BharatKosha
Back to the archive

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

आठवां अध्याय । २४७

Page 387Permalink

आठवां अध्याय । २४७ (जैसा कार्य हो) करमवालों के कामों को देखे । और वंश, जाति आदि देशव्यवहार और शास्त्रोक्त साक्षी, शपथ आदि के अनुसार अठारह प्रकार के विवाद-झगड़ों का अलग अलग विचार-फैसला करे। उन अठारह विवादों का नाम इस प्रकार है— (१) ऋण लेकर न देना (२) धरोहर (३) दूसरे की वस्तु को बेचना (४) साझे का व्यापार (५) दान दिया हुआ लौटा लेना (६) नौकरी न देना (७) प्रतिज्ञा भंग करना (८) खरीद-बेंच का झगड़ा (६) पशु स्वामी और चरवाहे का झगड़ा (१०) सरहद की लड़ाई (११) बड़ी बात कहना (१२) मार पीट (१३) चोरी (१४) ज़ोर-जुलम (१५) पर स्त्री का ले लेना (१६) स्त्री और पुरुष के धर्म की व्यवस्था (१७) जुआखोरी.(१८) जानवरों की लड़ाई में हार जीत का दाँव करना। इस संसार में ये १८ दावा होने के कारण हैं॥१–७॥ एषु स्थानेषु भूयिष्ठं विवादं चरतां नृणाम् । धर्मं शाश्वतमाश्रित्य कुर्यात् कार्यविनिर्णयम् ॥ ८ ॥ यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम् । तदा नियुञ्ज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥ ६ ॥ सोऽस्य कार्याणि संपश्येत् सभ्यैरेव त्रिभिर्वृतः । सभामेव प्रविश्याग्र्यामासीनः स्थित एव वा ॥ १० ॥ यस्मिन् देशे निषीदन्ति विप्रावेदविदस्त्रयः । राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान् ब्रह्मणस्तां सभां विदुः ॥ ११ ॥ धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते । शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ १२॥ सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम् । अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्बिषी ॥ १३ ॥

Page 388Permalink

२४८ मनुस्मृति । यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ १४ ॥ इन विषयों में झगड़ा करनेवालों का फ़ैसला राजा को सनातन- धर्म के अनुसार करना चाहिए। जब आप कारणवश न काम देख सके तो विद्वान् ब्राह्मण को सौंप देवे। वह ब्राह्मण तीन सभासदों के साथ सभा में बैठकर या खड़े ही राजा के खास कामों को देखे। जिस देश में वेदविशारद तीन ब्राह्मण राजसभा में निर्ण- यार्थ बैठते हैं और राजा का अधिकार पाया हुआ एक विद्वान् ब्राह्मण रहता है वह ब्रह्मा की सभा मानी जाती है। जिस सभा में धर्म, अधर्म से चौंका जाता है और उस चुभे काँटे को सभा- सद् धर्मशरीर से नहीं निकालते तो वे सभासद् पापभागी होते हैं। या तो सभा में न जाना, जाना तो सत्यवचन कहना। और जो जानकर भी कुछ न कहे या झूठ कहे तो वह पातकी होता है। जिस सभा में अधर्म से धर्म की और असत्य से सत्य की हत्या होती है उस सभा के सभासद् नष्ट होजाते हैं ॥ ८-१४ ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ १५ ॥ वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् । वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ॥ १६ ॥ एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः । शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ १७ ॥ धर्म का लोप करदेने से वह उस पुरुष को नष्ट करदेता है और धर्म की रक्षा करने से वह भी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश न करना चाहिए जिसमें नष्ट धर्म हमारा नाश न करे। भगवान् धर्म को 'वृष' कहते हैं और जो उसका नाश करता है उसको देवता 'वृषल' कहते हैं। इस कारण मनुष्य को धर्म

आठवां अध्याय। २४६

Page 389Permalink

आठवां अध्याय। २४६ का लोप न करना चाहिए । मृत्युसमय में भी एकमात्र मित्र धर्म ही पीछे चलता है और सब शरीर के साथ ही नाश को प्राप्त होजाता है ॥ १५-१७ ॥ पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादः साक्षिणमृच्छति । पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ १८ ॥ राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः । एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्यते ॥ १९ ॥ जातिमात्रोपजीवी वा कामं स्याद् ब्राह्मणब्रुवः । धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ॥ २० ॥ यस्य शूद्रस्तु कुरुते राज्ञो धर्मविवेचनम् । तस्य सीदति तद्राष्ट्रं पङ्के गौरिव पश्यतः ॥ २१ ॥ यद्राष्ट्रं शूद्रभूयिष्ठं नास्तिकाक्रान्तमद्विजम् । विनश्यत्याशु तत्कृत्स्नं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम् ॥ २२॥ न्याय करते समय उसका एक चौथाई अधर्म अन्याय करने वाले को, एक चौथाई झूठे गवाह को, एक चौथाई सभासद् और एक चौथाई राजा को अधर्म लगता है। जिस सभा में अन्यायी पुरुष की ठीक ठीक निन्दा कीजाती है, वहां राजा और सभा- सद् दोष से छूट जाते हैं। और उस अधर्मी को ही पाप लगता है। जिसकी जातिमात्र से जीविका है कुछ विद्या, योग्यता से नहीं वही चाहे न्यायकर्ता नियुक्त किया जाय, पर शूद्र को कभी अधिकार न देवे । जिस राजा का न्यायाधीश शूद्र होता है उसका राज्य कीचड़ में गौ की भांति फँसकर पीड़ा पाता है। जिस राज्य में शूद्र और नास्तिक, अधिक हों, द्विज न हों वह सम्पूर्ण राज्य दुर्भिक्ष और व्याधि से पीड़ित होकर शीघ्रही नष्ट होजाता है ॥ १८-२२ ॥ ३२

Page 390Permalink

२५० मनुस्मृति । धर्मासनमधिष्ठाय संवीताङ्गः समाहितः । प्रणम्य लोकपालेभ्यः कार्यदर्शनमारभेत् ॥ २३ ॥ अर्थानर्थावुभौ बुद्ध्वा धर्माधर्मौ च केवलौ । वर्णक्रमेण सर्वाणि पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ २४ ॥ बाह्यैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावमन्तर्गतं नृणाम् । स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ॥ २५ ॥ आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च । नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ २६ ॥ राजा न्यायासन पर वस्त्र वगैरह पहन कर बैठे और आठ लोकपालों को प्रणाम करके सावधानी से विचारकार्य का आरम्भ करे। प्रजा की लाभ और हानि को, धर्म और अधर्म को सोचकर वादियों के दावों को ब्राह्मणादि वर्ण के क्रम से देखना शुरू करे। मनुष्यों के बाहरी लक्षण, स्वर (आवाज़) शरीर का वर्ण, नीचे ऊपर देखना, आकार रोमांच होना आदि, आँख, हाथ, पैर की चेष्टा वगैरह से भीतरी हाल पहचानना। आकार, नीचे ऊपर देखना, गति, चेष्टा, बोली, आँख, मुँह के विकार से मन का भाव जाना जाता है ॥ २३-२६ ॥ बालदायादिकं रिक्थं तावद्राजानुपालयेत् । यावत्स स्यात्समावृत्तो यावच्चातीतशैशवः ॥ २७ ॥ वशाऽपुत्रासु चैव स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च । पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च ॥ २८ ॥ जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वबान्धवाः । ताञ्छिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः ॥ २६ ॥

आठवां अध्याय । २५१

Page 391Permalink

आठवां अध्याय । २५१ प्रणष्टस्वामिकं रिक्थं राजा त्र्यब्दं निधापयेत् । अर्वाक्त्र्यब्दाद्धरेत्स्वामी परेण नृपतिर्हरेत् ॥ ३० ॥ बालक के दायभाग का द्रव्य, तब तक राजा के अधीन (कोर्ट आफ़ वार्डस) में रहे जब तक वह समावर्त्तनवाला अर्थात् पढ़ लिखकर चतुर न हो और बालिग न होजाय । बन्ध्या स्त्री, अपुत्रा, सपिण्डरहित, पतिव्रता, विधवा और बहुत दिन की रोगी स्त्री का भी धन राजा की रक्षा में रहे । इन जीती हुई स्त्रियों का धन भाई बन्धु हर लेना चाहें तो उनको चोरदण्ड के मुवाफ़िक़ दण्ड देवे । जिसका स्वामी बे पता हो उस लावारिस धन को राजा तीन साल तक रखे, उसके भीतर आ जाय तो ले जाय, नहीं तो वह राजा का ही होजाता है ॥ २७-३० ॥ ममेदमिति यो ब्रूयात्सोऽनुयोज्यो यथाविधि । संवाद्य रूपसंख्यादीन् स्वामी तद्द्रव्यमर्हति ॥ ३१ ॥ अवेदयमानो नष्टस्य देशं कालं च तत्त्वतः । वर्णं रूपं प्रमाणं च तत्समं दण्डमर्हति ॥ ३२ ॥ आददीतार्थषड्भागं प्रणष्टाधिगतान्नृपः । दशमं द्वादशं वापि सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ३३ ॥ प्रणाष्टाधिगतं द्रव्यं तिष्ठेद्युक्तैरधिष्ठितम् । यांस्तत्र चौरान् गृह्णीयात्तान् राजेभेन घातयेत् ॥ ३४ ॥ ममायमिति यो ब्रूयान्निधिं सत्येन मानवः । तस्याददीत षड्भागं राजा द्वादशमेव वा ॥ ३५ ॥ अनृतं तु वदन् दण्ड्यः स्ववित्तस्यांशमष्टमम् । तस्यैव वा निधानस्य संख्यायाल्पीयसीं कलाम् ॥ ३६ ॥

Page 392Permalink

२५२ मनुस्मृति ।

तीन वर्ष के भीतर उसका मालिक आकर कहै कि-यह मेरा धन है, तब राजा उससे ठीक तौर से पूंछे कि धन कैसा है? कितना है? जो वह रूप, रंग, संख्या बतला दे तो उसको दे देना चाहिए। अगर खोई वस्तु का पता ठीक न बता सके तो उस पर उतना ही धन जुर्माना करे। कोई खोई वस्तु उसके मा- लिक को देते समय उसकी रक्षा के कारण उस धन का छठ्ठां, दशवां या बारहवां भाग राजा ले लेवे। किसीकी कोई चीज़ गुम गई हो और मिले तो राजा उसे पहरे में रक्खे और वहां से चुरानेवाला पकड़ा जाय तो उसको हाथी से मरवा देवे। जो पुरुष सच्चाई से कहे कि 'यह निधि मेरा है' उसके निधि* से छठ्ठां वां बारहवां भाग राजा ग्रहण कर लेवे। यदि वह दूसरे का अपना लेने की इच्छा करे तो उस निधि का आठवां भाग अथवा निधि गिनकर उसका कुछ भाग दण्ड देवे ॥ ३१-३६ ॥

विद्वांस्तु ब्राह्मणो दृष्ट्वा पूर्वोपनिहितं निधिम् । अशेषतोऽप्याददीत सर्वस्याधिपतिर्हि सः ॥ ३७ ॥ यं तु पश्येन्निधिं राजा पुराणं निहितं क्षितौ । तस्माद् द्विजेभ्यो दत्त्वार्धमर्धं कोशे प्रवेशयेत् ॥ ३८ ॥

यदि विद्वान् ब्राह्मण पुराने ज़माने की निधि पाजाय तो वह सब ले लेवै। क्योंकि ब्राह्मण सबका स्वामी हैं और जो भूमि में पुरानी निधि राजा पावे तो उसका आधा द्विजों को बाँट दे और आधा अपने खज़ाने में रखवा देवे ॥ ३७-३८ ॥

निधीनां तु पुराणानां धातूनामेव च क्षितौ । अर्धभाग्रक्षणाद्राजा भूमेरधिपतिर्हि सः ॥ ३९ ॥ दातव्यं सर्ववर्णेभ्यो राज्ञा चौरैर्हृतं धनम् । राजा तदुपयुञ्जानश्चौरस्याप्नोति किल्बिषम् ॥ ४० ॥

  • भूमि में गड़ा हुआ पुराना धन 'निधि' कहलाता है।

आठवां अध्याय । २५३

Page 393Permalink

आठवां अध्याय । २५३ जातिजानपदान्धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ४१ ॥ स्वानि कर्माणि कुर्वाणा दूरे सन्तोऽपि मानवाः । प्रिया भवन्ति लोकस्य स्वे स्वे कर्मण्यवस्थिताः॥४२॥ नोत्पादयेत्स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्य पूरुषः। न च प्रापितमन्येन ग्रसेदर्थं कथञ्चन ॥ ४३ ॥ भूमि का स्वामी और रक्षक होने से राजा गड़ा धन और धातु की खानों के आधे भाग का अधिकारी है। चोरों का चुराया हुआ धन छीन कर जिस वर्ण का हो उन सब को दे देय। यदि आप ग्रहण करे तो चोर के पाप का स्वयं भागी होता है। जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म (व्यापार) और कुलधर्म के अनु- सार अर्थात् रिवाज के अनुसार राजा राजधर्म को प्रचलित करे। जाति, देश और कुलधर्म और अपने कर्मों को करते लागे दूर रहते भी लोक में प्रिय होते हैं। राजा वा राजपुरुष जो नालिश न करता हो उससे खुद नालिश न करवावें और कोई झगड़ा पेश करे तो उसमें आनाकानी न करे ॥ ३६-४३ ॥ यथा नयत्यसृक्पातैर्मृगस्य मृगयुः पदम् । नयेत्तथानुमानेन धर्मस्य नृपतिः पदम् ॥ ४४ ॥ सत्यमर्थं च संपश्येदात्मानमथ साक्षिणः । देशं रूपं च कालं च व्यवहारविधौ स्थितः ॥ ४५ ॥ सद्भिराचरितं यत्स्याद्धार्मिकैश्च द्विजातिभिः । तद्देशकुलजातीनामविरुद्धं प्रकल्पयेत् ॥ ४६ ॥ जैसे वधक ज़मीन पर गिरे रुधिर के बूंदों से मारे हुए मृग का घर खोज लेता है। वैसे राजा अनुमान से मामला की अस-

Page 394Permalink

२५४ मनुस्मृति । लियत को खोज लेवे। सत्य का निर्णय करे, अन्याय से खुद डरे और गवाहों के झूठ, सत्य का एवं देश, काल और मामला का विचार करे । सजन पुरुष और धार्मिक द्विज जैसा आचरण करते हों और देश, कुल, जाति के आचार से जो ख़िलाफ़ न हो वैसा फ़ैसला करे ॥ ४४-४६ ॥ अधमर्णार्थसिद्ध्यर्थमुत्तमर्णेन चोदितः । दापयेद्धनिकस्यार्थमधमर्णाद्विभावितम् ॥ ४७ ॥ यैर्यैरुपायैरर्थं स्वं प्राप्नुयादुत्तमर्णिकः । तैस्तैरुपायैः संगृह्य दापयेदधमर्णिकम् ॥ ४८ ॥ धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च । प्रयुक्तं साधयेदर्थं पञ्चमेन बलेन च ॥ ४६ ॥ यः स्वयं साधयेदर्थमुत्तमर्णोऽधमर्णिकात् । न स राज्ञाभियोक्तव्यः स्वकं संसाधयन् धनम् ॥ ५० ॥ अर्थेऽपह्नवमानं तु करणेन विभावितम् । दापयेद्धनिकस्यार्थं दण्डलेशं च शक्तितः ॥ ५१ ॥ क़र्ज़ा का लेना-देना । अधमर्ण-क़र्ज़दार से अपना क़र्ज़ मिलने के लिए उत्तमर्ण-महा- जन कहे तो उसका धन राजा सबूत लेकर दिला देय । जिन्ह जिन उपायों से महाजन अपना रुपया पासके, उन उपायों से दिलाने की कोशिश करे । महाजन धर्म से, दावा से, कपट से, दबाव से और पाँचवें उचित बलात्कार से अपना धन वसूल करे। यदि महाजन ऋणी से खुद अपना धन वसूल करले तो उसपर राजा कोई अभियोग (मुक़द्दमा) न करे। धनी के धन को क़र्ज़दार न क़बूल करे और महाजन साक्षी-गवाह और लेख

आठवां अध्याय । २५५

Page 395Permalink

आठवां अध्याय । २५५ से साबित कर दे तो राजा उसको धन दिलावे और ऋणी के ऊपर शक्ति के अनुसार दण्ड भी करे ॥ ४७-५१ ॥ अपह्नवेऽधमर्णस्य देहीत्युक्तस्य संसदि । अभियोक्ता दिशेद्देश्यं करणं वान्यदुद्दिशेत् ॥ ५२ ॥ अदेश्यं यश्च दिशति निर्दिश्यापह्नुते च यः । यश्चाधरोत्तरानर्थान् विगीतान्नावबुध्यते ॥ ५३ ॥ अपदिश्यापदेश्यं च पुनर्यस्त्वपधावति । सम्यक् प्रणिहितं चार्थं पृष्टः सन्नाभिनन्दति ॥ ५४ ॥ राजसभा में ऋणी से कहा जाय-महाजन का क़र्ज़ा अदा कर दो, तो भी वह इन्कार करे तो राजा साक्षी, दस्तावेज़ वगैरह पेश करने की आज्ञा दे । जो झूठे गवाह या काग़ज़ पत्र पेश करे, जो पेश करके इन्कार करे और जो पूर्वापर की कही बातों का ध्यान न रक्खे । या जो बात को उलटता है, क़बूल करके भी पूँछने पर इन्कार करता है ॥ ५२-५४ ॥ असंभाष्ये साक्षिभिश्च देशे संभाषते मिथः । निरुच्यमानं प्रश्नं च नेच्छेद्यश्चापि निष्पतेत् ॥ ५५ ॥ ब्रूहीत्युक्तश्च न ब्रूयादुक्तं च न विभावयेत् । न च पूर्वापरं विद्यात्तस्मादर्थात् स हीयते ॥ ५६ ॥ साक्षिणः सन्ति मेत्युक्त्वा दिशेत्युक्तो दिशेन्न यः । धर्मस्थः कारणैरेतैर्हीनं तमपि निर्दिशेत् ॥ ५७ ॥ अभियोक्ता न चेद्ब्रूयाद्वध्यो दण्ड्यश्च धर्मतः । न चेत् त्रिपक्षात्प्रब्रूयाद्धर्मं प्रति पराजितः ॥ ५८ ॥ यो यावन्निह्नुवीतार्थं मिथ्या यावति वा वदेत् ।

Page 396Permalink

[Page Header] २५६ : मनुस्मृति ।

[Main Text] तौ नृपेण ह्यधर्मज्ञौ दाप्यौ तद्द्विगुणं दमम् ॥ ५६ ॥ पृष्टोऽपव्ययमानस्तु कृतावस्थो धनैषिणा । त्र्यवरैः साक्षिभिर्भाव्यो नृपब्राह्मणसन्निधौ ॥ ६० ॥ और जो एकान्त में गवाहों के साथ बातचीत करे, जाने हुए प्रश्न का उत्तर न दें, पूंछने पर कुछ न कहें और जो कहें सो दृढ़ता से न कहें जो पूर्वापर बातों को न जानें। ऐसे पुरुष अपने अर्थ- धन से हार जाते हैं। मेरे साक्षी हाज़िर हैं, ऐसा कह कर जो मांगने पर हाज़िर न कर सके, न्यायाधीश उसको भी हरा देय। वादी अपने दावा को सिद्ध न कर सके तो वह धर्मानुसार शिक्षा और दण्ड दोनों का पात्र होता है और जो प्रतिवादी-मुद्दआलेह डेढ़ महीना के भीतर झूठे दावे से हुई हानि की नालिश न कर सकें तो वह भी हारा समझा जाय। प्रतिवादी जितने धन के लिए झूठ बोले और वादी जितने धन का झूठा दावा करे, राजा उन दोनों अधर्मियों को उसका दूना दण्ड करे। अगर राजा और ब्राह्मण के सामने पूंछने पर ऋणी इन्कार करजाय तो तीन गवाह देकर ऋण सत्य करावें ॥ ५५-६० ॥ यादृशा धनिभिः कार्या व्यवहारेषु साक्षिणः । तादृशान् संप्रवक्ष्यामि यथा वाच्यमृतं च तैः ॥ ६१ ॥ गृहिणः पुत्रिणो मौलाः क्षत्रविट्शूद्रयोनयः । अर्थ्युक्ताः साक्ष्यमर्हन्ति न ये केचिदनापदि ॥ ६२ ॥ अब धनियों को और दूसरों को भी कैसे गवाह देने चाहिएं और वे कैसें सच्ची गवाही दें, यह सब कहा जाता है। साक्षी-गवाह। कुटुम्बी, पुत्रवान्, उसी देश का वासी, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये लोग जब वादी बुलावें तो गवाही दे सकते हैं, सब कोई नहीं ॥ ६१-६२॥

आठवां अध्याय । २५७

Page 397Permalink

आठवां अध्याय । २५७ आप्ताः सर्वेषु वर्णेषु कार्याकार्येषु साक्षिणः । सर्वधर्मविदोऽलुब्धा विपरीतांस्तु वर्जयेत् ॥ ६३ ॥ नार्थसम्बन्धिनो नाप्ता न सहाया न वैरिणः । न दृष्टदोषाः कर्त्तव्या न व्याध्यार्त्ता न दूषिताः॥६४॥ न साक्षी नृपतिः कार्यो न कारुकुशीलवौ । न श्रोत्रियो न लिङ्गस्थो न सङ्गेभ्यो विनिर्गतः ॥ ६५ ॥ नाध्यधीनो न वक्तव्यो न दस्युर्न विकर्मकृत् । न वृद्धो न शिशुर्नैको नान्त्यो न विकलेन्द्रियः॥६६॥ नार्त्तो न मत्तो नोन्मत्तो न क्षुत्तृष्णोपपीडितः । न श्रमार्त्तो न कामार्त्तो न क्रुद्धो नापि तस्करः ॥ ६७॥ सब वर्णों में जो यथार्थ कहनेवाले और धर्मज्ञ हों, लोभी न हों उनको साक्षी करना चाहिए। दावा में न धनके सम्बन्धी को, न सगे सम्बन्धी को, न मित्र को, न शत्रु को, न झूठ शपथ करने वाले को, न रोगी को, और न पहले किसी अपराध में शरीक हो उनको गवाही करना चाहिए। राजा को, कारीगर को, नट को, वेदपाठी को, संन्यासी और त्यागी को, पराधीन को, क्रूर को, अ- धर्मी को, बुड्ढे को, बालक को, एकही मनुष्य को, चाण्डाल-भङ्गी को, लूला-लंगड़ा को भी गवाह न करे। रोगों से दुखी, नशाबाज़, उन्मत्त, भूख-प्यास से दुखी, थका, कामपीडित, क्रोधी और चोर को भी गवाह न माने ॥ ६३-६७ ॥ स्त्रीणां साक्ष्यं स्त्रियः कुर्युद्विजानां सदृशा द्विजाः । शूद्राश्च सन्तः शूद्राणामन्त्यानामन्त्ययोनयः ॥ ६८ ॥ अनुभावी तु यः कश्चित्कुर्यात्साक्ष्यं विवादिनाम् । अन्तर्वेश्मन्यरख्ये वा शरीरस्यापि चात्यये ॥ ६६ ॥ ३३

Page 398Permalink

२५८ मनुस्मृति । स्त्रियाप्यसम्भवे कार्यं बालेन स्थविरेण वा । शिष्येण वन्धुना वापि दासेन भृतकेन वा ॥ ७० ॥ स्त्रियों की गवाही स्त्रियां, द्विजों की गवाही समान वर्ण के द्विज, शूद्रों की गवाही शूद्र और भङ्गी आदि की गवाही भङ्गी देवें । घर के भीतर, वन में ओर शरीरान्त (खून) में, कोई भी जानने वाला पुरुष गवाह हो सकता है । कोई योग्य गवाह न मिले तो स्त्री, बालक, बूढ़े, शिष्य, सम्बन्धी, दास और नौकर चाकर भी गवाह हो सकते हैं ॥ ६८-७० ॥ बालवृद्धातुराणां च साक्ष्येपु वदतां मृषा । जानीयादस्थिरां वाचमुत्सिक्तमनसां तथा ॥ ७१ ॥ साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च । वाग्दण्डयोश्च पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ॥ ७२ ॥ बहुत्वं परिगृह्णीयात्साक्षिद्वैधे नराधिपः । समेषु तु गुणोत्कृष्टान् गुणिद्वैधे द्विजोत्तमान् ॥ ७३ ॥ समक्षदर्शनात्साक्ष्यं श्रवणाच्चैव सिध्यति । तत्र सत्यं ब्रुवन् साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते ॥ ७४॥ साक्षी दृष्टश्रुतादन्यद्विब्रुवन्नार्यसंसदि । अवाङ्नरकमभ्येति प्रेत्य स्वर्गाच्च हीयते ॥ ७५ ॥ यत्रानिबद्धोऽपीक्षेत शृणुयाद्वापि किंचन । पृष्टस्तत्रापि तद्ब्रूयाद्यथादृष्टं यथाश्रुतम् ॥ ७६ ॥ एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद्बह्वयः शुच्योऽपि न स्त्रियः । स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वाच्च दोषैश्चान्येऽपि ये वृताः ॥ ७७ ॥

आठवां अध्याय । २५६

Page 399Permalink

आठवां अध्याय । २५६ स्वभावेनैव यद्ब्रूयुस्तद्ग्राह्यं व्यावहारिकम् । अतो यदन्यद्विब्रूयुर्धर्मार्थं तदपार्थकम् ॥ ७८ ॥ बालक, बूढ़े और रोगियों के झूठ बोलने का संभव रहता है, इसलिए उनके कहने पर भरोसा न रखे और चंचल चित्त मनुष्य को भी विश्वासी न जाने । संपूर्ण साहस के काम खून, डाका आग लगादेना और चोरी, व्यभिचार, गाली और मारपीट में सा- क्षियों की अधिक परीक्षा-जांच न करे। दोनों तरफ के गवाहों में यदि एक दूसरे के विपरीत कहे तो जिसको अधिक लोग कहें वही बात मानी जाय । और जहां दोनों विपरीत कहनेवाले समान हों वहां जिधर के गवाह गुणवान् हों उधर की बात सही माने और दोनों ही तरफ गुणी हों तो धर्मात्मा द्विजों की गवाही ठीक करे । जिसने आँखों से देखा हो या, जिसने खुद कानों से सुना हो, उसकी गवाही मानी जाती है । उसमें सच बोलने वाला साक्षी धर्म, अर्थ से नहीं हारता । जो पुरुष आर्यसभा में देखे सुने के विरुद्ध गवाही देता है, वह उलटे शिर नरक में पड़ता है । स्वर्ग से रहित होजाता है । जिस मामले में गवाह न भी हों तो भी पूंछने पर जैसा देखा, सुना हो वही बयान करे । निर्लोभ एक भी पुरुष गवाह काफ़ी होता है, पर बहुतसी पवित्र स्त्रियां भी गवाह नहीं होसकतीं । क्योंकि-स्त्रीकी बुद्धि स्थिर नहीं होती । निर्णय के समय, गवाह स्वाभाविक रीति से जो कहे, उसको प्रमाण माने । और भय-लोभ आदि से जो विरुद्ध बात कहें, वह बिलकुल व्यर्थ है ॥ ७१-७८ ॥ सभान्तः साक्षिणः प्राप्तानर्थिप्रत्यर्थिसन्निधौ । प्राड्विवाकोऽनुयुञ्जीत विधिनानेन सान्त्वयन् ॥ ७९ ॥ यद्द्वयोरनयोर्वेत्थ कार्येऽस्मिन् चेष्टितं मिथः । तद्ब्रूत सर्वं सत्येन युष्माकं ह्यत्र साक्षिता ॥ ८० ॥

Page 400Permalink

२६० मनुस्मृति । सत्यं साक्ष्ये ब्रुवन् साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान् । इह चानुत्तमां कीर्त्तिं वागेषा ब्रह्मपूजिता ॥ ८१ ॥ साक्ष्येऽनृतं वदन् पाशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम् । विवशः शतमाजातीस्तस्मात्साक्ष्यं वदेदृृतम् ॥ ८२ ॥ सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते । तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ ८३ ॥ आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः । मावमंस्थाः स्वमात्मानं नॄणां साक्षिणमुत्तमम् ॥८४॥ सभा में गवाह आ जाने पर न्यायकर्त्ता वादी, प्रतिवादी के सामने इसप्रकार कार्यारम्भ करे—इस मामला में आपस में जो कुछ हुआ है वह जो तुम जानते हो सत्य कहो क्योंकि—इस में तुम्हारी गवाही है । गवाह गवाही में सत्य बोलकर, उत्तम गति को पाता है और यहां कीर्त्ति पाता है, सत्यवाणी की वेद में प्रशंसा की है । गवाही में झूठबोलने वाला सौ जन्मतक वरुण के पाशों से बांधा जाता है । इसलिए साक्षी सत्य देनी चाहिए । साक्षी सत्य से पवित्र होता है । सत्य से धर्म बढ़ता है, इसकारण सब जाति के गवाहों को सत्य बोलना चाहिए । अपना आत्माही अपना साक्षी है, आत्माही अपने को सद्गति देता है । इस लिए मनुष्यों के उत्तम साक्षी अपने आत्मा का झूठ साक्षी से अपमान न करे ॥ ७६-८४ ॥ मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः । तांस्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुषः ॥ ८५ ॥ द्यौर्भूमिरापो हृदयं चन्द्राकार्काग्नियमानिलाः । रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च वृत्तज्ञाः सर्वदेहिनाम् ॥ ८६ ॥

आठवां अध्याय । २६१

Page 401Permalink

आठवां अध्याय । २६१ पापी लोग जानते हैं कि—पाप करते हमको कोई देखता नहीं, परन्तु उनको देवता और अन्तरात्मा देखता है । आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, रात्रि, सन्ध्या और धर्म इन सब के अधिष्ठात्री देवता सब प्राणियों के भले बुरे आचरणों को देखते हैं ॥ ८५-८६ ॥ देवब्राह्मणसान्निध्ये साक्ष्यं पृच्छेद्द्रुतं द्विजान् । उदङ्मुखान्प्राङ्मुखान्वा पूर्वाह्णे वै शुचिः शुचीन् ॥८७॥ ब्रूहीति ब्राह्मणं पृच्छेत्सत्यं ब्रूहीति पार्थिवम् । गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ ८८ ॥ ब्रह्मघ्नो ये स्मृता लोका ये च स्त्रीबालघातिनः । मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य ते ते स्युर्ब्रुवतो मृषा ॥ ८६ ॥ जन्मप्रभृति यत्किञ्चित्पुण्यं भद्र त्वया कृतम् । तत्ते सर्वं शुनो गच्छेद्यदि ब्रूयास्त्वमन्यथा ॥ ६० ॥ एकोऽहमस्मीत्यात्मानं यत्त्वं कल्याण मन्यसे । नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः ॥ ६१ ॥ यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदि स्थितः । तेन चेदविवादस्ते मा गङ्गां मा कुरून् गमः ॥ ६२ ॥ नग्नो मुण्डः कपालेन भिक्षार्थी क्षुत्पिपासितः । अन्धः शत्रुकुलं गच्छेद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ ६३ ॥ अवाक्शिरास्तमस्यन्धे किल्बिषी नरकं व्रजेत् । यः प्रश्नं वितथं ब्रूयात्पृष्टः सन् धर्मनिश्चयैः ॥६४॥ न्यायाधीश स्नानादि से पवित्र होकर, देवता और ब्राह्मण के समीप में पवित्र द्विजातियों को पूर्व या उत्तरमुख कराकर

Page 402Permalink

२६२ मनुस्मृति । प्रातःकाल सच सच वृत्तान्त पूछे । ब्राह्मण से 'कहो' ऐसा पूछे । क्षत्रिय से 'सच बोलो' इस भांति पूछे । और 'गौ, बीज, सोना चुराने का पातक तुमको होगा' ऐसा कहकर वैश्यों से पूछे । 'सब पाप तुमको लगेगा' यों कहकर शूद्र से साक्षी लेवे । ब्राह्मण, स्त्री, बालक को मारनेवाले को और मित्रद्रोही, कृतघ्न को जो जो लोक मिलते हैं वेही लोक झूठ बोलनेवाले को मिलते हैं। हे भद्र पुरुष ! जन्म से लेकर तूने जो कुछ पुण्य किया है, वह सब झूठी गवाही देगा तो, कुत्ते को पहुँचेगा । हे भद्र ! तू यह जो मानता है कि, मैं अकेला जीवात्मा हूं सो न मान । क्योंकि-पुण्य, पाप को देखनेवाला अन्तर्यामी नित्य हृदय में ही स्थित है। यमरूप वैवस्वत देव हृदय में स्थित हैं, उसमें विश्वास रखने से गङ्गा और कुरुक्षेत्र जाने की ज़रूरत नहीं है । जो झूठी गवाही देता है-उसको नङ्गा, शिर मुड़ाकर, भूखा, प्यासा और अंधा होकर, हाथ में ठीकरा लेकर शत्रु के घर भीख मांगने जाना पड़ता है। जो झूठ साक्षी पूंछने पर देता है। वह पापी नीचे शिर होकर, अँधरे नरक में पड़ता है ॥ ८७-६४ ॥ अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति स नरः कण्टकैः सह । यो भाषतेऽर्थवैकल्यमप्रत्यक्षं सभां गतः ॥ ६५ ॥ यस्य विद्वान् हि वदतः क्षेत्रज्ञो नाभिशङ्कते । तस्मान्न देवाः श्रेयांसं लोकेऽन्यं पुरुषं विदुः ॥ ६६ ॥ यावतो बान्धवान् यस्मिन् हन्ति साक्ष्येऽनृतं वदन् । तावतः संख्यया तस्मिन् शृणु सौम्य़ानुपूर्वशः ॥ ६७ ॥ पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते । शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ॥ ६८ ॥ हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन् । सर्वं भूम्यनृते हन्ति मास्म, भूम्यनृतं वदीः ॥ ६६ ॥

[आठवां अध्याय । २६३

Page 403Permalink

[आठवां अध्याय । २६३ अप्सु भूमिवदित्याहुः स्त्रीणां भोगे च मैथुने । अब्जेषु चैव रत्नेषु सर्वेष्वश्ममयेषु च ॥ १०० ॥ जो सभा में बिना देखी बात बनाकर बोलता है वह अंधा होकर कांटों सहित मछली खाता है। साक्षी के समय जिसकी जीवात्मा असत्य की शङ्का नहीं करता, उससे अच्छा देवगण दूसरे को नहीं मानते। हे सौम्य ! जिस साक्षी में झूठ बोलनेवाला जितने बान्धवों के मारने का फल पाता है वह यों है--पशु के बारे में झूठ बोलने से पांच बान्धवों की हत्या का पातक होता है। गौके विषय में दश, घोड़ा के सौ और पुरुष के लिए हज़ार की हत्या का पातक लगता है। सुवर्ण के लिए बोलने से पैदा हुए या होनेवालों की हत्या को पाता है और भूमि के लिए कहने से संपूर्ण प्राणियों के वध को करता है। इसलिए भूमि के बारे में कभी झूठी साक्षी न दे। सरोवर के जल, स्त्रीसंभोग, जल से पैदा मोती और नीलम आदि रत्नों के लिए झूठी गवाही देने से भूमि का सा दोष होता है ॥ ९५-१०० ॥ एतान् दोषानवेक्ष्य त्वं सर्वाननृतभाषणे । यथाश्रुतं यदादृष्टं सर्वमेवाञ्जसा वद ॥ १०१ ॥ गोरक्षकान् वाणिजिकांस्तथा कारुकुशीलवान् । प्रेष्यान् वार्धुषिकांश्चैव विप्रान् शूद्रवदाचरेत् ॥१०२॥ इन सब पातकों को समझकर, जैसा देखा या सुना है वही ठीक ठीक कहो। गोपालक, बनियां, बढ़ई, लोहार, गानेबजाने का काम करनेवाले, नौकरी पेशा और व्याजखोर ब्राह्मणों से गवाही लेते समय शूद्र के समान प्रश्न-सवाल करे ॥ १०१-१०२ ॥ तद्वदन् धर्मतोऽर्थेषु जानन्नप्यन्यथा नरः । न स्वर्गाच्च्यवते लोकाद्दैवीं वाचं वदन्ति ताम् ॥ १०३॥ शूद्रविट्क्षत्रविप्राणां यत्रार्तोक्तौ भवेद्वधः ।

Page 404Permalink

२६४ मनुस्मृति । तत्र वक्तव्यमनृतं तद्धि सत्याद्विशिष्यते ॥ १०४ ॥ वाग्दैवत्यैश्च चरुभिर्यजेरंस्ते सरस्वतीम् । अनृतस्यैनसस्तस्य कुर्वाणा निष्कृतिं पराम् ॥ १०५ ॥ कूष्माण्डैर्वापि जुहुयाद्घृतमग्नौ यथाविधि । उदित्यूचा वा वारुण्या ऋचेनाब्दैवतेन वा ॥ १०६ ॥ त्रिपक्षादब्रुवन् साक्ष्यमृणादिषु नरोऽगदः । तदृणं प्राप्नुयात्सर्वं दशबन्धं च सर्वतः ॥ १०७ ॥ यस्य दृश्येत सप्ताहादुक्तवाक्यस्य साक्षिणः । रोगोऽग्निर्ज्ञातिमरणमृणं दाप्यो दमं च सः ॥ १०८ ॥ असाक्षिकेेषु त्वर्थेषु मिथो विवदमानयोः । अविन्दंस्तत्त्वतः सत्यं शपथेनापि लम्भयेत् ॥ १०९ ॥ महर्षिभिश्च देवैश्च कार्यार्थं शपथाः कृताः । वशिष्ठश्चापि शपथं शेपे पैजवने नृपे ॥ ११० ॥ जो मनुष्य जानता हुआ भी धर्मवश झूठ बोले तो वह स्वर्गलोकसे पतित नहीं होता क्योंकि उस असत्य को देववाणी कहते हैं। जिस मामला में शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के प्राण जाते हों वहां साक्षी झूठ बोले-वह झूठ भी सत्य से श्रेष्ठ है । झूठे गवाहों को उस पाप से छुटकारा पानेके लिए वाणी देवता के लिए चरु बनाकर सरस्वतीदेवी का पूजन करना चाहिए । अथवा कूष्माण्ड मन्त्रों ( यद्देवा देवहेडनम् यजु० २० । १४ ) से हवन करे । या वरुण देवता के (उदुत्तमं वरुणपाशम्' यजु० १२। १२) मन्त्रसे अथवा जल देवता के मन्त्र ( आपो हिष्ठा यजु० ११ । ५० ) से हवन करे। कर्ज़ाके बारेमें साक्षी नीरोग होनेपर तीनदिनतक न आवे तो महा- जन अपना सब ऋण पावे और धन का दशांश गवाहपर दण्ड

आठवां अध्याय । २६५

Page 405Permalink

आठवां अध्याय । २६५ करे। गवाह को सात दिन के भीतर रोग, अग्नि, स्त्री पुत्रादि के मृत्यु की आपत्ति होजाय तो उसको दण्ड न करे। जिन वादी और प्रतिवादियों के गवाह न हों, उनका ठीक तत्त्व समझ में न आवे तो शपथ-क़सम से भी निर्णय करलेवे। महर्षि और देवताओं ने भी शपथ की थी। विश्वामित्रने वशिष्ठपर हत्या लगाई, थी तब उन्होंने राजा पैजवनके समीप शपथ कीथी ॥१०३-११०॥ न वृथा शपथं कुर्यात्स्वल्पेऽप्यर्थे नरो बुधः । वृथा हि शपथं कुर्वन् प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ १११ ॥ कामिनीषु विवाहेषु गवां भक्ष्ये तथेन्धने । ब्राह्मणाभ्युपपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम् ॥ ११२॥ सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः । गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ ११३ ॥ अग्निं वाहारयेदेनमप्सु चैनं निमज्जयेत् । पुत्रदारस्य वाप्येनं शिरांसि स्पर्शयेत् पृथक् ॥ ११४॥ यमिद्धो न दहत्यग्निरापो नोन्मज्जयन्ति च । न चार्तिमृच्छति क्षिप्रं स ज्ञेयः शपथे शुचिः॥ ११५ ॥ बुद्धिमान् पुरुष थोड़ी बात के लिए शपथ न करे । वृथा शपथ से लोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं। स्त्रियों में, विवाह में, गौवों के कुछ नुक़सान करने में यज्ञार्थ काष्ठसंग्रह में और ब्राह्मण की आपत्ति में झूठा शपथ करने से पाप नहीं लगता । ब्राह्मण को सत्य की शपथ दे, क्षत्रिय को सवारी और शस्त्र की देय, वैश्य को गौ, अन्न और सुवर्ण की और शूद्र को सब पातक लगने की शपथ देय । अथवा शूद्र से शपथ में अग्नि उठवावे, जल में गोता लगवावे और उसके पुत्र या स्त्री के ऊपर हाथ रखवावे। जिसको ३४

Page 406Permalink

२६६ मनुस्मृति ।

अग्नि न जळावे, जल में न डूबे और अचानक शिर पर आपत्ति न पड़जाय उसको शपथ में पवित्र जानना ॥ १११-११५ ॥

वत्सस्य ह्यभिशस्तस्य पुरा भ्रात्रा यवीयसा। नाग्निर्ददाह रोमापि सत्येन जगतः स्पृशः ॥ ११६ ॥ यस्मिन्यस्मिन् विवादे तु कौटसाक्ष्यं कृतं भवेत् । तत्तत्कार्यं निवर्त्तेत कृतं चाप्यकृतं भवेत् ॥ ११७ ॥ लोभान्मोहाद्भयान्मैत्रात्कामात्क्रोधात्तथैव च। अज्ञानाद्बालभावाच्च साक्ष्यं वितथमुच्यते ॥ ११८॥

पूर्व काल में वत्सऋषि के ऊपर उनके छोटे भाई ने कलङ्क लगाया था कि तू शूद्रा के गर्भ का है। तब वत्स ने अग्नि में प्रवेश किया था, पर सत्यवश अग्नि ने उनका एक रोम भी नहीं जलाया। जिन जिन मुक़द्मों में झूठी गवाही दी ऐसा नि- श्चय हो-उनको फिर से उलट कर परीक्षा करे। लोभ, मोह, भय, मित्रता, काम, क्रोध, अज्ञान और लड़कपन से गवाही झूठी कही जाती है ॥ ११६-११८ ॥

एषामन्यतमे स्थाने यः साक्ष्यमनृतं वदेत् । तस्य दण्डविशेषांस्तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ११९ ॥ लोभात्सहस्रं दण्ड्यस्तु मोहात्पूर्व तु साहसम् । भयाद्द्वौ मध्यमौ दण्डौ मैत्रात्पूर्व चतुर्गुणम् ॥ १२०॥ कामाद्दशगुणं पूर्वं क्रोधात्तु त्रिगुणं परम् । अज्ञानाद् द्वे शते पूर्णे बालिश्याच्छतमेव तु ॥ १२१ ॥ एतानाहुः कौटसाक्ष्ये प्रोक्तान्दण्डान्मनीषिभिः । धर्मस्याव्यभिचारार्थमधर्मानियमाय च ॥ १२२ ॥