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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

‘शत्रुघ्न! मेरे हृदयमें भी तुम्हारे लिये बड़ा प्रेम है। अतः मैं तुम्हारा मस्तक सँघूँगा। यही स्नेहकी पराकाष्ठा है’॥ १२ ॥

ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् वाल्मीकिने शत्रुघ्नका मस्तक सँघा और उनका तथा उनके साथियोंका आतिथ्य सत्कार किया॥ १३ ॥

नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नने भोजन किया और उस समय श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रका क्रमशः वर्णन सुना, जो गीतकी मधुरताके कारण बड़ा ही प्रिय एवं उत्तम जान पड़ता था॥ १४ ॥

उस वेलामें उन्हें जो रामचरित सुननेको मिला, वह पहले ही काव्यबद्ध कर लिया गया था। वह काव्यगान वीणाकी लयके साथ हो रहा था। हृदय, कण्ठ और मूर्धा—इन तीन स्थानोंमें मन्द्र, मध्यम और तार स्वरके भेदसे उच्चारित हो रहा था। संस्कृत भाषामें निर्मित होकर व्याकरण, छन्द, काव्य और संगीत-शास्त्रके लक्षणोंसे सम्पन्न था और गानोचित तालके साथ गाया गया था॥ १५ १/२ ॥

उस काव्यके सभी अक्षर एवं वाक्य सच्ची घटनाका प्रतिपादन करते थे और पहले जो वृत्तान्त घटित हो चुके थे, उनका यथार्थ परिचय दे रहे थे। वह अद्भुत काव्यगान सुनकर पुरुषसिंह शत्रुघ्न मूर्च्छित-से हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगी॥ १६ १/२ ॥

वे दो घड़ीतक अचेत-से होकर बारम्बार लम्बी साँस खींचते रहे। उस गानमें उन्होंने बीती हुई बातोंको वर्तमानकी भाँति सुना॥ १७ १/२ ॥

राजा शत्रुघ्नके जो साथी थे, वे भी उस गीत-सम्पत्तिको सुनकर दीन और नतमस्तक हो बोले—‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’॥ १८ १/२ ॥

शत्रुघ्नके जो सैनिक वहाँ मौजूद थे, वे परस्पर कहने लगे—‘यह क्या बात है? हमलोग कहाँ हैं? यह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहे हैं। जिन बातोंको हम पहले देख चुके हैं, उन्हींको इस आश्रमपर ज्यों-की-त्यों सुन रहे हैं॥ १९-२० ॥

‘क्या इस उत्तम गीतबन्धको हमलोग स्वप्नमें सुन रहे हैं?’ फिर अत्यन्त विस्मयमें पड़कर वे शत्रुघ्नसे बोले—॥ २१ ॥

‘नरश्रेष्ठ! आप इस विषयमें मुनिवर वाल्मीकिजीसे भलीभाँति पूछें।’ शत्रुघ्नने कौतूहलमें भरे हुए उन सब सैनिकोंसे कहा—‘मुनिके इस आश्रममें ऐसी अनेक आश्चर्यजनक घटनाएँ होती रहती हैं। उनके विषयमें उनसे कुछ पूछताछ करना हमारे लिये उचित नहीं है॥ २२-२३ ॥

‘कौतूहलवश महामुनि वाल्मीकिसे इन बातोंके विषयमें जानना या पूछना उचित न होगा।’ अपने सैनिकोंसे ऐसा कहकर रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न महर्षिको प्रणाम करके अपने खेमेमें चले गये॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥

बहत्तरवाँ सर्ग

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बहत्तरवाँ सर्ग

वाल्मीकिजीसे विदा ले शत्रुघ्नजीका अयोध्यामें जाकर श्रीराम आदिसे मिलना और सात दिनोंतक वहाँ रहकर पुनः मधुपुरीको प्रस्थान करना

सोते समय पुरुषसिंह शत्रुघ्न उस उत्तम श्रीरामचरित्रसम्बन्धी गानके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें सोचते रहे। इसलिये रातमें उन्हें बहुत देरतक नींद नहीं आयी॥ १ ॥

वीणाके लयके साथ उस रामचरित-गानका सुमधुर शब्द सुनकर महात्मा शत्रुघ्नकी शेष रात बहुत जल्दी बीत गयी॥ २ ॥

जब वह रात बीती और प्रातःकाल आया, तब पूर्वाह्नकालोचित नित्यकर्म करके शत्रुघ्नने हाथ जोड़कर मुनिवर वाल्मीकिसे कहा—॥ ३ ॥

‘भगवन्! अब मैं रघुकुलनन्दन श्रीरघुनाथजीका दर्शन करना चाहता हूँ। अतः यदि आपकी आज्ञा हो तो कठोर व्रतका पालन करनेवाले इन साथियोंके साथ मेरी अयोध्या जानेकी इच्छा है’॥ ४ ॥

इस तरहकी बात कहते हुए रघुकुलभूषण शत्रुसूदन शत्रुघ्नको वाल्मीकिजीने हृदयसे लगा लिया और जानेकी आज्ञा दे दी॥ ५ ॥

शत्रुघ्न श्रीरघुनाथजीके दर्शनके लिये उत्कण्ठित थे, इसलिये मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिको प्रणाम करके वे एक सुन्दर दीप्तिमान् रथपर आरूढ़ हो तुरंत अयोध्याकी ओर चल दिये॥ ६ ॥

इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहु श्रीमान् शत्रुघ्न रमणीय अयोध्यापुरीमें प्रवेश करके सीधे उस राजमहलमें गये, जहाँ महातेजस्वी श्रीराम विराजमान थे॥ ७ ॥

जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र देवताओंके बीचमें बैठते हैं, उसी प्रकार पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले भगवान् श्रीराम मन्त्रियोंके मध्यभागमें विराजमान थे। शत्रुघ्नने अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीरामको देखा, प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा—॥ ८-९ ॥

‘महाराज! आपने मुझे जिस कामके लिये आज्ञा दी थी, वह सब मैं कर आया हूँ। पापी लवण मारा गया और उसकी पुरी भी बस गयी॥ १० ॥

‘रघुनन्दन! आपका दर्शन किये बिना ये बारह वर्ष तो किसी प्रकार बीत गये; किंतु नरेश्वर! अब और अधिक कालतक आपसे दूर रहनेका मुझमें साहस नहीं है॥ ११ ॥

‘अमित पराक्रमी काकुत्स्थ! जैसे छोटा बच्चा अपनी माँसे अलग नहीं रह सकता, उसी प्रकार मैं चिरकालतक आपसे दूर नहीं रह सकूँगा। इसलिये आप मुझपर कृपा करें'॥ १२ ॥

ऐसी बातें कहते हुए शत्रुघ्नको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘शूरवीर! विषाद न करो। इस तरह कातर होना क्षत्रियोचित चेष्टा नहीं है॥ १३ ॥

‘रघुकुलभूषण! राजालोग परदेशमें रहनेपर भी दुःखी नहीं होते हैं। रघुवीर! राजाको क्षत्रिय-धर्मके अनुसार प्रजाका भलीभाँति पालन करना चाहिये॥ १४ ॥

‘नरश्रेष्ठ वीर! समय-समयपर मुझसे मिलनेके लिये अयोध्या आया करो और फिर अपनी पुरीको लौट जाया करो॥ १५ ॥

‘निःसंदेह तुम मुझे भी प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हो। परंतु राज्यका पालन करना भी तो आवश्यक कर्तव्य है॥ १६ ॥

‘अतः काकुत्स्थ! अभी सात दिन तो तुम मेरे साथ रहो। उसके बाद सेवक, सेना और सवारियोंके साथ मधुरापुरीको चले जाना’॥ १७ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात धर्मयुक्त होनेके साथ ही मनके अनुकूल थी। इसे सुनकर शत्रुघ्नने श्रीरामवियोगके भयसे दीन वाणीद्वारा कहा—‘जैसी प्रभुकी आज्ञा’॥ १८ ॥

श्रीरघुनाथजीकी आज्ञासे सात दिन अयोध्यामें ठहरकर महाधनुर्धर ककुत्स्थकुलभूषण शत्रुघ्न वहाँसे जानेको तैयार हो गये॥ १९ ॥

सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम, भरत और लक्ष्मणसे विदा ले शत्रुघ्न एक विशाल रथपर आरूढ़ हुए॥ २० ॥

महात्मा लक्ष्मण और भरत पैदल ही उन्हें पहुँचानेके लिये बहुत दूरतक पीछे-पीछे गये। तत्पश्चात् शत्रुघ्न रथके द्वारा शीघ्र ही अपनी राजधानीकी ओर चल दिये॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२॥

तिहत्तरवाँ सर्ग

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तिहत्तरवाँ सर्ग

एक ब्राह्मणका अपने मरे हुए बालकको राजद्वारपर लाना तथा राजाको ही दोषी बताकर विलाप करना

शत्रुघ्नको मथुरा भेजकर भगवान् श्रीराम भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयोंके साथ धर्मपूर्वक राज्यका पालन करते हुए बड़े सुख और आनन्दसे रहने लगे॥ १ ॥

तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद उस जनपदके भीतर रहनेवाला एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुए बालकका शव लेकर राजद्वारपर आया॥ २ ॥

वह स्नेह और दुःखसे आकुल हो नाना प्रकारकी बातें कहता हुआ रो रहा था और बार-बार ‘बेटा! बेटा!’ की पुकार मचाता हुआ इस प्रकार विलाप करता था— ॥

‘हाय! मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके कारण आज इन आँखोंसे मैं अपने इकलौते बेटेकी मृत्यु देख रहा हूँ॥ ४ ॥

‘बेटा! अभी तो तू बालक था। जवान भी नहीं होने पाया था। केवल पाँच हजार दिन* (तेरह वर्ष दस महीने बीस दिन)-की तेरी अवस्था थी। तो भी तू मुझे दुःख देनेके लिये असमयमें ही कालके गालमें चला गया॥ ५ ॥

‘वत्स! तेरे शोकसे मैं और तेरी माता—दोनों थोड़े ही दिनोंमें मर जायेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ ६ ॥

‘मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी मैंने झूठ बात मुँहसे निकाली हो। किसीकी हिंसा की हो अथवा समस्त प्राणियोंमेंसे किसीको भी कभी कष्ट पहुँचाया हो॥ ७ ॥

‘फिर आज किस पापसे मेरा यह बेटा पितृकर्म किये बिना इस बाल्यावस्थामें ही यमराजके घर चला गया॥ ८ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें तो अकाल-मृत्युकी ऐसी भयंकर घटना न पहले कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी॥ ९ ॥

‘निस्संदेह श्रीरामका ही कोऽइ महान् दुष्कर्म है, जिससे इनके राज्यमें रहनेवाले बालकोंकी मृत्यु होने लगी॥ १० ॥

‘दूसरे राज्यमें रहनेवाले बालकोंको मृत्युसे भय नहीं है; अतः राजन्! मृत्युके वशमें पड़े हुए इस बालकको जीवित कर दो, नहीं तो मैं अपनी स्त्रीके साथ इस राजद्वारपर अनाथकी भाँति प्राण दे दूँगा। श्रीराम! फिर ब्रह्महत्याका पाप लेकर तुम सुखी होना॥ ११-१२ ॥

‘महाबली नरेश! हम तुम्हारे राज्यमें बड़े सुखसे रहे हैं, इसलिये तुम अपने भाइयोंके साथ दीर्घजीवी होओगे॥ १३ ॥

‘श्रीराम! तुम्हारे अधीन रहनेवाले हमलोगोंपर यह बालक-मरणरूपी दुःख सहसा आ पड़ा है, जिससे हम स्वयं भी कालके अधीन हो गये हैं; अतः तुम्हारे इस राज्यमें हमें थोड़ा-सा भी सुख नहीं मिला॥ १४ ॥

‘महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंका यह राज्य अब अनाथ हो गया है। श्रीरामको स्वामीके रूपमें पाकर यहाँ बालकोंकी मृत्यु अटल है॥ १५ ॥

‘राजाके दोषसे जब प्रजाका विधिवत् पालन नहीं होता, तभी प्रजावर्गको ऐसी विपत्तियोंका सामना करना पड़ता है। राजाके दुराचारी होनेपर ही प्रजाकी अकाल-मृत्यु होती है॥ १६ ॥

‘अथवा नगरों तथा जनपदोंमें रहनेवाले लोग जब अनुचित कर्म—पापाचार करते हैं और वहाँ रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं होती, उन्हें अनुचित कर्मसे रोकनेके लिये कोई उपाय नहीं किया जाता, तभी देशकी प्रजामें अकाल-मृत्युका भय प्राप्त होता है॥ १७ ॥

‘अतः यह स्पष्ट है कि नगर या राज्यमें कहीं राजासे ही कोई अपराध हुआ होगा; तभी इस तरह बालककी मृत्यु हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है’॥

इस तरह अनेक प्रकारके वाक्योंसे उसने बारम्बार राजाके सामने अपना दुःख निवेदन किया और बारम्बार शोकसे संतप्त होकर वह अपने मरे हुए पुत्रको उठा-उठाकर हृदयसे लगाता रहा॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७३॥

चौहत्तरवाँ सर्ग

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चौहत्तरवाँ सर्ग

नारदजीका श्रीरामसे एक तपस्वी शूद्रके अधर्माचरणको ब्राह्मण-बालककी मृत्युमें कारण बताना

महाराज श्रीरामने उस ब्राह्मणका इस तरह दुःख और शोकसे भरा हुआ वह सारा करुण-क्रन्दन सुना॥ १ ॥

इससे वे दुःखसे संतप्त हो उठे। उन्होंने अपने मन्त्रियोंको बुलाया तथा वसिष्ठ और वामदेवको एवं महाजनोंसहित अपने भाइयोंको भी आमन्त्रित किया॥ २ ॥

तदनन्तर वसिष्ठजीके साथ आठ ब्राह्मणोंने राजसभामें प्रवेश किया और उन देवतुल्य नरेशसे कहा—‘महाराज! आपकी जय हो’॥ ३ ॥

उन आठोंके नाम इस प्रकार हैं—मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, काश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम तथा नारद॥ ४ ॥

इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्तम आसनोंपर बैठाया गया। वहाँ पधारे हुए उन महर्षियोंको श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और वे स्वयं भी अपने स्थानपर बैठ गये॥ ५ ॥

फिर मन्त्री और महाजनोंके साथ यथायोग्य शिष्टाचारका उन्होंने निर्वाह किया। उद्दीप्त तेजवाले वे सब लोग जब यथास्थान बैठ गये, तब श्रीरघुनाथजीने उनसे सब बातें बतायीं और कहा—‘यह ब्राह्मण राजद्वारपर धरना दिये पड़ा है’॥ ६ १/२ ॥

ब्राह्मणके दुःखसे दुःखी हुए उन महाराजका यह वचन सुनकर अन्य सब ऋषियोंके समीप स्वयं नारदजीने यह शुभ बात कही—॥ ७ १/२ ॥

‘राजन्! जिस कारणसे इस बालककी अकाल-मृत्यु हुई है, वह बताता हूँ, सुनिये। रघुकुलनन्दन नरेश! मेरी बात सुनकर जो उचित कर्तव्य हो उसका पालन कीजिये॥ ८ १/२ ॥

‘राजन्! पहले सत्ययुगमें केवल ब्राह्मण ही तपस्वी हुआ करते थे। महाराज! उस समय ब्राह्मणेतर मनुष्य किसी तरह तपस्यामें प्रवृत्त नहीं होता था॥ ९ १/२ ॥

‘वह युग तपस्याके तेजसे प्रकाशित होता था। उसमें ब्राह्मणोंकी ही प्रधानता थी। उस समय अज्ञानका वातावरण नहीं था। इसलिये उस युगके सभी मनुष्य अकाल-मृत्युसे रहित तथा त्रिकालदर्शी होते थे॥ १० १/२ ॥

‘सत्ययुगके बाद त्रेतायुग आया। इसमें सुदृढ़ शरीरवाले क्षत्रियोंकी प्रधानता हुई और वे क्षत्रिय भी उसी प्रकारकी तपस्या करने लगे॥ ११ १/२ ॥

‘परंतु त्रेतायुगमें जो महात्मा पुरुष हैं, उनकी अपेक्षा सत्ययुगके लोग तप और पराक्रमकी दृष्टिसे बढ़े-चढ़े थे॥ १२ १/२ ॥

‘इस प्रकार दोनों युगोंमेंसे पूर्व युगमें जहाँ ब्राह्मण उत्कृष्ट और क्षत्रिय अपकृष्ट थे, वहाँ त्रेतायुगमें वे समानशक्तिशाली हो गये॥ १३ १/२ ॥

‘तब मनु आदि सभी धर्मप्रवर्तकोंने ब्राह्मण और क्षत्रियमें एककी अपेक्षा दूसरेमें कोई विशेषता या न्यूनाधिकता न देखकर सर्वलोकसम्मत चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाकी स्थापना की॥ १४ १/२ ॥

‘त्रेतायुग वर्णाश्रम-धर्म-प्रधान है। वह धर्मके प्रकाशसे प्रकाशित होता है। वह धर्ममें बाधा डालनेवाले पापसे रहित है। इस युगमें अधर्मने भूतलपर अपना एक पैर रखा है। अधर्मसे युक्त होनेके कारण यहाँ लोगोंका तेज धीरे-धीरे घटता जायगा॥ १५-१६ ॥

‘सत्ययुगमें जीविकाका साधनभूत कृषि आदि रजोगुणमूलक कर्म ‘अनृत’ कहलाता था और मलके समान अत्यन्त त्याज्य था। वह अनृत ही अधर्मका एक पाद होकर त्रेतामें इस भूतलपर स्थित हुआ॥ १७ ॥

‘इस प्रकार अनृत (असत्य) रूपी एक पैरको भूतलपर रखकर अधर्मने त्रेतामें सत्ययुगकी अपेक्षा आयुको सीमित कर दिया॥ १८ ॥

‘अतः पृथ्वीपर अधर्मके इस अनृतरूपी चरणके पड़नेपर सत्यधर्मपरायण पुरुष उस अनृतके कुपरिणामसे बचनेके लिये शुभकर्मोंका ही आचरण करते हैं॥ १९ ॥

‘तथापि त्रेतायुगमें जो ब्राह्मण और क्षत्रिय हैं, वे ही सब तपस्या करते हैं। अन्य वर्णके लोग सेवा-कार्य किया करते हैं॥ २० ॥

‘उन चारों वर्णोंमेंसे वैश्य और शूद्रको सेवारूपी उत्कृष्ट धर्म स्वधर्मके रूपमें प्राप्त हुआ (वैश्य कृषि आदिके द्वारा ब्राह्मण आदिकी सेवा करने लगे और) शूद्र सब वर्णोंकी (तीनों वर्णोंके लोगोंकी) विशेषरूपसे पूजा—आदर-सत्कार करने लगे॥ २१ ॥

‘नृपश्रेष्ठ! इसी बीचमें जब त्रेतायुगका अवसान होता है और वैश्यों तथा शूद्रोंको अधर्मके एक-पादरूप अनृतकी प्राप्ति होने लगती है, तब पूर्व वर्णवाले ब्राह्मण और क्षत्रिय फिर ह्रासको

प्राप्त होने लगते हैं (क्योंकि उन दोनोंको अन्तिम दो वर्णोंका संसर्गजनित दोष प्राप्त हो जाता है)॥ २२ ॥

'तदनन्तर अधर्म अपने दूसरे चरणको पृथ्वीपर उतारता है। द्वितीय पैर उतारनेके कारण ही उस युगकी 'द्वापर' संज्ञा हो गयी है॥ २३ ॥

'पुरुषोत्तम! उस द्वापर नामक युगमें जो अधर्मके दो चरणोंका आश्रय है—अधर्म और अनृत दोनोंकी वृद्धि होने लगती है॥ २४ ॥

'इस द्वापरयुगमें तपस्यारूप कर्म वैश्योंको भी प्राप्त होता है। इस तरह तीन युगोंमें क्रमशः तीन वर्णोंको तपस्याका अधिकार प्राप्त होता है॥ २५ ॥

'तीन युगोंमें तीन वर्णोंका ही आश्रय लेकर तपस्यारूपी धर्म प्रतिष्ठित होता है; किंतु नरश्रेष्ठ! शूद्रको इन तीनों ही युगोंसे तपरूपी धर्मका अधिकार नहीं प्राप्त होता है॥ २६ ॥

'नृपशिरोमणे! एक समय ऐसा आयगा, जब हीन वर्णका मनुष्य भी बड़ी भारी तपस्या करेगा। कलियुग आनेपर भविष्यमें होनेवाली शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्योंके समुदायमें तपश्चर्याकी प्रवृत्ति होगी॥ २७ ॥

'राजन्! द्वापरमें भी शूद्रका तपमें प्रवृत्त होना महान् अधर्म माना गया है। (फिर त्रेताके लिये तो कहना ही क्या है?) महाराज! निश्चय ही आपके राज्यकी किसी सीमापर कोऽई खोटी बुद्धिवाला शूद्र महान् तपका आश्रय ले तपस्या कर रहा है, उसीके कारण इस बालककी मृत्यु हुऽई है॥ २८ १/२ ॥

'जो कोऽई भी दुर्बुद्धि मानव जिस किसी भी राजाके राज्य अथवा नगरमें अधर्म या न करने योग्य काम करता है, उसका वह कार्य उस राज्यके अनैश्वर्य (दरिद्रता)-का कारण बन जाता है और वह राजा शीघ्र ही नरकमें पड़ता है, इसमें संशय नहीं॥ २९-३० ॥

'इसी प्रकार जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, वह प्रजाके वेदाध्ययन, तप और शुभ कर्मोंके पुण्यका छठा भाग प्राप्त कर लेता है॥ ३१ ॥

'पुरुषसिंह! जो प्रजाके शुभ कर्मोंके छठे भागका उपभोक्ता है, वह प्रजाकी रक्षा कैसे नहीं करेगा? अतः आप अपने राज्यमें खोज कीजिये और जहाँ कोऽई दुष्कर्म दिखायी दे, वहाँ उसके रोकनेका प्रयत्न कीजिये॥ ३२ १/२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे धर्मकी वृद्धि होगी और मनुष्योंकी आयु बढ़ेगी। साथ ही इस बालकको भी नया जीवन प्राप्त होगा’॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७४॥

पचहत्तरवाँ सर्ग

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पचहत्तरवाँ सर्ग

श्रीरामका पुष्पकविमानद्वारा अपने राज्यकी सभी दिशाओंमें घूमकर दुष्कर्मका पता लगाना, किंतु सर्वत्र सत्कर्म ही देखकर दक्षिण दिशामें एक शूद्र तपस्वीके पास पहुँचना

नारदजीके ये अमृतमय वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको अपार आनन्द प्राप्त हुआ और उन्होंने लक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘सौम्य! जाओ। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले इन द्विजश्रेष्ठको सान्त्वना दो और इनके बालकका शरीर उत्तम गन्ध एवं सुगन्धसे युक्त तेलसे भरे हुए काठके कठौते या डोंगीमें डुबाकर रखवा दो और ऐसी व्यवस्था कर दो जिससे बालकका शरीर विकृत या नष्ट न होने पाये॥ २-३ ॥

‘शुभ कर्म करनेवाले इस बालकका शरीर जिस प्रकार सुरक्षित रहे, नष्ट या खण्डित न हो, वैसा प्रबन्ध करो’॥ ४ ॥

शुभलक्षण लक्ष्मणको ऐसा संदेश दे महायशस्वी श्रीरघुनाथजीने मन-ही-मन पुष्पकका चिन्तन किया और कहा—‘आ जाओ’॥ ५ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका अभिप्राय समझकर सुवर्णभूषित पुष्पक-विमान एक ही मुहूर्तमें उनके पास आ गया॥ ६ ॥

आकर नतमस्तक हो वह बोला—‘नरेश्वर! यह रहा मैं। महाबाहो! मैं सदा आपके अधीन रहनेवाला किङ्कर हूँ और सेवाके लिये उपस्थित हुआ हूँ’॥ ७ ॥

पुष्पकविमानका यह मनोहर वचन सुनकर वे महाराज श्रीराम महर्षियोंको प्रणाम करके उस विमानपर आरूढ़ हुए॥

उन्होंने धनुष, बाणोंसे भरे हुए दो तरकस और एक चमचमाती हुई तलवार हाथमें ले ली और लक्ष्मण तथा भरत—इन दोनों भाइयोंको नगरकी रक्षामें नियुक्त करके वहाँसे प्रस्थान किया॥ ९ ॥

श्रीमान् राम पहले तो इधर-उधर खोजते हुए पश्चिम दिशाकी ओर गये। फिर हिमालयसे घिरी हुई उत्तर दिशामें जा पहुँचे॥ १० ॥

जब उन दोनों दिशाओंमें कहीं थोड़ा-सा भी दुष्कर्म नहीं दिखायी दिया, तब नरेश्वर श्रीरामने समूची पूर्व दिशाका भी निरीक्षण किया॥ ११ ॥

पुष्पकपर बैठे हुए महाबाहु राजा श्रीरामने वहाँ भी शुद्ध सदाचारका पालन होता देखा। वह दिशा भी दर्पणके समान निर्मल दिखायी दी॥ १२ ॥

तब राजर्षिनन्दन रघुनाथजी दक्षिण दिशाकी ओर गये। वहाँ शैवल पर्वतके उत्तर भागमें उन्हें एक महान् सरोवर दिखायी दिया॥ १३ ॥

उस सरोवरके तटपर एक तपस्वी बड़ी भारी तपस्या कर रहा था। वह नीचेको मुख किये लटका हुआ था। रघुकुलनन्दन श्रीरामने उसे देखा॥ १४ ॥

देखकर राजा श्रीरघुनाथजी उग्र तपस्या करते हुए उस तपस्वीके पास आये और बोले—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तापस! तुम धन्य हो। तपस्यामें बढ़े-चढ़े सुदृढ़ पराक्रमी पुरुष! तुम किस जातिमें उत्पन्न हुए हो? मैं दशरथकुमार राम तुम्हारा परिचय जाननेके कौतूहलसे ये बातें पूछ रहा हूँ॥ १५-१६ ॥

‘तुम्हें किस वस्तुको पानेकी इच्छा है? तपस्याद्वारा संतुष्ट हुए इष्टदेवतासे वरके रूपमें तुम क्या पाना चाहते हो—स्वर्ग या दूसरी कोई वस्तु! कौन-सा ऐसा पदार्थ है, जिसके लिये तुम ऐसी कठोर तपस्या करते हो, जो दूसरोंके लिये दुष्कर है?॥ १७ ॥

‘तापस! जिस वस्तुके लिये तुम तपस्यामें लगे हुए हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। इसके सिवा यह भी बताओ कि तुम ब्राह्मण हो या दुर्जय क्षत्रिय? तीसरे वर्णके वैश्य हो अथवा शूद्र! तुम्हारा भला हो। ठीक-ठीक बताना’॥ १८ ॥

महाराज श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर नीचे सिर किये लटके हुए उस तपस्वीने उन नृपश्रेष्ठ दशरथनन्दन श्रीरामको अपनी जातिका परिचय दिया और जिस उद्देश्यसे उसने तपस्याके लिये प्रयास किया था, वह भी बताया॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७५॥

छिहत्तरवाँ सर्ग

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छिहत्तरवाँ सर्ग

श्रीरामके द्वारा शम्बूकका वध, देवताओंद्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्‍याश्रमपर महर्षि अगस्‍त्‍यके द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण-दान

क्लेशरहित कर्म करनेवाले भगवान् रामका यह वचन सुनकर नीचे मस्तक किये लटका हुआ वह तथाकथित तपस्वी इस प्रकार बोला— ॥ १ ॥

‘महायशस्वी श्रीराम! मैं शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ और सदेह स्वर्गलोकमें जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूँ। इसीलिये ऐसा उग्र तप कर रहा हूँ॥ २ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं झूठ नहीं बोलता। देवलोकपर विजय पानेकी इच्छासे ही तपस्यामें लगा हूँ। आप मुझे शूद्र समझिये। मेरा नाम शम्बूक है’॥ ३ ॥

वह इस प्रकार कह ही रहा था कि श्रीरामचन्द्रजीने म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींच ली और उसीसे उसका सिर काट लिया॥ ४ ॥

उस शूद्रका वध होते ही इन्द्र और अग्निसहित सम्पूर्ण देवता ‘बहुत ठीक, बहुत ठीक’ कहकर भगवान् श्रीरामकी बारम्बार प्रशंसा करने लगे॥ ५ ॥

उस समय उनके ऊपर सब ओरसे वायुदेवताद्वारा बिखेरे गये दिव्य एवं परम सुगन्धित पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी॥ ६ ॥

वे सब देवता अत्यन्त प्रसन्न होकर सत्यपराक्रमी श्रीरामसे बोले—‘देव! महामते! आपने यह देवताओंका ही कार्य सम्पन्न किया है॥ ७ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन सौम्य श्रीराम! आपके इस सत्कर्मसे ही यह शूद्र सशरीर स्वर्गलोकमें नहीं जा सका है। अतः आप जो वर चाहें माँग लें’॥ ८ ॥

देवताओंका यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने दोनों हाथ जोड़ सहस्रनेत्रधारी देवराज इन्द्रसे कहा—॥

‘यदि देवता मुझपर प्रसन्न हैं तो वह ब्राह्मणपुत्र जीवित हो जाय। यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वर है। देवतालोग मुझे यही वर दें॥ १० ॥

‘मेरे ही किसी अपराधसे ब्राह्मणका वह इकलौता बालक असमयमें ही कालके गालमें चला गया है॥

'मैंने ब्राह्मणके सामने यह प्रतिज्ञा की है कि 'मैं आपके पुत्रको जीवित कर दूँगा।' अतः आपलोगोंका कल्याण हो। आप उस ब्राह्मण-बालकको जीवित कर दें। मेरी बातको झूठी न करें'॥ १२ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर वे विबुधशिरोमणि देवता उनसे प्रसन्नतापूर्वक बोले —॥ १३ ॥

'ककुत्स्थकुलभूषण! आप संतुष्ट हों। वह बालक आज फिर जीवित हो गया और अपने भार्इ-बन्धुओंसे जा मिला॥ १४ ॥

'काकुत्स्थ! आपने जिस मुहूर्तमें इस शूद्रको धराशायी किया है, उसी मुहूर्तमें वह बालक जी उठा है॥ १५ ॥

'नरश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। भला हो। अब हम अगस्त्याश्रमको जा रहे हैं। रघुनन्दन! हम महर्षि अगस्त्यका दर्शन करना चाहते हैं। उन्हें जलशय्या लिये पूरे बारह वर्ष बीत चुके हैं। अब उन महातेजस्वी ब्रह्मर्षिकी वह जलशयन-सम्बन्धी व्रतकी दीक्षा समाप्त हुर्इ है॥ १६-१७ ॥

'रघुनन्दन! इसीलिये हमलोग उन महर्षिका अभिनन्दन करनेके लिये जायँगे। आपका कल्याण हो। आप भी उन मुनिश्रेष्ठका दर्शन करनेके लिये चलिये'॥ १८ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर रघुकुलनन्दन श्रीराम देवताओंके सामने वहाँ जानेकी प्रतिज्ञा करके उस सुवर्णभूषित पुष्पकविमानपर चढ़े॥ १९ ॥

तत्पश्चात् देवता बहुसंख्यक विमानोंपर आरूढ़ हो वहाँसे प्रस्थित हुए। फिर श्रीराम भी उन्हींके साथ शीघ्रतापूर्वक कुम्भज ऋषिके तपोवनको चल दिये॥ २० ॥

देवताओंको आया देख तपस्याकी निधि धर्मात्मा अगस्त्यने उन सबकी समानरूपसे पूजा की॥ २१ ॥

उनकी पूजा ग्रहण करके उन महामुनिका अभिनन्दन कर वे सब देवता अनुचरोंसहित बड़े हर्षके साथ स्वर्गको चले गये॥ २२ ॥

उनके चले जानेपर श्रीरघुनाथजीने पुष्पकविमानसे उतरकर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको प्रणाम किया॥ २३ ॥

अपने तेजसे प्रज्वलित-से होनेवाले महात्मा अगस्त्यका अभिवादन करके उनसे उत्तम आतिथ्य पाकर नरेश्वर श्रीराम आसनपर बैठे॥ २४ ॥

उस समय महातेजस्वी महातपस्वी कुम्भज मुनिने कहा—‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है। आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २५ ॥

‘महाराज श्रीराम! बहुत-से उत्तम गुणोंके कारण आपके लिये मेरे हृदयमें बड़ा सम्मान है। आप मेरे आदरणीय अतिथि हैं और सदा मेरे मनमें बसे रहते हैं॥ २६ ॥

‘देवतालोग कहते थे कि ‘आप अधर्मपरायण शूद्रका वध करके आ रहे हैं तथा धर्मके बलसे आपने ब्राह्मणके उस मरे हुए पुत्रको जीवित कर दिया है’॥ २७ ॥

‘रघुनन्दन! आज रातको आप मेरे ही पास इस आश्रममें निवास कीजिये। कल सबेरे पुष्पकविमानद्वारा अपने नगरको जाइयेगा। आप साक्षात् श्रीमान् नारायण हैं। सारा जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है और आप ही समस्त देवताओंके स्वामी तथा सनातन पुरुष हैं॥ २८-२९ ॥

‘सौम्य! यह विश्वकर्माका बनाया हुआ दिव्य आभूषण है, जो अपने दिव्य रूप और तेजसे प्रकाशित हो रहा है॥ ३० ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन! आप इसे लीजिये और मेरा प्रिय कीजिये; क्योंकि किसीकी दी हुई वस्तुका पुनः दान कर देनेसे महान् फलकी प्राप्ति बतायी जाती है॥ ३१ ॥

‘इस आभूषणको धारण करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं तथा बड़े-से-बड़े फलोंकी प्राप्ति करानेकी शक्ति भी आपमें ही है। आप इन्द्र आदि देवताओंको भी तारनेमें समर्थ हैं, इसलिये नरेश्वर! यह भूषण भी मैं आपको ही दूँगा। आप इसे विधिपूर्वक ग्रहण करें’॥ ३२ १/२ ॥

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और इक्ष्वाकुकुलके महारथी वीर श्रीरामने क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए वहाँ महात्मा अगस्त्यजीसे कहा—‘भगवन्! दान लेनेका काम तो केवल ब्राह्मणके लिये ही निन्दित नहीं है॥ ३३-३४ ॥

‘विप्रवर! क्षत्रियोंके लिये तो प्रतिग्रह स्वीकार करना अत्यन्त निन्दित बताया गया है। फिर क्षत्रिय प्रतिग्रह—विशेषतः ब्राह्मणका दिया हुआ दान कैसे ले सकता है? यह बतानेकी कृपा करें’॥ ३५ १/२ ॥

श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर महर्षि अगस्त्यने उत्तर दिया—‘रघुनन्दन! पहले ब्रह्मस्वरूप सत्ययुगमें सारी प्रजा बिना राजाके ही थी, आगे चलकर इन्द्र देवताओंके राजा बनाये गये॥ ३६-३७॥

‘तब सारी प्रजाएँ देवदेवेश्वर ब्रह्माजीके पास राजाके लिये गयीं और बोलीं—‘देव! आपने इन्द्रको देवताओंके राजाके पदपर स्थापित किया है। इसी तरह हमारे लिये भी किसी श्रेष्ठ पुरुषको राजा बना दीजिये, जिसकी पूजा करके हम पापरहित हो इस भूतलपर विचरें॥ ३८-३९॥

‘हम बिना राजाके नहीं रहेंगी। यह हमारा उत्तम निश्चय है।' तब सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने इन्द्रसहित समस्त लोकपालोंको बुलाकर कहा—‘तुम सब लोग अपने तेजका एक-एक भाग दो।' तब समस्त लोकपालोंने अपने-अपने तेजका भाग अर्पित किया॥ ४०-४१॥

‘उसी समय ब्रह्माजीको छींक आयी, जिससे क्षुप नामक राजा उत्पन्न हुआ। ब्रह्माजीने उस राजाको लोकपालोंके दिये हुए तेजके उन सभी भागोंसे संयुक्त कर दिया॥ ४२॥

‘तत्पश्चात् उन्होंने क्षुपको ही उन प्रजाजनोंके लिये उनके शासक नरेशके रूपमें समर्पित किया। क्षुपने वहाँ राजा होकर इन्द्रके दिये हुए तेजोभागसे पृथ्वीका शासन किया॥ ४३॥

‘वरुणके तेजोभागसे वे भूपाल प्रजाके शरीरका पोषण करने लगे। कुबेरके तेजोभागसे उन्होंने उन्हें धनपतिकी आभा प्रदान की तथा उनमें जो यमराजका तेजोभाग था, उससे वे प्रजाजनोंको अपराध करनेपर दण्ड देते थे॥ ४४ १/२॥

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आप भी राजा होनेके कारण सभी लोकपालोंके तेजसे सम्पन्न हैं। अतः प्रभो! इन्द्र-सम्बन्धी तेजोभागके द्वारा आप मेरे उद्धारके लिये यह आभूषण ग्रहण कीजिये। आपका भला हो'॥ ४५ १/२॥

तब भगवान् श्रीराम उन महात्मा मुनिके दिये हुए उस सूर्यके समान दीप्तिमान्, दिव्य, विचित्र एवं उत्तम आभूषणको ग्रहण करके उसकी उपलब्धिके विषयमें पूछने लगे—॥ ४६-४७ १/२॥

‘महायशस्वी मुने! यह अत्यन्त अद्भुत तथा दिव्य आकारसे युक्त आभूषण आपको कैसे प्राप्त हुआ, अथवा इसे कौन कहाँसे ले आया? ब्रह्मन्! मैं कौतूहलवश ये बातें आपसे पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप बहुत-से आश्चर्योंकी उत्तम निधि हैं'॥ ४८-४९ १/२॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर मुनिवर अगस्त्यने कहा—‘श्रीराम! पूर्व चतुर्युगीके त्रेतायुगमें जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसे बताता हूँ सुनिये’॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६॥

सतहत्तरवाँ सर्ग

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सतहत्तरवाँ सर्ग

महर्षि अगस्त्यका एक स्वर्गीय पुरुषके शवभक्षणका प्रसंग सुनाना

(अगस्त्यजी कहते हैं—) श्रीराम! प्राचीनकालके त्रेतायुगकी बात है, एक बहुत ही विस्तृत वन था, जो चारों ओर सौ योजनतक फैला हुआ था; परंतु उस वनमें न तो कोऽइ पशु था और न पक्षी ही॥ १ ॥

सौम्य! उस निर्जन वनमें उत्तम तपस्या करनेके लिये घूम-घूमकर उपयुक्त स्थानका पता लगानेके निमित्त मैं वहाँ गया॥ २ ॥

उस वनका स्वरूप कितना सुखदायी था, यह बतानेमें मैं असमर्थ हूँ। सुखद स्वादिष्ट फल-मूल तथा अनेक रूप-रंगके वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ३ ॥

उस वनके मध्यभागमें एक सरोवर था, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी थी। उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी फैले हुए थे और चक्रवाकोंके जोड़े उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ४ ॥

उसमें कमल और उत्पल छा रहे थे। सेवारका कहीं नाम भी नहीं था। वह परम उत्तम सरोवर अत्यन्त आश्चर्यमय-सा जान पड़ता था। उसका जल पीनेमें अत्यन्त सुखद एवं स्वादिष्ट था॥ ५ ॥

उसमें कीचड़ नहीं था, वह सर्वथा निर्मल था। उसे कोऽइ पार नहीं कर सकता था। उसके भीतर सुन्दर पक्षी कलरव कर रहे थे। उस सरोवरके पास ही एक विशाल, अद्भुत एवं अत्यन्त पवित्र पुराना आश्रम था; जिसमें एक भी तपस्वी नहीं था॥ ६ १/२ ॥

पुरुषप्रवर! जेठकी रातमें मैं उस आश्रमके भीतर एक रात रहा और प्रातःकाल सबेरे उठकर स्नान आदिके लिये उस सरोवरके तटपर जाने लगा॥ ७ १/२ ॥

उसी समय मुझे वहाँ एक शव दिखायी दिया जो हृष्ट-पुष्ट होनेके साथ ही अत्यन्त निर्मल था। उसमें कहीं कोऽइ मलिनता नहीं थी। नरेश्वर! वह शव उस जलाशयके तटपर बड़ी शोभासे सम्पन्न होकर पड़ा था॥ ८ १/२ ॥

प्रभो! रघुनन्दन! मैं उस शवके विषयमें यह सोचता हुआ कि 'यह क्या है?' वहाँ दो घड़ीतक उस तालाबके किनारे बैठा रहा॥ ९ १/२ ॥

दो घड़ी बीतते ही मैंने वहाँ एक दिव्य, अद्भुत, अत्यन्त उत्तम, हंसयुक्त और मनके समान वेगशाली विमान उतरता देखा। रघुनन्दन! उस विमानपर एक स्वर्गवासी देवता बैठे थे, जो अत्यन्त रूपवान् थे। वीर! वहाँ उनकी सेवामें सहस्रों अप्सराएँ बैठी थीं, जो दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थीं॥ १०-११ १/२ ॥

उनमेंसे कुछ मनोहर गीत गा रही थीं, दूसरी मृदङ्ग, वीणा और पणव आदि बाजे बजा रही थीं। अन्य बहुत-सी अप्सराएँ नृत्य करती थीं तथा प्रफुल्ल कमल-जैसे नेत्रोंवाली अन्य कितनी ही अप्सराएँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एवं चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल बहुमूल्य चवँर लेकर उन स्वर्गवासी देवताके मुखपर हवा कर रही थीं॥ १२-१३ १/२ ॥

रघुकुलनन्दन श्रीराम! तदनन्तर जैसे अंशुमाली सूर्य मेरुपर्वतके शिखरको छोड़कर नीचे उतरते हैं, उसी प्रकार उन स्वर्गवासी पुरुषने विमानसे उतरकर मेरे देखते-देखते उस शवका भक्षण किया॥ १४-१५ ॥

इच्छानुसार उस सुपुष्ट एवं प्रचुर मांसको खाकर वे स्वर्गीय देवता सरोवरमें उतरे और हाथ-मुँह धोने लगे॥ १६ ॥

रघुनन्दन! यथोचित रीतिसे कुल्ला-आचमन करके वे स्वर्गवासी पुरुष उस उत्तम एवं श्रेष्ठ विमानपर चढ़नेको उद्यत हुए॥ १७ ॥

पुरुषोत्तम! उन देवतुल्य पुरुषको विमानपर चढ़ते देख मैंने उनसे यह बात पूछी—॥ १८ ॥

‘सौम्य! देवोपम पुरुष! आप कौन हैं और किसलिये ऐसा घृणित आहार ग्रहण करते हैं? यह बतानेका कष्ट करें॥ १९ ॥

‘देवतुल्य तेजस्वी पुरुष! ऐसा दिव्य स्वरूप और ऐसा घृणित आहार किसका हो सकता है? सौम्य! आपमें ये दोनों आश्चर्यजनक बातें हैं, अतः मैं इसका यथार्थ रहस्य सुनना चाहता हूँ; क्योंकि मैं इस शवको आपके योग्य आहार नहीं मानता हूँ’॥ २० ॥

नरेश्वर! जब कौतूहलवश मैंने मधुर वाणीमें उन स्वर्गीय पुरुषसे इस प्रकार पूछा, तब मेरी बातें सुनकर उन्होंने यह सब कुछ मेरे सामने बताया॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७७॥

अठहत्तरवाँ सर्ग

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अठहत्तरवाँ सर्ग

राजा श्वेतका अगस्त्यजीको अपने लिये घृणित आहारकी प्राप्तिका कारण बताते हुए ब्रह्माजीके साथ हुए अपनी वार्ताको उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषणका दान दे भूख-प्यासके कष्टसे मुक्त होना

(अगस्त्यजी कहते हैं—) रघुकुलनन्दन राम! मेरी कही हुई शुभ अक्षरोंसे युक्त बात सुनकर उन स्वर्गीय पुरुषने हाथ जोड़कर इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥

‘ब्रह्मन्! आप जो कुछ पूछ रहे हैं, वह मेरे सुख-दुःखका अलङ्घनीय कारण, जो पूर्वकालमें घटित हो चुका है, यहाँ बताया जाता है, सुनिये॥ २ ॥

‘पूर्वकालमें मेरे महायशस्वी पिता विदर्भ देशके राजा थे। उनका नाम सुदेव था। वे तीनों लोकोंमें विख्यात पराक्रमी थे॥ ३ ॥

‘ब्रह्मन्! उनके दो पत्नियाँ थीं, जिनके गर्भसे उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए। उनमें ज्येष्ठ मैं था। मेरी श्वेतके नामसे प्रसिद्धि हुई और मेरे छोटे भाईका नाम सुरथ था॥ ४ ॥

‘पिताके स्वर्गलोकमें चले जानेपर पुरवासियोंने राजाके पदपर मेरा अभिषेक कर दिया। वहाँ परम सावधान रहकर मैंने धर्मके अनुकूल राज्यका पालन किया॥ ५ ॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षे! इस तरह धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा तथा राज्यका शासन करते हुए मेरे एक सहस्र वर्ष बीत गये॥ ६ ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! एक समय मुझे किसी निमित्तसे अपनी आयुका पता लग गया और मैंने मृत्यु-तिथिको हृदयमें रखकर वहाँसे वनको प्रस्थान किया॥ ७ ॥

‘उस समय मैं इसी दुर्गम वनमें आया, जिसमें न पशु हैं न पक्षी। वनमें प्रवेश करके मैं इसी सरोवरके सुन्दर तटके निकट तपस्या करनेके लिये बैठा॥ ८ ॥

‘राज्यपर अपने भाई राजा सुरथका अभिषेक करके इस सरोवरके समीप आकर मैंने दीर्घकालतक तपस्या की॥ ९ ॥

‘इस विशाल वनमें तीन हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके मैं परम उत्तम ब्रह्मलोकको प्राप्त हुआ॥ १० ॥