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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—१८ देवता—सोम

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मधोर्धारामनु क्षर तीव्रः सधस्थमासदः. चारुर्ऋताय पीतये.. (८) हे सोम! तुम मधुर सोम की धाराओं की ओर बहो, तीखे रस वाले बनकर इस निचोड़ने वाले स्थान पर बैठो एवं यज्ञ में देवों के निमित्त सुंदर पीने के पदार्थ बनो. (८) सूक्त—१८ देवता—सोम परि सुवानो गिरिष्टाः पवित्रे सोमो अक्षाः. मदेषु सर्वधा असि.. (१) ये सोम दशापवित्र पर गिरते हैं एवं निचोड़े जाने के समय पाषाणों पर स्थित रहते हैं. हे सोम! तुम नशीली वस्तुओं में सर्वोत्तम हो. (१) त्वं विप्रस्त्वं कविर्मधु प्र जातमन्धसः. मदेषु सर्वधा असि.. (२) हे विविध प्रकार से प्रसन्न करने वाले एवं मेधावी सोम! तुम अन्न से उत्पन्न मधुर रस दो. तुम मादक पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ हो. (२) तव विश्वे सजोषसो देवासः पीतिमाशति. मदेषु सर्वधा असि.. (३) हे सोम! सभी देव समान रूप से प्रसन्न होकर तुम्हें प्राप्त करते हैं. तुम नशीली वस्तुओं में सबसे उत्तम हो. (३) आ यो विश्वानि वार्या वसूनि हस्तयोर्दधे. मदेषु सर्वधा असि.. (४) जो सोम सभी वरण योग्य धनों को स्तोताओं के हाथों में देते हैं, वे सभी नशीली वस्तुओं में उत्तम हैं. (४) य इमे रोदसी मही सं मातरेव दोहते. मदेषु सर्वधा असि.. (५) जिस प्रकार एक बालक दो माताओं का दूध पीता है, उसी प्रकार सोम द्यावा-पृथिवी दोनों को दुहते हैं. सोम सभी मादक पदार्थों में श्रेष्ठ हैं. (५) परि यो रोदसी उभे सद्यो वाजेभिरर्षति. मदेषु सर्वधा असि.. (६) सोम शीघ्र ही अन्नों द्वारा द्यावा-पृथिवी को ढक देते हैं. सोम सभी नशीले पदार्थों के धारक हैं. (६) स शुष्मी कलशेष्वा पुनानो अचिक्रदत्. मदेषु सर्वधा असि.. (७) ये बली सोम शोधित होने के समय कलश के नीचे शब्द करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१९ देवता—सोम

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सूक्त—१९ देवता—सोम यत्सोम चित्रमुक्थ्यं दिव्यं पार्थिवं वसु. तन्नः पुनान आ भर.. (१) हे सोम! जो विचित्र, प्रशंसनीय, दिव्य एवं पृथ्वी का धन है, तुम निचुड़ते हुए हमें वह सब प्रदान करो. (१) युवं हि स्थः स्वर्षती इन्द्रश्च सोम गोपती. ईशाना पिप्यतं धियः.. (२) हे सोम! तुम एवं इंद्र सबके स्वामी एवं गायों का पालन करते हो. तुम हमारे यज्ञकर्मों को पूरा करो. (२) वृषा पुनान आयुषु स्तनयन्नधि बर्हिषि. हरिः सन्योनिमासदत्.. (३) अभिलाषापूरक सोम शुद्ध होते समय अध्वर्यु आदि के बीच शब्द करते हैं. हरितवर्ण सोम कुशों के ऊपर अपने स्थान पर बैठते हैं. (३) अवावशन्त धीतयो वृषभस्याधि रेतसि. सूनोर्वत्सस्य मातरः.. (४) सोमरूपी बछड़े द्वारा पी जाती हुई वसतीवरीरूपी गाएं सोम के सारवान् होने की कामना करती हैं. (४) कुविद्वृषण्यन्तीभ्यः पुनानो गर्भमादधत्. याः शुक्रं दुहते पयः.. (५) दूध आदि में मिलाए जाते हुए सोम अभिलाषा करने वाली वसतीवरी के गर्भ के रूप में अपना रस अनेक बार धारण करते हैं. जल दीप्त रस को दुहते हैं. (५) उप शिक्षापतस्थुषो भियसमा धेहि शत्रुषु. पवमान विदा रयिम्.. (६) हे शुद्ध किए जाते हुए सोम! हमारी जो अभिलषित वस्तुएं हैं, उन्हें हमारे समीप लाओ. हमारे शत्रुओं को भयभीत करो एवं उनका धन प्राप्त करो. (६) नि शत्रोः सोम वृष्ण्यं नि शुष्मं नि वयस्तिर. दूरे वा सतो अन्ति वा.. (७) हे निचोड़े जाते हुए सोम! शत्रु चाहे दूर हो या पास हो, तुम उसके तेज एवं अन्न का विनाश करो. (७) सूक्त—२० देवता—सोम प्र कविर्देववीतयेऽव्यो वारेभिरर्षति. साह्वान्विश्वा अभि स्पृधः.. (१)

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मेधावी सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र से छनकर देवों के पीने के लिए जाते हैं. शत्रुओं का आक्रमण सहन करने वाले सोम सभी शत्रुओं को पराजित करते हैं. (१) स हि ष्मा जरितृभ्य आ वाजं गोमन्तमन्वति. पवमानः सहस्रिणम्.. (२) शुद्ध होते हुए वे सोम स्तोताओं के लिए गायों से युक्त हजारों प्रकार का अन्न देते हैं. (२) परि विश्वानि चेतसा मृशसे पवसे मती. स नः सोम श्रवो विदः.. (३) हे सोम! तुम हमारे अनुकूल मन बनाकर हमें सभी प्रकार के धन देते हो. तुम स्तुतियां सुनकर रस देते हो. तुम हमें अन्न दो. (३) अभ्यर्ष बृहद्यशो मघवद्भ्यो ध्रुवं रयिम्. इषं स्तोतृभ्य आ भर.. (४) हे सोम! महान् यश हमारी ओर भेजो, हव्यदाता यजमानों को स्थायी धन दो एवं स्तोताओं को अन्न दो. (४) त्वं राजेव सुव्रतो गिरः सोमा विवेशिथ. पुनानो वह्ने अद्भुत.. (५) हे शोभनकर्म वाले सोम! तुम शुद्ध होकर हमारी स्तुति उसी प्रकार स्वीकार करो, जिस प्रकार राजा स्तुतियां स्वीकार करता है. हे सोम! तुम पवित्र करने वाले एवं अनोखे हो. (५) स वह्निरप्सु दुष्टरो मृज्यमानो गभस्त्योः. सोमश्चमूषु सीदति.. (६) यज्ञादि के वहन करने वाले वे सोम अंतरिक्ष में वर्तमान होकर हाथों द्वारा कठिनाई से रगड़े जाते हैं एवं चमू नामक पात्रों में स्थित होते हैं. (६) क्रीळुर्मखो न मंहयुः पवित्रं सोम गच्छसि. दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम्.. (७) हे क्रीड़ाशील एवं दान देने वाले सोम! तुम स्तोता के लिए शोभन बल देते हुए दान के समान दशापवित्र में जाते हो. (७) सूक्त—२१ देवता—सोम एते धावन्तीन्दवः सोमा इन्द्राय घृष्वयः. मत्सरासः स्वर्विदः.. (१) दीप्त शत्रुओं को पराजित करने वाले, मस्त बनाने वाले एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले सोम इंद्र के पास जाते हैं. (१) प्रवृण्वन्तो अभियुजः सुष्वये वरिवोविदः. स्वयं स्तोत्रे वयस्कृतः.. (२) निचोड़ने की क्रिया का आश्रय लेने वाले एवं रस निचोड़ने वाले को धन प्राप्त कराने

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वाले सोम स्तोता को अन्न देते हैं. (२) वृथा क्रीळन्त इन्दवः सधस्थमभ्येकमित्. सिन्धोरूर्मा व्यक्षरन्.. (३) अनायास क्रीड़ा करते हुए सोम एक साथ ही द्रोणकलश एवं वसतीवरी में टपकते हैं. (३) एते विश्वानि वार्या पवमानास आशत. हिता न सप्तयो रथे.. (४) जिस प्रकार रथ में जुड़े घोड़े रथ को मनचाहे स्थान की ओर ले जाते हैं, उसी प्रकार निचोड़े जाते हुए सोम हमें सभी प्रकार धन दें. (४) आस्मिन्पिशङ्गमिन्दवो दधाता वेनमादिशे. यो अस्मभ्यमरावा.. (५) हे सोम! जो यजमान हमें चुपचाप दान करता है, उस अभिलाषा करने वाले यजमान को नाना प्रकार का धन दो. (५) ऋभुर्न रथ्यं नवं दधाता केतमादिशे. शुक्राः पवध्वमर्णसा.. (६) हे सोम! रथ का मालिक जिस प्रकार रथ हांकने वाले को निर्देश देता है, उसी प्रकार तुम इस यजमान को ज्ञान दो एवं दीप्त होकर बरसो. (६) एत उ त्ये अवीवश्नन्काष्ठां वाजिनो अक्रत. सतः प्रासाविषुर्मतिम्.. (७) ये सोम यज्ञ की अभिलाषा करते हैं. अन्नयुक्त सोम ने द्रोणकलश से निकलकर यजमान के घर में अपना निवास बनाया एवं स्तोता की बुद्धि को प्रेरित किया. (७) सूक्त—२२ देवता—सोम एते सोमास आशवो रथा इव प्र वाजिनः. सर्गाः सृष्टा अहेषत.. (१) अध्वर्यु द्वारा संस्कृत सोम दशापवित्र से इस प्रकार नीचे जाते हैं, जिस प्रकार युद्ध में रथ और घोड़े तेज चलते हैं. (१) एते वाता इवोरवः पर्जन्यस्येव वृष्टयः. अग्नेरिव भ्रमा वृथा.. (२) ये सोम महान् वायु, बादलों की वर्षा एवं अग्नि की ज्वालाओं के समान निकलते हैं. (२) एते पूता विपश्चितः सोमासो दध्याशिरः. विपा व्यानशुर्धियः.. (३) शुद्ध, बुद्धियुक्त एवं दही मिले हुए ये सोम ज्ञान के द्वारा हमारी बुद्धियों को व्याप्त करते ebook converter DEMO Watermarks*

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हैं. (३) एते मृष्टा अमर्त्याः ससृवांसो न शश्रमुः. इयक्षन्तः पथो रजः.. (४) दशापवित्र द्वारा शोधित एवं मरणरहित सोम हव्य रखने के स्थान से जाते हुए मार्गों एवं लोकों में जाने की इच्छा करते हैं तथा थकते नहीं हैं. (४) एते पृष्ठानि रोदसोर्विप्रयन्तो व्यानशुः. उतेदमुत्तमं रजः.. (५) ये सोम द्यावा-पृथिवी के ऊपर अनेक प्रकार से विचरण करके फैलते हैं एवं उत्तम द्युलोक में जाते हैं. (५) तन्तुं तन्वानमुत्तममनु प्रवत आशत. उतेदमुत्तमाय्यम्.. (६) नदियां यज्ञ का विस्तार करने वाले एवं उत्तम सोम को प्राप्त करती हैं. सोम इस कार्य को उत्तम बनाते हैं. (६) त्वं सोम पणिभ्य आ वसु गव्यानि धारयः. ततं तन्तुमचिक्रदः.. (७) हे सोम! तुम पणियों के पास से गायों का समूह एवं धन लाते हो तथा यज्ञ का विस्तार करने वाला शब्द करते हो. (७) सूक्त—२३ देवता—सोम सोमा असृग्रमाशवो मधोर्मदस्य धारया. अभि विश्वानि काव्या.. (१) शीघ्र चलने वाले सोम नशीले रस की मधुर धारा के साथ सभी स्तुतियों को सुनकर प्रकट होते हैं. (१) अनु प्रत्नास आयवः पदं नवीयो अक्रमुः. रुचे जनन्त सूर्यम्.. (२) अश्व के समान शीघ्रगामी एवं प्राचीन सोमों ने सूर्य को दीप्त करने के लिए नवीन स्थान पर गमन किया है. (२) आ पवमान नो भरार्यो अदाशुषो गयम्. कृधि प्रजावतीरिषः.. (३) हे पवमान सोम! तुम दान न करने वाले शत्रु का धनपूर्ण घर हमें दो तथा हमें संतान वाले अन्न से युक्त बनाओ. (३) अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्. अभि कोशं मधुश्चुतम्.. (४) गतिशील सोम नशीला रस तथा रस टपकाने वाले कोश क्षरित करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

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सोमो अर्षति धर्णसिर्दधान इन्द्रियं रसम्. सुवीरो अभिशस्तिपा:.. (५) सोम विश्व को धारण करने वाले, इंद्रियों की वृद्धि करने वाले, रस धारण करने वाले, शोभन शक्ति से युक्त एवं हिंसा से बचाने वाले हैं. (५) इन्द्राय सोम पवसे देवेभ्य: सधमाद्य:. इन्दो वाजं सिषाससि.. (६) हे यज्ञ के पात्र सोम! तुम इंद्र एवं अन्य देवों के लिए रस टपकाते हो एवं हमें अन्न देने की अभिलाषा करते हो. (६) अस्य पीत्वा मदानामिन्द्रो वृत्राण्यप्रति. जघान जघनच्च नु.. (७) इस अतिशय नशीले सोम को पीकर अनाक्रांत इंद्र ने शत्रुओं को पहले मारा और अब भी मारते हैं. (७) सूक्त—२४ देवता—सोम प्र सोमासो अधन्विषु: पवमानास इन्दव:. श्रीणाना अप्सु मृज्जत.. (१) संस्कृत एवं दीप्तिशाली सोम जाते हैं एवं उंगलियों से मिलकर जल में मसले जाते हैं. (१) अभि गावो अधन्विषुरापो न प्रवता यती:. पुनाना इन्द्रमाशत.. (२) गतिशील सोम नीचे बहने वाले जल के समान दशापवित्र में पहुंचते हैं एवं प्रसन्न करने के उद्देश्य से इंद्र को व्याप्त करते हैं. (२) प्र पवमान धन्वसि सोमेन्द्राय पातवे. नृभिर्यतो वि नीयसे.. (३) हे पवमान सोम! मनुष्य तुम्हें चाहे जहां ले जावें. तुम वहीं रहकर इंद्र के पीने के उद्देश्य से इंद्र के पास पहुंचते हो. (३) त्वं सोम नृमादन: पवस्व चर्षणीसहे. सस्निर्यो अनुमाद्य:.. (४) हे मनुष्यों को मतवाला करने वाले सोम! तुम शत्रुओं को पराजित करने वाले योद्धाओं के लिए टपको. (४) इन्दो यदद्रिभि: सुतः पवित्रं परिधावसि. अरमिन्द्रस्य धाम्ने.. (५) हे सोम! जब तुम पत्थरों द्वारा कुचले जाकर दशापवित्र की ओर दौड़ते हो, तब तुम इंद्र के उदर के लिए पर्याप्त होते हो. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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पवस्व वृत्रहन्तमोक्थेभिरनुमाद्यः. शुचिः पावको अद्भुत:... (६) हे शत्रुओं का सर्वाधिक हनन करने वाले, उक्त मंत्रों द्वारा स्तुति करने योग्य, शुद्ध, दूसरों को पवित्र करने वाले एवं अद्भुत सोम! तुम टपको. (६) शुचिः पावक उच्यते सोमः सुतस्य मध्वः. देवावीरघशंसहा.. (७) मादक सोमलता का निचुड़ा हुआ रस शुद्ध एवं दूसरों को पवित्र करने वाला कहलाता है. वह देवों को तृप्त करने वाला एवं असुरहंता है. (७) सूक्त—२५ देवता—पवमान सोम पवस्व दक्षसाधनो देवेभ्यः पीतये हरे. मरुद्भ्यो वायवे मदः.. (१) हे हरितवर्ण, बल के साधक एवं नशीले सोम! तुम मरुतों, वायु एवं अन्य देवों के पीने के लिए टपको. (१) पवमान धिया हितोऽभि योनिं कनिक्रदत्. धर्मणा वायुमा विश.. (२) हे निचोड़े जाते हुए एवं हमारी उंगलियों द्वारा पकड़े गए सोम! तुम शब्द करते हुए अपने स्थान में प्रवेश करो. तुम यज्ञकर्म के साथ वायु के पात्र में प्रवेश करो. (२) सं देवैः शोभते वृषा कविर्योनावधि प्रियः. वृत्रहा देववीतमः.. (३) अपने स्थान में स्थित, अभिलाषापूरक, क्रांत बुद्धि वाले, सबके प्रिय, वृत्र का नाश करने वाले एवं देवों की अधिक अभिलाषा करने वाले पवमान सोम देवों के साथ भली प्रकार शोभा पाते हैं. (३) विश्वा रूपाण्याविशन्पुनानो याति हर्यतः. यत्रामृतास आसते.. (४) निचोड़े जाते हुए सुंदर सोम वहां जाते हैं, जहां देव निवास करते हैं. (४) अरुषो जनयन्गिरः सोमः पवत आयुषक्. इन्द्रं गच्छन्कविक्रतुः.. (५) क्रांत प्रज्ञा वाले एवं दीप्तिशाली सोम अपने समीपवर्ती इंद्र को व्याप्त करके शब्द करते हुए टपकते हैं. (५) आ पवस्व मदिन्तम पवित्रं धारया कवे. अर्कस्य योनिमासदम्.. (६) हे अतिशय मादक एवं क्रांत प्रज्ञा वाले सोम! तुम पूजनीय इंद्र के स्थान को प्राप्त करने के लिए दशापवित्र को पार करके धारा के रूप में बहो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२६ देवता—पवमान सोम

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सूक्त—२६ देवता—पवमान सोम तममृक्षन्त वाजिनमुपस्थे अदितेरधि. विप्रासो अण्व्या धिया.. (१) मेधावी अध्वर्यु आदि वेगशाली सोम को धरती की गोद में अपनी उंगलियों और स्तुतियों द्वारा मसलते हैं. (१) तं गावो अभ्यनूषत सहस्रधारमक्षितम्. इन्दुं धर्त्तारमा दिव:.. (२) स्तुतियां अनेक धाराओं वाले, क्षीणतारहित, दीप्तिशाली एवं स्वर्ग को धारण करने वाले सोम की स्तुति करती हैं. (२) तं वेधां मेधयाह्यन्यवमानमधि द्यवि. धर्णसिं भूरिधायसम्.. (३) लोग सबको धारण करने वाले, अनेक कर्मों के कर्त्ता, विधाता एवं पवित्र होते हुए सोम को स्वर्ग की ओर भेजते हैं. (३) तमह्यन्भुरिजोर्धिया संवसानं विवस्वत:. पतिं वाचो अदाभ्यम्.. (४) सेवा करने वाले ऋत्विज् पात्र में रहने वाले, स्तुतियों के स्वामी एवं अहिंसनीय सोम को दोनों हाथों की उंगलियों के द्वारा आगे बढ़ाते हैं. (४) तं सानावधि जामयो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभि:. हर्यतं भूरिचक्षसम्.. (५) उंगलियां हरे रंग वाले, सुंदर एवं बहुतों को देखने वाले सोम को ऊंचे स्थान की ओर प्रेरित करती हैं. (५) तं त्वा हिन्वन्ति वेधस: पवमान गिरावृधम्. इन्दविन्द्राय मत्सरम्.. (६) हे स्तुतियों द्वारा बढ़ते हुए, दीप्तिशाली, नशीले एवं निचुड़ते हुए सोम! ऋत्विज् तुम्हें इंद्र के पास जाने के लिए प्रेरित करते हैं. (६) सूक्त—२७ देवता—पवमान सोम एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते. पुनानो घ्नन्नप स्रिधः.. (१) मेधावी, चारों ओर से स्तुत एवं पवित्र होते हुए सोम शत्रुओं का विनाश करके दशापवित्र से हरिण के काले चमड़े पर जाते हैं. (१) एष इन्द्राय वायवे स्वर्जित्परि षिच्यते. पवित्रे दक्षसाधनः.. (२) eBook converter DEMO Watermarks*

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सबको जीतने वाले एवं शक्तिदाता सोम को दशापवित्र पर इंद्र एवं वायु के लिए सींचा जाता है. (२) एष नृभिर्वि नीयते दिवो मूर्धा वृषा सुतः. सोमो वनेषु विश्ववित्.. (३) द्युलोक के सिर के समान, अभिलाषापूरक, सर्वज्ञ, निचुड़े हुए एवं काष्ठ पात्रों में रखे हुए सोम ऋत्विजों द्वारा अनेक प्रकार से ले जाए जाते हैं. (३) एष गव्युरचिक्रदत् पवमानो हिरण्ययुः. इन्दुः सत्राजिदस्तुतः.. (४) हमारे लिए गायों और धन की इच्छा करते हुए, दीप्तिशाली, असुरों को जीतने वाले एवं स्वयं दूसरों द्वारा अहिंसित सोम निचुड़ते समय शब्द करते हैं. (४) एष सूर्येण हासते पवमानो अधि द्यवि. पवित्रे मत्सरो मदः.. (५) नशा करने वाले सोम जिस समय निचोड़े जाते हैं, उस समय सूर्य उन्हें द्युलोक में छोड़ते हैं. (५) एष शुष्यसिष्यददन्तरिक्षे वृषा हरिः. पुनाना इन्दुरिन्द्रमा.. (६) ये शक्तिशाली, अभिलाषापूरक, हरितवर्ण, दीप्तिशाली एवं निचुड़ते हुए सोम दशापवित्र पर गिरते हैं एवं इंद्र को प्राप्त होते हैं. (६) सूक्त—२८ देवता—सोम एष वाजी हितो नृभिर्विश्वविन्मनसस्पतिः. अव्यो वारं वि धावति.. (१) ये गतिशील, अध्वर्यु द्वारा पात्र पर रखे हुए, सर्वज्ञ व स्तोत्र के स्वामी सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर चलते हैं. (१) एष पवित्रे अक्षरत् सोमो देवेभ्यः सुतः. विश्वा धामान्याविशन्.. (२) देवों के लिए निचोड़े गए सोमदेव शरीरों में प्रवेश पाने के लिए दशापवित्र पर गिरते हैं. (२) एष देवः शुभायतेऽधि योनावमर्त्यः. वृत्रहा देववीतमः.. (३) ये मरणरहित, शत्रुहंता और देवों की अतिशय अभिलाषा करने वाले सोम अपने स्थान में शोभा पाते हैं. (३) एष वृषा कनिक्रदद्दशभिर्जामिभिर्यतः. अभि द्रोणानि धावति.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

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ये अभिलाषापूरक, शब्द करने वाले एवं दस उंगलियों द्वारा पकड़े हुए सोम काष्ठ से बने पात्र अर्थात् द्रोण कलश की ओर जाते हैं. (४) एष सूर्यमरोचयत् पवमानो विचर्षणिः. विश्वा धामानि विश्ववित्.. (५) ये निचोड़े जाते हुए, सबके द्रष्टा, सबको जानने वाले सोम सूर्य के साथ-साथ सभी तेजस्वी पदार्थों को दीप्त करते हैं. (५) एष शुष्म्यदाभ्यः सोमः पुनानो अर्षति. देवावीरघशंसहा.. (६) ये निचोड़े हुए सोम, शक्तिशाली, अहिंसनीय, देवों के रक्षक एवं पापनाशक होकर चलते हैं. (६) सूक्त—२९ देवता—सोम प्रास्य धारा अक्षरन्वृष्णः सुतस्यौजसा. देवाँ अनु प्रभूषतः.. (१) अभिलाषापूरक, निचोड़े हुए देवों को प्रभावित करने के इच्छुक सोम की धाराएं अपनी शक्ति से बहती हैं. (१) सप्तिं मृजन्ति वेधसो गृणन्तः कारवो गिरा. ज्योतिर्जज्ञानमुक्थ्यम्.. (२) स्तोता, यज्ञ करने वाले एवं कार्यकर्त्ता लोग दीप्तिशाली, बढ़े हुए, स्तुति योग्य एवं गतिशील सोम को स्तुतियों द्वारा शुद्ध करते हैं. (२) सुषहा सोम तानि ते पुनानाय प्रभूवसो. वर्धा समुद्रमुक्थ्यम्.. (३) हे अधिक धन के स्वामी सोम! जब तुम शुद्ध किए जाते हो, जब तुम्हारे तेज शोभा वाले बनते हैं, तब तुम स्तुति योग्य एवं समुद्र तुल्य द्रोणकलश को भरो. (३) विश्वा वसूनि सञ्जयन्पवस्व सोम धारया. इनु द्वेषांसि सध्यक्.. (४) हे सोम! समस्त धनों को हमें देने के लिए जीतते हुए धाराओं के रूप में नीचे गिरो. सभी शत्रुओं को एक साथ दूर भगाओ. (४) रक्षा सु नो अररुषः स्वनात्समस्य कस्य चित्. निदो यत्र मुमुच्महे.. (५) हे सोम! दान न करने वाले एवं अन्य सभी निंदकों से हमारी रक्षा करो. ऐसे साधन द्वारा हमारी रक्षा करो, जिससे हम मुक्त हो सकें. (५) एन्डो पार्थिवं रयिं दिव्यं पवस्व धारया. द्युमन्तं शुष्ममा भर.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—३० देवता—सोम

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हे कुचले जाते हुए सोम! तुम धारा के रूप में नीचे गिरो. स्वर्गीय एवं धरती संबंधी धन के साथ तुम दीप्ति वाला बल लाओ. (६) सूक्त—३० देवता—सोम प्र धारा अस्य शुष्मिणो वृथा पवित्रे अक्षरन्. पुनानो वाचमिष्यति.. (१) इन शक्तिशाली सोम की धाराएं बिना श्रम के ही दशापवित्र पर गिर रही हैं, सोम निचोड़ते समय ध्वनि करते हैं. (१) इन्दुह्रिंयानः सोतृभिर्मृज्यमानः कनिक्रदत्. इयर्ति वग्नुमिन्द्रियम्.. (२) ऋत्विजों द्वारा दशापवित्र पर शुद्ध किए जाते हुए दीप्तिशाली सोम शब्द करते हैं तथा इंद्रसंबंधी ध्वनि करते हैं. (२) आ नः शुष्मं नृषाह्यं वीरवन्तं पुरुस्पृहम्. पवस्व सोम धारया.. (३) हे सोम! तुम अपनी धाराओं से हमारे विरोधी लोगों को हराने वाला, संतानयुक्त व बहुतों द्वारा चाहने योग्य बल क्षरित करो. (३) प्र सोमो अति धारया पवमानो असिष्यदत्. अभि द्रोणान्यासदम्.. (४) निचोड़े जाते हुए सोम द्रोणकलश में जाने के लिए दशापवित्र को पार करके टपकते हैं. (४) अप्सु त्वा मधुमत्तमं हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः. इन्दविन्द्राय पीतये.. (५) हे हरे रंग के एवं अत्यंत नशीले सोम! तुम जल में रहते हो. लोग इंद्र को पिलाने के लिए तुम्हें पत्थरों से कूटते हैं. (५) सुनोता मधुमत्तमं सोममिन्द्राय वज्रिणे. चारुं शर्धाय मत्सरम्.. (६) हे ऋत्विजो! तुम मधुर रस वाले सुंदर व नशीले सोम को इंद्र के लिए निचोड़ो. इसे पीकर इंद्र हमें बल देंगे. (६) सूक्त—३१ देवता—सोम प्र सोमासः स्वाध्य१: पवमानासो अक्रमुः. रयिं कृण्वन्ति चेतनम्.. (१) शोभनकर्म वाले एवं निचोड़ते हुए सोम हमें प्रसिद्ध करने वाला धन देते हुए कलश की ebook converter DEMO Watermarks*

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ओर जा रहे हैं. (१) दिवस्पृथिव्या अधि भवेन्दो द्युम्नवर्धनः. भवा वाजानां पतिः.. (२) हे अन्नों के स्वामी सोम! तुम द्युलोक और धरती संबंधी दीप्तिशाली धन को बढ़ाने वाले बनो. (२) तुभ्यं वाता अभिप्रियस्तुभ्यमर्षन्ति सिन्धवः. सोम वर्धन्ति ते महः.. (३) हे सोम! वायु तुम्हें तृप्ति देने वाले हैं एवं नदियां तुम्हारे लिए ही बहती हैं. ये दोनों तुम्हारी महिमा बढ़ावें. (३) आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्. भवा वाजस्य सङ्गथे.. (४) हे सोम! तुम वायु और जल की सहायता से बढ़ो. अभिलाषापूरक बल तुम्हें चारों ओर से प्राप्त हो. तुम अन्न प्राप्त कराने वाले बनो. (४) तुभ्यं गावो घृतं पयो बभ्रो दुदुहे अक्षितम. वर्षिष्ठे अधि सानवि.. (५) हे पीले रंग के सोम! गाएं तुम्हारे लिए क्षीण न होने वाला दूध-दही देती हैं. तुम बढ़े एवं ऊंचे स्थान पर बैठो. (५) स्वायुधस्य ते सतो भुवनस्य पते वयम्. इन्दो सखित्वमुश्मसि.. (६) हे शोभन आयुधों वाले एवं लोक के स्वामी सोम! हम तुम्हारी मित्रता चाहते हैं. (६) सूक्त—३२ देवता—सोम प्र सोमासो मदच्युतः श्रवसे नो मघोनः. सुता विदथे अक्रमुः.. (१) नशा करने वाले सोम निचुड़कर हव्यदाता यजमान को अन्न देने के लिए यज्ञ में जाते हैं. (१) आदीं त्रितस्य योष॑णो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (२) त्रित ऋषि की उंगलियां हरे रंग के सोम को इंद्र के पीने के लिए पत्थरों से कुचलती हैं. (२) आदीं हंसो यथा गणं विश्वस्यावीवशनन्मतिम्. अत्यो न गोभिरज्यते.. (३) हंस जिस प्रकार मानव-समूह में घुसता है, उसी प्रकार यह सोम सभी स्तोताओं की बुद्धि में प्रवेश करते हैं. जिस प्रकार घोड़े को स्नान कराते हैं, उसी प्रकार सोम जलों से सींचे ebook converter DEMO Watermarks*

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जाते हैं. (३) उभे सोमावचाकशनन्मृगो न तक्तो अर्षसि. सीदन्नृतस्य योनिमा.. (४) हे गाय के दूध-दही से मिले हुए सोम! तुम हिरन के समान द्यावा-पृथिवी को देखते हुए यज्ञ के स्थान में बैठने हेतु जाते हो. (४) अभि गावो अनूषत योषा जारमिव प्रियम्. अगन्नाजिं यथा हितम्.. (५) हे सोम! स्त्रियां जिस प्रकार अपने प्यारे प्रेमी की स्तुति करती हैं, उसी प्रकार लोगों की वाणी तुम्हारी प्रशंसा करती है. शूर जिस प्रकार संग्राम में जाता है, उसी प्रकार सोम अपने निश्चित स्थान में जाते हैं. (५) अस्मे धेहि द्युमद्यशो मघवद्भ्यश्च मह्यं च. सनिं मेधामुत श्रवः.. (६) हे सोम! मुझ हव्य अन्नधारी स्तोता को दीप्तिवाला अन्न, धन, बुद्धि और यश दो. (६) सूक्त—३३ देवता—सोम प्र सोमासो विपश्चितोऽपां न यन्त्युर्मयः. वनानि महिषा इव.. (१) मेधावी सोम द्रोणकलशों की ओर इस प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार पानी में लहरें उठती हैं. बूढ़ा हिरण जैसे जंगल की ओर जाता है, उसी प्रकार सोम पात्र से नीचे जाते हैं. (१) अभि द्रोणानि बभ्रवः शुक्रा ऋतस्य धारया. वाजं गोमन्तमक्षरन्.. (२) पीले रंग वाले एवं दीप्तिशाली सोम गोयुक्त अन्न प्रदान करते हुए अमृत की धारा के रूप में द्रोणकलश में गिरते हैं. (२) सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः. सोमा अर्षन्ति विष्णवे.. (३) निचोड़े हुए सोम इंद्र, वरुण, मरुद्गण एवं विष्णु के पास जाते हैं. (३) तिस्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनवः. हरिरेति कनिक्रदत्.. (४) ऋक्, यजु एवं साम के रूप में तीन स्तुतियां बोली जा रही हैं. प्रसन्न करने वाली गाएं रंभा रही हैं. हरे रंग वाले सोम शब्द करते हुए जाते हैं. (४) अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीर्ऋतस्य मातरः. मर्मृज्यन्ते दिवः शिशुम्.. (५) स्तोता ब्राह्मण यज्ञ की माताओं के सामने महान् स्तुतियों का उच्चारण कर रहे हैं. द्युलोक के शिशु के समान सोम मसले जा रहे हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—३४ देवता—सोम

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रायः समुद्रांश्चतुरोऽस्मभ्यं सोम विश्वतः. आ पवस्व सहस्रिणः.. (६) हे सोम! चारों समुद्रों से घिरी धनपूर्ण धरती को चारों ओर से हमें दो. तुम हमारी हजारों अभिलाषाएं पूरी करो. (६) सूक्त—३४ देवता—सोम प्र सुवानो धारया तनेन्दुहिंन्वानो अर्षति. रुजद् दृळ्हा व्योजसा.. (१) निचुड़ते हुए सोम अध्वर्यु की प्रेरणा से दशापवित्र में जाते हैं तथा शत्रुओं की दृढ़ नगरियों को शिथिल बनाते हैं. (१) सुत इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः. सोमो अर्षति विष्णवे.. (२) निचोड़े हुए सोम इंद्र, वायु, वरुण, मरुद्गण एवं विष्णु के पास जाते हैं. (२) वृषाणं वृषभिर्यतं सुन्वन्ति सोममद्रिभिः. दुहन्ति शक्मना पयः.. (३) अध्वर्यु आदि रस बरसाने वाले एवं हाथ में पकड़े हुए सोमरस को निचोड़ने वाले पत्थरों द्वारा दुहते हैं. वे कर्मरूपी बल द्वारा सोमरसरूपी दूध दुहते हैं. (३) भुवत्त्रितस्य मर्ज्यो भुवदिन्द्राय मत्सरः. सं रूपैरज्यते हरिः.. (४) त्रित ऋषि का यह नशीला सोम अपने एवं इंद्र के पीने के लिए शुद्ध हो रहा है. हरे रंग का सोम दूध आदि के साथ मिलाया जाता है. (४) अभीमृतस्य विष्टपं दुहते पृश्निमातरः. चारु प्रियतमं हविः.. (५) पृश्नि के पुत्र मरुद्गण इस यज्ञ के स्थान, इंद्र आदि के प्रिय, होम के साधन व मनोहर सोम को दुहते हैं. (५) समेनमहुता इमा गिरो अर्षन्ति सस्रुतः. धेनूर्वाश्रो अवीवशत्.. (६) हमारी सरल स्तुतियां चलती हुई सोम के साथ मिलती हैं. शब्द करते हुए सोम उन प्रसन्न करने वाली स्तुतियों की अभिलाषा करते हैं. (६) सूक्त—३५ देवता—सोम आ नः पवस्व धारया पवमान रयिं पृथुम्. यया ज्योतिर्विदासि नः.. (१) हे निचुड़ते हुए सोम! तुम धारा के रूप में हमारे चारों ओर गिरो तथा अपनी धारा के ebook converter DEMO Watermarks*

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द्वारा हमें विस्तीर्ण धन एवं तेजस्वी स्वर्ग दो. (१) इन्दो समुद्रमीङ्खय पवस्व विश्वमेजया. रायो धर्ता न ओजसा.. (२) हे जल को प्रेरित करने वाले तथा सभी शत्रुओं को कंपित करने वाले सोम! तुम अपनी शक्ति द्वारा हमें धन देने वाले बनो. (२) त्वया वीरेण वीरवोऽभि ष्याम पृतन्यतः. क्षरा णो अभि वार्यम्.. (३) हे वीरों वाले सोम! हम तुम्हारे बल की सहायता से युद्ध चाहने वाले शत्रुओं को पराजित करेंगे. हमें वरण करने योग्य धन दो. (३) प्र वाजमिन्दुरिष्यति सिषासन्वाजसा ऋषिः. व्रता विदान आयुधा.. (४) तेजस्वी, अन्न देने वाले, सबके द्रष्टा एवं व्रतों व आयुधों को जानने वाले सोम यजमानों का भरणपोषण करने की इच्छा से अन्न देते हैं. (४) तं गीर्भिर्वाचमीङ्खयं पुनानं वासयामसि. सोमं जनस्य गोपतिम्.. (५) मैं उन सोम की स्तुतिवचनों द्वारा प्रशंसा करता हूं, जो यजमान को गाएं देते हैं. मैं निचुड़ते हुए सोम को स्थान देता हूं. (५) विश्वो यस्य व्रते जनो दाधार धर्मणस्पतेः. पुनानस्य प्रभूवसोः.. (६) सभी यजमान यज्ञकर्म के पालक, पवित्र होते हुए एवं अधिक धन वाले सोम के काम में मन लगाते हैं. (६) सूक्त—३६ देवता—सोम असर्जि रथ्यो यथा पवित्रे चम्वोः सुतः. कार्ष्मन्वाजी न्यक्रमोत्.. (१) रथ में जुड़ा हुआ घोड़ा जिस प्रकार युद्ध में चलता है, उसी प्रकार चमू नामक दोनों पात्रों में निचोड़े गए एवं दशापवित्र पर छाने गए सोम यज्ञ में गति करते हैं. (१) स वह्निः सोम जागृविः पवस्व देववीरति. अभि कोशं मधुश्रुतम्.. (२) हे यज्ञ वहन करने वाले, जागरूक एवं देवाभिलाषी सोम! तुम रस टपकाने वाले, दशापवित्र से छनकर द्रोणकलश में गिरो. (२) स नो ज्योतींषि पूर्व्य पवमान वि रोचय. क्रत्वे दक्षाय नो हिनु.. (३) हे प्राचीन एवं निचुड़ते हुए सोम! हमारे लिए दिव्य स्थानों को प्रकाशित करो तथा हमें ebook converter DEMO Watermarks*

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यज्ञकर्म एवं शक्तिप्राप्ति की प्रेरणा दो. (३) शुम्भमान ऋतायुभिर्मृज्यमानो गभस्त्योः. पवते वारे अव्यये.. (४) यज्ञ के अभिलाषी ऋत्विजों द्वारा अलंकृत एवं हाथों द्वारा मसले गए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र से छनते हैं. (४) स विश्वा दाशुषे वसु सोमो दिव्यानि पार्थिवा. पवतामान्तरिक्ष्या.. (५) वे निचोड़े जाते हुए सोम हविदाता यजमान को द्युलोक, भूलोक और अंतरिक्ष संबंधी सभी धन दें. (५) आ दिवस्पृष्ठमश्वयुर्गव्युः सोम रोहसि. वीरयुः शवसस्पते.. (६) हे अन्न के पालक सोम! तुम स्तोताओं के लिए गाएं, घोड़े एवं वीर संतान देने के अभिलाषी बनकर स्वर्ग की पीठ पर चढ़ो. (६) सूक्त—३७ देवता—सोम स सुतः पीतये वृषा सोमः पवित्रे अर्षति. विघ्नन्रक्षांसि देवयुः.. (१) इंद्र के पीने के लिए निचोड़े गए, अभिलाषापूरक, राक्षसों का नाश करने वाले एवं देवाभिलाषी सोम भेड़ के बालों द्वारा बने दशापवित्र से छनकर द्रोणकलश में जाते हैं. (१) स पवित्रे विचक्षणो हरिरर्षति धर्णसिः. अभि योनिं कनिक्रदत्.. (२) सबके द्रष्टा, हरे रंग वाले एवं सबको धारण करने वाले वे सोम पहले दशापवित्र पर जाते हैं. बाद में शब्द करते हुए द्रोणकलश में गिरते हैं. (२) स वाजी रोचना दिवः पवमानो वि धावति. रक्षोहा वारमव्ययम्.. (३) वे वेगशाली, स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले, राक्षसों के हंता एवं निचुड़ते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके जाते हैं. (३) स त्रितस्याधि सानवि पवमानो अरोचयत्. जामिभिः सूर्य सह.. (४) वह सोम त्रित ऋषि के समुन्नत यज्ञ में निचुड़कर अपने बढ़े हुए तेजों के साथ सूर्य को प्रकाशित करते हैं. (४) स वृत्रहा वृषा सुतो वरिवोविद्ददाभ्यः. सोमो वाजमिवासरत्.. (५) वे वृत्रनाशक, अभिलाषापूरक, निचुड़े हुए, यज्ञकर्त्ता को धन देने वाले एवं अन्यों द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*

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अपराजेय सोम इस तरह कलश में जाते हैं, जैसे युद्ध में कोई घोड़ा चलता है. (५) स देवः कविनेषितोऽभि द्रोणानि धावति. इन्दुरिन्द्राय मंहना.. (६) वे दीप्तिशाली, भीगे हुए, अध्वर्यु के द्वारा प्रेरित एवं महान् सोम अध्वर्यु की प्रेरणा से इंद्र के निमित्त द्रोणकलश में जाते हैं. (६) सूक्त—३८ देवता—सोम एष उ स्य वृषा रथोऽव्यो वारेभिरर्षति. गच्छन् वाजं सहस्रिणम्.. (१) अभिलाषापूरक सोम रथ के समान गतिशील होकर यजमान को हजारों अन्न देने के लिए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके कलश में जाते हैं. (१) एतं त्रितस्य योषणो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (२) त्रित ऋषि की उंगलियां इस भीगे हुए एवं हरे रंग के सोम को इंद्र के पीने के लिए पत्थरों से कुचल रही हैं. (२) एतं त्यं हरितो दश मर्मृज्यन्ते अपस्युवः. याभिर्मदाय शुम्भते.. (३) पकड़ने के स्वभाव वाली दस उंगलियां कर्म की इच्छुक बनकर सोम को निचोड़ रही हैं. इन उंगलियों द्वारा सोम इंद्र के नशे के लिए शुद्ध किए जाते हैं. (३) एष स्य मानुषीष्वा श्येनो न विक्षु सीदति. गच्छञ्जारो न योषितम्.. (४) ये सोम मानवप्रजाओं में बाज पक्षी के समान बैठते हैं. जैसे कोई यार अपनी प्रेयसी के पास चुपचाप जाता है, उसी प्रकार सोम करते हैं. (४) एष स्य मद्यो रसोऽव चष्टे दिवः शिशुः. य इन्दुर्वारेमाविशत्.. (५) स्वर्ग के पुत्र वे सोम मादक रस के रूप में सबको देखते हैं तथा दीप्त सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र में प्रवेश करते हैं. (५) एष स्य पीतये सुतो हरिरर्षति धर्णसिः. क्रन्दन्योनिमभि प्रियम्.. (६) ये पीने के लिए निचोड़े गए, हरे रंग के एवं सबके धारक सोम शब्द करते हुए अपने प्रिय स्थान द्रोणकलश में जाते हैं. (६) सूक्त—३९ देवता—सोम ebook converter DEMO Watermarks*

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आशुर्ष बृहन्मते परि प्रियेण धाम्ना. यत्र देवा इति ब्रवन्.. (१) हे महान् बुद्धि वाले सोम! देवों के अतिशय प्रिय शरीर में धारा के द्वारा शीघ्र गमन करो. तुम यह कहते हुए जाओ— “जहां देव हैं, मैं वहीं जा रहा हूं.” (१) परिष्कृण्वन्ननिष्कृतं जनाय यातयन्निषः. वृष्टिं दिवः परि स्रव.. (२) हे सोम! तुम असंस्कृत स्थान को संस्कृत करते हुए एवं यज्ञ करने वाले यजमान को जन्म देते हुए आकाश से बरसो. (२) सुत एति पवित्र आ त्विषिं दधान ओजसा. विचक्षणो विरोचयन्.. (३) दीप्ति धारण करते हुए एवं सबको देखते हुए निचोड़े गए सोम सबको दीप्त बनाते हैं एवं अपनी शक्ति से दशापवित्र पर जाते हैं. (३) अयं स यो दिवस्परि रघुयामा पवित्र आ. सिन्धोरूर्मा व्यक्षरत्.. (४) दशापवित्र पर सींचे जाते हुए सोम पानी की लहरों के रूप में टपकते हैं एवं द्युलोक के ऊपर तेज चाल से जाते हैं. (४) आविवासन् परावतो अथो अर्वावतः सुतः. इन्द्राय सिच्यते मधु.. (५) निचुड़े हुए सोम दूरवर्ती एवं समीपवर्ती देवों तथा इंद्र की सेवा के लिए मधु के समान सींचे जाते हैं. (५) समीचीना अनूषत हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः. योनावृतस्य सीदत.. (६) हे देवो! भली प्रकार मिले हुए स्तोता स्तुतियां करते हैं एवं पत्थरों की सहायता से हरे रंग के सोम को प्रेरित करते हैं. इसलिए तुम यज्ञ में बैठो. (६) सूक्त—४० देवता—सोम पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृधो विचर्षणिः. शुम्भन्ति विप्रं धीतिभिः.. (१) निचुड़ते हुए एवं सबको देखने वाले सोम सभी हिंसक शत्रुओं को लांघ गए. लोग मेधावी सोम को स्तुतियों द्वारा अलंकृत करते हैं. (१) आ योनिमरुणो रुहदगमदिन्द्रं वृषा सुतः. ध्रुवे सदसि सीदति.. (२) लाल रंग वाले सोम द्रोणकलश में जा रहे हैं. इसके बाद अभिलाषापूरक एवं निचुड़े हुए सोम इंद्र के समीप जाते हैं एवं निश्चित स्थान पर बैठते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

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नू नो रयिं महामिन्दोऽस्मभ्यं सोम विश्वतः. आ पवस्व सहस्रिणम्.. (३) हे निचुड़े हुए सोम! तुम चारों ओर से हमारे लिए अगणित एवं महान् धन लाओ. (३) विश्वा सोम पवमान द्युम्नानीन्दवा भर. विदाः सहस्रिणीरिषः.. (४) हे निचुड़ते हुए दीप्तिशाली सोम! तुम बहुत प्रकार का अन्न हमारे पास लाओ एवं हमें हजारों प्रकार का अन्न दो. (४) स नः पुनान आ भर रयिं स्तोत्रे सुवीर्यम्. जरितुर्वर्धया गिरः.. (५) हे निचुड़ते हुए सोम! तुम हमारे स्तोताओं के लिए शोभन पुत्र वाला धन लाओ तथा उनकी स्तुतियों को बढ़ाओ. (५) पुनान इन्दवा भर सोम द्विबर्हसं रयिम्. वृषन्निन्दो न उक्थ्यम्.. (६) हे निचुड़ते हुए सोम! तुम हमारे लिए द्यावा-पृथिवी में बढ़े हुए धन को लाओ. हे अभिलाषापूरक सोम! तुम हमें स्तुति के योग्य धन दो. (६) सूक्त—४१ देवता—सोम प्र ये गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः. घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम्.. (१) निचुड़े हुए, गतिशील, तेज चलने वाले एवं दीप्तिशाली सोम काले चमड़े वाले लोगों को मारते हुए घूमते हैं, तुम उनकी स्तुति करो. (१) सुवितस्य मनामहेऽति सेतुं दुराव्यम्. साह्वांसो दस्युमव्रतम्.. (२) शोभन-सोम यज्ञ न करने वाले तथा दस्युजनों को पराजित करना चाहते हैं. वे बंधनकारी तथा दुष्टबुद्धि राक्षसों को दबाने की अभिलाषा रखते हैं. हम सोम की इन दोनों इच्छाओं की प्रशंसा करते हैं. (२) शृण्वे वृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुष्मिणः. चरन्ति विद्युतो दिवि.. (३) सोम का शब्द वर्षा के समान सुनाई देता है तथा निचुड़ते हुए एवं शक्तिशाली सोम की दीप्तियां अंतरिक्ष में चलती हैं. (३) आ पवस्व महीमिषं गोमदिन्दो हिरण्यवत्. अश्वावद्वाजवत् सुतः.. (४) हे सोम! तुम निचुड़कर हमारे सामने गायों, स्वर्ण, घोड़ों और बल से युक्त महान् अन्न लाओ. (४)

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स पवस्व विचर्षण आ मही रोदसी पृण. उषाः सूर्यो न रश्मिभिः.. (५) हे सूर्यदर्शक सोम! तुम नीचे की ओर गिरो एवं उस रस से विस्तृत द्यावा-पृथिवी को इस प्रकार पूर्ण कर दो, जिस प्रकार सूर्य किरणों से दिन को पूर्ण करता है. (५) परि णः शर्मयन्त्या धारया सोम विश्वतः. सरा रसेव विष्टपम्.. (६) हे सोम! नदियां अपनी धारा से जिस प्रकार भूलोक को पूर्ण करती हैं, उसी प्रकार तुम अपनी सुखकारी धारा के द्वारा हमें चारों ओर से पूर्ण करो. (६) सूक्त—४२ देवता—सोम जनयन्न्रोचना दिवो जनयन्नप्सु सूर्यम्. वसानो गा अपो हरिः.. (१) ये हरे रंग के सोम द्युलोकसंबंधी नक्षत्र, ग्रह आदि को तथा अंतरिक्ष में सूर्य को उत्पन्न करते हैं. इसके बाद नीचे बहने वाले जल से धरती को ढकते हैं. (१) एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि. धारया पवते सुतः.. (२) प्राचीन स्तोत्र के साथ निचुड़ते हुए ये सोम अपनी धारा से देवों के लिए सब ओर से गिरते हैं. (२) वावृधानाय तूर्वये पवन्ते वाजसातये. सोमाः सहस्रपाजसः.. (३) असीमित शक्ति वाले सोम बढ़े हुए अन्न को शीघ्र पाने के लिए निचोड़े जाते हैं. (३) दुहानः प्रत्नमित्पयः पवित्रे परि षिच्यते. क्रन्दन्देवाँ अजीजनत्.. (४) सोम प्राचीन रस को टपकाते हुए दशापवित्र पर सींचे जाते हैं एवं शब्द करते हुए देवों को अपने समीप उत्पन्न करते हैं. (४) अभि विश्वानि वार्याभि देवाँ ऋतावृधः. सोमः पुनानो अर्षति.. (५) निचोड़े जाते हुए ये सोम सभी वरण करने योग्य धनों एवं यज्ञवर्धक देवों के पास जाते हैं. (५) गोमन्नः सोम वीरवदश्वावद्वाजवत्सुतः. पवस्व बृहतीरिषः.. (६) हे सोम! तुम निचुड़कर हमें गायों, बहुत सी संतानों, घोड़ों तथा संग्राम में प्राप्त धनों के साथ बहुत सा अन्न दो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*