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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages
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धृतराष्ट्रमामन्त्र्य काले वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥ धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर गंगानन्दन भीष्मने धृतराष्ट्रको पुकारकर उनसे यह समयोचित वचन कहा— ॥ २९ ॥

भीष्म उवाच

राजन् विदितधर्मोऽसि सुनिर्णीतार्थसंशयः । बहुश्रुता हि ते विप्रा बहवः पर्युपासिताः ॥ ३० ॥ **भीष्मजी बोले—**राजन्! तुम धर्मको अच्छी तरह जानते हो। तुमने अर्थतत्त्वका भी भलीभाँति निर्णय कर लिया है। अब तुम्हारे मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है; क्योंकि तुमने अनेक शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले बहुत-से विद्वान् ब्राह्मणोंकी सेवा की है—उनके सत्संगसे लाभ उठाया है ॥ ३० ॥

वेदशास्त्राणि सर्वाणि धर्मांश्च मनुजेश्वर । वेदांश्च चतुरः सर्वान् निखिलेनानुबुद्ध्यसे ॥ ३१ ॥ मनुजेश्वर! तुम चारों वेदों, सम्पूर्ण शास्त्रों और धर्मोंका रहस्य पूर्णरूपसे जानते और समझते हो ॥ ३१ ॥

न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत् तथा । श्रुतं देवरहस्यं ते कृष्णद्वैपायनादपि ॥ ३२ ॥ कुरुनन्दन! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जो कुछ हुआ है, वह अवश्यम्भावी था। तुमने श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजीसे देवताओंका रहस्य भी सुन लिया है (उसीके अनुसार महाभारतयुद्धकी सारी घटनाएँ हुई हैं) ॥ ३२ ॥

यथा पाण्डोः सुता राजंस्तथैव तव धर्मतः । तान् पालय स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान् ॥ ३३ ॥ ये पाण्डव जैसे राजा पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे भी हैं। ये सदा गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते हैं। तुम धर्ममें स्थित रहकर अपने पुत्रोंके समान ही इनका पालन करना ॥ ३३ ॥

धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव । आनृशंस्यपरं ह्येनं जानामि गुरुवत्सलम् ॥ ३४ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरका हृदय बहुत ही शुद्ध है। ये सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहेंगे। मैं जानता हूँ, इनका स्वभाव बहुत ही कोमल है और ये गुरुजनोंके प्रति बड़ी भक्ति रखते हैं ॥ ३४ ॥

तव पुत्रा दुरात्मानः क्रोधलोभपरायणाः । ईर्ष्याभिभूता दुर्वृत्तास्तान् न शोचितुमर्हसि ॥ ३५ ॥

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तुम्हारे पुत्र बड़े दुरात्मा, क्रोधी, लोभी, ईर्ष्याके वशीभूत तथा दुराचारी थे। अतः उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतावदुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ।
वासुदेवं महाबाहुमभ्यभाषत कौरवः ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मनीषी धृतराष्ट्रसे ऐसा वचन कहकर कुरुवंशी भीष्मने महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा ॥ ३६ ॥

भीष्म उवाच

भगवन् देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत ।
त्रिविक्रम नमस्तुभ्यं शङ्खचक्रगदाधर ॥ ३७ ॥
भीष्मजी बोले—भगवन्! देवदेवेश्वर! देवता और असुर सभी आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले तथा शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायणदेव! आपको नमस्कार है ॥ ३७ ॥

वासुदेवो हिरण्यात्मा पुरुषः सविता विराट् ।
जीवभूतोऽनुरूपस्त्वं परमात्मा सनातनः ॥ ३८ ॥
आप वासुदेव, हिरण्यात्मा, पुरुष, सविता, विराट्, अनुरूप, जीवात्मा और सनातन परमात्मा हैं ॥ ३८ ॥

त्रायस्व पुण्डरीकाक्ष पुरुषोत्तम नित्यशः ।
अनुजानीहि मां कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥ ३९ ॥
कमलनयन श्रीकृष्ण! पुरुषोत्तम! वैकुण्ठ! आप सदा मेरा उद्धार करें। अब मुझे जानेकी आज्ञा दें ॥ ३९ ॥

रक्ष्याश्च ते पाण्डवेया भवान् येषां परायणम् ।
उक्तवानस्मि दुर्बुद्धिं मन्दं दुर्योधनं तदा ॥ ४० ॥
‘यतः कृष्णस्ततो धर्मो’ यतो धर्मस्ततो जयः ।
वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवैः ॥ ४१ ॥
संधानस्य परः कालस्तवेति च पुनः पुनः ।
न च मे तद् वचो मूढः कृतवान् स सुमन्दधीः ।
घातयित्वेह पृथिवीं ततः स निधनं गतः ॥ ४२ ॥
प्रभो! आप ही जिनके परम आश्रय हैं, उन पाण्डवोंकी सदा आपको रक्षा करनी चाहिये। मैंने दुर्बुद्धि एवं मन्द दुर्योधनसे कहा था कि ‘जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, उसी पक्षकी जय होगी; इसलिये बेटा दुर्योधन! तुम भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे पाण्डवोंके साथ सन्धि कर लो। यह सन्धिके लिये बहुत उत्तम अवसर आया

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है।' इस प्रकार बार-बार कहनेपर भी उस मन्दबुद्धि मूढ़ने मेरी वह बात नहीं मानी और सारी पृथ्वीके वीरोंका नाश कराकर अन्तमें वह स्वयं भी कालके गालमें चला गया ॥ ४०—४२ ॥

त्वां तु जानाम्यहं देवं पुराणमृषिसत्तमम् । नरेण सहितं देव बदर्यां सुचिरोषितम् ॥ ४३ ॥ देव! मैं आपको जानता हूँ। आप वे ही पुरातन ऋषि नारायण हैं, जो नरके साथ चिरकालतक बदरिकाश्रममें निवास करते रहे हैं ॥ ४३ ॥

तथा मे नारदः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः । नरनारायणावेतौ सम्भूतौ मनुजेष्विति ॥ ४४ ॥ देवर्षि नारद तथा महातपस्वी व्यासजीने भी मुझसे कहा था कि ये श्रीकृष्ण और अर्जुन साक्षात् भगवान् नारायण और नर हैं, जो मानव-शरीरमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४४ ॥

स मां त्वमनुजानीहि कृष्ण मोक्ष्ये कलेवरम् । त्वयाहं समनुज्ञातो गच्छेयं परमां गतिम् ॥ ४५ ॥ श्रीकृष्ण! अब आप आज्ञा दीजिये, मैं इस शरीरका परित्याग करूँगा। आपकी आज्ञा मिलनेपर मुझे परम गतिकी प्राप्ति होगी ॥ ४५ ॥

वासुदेव उवाच

अनुजानामि भीष्म त्वां वसून् प्राप्नुहि पार्थिव । न तेऽस्ति वृजिनं किंचिदिहलोके महाद्युते ॥ ४६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पृथ्वीपालक महातेजस्वी भीष्मजी! मैं आपको (सहर्ष) आज्ञा देता हूँ। आप वसुलोकको जाइये। इस लोकमें आपके द्वारा अणुमात्र भी पाप नहीं हुआ है ॥ ४६ ॥

पितृभक्तोऽसि राजर्षे मार्कण्डेय इवापरः । तेन मृत्युस्तव वशे स्थितो भृत्य इवानतः ॥ ४७ ॥ राजर्षे! आप दूसरे मार्कण्डेयके समान पितृभक्त हैं; इसलिये मृत्यु विनीत दासीके समान आपके वशमें हो गयी है ॥ ४७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः पाण्डवानिदमब्रवीत् । धृतराष्ट्रमुखांश्चापि सर्वांश्च सुहृदस्तथा ॥ ४८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान्‌के ऐसा कहनेपर गंगानन्दन भीष्मने पाण्डवों तथा धृतराष्ट्र आदि सभी सुहृदोंसे कहा— ॥ ४८ ॥

प्राणानुत्स्रष्टुमिच्छामि तत्रानुज्ञातुमर्हथ । सत्येषु यतितव्यं वः सत्यं हि परमं बलम् ॥ ४९ ॥

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‘अब मैं प्राणोंका परित्याग करना चाहता हूँ। तुम सब लोग इसके लिये मुझे आज्ञा दो। तुम्हें सदा सत्य धर्मके पालनका प्रयत्न करते रहना चाहिये; क्योंकि सत्य ही सबसे बड़ा बल है ।। ४९ ।। आनृशंस्यपरैर्भाव्यं सदैव नियतात्मभिः ।
ब्रह्मण्यैर्धर्मशीलैश्च तपोनित्यैश्च भारताः ।। ५० ।।
‘भरतवंशियो! तुमलोगोंको सबके साथ कोमलताका बर्ताव करना, सदा अपने मन और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखना तथा ब्राह्मणभक्त, धर्मनिष्ठ एवं तपस्वी होना चाहिये’ ।। ५० ।।
इत्युक्त्वा सुहृदः सर्वान् सम्परिष्वज्य चैव ह ।
पुनरेवाब्रवीद् धीमान् युधिष्ठिरमिदं वचः ।। ५१ ।।
ब्राह्मणाश्चैव ते नित्यं प्राज्ञाश्चैव विशेषतः ।
आचार्या ऋत्विजश्चैव पूजनीया जनाधिप ।। ५२ ।।
ऐसा कहकर बुद्धिमान् भीष्मजीने अपने सब सुहृदोंको गले लगाया और युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार कहा—‘युधिष्ठिर! तुम्हें सामान्यतः सभी ब्राह्मणोंकी विशेषतः विद्वानोंकी और आचार्य तथा ऋत्विजोंकी सदा ही पूजा करनी चाहिये’ ।। ५१-५२ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे
सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत भीष्मस्वर्गारोहणपर्वमें दानधर्मविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६७ ।।

१६८-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा कुरून् सर्वान् भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
तूष्णीं बभूव कौरव्यः स मुहूर्तमरिंदम ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुदमन जनमेजय! समस्त कौरवोंसे ऐसा कहकर कुरुश्रेष्ठ शान्तनुनन्दन भीष्मजी दो घड़ीतक चुपचाप पड़े रहे ॥ १ ॥

धारयामास चात्मानं धारणासु यथाक्रमम् ।
तस्योर्ध्वमगमन् प्राणाः संनिरुद्धा महात्मनः ॥ २ ॥
तदनन्तर वे मनसहित प्राणवायुको क्रमशः भिन्न-भिन्न धारणाओंमें स्थापित करने लगे। इस तरह यौगिक क्रियाद्वारा रोके हुए महात्मा भीष्मजीके प्राण क्रमशः ऊपर चढ़ने लगे ॥ २ ॥

इदमाश्चर्यमासीच्च मध्ये तेषां महात्मनाम् ।
सहितैर्ऋषिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिः प्रभो ॥ ३ ॥
यद्यन्मुञ्चति गात्रं हि स शान्तनुसुतस्तदा ।
तत् तद् विशल्यं भवति योगयुक्तस्य तस्य वै ॥ ४ ॥
प्रभो! उस समय वहाँ एकत्र हुए सभी संत-महात्माओंके बीच एक बड़े आश्चर्यकी घटना घटी। व्यास आदि सब महर्षियोंने देखा कि योगयुक्त हुए शान्तनुनन्दन भीष्मके प्राण उनके जिस-जिस अंगको त्यागकर ऊपर उठते थे, उस-उस अंगके बाण अपने-आप निकल जाते और उनका घाव भर जाता था ॥ ३-४ ॥

क्षणेन प्रेक्षतां तेषां विशल्यः सोऽभवत् तदा ।
तद् दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे वासुदेवपुरोगमाः ॥ ५ ॥
सह तैर्मुनिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिर्नृप ।
नरेश्वर! इस प्रकार सबके देखते-देखते भीष्मजीका शरीर क्षणभरमें बाणोंसे रहित हो गया। यह देखकर व्यास आदि समस्त मुनियोंसहित भगवान् श्रीकृष्ण आदिको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५ ½ ॥

संनिरुद्धस्तु तेनात्मा सर्वेष्वायतनेषु च ॥ ६ ॥

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जगाम भित्त्वा मूर्धानं दिवमभ्युत्पपात ह ।
भीष्मजीने अपने देहके सभी द्वारोंको बंद करके प्राणोंको सब ओरसे रोक लिया था; इसलिये वह उनका मस्तक (ब्रह्मरन्ध्र) फोड़कर आकाशमें चला गया ॥ ६ १/२ ॥
देवदुन्दुभिनादश्च पुष्पवर्षैः सहाभवत् ॥ ७ ॥
सिद्धा ब्रह्मर्षयश्चैव साधु साध्विति हर्षिताः ।
उस समय देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और साथ ही दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। सिद्धों तथा ब्रह्मर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ। वे भीष्मजीको साधुवाद देने लगे ॥ ७ १/२ ॥
महोल्केव च भीष्मस्य मूर्धदेशाज्जनाधिप ॥ ८ ॥
निःसृत्याकाशमाविश्य क्षणेनान्तरधीयत ।
जनेश्वर! भीष्मजीका प्राण उनके ब्रह्मरन्ध्रसे निकलकर बड़ी भारी उल्काकी भाँति आकाशमें उड़ा और क्षणभरमें अन्तर्धान हो गया ॥ ८ १/२ ॥
एवं स राजशार्दूल नृपः शान्तनवस्तदा ॥ ९ ॥
समयुज्यत कालेन भरतानां कुलोद्वहः ।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भरतवंशका भार वहन करनेवाले शान्तनुनन्दन राजा भीष्म कालके अधीन हुए ॥ ९ १/२ ॥
ततस्त्वादाय दारूणि गन्धांश्च विविधान् बहून् ॥ १० ॥
चितां चक्रमहात्मानः पाण्डवा विदुरस्तथा ।
युयुत्सुश्चापि कौरव्य प्रेक्षकास्त्वितरेऽभवन् ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! तदनन्तर बहुत-से काष्ठ और नाना प्रकारके सुगन्धित द्रव्य लेकर महात्मा पाण्डव, विदुर और युयुत्सुने चिता तैयार की और शेष सब लोग अलग खड़े होकर देखते रहे ॥ १०-११ ॥
युधिष्ठिरश्च गाङ्गेयं विदुरश्च महामतिः ।
छादयामासतुरुभौ क्षौमैर्माल्यैश्च कौरवम् ॥ १२ ॥
राजा युधिष्ठिर और परम बुद्धिमान् विदुर इन दोनोंने रेशमी वस्त्रों और मालाओंसे कुरुनन्दन गंगापुत्र भीष्मको आच्छादित किया और चितापर सुलाया ॥ १२ ॥
धारयामास तस्याथ युयुत्सुश्छत्रमुत्तमम् ।
चामरव्यजने शुभ्रे भीमसेनार्जुनावुभौ ॥ १३ ॥
उस समय युयुत्सुने उनके ऊपर उत्तम छत्र लगाया और भीमसेन तथा अर्जुन श्वेत चँवर एवं व्यजन डुलाने लगे ॥ १३ ॥
उष्णीषे परिगृह्णीतां माद्रीपुत्रावुभौ तथा ।
स्त्रियः कौरवनाथस्य भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् ॥ १४ ॥
तालवृन्तान्युपादाय पर्यवीजन्त सर्वशः ।

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माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने पगड़ी हाथमें लेकर भीष्मजीके मस्तकपर रखी। कौरवराजके रनिवासकी स्त्रियाँ ताड़के पंखे हाथमें लेकर कुरुकुलधुरन्धर भीष्मजीके शवको सब ओरसे हवा करने लगीं ॥ १४ १/२ ॥

ततोऽस्य विधिवच्चक्रुः पितृमेधं महात्मनः ॥ १५ ॥
यजनं बहुशश्चाग्नौ जगुः सामानि सामगाः ।
ततश्चन्दनकाष्ठैश्च तथा कालीयकैरपि ॥ १६ ॥
कालागुरुप्रभृतिभिर्गन्धैश्चोच्चावचैस्तथा ।
समवच्छाद्य गाङ्गेयं सम्प्रज्वाल्य हुताशनम् ॥ १७ ॥
अपसव्यमकुर्वन्त धृतराष्ट्रमुखाश्चिताम् ।

तदनन्तर पाण्डवोंने विधिपूर्वक महात्मा भीष्मका पितृमेध कर्म सम्पन्न किया। अग्निमें बहुत-सी आहुतियाँ दी गयीं। साम-गान करनेवाले ब्राह्मण साममन्त्रोंका गान करने लगे तथा धृतराष्ट्र आदिने चन्दनकी लकड़ी, कालीचन्दन और सुगन्धित वस्तुओंसे भीष्मके शरीरको आच्छादित करके उनकी चितामें आग लगा दी। फिर धृतराष्ट्र आदि सब कौरवोंने इस जलती हुई चिताकी प्रदक्षिणा की ॥ १५—१७ १/२ ॥

संस्कृत्य च कुरुश्रेष्ठं गाङ्गेयं कुरुसत्तमाः ॥ १८ ॥
जग्मुर्भागीरथीं पुण्यामृषिजुष्टां कुरूद्वहाः ।
अनुगम्यमाना व्यासेन नारदेनासितेन च ॥ १९ ॥
कृष्णेन भरतस्त्रीभिर्ये च पौराः समागताः ।
उदकं चक्रिरे चैव गाङ्गेयस्य महात्मनः ॥ २० ॥
विधिवत् क्षत्रियश्रेष्ठाः स च सर्वो जनस्तदा ।

इस प्रकार कुरुश्रेष्ठ भीष्मजीका दाह-संस्कार करके समस्त कौरव अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर ऋषि-मुनियोंसे सेवित परम पवित्र भागीरथीके तटपर गये। उनके साथ महर्षि व्यास, देवर्षि नारद, असित, भगवान् श्रीकृष्ण तथा नगरनिवासी मनुष्य भी पधारे थे। वहाँ पहुँचकर उन क्षत्रियशिरोमणियों और अन्य सब लोगोंने विधिपूर्वक महात्मा भीष्मको जलांजलि दी ॥ १८—२० १/२ ॥

ततो भागीरथी देवी तनयस्योदके कृते ॥ २१ ॥
उत्थाय सलिलात् तस्माद् रुदती शोकविह्वला ।
परिदेवयती तत्र कौरवानभ्यभाषत ॥ २२ ॥
निबोधत यथावृत्तमुच्यमानं मयानघाः ।
राजवृत्तेन सम्पन्नः प्रज्ञयाभिजनेन च ॥ २३ ॥

उस समय कौरवोंद्वारा अपने पुत्र भीष्मको जलांजलि देनेका कार्य पूरा हो जानेपर भगवती भागीरथी जलके ऊपर प्रकट हुई और शोकसे विह्वल हो रोदन एवं विलाप करती हुई कौरवोंसे कहने लगी—'निष्पाप पुत्रगण! मैं जो कहती हूँ, उस बातको यथार्थरूपसे

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सुनो। भीष्म राजोचित सदाचारसे सम्पन्न थे। वे उत्तम बुद्धि और श्रेष्ठ कुलसे सम्पन्न थे॥ २१—२३॥ सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो महाव्रतः। जामदग्न्येन रामेण यः पुरा न पराजितः॥ २४॥ दिव्यैरस्त्रैर्महावीर्यः स हतोऽद्य शिखण्डिना। ‘महान् व्रतधारी भीष्म कुरुकुलवृद्ध पुरुषोंके सत्कार करनेवाले और अपने पिताके बड़े भक्त थे। हाय! पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुराम भी अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा जिस मेरे महापराक्रमी पुत्रको पराजित न कर सके, वह इस समय शिखण्डीके हाथसे मारा गया। यह कितने कष्टकी बात है॥ २४ १/२॥ अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम पार्थिवाः॥ २५॥ अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं यन्न दीर्यति मेऽद्य वै। ‘राजाओ! अवश्य ही मेरा हृदय पत्थर और लोहेका बना हुआ है, तभी तो अपने प्रिय पुत्रको जीवित न देखकर भी आज यह फट नहीं जाता है॥ २५ १/२॥ समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां स्वयंवरे॥ २६॥ विजित्यैकरथेनैव कन्याश्चायं जहार ह। ‘काशीपुरीके स्वयंवरमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रिय एकत्र हुए थे, किंतु भीष्मने एकमात्र रथकी ही सहायतासे उन सबको जीतकर काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण किया था॥ २६ १/२॥ यस्य नास्ति बले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन॥ २७॥ हतं शिखण्डिना श्रुत्वा न विदीर्येत यन्मनः। ‘हाय! इस पृथ्वीपर बलमें जिसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, उसीको शिखण्डीके हाथसे मारा गया सुनकर आज मेरी छाती क्यों नहीं फट जाती॥ २७ १/२॥ जामदग्न्यः कुरुक्षेत्रे युधि येन महात्मना॥ २८॥ पीडितो नातियत्नेन स हतोऽद्य शिखण्डिना। ‘जिस महामना वीरने जमदग्निनन्दन परशुरामको कुरुक्षेत्रके युद्धमें अनायास ही पीड़ित कर दिया था, वही शिखण्डीके हाथसे मारा गया, यह कितने दुःखकी बात है’॥ २८ १/२॥ एवंविधं बहु तदा विलपन्तीं महानदीम्॥ २९॥ आश्वासयामास तदा गङ्गां दामोदरो विभुः।

अध्याय (पृष्ठ 1564)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

श्रीकृष्ण और व्यासजीके द्वारा पुत्र-शोकाकुला गङ्गाजीको सान्त्वना

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ऐसी बातें कहकर जब महानदी गंगाजी बहुत विलाप करने लगीं, तब भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा— ।। २९ १/२ ।। समाश्र्वसिहि भद्रे त्वं मा शुचः शुभदर्शने ।। ३० ।। गतः स परमं लोकं तव पुत्रो न संशयः । ‘भद्रे! धैर्य धारण करो। शुभदर्शने! शोक न करो। तुम्हारे पुत्र भीष्म अत्यन्त उत्तम लोकमें गये हैं, इसमें संशय नहीं है ।। ३० १/२ ।। वसुरेष महातेजाः शापदोषेण शोभने ।। ३१ ।। मानुषत्वमनुप्राप्तो नैनं शोचितुमर्हसि । ‘शोभने! ये महातेजस्वी वसु थे, वसिष्ठजीके शाप-दोषसे इन्हें मनुष्य-योनिमें आना पड़ा था। अतः इनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।। ३१ १/२ ।। स एष क्षत्रधर्मेण अयुध्यत रणाजिरे ।। ३२ ।। धनंजयेन निहतो नैष देवि शिखण्डिना । ‘देवि! इन्होंने समरांगणमें क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध किया था। ये अर्जुनके हाथसे मारे गये हैं, शिखण्डीके हाथसे नहीं ।। ३२ १/२ ।। भीष्मं हि कुरुशार्दूलमुद्यतेषुं महारणे ।। ३३ ।। न शक्तः संयुगे हन्तुं साक्षादपि शतक्रतुः । स्वच्छन्दतस्तव सुतो गतः स्वर्गं शुभानने ।। ३४ ।। ‘शुभानने! तुम्हारे पुत्र कुरुश्रेष्ठ भीष्म जब हाथमें धनुष-बाण लिये रहते, उस समय साक्षात् इन्द्र भी उन्हें युद्धमें मार नहीं सकते थे। ये तो अपनी इच्छासे ही शरीर त्यागकर स्वर्गलोकमें गये हैं ।। ३३-३४ ।। न शक्ता विनिहन्तुं हि रणे तं सर्वदेवताः । तस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे शोचस्व कुरुनन्दनम् । वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव ।। ३५ ।। ‘सरिताओंमें श्रेष्ठ देवि! सम्पूर्ण देवता मिलकर भी युद्धमें उन्हें मारनेकी शक्ति नहीं रखते थे। इसलिये तुम कुरुनन्दन भीष्मजीके लिये शोक मत करो। ये तुम्हारे पुत्र भीष्म वसुओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं। अतः इनके लिये चिन्तारहित हो जाओ’ ।। ३५ ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्ता सा तु कृष्णेन व्यासेन तु सरिद्वरा । त्यक्त्वा शोकं महाराज स्वं वार्यवततार ह ।। ३६ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! जब भगवान् श्रीकृष्ण और व्यासजीने इस प्रकार समझाया, तब नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाजी शोक त्यागकर अपने जलमें उतर गयीं ।। ३६ ।। सत्कृत्य ते तां सरितं ततः कृष्णमुखा नृप ।

॥ अनुशासनपर्व सम्पूर्णम् ॥

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अनुज्ञातास्तया सर्वे न्यवर्तन्त जनाधिपाः ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! श्रीकृष्ण आदि सब नरेश गंगाजीका सत्कार करके उनकी आज्ञा ले वहाँसे लौट आये ॥ ३७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामनुशासनपर्वणि
भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे
भीष्ममुक्तिर्नामाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥

इस प्रकार व्यासनिर्र्मत श्रीमद्महाभारत शतसाहस्री संहितामें अनुशासनपर्वके अन्तर्गत भीष्मस्वर्गारोहणपर्वमें दानधर्म तथा भीष्म-युधिष्ठिरसंवादके प्रसंगमें भीष्मजीकी मुक्ति नामक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६८ ॥


॥ अनुशासनपर्व सम्पूर्णम् ॥


अनुष्टुप्(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपरकुल योग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये७३५८॥(३५०॥)४८१॥॥=७८४०।=
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये१९५४(१२)१६॥१९७०॥
अनुशासनपर्वकी कुल श्लोकसंख्या—९८१०॥॥=

आश्वमेधिकपर्व

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⬅ विषय-सूची (TOC)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

आश्वमेधिकपर्व

अश्वमेधपर्व

प्रथमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका शोकमग्न होकर गिरना और धृतराष्ट्रका उन्हें समझाना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

कृतोदकं तु राजानं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ।
पुरस्कृत्य महाबाहुरुत्तताराकुलेन्द्रियः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्र भीष्मको जलांजलि दे चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उन्हें आगे करके जलसे बाहर निकले। उस समय उनकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो रही थीं ॥ २ ॥

उत्तीर्य तु महाबाहुर्बाष्पव्याकुललोचनः ।
पपात तीरे गङ्गाया व्याधविद्ध इव द्विपः ॥ ३ ॥
बाहर निकलकर विशालबाहु युधिष्ठिर गंगाजीके तटपर व्याधके बाणोंसे बिंधे हुए गजराजके समान गिर पड़े। उस समय उनके दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ ३ ॥

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तं सीदमानं जग्राह भीमः कृष्णेन चोदितः । मैवमित्यब्रवीच्चैनं कृष्णः परबलार्दनः ॥ ४ ॥ उन्हें शिथिल होते देख श्रीकृष्णकी प्रेरणासे भीमसेनने उन्हें पकड़ लिया। तत्पश्चात् शत्रुसेनाका संहार करनेवाले श्रीकृष्णने उनसे कहा—'राजन्! आपको ऐसा अधीर नहीं होना चाहिये' ॥ ४ ॥

तमार्तं पतितं भूमौ श्वसन्तं च पुनः पुनः । ददृशुः पार्थिवा राजन् धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ५ ॥ राजन्! वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंने देखा कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर शोकार्त होकर पृथ्वीपर पड़े हैं और बारंबार लंबी साँस खींच रहे हैं ॥ ५ ॥

तं दृष्ट्वा दीनमनसं गतसत्त्वं नरेश्वरम् । भूयः शोकसमाविष्टाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥ ६ ॥ राजाको इतना दीनचित्त और हतोत्साह देखकर पाण्डव फिर शोकमें डूब गये और उन्हींके पास बैठ रहे ॥ ६ ॥

राजा तु धृतराष्ट्रश्च पुत्रशोकाभिपीडितः । वाक्यमाह महाबुद्धिः प्रज्ञाचक्षुर्नरेश्वरम् ॥ ७ ॥ उस समय पुत्रशोकसे पीड़ित हुए परम बुद्धिमान् प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रने महाराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ७ ॥

उत्तिष्ठ कुरुशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम् । क्षत्रधर्मेण कौन्तेय जितेयमवनी त्वया ॥ ८ ॥ 'कुरुवंशके सिंह! कुन्तीकुमार! उठो और इसके बाद जो कार्य प्राप्त है, उसे पूर्ण करो। तुमने क्षत्रियधर्मके अनुसार इस पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ ८ ॥

भुङ्क्ष्व भोगान् भ्रातृभिश्च सुहृद्भिश्च मनोऽनुगान् । शोचितव्यं न पश्यामि त्वया धर्मभृतां वर ॥ ९ ॥ 'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! अब तुम अपने भाइयों और सुहृदोंके साथ मनोवांछित भोग भोगो। तुम्हारे लिये शोक करनेका कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता ॥ ९ ॥

शोचितव्यं मया चैव गान्धार्या च महीपते । ययोः पुत्रशतं नष्टं स्वप्नलब्धं यथा धनम् ॥ १० ॥ 'पृथ्वीनाथ! शोक तो मुझको और गान्धारीको करना चाहिये, जिनके सौ पुत्र स्वप्नमें प्राप्त हुए धनकी भाँति नष्ट हो गये ॥ १० ॥

अश्रुत्वा हितकामस्य विदुरस्य महात्मनः । वाक्यानि सुमहार्थानि परितप्यामि दुर्मतिः ॥ ११ ॥ 'अपने हितैषी महात्मा विदुरके महान् अर्थयुक्त वचनोंको अनसुना करके आज मैं दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र अत्यन्त संतप्त हो रहा हूँ ॥ ११ ॥

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उक्तवान् विदुरो यन्मां धर्मात्मा दिव्यदर्शनः ।
दुर्योधनापराधेन कुलं ते विनशिष्यति ॥ १२ ॥
स्वस्ति चेदिच्छसे राजन् कुलस्य कुरु मे वचः ।
वध्यतामेष दुष्टात्मा मन्दो राजा सुयोधनः ॥ १३ ॥
‘दिव्य दृष्टि रखनेवाले धर्मात्मा विदुरने मुझसे यह पहले ही कह दिया था कि ‘दुर्योधनके अपराधसे आपका सारा कुल नष्ट हो जायगा। यदि आप अपने कुलका कल्याण करना चाहते हैं तो मेरी बात मान लीजिये। इस मन्दबुद्धि दुष्टात्मा राजा दुर्योधनको मार डालिये ।। १२-१३ ।।
कर्णश्च शकुनिश्चैव नैनं पश्यतु कर्हिचित् ।
द्यूतसंघातमप्येषामप्रमादेन वारय ॥ १४ ॥
“कर्ण और शकुनिको इससे कभी मिलने न दीजिये। आप पूर्ण सावधान रहकर इन सबके द्यूतविषयक संगठनको रोकिये ।। १४ ।।
अभिषेचय राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
स पालयिष्यति वशी धर्मेण पृथिवीमिमाम् ॥ १५ ॥
“धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको अपने राज्यपर अभिषिक्त कीजिये। ये मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं, अतः धर्मपूर्वक इस पृथिवीका पालन करेंगे ।। १५ ।।
अथ नेच्छसि राजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
मेढीभूतः स्वयं राज्यं प्रतिगृह्णीष्व पार्थिव ॥ १६ ॥
“नरेश्वर! यदि आप कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राजा बनाना नहीं चाहते तो स्वयं ही मेठ बनकर सारे राज्यका भार स्वयं ही लिये रहिये ।। १६ ।।
समं सर्वेषु भूतेषु वर्तमानं नराधिप ।
अनुजीवन्तु सर्वे त्वां ज्ञातयो भ्रातृभिः सह ॥ १७ ॥
“महाराज! आप सभी प्राणियोंके प्रति समान बर्ताव करें और सभी सजातीय मनुष्य अपने भाई-बन्धुओंके साथ आपके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करें' ।। १७ ।।
एवं ब्रुवति कौन्तेय विदुरे दीर्घदर्शिनि ।
दुर्योधनमहं पापमन्ववर्तं वृथामतिः ॥ १८ ॥
'कुन्तीनन्दन! दूरदर्शी विदुरके ऐसा कहनेपर भी मैंने पापी दुर्योधनका ही अनुसरण किया। मेरी बुद्धि निरर्थक हो गयी थी ।। १८ ।।
अश्रुत्वा तस्य धीरस्य वाक्यानि मधुराण्यहम् ।
फलं प्राप्य महत् दुःखं निमग्नः शोकसागरे ॥ १९ ॥
'धीर विदुरके मधुर वचनोंको अनसुना करके मुझे यह महान् दुःखरूपी फल प्राप्त हुआ है। मैं शोकके महान् समुद्रमें डूब गया हूँ ।। १९ ।।
वृद्धौ हि तेऽद्य पितरौ पश्य नौ दुःखितौ नृप ।

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न शोचितव्यं भवता पश्यामीह जनाधिप ॥ २० ॥
‘नरेश्वर! दुःखमें डूबे हुए हम दोनों बूढ़े माता-पिताकी ओर देखो। तुम्हारे लिये शोक करनेका औचित्य मैं नहीं देख पाता हूँ’ ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1571)

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द्वितीयोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु राज्ञा स धृतराष्ट्रेण धीमता ।
तूष्णीं बभूव मेधावी तमुवाचाथ केशवः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर भी मेधावी युधिष्ठिर चुप ही रहे। तब भगवान् श्रीकृष्णने कहा— ॥ १ ॥

अतीव मनसा शोकः क्रियमाणो जनाधिप ।
संतापयति चैतस्य पूर्वप्रेतान् पितामहान् ॥ २ ॥
'जनेश्वर! यदि मनुष्य मरे हुए प्राणीके लिये अपने मनमें अधिक शोक करता है तो उसका वह शोक उसके पहलेके मरे हुए पितामहोंको भारी संतापमें डाल देता है ॥ २ ॥

यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ।
देवांस्तर्पय सोमेन स्वधया च पितॄनपि ॥ ३ ॥
'इसलिये आप बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये और सोमरसके द्वारा देवताओं तथा स्वधाद्वारा पितरोंको तृप्त कीजिये ॥ ३ ॥

अतिथीनन्नपानेन कामैरन्यैरकिंचनान् ।
विदितं वेदितव्यं ते कर्तव्यमपि ते कृतम् ॥ ४ ॥
'अतिथियोंको अन्न और जल देकर तथा अकिंचन मनुष्योंको दूसरी-दूसरी मनचाही वस्तुएँ देकर संतुष्ट कीजिये। आपने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया है। करनेयोग्य कार्यको भी पूर्ण कर लिया है ॥ ४ ॥

श्रुताश्च राजधर्मास्ते भीष्माद् भागीरथीसुतात् ।
कृष्णद्वैपायनाच्चैव नारदाद् विदुरात् तथा ॥ ५ ॥
'आपने गंगानन्दन भीष्मसे राजधर्मोंका वर्णन सुना है। श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और विदुरजीसे कर्तव्यका उपदेश श्रवण किया है ॥ ५ ॥

नेमामर्हसि मूढानां वृत्तिं त्वमनुवर्तितुम् ।
पितृपैतामहं वृत्तमास्थाय धुरमुद्वह ॥ ६ ॥
अतः आपको मूढ़ पुरुषोंके इस बर्तावका अनुसरण नहीं करना चाहिये। पिता-पितामहोंके बर्तावका आश्रय लेकर राजकार्यका भार सँभालिये ॥ ६ ॥

युक्तं हि यशसा क्षात्रं स्वर्गं प्राप्तुमसंशयम् ।
न हि कश्चिद्धि शूराणां निहतोऽत्र पराङ्मुखः ॥ ७ ॥

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'इस युद्धमें वीरोचित सुयशसे युक्त हुआ सारा क्षत्रियसमुदाय स्वर्गलोक पानेका अधिकारी है, क्योंकि इन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखाकर नहीं मारा गया है ॥ ७ ॥ त्यज शोकं महाराज भवितव्यं हि तत्तथा । न शक्यास्ते पुनर्दृष्टुं त्वया येऽस्मिन् रणे हताः ॥ ८ ॥ 'महाराज! शोक त्याग दीजिये, क्योंकि जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी। इस युद्धमें जो लोग मारे गये हैं, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते' ॥ ८ ॥ एतावदुक्त्वा गोविन्दो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । विरराम महातेजास्तमुवाच युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब युधिष्ठिरने उनसे कहा ॥ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच गोविन्द मयि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम । सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मय्यनुकम्पसे ॥ १० ॥ युधिष्ठिर बोले—गोविन्द! आपका जो मेरे ऊपर प्रेम है, वह मुझे अच्छी तरह ज्ञात है। आप स्नेह और सौहार्दवश सदा ही मुझपर कृपा करते रहते हैं ॥ १० ॥ प्रियं तु मे स्यात् सुमहत्कृतं चक्रगदाधर । श्रीमन् प्रीतेन मनसा सर्वं यादवन्दन ॥ ११ ॥ यदि मामनुजानीयाद् भवान् गन्तुं तपोवनम् । (कृतकृत्यो भविष्यामि इति मे निश्चिता मतिः ।) चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान् यादवनन्दन! यदि आप प्रसन्न मनसे मुझे तपोवनमें जानेकी आज्ञा दे दें तो मेरा सारा और महान् प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय। उस दशामें मैं कृतकार्य हो जाऊँगा, यह मेरा निश्चित विचार है ॥ ११ १/२ ॥ न हि शान्तिं प्रपश्यामि पातयित्वा पितामहम् ॥ १२ ॥ (नृशंसः पुरुषव्याघ्रं गुरुं वीर्यबलान्वितम् ।) कर्णं च पुरुषव्याघ्रं संग्रामेष्वपलायिनम् । मैं क्रूरतापूर्वक पितामह भीष्मको, बल-पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह गुरुदेव द्रोणाचार्यको और युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले नरश्रेष्ठ कर्णको मरवाकर कभी शान्ति नहीं पा सकता ॥ १२ १/२ ॥ कर्मणा येन मुच्येयमस्मात् क्रूरादरिंदम ॥ १३ ॥ कर्मणा तद् विधत्स्वेह येन शुध्यति मे मनः ।

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शत्रुदमन श्रीकृष्ण! अब जिस कर्मके द्वारा मुझे अपने इस क्रूरतापूर्ण पापसे छुटकारा मिले तथा जिससे मेरा चित्त शुद्ध हो, वही कीजिये ।। १३ १/२ ।। तमेवं वादिनं पार्थं व्यासः प्रोवाच धर्मवित् ।। १४ ।। सान्त्वयन् सुमहातेजाः शुभं वचनमर्थवत् । अकृता ते मतिस्तात पुनर्बाल्येन मुह्यसे ।। १५ ।। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख धर्मके तत्त्वको जाननेवाले महातेजस्वी व्यासजीने उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ एवं सार्थक वचन कहा—‘तात! तुम्हारी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं हुई है। तुम पुनः बालकोचित अविवेकके कारण मोहमें पड़ गये ।। १४-१५ ।। किमाकारा वयं तात प्रलपामो मुहुर्मुहुः । विदिताः क्षत्रधर्मास्ते येषां युद्धेन जीविका ।। १६ ।। ‘तात! अब हमलोग किस लायक रह गये। हम बारंबार जो कुछ कहते या समझाते हैं वह सब व्यर्थका प्रलाप सिद्ध हो रहा है। युद्धसे ही जिनकी जीविका चलती है, उन क्षत्रियोंके धर्म भलीभाँति तुम्हें विदित हैं ।। १६ ।। तथाप्रवृत्तो नृपतिर्नाधिबन्धेन युज्यसे । मोक्षधर्माश्च निखिला याथातथ्येन ते श्रुताः ।। १७ ।। ‘उनके अनुसार बर्ताव करनेवाला राजा कभी मानसिक चिन्तासे ग्रस्त नहीं होता। तुमने सम्पूर्ण मोक्षधर्मोंको भी यथार्थरूपसे सुना है ।। १७ ।। (यथा वै कामजां मायां परित्यक्तुं त्वमर्हसि । तथा तु कुर्वन् नृपतिर्नानुबन्धेन युज्यते ।।) ‘तुम्हें कामजनित मायाका जिस प्रकार परित्याग करना चाहिये, उस प्रकार उसका त्याग करनेवाला नरेश कभी बन्धनमें नहीं पड़ता ।। असकृच्चापि संदेहाश्छिन्नास्ते कामजा मया । अश्रद्दधानो दुर्मेधा लुप्तस्मृतिरसि ध्रुवम् ।। १८ ।। ‘मैंने अनेक बार तुम्हारे कामजनित संदेहोंका निवारण किया है; परंतु तुम दुर्बुद्धि होनेके कारण उसपर श्रद्धा नहीं करते। निश्चय इसलिये तुम्हारी स्मरणशक्ति लुप्त हो गयी है ।। १८ ।। मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम् । प्रायश्चित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेऽनघ । राजधर्माश्च ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुताः ।। १९ ।। ‘तुम ऐसे न बनो, तुम्हारे लिये इस तरह अज्ञानका अवलम्बन उचित नहीं है। निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके प्रायश्चित्तोंका भी ज्ञान है। तुमने सब प्रकारके राजधर्म और दानधर्म भी सुने हैं ।। १९ ।।

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स कथं सर्वधर्मज्ञः सर्वागमविशारदः ।
परिमुह्यसि भूयस्त्वमज्ञानादिव भारत ॥ २० ॥
‘भारत! इस प्रकार सब धर्मोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् होकर भी तुम अज्ञानवश बारंबार मोहमें क्यों पड़ते हो?’ ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 1575)

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तृतीयोऽध्यायः

व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना

व्यास उवाच

युधिष्ठिर तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः ।
न हि कश्चित्स्वयं मर्त्यः स्ववशः कुरुते क्रियाम् ॥ १ ॥
**व्यासजीने कहा—**युधिष्ठिर! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारी बुद्धि ठीक नहीं है। कोई भी मनुष्य स्वाधीन होकर अपने-आप कोई काम नहीं करता है ॥ १ ॥

ईश्वरेण च युक्तोऽयं साध्वसाधु च मानवः ।
करोति पुरुषः कर्म तत्र का परिदेवना ॥ २ ॥
यह मनुष्य अथवा पुरुषसमुदाय ईश्वरसे प्रेरित होकर ही भले-बुरे काम करता है।* अतः इसके लिये शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ २ ॥

आत्मानं मन्यसे चाथ पापकर्मार्णमन्ततः ।
शृणु तत्र यथापापमपकृष्येत भारत ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! यदि तुम अन्ततोगत्वा अपने-आपको ही युद्धरूपी पापकर्मका प्रधान हेतु मानते हो तो वह पाप जिस प्रकार नष्ट हो सकता है, वह उपाय बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥

तपोभिः क्रतुभिश्चैव दानेन च युधिष्ठिर ।
तरन्ति नित्यं पुरुषा ये स्म पापानि कुर्वते ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! जो लोग पाप करते हैं, वे तप, यज्ञ और दानके द्वारा ही सदा अपना उद्धार करते हैं ॥ ४ ॥

यज्ञेन तपसा चैव दानेन च नराधिप ।
पूयन्ते नरशार्दूल नरा दुष्कृतकारिणः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! पुरुषसिंह! पापाचारी मनुष्य यज्ञ, दान और तपस्यासे ही पवित्र होते हैं ॥ ५ ॥

असुराश्च सुराश्चैव पुण्यहेतोर्मखक्रियाम् ।
प्रयतन्ते महात्मानस्तस्माद् यज्ञाः परायणम् ॥ ६ ॥
महामना देवता और दैत्य पुण्यके लिये यज्ञ करनेका ही प्रयत्न करते हैं, अतः यज्ञ परम आश्रय है ॥ ६ ॥

यज्ञैरेव महात्मानो बभूवुरधिकाः सुराः ।
ततो देवाः क्रियावन्तो दानवानभ्यधर्षयन् ॥ ७ ॥