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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम-गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना

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त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम-गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना

वासुदेव उवाच न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत । शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ॥ १ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—भारत! केवल राज्य आदि बाह्य पदार्थोंका त्याग करनेसे ही सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शारीरिक द्रव्यका त्याग करके भी सिद्धि प्राप्त होती है अथवा नहीं भी होती है ॥ १ ॥

बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृद्ध्यतः । यो धर्मो यत् सुखं चैव द्विषतामस्तु तत् तथा ॥ २ ॥ बाह्य पदार्थोंसे अलग होकर भी जो शारीरिक सुख-विलासमें आसक्त है, उसे जिस धर्म और सुखकी प्राप्ति होती है, वह तुम्हारे साथ द्वेष करनेवालोंको ही प्राप्त हो ॥ २ ॥

द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥ ३ ॥ ‘मम’ (मेरा) ये दो अक्षर ही मृत्युरूप हैं और ‘न मम’ (मेरा नहीं है) यह तीन अक्षरोंका पद सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण है। ममता मृत्यु है और उसका त्याग सनातन अमृतत्व है ॥ ३ ॥

ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव व्यवस्थितौ । अदृश्यमानौ भूतानि योधयेतामसंशयम् ॥ ४ ॥ राजन्! इस प्रकार मृत्यु और अमृत दोनों अपने भीतर ही स्थित हैं। ये दोनों अदृश्य रहकर प्राणियोंको लड़ाते हैं अर्थात् किसीको अपना मानना और किसीको अपना न मानना यह भाव ही युद्धका कारण है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥

अविनाशोऽस्य सत्त्वस्य नियतो यदि भारत । भित्त्वा शरीरं भूतानामहिंसां प्रतिपद्यते ॥ ५ ॥ भरतनन्दन! यदि इस जगत्‌की सत्ताका विनाश न होना ही निश्चित हो, तब तो प्राणियोंके शरीरका भेदन करके भी मनुष्य अहिंसाका ही फल प्राप्त करेगा ॥ ५ ॥

लब्ध्वा हि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजङ्गमाम् । ममत्वं यस्य नैव स्यात् किं तया स करिष्यति ॥ ६ ॥

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चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथ्वीको पाकर भी जिसकी उसमें ममता नहीं होती, वह उसको लेकर क्या करेगा अर्थात् उस सम्पत्तिसे उसका कोई अनर्थ नहीं हो सकता ॥ ६ ॥

अथवा वसतः पार्थ वने वन्येन जीवतः ।
ममता यस्य द्रव्येषु मृत्योरास्ये स वर्तते ॥ ७ ॥
किंतु कुन्तीनन्दन! जो वनमें रहकर जंगली फल-मूलोंसे ही जीवन-निर्वाह करता है, उसकी भी यदि द्रव्योंमें ममता है तो वह मौतके मुखमें ही विद्यमान है ॥ ७ ॥

बाह्यान्तराणां शत्रूणां स्वभावं पश्य भारत ।
यन्न पश्यति तद् भूतं मुच्यते स महाभयात् ॥ ८ ॥
भारत! बाहरी और भीतरी शत्रुओंके स्वभावको देखिये-समझिये (ये मायामय होनेके कारण मिथ्या हैं, ऐसा निश्चय कीजिये)। जो मायिक पदार्थोंको ममत्वकी दृष्टिसे नहीं देखता, वह महान् भयसे छुटकारा पा जाता है ॥ ८ ॥

कामात्मानं न प्रशंसन्ति लोके
नेहाकामा काचिदस्ति प्रवृत्तिः ।
सर्वे कामा मनसोऽङ्गप्रभूता
यान् पण्डितः संहरते विचिन्त्य ॥ ९ ॥
जिसका मन कामनाओंमें आसक्त है, उसकी संसारके लोग प्रशंसा नहीं करते हैं। कोई भी प्रवृत्ति बिना कामनाके नहीं होती और समस्त कामनाएँ मनसे ही प्रकट होती हैं। विद्वान् पुरुष कामनाओंको दुःखका कारण मानकर उनका परित्याग कर देते हैं ॥ ९ ॥

भूयो भूयोजनमनोऽभ्यासयोगाद्
योगी योगं सारमार्गं विचिन्त्य ।
दानं च वेदाध्ययनं तपश्च
काम्यानि कर्माणि च वैदिकानि ॥ १० ॥
व्रतं यज्ञान् नियमान् ध्यानयोगान्
कामेन यो नारभते विदित्वा ।
यद् यच्चायं कामयते स धर्मो
न यो धर्मो नियमस्तस्य मूलम् ॥ ११ ॥
योगी पुरुष अनेक जन्मोंके अभ्याससे योगको ही मोक्षका मार्ग निश्चित करके कामनाओंका नाश कर डालता है। जो इस बातको जानता है, वह दान, वेदाध्ययन, तप, वेदोक्त कर्म, व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यान-योगादिका कामनापूर्वक अनुष्ठान नहीं करता तथा जिस कर्मसे वह कुछ कामना रखता है, वह धर्म नहीं है। वास्तवमें कामनाओंका निग्रह ही धर्म है और वही मोक्षका मूल है ॥ १०-११ ॥

अत्र गाथाः कामगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
शृणु संकीर्त्यमानास्ता अखिलेन युधिष्ठिर ।

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नाहं शक्योऽनुपायेन हन्तुं भूतेन केनचित् ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंके जानकार विद्वान् एक पुरातन गाथाका वर्णन किया करते हैं, जो कामगीता कहलाती है। उसे मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिये। कामका कहना है कि कोई भी प्राणी वास्तविक उपाय (निर्ममता और योगाभ्यास)-का आश्रय लिये बिना मेरा नाश नहीं कर सकता है ॥ १२ ॥

यो मां प्रयतते हन्तुं ज्ञात्वा प्रहरणे बलम् । तस्य तस्मिन् प्रहरणे पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १३ ॥ जो मनुष्य अपनेमें अस्त्रबलकी अधिकताका अनुभव करके मुझे नष्ट करनेका प्रयत्न करता है, उसके उस अस्त्रबलमें मैं अभिमानरूपसे पुनः प्रकट हो जाता हूँ ॥ १३ ॥

यो मां प्रयतते हन्तुं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः । जङ्गमेष्विव धर्मात्मा पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १४ ॥ जो नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा मुझे मारनेका यत्न करता है, उसके चित्तमें मैं उसी प्रकार उत्पन्न होता हूँ, जैसे उत्तम जंगम योनियोंमें धर्मात्मा ॥ १४ ॥

यो मां प्रयतते नित्यं वेदैर्वेदान्तसाधनैः । स्थावरेष्विव भूतात्मा तस्य प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १५ ॥ जो वेद और वेदान्तके स्वाध्यायरूप साधनोंके द्वारा मुझे मिटा देनेका सदा प्रयास करता है, उसके मनमें मैं स्थावर प्राणियोंमें जीवात्माकी भाँति प्रकट होता हूँ ॥ १५ ॥

यो मां प्रयतते हन्तुं धृत्या सत्यपराक्रमः । भावो भवामि तस्याहं स च मां नावबुध्यते ॥ १६ ॥ जो सत्यपराक्रमी पुरुष धैर्यके बलसे मुझे नष्ट करनेकी चेष्टा करता है, उसके मानसिक भावोंके साथ मैं इतना घुल-मिल जाता हूँ कि वह मुझे पहचान नहीं पाता ॥ १६ ॥

यो मां प्रयतते हन्तुं तपसा संशितव्रतः । ततस्तपसि तस्याथ पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १७ ॥ जो कठोर व्रतका पालन करनेवाला मनुष्य तपस्याके द्वारा मेरे अस्तित्वको मिटा डालनेका प्रयास करता है, उसकी तपस्यामें ही मैं प्रकट हो जाता हूँ ॥ १७ ॥

यो मां प्रयतते हन्तुं मोक्षमास्थाय पण्डितः । तस्य मोक्षरतिस्थस्य नृत्यामि च हसामि च । अवध्यः सर्वभूतानामहमेकः सनातनः ॥ १८ ॥ जो विद्वान् पुरुष मोक्षका सहारा लेकर मेरे विनाशका प्रयत्न करता है, उसकी जो मोक्षविषयक आसक्ति है, उसीसे वह बँधा हुआ है। यह विचारकर मुझे उसपर हँसी आती है और मैं खुशीके मारे नाचने लगता हूँ। एकमात्र मैं ही समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य एवं सदा रहनेवाला हूँ ॥ १८ ॥

तस्मात्त्वमपि तं कामं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।

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धर्मे कुरु महाराज तत्र ते स भविष्यति ॥ १९ ॥ अतः महाराज! आप भी नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा अपनी उस कामनाको धर्ममें लगा दीजिये। वहाँ आपकी वह कामना सफल होगी ॥ १९ ॥ यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता । अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः ॥ २० ॥ मा ते व्यथास्तु निहतान् बन्धून् वीक्ष्य पुनः पुनः । न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं ये हताऽस्मिन् रणाजिरे ॥ २१ ॥ विधिपूर्वक दक्षिणा देकर आप अश्वमेधका तथा पर्याप्त दक्षिणावाले अन्यान्य समृद्धिशाली यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये। अपने मारे गये भाई-बन्धुओंको बारंबार याद करके आपके मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये। इस समरांगणमें जिनका वध हुआ है, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते ॥ स त्वमिष्ट्वा महायज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः । कीर्तिं लोके परां प्राप्य गतिमग्रयां गमिष्यसि ॥ २२ ॥ इसलिये आप पर्याप्त दक्षिणावाले समृद्धिशाली महायज्ञोंका अनुष्ठान करके इस लोकमें उत्तम कीर्ति और परलोकमें श्रेष्ठ गति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरका संवादविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्मराज्यका वर्णन

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चतुर्दशोऽध्यायः

ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्मराज्यका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

एवं बहुविधैर्वाक्यैर्मुनिभिस्तैस्तपोधनैः ।
समाश्र्वस्यत राजर्षिर्हतबन्धुर्युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
सोऽनुनीतो भगवता विष्टरश्रवसा स्वयं ।
द्वैपायनेन कृष्णेन देवस्थानेन वा विभुः ॥ २ ॥
नारदेनाथ भीमेन नकुलेन च पार्थिव ।
कृष्णया सहदेवेन विजयेन च धीमता ॥ ३ ॥
अन्यैश्च पुरुषव्याघ्रैर्ब्राह्मणैः शास्त्रदृष्टिभिः ।
व्यजहाच्छोकजं दुःखं संतापं चैव मानसम् ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार साक्षात् विष्टरश्रवा (विस्तृत यशवाले) भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवस्थान, नारद, भीमसेन, नकुल, द्रौपदी, सहदेव, बुद्धिमान् अर्जुन तथा अन्यान्य श्रेष्ठ पुरुषों और शास्त्रदर्शी ब्राह्मणों एवं तपोधन मुनियोंके बहुविध वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेपर जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, उन राजर्षि युधिष्ठिरका मन शान्त हुआ और उन्होंने शोकजनित दुःख तथा मानसिक संतापको त्याग दिया ॥ १—४ ॥

अर्चयामास देवांश्च ब्राह्मणांश्च युधिष्ठिरः ।
कृत्वाथ प्रेतकार्याणि बन्धूनां स पुनर्नृपः ॥ ५ ॥
अन्वशासच्च धर्मात्मा पृथिवीं सागराम्बराम् ।

तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन किया और मरे हुए बन्धु-बान्धवोंका श्राद्ध करके वे धर्मात्मा नरेश समुद्रपर्यन्त पृथ्‍वीका शासन करने लगे ॥ ५ १/२ ॥

प्रशान्तचेताः कौरव्यः स्वराज्यं प्राप्य केवलम् ।
व्यासं च नारदं चैव तांश्चान्यानब्रवीन्नृपः ॥ ६ ॥

चित्त शान्त होनेपर केवल अपना राज्य ग्रहण करके कुरुवंशी नरेश युधिष्ठिरने व्यास, नारद तथा अन्यान्य मुनिवरोंसे कहा— ॥ ६ ॥

आश्वासितोऽहं प्राग्वृद्धैर्भवद्भिर्मुनिपुङ्गवैः ।
न सूक्ष्ममपि मे किंचिद् व्यलीकमिह विद्यते ॥ ७ ॥

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'महानुभावो! आप सब लोग वृद्ध और मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपकी बातोंसे मुझे बड़ी सान्त्वना मिली है। अब मेरे मनमें तनिक भी दुःख नहीं है ॥ ७ ॥ अर्थश्च सुमहान् प्राप्तो येन यक्ष्यामि देवताः । पुरस्कृत्याद्य भवतः समानेष्यामहे मखम् ॥ ८ ॥ 'इधर पर्याप्त धन भी मिल गया, जिससे मैं भलीभाँति देवताओंका यजन भी कर सकूँगा। अब आपलोगोंको आगे करके हमलोग उस धनको अपनी यज्ञशालामें ले आवेंगे ॥ ८ ॥ हिमवन्तं त्वया गुप्ता गमिष्यामः पितामह । बह्वाश्चर्यो हि देशः स श्रूयते द्विजसत्तम ॥ ९ ॥ 'द्विजश्रेष्ठ पितामह! हमलोग आपसे ही सुरक्षित होकर हिमालय पर्वतकी यात्रा करेंगे। सुना जाता है, वह प्रदेश अनेक आश्चर्यजनक दृश्योंसे भरा हुआ है ॥ ९ ॥ तथा भगवता चित्रं कल्याणं बहुभाषितम् । देवर्षिणा नारदेन देवस्थानेन चैव ह ॥ १० ॥ 'आपने, देवर्षि नारदने तथा मुनिवर देवस्थानने बहुत-सी अद्भुत बातें बतायी हैं, जो मेरा कल्याण करनेवाली हैं ॥ १० ॥ नाभागधेयः पुरुषः कश्चिदेवंविधान् गुरून् । लभते व्यसनं प्राप्य सुहृदः साधुसम्मतान् ॥ ११ ॥ 'जो सौभाग्यशाली नहीं है, ऐसा कोई भी पुरुष संकटमें पड़नेपर आप-जैसे साधुसम्मानित हितैषी गुरुजनोंको नहीं पा सकता' ॥ ११ ॥ एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सर्व एव महर्षयः । अभ्यनुज्ञाप्य राजानं तथोभौ कृष्णफाल्गुनौ ॥ १२ ॥ पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवादर्शनं ययुः । ततो धर्मसुतो राजा तत्रैवोपाविशत् प्रभुः ॥ १३ ॥ राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करनेपर सभी महर्षि राजा युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण तथा अर्जुनकी अनुमति ले सबके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये। फिर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर उन्हें विदा करके वहीं बैठ गये ॥ १२-१३ ॥ एवं नातिमहान् कालः स तेषां संन्यवर्तत । कुर्वतां शौचकार्याणि भीष्मस्य निधने तदा ॥ १४ ॥ भीष्मकी मृत्युके पश्चात् शौचकार्य सम्पन्न करते हुए पाण्डवोंका कुछ काल वहीं व्यतीत हुआ ॥ १४ ॥ महादानानि विप्रेभ्यो ददतामौर्ध्वदेहिकम् । भीष्मकर्णपुरोगाणां कुरूणां कुरुसत्तम ॥ १५ ॥ सहितो धृतराष्ट्रेण स ददावौर्ध्वदेहिकम् ।

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कुरुश्रेष्ठ! धृतराष्ट्रसहित उन्होंने भीष्म और कर्ण आदि कुरुवंशियोंके निमित्त और्ध्वदैहिक क्रिया (श्राद्ध)-में ब्राह्मणोंको बड़े-बड़े दान दिये ।। १५ १/२ ।। ततो दत्त्वा बहुधनं विप्रेभ्यः पाण्डवर्षभः ।। १६ ।। धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विवेश गजसाह्वयम् । तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन देकर पाण्डवशिरोमणि युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रको आगे करके हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ।। १६ १/२ ।। स समाश्वास्य पितरं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । अन्वशाद् वै स धर्मात्मा पृथिवीं भ्रातृभिः सह ।। १७ ।। धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर प्रज्ञाचक्षु पितृव्य महाराज धृतराष्ट्रको सान्त्वना देकर भाइयोंके साथ पृथिवीका राज्य करने लगे ।। १७ ।। (यथा मनुर्महाराजो रामो दाशरथिर्यथा । तथा भरतसिंहोऽपि पालयामास मेदिनीम् ।। जैसे महाराज मनु तथा दशरथनन्दन श्रीरामने इस पृथिवीका पालन किया था, उसी प्रकार भरतसिंह युधिष्ठिर भी भूमण्डलकी रक्षा करने लगे ।। नाधर्म्यमभवत् तत्र सर्वो धर्मरुचिर्जनः । बभूव नरशार्दूल यथा कृतयुगे तथा ।। उनके राज्यमें कहीं कोई अधर्मयुक्त कार्य नहीं होता था। सब लोग धर्मविषयक रुचि रखते थे। पुरुषसिंह! जैसे सत्ययुगमें समस्त प्रजा धर्मपरायण रहती थी, उसी प्रकार उस समय द्वापरमें भी हो गयी थी ।। कलिमासन्नमाविशं निवास्य नृपनन्दनः । भ्रातृभिः सहितो धीमान् बभौ धर्मबलोद्धतः ।। कलियुगको समीप आया देख बुद्धिमान् नृपनन्दन युधिष्ठिरने उसको भी निवास दिया और भाइयोंके साथ वे धर्मबलसे अजेय होकर शोभा पाने लगे ।। ववर्ष भगवान् देवः काले देशे यथेप्सितम् । निरामयं जगदभूत् क्षुत्पिपासे न किंचन ।। भगवान् पर्जन्यदेव उनके राज्यके प्रत्येक देशमें यथेष्ट वर्षा करते थे। सारा जगत् रोग-शोकसे रहित हो गया था, किसीको भी भूख-प्यासका थोड़ा-सा भी कष्ट नहीं रह गया था ।। आधिर्नास्ति मनुष्याणां व्यसने नाभवन्मतिः । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णास्ते स्वधर्मोत्तराः शिवाः ।। धर्मः सत्यप्रधानश्च सत्यं सद्भिषयान्वितम् । मनुष्योंको मानसिक व्यथा नहीं सताती थी। किसीका मन दुर्व्यसनमें नहीं लगता था। ब्राह्मण आदि सभी वर्णोंके लोग स्वधर्मको ही उत्कृष्ट मानकर उसमें लगे रहते थे। सभी

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मंगलयुक्त थे। धर्ममें सत्यकी प्रधानता थी और सत्य उत्तम विषयोंसे युक्त होता था ॥ धर्मासनस्थः सद्भिः स स्त्रीबालातुरवृद्धकान् ॥ वर्णाश्रमान् पूर्वकृतान् सकलान् रक्षणोद्यतः । धर्मके आसनपर बैठे हुए युधिष्ठिर सत्पुरुषों, स्त्रियों, बालकों, रोगियों, बड़े-बूढ़ों तथा पूर्वनिर्मित सम्पूर्ण वर्णाश्रम-धर्मोंकी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहते थे ॥ अवृत्तिवृत्तिदानाद्यैर्यज्ञार्थैर्दीपितैरपि । आमुष्मिकं भयं नास्ति ऐहिकं कृतमेव तु । स्वर्गलोकोपमो लोकस्तदा तस्मिन् प्रशासति ॥ बभूव सुखमेकाग्रं तद्विशिष्टतरं परम् ॥ वे जीविकाहीन मनुष्योंको जीविका प्रदान करते, यज्ञके लिये धन दिलाते तथा अन्यान्य उपायोंद्वारा प्रजाकी रक्षा करते थे। अतः इहलोकका सारा सुख तो सबको प्राप्त ही था, परलोकका भी भय नहीं रह गया था। उनके शासनकालमें सारा जगत् स्वर्गलोकके समान सुखद हो गया था। यहाँका एकाग्र सुख स्वर्गसे भी विशिष्ट एवं उत्तम था ॥ नार्यः पतिव्रताः सर्वा रूपवत्यः स्वलंकृताः । यथोक्तवृत्ताः स्वगुणैर्बभूवुः प्रीतिहेतवः ॥ उनके राज्यकी सारी स्त्रियाँ पतिव्रता, रूपवती, आभूषणोंसे विभूषित और शास्त्रोक्त सदाचारसे सम्पन्न होती थीं। वे अपने उत्तम गुणोंद्वारा पतिकी प्रसन्नताको बढ़ानेमें कारण होती थीं ॥ पुमांसः पुण्यशीलाढ्याः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः । सुखिनः सूक्ष्ममप्येनो न कुर्वन्ति कदाचन ॥ पुरुष पुण्यशील, अपने-अपने धर्ममें अनुरक्त और सुखी थे। वे कभी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पाप भी नहीं करते थे ॥ सर्वे नराश्च नार्यश्च सततं प्रियवादिनः । अजिह्यमनसः शुक्लाः बभूवुः श्रमवर्जिताः ॥ सभी स्त्री-पुरुष सदा प्रिय वचन बोलते थे, मनमें कुटिलता नहीं आने देते थे, शुद्ध रहते थे और कभी थकावटका अनुभव नहीं करते थे ॥ भूषिताः कुण्डलैर्हारैः कटकैः कटिसूत्रकैः । सुवाससः सुगन्धाढ्याः प्रायशः पृथिवीतले ॥ उन दिनों प्रायः भूतलके सभी मनुष्य कुण्डल, हार, कड़े और करधनीसे विभूषित थे। सुन्दर वस्त्र और सुन्दर गन्धसे सुशोभित होते थे ॥ सर्वे ब्रह्मविदो विप्राः सर्वत्र परिनिष्ठिताः । वलीपलितहीनास्तु सुखिनो दीर्घजीविनः ॥

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सभी ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता और समस्त शास्त्रोंमें परिनिष्ठित थे। उनके शरीरमें झुर्रियाँ नहीं पड़ती थीं, उनके बाल सफेद नहीं होते थे और वे सुखी तथा दीर्घजीवी होते थे।।
इच्छा न जायतेऽन्यत्र वर्णेषु च न संकरः।
मनुष्याणां महाराज मर्यादासु व्यवस्थितः॥
महाराज! मनुष्योंकी इच्छा परायी स्त्रियोंके लिये नहीं होती थी, वर्णोंमें कभी संकरता नहीं आती थी और सब लोग मर्यादामें स्थित रहते थे।।
तस्मिञ्छासति राजेन्द्र मृगव्यालसरीसृपाः।
अन्योन्यमपि चान्येषु न बाधन्ते कदाचन॥
राजेन्द्र युधिष्ठिरके शासनकालमें हिंसक पशु, सर्प और बिच्छू आदि न तो आपसमें और न दूसरोंको ही कभी बाधा पहुँचाते थे।।
गावः सुक्षीरभूयिष्ठाः सुवालधिमुखोदराः।
अपीडिताः कर्षकाद्यैर्हृतव्याधितवत्सकाः॥
गौएँ बहुत दूध देती थीं, उनके मुख, पूँछ और उदर सुन्दर होते थे। किसान आदि उन्हें पीड़ा नहीं देते थे और उनके बछड़े भी नीरोग होते थे।।
अवन्ध्यकाला मनुजाः पुरुषार्थेषु च क्रमात्।
विषयेष्वनिषिद्धेषु वेदशास्त्रेषु चोद्यताः॥
उस समयके सभी मनुष्य अपने समयको व्यर्थ नहीं जाने देते थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन पुरुषार्थोंमें क्रमशः प्रवृत्त होते थे। शास्त्रमें जिनका निषेध नहीं किया गया है, उन्हीं विषयोंका सेवन करते और वेदशास्त्रोंके स्वाध्यायके लिये सदा उद्यत रहते थे।।
सुवृत्ता वृषभाः पुष्टाः सुस्वभावाः सुखोदयाः।
अतीव मधुरः शब्दः स्पर्शश्चातिसुखं रसम्।
रूपं दृष्टिक्षमं रम्यं मनोज्ञं गन्धवद् बभौ॥
उस समयके बैल अच्छी चाल-ढालवाले, हृष्ट-पुष्ट, अच्छे स्वभाववाले और सुखकी प्राप्ति करानेवाले होते थे। उन दिनों शब्द और स्पर्श नामक विषय अत्यन्त मधुर होते थे। रस बहुत ही सुखद जान पड़ता था, रूप दर्शनीय एवं रमणीय प्रतीत होता था और गन्ध नामक विषय भी मनोरम जान पड़ता था।।
धर्मार्थकामसंयुक्तं मोक्षाभ्युदयसाधनम्।
प्रह्लादजननं पुण्यं सम्बभूवाथ मानसम्॥
सबका मन धर्म, अर्थ और काममें संलग्न, मोक्ष और अभ्युदयके साधनमें तत्पर, आनन्दजनक और पवित्र होता था।।
स्थावरा बहुपुष्पाढ्याः फलच्छायावहास्तथा।
सुस्पर्शा विषहीनाश्च सुपत्रत्वक्प्ररोहिणः॥

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स्थावर (वृक्ष) बहुत-से फूलोंसे सुशोभित तथा फल और छाया देनेवाले होते थे। उनका स्पर्श सुखद जान पड़ता था और वे विषसे हीन तथा सुन्दर पत्र, छाल और अंकुरसे युक्त होते थे॥

मनोऽनुकूलाः सर्वेषां चेष्टा भूस्तापवर्जिता ।
यथा बभूव राजर्षिस्तद्वृत्तमभवद् भुवि ॥
सबकी चेष्टाएँ मनके अनुकूल होती थीं। पृथ्वीपर किसी प्रकारका संताप नहीं होता था। राजर्षि युधिष्ठिर स्वयं जैसे आचार-विचारसे युक्त थे, उसीका भूतलपर प्रसार हुआ था॥

सर्वलक्षणसम्पन्नाः पाण्डवा धर्मचारिणः ।
ज्येष्ठानुवर्तिनः सर्वे बभूवुः प्रियदर्शनाः ॥
समस्त पाण्डव सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, धर्माचरण करनेवाले और बड़े भाईकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले थे। उनका दर्शन सभीको प्रिय था॥

सिंहोरस्का जितक्रोधास्तेजोबलसमन्विताः ।
आजानुबाहवः सर्वे दानशीला जितेन्द्रियाः ॥
उनकी छाती सिंहके समान चौड़ी थी। वे क्रोधपर विजय पानेवाले और तेज एवं बलसे सम्पन्न थे। उन सबकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। वे सभी दानशील एवं जितेन्द्रिय थे॥

तेषु शासत्सु धरणीमृतवः स्वगुणैर्बभुः ।
सुखोदयाय वर्तन्ते ग्रहास्तारागणैः सह ॥
पाण्डव जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय सभी ऋतुएँ अपने गुणोंसे सुशोभित होती थीं। ताराओंसहित समस्त ग्रह सबके लिये सुखद हो गये थे॥

मही सस्यप्रबहुला सर्वरत्नगुणोदया ।
कामधुग्धेनुवद् भोगान् फलति स्म सहस्रधा ॥
पृथ्वीपर खेतीकी उपज बढ़ गयी थी। सभी रत्न और गुण प्रकट हो गये थे। कामधेनुके समान वह सहस्रों प्रकारके भोगरूप फल देती थी॥

मन्वादिभिः कृताः पूर्वं मर्यादा मानवेषु याः ।
अनतिक्रम्य ताः सर्वाः कुलेषु समयानि च ।
अन्वशासन्त राजानो धर्मपुत्रप्रियंकराः ॥
पूर्वकालमें मनु आदि राजर्षियोंने मनुष्योंमें जो मर्यादाएँ स्थापित की थीं, उन सबका तथा कुलोचित सदाचारोंका उल्लंघन न करते हुए भूमण्डलके सभी राजा अपने-अपने राज्यका शासन करते थे। इस प्रकार सभी भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिरका प्रिय करनेवाले थे॥

महाकुलानि धर्मिष्ठा वर्धयन्तो विशेषतः ।
मनुप्रणीतया कृत्या तेऽन्वशासन् वसुन्धराम् ॥

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धर्मिष्ठ राजा श्रेष्ठ कुलोंको विशेष प्रोत्साहन देते थे। वे मनुकी बनायी हुई राजनीतिके अनुसार इस वसुधाका शासन करते थे ।। राजवृत्तिर्हि सा शश्वद् धर्मिष्ठाभून्महीतले । प्रायो लोकमतिस्तात राजवृत्तानुगामिनी ।। तात! इस पृथ्वीपर राजाओंके बर्ताव सदा धर्मानुकूल होते थे। प्रायः लोगोंकी बुद्धि राजाके ही बर्तावका अनुसरण करनेवाली होती है ।। एवं भारतवर्षं स्वं राजा स्वर्गं सुरेन्द्रवत् । शशास विष्णुना सार्धं गुप्तो गाण्डीवधन्वना ।।) जैसे इन्द्र स्वर्गका शासन करते हैं, उसी प्रकार गाण्डीवधारी अर्जुनसे सुरक्षित राजा युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके सहयोगसे अपने राज्य—भारतवर्षका शासन करते थे ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४७ १/३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 1645)

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पञ्चदशोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना

जनमेजय उवाच

विजिते पाण्डवेयैस्तु प्रशान्ते च द्विजोत्तम ।
राष्ट्रे किं चक्रतुर्वीरौ वासुदेवधनंजयौ ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**द्विजश्रेष्ठ! जब पाण्डवोंने अपने राष्ट्रपर विजय पा ली और राज्यमें सब ओर शान्ति स्थापित हो गयी, उसके बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन इन दोनों वीरोंने क्या किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

विजिते पाण्डवै राजन् प्रशान्ते च विशाम्पते ।
राष्ट्रे बभूवतुर्हृष्टौ वासुदेवधनंजयौ ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**प्रजानाथ! नरेश्वर! जब पाण्डवोंने राष्ट्रपर विजय पा ली और सर्वत्र शान्ति स्थापित हो गयी, तब भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २ ॥

विजह्राते मुदा युक्तौ दिवि देवेश्वराविव ।
तौ वनेषु विचित्रेषु पर्वतेषु ससानुषु ॥ ३ ॥
स्वर्गलोकमें विहार करनेवाले दो देवेश्वरोंकी भाँति वे दोनों मित्र आनन्दमग्न हो विचित्र-विचित्र वनोंमें और पर्वतोंके सुरम्य शिखरोंपर विचरने लगे ॥ ३ ॥

तीर्थेषु चैव पुण्येषु पल्वलेषु नदीषु च ।
चङ्क्रम्यमाणौ संहृष्टावश्विनाविव नन्दने ॥ ४ ॥
पवित्र तीर्थों, छोटे तालाबों और नदियोंके तटोंपर विचरण करते हुए वे दोनों नन्दन-वनमें विहार करनेवाले अश्विनीकुमारोंके समान हर्षका अनुभव करते थे ॥ ४ ॥

इन्द्रप्रस्थे महात्मानौ रेमतुः कृष्णपाण्डवौ ।
प्रविश्य तां सभां रम्यां विजह्राते च भारत ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! फिर इन्द्रप्रस्थमें लौटकर महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन मयनिर्मित रमणीय सभामें प्रवेश करके आनन्दपूर्वक मनोविनोद करने लगे ॥ ५ ॥

तत्र युद्धकथाश्चित्राः परिक्लेशांश्च पार्थिव ।
कथायोगे कथायोगे कथयामासतुः सदा ॥ ६ ॥
ऋषीणां देवतानां च वंशांस्तावाहतुः सदा ।

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प्रीयमाणौ महात्मानौ पुराणावृषिसत्तमौ ।। ७ ।।
पृथ्वीनाथ! वे दोनों महात्मा पुरातन ऋषिवर नर और नारायण थे तथा आपसमें बहुत प्रेम रखते थे। बातचीतके प्रसंगमें वे दोनों मित्र सदा देवताओं तथा ऋषियोंके वंशोंकी चर्चा करते थे और युद्धकी विचित्र कथाओं एवं क्लेशोंका वर्णन किया करते थे ।। ६-७ ।।
मधुरास्तु कथाश्चित्राश्चित्रार्थपदनिश्चयाः ।
निश्चयज्ञः स पार्थाय कथयामास केशवः ।। ८ ।।
भगवान् श्रीकृष्ण सब प्रकारके सिद्धान्तोंको जाननेवाले थे। उन्होंने अर्जुनको विचित्र पद, अर्थ एवं सिद्धान्तोंसे युक्त बड़ी विलक्षण एवं मधुर कथाएँ सुनायीं ।।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं ज्ञातीनां च सहस्रशः ।
कथाभिः शमयामास पार्थं शौरिर्जनार्दनः ।। ९ ।।
कुन्तीकुमार अर्जुन पुत्रशोकसे संतप्त थे। सहस्रों भाई-बन्धुओंके मारे जानेका भी उनके मनमें बड़ा दुःख था। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने अनेक प्रकारकी कथाएँ सुनाकर उस समय पार्थको शान्त किया ।। ९ ।।
स तमाश्वास्य विधिवद् विज्ञानज्ञो महातपाः ।
अपहृत्यात्मनो भारं विशश्रामेव सात्वतः ।। १० ।।
महातपस्वी विज्ञानवेत्ता श्रीकृष्णने विधिपूर्वक अर्जुनको सान्त्वना देकर अपना भार उतार दिया और वे सुखपूर्वक विश्राम-सा करने लगे ।। १० ।।
ततः कथान्ते गोविन्दो गुडाकेशमुवाच ह ।
सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा हेतुयुक्तमिदं वचः ।। ११ ।।
बातचीतके अन्तमें गोविन्दने गुडाकेश अर्जुनको अपनी मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना प्रदान करते हुए उनसे यह युक्तियुक्त बात कही ।। ११ ।।
वासुदेव उवाच
विजितेयं धरा कृत्स्ना सव्यसाचिन् परंतप ।
त्वद्बाहुबलमाश्रित्य राज्ञा धर्मसुतेन ह ।। १२ ।।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुन! धर्मपुत्र युधिष्ठिरने तुम्हारे बाहुबलका सहारा लेकर इस समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर ली ।।
असपत्नां महीं भुङ्क्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनानुभावेन यमयोश्च नरोत्तम ।। १३ ।।
नरश्रेष्ठ! भीमसेन तथा नकुल-सहदेवके प्रभावसे धर्मराज युधिष्ठिर इस पृथ्वीका निष्कण्टक राज्य भोग रहे हैं ।। १३ ।।
धर्मेण राज्ञा धर्मज्ञ प्राप्तं राज्यमकण्टकम् ।
धर्मेण निहतः संख्ये स च राजा सुयोधनः ।। १४ ।।

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धर्मज्ञ! राजा युधिष्ठिरने यह निष्कण्टक राज्य धर्मके बलसे ही प्राप्त किया है। धर्मसे ही राजा दुर्योधन युद्धमें मारा गया है ॥ १४ ॥
अधर्मरुचयो लुब्धाः सदा चाप्रियवादिनः ।
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानः सानुबन्धा निपातिताः ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रके पुत्र अधर्ममें रुचि रखनेवाले, लोभी, कटुवादी और दुरात्मा थे। इसलिये अपने सगे-सम्बन्धियोंसहित मार गिराये गये ॥ १५ ॥
प्रशान्तामखिलां पार्थ पृथिवीं पृथिवीपतिः ।
भुङ्क्ते धर्मसुतो राजा त्वया गुप्तः कुरूद्वह ॥ १६ ॥
कुरुकुलतिलक कुन्तीकुमार! धर्मपुत्र पृथिवीपति राजा युधिष्ठिर आज तुमसे सुरक्षित होकर सर्वथा शान्त हुई समूची पृथिवीका राज्य भोगते हैं ॥ १६ ॥
रमे चाहं त्वया सार्धमरण्येष्वपि पाण्डव ।
किमु यत्र जनोऽयं वै पृथा चामित्रकर्षण ॥ १७ ॥
शत्रुसूदन पाण्डुकुमार! तुम्हारे साथ रहनेपर निर्जन वनमें भी मुझे सुख और आनन्द मिल सकता है। फिर जहाँ इतने लोग और मेरी बुआ कुन्ती हों, वहाँकी तो बात ही क्या है? ॥ १७ ॥
यत्र धर्मसुतो राजा यत्र भीमो महाबलः ।
यत्र माद्रवतीपुत्रौ रतिस्तत्र परा मम ॥ १८ ॥
जहाँ धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर हों, महाबली भीमसेन और माद्रीकुमार नकुल-सहदेव हों, वहाँ मुझे परम आनन्द प्राप्त हो सकता है ॥ १८ ॥
तथैव स्वर्गकल्पेषु सभोद्देशेषु कौरव ।
रमणीयेषु पुण्येषु सहितस्य त्वयानघ ॥ १९ ॥
कालो महांस्त्वतीतो मे शूरसूनुमपश्यतः ।
बलदेवं च कौरव्य तथान्यान् वृष्णिपुङ्गवान् ॥ २० ॥
सोऽहं गन्तुमभीप्सामि पुरीं द्वारावतीं प्रति ।
रोचतां गमनं मह्यं तवापि पुरुषर्षभ ॥ २१ ॥
निष्पाप कुरुनन्दन! इस सभाभवनके रमणीय एवं पवित्र स्थान स्वर्गके समान सुखद हैं। यहाँ तुम्हारे साथ रहते हुए बहुत दिन बीत गये। इतने दिनोंतक मैं अपने पिता शूरसेनकुमार वसुदेवजीका दर्शन न कर सका। भैया बलदेव तथा अन्यान्य वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंके भी दर्शनसे वंचित रहा। अतः अब मैं द्वारकापुरीको जाना चाहता हूँ। पुरुषप्रवर! तुम्हें भी मेरे इस यात्रासम्बन्धी प्रस्तावको सहर्ष स्वीकार करना चाहिये ॥ १९—२१ ॥
उक्तो बहुविधं राजा तत्र तत्र युधिष्ठिरः ।
सह भीष्मेण यद् युक्तमस्माभिः शोककारिते ॥ २२ ॥

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शोकावस्थामें मनुष्यका दुःख दूर करनेके लिये उसे जो कुछ उपदेश देना उचित है, वह भीष्मसहित हमलोगोंने विभिन्न स्थानोंमें राजा युधिष्ठिरको दिया है। उन्हें अनेक प्रकारसे समझाया है ॥ २२ ॥

शिष्यो युधिष्ठिरोऽस्माभिः शास्ता सन्नपि पाण्डवः ।
तेन तत् तु वचः सम्यग् गृहीतं सुमहात्मना ॥ २३ ॥
यद्यपि पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हमारे शासक और शिक्षक हैं तो भी हमलोगोंने शिक्षा दी है और उन श्रेष्ठ महात्माने हमारी उन सभी बातोंको भलीभाँति स्वीकार किया है ॥

धर्मपुत्रे हि धर्मज्ञे कृतज्ञे सत्यवादिनि ।
सत्यं धर्मो मतिश्चाग्रया स्थितिश्च सततं स्थिरा ॥ २४ ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर धर्मज्ञ, कृतज्ञ और सत्यवादी हैं। उनमें सत्य, धर्म, उत्तम बुद्धि तथा ऊँची स्थिति आदि गुण सदा स्थिरभावसे रहते हैं ॥ २४ ॥

तत्र गत्वा महात्मानं यदि ते रोचतेऽर्जुन ।
अस्मद्गमनसंयुक्तं वचो ब्रूहि जनाधिपम् ॥ २५ ॥
अर्जुन! यदि तुम उचित समझो तो महात्मा राजा युधिष्ठिरके पास चलकर उनके समक्ष मेरे द्वारका जानेका प्रस्ताव उपस्थित करो ॥ २५ ॥

न हि तस्याप्रियं कुर्यां प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते ।
कुतो गन्तुं महाबाहो पुरीं द्वारावतीं प्रति ॥ २६ ॥
महाबाहो! मेरे प्राणोंपर संकट आ जाय तब भी मैं धर्मराजका अप्रिय नहीं कर सकता; फिर द्वारका जानेके लिये उनका दिल दुखाऊँ, यह तो हो ही कैसे सकता है? ॥

सर्वं त्विदमहं पार्थ त्वत्प्रीतिहितकाम्यया ।
ब्रवीमि सत्यं कौरव्य न मिथ्यैतत् कथंचन ॥ २७ ॥
कुरुनन्दन! कुन्तीकुमार! मैं सच्ची बात बता रहा हूँ, मैंने जो कुछ किया या कहा है, वह सब तुम्हारी प्रसन्नताके लिये और तुम्हारे ही हितकी दृष्टिसे किया है। यह किसी तरह मिथ्या नहीं है ॥ २७ ॥

प्रयोजनं च निर्वृत्तमिह वासे ममार्जुन ।
धार्तराष्ट्रो हतो राजा सबलः सपदानुगः ॥ २८ ॥
अर्जुन! यहाँ मेरे रहनेका जो प्रयोजन था, वह पूरा हो गया है। धृतराष्ट्रका पुत्र राजा दुर्योधन अपनी सेना और सेवकोंके साथ मारा गया ॥ २८ ॥

पृथिवी च वशे तात धर्मपुत्रस्य धीमतः ।
स्थिता समुद्रवलया सशैलवनकानना ॥ २९ ॥
चिता रत्नैर्बहुविधैः कुरुराजस्य पाण्डव ।

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तात! पाण्डुनन्दन! नाना प्रकारके रत्नोंके संचयसे सम्पन्न, समुद्रसे घिरी हुई, पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी भी बुद्धिमान् धर्मपुत्र कुरुराज युधिष्ठिरके अधीन हो गयी॥ २९१/२॥

धर्मेण राजा धर्मज्ञः पातु सर्वां वसुन्धराम्॥ ३०॥
उपास्यमानो बहुभिः सिद्धैश्चापि महात्मभिः।
स्तूयमानश्च सततं वन्दिभिर्भरतर्षभ॥ ३१॥
भरतश्रेष्ठ! बहुत-से सिद्ध महात्माओंके संगसे सुशोभित तथा वन्दीजनोंके द्वारा सदा ही प्रशंसित होते हुए धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर अब धर्मपूर्वक सारी पृथ्वीका पालन करें॥ ३०-३१॥

तं मया सह गत्वाद्य राजानं कुरु वर्धनम्।
आपृच्छ कुरुशार्दूल गमनं द्वारकां प्रति॥ ३२॥
कुरुश्रेष्ठ! अब तुम मेरे साथ चलकर राजाको बधाई दो और मेरे द्वारका जानेके विषयमें उनसे पूछकर आज्ञा दिला दो॥ ३२॥

इदं शरीरं वसु यच्च मे गृहे
निवेदितं पार्थ सदा युधिष्ठिरे।
प्रियश्च मान्यश्च हि मे युधिष्ठिरः
सदा कुरूणामधिपो महामतिः॥ ३३॥
पार्थ! मेरे घरमें जो कुछ धन-सम्पत्ति है, वह और मेरा यह शरीर सदा धर्मराज युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित है। परम बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिर सर्वदा मेरे प्रिय और माननीय हैं॥ ३३॥

प्रयोजनं चापि निवासकारणे
न विद्यते मे त्वदृते नृपात्मज।
स्थिता हि पृथ्वी तव पार्थ शासने
गुरोः सुवृत्तस्य युधिष्ठिरस्य च॥ ३४॥
राजकुमार! अब तुम्हारे साथ मन बहलानेके सिवा यहाँ मेरे रहनेका और कोई प्रयोजन नहीं रह गया है। पार्थ! यह सारी पृथ्वी तुम्हारे और सदाचारी गुरु युधिष्ठिरके शासनमें पूर्णतः स्थित है॥ ३४॥

इतीदमुक्तः स तदा महात्मना
जनार्दनेनामितविक्रमोऽर्जुनः।
तथेति दुःखादिव वाक्यमैरय-
ज्जनार्दनं सम्प्रतिपूज्य पार्थिव॥ ३५॥
पृथ्वीनाथ! उस समय महात्मा भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अमित पराक्रमी अर्जुनने उनकी बातका आदर करते हुए बड़े दुःखके साथ ‘तथास्तु’ कहकर उनके जानेका

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प्रस्ताव स्वीकार किया ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

(अनुगीतापर्व)

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(अनुगीतापर्व)

षोडशोऽध्यायः

अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना

जनमेजय उवाच

सभायां वसतोस्तत्र निहत्यारीन् महात्मनोः ।
केशवार्जुनयोः का नु कथा समभवद् द्विज ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! शत्रुओंका नाश करके जब महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन सभाभवनमें रहने लगे, उन दिनों उन दोनोंमें क्या-क्या बातचीत हुई? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

कृष्णेन सहितः पार्थः स्वं राज्यं प्राप्य केवलम् ।
तस्यां सभायां दिव्यायां विजहार मुदा युतः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! श्रीकृष्णके सहित अर्जुनने जब केवल अपने राज्यपर पूरा अधिकार प्राप्त कर लिया, तब वे उस दिव्य सभाभवनमें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ २ ॥

तत्र कंचित् सभोद्देशं स्वर्गोद्देशसमं नृप ।
यदृच्छया तौ मुदितौ जग्मतुः स्वजनावृतौ ॥ ३ ॥
नरेश्वर! एक दिन वहाँ स्वजनोंसे घिरे हुए वे दोनों मित्र स्वेच्छासे घूमते-घामते सभामण्डपके एक ऐसे भागमें पहुँचे, जो स्वर्गके समान सुन्दर था ॥ ३ ॥

ततः प्रतीतः कृष्णेन सहितः पाण्डवोऽर्जुनः ।
निरीक्ष्य तां सभां रम्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णके साथ रहकर बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने एक बार उस रमणीय सभाकी ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ४ ॥

विदितं मे महाबाहो संग्रामे समुपस्थिते ।
माहात्म्यं देवकीमातस्तच्च ते रूपमैश्वरम् ॥ ५ ॥

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‘महाबाहो! देवकीनन्दन! जब संग्रामका समय उपस्थित था, उस समय मुझे आपके माहात्म्यका ज्ञान और ईश्वरीय स्वरूपका दर्शन हुआ था ॥ ५ ॥

यत् तद् भगवता प्रोक्तं पुरा केशव सौहृदात् ।
तत् सर्वं पुरुषव्याघ्र नष्टं मे भ्रष्टचेतसः ॥ ६ ॥
‘किंतु केशव! आपने सौहार्दवश पहले मुझे जो ज्ञानका उपदेश दिया था, मेरा वह सब ज्ञान इस समय विचलित-चित्त हो जानेके कारण नष्ट हो गया (भूल गया) है ॥ ६ ॥

मम कौतूहलं त्वस्ति तेष्वर्थेषु पुनः पुनः ।
भवांस्तु द्वारकां गन्ता नचिरादिव माधव ॥ ७ ॥
‘माधव! उन विषयोंको सुननेके लिये मेरे मनमें बारंबार उत्कण्ठा होती है। इधर आप जल्दी ही द्वारका जानेवाले हैं; अतः पुनः वह सब विषय मुझे सुना दीजिये’ ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु तं कृष्णः फाल्गुनं प्रत्यभाषत ।
परिष्वज्य महातेजा वचनं वदतां वरः ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! अर्जुनके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें गलेसे लगाकर इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ८ ॥

वासुदेव उवाच

श्रावितस्त्वं मया गुह्यं ज्ञापितश्च सनातनम् ।
धर्मं स्वरूपिणं पार्थ सर्वलोकांश्च शाश्वतान् ॥ ९ ॥
अबुद्ध्या नाग्रहीर्यस्त्वं तन्मे सुमहदप्रियम् ।
न च साद्य पुनर्भूयः स्मृतिर्मे सम्भविष्यति ॥ १० ॥
श्रीकृष्ण बोले— अर्जुन! उस समय मैंने तुम्हें अत्यन्त गोपनीय ज्ञानका श्रवण कराया था, अपने स्वरूपभूत धर्म-सनातन पुरुषोत्तमतत्त्वका परिचय दिया था और (शुक्ल-कृष्ण गतिका निरूपण करते हुए) सम्पूर्ण नित्य लोकोंका भी वर्णन किया था; किंतु तुमने जो अपनी नासमझीके कारण उस उपदेशको याद नहीं रखा, यह मुझे बहुत अप्रिय है। उन बातोंका अब पूरा-पूरा स्मरण होना सम्भव नहीं जान पड़ता ॥ ९-१० ॥

नूनमश्रद्दधानोऽसि दुर्मेधा ह्यसि पाण्डव ।
न च शक्यं पुनर्वक्तुमशेषेण धनंजय ॥ ११ ॥
पाण्डुनन्दन! निश्चय ही तुम बड़े श्रद्धाहीन हो, तुम्हारी बुद्धि बहुत मन्द जान पड़ती है। धनंजय! अब मैं उस उपदेशको ज्यों-का-त्यों नहीं कह सकता ॥ ११ ॥

स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने ।
न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः ॥ १२ ॥

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क्योंकि वह धर्म ब्रह्मपदकी प्राप्ति करानेके लिये पर्याप्त था, वह सारा-का-सारा धर्म उसी रूपमें फिर दोहरा देना अब मेरे वशकी बात भी नहीं है ।। १२ ।।
परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया ।
इतिहासंत तु वक्ष्यामि तस्मिन्नर्थे पुरातनम् ।। १३ ।।
उस समय योगयुक्त होकर मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था। अब उस विषयका ज्ञान करानेके लिये मैं एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ ।। १३ ।।
यथा तां बुद्धिमास्थाय गतिमग्रयां गमिष्यसि ।
शृणु धर्मभृतां श्रेष्ठ गदितं सर्वमेव मे ।। १४ ।।
जिससे तुम उस समत्वबुद्धिका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त कर लोगे। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब तुम मेरी सारी बातें ध्यान देकर सुनो ।। १४ ।।
आगच्छद् ब्राह्मणः कश्चित् स्वर्गलोकादरिंदम ।
ब्रह्मलोकाच्च दुर्धर्षः सोऽस्माभिः पूजितोऽभवत् ।। १५ ।।
अस्माभिः परिपृष्टश्च यदाह भरतर्षभ ।
दिव्येन विधिना पार्थ तच्छृणुष्वाविचारयन् ।। १६ ।।
शत्रुदमन! एक दिनकी बात है, एक दुर्धर्ष ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे उतरकर स्वर्गलोकमें होते हुए मेरे यहाँ आये। मैंने उनकी विधिवत् पूजा की और मोक्षधर्मके विषयमें प्रश्न किया। भरतश्रेष्ठ! मेरे प्रश्नका उन्होंने सुन्दर विधिसे उत्तर दिया। पार्थ! वही मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। कोई अन्यथा विचार न करके इसे ध्यान देकर सुनो ।। १५-१६ ।।

ब्राह्मण उवाच
मोक्षधर्मं समाश्रित्य कृष्ण यन्मामपृच्छथाः ।
भूतानामनुकम्पार्थं यन्मोहच्छेदनं विभो ।। १७ ।।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावन्मधुसूदन ।
शृणुष्वावहितो भूत्वा गदतो मम माधव ।। १८ ।।
ब्राह्मणने कहा— श्रीकृष्ण! मधुसूदन! तुमने सब प्राणियोंपर कृपा करके उनके मोहका नाश करनेके लिये जो यह मोक्ष-धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाला प्रश्न किया है, उसका मैं यथावत् उत्तर दे रहा हूँ। प्रभो! माधव! सावधान होकर मेरी बात श्रवण करो ।। १७-१८ ।।
कश्चिद् विप्रस्तपोयुक्तः काश्यपो धर्मवित्तमः ।
आससाद द्विजं कंचिद् धर्माणाममागतागमम् ।। १९ ।।
गतागते सुबहुशो ज्ञानविज्ञानपारगम् ।
लोकतत्त्वार्थकुशलं ज्ञातार्थं सुखदुःखयोः ।। २० ।।
जातीमरणतत्त्वज्ञं कोविदं पापपुण्ययोः ।
द्रष्टारमुच्चनीचानां कर्मभिर्देहिनां गतिम् ।। २१ ।।