श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
सैंतीसवाँ सर्ग
सैंतीसवाँ सर्ग
श्रीरामका सभासदोंके साथ राजसभामें बैठना
ककुत्स्थकुलभूषण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजीका धर्मपूर्वक राज्याभिषेक हो जानेपर पुरवासियोंका हर्ष बढ़ानेवाली उनकी पहली रात्रि व्यतीत हुई॥ १ ॥
वह रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब प्रातःकाल महाराज श्रीरामको जगानेवाले सौम्य वन्दीजन राजमहलमें उपस्थित हुए॥ २ ॥
उनके कण्ठ बड़े मधुर थे। वे संगीतकी कलामें किन्नरोंके समान सुशिक्षित थे। उन्होंने बड़े हर्षमें भरकर यथावत्-रूपसे वीर नरेश श्रीरघुनाथजीका स्तवन आरम्भ किया॥ ३ ॥
‘श्रीकौसल्याजीका आनन्द बढ़ानेवाले सौम्य-स्वरूप वीर श्रीरघुवीर! आप जागिये। महाराज! आपके सोये रहनेपर तो सारा जगत् ही सोया रहेगा (ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्मानुष्ठानमें नहीं लग सकेगा)॥ ४ ॥
‘आपका पराक्रम भगवान् विष्णुके समान तथा रूप अश्विनीकुमारोंके समान है। बुद्धिमें आप बृहस्पतिके तुल्य हैं और प्रजापालनमें साक्षात् प्रजापतिके सदृश हैं॥
‘आपकी क्षमा पृथिवीके समान और तेज भगवान् भास्करके समान है। वेग वायुके तुल्य और गम्भीरता समुद्रके सदृश है॥ ६ ॥
‘नरेश्वर! आप भगवान् शङ्करके समान युद्धमें अविचल हैं। आपकी-सी सौम्यता चन्द्रमामें ही पायी जाती है। आपके समान राजा न पहले थे और न भविष्यमें होंगे॥ ७ ॥
‘पुरुषोत्तम! आपको परास्त करना कठिन ही नहीं, असम्भव है। आप सदा धर्ममें संलग्न रहते हुए प्रजाके हित-साधनमें तत्पर रहते हैं, अतः कीर्ति और लक्ष्मी आपको कभी नहीं छोड़ती हैं॥ ८ ॥
‘ककुत्स्थकुलनन्दन! ऐश्वर्य और धर्म आपमें नित्य प्रतिष्ठित हैं।’ वन्दीजनोंने ये तथा और भी बहुत-सी सुमधुर स्तुतियाँ सुनायीं॥ ९ ॥
सूत भी दिव्य स्तुतियोंद्वारा श्रीरघुनाथजीको जगाते रहे। इस प्रकार सुनायी जाती हुई स्तुतियोंके द्वारा भगवान् श्रीराम जागे॥ १० ॥
जैसे पापहारी भगवान् नारायण सर्पशय्यासे उठते हैं, उसी प्रकार वे भी श्वेत बिछौनोंसे ढकी हुई शय्याको छोड़कर उठ बैठे॥ ११॥
महाराजके शय्यासे उठते ही सहस्रों सेवक विनयपूर्वक हाथ जोड़ उज्ज्वल पात्रोंमें जल लिये उनकी सेवामें उपस्थित हुए॥ १२॥
स्नान आदि करके शुद्ध हो उन्होंने समयपर अग्निमें आहुति दी और शीघ्र ही इक्ष्वाकुवंशियोंद्वारा सेवित पवित्र देवमन्दिरमें वे पधारे॥ १३॥
वहाँ देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंका विधिवत् पूजन करके वे अनेक कर्मचारियोंके साथ बाहरकी ड्योढ़ीमें आये॥ १४॥
इसी समय प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी वसिष्ठ आदि सभी महात्मा मन्त्री और पुरोहित वहाँ उपस्थित हुए॥ १५॥
तत्पश्चात् अनेकानेक जनपदोंके स्वामी महामनस्वी क्षत्रिय श्रीरामचन्द्रजीके पास उसी तरह आकर बैठे, जैसे इन्द्रके समीप देवतालोग आकर बैठा करते हैं॥ १६॥
महायशस्वी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—ये तीनों भाई बड़े हर्षके साथ उसी तरह भगवान् श्रीरामकी सेवामें उपस्थित रहते थे, जैसे तीनों वेद यज्ञकी॥ १७॥
इसी समय मुदित नामसे प्रसिद्ध बहुत-से सेवक भी, जिनके मुखपर प्रसन्नता खेलती रहती थी, हाथ जोड़े सभाभवनमें आये और श्रीरघुनाथजीके पास बैठ गये॥ १८॥
फिर महापराक्रमी महातेजस्वी तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि बीस* वानर भगवान् श्रीरामके समीप आकर बैठे॥ १९॥
अपने चार राक्षस मन्त्रियोंसे घिरे हुए विभीषण भी उसी प्रकार महात्मा श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए, जैसे गुह्यकगण धनपति कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं॥ २०॥
जो लोग शास्त्रज्ञानमें बढ़े-चढ़े और कुलीन थे, वे चतुर मनुष्य भी महाराजको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके वहाँ बैठ गये॥ २१॥
इस प्रकार बहुत-से श्रेष्ठ एवं तेजस्वी महर्षि, महापराक्रमी राजा, वानर और राक्षसोंसे घिरे राजसभामें बैठे हुए श्रीरघुनाथजी बड़ी शोभा पा रहे थे॥ २२॥
जैसे देवराज इन्द्र सदा ऋषियोंसे सेवित होते हैं, उसी तरह महर्षि-मण्डलीसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उस समय सहस्रलोचन इन्द्रसे भी अधिक शोभा पा रहे थे॥ २३॥
जब सब लोग यथास्थान बैठ गये, तब पुराणवेत्ता महात्मा लोग भिन्न-भिन्न धर्म-कथाएँ कहने लगे*॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥
* सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्, जाम्बवान्, सुषेण, तार, नील, नल, मैन्द, द्विविद, कुमुद, शरभ, शतबलि, गन्धमादन, गज, गवाक्ष, गवय, धूम्र, रम्भ तथा ज्योतिर्मुख—ये प्रधान-प्रधान वानर-वीर बीसकी संख्यामें उपस्थित थे।
* इस सर्गके बाद कुछ प्रतियोंमें प्रक्षिप्त रूपसे पाँच सर्ग और उपलब्ध होते हैं, जिनमें वाली और सुग्रीवकी उत्पत्तिका तथा रावणके श्वेतद्वीपमें गमनका इतिहास वर्णित है। इस इतिहासके वक्ता भी अगस्त्यजी ही हैं। परंतु इसके पहले सर्गमें ही अगस्त्यजीके विदा होनेका वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इन सर्गोंका उल्लेख असङ्गत प्रतीत होता है। इसीलिये ये सर्ग यहाँ नहीं लिये गये हैं।
अड़तीसवाँ सर्ग
अड़तीसवाँ सर्ग
श्रीरामके द्वारा राजा जनक, युधाजित्, प्रतर्दन तथा अन्य नरेशोंकी विदाई
महाबाहु श्रीरघुनाथजी इसी प्रकार प्रतिदिन राजसभामें बैठकर पुरवासियों और जनपदवासियोंके सारे कार्योंकी देखभाल करते हुए शासनका कार्य चलाते थे॥ १ ॥
तदनन्तर कुछ दिन बीतनेपर श्रीरामचन्द्रजीने मिथिलानरेश विदेहराज जनकजीसे हाथ जोड़कर यह बात कही— ॥ २ ॥
‘महाराज! आप ही हमारे सुस्थिर आश्रय हैं। आपने सदा हमलोगोंका लालन-पालन किया है। आपके ही बढ़े हुए तेजसे मैंने रावणका वध किया है॥ ३ ॥
‘राजन्! समस्त इक्ष्वाकुवंशी और मैथिल नरेशोंमें आपसके सम्बन्धके कारण सब प्रकारसे जो प्रेम बढ़ा है, उसकी कहीं तुलना नहीं है॥ ४ ॥
‘पृथ्वीनाथ! अब आप हमारे द्वारा भेंट किये गये ये रत्न लेकर अपनी राजधानीको पधारें। भरत (तथा उनके साथ-साथ शत्रुघ्न भी) आपकी सहायताके लिये आपके पीछे-पीछे जायँगे’ ॥ ५ ॥
तब जनकजी ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—‘राजन्! मैं आपके दर्शन तथा न्यायानुसार व्यवहारसे बहुत प्रसन्न हूँ॥ ६ ॥
‘आपने मेरे लिये जो रत्न एकत्र किये हैं, वह सब मैं अपनी सीता आदि पुत्रियोंको देता हूँ’ ॥ ७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर श्रीमान् राजा जनक प्रसन्न-चित्त हो श्रीरामकी अनुमति ले मिथिलापुरीको चल दिये॥ ८ ॥
जनकजीके चले जानेके पश्चात् श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर अपने मामा केकय-नरेश युधाजित्से, जो बड़े सामर्थ्यशाली थे, विनयपूर्वक कहा— ॥ ९ ॥
‘राजन्! पुरुषप्रवर! यह राज्य, मैं, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—सब आपके अधीन हैं। आप ही हमारे आश्रय हैं॥ १० ॥
‘महाराज केकयराज वृद्ध हैं। वे आपके लिये बहुत चिन्तित होंगे। इसलिये पृथ्वीनाथ! आपका आज ही जाना मुझे अच्छा जान पड़ता है॥ ११ ॥
'आप बहुत-सा धन तथा नाना प्रकारके रत्न लेकर पधारें। मार्गमें सहायताके लिये लक्ष्मण आपके साथ जायँगे'॥ १२ ॥
तब युधाजित्ने 'तथास्तु' कहकर श्रीरामचन्द्रजीकी बात मान ली और कहा—'रघुनन्दन! ये रत्न और धन सब तुम्हारे ही पास अक्षयरूपसे रहें'॥ १३ ॥
फिर पहले श्रीरघुनाथजीने प्रणामपूर्वक अपने मामाकी परिक्रमा की, इसके बाद केकयकुलकी वृद्धि करनेवाले राजकुमार युधाजित्ने भी राजा श्रीरामकी प्रदक्षिणा की॥ १४ ॥
इसके बाद केकयराजने लक्ष्मणजीके साथ उसी तरह अपने देशको प्रस्थान किया, जैसे वृत्रासुरके मारे जानेपर इन्द्रने भगवान् विष्णुके साथ अमरावतीकी यात्रा की थी॥ १५ ॥
मामाको विदा करके रघुनाथजीने किसीसे भी भय न माननेवाले अपने मित्र काशिराज प्रतर्दनको हृदयसे लगाकर कहा— ॥ १६ ॥
'राजन्! आपने राज्याभिषेकके कार्यमें भरतके साथ पूरा उद्योग किया है और ऐसा करके अपने महान् प्रेम तथा परम सौहार्दका परिचय दिया है॥ १७ ॥
'काशिराज! अब आप सुन्दर परकोटों तथा मनोहर फाटकोंसे सुशोभित और अपने ही द्वारा सुरक्षित रमणीय पुरी वाराणसीको पधारिये'॥ १८ ॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामने पुनः अपने उत्तम आसनसे उठकर प्रतर्दनको छातीसे लगा उनका गाढ़
आलिङ्गन किया॥ १९ ॥
इस प्रकार कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीरामने उस समय काशिराजको विदा किया। श्रीरघुनाथजीकी अनुमति पाकर उनसे विदा ले निर्भय काशिराज तत्काल वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये॥ २०½ ॥
काशिराजको विदा करके श्रीरघुनाथजी हँसते हुए अन्य तीन सौ भूपालोंसे मधुर वाणीमें बोले— ॥ २१½ ॥
'मेरे ऊपर आपलोगोंका अविचल प्रेम है, जिसकी रक्षा आपने अपने ही तेजसे की है। आपलोगोंमें सत्य और धर्म नियतरूपसे नित्य-निरन्तर निवास करते हैं॥ २२½ ॥
'आप महापुरुषोंके प्रभाव और तेजसे ही मेरे द्वारा दुर्बुद्धि दुरात्मा राक्षसाधम रावण मारा गया है॥ २३½ ॥
‘मैं तो उसके वधमें निमित्तमात्र बना हूँ। वास्तवमें तो आपलोगोंके तेजसे ही पुत्र, मन्त्री, बन्धु-बान्धव तथा सेवकगणोंके सहित रावण युद्धमें मारा गया है॥ २४½ ॥
‘वनसे जनकराजनन्दिनी सीताके अपहरणका समाचार सुनकर महात्मा भरतने आपलोगोंको यहाँ बुलाया था॥ २५½ ॥
‘आप सभी महामना भूपाल राक्षसोंपर आक्रमण करनेके लिये उद्योगशील थे। तबसे आजतक यहाँ आपलोगोंका बहुत समय व्यतीत हो गया है। अतः अब मुझे आपलोगोंका अपने नगरको लौट जाना ही उचित जान पड़ता है’॥ २६½ ॥
इसपर राजाओंने अत्यन्त हर्षसे भरकर कहा— ‘श्रीराम! आप विजयी हुए और अपने राज्यपर भी प्रतिष्ठित हो गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २७½ ॥
‘हमारे सौभाग्यसे ही आप सीताको लौटा लाये और उस प्रबल शत्रुको परास्त कर दिया। श्रीराम! यही हमारा सबसे बड़ा मनोरथ है और यही हमारे लिये सबसे बढ़कर प्रसन्नताकी बात है कि आज हमलोग आपको विजयी देख रहे हैं तथा आपकी शत्रु-मण्डली मारी जा चुकी है॥ २८-२९ ॥
‘प्रशंसनीय श्रीराम! आप जो हमलोगोंकी प्रशंसा कर रहे हैं, यह आपहीके योग्य है। हम ऐसी प्रशंसा करनेकी कला नहीं जानते हैं॥ ३० ॥
‘अब हम आज्ञा चाहते हैं। अपनी पुरीको जायँगे। जिस प्रकार आप सदा हमारे हृदयमें विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार हे महाबाहो! जिसमें हमलोग आपके प्रति प्रेमसे युक्त रहकर आपके हृदयमें बसे रहें, ऐसी प्रीति आपकी हमपर सदा बनी रहनी चाहिये।’ तब श्रीरघुनाथजीने हर्षसे भरे हुए उन राजाओंसे कहा— ‘अवश्य ऐसा ही होगा’॥ ३१-३२ ॥
तत्पश्चात् जानेके लिये उत्सुक हो सबने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा— ‘भगवन्! अब हम जा रहे हैं।’ इस तरह श्रीरामसे सम्मानित हो वे सब राजा अपने-अपने देशको चले गये॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥
उनतालीसवाँ सर्ग
उनतालीसवाँ सर्ग
राजाओंका श्रीरामके लिये भेंट देना और श्रीरामका वह सब लेकर अपने मित्रों, वानरों, रीछों और राक्षसोंको बाँट देना तथा वानर आदिका वहाँ सुखपूर्वक रहन ा
अयोध्यासे प्रस्थित हो वे महामना भूपाल सहस्रों हाथी, घोड़े तथा पैदल-समूहोंसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से हर्षपूर्वक आगे बढ़ने लगे॥ १ ॥
भरतकी आज्ञासे श्रीरामचन्द्रजीकी सहायताके लिये वहाँ कऽइ अक्षौहिणी सेनाएँ युद्धके लिये उद्यत होकर आयी थीं। उन सबके सैनिक और वाहन हर्ष एवं उत्साहसे भरे हुए थे॥ २ ॥
वे सभी भूपाल बलके घमंडमें भरकर आपसमें इस तरहकी बातें करने लगे— ‘हमलोगोंने युद्धमें श्रीराम और रावणको आमने-सामने खड़ा नहीं देखा॥ ३ ॥
‘भरतने (पहले तो सूचना नहीं दी) पीछे युद्ध समाप्त हो जानेपर हमें व्यर्थ ही बुला लिया। यदि सब राजा गये होते तो उनके द्वारा समस्त राक्षसोंका संहार बहुत जल्दी हो गया होता, इसमें संशय नहीं है॥ ४ ॥
‘श्रीराम और लक्ष्मणके बाहुबलसे सुरक्षित एवं निश्चिन्त हो हमलोग समुद्रके उस पार सुखपूर्वक युद्ध कर सकते थे’॥ ५ ॥
ये तथा और भी बहुत-सी बातें कहते हुए वे सहस्रों नरेश बड़े हर्षके साथ अपने-अपने राज्यको गये॥
उनके अपने-अपने प्रसिद्ध राज्य समृद्धिशाली, सुख और आनन्दसे परिपूर्ण, धन-धान्यसे सम्पन्न तथा रत्न आदिसे भरे-पूरे थे। उन राज्यों तथा नगरोंमें जाकर उन नरेशोंने श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छासे नाना प्रकारके रत्न और उपहार भेजे। घोड़े, सवारियाँ, रत्न, मतवाले हाथी, उत्तम चन्दन, दिव्य आभूषण, मणि, मोती, मूँगे, रूपवती दासियाँ, नाना प्रकारकी बकरियाँ और भेड़ें तथा तरह-तरहके बहुत-से रथ भेंट किये॥ ७—१० ॥
महाबली भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न उन रत्नोंको लेकर पुनः अपनी पुरीमें लौट आये। रमणीय पुरी अयोध्यामें आकर उन तीनों पुरुषप्रवर बन्धुओंने ये विचित्र रत्न श्रीरामको समर्पित कर दिये॥ ११-१२ ॥
उन सबको ग्रहण करके महात्मा श्रीरामने बड़ी प्रसन्नताके साथ उपकारी वानरराज सुग्रीव और विभीषणको तथा अन्य राक्षसों और वानरोंको भी बाँट दिया; क्योंकि उन्हींसे घिरे रहकर भगवान् श्रीरामने युद्धमें विजय प्राप्त की थी॥ १३-१४॥
उन सभी महाबली वानरों और राक्षसोंने श्रीरामचन्द्रजीके दिये हुए वे रत्न अपने मस्तक और भुजाओंमें धारण कर लिये॥ १५ ॥
तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनरेश महापराक्रमी महारथी कमलनयन श्रीरामने महाबाहु हनुमान् और अङ्गदको गोदमें बैठाकर सुग्रीवसे इस प्रकार कहा—'सुग्रीव! अङ्गद तुम्हारे सुपुत्र हैं और पवनकुमार हनुमान् मन्त्री। वानरराज! ये दोनों मेरे लिये मन्त्रीका भी काम देते थे और सदा मेरे हित-साधनमें लगे रहते थे। इसलिये और विशेषतः तुम्हारे नाते ये मेरी ओरसे विविध आदर-सत्कार एवं भेंट पानेके योग्य हैं'॥ १६—१८॥
ऐसा कहकर महायशस्वी श्रीरामने अपने शरीरसे बहुमूल्य आभूषण उतारकर उन्हें अङ्गद तथा हनुमान्के अङ्गोंमें बाँध दिया॥ १९॥
इसके बाद श्रीरघुनाथजीने महापराक्रमी वानरयूथ पतियों—नील, नल, केसरी, कुमुद, गन्धमादन, सुषेण, पनस, वीर मैन्द, द्विविद, जाम्बवान्, गवाक्ष, विनत, धूम्र, बलीमुख, प्रजङ्घ, महाबली संनाद, दरीमुख, दधिमुख और यूथप इन्द्रजानुको बुलाकर उनकी ओर दोनों नेत्रोंसे इस प्रकार देखा, मानो वे उन्हें नेत्रपुटोंद्वारा पी रहे हों। उन्होंने स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें उनसे कहा—'वानरवीरो! आपलोग मेरे सुहृद्, शरीर और भाईँ हैं। आपने ही मुझे संकटसे उबारा है। आप-जैसे श्रेष्ठ सुहृदोंको पाकर राजा सुग्रीव धन्य हैं'॥ २०—२४॥
ऐसा कहकर नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीने उन्हें यथायोग्य आभूषण और बहुमूल्य हीरे दिये तथा उनका आलिङ्गन किया॥ २५॥
मधुके समान पिङ्गल वर्णवाले वे वानर वहाँ सुगन्धित मधु पीते, राजभोग वस्तुओंका उपभोग करते और स्वादिष्ट फल-मूल खाते थे॥ २६ ॥
इस प्रकार निवास करते हुए उन वानरोंका वहाँ एक महीनेसे अधिक समय बीत गया; परंतु श्रीरघुनाथजीके प्रति भक्तिके कारण उन्हें वह समय एक मुहूर्तके समान ही जान पड़ा॥ २७ ॥
श्रीराम भी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरों, महापराक्रमी राक्षसों तथा महाबली रीछोंके साथ बड़े आनन्दसे समय बिताते थे॥ २८ ॥
इस तरह उनका शिशिर-ऋतुका दूसरा महीना भी सुखपूर्वक बीत गया। इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंकी उस सुरम्य राजधानीमें वे वानर और राक्षस बड़े हर्ष और प्रेमसे रहते थे। श्रीरामके प्रेमपूर्वक सत्कारसे उनका वह समय सुखपूर्वक बीत रहा था॥ २९-३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥
चालीसवाँ सर्ग
चालीसवाँ सर्ग
वानरों, रीछों और राक्षसोंकी बिदाई
इस तरह वहाँ सुखपूर्वक निवास करते हुए रीछों, वानरों और राक्षसोंमेंसे सुग्रीवको सम्बोधित करके महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीने इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
‘सौम्य! अब तुम देवताओं तथा असुरोंके लिये भी दुर्जय किष्किन्धापुरीको जाओ और वहाँ मन्त्रियोंके साथ रहकर अपने निष्कण्टक राज्यका पालन करो॥ २ ॥
‘महाबाहो! अङ्गद और हनुमान्को भी तुम अत्यन्त प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखना। महाबली नल, अपने श्वशुर वीर सुषेण, बलवानोंमें श्रेष्ठ तार, दुर्धर्ष वीर कुमुद, महाबली नील, वीर शतबलि, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, महाबली शरभ, महान् बल-पराक्रमसे युक्त दुर्जय वीर ऋक्षराज जाम्बवान् तथा गन्धमादनपर भी तुम प्रेमपूर्ण दृष्टि रखना॥ ३—६ ॥
‘परम पराक्रमी ऋषभ, वानर, सुपाटल, केसरी, शरभ, शुम्भ तथा महाबली शङ्खचूडको भी प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखना॥ ७ ॥
‘इनके सिवा जिन-जिन महामनस्वी वानरोंने मेरे लिये अपने प्राणोंकी बाजी लगा दी थी, उन सबपर तुम प्रेमदृष्टि रखना। कभी उनका अप्रिय न करना’॥ ८ ॥
ऐसा कहकर श्रीरामने सुग्रीवको बारम्बार हृदयसे लगाया और फिर मधुर वाणीमें विभीषणसे कहा—
‘राक्षसराज! तुम धर्मपूर्वक लङ्काका शासन करो। मैं तुम्हें धर्मज्ञ मानता हूँ। तुम्हारे नगरके लोग, सब राक्षस तथा तुम्हारे भाई कुबेर भी तुम्हें धर्मज्ञ ही समझते हैं॥ १० ॥
‘राजन्! तुम किसी तरह भी अधर्ममें मन न लगाना। जिनकी बुद्धि ठीक है, वे राजा निश्चय ही दीर्घकालतक पृथ्वीका राज्य भोगते हैं॥ ११ ॥
‘राजन्! तुम सुग्रीवसहित मुझे सदा याद रखना। अब निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे जाओ’॥ १२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह भाषण सुनकर रीछों, वानरों और राक्षसोंने ‘धन्य-धन्य’ कहकर उनकी बारम्बार प्रशंसा की॥ १३ ॥
वे बोले— ‘महाबाहु श्रीराम! स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान आपके स्वभावमें सदा परम मधुरता रहती है। आपकी बुद्धि और पराक्रम अद्भुत हैं’॥ १४ ॥
वानर और राक्षस जब ऐसा कह रहे थे, उसी समय हनुमान्जी विनम्र होकर श्रीरघुनाथजीसे बोले— ॥
‘महाराज! आपके प्रति मेरा महान् स्नेह सदा बना रहे। वीर! आपमें ही मेरी निश्चल भक्ति रहे। आपके सिवा और कहीं मेरा आन्तरिक अनुराग न हो॥ १६ ॥
‘वीर श्रीराम! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक निःसंदेह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें॥ १७ ॥
‘रघुकुलनन्दन नरश्रेष्ठ श्रीराम! आपका जो यह दिव्य चरित्र और कथा है, इसे अप्सराएँ मुझे गाकर सुनाया करें॥ १८ ॥
‘वीर प्रभो! आपके उस चरितामृतको सुनकर मैं अपनी उत्कण्ठाको उसी तरह दूर करता रहूँगा, जैसे वायु बादलोंकी पंक्तिको उड़ाकर दूर ले जाती है’॥ १९ ॥
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने श्रेष्ठ सिंहासनसे उठकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और स्नेहपूर्वक इस प्रकार कहा— ॥ २० ॥
‘कपिश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा, इसमें संशय नहीं है। संसारमें मेरी कथा जबतक प्रचलित रहेगी, तबतक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीरमें प्राण भी रहेंगे ही। जबतक ये लोक बने रहेंगे, तबतक मेरी कथाएँ भी स्थिर रहेंगी॥ २१-२२ ॥
‘कपे! तुमने जो उपकार किये हैं, उनमेंसे एक-एकके लिये मैं अपने प्राण निछावर कर सकता हूँ। तुम्हारे शेष उपकारोंके लिये तो मैं ऋणी ही रह जाऊँगा॥ २३ ॥
‘कपिश्रेष्ठ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो-जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीरमें ही पच जायँ। उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि पुरुषमें उपकारका बदला पानेकी योग्यता आपत्तिकालमें ही आती है (मैं नहीं चाहता कि तुम भी संकटमें पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ)’॥ २४ ॥
इतना कहकर श्रीरघुनाथजीने अपने कण्ठसे एक चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हार निकाला, जिसके मध्यभागमें वैदूर्यमणि थी। उसे उन्होंने हनुमान्जीके गलेमें बाँध दिया॥ २५ ॥
वक्षःस्थलसे सटे हुए उस विशाल हारसे हनुमान्जी उसी तरह सुशोभित हुए, जैसे सुवर्णमय गिरिराज सुमेरुके शिखरपर चन्द्रमाका उदय हुआ हो॥ २६ ॥
श्रीरघुनाथजीके ये विदाईके शब्द सुनकर वे महाबली वानर एक-एक करके उठे और उनके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करके वहाँसे चल दिये॥ २७ ॥
सुग्रीव और धर्मात्मा विभीषण श्रीरामके हृदयसे लग गये और उनका गाढ़ आलिंगन करके विदा हुए। उस समय वे सब-के-सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए श्रीरामके भावी विरहसे व्यथित हो उठे थे॥ २८ ॥
वे राक्षस, रीछ और वानर रघुवंशवर्धन श्रीरामको प्रणाम करके नेत्रोंमें वियोगके आँसू लिये अपने-अपने निवासस्थानको लौट गये॥ ३१ ॥
श्रीरामको छोड़कर जाते समय वे सभी दुःखसे किंकर्तव्यविमूढ़ तथा अचेत-से हो रहे थे। किसीके गलेसे आवाज नहीं निकलती थी और सभीके नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे॥ २९ ॥
महात्मा श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार कृपा एवं प्रसन्नतापूर्वक विदा देनेपर वे सब वानर विवश हो उसी प्रकार अपने-अपने घरको गये, जैसे जीवात्मा विवशतापूर्वक शरीर छोड़कर परलोकको जाता है॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥
इकतालीसवाँ सर्ग
इकतालीसवाँ सर्ग
कुबेरके भेजे हुए पुष्पकविमानका आना और श्रीरामसे पूजित एवं अनुगृहीत होकर अदृश्य हो जाना, भरतके द्वारा श्रीरामराज्यके विलक्षण प्रभावका वर्णन
रीछों, वानरों और राक्षसोंको विदा करके भाइयोंसहित सुख-स्वरूप महाबाहु श्रीराम सुख और आनन्दपूर्वक वहाँ रहने लगे॥ १ ॥
एक दिन अपराह्नकालमें (दोपहरके बाद) अपने भाइयोंके साथ बैठे हुए महाप्रभु श्रीरघुनाथजीने आकाशसे यह मधुर वाणी सुनी—॥ २ ॥
‘सौम्य श्रीराम! आप मेरी ओर प्रसन्नतापूर्ण मुखसे दृष्टिपात करनेकी कृपा करें। प्रभो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं कुबेरके भवनसे लौटा हुआ पुष्पकविमान हूँ॥ ३ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा मानकर मैं कुबेरकी सेवाके लिये उनके भवनमें गया था; परंतु उन्होंने मुझसे कहा—॥ ४ ॥
‘विमान! महात्मा महाराज श्रीरामने युद्धमें दुर्धर्ष राक्षसराज रावणको मारकर तुम्हें जीता है॥ ५ ॥
‘पुत्रों, बन्धु-बान्धवों तथा सेवकगणोंसहित उस दुरात्मा रावणके मारे जानेसे मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ ६ ॥
‘सौम्य! इस तरह परमात्मा श्रीरामने लङ्कामें रावणके साथ-साथ तुमको भी जीत लिया है; अतः मैं आज्ञा देता हूँ, तुम उन्हींकी सवारीमें रहो॥ ७ ॥
‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम सम्पूर्ण जगत्के आश्रय हैं। तुम उनकी सवारीके काम आओ— यह मेरी सबसे बड़ी कामना है। इसलिये तुम निश्चिन्त होकर जाओ’॥ ८ ॥
‘इस प्रकार मैं महात्मा कुबेरकी आज्ञा पाकर ही आपके पास आया हूँ, अतः आप मुझे निःशङ्क होकर ग्रहण करें॥ ९ ॥
‘मैं सभी प्राणियोंके लिये अजेय हूँ और कुबेरकी आज्ञाके अनुसार मैं आपके आदेशका पालन करता हुआ अपने प्रभावसे समस्त लोकोंमें विचरण करूँगा’॥ १० ॥
पुष्पकके ऐसा कहनेपर महाबली श्रीरामने उस विमानको पुनः आया देख उससे कहा—॥ ११ ॥
‘विमानराज पुष्पक! यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ। कुबेरकी अनुकूलता होनेसे हमें मर्यादाभङ्गका दोष नहीं लगेगा’॥ १२ ॥
ऐसा कहकर महाबाहु श्रीरामने लावा, फूल, धूप और चन्दन आदिके द्वारा पुष्पकका पूजन किया॥ १३ ॥
और कहा—‘अब तुम जाओ। जब मैं स्मरण करूँ, तब आ जाना। आकाशमें रहना और अपनेको मेरे वियोगसे दुःखी न होने देना (मैं यथासमय तुम्हारा उपयोग करता रहूँगा)। स्वेच्छासे सम्पूर्ण दिशाओंमें जाते समय तुम्हारी किसीसे टक्कर न हो अथवा तुम्हारी गति कहीं प्रतिहत न हो’॥ १४½ ॥
पुष्पकने ‘एवमस्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली। इस प्रकार श्रीरामने उसका पूजन करके जब उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह पुष्पक वहाँसे अपनी अभीष्ट दिशाको चला गया॥ १५½ ॥
इस प्रकार पुण्यमय पुष्पकविमानके अदृश्य हो जानेपर भरतजीने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥
‘वीरवर! आप देवस्वरूप हैं। इसीलिये आपके शासनकालमें मनुष्येतर प्राणी भी बारम्बार मनुष्योंके समान सम्भाषण करते देखे जाते हैं॥ १७½ ॥
‘राघव! आपके राज्यपर अभिषिक्त हुए एक माससे अधिक हो गया, तबसे सभी लोग नीरोग दिखायी देते हैं। बूढ़े प्राणियोंके पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियाँ बिना कष्ट सहे प्रसव करती हैं। सभी मनुष्योंके शरीर हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते हैं॥ १८-१९ ॥
‘राजन्! पुरवासियोंमें बड़ा हर्ष छा रहा है। मेघ अमृतके समान जल गिराते हुए समयपर वर्षा करते हैं॥
‘हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है। राजन्! नगर और जनपदके लोग इस पुरीमें कहते हैं कि हमारे लिये चिरकालतक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें’॥ २१½ ॥
भरतकी कही हुई ये सुमधुर बातें सुनकर नृपश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ सर्ग
बयालीसवाँ सर्ग
अशोकवनिकामें श्रीराम और सीताका विहार, गर्भिणी सीताका तपोवन देखनेकी इच्छा प्रकट करना और श्रीरामका इसके लिये स्वीकृति देना
सुवर्णभूषित पुष्पक विमानको विदा करके महाबाहु श्रीरामने अशोकवनिका (अन्तःपुरके विहार योग्य उपवन) में प्रवेश किया॥ १ ॥
चन्दन, अगुरु, आम, तुङ्ग (नारियल), कालेयक (रक्तचन्दन) तथा देवदारु-वन सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ २ ॥
चम्पा, अशोक, पुंनाग, महुआ, कटहल, असन तथा धूमरहित अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले पारिजातसे वह वाटिका सुशोभित थी॥ ३ ॥
लोध्र, कदम्ब, अर्जुन, नागकेसर, छितवन, अतिमुक्तक, मन्दार, कदली तथा गुल्मों और लताओंके समूह उसमें सब ओर व्याप्त थे॥ ४ ॥
प्रियङ्गु, धूलिकदम्ब, बकुल, जामुन, अनार और कोविदार आदि वृक्ष उस उपवनको सुशोभित करते थे॥ ५ ॥
सदा फूल और फल देनेवाले रमणीय, मनोरम, दिव्य रस और गन्धसे युक्त तथा नूतन अङ्कुर-पल्लवोंसे अलंकृत वृक्ष भी उस अशोकवनिकाकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ६ ॥
वृक्ष लगानेकी कलामें कुशल मालियोंद्वारा तैयार किये गये दिव्य वृक्ष, जिनमें मनोहर पल्लव तथा पुष्प शोभा पाते थे और जिनके ऊपर मतवाले भ्रमर छा रहे थे, उस उपवनकी श्री-वृद्धि कर रहे थे॥ ७ ॥
कोकिल, भृङ्गराज आदि रंग-बिरंगे सैकड़ों पक्षी उस वाटिकाकी शोभा थे, जो आम्रकी डालियोंके अग्रभागपर बैठकर वहाँ विचित्र सुषमाकी सृष्टि कर रहे थे॥ ८ ॥
कोई वृक्ष सुवर्णके समान पीले, कोई अग्निशिखाके समान उज्ज्वल और कोई नीले अञ्जनके समान श्याम थे, जो स्वयं सुशोभित होकर उस उपवनकी शोभा बढ़ाते थे॥ ९ ॥
वहाँ अनेक प्रकारके सुगन्धित पुष्प और गुच्छ दृष्टिगोचर होते थे। उत्तम जलसे भरी हुई भाँति-भाँतिकी बावड़ियाँ देखी जाती थीं॥ १० ॥
जिनमें माणिक्यकी सीढ़ियाँ बनी थीं। सीढ़ियोंके बाद कुछ दूरतक जलके भीतरकी भूमि स्फटिक मणिसे बँधी हुई थी। उन बावड़ियोंके भीतर खिले हुए कमल और कुमुदोंके समूह शोभा पाते थे, चक्रवाक भी उनकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ११ ॥
पपीहे और तोते वहाँ मीठी बोली बोल रहे थे। हंसों और सारसोंके कलरव गूँज रहे थे। फूलोंसे चितकबरे दिखायी देनेवाले तटवर्ती वृक्ष उन्हें शोभासम्पन्न बना रहे थे॥ १२ ॥
वे भाँति-भाँतिके परकोटों और शिलाओंसे भी सुशोभित थीं। वहीं वनप्रान्तमें नीलमके समान रंगवाली हरी-हरी घासें उस वाटिकाका शृङ्गार कर रही थीं। वहाँके वृक्षोंका समुदाय फूलोंके भारसे लदा हुआ था॥ १३½ ॥
वहाँ मानो परस्पर होड़ लगाकर खिले हुए पुष्पशाली वृक्षोंके झड़े हुए फूलोंसे काले-काले प्रस्तर उसी तरह चितकबरे दिखायी देते थे, जैसे तारोंके समुदायसे अलंकृत आकाश॥ १४½ ॥
जैसे इन्द्रका नन्दन और ब्रह्माजीका बनाया हुआ कुबेरका चैत्ररथ वन सुशोभित होता है, उसी प्रकार सुन्दर भवनोंसे विभूषित श्रीरामका वह क्रीडा-कानन शोभा पा रहा था॥ १५½ ॥
वहाँ अनेक ऐसे भवन बने थे, जिनके भीतर बैठनेके लिये बहुत-से आसन सजाये गये थे। वह वाटिका अनेक लतामण्डपोंसे सम्पन्न दिखायी देती थी। उस समृद्धिशालिनी अशोकवनिकामें प्रवेश करके रघुकुलनन्दन श्रीराम पुष्पराशिसे विभूषित एक सुन्दर आसनपर बैठे, जिसपर कालीन बिछा था॥ १६-१७½ ॥
जैसे देवराज इन्द्र शचीको सुधापान कराते हैं, उसी प्रकार ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने अपने हाथसे पवित्र पेय मधु लेकर सीताजीको पिलाया॥ १८½ ॥
सेवकगण श्रीरामके भोजनके लिये वहाँ तुरंत ही राजोचित भोग्य पदार्थ (भाँति-भाँतिकी रसोई) तथा नाना प्रकारके फल ले आये॥ १९½ ॥
उस समय राजा रामके समीप नृत्य और गीतकी कलामें निपुण अप्सराएँ और नाग-कन्याएँ किन्नरियोंके साथ मिलकर नृत्य करने लगीं॥ २०½ ॥
नाचने-गानेमें कुशल और चतुर बहुत-सी रूपवती स्त्रियाँ मधुपानजनित मदके वशीभूत हो श्रीरामचन्द्रजीके निकट अपनी नृत्य-कलाका प्रदर्शन करने लगीं॥ २१½ ॥
दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा श्रीराम सदा उत्तम वस्त्राभूषणोंसे भूषित हुई उन मनोऽभिराम रमणियोंको उपहार आदि देकर संतुष्ट रखते थे॥ २२½ ॥
उस समय भगवान् श्रीराम सीतादेवीके साथ सिंहासनपर विराजमान हो अपने तेजसे अरुन्धतीके साथ बैठे हुए वसिष्ठजीके समान शोभा पाते थे॥ २३½ ॥
यों श्रीराम प्रतिदिन देवताके समान आनन्दित रहकर देवकन्याके समान सुन्दरी विदेहनन्दिनी सीताके साथ रमण करते थे॥ २४½ ॥
इस प्रकार सीता और रघुनाथजी चिरकालतक विहार करते रहे। इतनेहीमें सदा भोग प्रदान करनेवाला शिशिरऋतुका सुन्दर समय व्यतीत हो गया। भाँतिभाँतिके भोगोंका उपभोग करते हुए उन राजदम्पतिका वह शिशिरकाल बीत गया॥ २५-२६ ॥
धर्मज्ञ श्रीराम दिनके पूर्वभागमें धर्मके अनुसार धार्मिक कृत्य करते थे और शेष आधे दिन अन्तःपुरमें रहते थे॥ २७ ॥
सीताजी भी पूर्वाह्नकालमें देवपूजन आदि करके सब सासुओंकी समानरूपसे सेवा-पूजा करती थीं॥ २८ ॥
तत्पश्चात् विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो श्रीरामचन्द्रजीके पास चली जाती थीं। ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गमें शची सहस्त्राक्ष इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती हैं॥ २९ ॥
इन्हीं दिनों श्रीरामचन्द्रजीने अपनी पत्नीको गर्भके मङ्गलमय चिह्नसे युक्त देखकर अनुपम हर्ष प्राप्त किया और कहा— ‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’॥ ३० ॥
फिर वे देवकन्याके समान सुन्दरी सीतासे बोले— ‘विदेहनन्दिनि! तुम्हारे गर्भसे पुत्र प्राप्त होनेका यह समय उपस्थित है। वरारोहे! बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है? मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ?’॥ ३१½ ॥
इसपर सीताजीने मुसकराकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ‘रघुनन्दन! मेरी इच्छा एक बार उन पवित्र तपोवनोंको देखनेकी हो रही है। देव! गङ्गातटपर रहकर फल-मूल खानेवाले जो उग्र तेजस्वी महर्षि हैं, उनके समीप (कुछ दिन) रहना चाहती हूँ। काकुत्स्थ! फल-मूलका आहार करनेवाले महात्माओंके तपोवनमें एक रात निवास करूँ, यही मेरी इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा है’॥ ३२—३४½ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने सीताकी इस इच्छाको पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा की और कहा— ‘विदेहनन्दिनि! निश्चिन्त रहो। कल ही वहाँ जाओगी, इसमें संशय नहीं है’॥ ३५ ॥
मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम अपने मित्रोंके साथ बीचके खण्डमें चले गये॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२॥
तैंतालीसवाँ सर्ग
तैंतालीसवाँ सर्ग
भद्रका पुरवासियोंके मुखसे सीताके विषयमें सुनी हुई अशुभ चर्चासे श्रीरामको अवगत कराना
वहाँ बैठे हुए महाराज श्रीरामके पास अनेक प्रकारकी कथाएँ कहनेमें कुशल हास्यविनोद करनेवाले सखा सब ओरसे आकर बैठते थे॥ १ ॥
उन सखाओंके नाम इस प्रकार हैं—विजय, मधुमत्त, काश्यप, मङ्गल, कुल, सुराजि, कालिय, भद्र, दन्तवक्त्र और सुमागध॥ २ ॥
ये सब लोग बड़े हर्षसे भरकर महात्मा श्रीरघुनाथजीके सामने अनेक प्रकारकी हास्य-विनोदपूर्ण कथाएँ कहा करते थे॥ ३ ॥
इसी समय किसी कथाके प्रसङ्गमें श्रीरघुनाथजीने पूछा— ‘भद्र! आजकल नगर और राज्यमें किस बातकी चर्चा विशेषरूपसे होती है?॥ ४ ॥
‘नगर और जनपदके लोग मेरे, सीताके, भरतके, लक्ष्मणके तथा शत्रुघ्न और माता कैकेयीके विषयमें क्या-क्या बातें करते हैं? क्योंकि राजा यदि आचारविचार से हीन हों तो वे अपने राज्यमें तथा वनमें (ऋषि-मुनियोंके आश्रममें) भी निन्दाके विषय बन जाते हैं— सर्वत्र उन्हींकी बुराइयोंकी चर्चा होती है’॥ ५-६ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भद्र हाथ जोड़कर बोला— ‘महाराज! आजकल पुरवासियोंमें आपको लेकर सदा अच्छी ही चर्चाएँ चलती हैं’॥ ७ ॥
‘सौम्य! पुरुषोत्तम! दशग्रीव-वधसम्बन्धी जो आपकी विजय है, उसको लेकर नगरमें सब लोग अधिक बातें किया करते हैं’॥ ८ ॥
भद्रके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने कहा— ‘पुरवासी मेरे विषयमें कौन-कौन-सी शुभ या अशुभ बातें कहते हैं, उन सबको यथार्थरूपसे पूर्णतः बताओ। इस समय उनकी शुभ बातें सुनकर जिन्हें वे शुभ मानते हैं उनका मैं आचरण करूँगा और अशुभ बातें सुनकर जिन्हें वे अशुभ समझते हैं, उन कृत्योंको त्याग दूँगा॥ ९-१० ॥
‘तुम विश्वस्त और निश्चिन्त होकर बेखटके कहो। पुरवासी और जनपदके लोग मेरे विषयमें किस प्रकार अशुभ चर्चाएँ करते हैं’॥ ११ ॥
श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भद्रने हाथ जोड़कर एकाग्रचित्त हो उन महाबाहु श्रीरामसे यह परम सुन्दर बात कही— ॥ १२ ॥
‘राजन्! सुनिये, पुरवासी मनुष्य चौराहोंपर, बाजारमें, सड़कोंपर तथा वन और उपवनमें भी आपके विषयमें किस प्रकार शुभ और अशुभ बातें कहते हैं? यह बता रहा हूँ॥ १३ ॥
‘वे कहते हैं ‘श्रीरामने समुद्रपर पुल बाँधकर दुष्कर कर्म किया है। ऐसा कर्म तो पहलेके किन्हीं देवताओं और दानवोंने भी नहीं सुना होगा॥ १४ ॥
‘श्रीरामद्वारा दुर्धर्ष रावण सेना और सवारियोंसहित मारा गया तथा राक्षसोंसहित रीछ और वानर भी वशमें कर लिये गये॥ १५ ॥
‘परंतु एक बात खटकती है, युद्धमें रावणको मारकर श्रीरघुनाथजी सीताको अपने घर ले आये। उनके मनमें सीताके चरित्रको लेकर रोष या अमर्ष नहीं हुआ॥ १६ ॥
‘उनके हृदयमें सीता-सम्भोगजनित सुख कैसा लगता होगा? पहले रावणने बलपूर्वक सीताको गोदमें उठाकर उनका अपहरण किया था, फिर वह उन्हें लङ्कामें भी ले गया और वहाँ उसने अन्तःपुरके क्रीडा-कानन अशोकवनिकामें रखा। इस प्रकार राक्षसोंके वशमें होकर वे बहुत दिनोंतक रहीं तो भी श्रीराम उनसे घृणा क्यों नहीं करते हैं। अब हमलोगोंको भी स्त्रियोंकी ऐसी बातें सहनी पड़ेंगी; क्योंकि राजा जैसा करता है, प्रजा भी उसीका अनुकरण करने लगती है’॥ १७—१९ ॥
‘राजन्! इस प्रकार सारे नगर और जनपदमें पुरवासी मनुष्य बहुत-सी बातें कहते हैं’॥ २० ॥
भद्रकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त पीड़ित होकर समस्त सुहृदोंसे पूछा— ‘आपलोग भी मुझे बतावें, यह कहाँतक ठीक है’॥ २१ ॥
तब सबने धरतीपर मस्तक टेककर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके दीनतापूर्ण वाणीमें कहा— ‘प्रभो! भद्रका यह कथन ठीक है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है’॥
सबके मुखसे यह बात सुनकर शत्रुसूदन श्रीरामने तत्काल उन सब सुहृदोंको विदा कर दिया॥ २३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भद्र हाथ जोड़कर बोला— ‘महाराज! आजकल पुरवासियोंमें आपको लेकर सदा अच्छी ही चर्चाएँ चलती हैं’॥ ७ ॥