पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
बोला-स्वामिन् ! मैने यह कहा कि "यह वन चण्डिकाके वाहनभूत हमारा स्वामी पिंगलक नाम सिंहका अधिकृतहै, सो आप अभ्यागत प्रिय अतिथि प्राप्त हो सो उस (स्वामी) के पास चलकर भ्रातृस्नेहसे एक स्थानमेंही भक्षण पान विहार क्रियासे एक स्थानमें रहकर समय व्यतीत करो, तब उसने यह सब स्वी- कार करके प्रसन्न हो कहा-‘स्वामीके निकटसे अभयदक्षिणा दिवाओ, सो इसमें स्वामीही प्रमाण है” यह सुनकर पिंगलक बोला-“धन्य बुद्धिमान् धन्य । मानो यह मेरे हृदयसेही सम्मति करके तैने कहा। मैने उसको अभय दक्षिणा दी, परन्तु उससेभी मेरे निमित्त अभय दक्षिणा दिवाकर शीघ्र लाओ। ठीकही कहा है- अन्तःसारैरकुटिलैरच्छिद्रैः परीक्षितैः । मन्त्रिभिर्धार्यते राज्यं सुस्तम्भैरिव मन्दिरम् ॥ १३७॥ सारवान् कुटिलतासे रहित निर्दोष अच्छी प्रकार परीक्षा किये हुए मंत्रियोंसे राज्य धारण कियाजाताहै जैसे अच्छे स्तम्भोंसे मन्दिर ॥ १३७ ॥ तथाच- और भी- मन्त्रणां भिन्नसन्धाने भिषजां सान्निपातिके । कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा स्वस्थे को वा न पण्डितः ॥१३८॥” अयुक्तके युक्त करनेमें मन्त्रियोंकी सन्निपातके कर्म ( व्यापार ) में वैद्योंकी बुद्धि देखी जातीहै स्वस्थतामें कौन पंडित नहीं होताहै ॥ १३८ ॥ दमनकोऽपि तं प्रणम्य सञ्जीवकसकाशं प्रस्थितः सहर्षमचि- न्तयत् । "अहो ! प्रसादसन्मुखो नः स्वामी वचनवशगश्च संवृ- त्तस्तन्नास्ति धन्यतरो मम । उक्तञ्च- दमनकभी उसको प्रणाम कर संजीवकके समीप गया, और प्रसन्नतासे विचारने लगा “अहो इस समय स्वामी हमपर प्रसन्न है वचनके वशीभूत है सो इस समय मुझसे अधिक धन्य और कौनहै। कहाभी है- अमृतं शिशिरे वह्निरमृतं प्रियदर्शनम् । अमृतं राजसम्मानममृतं क्षीरभोजनम् ॥ १३९॥ जाड़ेमें अग्नि अमृत है, प्रियदर्शन अमृत है, राजसन्मान अमृत है, तथा क्षीर भोजन अमृत है ॥ १३९ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ४५ ) अथ सञ्जीवकसकाशमासाद्य सप्रश्रयमुवाच-“भो मित्र ! प्रार्थितोऽसौ मया भवदर्थे स्वाम्यभयप्रदानम् । तद्विश्रब्ध मा- गम्यतामिति। परं त्वया राजप्रसादमासाद्य मया सह समय- धर्मेण वर्त्तितव्यम् । न गर्वमासाद्य स्वप्रभुतया विचरणीयम् । अहमपि तव संकेतेन सर्वां राज्यधुरममात्यपदवीमाश्रित्य उद्धरिष्यामि। एवं कृते द्वयोरपि आवयोः राज्यलक्ष्मीर्भोग्या भविष्यति । यतः- सञ्जीवकके निकट जाकर नम्रतापूर्वक यह वचन बोला-“हे मित्र ! आपके निमित्त मैंने स्वामीसे अभयदानके लिये प्रार्थना की । सो नि शक होकर चलो परन्तु तुमको राजाका प्रसाद प्राप्त कर, मेरे साथ नियमक्रमसे बर्तना चाहिये, गर्वको प्राप्त होकर अपनी प्रभुतासे न विचरना और मैंभी तुम्हारे संकेतसे सम्पूर्ण राज्यभार अमात्यपदवीको प्राप्त कर धारण करूंगा ऐसा करनेसेही हम दोनोको राज्यलक्ष्मी भोग्य होगी । कारण- आखेटकस्य धर्मेण विभवाः स्युर्वशे नृणाम् । नृप्रजाः प्रेरयत्येको हन्त्यन्योऽत्र मृगानिव ॥ १४० ॥ आखेटके धर्मसे ऐश्वर्य मनुष्योके वशीभूत होजाते हैं, एक मनुष्यरूपी प्रजा- ओको प्रेषण करता है और दूसरा इस संसारमें मृगोंकी समान कार्यसिद्धि करता है ॥ १४० ॥ तथाच- और देखो- यो न पूजयते गर्वादुत्तमाधममध्यमान् । भूपसम्मानमान्योऽपि भ्रश्यते दन्तिलो यथा ॥ १४१ ॥” जो गर्वसे उत्तम, अधम, मध्यमका सन्मान नहीं करता है, वह राजासे सन्मान मान्यताको प्राप्त होकरभी दन्तिलके समान भ्रष्ट होता है ॥ १४१ ॥” सञ्जीवक आह-“कथमेतत् ? ” सोऽब्रवीत- सञ्जीवक बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला-
(४६) पञ्चतन्त्रम् ।
(४६) पञ्चतन्त्रम् । कथा ३. अस्त्यत्र धरातले वर्द्धमानं नाम नगरम् । तत्र दन्तिलो नाम नानाभाण्डपतिः सकलपुरनायकः प्रतिवसतिस्म । तेन पुरकार्य्यं नृपकार्य्यञ्च कुर्व्वता तुष्टिं नीताः तत्पुरवासिनो लोका नृपतिश्च । किं बहुना । न कोऽपि तादृक् केनापि चतुरो दृष्टो न अपि श्रुतो वेति । अथवा साधु चेदमुच्यते- इस धरातलमें वर्द्धमान नाम नगर है उसमे दन्तिल नामवाला बहुत धनपति (सेठ) सब पुरका नायक रहताथा । उसने पुरकार्य और राजकार्य करके उस पुरके रहनेवाले लोक और राजाको प्रसन्न किया कोईभी उसके समान चतुर किसीने न देखा न सुना; अथवा यह सत्य कहा है कि- नरपतिहितकर्त्ता द्वेष्यतां याति लोके जनपदहितकर्त्ता त्यज्यते पार्थिवेन्द्रैः । इति महति विरोधे वर्त्तमाने समाने नृपतिजनपदानां दुर्लभः कार्य्यकर्त्ता ॥ १४२ ॥ राजाका हितकर्ता लोकमें द्वेषताको प्राप्त होता है, देशका हित करनेवाला राजोंसे त्यागा जाता है, इस प्रकार बडे विरोधके वर्तमान होनेमें राजा और प्रजाका कार्य साधक दुर्लभ है ॥ १४२ ॥ अथ एवं गच्छति काले दन्तिलस्य कदाचिद्विवाहः सम्प्र- वृत्तः । तत्र तेन सर्वे पुरनिवासिनो राजसन्निधिलोकाश्च सम्मानपुरःसरमामन्त्र्य भोजिता वस्त्रादिभिः सत्कृताश्च । ततो विवाहानन्तरं राजा सान्तःपुरः स्वगृहंमानीय अभ्य- र्च्चितः । अथ तस्य नृपतेः गृहसम्मार्जनकर्त्ता गोरम्भो नाम राजसेवको गृहायातोऽपि तेन अनुचितस्थाने उपविष्टोऽवज्ञया अर्द्धचन्द्रं दत्त्वा निःसारितः । सोऽपि ततःप्रभृति निःश्वसन् अपमानात् न रात्रौ अपि अधिशेते । 'कथं मया तस्य भाण्ड- पतेः राजप्रसादहानिः कर्त्तव्या' इति चिन्तयन् आस्ते । 'अथवा किमनेन वृथा शरीरशोषणेन । न किञ्चित् मया तस्य अपकर्तुं शक्यमिति । अथवा साधु इदमुच्यते-
भाषाटीकासमेतम् । (४७) इस प्रकार समयके बीतनेपर एक समय दन्तिलका विवाह हुआ। वहा उसने सब नगरके रहनेवाले तथा राजसमीपी लोक बहुत सन्मानसे निमन्त्रण कर बुलाय भोजन कराय वस्त्रादिसे सत्कार किये। तब विवाहके उपरान्त रनवाससहित राजाकोभी अपने घरमे बुलाकर सत्कार किया। उस राजाके घरकी बुहारी देनेवाले गोरम्भ नाम राजसेवकको घर आनेपरभी अनुचित स्थानमे बैठनेके कारण गलहस्त देकर निकाल दिया। वहभी उस दिनसे लेकर निश्वास लेता हुआ अपमानके कारण रात्रिकोभी नहीं सोता था। 'किस प्रकारमै इस भाडप- तिकी राजप्रसाद हानि करू' यही विचार करता रहता। 'अथवा वृथा इस शरीरके शुष्ककरनेसे क्याहै। मैं कुछभी उसका अपकार नहीं करसकता। अथवा किसीने सत्य कहाहै- यो ह्यपकर्तुमशक्तः कुप्यति किमसो नरोऽत्र निर्लज्जः । उत्पतितोऽपि हि चणकः शक्तः किं भ्राष्ट्रकं भङ्क्तुम् ॥१४३॥ जो किसीका कुछ अपकार नहीं कर सकता वह निर्लज्ज वृथा क्यों क्रोध करताहै, कूदकरभी क्या चना भाडको फोड सकताहै ॥ १४३ ॥ अथ कदाचित्प्रत्यूषे योगनिद्रां गतस्य राज्ञः शय्यान्ते मा- र्जनं कुर्वन् इदमाह-"अहो ! दन्तिलस्य महद्दृत्तत्वं यत् राज- महिषीमालिङ्गति" तच्छ्रुत्वा राजा ससम्भ्रममुत्थाय तमुवाच- "भो ! भो ! गोरम्भ ! सत्यमेतत् यत् त्वया जल्पितं किं देवी दन्तिलेन समालिंगाता ? इति" । गोरम्भः प्राह- "देव ! रा- त्रिजागरणेन द्यूतासक्तस्य मे बलात् निद्रा समायाता । तन्न वेद्मि किं मया अभिहितम्" । राजा-(सेर्ष्य स्वगतम् ) "एष तावदस्मद्गृहे अप्रतिहतगतिः तथा दन्तिलोऽपि । तत्कदाचित् अनेन देवी समालिंग्यमाना दृष्टा भविष्यति । तेन इदमभिहितम् । उक्तञ्च- एकसमय प्रातःकाल जब कि, राजा उघानींदमें था उनकी सेजके निकट बुहारी देता हुआ यों बोला-"आश्चर्यहै दन्तिलका ऐसा घमण्डहै कि, राजम- हिषीको आलिंगन करताहै"। यह सुन राजा घबडाता हुआ उठकर उससे बोला-"भोभो गोरम्भ ! यह सत्य है क्या जो तैने कहा, क्या देवीको दन्तिलने
( ४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४८ ) पञ्चतन्त्रम् । आलिंगन किया है ? '' । गोरम्भ बोला- “ देव ! रात्रिमें द्यूत खेलनेके कारण जागरण करनेसे मुझे बहुत निद्रा होरहीहै, सो मुझे विदित नहीं कि, मैंने क्या कहा”। राजाने ( ईर्ष्यासे मनमें ) कहा-“यह हमारे घरमें बेरोकटोक आने- वाला है और दन्तिलभी, सो इसने कभी देवी आलिङ्गित होती देखी होगी, इसकारण यह कहता है । कहाहै- यद्वाञ्छति दिवा मर्त्यो वीक्षते वा करोति वा । तत्स्वप्नेऽपि तदभ्यासाद् ब्रूते वाथ करोति वा ॥ १४४ ॥ जो मनुष्य दिनमें इच्छा करता, देखता वा करताहै उसके अभ्याससे वह स्वप्नमेंभी वही बोलता या करताहै ॥ १४४ ॥ तथाच- औरभी- शुभं वा यदि वा पापं यन्नृणां हृदि संस्थितम् । सुगूढमपि तज्ज्ञेयं स्वप्नवाक्यात्तथा मदात् ॥ १४५ ॥ अच्छा या बुरा जो मनुष्योके हृदयमें स्थितहे वह स्वप्नवाक्यसे अथवा मदसे गुप्त बातभी विदित होजाती है ॥ १४५ ॥ अथवा स्त्रीणां विषये कोऽत्र सन्देहः ? अथवा स्त्रियोंके विषयमें क्या सन्देह है ? जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं साविभ्रमाः । हृद्गतं चिन्तयन्त्यन्यं प्रियः को नाम योषिताम् ॥ १४६ ॥ किसीके साथ बोलतीहैं, किसीको विलासपूर्वक देखतीहैं, हृदयमें प्राप्तहुए अन्यको विचार करतीहैं कहो, स्त्रियोंको कौन प्याराहै ॥ १४६ ॥ अन्यच्च- औरभी- एकेन स्मितपाटलाधररुचो जल्पन्त्यनल्पाक्षरं वीक्षन्तेऽन्यमितः स्फुटत्कुमुदिनीफुल्लोल्लसल्लोचनाः । दूरोदारचरित्रचित्रविभवं ध्यायन्ति चान्यं धिया केनेत्थं परमार्थतोऽर्थवदिव प्रेमास्ति वाम भ्रुवाम् ॥ १४७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ४९ ) स्मित लाल अधरकी कान्तिवाली किसीके साथ थोडा बोलती है, स्फुरित खिली कुमुदिनीकी समान किसीको देखती हैं, विचित्र चारित्रवाले विविध सम्प- त्तिमान् अन्य पुरुषको बुद्धिसे ध्यान करती हैं, स्त्रियोंका यथार्थ और सत्य प्रेम किसके साथ है ? किसीके नहीं. (शार्दूल विक्रीडित छन्द) ॥ १४७ ॥ तथाच- तैसाही- नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ १४८ ॥ अग्नि काष्ठोंसे, सागर नदियोंसे, काल सब प्राणियोंसे, और स्त्री पुरुषोंसे तृप्त नहीं होती हैं ॥ १४८ ॥ रहो नास्ति क्षणो नास्ति नास्ति प्रार्थयिता नरः । तेन नारद नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥ १४९ ॥ एकान्त नहीं है, अवकाश नहीं है, प्रार्थना करनेवाला मनुष्य नहीं है, हे नारद ! इसी कारण स्त्रियोंका सतीत्व रहताहै ॥ १४९ ॥ यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मम कामिनी । स तस्या वशगो नित्यं भवेत्क्रीडाशकुन्तवत् ॥ १५० ॥ जो मनुष्य मूर्ख अज्ञानसे यह जानता है कि, यह स्त्री मुझसे अनुरक्त है, वह मनुष्य उसके वशीभूत होकर क्रीडाका पक्षीसा होजाताहै ॥ १५० ॥ तासां वाक्यानि कृत्यानि स्वल्पानि सुगुरूण्यपि । करोति यः कृती लोके लघुत्वं याति सर्वतः ॥ १५१ ॥ जो कृती पुरुष स्त्रियोंके छोटे बडे, थोडे या बहुत वाक्योंकोभी करताहै वह सब प्रकारसे लघुताको प्राप्त होता है ॥ १५१ ॥ स्त्रियश्च यः प्रार्थयते सन्निकर्षञ्च गच्छति । ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः ॥ १५२ ॥ जो स्त्रीकी प्रार्थना करता है और उनके निकट जाताहै और थोडीभी सेवा करता है स्त्री उसीकी इच्छा करती हैं ॥ १५२ ॥ अनर्थित्वान्मनुष्याणां भयात्परिजनस्य च । मर्याद्दायाममर्याद्दाः स्त्रियस्तिष्ठन्ति सर्वदा ॥ १५३ ॥ ४
( ५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ५० ) पञ्चतन्त्रम् । मनुष्योंके न चाहनेसे, परिजनोंके भयसे, मर्यादा रहित स्त्रियें सदा मर्यादामें रहती हैं ॥ १५३ ॥ नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासाञ्च वयसि स्थितिः । विरूपं रूपवन्तं वा पुमानित्येव भुज्यते ॥ १५४ ॥ इनको कोई अगम्य नहीं, न इनमें कुछ अवस्थाकी स्थिति है ( यह बूढ़ा है या तरुण ) विरूप या रूपवान् है, केवल पुरुषमात्रको भोगती हैं ॥ १५४ ॥ रक्तो हि जायते भोग्यो नारीणां शाटको यथा । घृष्यते यो दशालम्बी नितम्बे विनिवेशितः ॥ १५५ ॥ रक्त ( प्रेमी वा लाल ) पुरुष शाटी ( धोती ) की समान स्त्रियोंको भोग्य होता है जो उत्कृष्ट दशामें प्राप्त हो अवलंबिन होता है अथवा जो वस्त्र नित- म्बमें आरोपण किया घर्षणको प्राप्त होता है ॥ १५५ ॥ अलक्तको यथा रक्तो निष्पीड्य पुरुषस्तथा । अबलाभिर्बलाद्रक्तः पादमूले निपात्यते ॥ १५६ ॥ ” स्त्रियें जैसे लाखका रंग वलसे पीडन कर चरणोंमें लगाती हैं इसी प्रकार रक्त ( अनुरागी ) पुरुषको चरणोंमें डालती हैं ॥ १५६ ॥ ” एवं स राजा बहुविधं विलप्य तत्प्रभृति दन्तिलस्य प्र- सादपराङ्मुखः सञ्जातः । किं बहुना राजद्वारप्रवेशोऽपि तस्य निवारितः । दन्तिलोऽपि अकस्मादेव प्रसादपराङ्मुख- मवनिपतिमवलोक्य चिन्तयामास । इस प्रकार राजा अनेक परितापकर उसी दिनसे दन्तिलसे विगत अनुराग- वाला हुआ । बहुत क्या राजद्वारमें उसका प्रवेश निवारित हुआ, दन्तिलभी अकस्मात् रुष्टराजाको देखकर विचारने लगा । “ अहो ! साधु चेदमुच्यते- "अहो ( आश्चर्य है ) किसीने सत्य कहा है- कोऽर्थान् प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तङ्गताः स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः । कः कालस्य न गोचरान्तरगतः कोऽर्थी गतो गौरवं को वा दुर्जनवागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पुमान् ॥ १५७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ५१ ) धनको प्राप्त होकर कौन गर्वित न हुआ२ किस विषयी पुरुषकी आपत्ति नाश हुई है ? पृथ्वीमें स्त्रियोंसे किसका मन खण्डित नहीं हुआ ? राजाका प्यारा कौनहै २ कालके गोचर कौन नहीं हुआ २ कौन मांगनेवाला गौरवको प्राप्त हुआहै ? और कौन पुरुष दुर्जनोंकी गोष्ठीमे बैठकर कुशलताको प्राप्त हुआहै ? कोई नहीं ॥ १९७ ॥ तथा च- और भी कहाहै- काके शौचं द्यूतकारे च सत्यं सर्पे क्षान्तिः स्त्रीषु कामोपशान्तिः । क्लीबे धैर्यं मद्यपे तत्त्वचिन्ता राजा मित्रं केन दृष्टं श्रुतं वा ॥ १९८ ॥ कौएमें पवित्रता, जुएमे सत्य, सर्पमें सहनशीलता, स्त्रियोंमें कामशान्ति, नपुंसकमे धैर्य, मद्यपमें तत्त्वचिन्ता, और राजा मित्र किसने देखा वा सुना है २ ॥ १९८ ॥ अपरं मया अस्य भूपतेरथवा अन्यस्यापि कस्यचित राजसम्बन्धिनः स्वप्नेऽपि न अनिष्टं कृतम् । तत्किमेतत् परा- ङ्मुखो मां प्रति भूपतिः” इति । एवं तं दन्तिलं कदाचित् राजद्वारे विस्तम्भितं विलोक्य सम्मार्जनकर्त्ता गोरम्भो विहस्य द्वारपालानिदमूचे-“भो भो द्वारपालाः ! राजप्रसा- दाधिष्ठितोऽयं दन्तिलः स्वयं निग्रहानुग्रहकर्त्ता च । तदनेन निवारितेन यथा अहं तथा यूयमपि अर्द्धचन्द्रभाजिनो भवि- ष्यथ” । तच्छ्रुत्वा दन्तिलश्चिन्तयामास । “नूनमिदमस्य गोरम्भस्य चेष्टितम् । अथवा साध्विदमुच्यते- मैंने इस राजाका तथा अन्य किसी राजसम्बन्धीका स्वप्नमेंभी अनिष्ट नहीं किया सो यह क्या है जो राजा मुझसे विरुद्ध है” । इस प्रकार उस दन्तिलको कभी राज द्वारमें स्तम्भित देखकर सम्मार्जनकर्ता वह गोरम्भ हँसकर द्वारपालसे बोला-“हे द्वारपाल ! राजप्रसादमें प्राप्त हुआ यह दन्तिल स्वयं निग्रह और अनुग्रहका कर्ता है, सो इसके निवारण करनेसे जैसे मैं इसी प्रकारसे तुमभी
( ५२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ५२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अर्धचन्द्र (गलहस्त) भागी होंगे" यह सुनकर दन्तिल विचारने लगा-"यह अवश्यही इस गोरम्भकी चेष्टा है। अथवा ठीक कहा है कि- अकुलीनोऽपि मूर्खोऽपि भूपालं योऽत्र सेवते । अपि सम्मानहीनोऽपि स सर्वत्र प्रपूज्यते ॥ १५९ ॥ चाहें कुलीन या मूर्ख कोईभी राजाकी सेवा करता हो सम्मानसे हीनभी वह सर्वत्र पूजित होता है ॥ १५९ ॥ अपि कापुरुषो भीरुः स्याच्चेन्नृपतिसेवकः। तथापि न पराभूतिं जनादाप्नोति मानवः ॥ १६० ॥" चाहें कापुरुष डरपोक भी राजाका सेवक हो तो वह किसीसे पराभवको प्राप्त नहीं होताहै ॥ १६० ॥" एवं स बहुविधं विलप्य विलक्षमनाः सोद्वेगो गतप्रभावः स्वगृहं गत्वा निशामुखे गोरम्भमाहूय वस्त्रयुगलेन सम्मान्य इदमुवाच-"भद्र ! मया न तदा त्वं रागवशात् निःसा- रितः । यतस्त्वं ब्राह्मणानामग्रतोऽनुचितस्थाने समुपविष्टो दृष्ट इति अपमानितः । तत् क्षम्यताम्" । सोऽपि स्वर्गरा- ज्योपमं तद्वस्त्रयुगलमासाद्य परं परितोषं गत्वा तमुवाच- "भोः श्रेष्ठिन् ! क्षान्तं मया ते तत् । तदस्य सम्मानस्य कृते पश्य मे बुद्धिप्रभावं राजप्रसादञ्च" । एवमुक्त्वा सपरितोषं निष्क्रान्तः । साधु चेदमुच्यते- इसप्रकार अनेकविध तापित होकर लज्जितमन और उद्वेगसे प्रभावहीन वह (दन्तिल) घर जाकर रात्रिमें गोरम्भको बुलाय दो वस्त्रोंसे सम्मानकर यह बोला- "भद्र ! मैंने उससमय तुझको क्रोधवशसे नहीं निकाला था । परन्तु जो कि, तू ब्राह्मणोंके आगे अनुचित स्थानपर बैठा देखागया इससे तिरस्कृत किया सो क्षमाकरो" । वह स्वर्गराज्यकी समान वस्त्रद्वयको प्राप्तहो परमसन्तुष्टतासे उससे बोला,-"भो श्रेष्ठ ! मैंने वह सब शान्त किया । सो इस सन्मानके करनेसे मेरे बुद्धिप्रभाव और राजप्रसादको देखो" यह कह सन्तुष्टतासे चला गया । यह अच्छाही कहा है- "स्तोकेनोन्नतिमायाति स्तोकेनायात्यधोगतिम् । अहो सुसदृशी चेष्टा तुलायष्टेः खलस्य च ॥ १६१ ॥"
भाषाटीकासमेतम् । ( ५३ ) “थोडेसेही ऊपरको चलाजाताहै, थोडेसेही नीचेको जाताहै, तराजू और दुष्टकी एकहीसी चेष्टाहै ॥ १६१ ॥” ततश्च अन्येद्युः स गोरम्भो राजकुले गत्वा योगनिद्रां गतस्य भूपतेः सम्मार्जनक्रियां कुर्वन् इदमह-“अहोऽविवे- कोऽस्मद्भूपतेः यत् पुरीषोत्सर्गमाचरन् चिर्भटीभक्षणं करोति” तच्छ्रुत्वा राजा सविस्मयं तमुवाच-“रेरे गोरम्भ ! किमप्र- स्तुतं लपसि ! । गृहकर्मकरं मत्वा त्वां न व्यापादयामि। किं त्वया कदाचिदहमेवंविधं कर्म समाचरन् दृष्टः?” सोऽब्रवीत्- “देव! द्यूतासक्तस्य रात्रिजागरणेन सम्मार्जनं कुर्वाणस्य मम बलात् निद्रा समायाता । तथा अधिष्ठितेन मया किञ्चिज्ज- ल्पितम्, तन्न वेद्मि, तत्प्रसादं करोतु स्वामी निद्रापरवशस्ये- ति”।एवं श्रुत्वा राजा चिन्तितवान् “यन्मया जन्मान्तरे पुरी- षोत्सर्ग कुर्वता कदापि चिर्भटिका न भक्षिता । तत् यथा अयं व्यतिकरो असम्भाव्यो मम अनेन मूढेन व्याहृतः तथा दन्तिलस्य अपि इति निश्चयः । तन्मया न युक्तं कृतं यत् स वराकः सम्मानेन वियोजितः न तादृकपुरुषाणामेवंविधं चेष्टितं सम्भाव्यते । तदभावेन राजकृत्यानि पौरकृत्यानि च सर्वाणि शिथिलतां व्रजन्ति”। एवमनेकधा विमृश्य दन्तिलं समाहूय निजाङ्गवस्त्राभरणादिभिः संयोज्य स्वाधिकारे नियोजयामास। अतोऽहं ब्रवीमि-“यो न पूजयते गर्वात्” इति सो दूसरे दिन गोरम्भ राजकुलमें जाकर राजाकी सम्मर्जन क्रिया करता हुआ यह बोला कि-“इस हमारे राजाकी कैसी अज्ञानताहै जो पुरीष उत्सर्ग (मल- त्याग) करनेमे चिर्भटी (काकडी) भक्षण करताहै” यह सुन राजा विस्मितहो बोला,-“रे गोरम्भ ! क्या अनहोनी बात कहताहै, घरके कर्म करनेवाला जान- कर तुझको नहीं मारताहू, क्या कभी इस प्रकारके कर्म करते तैंने मुझे देखा ?” वह बोला-“स्वामिन् ! जुए खेलनेके कारण रात्रिमें जागनेसे समार्जन करते २ १-ककडी ।
बड़से मुझे निद्रा आगई, सो निद्रित होनेके कारण कुछ मेरे मुखसे निकल गया, सो मुझे विदित नहीं, सो मुझ निद्रापरवशके ऊपर आप प्रसन्न हूजिये" यह सुनकर राजाने विचार किया कि, “मैने तो जन्मान्तरमें भी मलत्याग करते कभी चिर्भटी नहीं खाई, जिस कारण यह सम्बन्ध नहीं होनेवालाभी इस मूर्खने कहा इसी प्रकार दन्तिलकाभी (असत्य है) यह निश्चय है। सो मैने यह अच्छा नहीं किया जो वृथा उस बिचारेको सन्मानसे बहिष्कृत किया, इस सरीखे पुरुषोंकी कभी ऐसी चेष्टा नहीं होसकती है, उसके बिना सब राजकाज और पुरके कार्य शिथिल पड़े हैं" इस प्रकार अनेक विचार कर दन्तिलको बुलाय अपने अंगके वस्त्र आभरण आदिसे उसको सत्कृत कर निज अधिकारमें नियुक्त किया। इससे मै कहताहूं “जो गर्वसे नहीं पूजता है”-इत्यादि । सञ्जीवक आह-“भद्र ! एवमेवैतत् । यद्भवता अभिहितं तदेव मया कर्त्तव्यमिति” । एवमभिहिते दमनकस्तमादाय पिंगलकसकाशमगमत् । आह च-“देव ! एष मया आनीतः स सञ्जीवकः । अधुना देवः प्रमाणम्” । सञ्जीवकोऽपि तं सादरं प्रणम्य अग्रतः सविनयं स्थितः । पिंगलकोऽपि तस्य पीनायत ककुद्मतो नखकुलिशालंकृतं दक्षिणपाणिमुपरि दत्त्वा मानपुरःसरमुवाच ।"अपि शिवंभवतः? कुतस्त्वमस्मि- न्वने विजने समायातोऽसि?” तेनापि आत्मवृत्तान्तः कथितः। यथा वर्द्धमानेन सह वियोगः सञ्जातस्तथा सर्वं निवेदितम् । तच्छ्रुत्वा पिंगलकः सादरतरं तमुवाच-“ वयस्य ! न भेत- व्यम्, मद्भुजपञ्जरपरिरक्षितेन यथेच्छं त्वया अधुना वर्त्तितव्यम् अन्यच्च नित्यं मत्समीपवर्त्तिना भाव्यं यतः कारणाद्बह्वपायं रौद्रसत्त्वनिषेवितं वनं गुरूणामपि सत्त्वानामसेव्यं कुतः शष्पभोजिनाम्” । एवमुक्त्वा सकलमृगपरिवृतो यमुना कच्छ- मवतीर्य्य उदकग्रहणं कृत्वा स्वेच्छया तदेव वनं प्रविष्टः । ततश्च करटकदमनकनिक्षिप्तराज्यभारः सञ्जीवकेन सह सुभाषितगोष्ठीमनुभवन्नास्ते ।
भाषाटीकासमेतम् । ( ५५ ) संजीवक बोला—"यह ऐसाही है जैसा तुमने कहा है वही मैं करूंगा"। यह कहनेपर दमनक उसको ले पिंगलकके समीप गया और बोला—"देव ! यह मैं संजीवकको लायाहू, अब स्वामीही प्रमाण है"। संजीवकभी उसको सादर प्रणाम कर विनयपूर्वक आगे बैठगया और पिंगलकभी उसके पुष्ट और बडे कंधे- पर नखरूपी बज्रसे अलंकृत दहिना हाथ ऊपर रख आदरसे बोला—"आप कुशलहैं ? इस निर्जनवनमे कहासे आये ?" उसनेभी अपना वृत्तान्त कहा जैसे वर्द्धमानके संगवियोग हुआ वहभी सब कहा। यह सुन पिंगलक आदरपूर्वक उससे बोला—"मित्र मेरे भुजपंजरसे रक्षित होकर कहीं मत डरो, अब तुम यथेच्छ ( स्वच्छन्द ) रहो और नित्य हमारे समीपमें आओ जिस कारणसे कि, बहुतसे दुःखवाले भयकर जीवोसे सेवित यह वन बडे २ प्राणियोको भी असेव्यहै, फिर घास खानेवालोको तो क्या"। यह कह सब मृगोके सहित यमुनाके किनारेपर आय जलपान कर स्वेच्छासे उस वनमें प्रविष्ट हुआ। तब करटक दमनकपर राज्यभार सौंप संजीवकके साथ सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभव करता रहने लगा । अथवा साध्विदमुच्यते— अथवा यह सत्य कहा है— यदृच्छयाप्युपनतं सकृत्सज्जनसङ्गतम् । भवत्यजरमत्यन्तं नाभ्यासक्रममीक्षते ॥ १६२ ॥ अकस्मात् महान् उपस्थित हुआ सज्जनका संग अक्षय फलवाला होता है, वह बारवार अभ्यासके क्रमकी अपेक्षा नहीं करता है ( एकही बारमें बहुत उपकार होता है ) ॥ १६२ ॥ सञ्जीवकेनापि अनेकशास्त्रावगाहनात् उत्पन्नबुद्धिप्राग- ल्भ्येन स्तोकैरेवाहोभिर्मूढमतिः पिंगलको धीमान् तथा कृतो यथारण्यधर्माद्वियोज्य ग्राम्यधर्मेषु नियोजितः । किं बहुना प्रत्यहं पिंगलकसञ्जीवकावेव केवलं रहसि मन्त्रयतः । शेषः सर्वोऽपि मृगजनो दूरीभूतस्तिष्ठति । करटकदमनका- वपि प्रवेशं न लभेते । अन्यच्च सिंहपराक्रमाभावात्सर्वोऽपि मृगजनस्तौ च शृगालौ क्षुधाव्याधिबाधिता एकां दिशमा- श्रित्य स्थिताः। उक्तञ्च—
( ५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ५६ ) पञ्चतन्त्रम् । सञ्जीवकके साथ अनेक शास्त्रके अवगाहनसे बुद्धिकी प्रगल्भता अधिक होनेके कारण थोडेही दिनोंमें उसने मूढमति पिंगलक इस प्रकार बुद्धिमान् कर दिया कि, वनके धर्मोंसे पृथक् कर ग्राम्य धर्ममें लगादिया । बहुत कहनेसे क्या प्रतिदिन संजीवक और पिंगलकही केवल एकान्तमें सम्मति करते, शेष सम्पूर्ण मृगजन दूरस्थित रहते, करटक दमनकको भी प्रवेश न मिलता । और सिंहके पराक्रम न करनेके कारण सम्पूर्ण मृग और वे दोनों शृगाल क्षुधारूप रोगसे व्यथित हुए एक दिशामें आश्रित हो स्थितहुए । कहा है- फलहीनं नृपं भृत्याः कुलीनमपि चोन्नतम् । सन्त्यज्यान्यत्र गच्छन्ति शुष्कं वृक्षमिवान्डजाः ॥ १६३ ॥ भृत्यजन फलहीन कुलीन और उन्नत राजाकोभी छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, जैसे शुष्क वृक्षको पक्षी ॥ १६३ ॥ तथाच- तैसेही- अपि सम्मानसंयुक्ताः कुलीना भक्तितत्पराः । वृत्तिभंगान्महीपालं त्यजन्त्येव हि सेवकाः ॥ १६४ ॥ सन्मानसेभी संयुक्त कुलीन भक्तिमे तत्पर सेवकभी आजीविका न मिलनेसे स्वामीको त्याग देते हैं ॥ १६४ ॥ अन्यच्च- औरभी- कालातिक्रमणं वृत्तेर्यो न कुर्वीत भूपतिः । कदाचित्तं न मुञ्चन्ति भर्त्सिता अपि सेवकाः ॥ १६५ ॥ जो राजा मासिक देनेका कालातिक्रम नहीं करता है उसको धुड़कनेसेभी सेवक कभी नहीं त्यागते हैं ॥ १६५ ॥ तथा न केवलं सेवका इत्थम्भूता यावत् समस्तमपि एत- ज्जगत् परस्परं भक्षणार्थं सामादिभिरुपायैस्तिष्ठति । तद्यथा- इस प्रकारसे सेवक सम्पूर्ण जगत्को परस्पर भक्षणके निमित्त सामादि उप- योंसे स्थित रहते हैं । सो ऐसे कि-
भाषाटीकासमेतम् । ( ५७ ) देशानामुपरि क्ष्माभृदातुराणां चिकित्सकाः । वणिजो ग्राहकाणां च मूर्खाणामपि पण्डिताः ॥ १६६ ॥ देशोपर राजा, रोगियोंको वैद्य, ग्राहकोको वणिक्, मूर्खोंको पण्डित॥ १६६॥ प्रमादिनां तथा चौरा भिक्षुका गृहमेधिनाम् । गणिकाः कामिनाञ्चैव सर्वलोकस्य शिल्पिनः ॥ १६७ ॥ असावधानोको चोर, गृहस्थियोको फकीर, कामियोंको गणिका, और सब लोकको शिल्पी ॥ १६७ ॥ सामादिसजितैः पाशैः प्रतीक्षन्ते दिवानिशम् । उपजीवन्ति शक्त्या हि जलजा जलदानिव ॥ १६८ ॥ साम दानादि द्वारा लगाये पाशोंसे रात दिन देखते रहते हैं जैसे व्रीहि आदि मेघोंकी ( प्रतीक्षा करते हैं ) इस प्रकार सब उनकी शक्तिसे जीते हैं॥१६८ अथवा साध्विदमुच्यते- अथवा यह अच्छा कहा है- सर्पाणाञ्च खलानाञ्च परद्रव्यापहारिणाम् । अभिप्राया न सिध्यन्ति तेनेदं वर्त्तते जगत् ॥ १६९ ॥ सर्प और पराये द्रव्य हरनेवाले दुष्टोंके अभिप्राय नहीं सिद्ध होते इसी कार- णसे यह जगत् रक्षाको प्राप्त है ॥ १६९ ॥ अत्तुं वाञ्छति शाम्भवो गणपतेराखुं क्षुधार्त्तः फणी तं च क्रौञ्चरिपोः शिखी गिरिसुतासिंहोऽपि नागाशनम् । इत्थं यत्र परिग्रहस्य घटना शम्भोरपि स्याद्गृहे तत्रान्यस्य कथं न भावि जगतोयस्मात्स्वरूपं हितत् १७०॥ ( देखो ) शिवजीका सर्प क्षुधित होकर गणेशजीके मूषकको खानेकी इच्छा करता है, उसको कार्तिकेयका मोर और मोरको गिरिजाका वाहन सिंह खानेकी इच्छा करता है, इसप्रकार शिवके घरमेभी परस्पर आक्रमणकी घटना है, तो दूसरेके घरमे क्यो न होगी, कारण कि, परस्पर उपजीविकावाला जगत्का स्वरूप ही है ॥ १७० ॥ ततः स्वामिप्रसादरहितौ क्षुत्क्षामकण्ठौ परस्परं करटक- दमनकौ मन्त्रयेते । तत्र दमनको ब्रूते-"आर्य्य करटक !
आवां तावदप्रधानतां गतौ। एष पिंगलकः सञ्जीवकानुरक्तः स्वव्यापारपराङ्मुखः सञ्जातः । सर्वोऽपि परिजनो गतः। तत्किं क्रियते" । करटक आह--“यद्यपि त्वदीव्यवचनं न करोति तथापि स्वामी स्वदोषनाशाय वाच्यः । उक्तञ्च-- सो स्वामीके प्रसादसे रहित भूखसे दुर्बल करटक और दमनक सम्मति करने लगे । दमनक बोला--“आर्य्य करटक ! हम तो अब अप्रधानताको प्राप्तहुए और यह पिंगलक संजीवकमें अनुरक्त होकर अपने कार्यसे विमुख हुआ । सब परिजन चलेगये अब क्या करें” । करटक बोला--“यद्यपि आपके वचन नहीं मानता तथापि अपने दोष नाशके लिये स्वामीसे कहना उचितहै । कहाहै कि-- अशृण्वन्नपि बोद्धव्यो मंत्रिभिः पृथिवीपतिः । यथा स्वदोषनाशाय विदुरेणाम्बिकासुतः ॥ १७१ ॥ मंत्रियोंको राजा न सुनतेहुएभी समझाना चाहिये जैसे विदुरने धृतराष्ट्र- को अपने दोष नाश करनेके लिये समझाया था ॥ १७१ ॥ तथाच-- और देखो-- मदोन्मत्तस्य भूपस्य कुञ्जरस्य च गच्छतः । उन्मार्गं वाच्यतां यान्ति महामात्राः समीपगाः ॥ १७२ ॥ मदोन्मत्त राजा और हाथीके उन्मार्ग जानेमें उनके समीपी और महावत वाच्यता ( निन्दा )को प्राप्त होते ह ॥ १७२ ॥ तत् त्वया एष शष्पभोजी स्वामिनः सकाशमानीतस्त- त्स्वहस्तेन अङ्गाराः कर्षिताः”। दमनक आह--“सत्यमेतत । ममायं दोषो स्वामिनः । उक्तञ्च- सो तैने यह घास खानेवाला स्वामीके निकट प्राप्त किया सो अपने हाथसे ही तैने अंगारा खेंचा”दमनक बोला--“यह सत्य है इसमे मेरा दोषहै स्वामीका नहीं । कहाहै-- जम्बूको हुडुयुद्धेन वयं चाषाढभूतिना । दूतिका परकार्य्येण त्रयो दोषाः स्वयंकृताः ॥ १७३ ॥” हुडु ( जीवविशेष ) से जम्बूक और आषाढभूतिसे हम दूसरेके कार्यसे दूती यह तीनों अपने दोषसे (दूषित हुए ) ॥ १७३ ॥'
करकट बोला- "यह कैसी कथा है ?" वह बोला-
भाषाटीकासमेतम् । ( ५९) करटक आह "कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्- करकट बोला- "यह कैसी कथा है ?" वह बोला- कथा ४. अस्ति कस्मिंश्चिद्विविक्तप्रदेशे मठायतनम् । तत्र देव- शर्मा नाम परिव्राजकः प्रतिवसति स्म । तस्य अनेक- साधुजनदत्तसूक्ष्मवस्त्रविक्रयवशात् कालेन महती वित्त- मात्रा सञ्जाता । ततः स न कस्यचिद्विश्वसिति । नक्त- न्दिनं कक्षान्तरात्तां मात्रां न मुञ्चति । अथवा साधु चे- दमुच्यते- एक किसी निर्जन स्थानमे मठस्थान है वहा देवशर्मा नामक सन्यासी रह- ताथा, उसके पास अनेक महात्मा पुरुषोके दिये सूक्ष्म वस्त्रोके बेचनेसे कुछ समयमें बहुतसा द्रव्य प्राप्त हुआ । तबसे वह किसीका विश्वास नहीं करता रातदिन बगलमेसे उस द्रव्यको नहीं छोडताथा । अथवा किसीने सत्य कहा है- अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानाञ्च रक्षणे । आये दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः ॥ १७४ ॥ अर्थोंके उत्पन्न करनेमें दुःख, अर्जन कियेकी रक्षा करनेमें दुःख, आनेमे दुःख, जानेमें दुःख कष्टके आश्रयवाले अर्थोंको धिक्कार है ॥ १७४ ॥ अथ आषाढभूतिर्नाम परवित्तापहारी धूर्त्तस्तामर्थमात्रां तस्य कक्षान्तरगतां लक्षयित्वा व्यचिन्तयत् । "कथं मया अस्य इयमर्थमात्रा हर्तव्येति । तदत्र मठे तावद्दृढशिला- सञ्चयवशात् भित्तिभेदो न भवति । उच्चैस्तरत्वाच्च द्वारे प्रवेशो न स्यात् । तदेनं मायावचनैर्विश्वास्य अहं छात्रतां व्रजामि येन स विश्वस्तः कदाचिद्विश्वासमेति । उक्तञ्च- उस समय आषाढभूतिनामक पराये धनका हरण करनेवाला धूर्त उस धनको उसकी बगलमें देखकर विचारने लगा- "किस प्रकार मैं यह इसकी धनमात्रा ग्रहण करू । और दृढ पत्थरके बने हुए इस मठमे कूमल नहीं लगसक्ता, ऊंचा अधिक होनेसे द्वारमें प्रवेशभी नहीं होसकता, सो इसको वचनोंसे विश्व-
(६०) पञ्चतन्त्रम् ।
(६०) पञ्चतन्त्रम् । देकर मैं इसका शिष्यबनूं, जिससे यह विश्वासको प्राप्तहुआ कदाचित् मेरे विश्वासमें आजाय । कहाहै- निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः । नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्फुटवक्ता न वञ्चकः ॥ १७५ ॥” निस्पृह अधिकारी नहीं होता, अकामी श्रृंगारप्रिय नहीं होता, मूर्ख कभी प्रिय नहीं बोलसकता, साफ कहनेवाला ठग नहीं होता ॥ १७५ ॥” एवं निश्चित्य तस्यान्तिकमुपगम्य “ॐनमः शिवायति” प्रोच्चार्य साष्टांगं प्रणम्य च सप्रश्रयमुवाच-“भगवन् ! अ- सारः संसारोऽयं, गिरिनदीवेगोपमं यौवनं, तृणाग्निसमं जी- वितम्, शरदभ्रच्छायासदृशा भोगाः, स्वप्नसदृशो मित्रपुत्र- कलत्रभृत्यवर्गसम्बन्धः । एवं मया सम्यक् परिज्ञातम् । तत् किं कुर्वतो मे संसारसमुद्रोत्तरणं भविष्यति”। तच्छ्रुत्वा देव- शर्मा सादरमाह- “वत्स ! धन्योऽसि यत्प्रथमे वयसि एवं विरक्तिभावः । उक्तञ्च- यह विचारकर उसके समीप जाय “ॐ नमः शिवाय” यह उच्चारणकर साष्टांग प्रणाम कर नम्रतासे बोला-“भगवन् ! यह असार संसार है, गिरिन- दीके वेगकी समान यौवन है, तृणकी अग्निकी समान जीवन है, शरदके मेघकी समान भोगहैं, स्वप्नकी समान मित्र, पुत्र, कलत्र (स्त्री) वर्गका सम्बन्धहै, यह मैंने भली प्रकार जान लिया सो क्या करनेसे मैं संसारसागरके पार हूंगा” यह सुन देवशर्मा आदरसे बोला-“हे पुत्र ! धन्य है जो पहली अवस्थामें ही तुझको यह विरक्तता उत्पन्न हुईहै । कहाहै- पूर्वे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मे मतिः । धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते ॥ १७६ ॥ जो प्रथम अवस्थामें शान्तहै वही शान्त है ऐसा मैं मानताहूं और धातुओंके क्षीण होनेमें कौन शान्त नहीं होताहै ॥ १७६ ॥ आदौ चित्ते ततः काये सतां सम्पद्यते जरा । असतान्तु पुनः काये नैव चित्ते कदाचन ॥ १७७ ॥ जरा सत्पुरुषोंके पहले चित्तमें, पीछे कायामें प्रवृत्त होतीहै, जरा अशान्तोंके शरीरमें प्राप्तहोकरभी चित्तमें नहीं होती ॥ १७७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ॰ ( ६१) , यच्च मां संसारसागरोत्तरणोपायं पृच्छसि तच्छ्रूयताम् । और जो मुझसे संसारसागरसे पार होनेका उपाय पूछताहै, तो सुन— शूद्रो वा यदि वान्योऽपि चण्डालोऽपि जटाधरः । दीक्षितः शिवमन्त्रेण स भस्माङ्गी शिवो भवेत् ॥ १७८ ॥ शूद्र अथवा कोई अन्य चाण्डाल वा जटाधारी कोईहो शिवमन्त्रस दीक्षित हो शरीरमें भस्म लगानेसे शिव होजाताहै ॥ १७८ ॥ षडक्षरेण मन्त्रेण पुष्पमेकमपि स्वयम् । लिंगस्य मूर्ध्नि यो दद्यान्न स भूयोऽभिजायते ॥ १७९ ॥ जो षडक्षरमंत्रसे एकभी फूल शिवलिंगपर चढाताहै उसका फिर जन्म नहीं होताहै ॥ १७९ ॥ तच्छ्रुत्वा आषाढभूतिस्तत्पादौ गृहीत्वा सप्रश्रयमिदमाह- "भगवन् ! तर्हि दीक्षया मे अनुग्रहं कुरु" । देवशर्मा आह- "वत्स ! अनुग्रहं ते करिष्यामि परन्तु रात्रौ त्वया मठमध्ये न प्रवेष्टव्यं यत्कारणं निःसङ्गता यतीनां प्रशस्यते तव च ममापि, च । उक्तञ्च- यह सुन आषाढभूति उसके चरणोंको ग्रहणकर आदरसे यह बोला-“भग- वन् ! तो दीक्षा कर मेरे ऊपर अनुग्रहकरो"। देवशर्मा बोला-“वत्स ! तेरे ऊपर मैं अनुग्रह करूंगा, परन्तु रात्रिमें तू मठमे प्रवेश न करना कारण यह है कि, यतियोंकी निस्संगताही प्रशंसनीयहै सो तुम्हारी और मेरीभी । कहाहै- दुर्मन्त्रान्नृपतिर्विनश्यति यतिः सङ्गात्सुतो लालनाद् विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् । मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरनयात्स्नेहः प्रवासाश्रयात् स्त्री गर्वादनवेक्षणादपि कृषिस्त्यागात्प्रमादाद्धनम् ॥१८०॥ दुर्मन्त्रसे राजा नष्ट होता है, संगसे यति, लाडसे पुत्र, न पढनेसे ब्राह्मण, कुपुत्रसे कुल, दुष्टोंके संगसे शील, अप्रणयसे मित्रता, अनयसे समृद्धि, परदेशमें रहनेसे स्नेह, गर्वसे स्त्री, न देखनेसे खेती, त्याग और प्रमादसे धन नष्ट- होताहै ॥ १८० ॥
( ६२ ) . पञ्चतन्त्रम् ।
( ६२ ) . पञ्चतन्त्रम् ।
तत् त्वया व्रतग्रहणानन्तरं मठद्वारे तृणकुटीरके शयि- तव्यमिति”। स आह-“भगवन् ! भवदादेशः प्रमाणम् । परत्र हि तेन मे प्रयोजनम्”। अथ कृतशयनसमयं देवशर्मा अनु- ग्रहं कृत्वा शास्त्रोक्तविधिना शिष्यतामनयत् । सोऽपि हस्त- पादावमर्दनादिपरिचर्यया तं परितोषमनयत् । पुनस्तथापि मुनिः कक्षान्तरान्मात्रां न मुञ्चति । अथ एवं गच्छति काले आषाढभूतिश्चिन्तयामास । “अहो ! न कथञ्चिदेष मे विश्वा- समागच्छति । तत् किं दिवापि शस्त्रेण मारयामि, किं वा विषं प्रयच्छामि, किंवा पशुधर्मेण व्यापादयामि” । इत्येवं चिन्तयतस्तस्य देवशर्मणोऽपि शिष्यपुत्रः कश्चिद्ग्रामादामन्त्र- णार्थं समायातः । प्राह च-“भगवन् ! पवित्रारोपणकृते मम गृहमागम्पतामिति”। तच्छ्रुत्वा देवशर्मा आषाढभूतिना सह प्रहृष्टमनाः प्रस्थितः । अथ एवं तस्य गच्छतोऽग्रे काचिन्नदी समायाता । तां दृष्ट्वा मात्रां कक्षान्तरादवतार्य कन्थामध्ये सुगुप्तां निधाय स्नात्वा देवार्चनं विधाय तदनन्तरमाषा- ढभूतिमिदमाह-“भो आषाढभूते ! यावदहं पुरीषोत्सर्गं कृत्वा समागच्छामि तावदेषा कन्था योगेश्वरस्य सावधान- तया रक्षणीया” इत्युक्त्वा गतः । आषाढभूतिरपि तस्मिन्न- दर्शनीभूते मात्रामादाय सत्वरं प्रस्थितः । देवशर्मापि छात्र- गुणानुरञ्जितमनाः सुविश्वस्तो यावदुपविष्टस्तिष्ठति ताव- त्सुवर्णरोमदेहयूथमध्ये हुडुयुद्धमपश्यत् । अथ रोषवशाद्धुडुयु- गलस्य दूरमपसरणं कृत्वा भूयोऽपि समुपैत्य ललाटपट्टाभ्यां प्रहरतो भूरि रुधिरं पतति । तच्च जम्बूको जिह्वालौल्याेन रंगभूमिं प्रविश्य आस्वादयति । देवशर्मापि तदालोक्य व्यचिन्तयत । “अहो ! मन्दमतिरयं जम्बूकः यदि कथमपि अनयोः संघट्टे पतिष्यति तन्नूनं मृत्युमवाप्स्यतीति वितर्क- यामि” । क्षणान्तरे च तथैव रक्तास्वादनलौल्यान्मध्ये प्रवि- शंस्तयोः शिरःसम्पाते पतितो मृतश्च शृगालः । देवशर्मापि
भाषाटीकासमेतम् । ( ६३ ) तं शोचमानो मात्रामुद्दिश्य शनैः शनैः प्रस्थितो यावदाषा- ढभूतिं न पश्यति ततश्च औत्सुक्येन शौचं विधाय यावत् कन्थामालोकयति तावत् मात्रां न पश्यति । ततश्च “हा ! हा ! मुषितोऽस्मीति” जल्पन् पृथिवीतले मूर्च्छया निप- पात । ततः क्षणात् चेतनां लब्ध्वा भूयोऽपि समुत्थाय फूत्कर्त्तुमारब्धः। “भो आषाढभूते ! क्व मां वञ्चयित्वा गतोऽसि । तद्देहि मे प्रतिवचनम्” । एवं बहु विलप्य तस्य पदपद्धतिम- न्वेषयञ्छनैः शनैः प्रस्थितः । अथ एवं गच्छन् सायन्तनसमये कञ्चिद्ग्राममाससाद । अथ तस्माद्ग्रामात्कश्चित्कौलिकः सभा- र्यो मद्यपानकृते समीपवर्त्तिनि नगरे प्रस्थितः । देवशर्मोपि तमालोक्य प्रोवाच--“भो भद्र ! वयं सूर्योढा अतिथयस्त- द्वान्तिकं प्राप्ता न कमपि अत्र ग्रामे जानीमः । तद्गृह्यताम- तिथिधर्मः । उक्तञ्च-- सो तुझ व्रतग्रहणके उपरान्त मठके द्वारे तृणके कुटीमे प्रवेश करना चाहिये”। वह बोला--“भगवन् ! आपकी आज्ञा प्रमाण है दूसरे लोकमे मग लहो यही मेरा प्रयोजन है” सो शयनकी प्रतिज्ञा कर देवशर्मा अनुग्रहकर शास्त्रोक्त विधिसे उसको शिष्य करता भया । वहभी हाथ पैर आदि दाबनेकी परिचर्यासे उसको संतुष्ट करता हुआ, इसपरभी वह मुनि बगलसे मात्राको न त्यागता । तब कुछ समय बीतनेपर आषाढ भूति विचार करनेलगा, “अहो किसीप्रकारसेभी यह मेरे विश्वासको प्राप्त नहीं होताहै। सो क्या दिनमें शस्त्रसे मारू या इसको विषदू या पशुकी समान मारडालू” । यह उसके विचारकरनेपर देवशर्माके शिष्यका पुत्र कोई ग्रामसे निमन्त्रण करनेको आया और बोला-- “भगवन् ! यज्ञोपवीत देनेके निमित्त मेरे घर आइये”। यह सुन देवशर्मा आषाढभूतिके साथ प्रसन्न मन हो चला । तब उनके जातेमें कोई नदी आगे आई । उसको देखकर मात्राको बगलमेंसे निकाल गुदडीमें छिपाय रख स्नान- कर देवार्चनविधिकर आषाढभूतिसे यह बोला--“हे आषाढभूति ! जबतक मैं पुरीष त्यागन करआऊ तबतक यह मुझ योगेश्वरकी गुदडी सावधानतासे रक्षा करना” यह कह गया । आषाढभूतिभी उसके अदर्शन होनेमें उस मात्राको