमें यज्ञका निर्वाह करते थे। वे वेदविद्याके ज्ञानमें बढ़े-चढ़े, पवित्र, सदाचारी और यशस्वी थे ॥ १५ ॥

यजन्तोऽहरहर्यज्ञैर्निराशीर्बन्धना बुधाः ।
तेषां यज्ञाश्च वेदाश्च कर्माणि च यथागमम् ॥ १६ ॥
वे विद्वान् पुरुष प्रतिदिन कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हो यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन करते थे। उनके वे यज्ञ, वेदाध्ययन तथा अन्यान्य कर्म शास्त्रविधिके अनुसार सम्पन्न होते थे ॥ १६ ॥

आगमाश्च यथाकाले संकल्पाश्च यथाक्रमम् ।
अपेतकामक्रोधानां दुश्चराचारकर्मणाम् ॥ १७ ॥
उन्होंने काम और क्रोधको त्याग दिया था। उनके आचार-कर्म दूसरोंके लिये आचरणमें लाने अत्यन्त कठिन थे। उनके हृदयमें यथासमय शास्त्र-ज्ञान और सत्यंकल्पका क्रमशः उदय होता था ॥ १७ ॥

स्वकर्मभिः शंसितानां प्रकृत्या शंसितात्मनाम् ।
ऋजूनां शमनित्यानां स्वेषु कर्मसु वर्तताम् ॥ १८ ॥
अपने उत्तम कर्मोंके कारण उनकी बड़ी प्रशंसा होती थी। वे स्वभावसे ही पवित्रचित्त, सरल, शान्तिपरायण और स्वधर्मनिष्ठ होते थे ॥ १८ ॥

सर्वमानन्त्यमेवासीदिति नः शाश्वती श्रुतिः ।
तेषामदीनसत्त्वानां दुश्चराचारकर्मणाम् ॥ १९ ॥
उनके हृदय बड़े उदार थे, उनके आचार और कर्म दूसरोंके लिये आचरणमें लानेमें अत्यन्त कठिन थे, अतः उनका सारा शुभ कर्म ही अक्षय मोक्षरूप फल देनेवाला था। यह बात सदा हमारे सुननेमें आयी है ॥

स्वकर्मभिः सम्भृतानां तपो घोरत्वमागतम् ।
तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् ॥ २० ॥

वे अपने-अपने कर्मोंसे ही परिपुष्ट थे। उनकी तपस्या घोर रूप धारण कर चुकी थी। वे आश्चर्यजनक सदाचारका पालन करते थे और उसका उन्हें पुरातन, शाश्वत एवं अविनाशी ब्रह्मरूप फल प्राप्त होता था ।।

अशक्नुवद्भिश्चरितुं किंचिद् धर्मेषु सूक्ष्मताम् ।
निरापद्धर्म आचारो ह्यप्रमादोऽपराभवः ॥ २१ ॥
धर्मोंमें जो किंचित् सूक्ष्मता है, उसका आचरण करनेमें कितने ही लोग असमर्थ हो जाते हैं। वास्तवमें वेदोक्त आचार और धर्म आपत्तिसे रहित है। उसमें न तो प्रमाद है और न पराभव ही है ॥ २१ ॥

सर्ववर्णेषु जातेषु नासीत् कश्चिद् व्यतिक्रमः ।
व्यस्तमेकं चतुर्धा हि ब्राह्मणा आश्रमं विदुः ॥ २२ ॥
पूर्वकालमें सब वर्णोंकी उत्पत्ति हो जानेपर आश्रमके विषयमें कोई वैषम्य नहीं था। तदनन्तर एक ही आश्रमको अवस्था-भेदसे चार भागोंमें विभक्त किया गया। इस बातको सभी ब्राह्मण जानते रहे ॥ २२ ॥

तं सन्तो विधिवत् प्राप्य गच्छन्ति परमां गतिम् ।
गृहेभ्य एव निष्क्रम्य वनमन्ये समाश्रिताः ॥ २३ ॥
गृहमेवाभिसंश्रित्य ततोऽन्ये ब्रह्मचारिणः ।
त एते दिवि दृश्यन्ते ज्योतिर्भूता द्विजातयः ॥ २४ ॥
नक्षत्राणीव धिष्ण्येषु बहवस्तारकागणाः ।
आनन्त्यमुपसम्प्राप्ताः संतोषादिति वैदिकम् ॥ २५ ॥
श्रेष्ठ पुरुष विधिपूर्वक उन सब आश्रमोंमें प्रवेश करके उनके धर्मका पालन करते हुए परम-गतिको प्राप्त होते हैं। उनमेंसे कुछ लोग तो घरसे निकलकर (अर्थात् संन्यासी होकर), कुछ लोग वानप्रस्थका आश्रय लेकर, कुछ मानव गृहस्थ ही रहकर और कोई ब्रह्मचर्य आश्रमका सेवन करते हुए ही उस आश्रमधर्मका पालन करके परमपदको प्राप्त होते हैं। उस समय वे ही द्विजगण आकाशमें ज्योति-र्मयरूपसे दिखायी देते हैं, जो कि नक्षत्रोंके समान ही आकाशके विभिन्न स्थानोंमें अनेक तारागण हैं—इन सबने संतोषके द्वारा ही यह अनन्त पद प्राप्त किया है, ऐसा वैदिक सिद्धान्त है ॥ २३—२५ ॥

यद्यागच्छन्ति संसारं पुनर्योनिषु तादृशाः ।
न लिप्यन्ते पापकृत्यैः कदाचित् कर्मयोनितः ॥ २६ ॥
ऐसे पुण्यात्मा पुरुष यदि कभी पुनः संसारकी कर्माधिकार युक्त योनियोंमें आते या जन्म ग्रहण करते हैं तो वे उस योनिके सम्बन्धसे पापकर्मोंद्वारा लिप्त नहीं होते हैं ॥ २६ ॥

एवमेव ब्रह्मचारी शुश्रूषुर्घोरनिश्चयः ।
एवं युक्तो ब्राह्मणः स्यादन्यो ब्राह्मणको भवेत् ॥ २७ ॥

इसी प्रकार गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाला, ब्रह्मचर्य-परायण, दृढ़ निश्चयवाला तथा योगयुक्त ब्रह्मचारी ही उत्तम ब्राह्मण हो सकता है। उससे भिन्न अन्य प्रकारका ब्राह्मण निम्न कोटिका अथवा नाममात्रका ब्राह्मण समझा जाता है॥ २७॥

कर्मैवं पुरुषस्याह शुभं वा यदि वाशुभम् ।
एवं पक्वकषायाणामानन्त्येन श्रुतेन च ॥ २८ ॥
सर्वमानन्त्यमासीद् वै एवं नः शाश्वती श्रुतिः ।
तेषामपेततृष्णानां निर्णीक्तानां शुभात्मनाम् ॥ २९ ॥

इस प्रकार शुभ अथवा अशुभ कर्म ही पुरुषका तदनु-रूप नाम नियत करता है। जिनके राग-द्वेष आदि कषाय पक गये हैं, जिनके मनसे तृष्णा निकल गयी है, जो बाहर-भीतरसे शुद्ध हैं तथा जिनकी बुद्धि कल्याणस्वरूप मोक्षमें लगी हुई है, उन तत्त्वज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें अनन्त ब्रह्मज्ञान तथा शास्त्रज्ञानके प्रभावसे सब कुछ ब्रह्मस्वरूप हो गया था; यह बात सदा ही हमारे सुननेमें आयी है॥ २८-२९॥

चतुर्थोपनिषद् धर्मः साधारण इति स्मृतिः ।
संसिद्धैः साध्यते नित्यं ब्राह्मणैर्नियतात्मभिः ॥ ३० ॥

तुरीय ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली जो उपनिषद्-विद्या है, उसकी प्राप्ति करानेवाले शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा तथा समाधानरूप जो धर्म हैं, वह सभी वर्ण और आश्रमके लोगोंके लिये साधारण हैं—ऐसा स्मृतिका कथन है। परंतु जो संयतचित्त और तपःसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ पुरुष हैं, वे ही सदा उस धर्मका साधन कर पाते हैं॥ ३०॥

संतोषमूलस्त्यागात्मा ज्ञानाधिष्ठानमुच्यते ।
अपवर्गमतिर्नित्यो यतिधर्मः सनातनः ॥ ३१ ॥

संतोष ही जिसके सुखका मूल है, त्याग ही जिसका स्वरूप है, जो ज्ञानका आश्रय कहा जाता है, जिसमें मोक्षदायिनी बुद्धि—ब्रह्मसाक्षात्काररूप वृत्ति नित्य आवश्यक है, वह संन्यास-आश्रमरूप धर्म सनातन है॥

साधारणः केवलो वा यथाबलमुपासते ।
गच्छतां गच्छतां क्षेमं दुर्बलोऽत्रावसीदति ।
ब्रह्मणः पदमन्विच्छन् संसारान्मुच्यते शुचिः ॥ ३२ ॥

यह यतिधर्म अन्य आश्रमके धर्मोंसे मिला हुआ हो या स्वतन्त्र हो, जो अपने वैराग्य-बलके अनुसार इसका आश्रय लेते हैं, वे कल्याणके भागी होते हैं। इस मार्गसे जानेवाले सभी पथिकोंका परम कल्याण होता है; परंतु जो दुर्बल है—मन और इन्द्रियोंको वशमें न रखनेके कारण जो इसके साधनमें असमर्थ है, वही यहाँ शिथिल होकर बैठ रहता है। जो बाहर और भीतरसे पवित्र है, वह ब्रह्मपदका अनुसंधान करता हुआ संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ३२॥

स्यूमराश्मिरुवाच

ये भुञ्जते ये ददते यजन्तेऽधीयते च ये । मात्राभिरुपलब्धाभिर्ये वा त्यागं समाश्रिताः ॥ ३३ ॥ एतेषां प्रेत्यभावे तु कतमः स्वर्गजित्त्तमः । एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन् यथातत्त्वेन पृच्छतः ॥ ३४ ॥ **स्यूमराश्मिने पूछा—**ब्रह्मन्! जो लोग प्राप्त हुए धनके द्वारा केवल भोग भोगते हैं, जो दान करते हैं, जो उस धनको यज्ञमें लगाते हैं, जो स्वाध्याय करते हैं अथवा जो त्यागका आश्रय लेते हैं, इनमेंसे कौन पुरुष मृत्युके पश्चात् प्रधानरूपसे स्वर्गलोकपर विजय पाता है? मैं जिज्ञासुभावसे पूछ रहा हूँ; आप मुझे यह सब यथार्थरूपसे बताइये ॥ ३३-३४ ॥

कपिल उवाच

परिग्रहाः शुभाः सर्वे गुणतोऽभ्युदयाश्च ये । न तु त्यागसुखं प्राप्ता एतत् त्वमपि पश्यसि ॥ ३५ ॥ **कपिलजीने कहा—**जिनका सात्त्विक गुणसे प्राकट्य हुआ है, ऐसे सभी परिग्रह शुभ हैं; परंतु त्यागमें जो सुख है, उसे इनमेंसे कोई भी नहीं पा सके हैं। इस बातको तुम भी देखते ही हो ॥ ३५ ॥

स्यूमराश्मिरुवाच

भवन्तो ज्ञाननिष्ठा वै गृहस्थाः कर्मनिश्चयाः । आश्रमाणां च सर्वेषां निष्ठायामैक्यमुच्यते ॥ ३६ ॥ एकत्वेन पृथक्त्वेन विशेषो नात्र दृश्यते । तद् यथावद् यथान्यायं भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥ ३७ ॥ **स्यूमराश्मिने पूछा—**भगवन्! आप तो ज्ञाननिष्ठ हैं और गृहस्थलोग कर्मनिष्ठ होते हैं; परंतु आप इस समय निष्ठामें सभी आश्रमोंकी एकताका प्रतिपादन कर रहे हैं। इस प्रकार ज्ञान और कर्मकी एकता और पृथक्ता—दोनोंका भ्रम होनेसे इनका ठीक-ठीक अन्तर समझमें नहीं आता है। इसलिये आप मुझे उसे यथोचित एवं यथार्थरीतिसे बतानेकी कृपा करें ॥ ३६-३७ ॥

कपिल उवाच

शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः । कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति ॥ ३८ ॥ **कपिलजीने कहा—**कर्म स्थूल और सूक्ष्म शरीरकी शुद्धि करनेवाले हैं, किंतु ज्ञान परम गतिरूप है। जब कर्मोंद्वारा चित्तके रागादि दोष जल जाते हैं, तब मनुष्य रस-स्वरूप ज्ञानमें स्थित हो जाता है ॥ ३८ ॥ आनृशंस्यं क्षमा शान्तिरहिंसा सत्यमार्जवम् ।

अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा शमस्तथा ॥ ३९ ॥ पन्थानो ब्रह्मणस्त्वेते एतैः प्राप्नोति यत्परम् । तद् विद्वाननुबुद्ध्येत मनसा कर्मनिश्चयम् ॥ ४० ॥ समस्त प्राणियोंपर दया, क्षमा, शान्ति, अहिंसा, सत्य, सरलता, अद्रोह, निरभिमानता, लज्जा, तितिक्षा और शम—ये परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके मार्ग हैं। इनके द्वारा पुरुष परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार विद्वान् पुरुषको मनके द्वारा कर्मके वास्तविक परिणामका निश्चय समझना चाहिये ॥ ३९-४० ॥

यां विप्राः सर्वतः शान्ता विशुद्धा ज्ञाननिश्चयाः । गतिं गच्छन्ति संतुष्टास्तामाहुः परमां गतिम् ॥ ४१ ॥ सब ओरसे शान्त, संतुष्ट, विशुद्धचित्त और ज्ञाननिष्ठ विप्र जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसीको परमगति कहते हैं ॥ ४१ ॥

वेदांश्च वेदितव्यं च विदित्वा च यथास्थितिम् । एवं वेदविदित्याहुरतोऽन्यो वातरेचकः ॥ ४२ ॥ जो वेदों और उनके द्वारा जानने योग्य परब्रह्मको ठीक-ठीक जानता है, उसीको वेदवेत्ता कहते हैं। उससे भिन्न जो दूसरे लोग हैं, वे मुँहसे वेद नहीं पढ़ते, धौंकनीके समान केवल हवा छोड़ते हैं ॥ ४२ ॥

सर्वं विदुर्वेदविदो वेदे सर्वं प्रतिष्ठितम् । वेदे हि निष्ठा सर्वस्य यद् यदस्ति च नास्ति च ॥ ४३ ॥ वेदज्ञ पुरुष सभी विषयोंको जानते हैं; क्योंकि वेदमें सब कुछ प्रतिष्ठित है। जो-जो वस्तु है और जो नहीं है, उन सबकी स्थिति वेदमें बतायी गयी है ॥ ४३ ॥

एषैव निष्ठा सर्वत्र यत् तदस्ति च नास्ति च । एतदन्तं च मध्यं च सच्चासच्व विजानतः ॥ ४४ ॥ सम्पूर्ण शास्त्रोंकी एकमात्र निष्ठा यही है कि जो-जो दृश्य पदार्थ है वह प्रतीतिकालमें तो विद्यमान है, परंतु परमार्थ ज्ञानकी स्थितिमें बाधित हो जानेपर वह नहीं है। ज्ञानी पुरुषकी दृष्टिमें सदसत् स्वरूप ब्रह्म ही इस जगत्‌का आदि, मध्य और अन्त है ॥ ४४ ॥

समाप्तं त्याग इत्येव सर्ववेदेषु निश्चितम् । संतोष इत्यनुगतमपवर्गे प्रतिष्ठितम् ॥ ४५ ॥ सब कुछ त्याग देनेपर ही उस ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। यही बात सम्पूर्ण वेदोंमें निश्चित की गयी है। वह अपने आनन्दस्वरूपसे सबमें अनुगत तथा अपवर्ग (मोक्ष) में प्रतिष्ठित है ॥ ४५ ॥

ऋतं सत्यं विदितं वेदितव्यं सर्वस्यात्मा स्थावरं जङ्गमं च । सर्वं सुखं यच्छिवमुत्तरं च

ब्रह्माव्यक्तं प्रभवश्चाव्ययं च ॥ ४६ ॥
अतः वह ब्रह्म ऋत, सत्य, ज्ञात, ज्ञातव्य, सबका आत्मा, स्थावर-जंगमरूप, सम्पूर्ण सुखरूप, कल्याणमय, सर्वोत्कृष्ट, अव्यक्त, सबकी उत्पत्तिका कारण और अविनाशी है ॥ ४६ ॥

तेजः क्षमा शान्तिरनामयं शुभं
तथाविधं व्योम सनातनं ध्रुवम् ।
एतैः सर्वैर्गम्यते बुद्धिनेत्रै-
स्तस्मै नमो ब्रह्मणे ब्राह्मणाय ॥ ४७ ॥
उस आकाशके समान असंग, अविनाशी और सदा एकरस तत्त्वका ज्ञान-नेत्रोंवाले सभी पुरुष तेज, क्षमा और शान्तिरूप शुभ साधनोंके द्वारा साक्षात्कार करते हैं। जो वास्तवमें ब्रह्मवेत्तासे अभिन्न है, उस परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि गोकपिलीये
सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें गोकपिलीयोपाख्यानविषयक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७० ॥

धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा

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एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा

युधिष्ठिर उवाच

धर्ममर्थं च कामं च वेदाः शंसन्ति भारत ।
कस्य लाभो विशिष्टोऽत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**राजा युधिष्ठिरने पूछा—**भरतनन्दन पितामह! वेद तो धर्म, अर्थ और काम—तीनोंकी ही प्रशंसा करते हैं; अतः आप मुझे यह बताइये कि इन तीनोंमेंसे किसकी प्राप्ति मेरे लिये सबसे बढ़कर है ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
कुण्डधारेण यत् प्रीत्या भक्तायोपकृतं पुरा ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा, जिसके अनुसार कुण्डधार नामक मेघने पूर्वकालमें प्रसन्न होकर अपने एक भक्तका उपकार किया था ॥ २ ॥

अधनो ब्राह्मणः कश्चित् कामाद् धर्ममवैक्षत ।
यज्ञार्थं सततोऽर्थार्थी तपोऽतप्यत दारुणम् ॥ ३ ॥
किसी समय एक निर्धन ब्राह्मणने सकामभावसे धर्म करनेका विचार किया। वह यज्ञ करनेके लिये सदा ही धनकी इच्छा रखता था, अतः बड़ी कठोर तपस्या करने लगा ॥ ३ ॥

स निश्चयमथो कृत्वा पूजयामास देवताः ।
भक्त्या न चैवाध्यगच्छद् धनं सम्पूज्य देवताः ॥ ४ ॥
यही निश्चय करके उसने भक्तिपूर्वक देवताओंकी पूजा-अर्चा आरम्भ की। परंतु देवताओंकी पूजा करके भी वह धन न पा सका ॥ ४ ॥

ततश्चिन्तामनुप्राप्तः कतमद्दैवतं तु तत् ।
यन्ये द्रुतं प्रसीदेत मानुषैरजडीकृतम् ॥ ५ ॥
तब वह इस चिन्तामें पड़ा कि वह कौन-सा देवता है, जो मुझपर शीघ्र प्रसन्न हो जाय और मनुष्योंने आराधना करके जिसे जड न बना दिया हो ॥ ५ ॥

सोऽथ सौम्येन मनसा देवानुचरमन्तिके ।
प्रत्यपश्यज्जलधरं कुण्डधारमवस्थितम् ॥ ६ ॥

तदनन्तर उस ब्राह्मणने शान्त मनसे देवताओंके अनुचर कुण्डधार नामक मेघको पास ही खड़ा देखा ।। दृष्ट्वैव तं महाबाहुं तस्य भक्तिरजायत । अयं मे धास्यति श्रेयो वपुरेतद्धि तादृशम् ।। ७ ।। उस महाबाहु मेघको देखते ही ब्राह्मणके मनमें उसके प्रति भक्ति उत्पन्न हो गयी और वह सोचने लगा कि यह अवश्य मेरा कल्याण करेगा; क्योंकि इसका यह शरीर वैसे ही लक्षणोंसे सम्पन्न है ।। ७ ।। संनिकृष्टश्च देवस्य न चान्यैर्मानुषैर्वृतः । एष मे दास्यति धनं प्रभूतं शीघ्रमेव च ।। ८ ।। यह देवताका संनिकटवर्ती है और दूसरे मनुष्योंने इसे घेर नहीं रखा है। इसलिये यह मुझे शीघ्र ही प्रचुर धन देगा ।। ८ ।। ततो धूपैश्च गन्धैश्च माल्यैरुच्चावचैरपि । बलिभिर्विविधाभिश्च पूजयामास तं द्विजः ।। ९ ।। तब ब्राह्मणने धूप, गन्ध, छोटे-बड़े माल्य तथा भाँति-भाँतिके पूजोपहार अर्पित करके कुण्डधार मेघका पूजन किया ।। ९ ।। ततस्त्वल्पेन कालेन तुष्टो जलधरस्तदा । तस्योपकारनियतामिमां वाचमुवाच ह ।। १० ।। इससे वह मेघ थोड़े ही समयमें संतुष्ट हो गया और उसने ब्राह्मणके उपकारमें नियमपूर्वक प्रवृत्ति सूचित करनेवाली यह बात कही— ।। १० ।।

ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा ।
निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ।। ११ ।।
‘ब्रह्मन्! ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर और व्रतभंग करनेवाले मनुष्यके लिये साधुपुरुषोंने प्रायश्चित्तका विधान किया है, किंतु कृतघ्नके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है’ ।। ११ ।।
आशायास्तनयोऽधर्मः क्रोधोऽसूयासुतः स्मृतः ।
लोभः पुत्रो निकृत्यास्तु कृतघ्नो नार्हति प्रजाम् ।। १२ ।।
‘आशाका पुत्र अधर्म है। असूयाका पुत्र क्रोध माना गया है। निकृति (शठता) का पुत्र लोभ है; परंतु कृतघ्न मनुष्य संतान पानेके योग्य नहीं है’ ।। १२ ।।
ततः स ब्राह्मणः स्वप्ने कुण्डधारस्य तेजसा ।
अपश्यत् सर्वभूतानि कुशेषु शयितस्तदा ।। १३ ।।
तदनन्तर वह ब्राह्मण कुण्डधारके तेजसे प्रेरित हो कुशोंकी शय्यापर सो गया और स्वप्नमें उसने समस्त प्राणियोंको देखा ।। १३ ।।
शमेन तपसा चैव भक्त्या च निरुपस्कृतः ।
शुद्धात्मा ब्राह्मणो रात्रौ निदर्शनमपश्यत ।। १४ ।।

वह शम-दम, तप और भक्तिभावसे सम्पन्न, भोगरहित तथा शुद्धचित्तवाला था। उस ब्राह्मणको रातमें कुछ ऐसा दृष्टान्त दिखायी दिया, जिससे उसे कुण्डधारके प्रति अपनी भक्तिका परिचय मिल गया ॥ १४ ॥

मणिभद्रं स तत्रस्थं देवतानां महाद्युतिम् ।
अपश्यत महात्मानं व्यादिशन्तं युधिष्ठिर ॥ १५ ॥

युधिष्ठिर! उसने देखा कि महातेजस्वी महात्मा यक्षराज मणिभद्र वहाँ विराजमान हैं और देवताओंके समक्ष विभिन्न याचकोंको उपस्थित कर रहे हैं ॥ १५ ॥

तत्र देवाः प्रयच्छन्ति राज्यानि च धनानि च ।
शुभैः कर्मभिरारब्धाः प्रच्छिन्दन्त्यशुभेषु च ॥ १६ ॥

वहाँ देवतालोग उन याचकोंके शुभकर्मके बदले राज्य और धन आदि दे रहे थे और अशुभ कर्मका भोग उपस्थित होनेपर पहलेके दिये हुए राज्य आदिको भी छीन लेते थे ॥ १६ ॥

पश्यतामथ यक्षाणां कुण्डधारो महाद्युतिः ।
निपत्य पतितो भूमौ देवानां भरतर्षभ ॥ १७ ॥

भरतश्रेष्ठ! वहाँ यक्षोंके देखते-देखते महातेजस्वी कुण्डधारने देवताओंके आगे धरतीपर माथा टेक दिया ॥

ततस्तु देववचनान्मणिभद्रो महामनाः ।
उवाच पतितं भूमौ कुण्डधार किमिष्यते ॥ १८ ॥

तब महामनस्वी मणिभद्रने देवताओंके कहनेसे पृथ्वीपर पड़े हुए उस मेघसे पूछा, 'कुण्डधार! तुम क्या चाहते हो?' ॥ १८ ॥

कुण्डधार उवाच

यदि प्रसन्ना देवा मे भक्तोऽयं ब्राह्मणो मम ।
अस्यानुग्रहमिच्छामि कृतं किंचित् सुखोदयम् ॥ १९ ॥

कुण्डधार बोला— यह ब्राह्मण मेरा भक्त है। यदि देवतालोग मुझपर प्रसन्न हों तो मैं इसके ऊपर उनका ऐसा अनुग्रह चाहता हूँ, जिससे इसे भविष्यमें कुछ सुख मिल सके ॥ १९ ॥

ततस्तं मणिभद्रस्तु पुनर्वचनमब्रवीत् ।
देवानामेव वचनात् कुण्डधारं महाद्युतिम् ॥ २० ॥

तब मणिभद्रने देवताओंकी ही आज्ञासे महातेजस्वी कुण्डधारके प्रति पुनः यह बात कही ॥ २० ॥

मणिभद्र उवाच

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते कृतकृत्यः सुखी भव ।

धनार्थी यदि विप्रोऽयं धनमस्मै प्रदीयताम् ॥ २१ ॥ **मणिभद्र बोले—**कुण्डधार! उठो, उठो; तुम्हारा कल्याण हो, तुम कृतकृत्य और सुखी हो जाओ। यदि यह ब्राह्मण धन चाहता तो इसे धन दे दिया जाय ॥ २१ ॥ यावद् धनं प्रार्थयते ब्राह्मणोऽयं सखा तव । देवानां शासनात् तावदसंख्येयं ददाम्यहम् ॥ २२ ॥ तुम्हारा सखा यह ब्राह्मण जितना धन चाहता हो, देवताओंकी आज्ञासे मैं उतना ही अथवा असंख्य धन इसे दे रहा हूँ ॥ २२ ॥ विचार्य कुण्डधारस्तु मानुष्यं चलमध्रुवम् । तपसे मतिमाधत्त ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥ युधिष्ठिर! परंतु कुण्डधारने यह सोचकर कि मानव-जीवन चंचल एवं अस्थिर है, उस ब्राह्मणके तपोबलको भी बढ़ानेका विचार किया ॥ २३ ॥

कुण्डधार उवाच

नाहं धनानि याचामि ब्राह्मणाय धनप्रद ॥ २४ ॥ अन्यमेवाहमिच्छामि भक्तायानुग्रहं कृतम् । पृथिवीं रत्नपूर्णां वा महद् वा रत्नसंचयम् ॥ २५ ॥ भक्ताय नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः । धर्मेऽस्य रमतां बुद्धिर्धर्मं चैवोपजीवतु । धर्मप्रधानो भवतु ममैषोऽनुग्रहो मतः ॥ २६ ॥ **कुण्डधार बोला—**धनदाता देव! मैं ब्राह्मणके लिये धनकी याचना नहीं करता हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे इस भक्तपर किसी और प्रकारका ही अनुग्रह किया जाय। मैं अपने इस भक्तको रत्नोंसे भरी हुई पृथ्वी अथवा रत्नोंका विशाल भण्डार नहीं देना चाहता। मेरी तो यह इच्छा है कि यह धर्मात्मा हो। इसकी बुद्धि धर्ममें लगी रहे तथा यह धर्मसे ही जीवन-निर्वाह करे। इसके जीवनमें धर्मकी ही प्रधानता रहे। इसीको मैं इसके लिये महान् अनुग्रह मानता हूँ ॥ २४—२६ ॥

मणिभद्र उवाच

सदा धर्मफलं राज्यं सुखानि विविधानि च । फलान्येवायमश्नातु कायक्लेशविवर्जितः ॥ २७ ॥ **मणिभद्र बोला—**धर्मके फल तो सदा राज्य और नाना प्रकारके सुख ही हैं; अतः यह ब्राह्मण शारीरिक कष्टसे रहित हो केवल उन फलोंका ही उपभोग करे ॥ २७ ॥

भीष्म उवाच

ततस्तदेव बहुशः कुण्डधारो महायशाः ।

अभ्यासमकरोद् धर्मे ततस्तुष्टास्तु देवताः ॥ २८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! मणिभद्रके ऐसा कहनेपर भी महायशस्वी कुण्डधारने बार-बार अपनी वही बात दुहरायी। ब्राह्मणका धर्म बढ़े, इसीके लिये आग्रह किया। इससे सब देवता संतुष्ट हो गये ॥ २८ ॥

मणिभद्र उवाच प्रीतास्ते देवताः सर्वा द्विजस्यास्य तथैव च । भविष्यत्येष धर्मात्मा धर्मे चाधास्यते मतिः ॥ २९ ॥ **तब मणिभद्रने कहा—**कुण्डधार! सब देवता तुमपर और इस ब्राह्मणपर भी बहुत प्रसन्न हैं। यह धर्मात्मा होगा और इसकी बुद्धि धर्ममें ही लगी रहेगी ॥ ततः प्रीतो जलधरः कृतकार्यो युधिष्ठिर । ईप्सितं मनसो लब्ध्वा वरमन्यैः सुदुर्लभम् ॥ ३० ॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ मनोवाञ्छित वर पाकर कृतकृत्य एवं सफल-मनोरथ हो वह मेघ बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ ३० ॥ ततोऽपश्यत चीराणि सूक्ष्माणि द्विजसत्तमः । पार्श्वतोऽभ्याशतो न्यस्तान्यथ निर्वेदमागतः ॥ ३१ ॥ तत्पश्चात् उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपने निकट अगल-बगलमें रखे हुए बहुत-से सूक्ष्म चीर (वल्कल आदि) देखे। इससे उसके मनमें बड़ा खेद एवं वैराग्य हुआ ॥ ३१ ॥

ब्राह्मण उवाच अयं न सुकृतं वेत्ति कोन्वन्यो वेत्स्यते कृतम् । गच्छामि वनमेवाहं वरं धर्मेण जीवितुम् ॥ ३२ ॥ **ब्राह्मण मन-ही-मन बोला—**जब मेरे इस पुण्यमय तपका उद्देश्य यह कुण्डधार ही नहीं समझ पा रहा है, तब दूसरा कौन जानेगा! अच्छा, अब मैं वनको ही चलता हूँ। धर्ममय जीवन बिताना ही अच्छा है ॥ ३२ ॥

भीष्म उवाच निर्वेदाद् देवतानां च प्रसादात् स द्विजोत्तमः । वनं प्रविश्य सुमहत् तप आरब्धवांस्तदा ॥ ३३ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! वैराग्य और देवताओंके कृपाप्रसादसे वनमें जाकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने उस समय बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की ॥ ३३ ॥ देवतातिथिशेषेण फलमूलाशनो द्विजः । धर्मे चास्य महाराज दृढा बुद्धिरजायत ॥ ३४ ॥

देवताओं और अतिथियोंको अर्पण करके शेष बचे हुए फल-मूल आदिका वह आहार करता था। महाराज! धर्मके विषयमें उसकी बुद्धि अटल हो गयी थी॥ ३४॥
त्यक्त्वा मूलफलं सर्वं पर्णाहारोऽभवद् द्विजः।
पर्णं त्यक्त्वा जलाहारः पुनरासीद् द्विजस्तदा॥ ३५॥
वायुभक्षस्ततः पश्चाद् बहून् वर्षगणानभूत्।
न चास्य क्षीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत्॥ ३६॥
कुछ कालके बाद वह ब्राह्मण सारे फल-मूलका भोजन छोड़कर केवल पत्ते चबाकर रहने लगा। फिर पत्तेका भी त्याग करके केवल जल पीकर निर्वाह करने लगा। तत्पश्चात् बहुत वर्षोंतक वह केवल वायु पीकर रहा। फिर भी उसकी प्राणशक्ति क्षीण नहीं होती थी, यह एक अद्भुत-सी बात थी॥ ३५-३६॥
धर्मे च श्रद्दधानस्य तपस्युग्रे च वर्ततः।
कालेन महता तस्य दिव्या दृष्टिरजायत॥ ३७॥
धर्ममें श्रद्धा रखते हुए दीर्घकालतक उग्र तपस्यामें लगे हुए उस ब्राह्मणको दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गयी॥
तस्य बुद्धिः प्रादुरासीद् यदि दद्यामहं धनम्।
तुष्टः कस्यचिदेवेह मिथ्यावाङ् न भवेन्मम॥ ३८॥
उस समय उसे यह अनुभव हुआ कि यदि मैं संतुष्ट होकर इस जगत्में किसीको प्रचुर धन दे दूँ तो मेरा दिया हुआ वचन मिथ्या नहीं होगा॥ ३८॥
ततः प्रहृष्टवदनो भूय आरब्धवांस्तपः।
भूयश्चाचिन्तयत् सिद्धो यत्परं सोऽभिमन्यते॥ ३९॥
यह विचार आते ही उसका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उसने बड़े उत्साहके साथ पुनः तपस्या आरम्भ की। पुनः सिद्धि प्राप्त होनेपर उसने देखा कि वह मनमें जो-जो संकल्प करता है, वह अत्यन्त महान् होनेपर भी सामने प्रस्तुत हो जाता है। यह देखकर ब्राह्मणने पुनः यों विचार किया—॥ ३९॥
यदि दद्यामहं राज्यं तुष्टो वै यस्य कस्यचित्।
स भवेदचिराद् राजा न मिथ्या वाग् भवेन्मम।
‘यदि मैं संतुष्ट होकर जिस किसीको भी राज्य दे दूँ तो वह शीघ्र ही राजा हो जायगा। मेरी यह बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती’॥ ३९½॥
तस्य साक्षात् कुण्डधारो दर्शयामास भारत॥ ४०॥
ब्राह्मणस्य तपोयोगात् सौहृदेनाभिचोदितः॥ ४१॥
समागम्य स तेनाथ पूजां चक्रे यथाविधि।
ब्राह्मणः कुण्डधारस्य विस्मितश्चाभवन्नृप॥ ४२॥

भरतनन्दन! इतनेहीमें ब्राह्मणकी तपस्याके प्रभावसे तथा उसके प्रति सौहार्दसे प्रेरित होकर कुण्डधारने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उससे मिलकर ब्राह्मणने कुण्डधारकी विधिपूर्वक पूजा की। नरेश्वर! उसे देखकर ब्राह्मणको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४०—४२ ॥ ततोऽब्रवीत् कुण्डधारो दिव्यं ते चक्षुरुत्तमम् । पश्य राज्ञां गतिं विप्र लोकांश्र्चैव तु चक्षुषा ॥ ४३ ॥ तब कुण्डधारने ब्राह्मणसे कहा—'विप्रवर! तुम्हें परम उत्तम दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है; अतः तुम अपनी आँखोंसे देख लो कि राजाओंको किस गतिकी प्राप्ति होती है तथा वे किन-किन लोकोंमें जाते हैं' ॥ ४३॥ ततो राजसहस्राणि मग्नानि निरये तदा । दूरादपश्यद् विप्रः स दिव्ययुक्तेन चक्षुषा ॥ ४४ ॥ तब उस ब्राह्मणने दूरसे ही अपने दिव्य नेत्रोंसे देखा कि सहस्रों राजा नरकमें डूबे हुए हैं ॥ ४४ ॥

कुण्डधार उवाच मां पूजयित्वा भावेन यदि त्वं दुःखमाप्नुयाः । कृतं मया भवेत् किं ते कश्च तेऽनुग्रहो भवेत् ॥ ४५ ॥ **कुण्डधार बोला—**ब्रह्मन्! तुमने बड़े भक्तिभावसे मेरी पूजा की थी। इसपर भी यदि तुम धन पाकर दुःख ही भोगते रहते तो मेरे द्वारा तुम्हारा क्या उपकार हुआ होता और तुम्हारे ऊपर मेरा कौन-सा अनुग्रह सिद्ध हो सकता था ॥ पश्य पश्य च भूयस्त्वं कामानिच्छेत् कथं नरः । स्वर्गद्वारं हि संरुद्धं मानुषेषु विशेषतः ॥ ४६ ॥ देखो-देखो, एक बार फिर लोगोंकी दशापर दृष्टिपात करो। यह सब देख-सुनकर मनुष्य भोगोंकी इच्छा कैसे कर सकता है। जो धन और भोगोंमें आसक्त हैं, ऐसे लोगों, विशेषतः मनुष्योंके लिये स्वर्गका दरवाजा प्रायः बंद ही रहता है ॥ ४६ ॥

भीष्म उवाच ततोऽपश्यत् स कामं च क्रोधं लोभं भयं मदम् । निद्रां तन्द्रीं तथाऽऽलस्यमावृत्य पुरुषान् स्थितान् ॥ ४७ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर ब्राह्मणने देखा कि उन भोगी पुरुषोंको काम, क्रोध, लोभ, भय, मद, निद्रा, तन्द्रा और आलस्य आदि शत्रु घेरकर खड़े हैं ॥

कुण्डधार उवाच एतैर्लोकाः सुसंरुद्धा देवानां मानुषाद् भयम् । तथैव देववचनाद् विघ्नं कुर्वन्ति सर्वशः ॥ ४८ ॥

कुण्डधार बोला—विप्रवर! देखो, सब लोग इन्हीं दोषोंसे घिरे हुए हैं। देवताओंको मनुष्योंसे भय बना रहता है, इसलिये ये काम आदि दोष देवताओंके आदेशसे मनुष्यके धर्म और तपस्यामें सब प्रकारसे विघ्न डाला करते हैं ॥ ४८ ॥
न देवैरननुज्ञातः कश्चिद् भवति धार्मिकः ।
एष शक्तोऽसि तपसा दातुं राज्यं धनानि च ॥ ४९ ॥
देवताओंकी अनुमति प्राप्त किये बिना कोई निर्विघ्नरूपसे धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता; किंतु तुम्हें तो देवताओंका अनुग्रह प्राप्त हो गया है। इसलिये अब तुम अपने तपके प्रभावसे दूसरोंको राज्य और धन देनेमें समर्थ हो गये हो ॥ ४९ ॥

भीष्म उवाच
ततः पपात शिरसा ब्राह्मणस्तोयधारिणे ।
उवाच चैनं धर्मात्मा महान् मेऽनुग्रहः कृतः ॥ ५० ॥
कामलोभानुबन्धेन पुरा ते यदसूयितम् ।
मया स्नेहमविज्ञाय तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तब उस धर्मात्मा ब्राह्मणने धरतीपर मस्तक टेककर कुण्डधार मेघको साष्टांग प्रणाम किया और उससे कहा—'प्रभो! आपने मुझपर महान् अनुग्रह किया है। आपके स्नेहको न समझकर काम और लोभके बन्धनमें बँधे रहनेसे मैंने पहले आपके प्रति जो दोषदृष्टि कर ली थी, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें' ॥
क्षान्तमेव मयेत्युक्त्वा कुण्डधारो द्विजर्षभम् ।
सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ५२ ॥
(कुण्डधारने कहा—) 'विप्रवर! मैं तो पहलेसे ही क्षमा कर चुका हूँ' ऐसा कहकर उस मेघने उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपनी दोनों भुजाओंद्वारा हृदयसे लगा लिया और वह फिर वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ ५२ ॥
ततः सर्वांस्तदा लोकान् ब्राह्मणोऽनुचचार ह ।
कुण्डधारप्रसादेन तपसा सिद्धिमागतः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर कुण्डधारके कृपाप्रसादसे तपस्याद्वारा सिद्धि पाकर वह ब्राह्मण सम्पूर्ण लोकोंमें विचरने लगा ॥
विहायसा च गमनं तथा संकल्पितार्थता ।
धर्माच्छक्त्या तथा योगाद् या चैव परमा गतिः ॥ ५४ ॥
आकाशमार्गसे चलना, संकल्पमात्रसे ही अभीष्ट वस्तुका प्राप्त हो जाना तथा धर्म, शक्ति और योगके द्वारा जो परमगति प्राप्त होती है, वह सब कुछ उस ब्राह्मणको प्राप्त हो गयी ॥ ५४ ॥
देवता ब्राह्मणाः सन्तो यक्षा मानुषचारणाः ।

धार्मिकान् पूजयन्तीह न धनाढ्यान् न कामिनः ॥ ५५ ॥
देवता, ब्राह्मण, साधु-संत, यक्ष, मनुष्य और चारण-ये सब-के-सब इस जगत्में धर्मात्माओंका ही पूजन करते हैं, धनियों और भोगियोंका नहीं ॥ ५५ ॥
सुप्रसन्ना हि ते देवा यत्ते धर्मे रता मतिः ।
धने सुखकला काचिद् धर्मे तु परमं सुखम् ॥ ५६ ॥
राजन्! तुम्हारे ऊपर भी देवता बहुत प्रसन्न हैं, जिससे तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी हुई है। धनमें तो सुखका कोई लेशमात्र ही रहता है। परमसुख तो धर्ममें ही है ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि कुण्डधारोपाख्याने
एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें कुण्डधारका उपाख्यानविषयक दो सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७१ ॥

धर्मार्थं न सुखार्थार्थं कथं यज्ञः समाहितः ॥ १ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा

युधिष्ठिर उवाच

बहूनां यज्ञतपसामेकार्थानां पितामह ।
धर्मार्थं न सुखार्थार्थं कथं यज्ञः समाहितः ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यज्ञ और तप तो बहुत हैं और वे सब एकमात्र भगवत्प्रीतिके लिये किये जा सकते हैं; परंतु उनमेंसे जिस यज्ञका प्रयोजन केवल धर्म हो, स्वर्ग-सुख अथवा धनकी प्राप्ति न हो, उसका सम्पादन कैसे होता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि नारदेनानुकीर्तितम् ।
उञ्छवृत्तेः पुरावृत्तं यज्ञार्थे ब्राह्मणस्य च ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! पूर्वकालमें उञ्छवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करनेवाले एक ब्राह्मणका यज्ञके सम्बन्धमें जैसा वृत्तान्त है और जिसे नारदजीने मुझसे कहा था, वही प्राचीन इतिहास मैं यहाँ तुम्हें बता रहा हूँ ॥ २ ॥

नारद उवाच

राष्ट्रे धर्मोत्तरे श्रेष्ठे विदर्भेष्वभवद् द्विजः ।
उञ्छवृत्तिर्ऋषिः कश्चिद् यज्ञं यष्टुं समादधे ॥ ३ ॥

नारदजीने कहा— जहाँ धर्मकी ही प्रधानता है, उस उत्तम राष्ट्र विदर्भमें कोई ब्राह्मण ऋषि निवास करता था। वह कटे हुए खेत या खलिहानसे अन्नके बिखरे हुए दानोंको बीन लाता और उसीसे जीवन-निर्वाह करता था। एक बार उसने यज्ञ करनेका निश्चय किया ॥ ३ ॥

श्यामाकमशनं तत्र सूर्यपर्णी सुवर्चला ।
तिक्तं च विरसं शाकं तपसा स्वादुतां गतम् ॥ ४ ॥

जहाँ वह रहता था, वहाँ अन्नके नामपर साँवाँ मिलता था। दाल बनानेके लिये सूर्यपर्णी (जंगली उड़द) मिलती थी और शाक-भाजीके लिये सुवर्चला (ब्राह्मी लता) तथा अन्य प्रकारके तिक्त एवं रसहीन शाक उपलब्ध होते थे; परंतु ब्राह्मणकी तपस्यासे उपर्युक्त सभी वस्तुएँ सुस्वादु हो गयी थीं ॥ ४ ॥

उपगम्य वने सिद्धिं सर्वभूताविहिंसया ।
अपि मूलफलैरिष्टो यज्ञः स्वर्ग्यः परंतप ॥ ५ ॥

परंतप युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणने वनमें तपस्याद्वारा सिद्धि लाभ करके समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी भी हिंसा न करते हुए मूल और फलोंद्वारा भी स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले यज्ञका अनुष्ठान किया ।। ५ ।।

तस्य भार्या व्रतकृशा शुचिः पुष्करधारिणी ।
यज्ञपत्नी समानीता सत्येनानुविधीयते ॥ ६ ॥
उस ब्राह्मणके एक पत्नी थी, जिसका नाम था पुष्करधारिणी। उसके आचार-विचार परम पवित्र थे। वह व्रत-उपवास करते-करते दुर्बल हो गयी थी। ब्राह्मणका नाम सत्य था। यद्यपि वह ब्राह्मणी अपने पति सत्यके हिंसाप्रधान यज्ञकी इच्छा प्रकट करनेपर उसके अनुकूल नहीं होती थी, तो भी ब्राह्मण उसे यज्ञपत्नीके स्थानपर आग्रहपूर्वक बुला ही लाता था ।। ६ ।।

सा तु शापपरित्रस्ता तत्स्वभावानुवर्तिनी ।
मायूरजीर्णपर्णानां वस्त्रं तस्याश्च वर्णितम् ॥ ७ ॥
ब्राह्मणी शापसे डरकर पतिके स्वभावका सर्वथा अनुसरण करती थी। ऐसा कहा जाता है कि वह मोरोंकी टूटकर गिरी पुरानी पाँखोंको जोड़कर उनसे ही अपना शरीर ढँकती थी ।। ७ ।।

अकामया कृतस्तत्र यज्ञो होत्रनुशासनात् ।
शुक्रस्य पुनराजातिः पर्णादो नाम धर्मवित् ॥ ८ ॥
होताके आदेशसे इच्छा न होनेपर भी ब्राह्मण-पत्नीने उस यज्ञका कार्य सम्पन्न किया। होताका कार्य पर्णाद नामसे प्रसिद्ध एक धर्मज्ञ ऋषि करते थे, जो शुक्राचार्यके वंशज थे ।। ८ ।।

तस्मिन् वने समीपस्थो मृगोऽभूत् सहवासिकः ।
वचोभिरब्रवीत् सत्यं त्वयेदं दुष्कृतं कृतम् ॥ ९ ॥
उस वनमें सत्यका सहवासी एक मृग था, जो वहाँ पास ही रहता था। एक दिन उसने मनुष्यकी बोलीमें सत्यसे कहा—‘ब्राह्मण! तुमने यज्ञके नामपर यह दुष्कर्म किया है ।। ९ ।।

यदि मन्त्राङ्गहीनोऽयं यज्ञो भवति वै कृतः ।
मां भोः प्रक्षिप होत्रे त्वं गच्छ स्वर्गमनिन्दितः ॥ १० ॥
‘यदि किया हुआ यज्ञ मन्त्र और अंगसे हीन हो तो वह यजमानके लिये दुष्कर्म ही है। ब्राह्मणदेव! तुम मुझे होताको सौंप दो और स्वयं निन्दारहित होकर स्वर्गलोकमें जाओ' ।। १० ।।

ततस्तु यज्ञे सावित्री साक्षात् तं संयमन्त्रयत् ।
निमन्त्रयन्ती प्रत्युक्ता न हन्यां सहवासिनम् ॥ ११ ॥