Skip to content
BharatKosha
Back to the archive

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages
Page 68Permalink

तब शशिप्रभा ने उसके गले से लिपट कर रोकर कहा- 'कल्याणि! मुझे भी पर पुरूष से मिलाओ।'

तब यशोदेवी ने उसे सान्त्वना देकर पति की जानकारी में उसे अपने घर ले जाकर अपने पुत्र से मिलाया पति ने भी उसे सखी समझकर जाने से नहीं रोका।

हे कामिनि! यशोदेवी ने इस प्रकार राजशेखर और उसकी पत्नी को धोखा देकर अपनी महती बुद्धि से अपना कार्य पूरा कर लिया। अतैव यदि तुम्हारे पास ऐसी बुद्धि हो तो परपुरूष के पास जाओ अन्यथा नहीं।

कथा-3

"राजा सुदर्शन की कथा";

विशाला नगरी में सुदर्शन नाम का राजा था। वहीं पर विमल नाम का एक बनिया था उसकी दो पत्नियों को सुन्दर रूप सम्पन्न देखकर कुटिल नामक धूर्त ने उन्हें प्राप्त करने के लिए अम्बिका देवी की आराधना कर विमल का रूप माँगा। उसका आकार प्रकार पाकर 'विमल' के बाहर जाने पर उसके घर जाकर वह धूर्त अपना आधिपत्य जमा लिया। उसने पुरस्कार रूप में धन प्रदान कर समस्त भृत्य वर्ग को अपने अधीन कर लिया। वह विमल की दोनों पत्नियों को अत्यन्त सम्मान दान आदि से संतुष्ट कर उनका सम्भोग करता रहा।

कुछ समय पश्चात् वास्तविक विमल भी द्वार पर आया तो कुटिल की आज्ञा से द्वारपाल ने उसे भीतर प्रविष्ट होने से रोक दिया, तब वह जोर से चिल्लाने लगा कि 'महान धूर्त ने हमें धोखा दिया।' इस प्रकार चिल्लाते हुए उसे देखकर कौतुक वश उसके कुल गोत्र वालों एवं बनियों का समुदाय एकत्र हो, नगरपालों एवं मुख्यमन्त्री के सामने चिल्लाने लगा- राजन्! 'महान धूर्त ने हमें धोखा दिया'।

तब राजा ने उस धूर्त को देखने के लिए अपने आदमी भेजे, उस धूर्त ने उन्हें भी धन देकर अपने अनुकूल कर लिया। धन प्राप्त कर राजा के आदमी कहने लगे, स्वामी! विमल तो घर में है, यह द्वार पर स्थित व्यक्ति ही महान धूर्त है।

[ 57 ]

Page 69Permalink

तब राजा को उपाय सूझा। उसने विमल की दोनों पत्नियों को पृथक-पृथक कर पूछा। तुम दोनों को विवाह के समय पति ने कौन आभूषण और धन दिया था। विवाह के पश्चात् क्या बातचीत हुई थी? प्रथम सहवास के समय पति के साथ तुम्हारी क्या बातचीत हुई थी? तुम दोनो की माता-पिता कौन है? क्या कुल और जाति है? इस प्रकार पूछने पर दोनों ने जो पाया था, जो-जो बातें हुई थी, जिस प्रकार प्रथम सहवास के समय शयन किया था सबकुछ बता दिया। इसके बाद राजा ने वही बाते परस्पर विवाद करते उन दोनों पुरुषों से पूछा तो रूक्मणी एवं सुन्दरी नाम्नी दोनों भार्याओ का संवाद जो कहता है वही सच है। दूसरा धूर्त है, राजा ने उसे निकाल दिया। सच्चा विमल पत्नी समेत राजा से सत्कृत हुआ और अपने घर गया। यह कथा सुनकर प्रभावती सो गयी।

कथा-4

"विषकन्या-विवाह की कथा"

सोमप्रभ नामक ब्राह्मणों की एक बस्ती थी, वहाँ सोमशर्मा नामक एक विद्वान, धार्मिक ब्राह्मण था। उसकी पुत्री विषकन्या अत्यन्त रूपवती थी, किन्तु भय के कारण उससे कोई विवाह नहीं करता था। तब सोमशर्मा वर की तलाश में पृथ्वी पर घूमते हुए जनस्थान नामक ब्राह्मणों की बस्ती में पहुँचा। वहाँ गोविन्द नामक मूर्ख एवं निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसे उसने कन्या दे दी। उसने रोकते हुए सुहृज्जनों की भी अवज्ञाकर रूपलावण्यवती मोहिनी विषकन्या से विवाह कर लिया। वह काम-कला प्रवीण थी एवं गोविन्द मूर्ख एवं अल्पवयस्क था। तब वह अपने रूप लावण्य एवं यौवन पर शोक करने लगी। कहा गया है कि-कामकलानिपुण पत्नी का मूर्ख पति, प्रौढ़ स्त्री का मूर्ख नायक, दानशील गुणीजन का अल्पधन- ये तीनों दुःखदायी होते हैं।$^1$


1 अविदग्धः पतिः स्त्रीणां, प्रौढाना नायकोऽगुणी
गुणिनां त्यागिना स्तोको विभवश्चेति दुःखकृत्
शुक्सप्ततिः श्लोक सं० 23, पृष्ठ सं०- 24

[ 58 ]

Page 70Permalink

वह विषकन्या एक दिन अपने पति गोविन्द से बोली मैं तुम्हारे साथ अपने पिता के घर चलूँगी तब गोविन्द बैलगाड़ी पर भार्या समेत चल पड़ा। जाते समय मार्ग मे एक युवक, वक्ता, रूपवान और शूर विष्णु नामक ब्राह्मण मिला। ब्राह्मण और विषकन्या मे परस्पर अनुराग हो गया। कहा गया है कि अन्य धनुर्धारियों को अपने सामने न ठहरने देने वाला वीर कामदेव सर्वोत्कृष्ट है जिसके पुष्पशरों के लगने से, प्रथम प्रिय के दर्शन आदि से अनुराग उत्पन्न होता है, तदन्तर क्रमशः प्रिय से मिलने का मनोऽभिलाष, निद्राभङ्ग, शारीरिक दौर्बल्य, अपने-अपने व्यापरे में इन्द्रियों का आलस्य, प्रिय के अतिरिक्त अन्य विषयों में मन की विरक्ति, लज्जा का छूट जाना, उन्माद, मूर्छा और मरण इन दस दशाओ को सारा जगत प्राप्त होता है।¹

वह पथिक पति पत्नी को खूब सुपारी पान देता, इस प्रकार उस मूर्ख ब्राह्मण ने उस विष्णु पर विश्वास कर लिया और मेरे विषय में कहीं इसका पत्नी में अत्यन्त अनुराग है ऐसा न सोचने लगे। इस भय से स्वयं उतरकर उस ब्राह्मण को गाड़ी का चालक बना दिया। पति के वृक्षों के आड़ में आ जाने पर विष्णु ने मोहिनी का भोग किया और अपने अधीन बना लिया। पति गोविन्द के आ जाने पर 'तुम चोर हो' यह कहकर विष्णु ने उसे गाडी पर चढ़ने से रोक दिया और मोहनी को ग्रहण कर गोविन्द पर आक्रमण कर दिया। विषकन्या के प्रभाव से गोविन्द विष्णु से पराजित हुआ। तब मार्ग के समीपवर्ती गाँव में जाकर गुहार लगाने लगा कि चोर ने मेरी पत्नी को ग्रहण कर लिया है।


1 प्रीतिः स्याद्दर्शनाद्यौ. प्रथममथ मनःसङ्गसङ्कल्प भावो,
निद्राच्छेदस्तनुत्वं वपुषि कलुषता चेन्द्रियाणां निवृत्तिः ।
हीनाशोन्मादमूर्छामरणमिति जगद्यात्यवस्था दशैताः
लग्नैर्यत्पुष्पबाणै स जयति मदनः सन्निरस्तान्यधन्वी।
शुकसप्ततिः, श्लोक स०-28, पृष्ठ स०- 225-26

[ 59 ]

Page 71Permalink

तब ग्राम के मुखिया ने मोहिनी समेत विष्णु को पकड लिया। पूछने पर विष्णु ने उत्तर दिया कि मैने इसे विवाहा है। मेरी भार्या को मार्ग मे देखकर यह पथिक इसे ग्रहण करना चाहता है। गोविन्द ने भी पूछने पर यही उत्तर दिया। मन्त्री ने दोनों का एक ही उत्तर सुनकर जाति आदि पूछा, तीनों एक ही उत्तर देते हैं। पुनः मन्त्री ने पूछा कि तुम लोगों का यात्रा में कितने दिनों से साथ हुआ। उन लोगों ने कहा प्रातः भोजन के पश्चात साथ हुआ। तब मन्त्री ने पृथक-पृथक दोनों ब्राह्मणों से पूछा-मोहिनी ने भोजन के समय क्या भोजन किया। मोहिनी के भोजन के विषय में गोविन्द ही जानता था। दूसरा नही। तब वह दूसरा मन्त्री से निरादृत हुआ। तब मन्त्री ने गोविन्द को शिक्षा दी की इस ब्राह्मणी को धिक्कार है। इस लोक एवं परलोक में दुखदायिनी इस स्त्री का तुम परित्याग कर दो।¹

लेकिन वह नहीं माना और उस मोहिनी को लेकर चला और मार्ग में उसी के लिए मार डाला गया।

इसलिए हे देवी! वृद्धों के सिखाने पर भी जो इस प्रकार उनके वचनों का तिरस्कार करता है वह गोविन्द ब्राह्मण की भाँति नष्ट हो जाता है।

कथा- 5

"बालपण्डिता की कथा"

उज्जायिनी नाम की नगरी का राजा विक्रमादित्य था जिसकी रानी का नाम कामलीला था। एक दिन भोजन के समय राजा ने रानी को कुछ मछलियाँ खाने को दिया जिसे रानी ने खाने क्या छूने से भी इन्कार कर दिया। तब वे मछलियाँ हँसने


¹ धिग्मा ब्राह्मणी परत्रेह च दुःखदा मुञ्च शीघ्रम्।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ स० 28

[ 60 ]

Page 72Permalink

लगीं। जिसकी आवाज महल के बाहर के लोग भी सुन लिए। अब राजा अपने दरबार में उपस्थित सारे विद्वानों (मन्त्रवेत्ता, दैवज्ञ एवं शकुनवेत्ता-जनों) से पूछा लेकिन कोई इस हँसी का कारण न बता सका तब राजा ने अपने मुख्य पुरोहित से इसी हँसी का कारण पूछा और न बताने की स्थिति में देश निकालने की धमकी दी। तब पुरोहित विषादग्रस्त हो पाँच दिन का समय मॉगकर अपने घर चला गया। जहाँ उसकी पुत्री बालपण्डिता ने उसके विषाद का कारण पूछा। उसने कहा विद्वानों को विषाद में भी प्रसन्नचित रहना चाहिए। कहा गया है- जिसे समृद्धि में हर्ष, विपत्ति में विषाद, रण मे कापुरूषता न हो, ऐसे त्रिभुवन श्रेष्ठ विरलेपुत्र को माता पैदा करती है।$^1$ तब ब्राह्मण ने सभी हाल कह सुनाया और कहा कि अगर जीना चाहता हूँ तो ब्राह्मणों के साथ मुझे परदेश चले जाना चाहिए। तब बालिका ने कहा कि तात! तुमने ठीक कहा लेकिन राजा के बिना मनुष्य की कही पूजा नहीं होती।$^2$ क्योंकि कहा गया है कि- राजा की सेवा से साधारण व्यक्ति भी असाधारण एवं मुख्य हो जाता है तथा न करने पर असाधरण भी साधरण एवं नगण्य हो जाता है।$^3$ इस तरह विभिन्न सूक्तियों के माध्यम से बालपण्डिता ने अपने पिता को समझाते हुए कहा कि- हे तात्! तुम राजा के मान्य एवं प्रसन्नता के पात्र हो, तुम स्थिर हो जाओ! मत्स्यों के हँसने का कारण राजा के आगे मै कहूँगी, तुम स्नान तथा भोजन करो।

तब ब्राह्मण के निवेदन पर राजा ने उस बालपण्डिता को बुलाकार उस मत्स्य हास्य का कारण जानना चाहा इस पर बालिका ने कहा- हे राजन्! आप अपना तिरस्कार खुद मत करो क्योंकि-राजा कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता, वह अलौकिक रूपधारी होता है। राजा का शरीर इन्द्र से ऐश्वर्य, अग्नि से तेज, यम से क्रोध, कुबेर से


1 सम्पदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरूत्वम्।
त त्रिभुवनत्रयतिलकं जननी, जनयति सुतं विरलम्।। शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 31, पृष्ठ सं० 32
2 परं स्वामिरहितानां न क्वापि पूजा।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ सं०- 34
3 अप्रधान प्रधान स्याद्यदि सेवेत पार्थिवम्।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं०- 38, पृष्ठ -34-35

[ 61 ]

Page 73Permalink

अब वह वणिक् मंदिर से प्रतिदिन पाँच मण्डक लाता और उसी से उसका भरण पोषण होता। एक दिन वणिक् भार्या (पद्मिनी) की सखी मन्दोदरी ने उससे उन मण्डको का रहस्य पूछा जिस पर पद्मिनी ने अपनी अनभिज्ञता दर्शायी तो उस सखी ने कहा कि जो इसे तुमने नहीं जाना तो तुम्हारा यौवन, रूप एव जीवन सब व्यर्थ है। तब वह अपने पति से यह रहस्य जानना चाही तो पति ने इसे दैवकृपा कहा तथा पति ने उसे समझाया कि मनुष्य की समृद्धि एवं विपत्ति, जीवन एवं मरण का कारण दैव है।

पति से अस्पष्ट जबाव पाकर उसने अनशन कर दिया। अतः पति ने उसे बहुत समझाया कि इसे कह देने पर बडी हानि एवं पश्चाताप होगा लेकिन उसने नहीं माना। कहा गया है– जिसे देव दुःख देना चाहते हैं उसकी बुद्धि हर लेते हैं जिससे वह अपने कल्याण की बात नही समझ पाता। तब उस बुद्धि रहित ने उसे रहस्य बता दिया। तब उसने अपनी सखी से यह सारा रहस्य बताया। अब अगले दिन जब दोनों के पति गणेश जी के पास गए तो उन्होंने पद्मिनी के पति को दंडित किया तथा उसकी सखी के पति को पाँच मण्डक दे दिया। फलतः पद्मिनी को घोर पश्चाताप हुआ।

कथा- 7

"स्थगिका और ब्राह्मण कथा"

दूसरे दिन पुनः राजा ने बालिका से मत्स्य हास्य का कारण जानना चाहा तो बालिका ने कहा राजन् आप कारण न पूछें वर्ना आपको पश्चाताप होगा।

जिस प्रकार स्थगिका नाम की नायिका में आसक्त ब्राह्मण को हुआ था। वैसे ही आपको भी पश्चाताप होगा।

वत्सोन नामक नगर में वीर नामक राजा तथा केशव नामक ब्राह्मण था। वह पृथिवी पर धन के लिए देवतीर्थों, शमशानों तथा नगरों में घूमता हुआ एक निर्जन प्रदेश में पहुँचा जहाँ उसने कपिल वर्ण के कच्छप पर वीरासन से स्थित तापस को देखा तो उस विप्र ने उसके सामने हाथ जोड़कर धन की याचना की। तब उस तापस ने उसे

[ 63 ]

Page 74Permalink

सिन्दूर दिया और कहा जब तुम इसे स्पर्श करोगे तो यह तुम्हें पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ देगा। लेकिन तुम इसको व्यक्त मत करना अन्यथा यह लौटकर मेरे पास चला आएगा।

अब वह ब्राह्मण रत्नावती पुरी को गया जहाँ वह स्थगिका नाम की वेश्या के साथ नित्य रमण करता था। उसके नित्य के धनागम का रहस्य न जान पाने पर उस वेश्या ने अपनी भक्ति, कला एवं सेवा से उसे इतना प्रसन्न किया कि उस ब्राह्मण ने सारा राज बता दिया। जब वह ब्राह्मण रात में सो गया तो उस वेश्या ने उसका सिन्दूर लेकर धनहीन अवस्था में उसको (ब्राह्मण को) घर से निकाल दिया।

वह विप्र अपना सिदूर न पाकर 'मेरा धन हर लिया गया' चिल्लाता हुआ राजा के पास गया जहाँ कुटनी ने पूछे जाने पर कहा कि यह धूर्त मेरी पुत्री पर लुब्ध है और उसके साथ रमण करना चाहता है इसी कारण यह चोरी लगा रहा है। लेकिन राजा किसी प्रकार सिन्दूर का रहस्य जान गया। किन्तु लोगों के द्वारा वह ब्राह्मण निर्वासित कर दिया गया और सिन्दूर योगीन्द्र के पास पहुँच गया। उस विप्र की न स्थगिका ही रह गयी और न सिन्दूर ही रह गया।

इसी प्रकार राजन्! तुम्हें भी रति और प्रीति नहीं होगी।

कथा- 8

"वणिक पुत्री सुभगा की कथा"

दूसरे दिन बाल पण्डिता ने राजा के आग्रह करने पर कहा कि- राजा का शरीर बहुत महत्वपूर्ण है अतः आपको किसी भी शुभ अथवा अशुभ कार्य के विषय में आग्रह नहीं करना चाहिए। राजन्! मत्स्य हास्य का कारण कह देने पर आपकी भी हालत उस वणिक् पुत्री के समान होगी जिसका न घर ही रहा और न बाहर।

त्रिपुर नामक स्थान का राजा त्रिविक्रम था। जहाँ सुन्दर नामक वणिक् था जिसकी पत्नी अत्यन्त व्यभिचारिणी थी। वणिक् उसे नियंत्रित नहीं कर पाता था। एक बार उसके पति द्वारा घर से बाहर निकलने पर रोक लगाने पर वह अपने सखी की मदद से अपने घर में आग लगवा कर अपने उपपति से मिलने यक्ष मन्दिर में चली

[ 64 ]

Page 75Permalink

गई। वह पुरूष घर जलता देखकर मन्दिर छोड़कर आग देखने चला गया जिससे वह उपभोग नहीं कर सकी। अतः उसका न घर रहा न बाहर का आनन्द ही।

कथा-9

"पुष्पहास और रानी की कथा"

शुक ने कहा देवि। बालपण्डिता ने राजा से कहा यदि मेरा कहा हुआ आप नहीं समझ है तो सुनिये– सब मन्त्रियों में श्रेष्ठ पुष्पहास मंत्री बिना अपराध बन्दी है। वह क्यो बन्दी बनाया गया है?

राजा बोला– यह पुष्पहास जैसा नाम से है वैसा गुण से भी है। जब यह मेरी सभा में हँसता है तो इसके मुख में पुष्पों की झडी लग जाती है। यह बात अन्य राज्य मण्डलों में फैल गयी। तब उन राजाओं ने अपने आदमी इस कुतूहल की सत्यता का पता लगाने के लिए भेजे। उनके आने पर वह नहीं हँसा और पुष्पों का ढेर भी नहीं लगा। इस कारण उसे कारागार में बन्द कर दिया गया है।

तब बालपण्डिता ने कहा– वह मन्त्री ही अपने हँसने और मत्स्यों के हँसने का कारण कहेगा तब राजा ने पुष्पहास मंत्री को वस्त्रादि देकर मन्त्रिपद पर स्थापित कर मत्स्यहास का कारण पूछा।

मन्त्री बोला राजन्! मेरी पत्नी अन्य पुरूष में रत् हो गयी ऐसा जान लेने के कारण में नहीं मैं नहीं हँसा था।

राजा ने ऐसा सुनकर फूलों के गुच्छों से रानी को प्रताडित कर उसके मुख की ओर देखा। उस प्रहार से उसने मिथ्या मूर्छा का अभिनय किया। पुष्पहास उस रानी को देखकर हँसने लगा और पुष्पों का ढेर लग गया। राजा ने मन्त्री से कहा– हमारे दुःख मे क्यों हँस रहे हो? मन्त्री ने कहा–राजन्! तुम्हारी रानी रात में सेवक जनों द्वारा छड़ी से आहत होकर भी मूर्छित नहीं होती, इस समय मूर्छित हो गयी– यही

[ 65 ]

Page 76Permalink

हँसने का कारण है। इस प्रकार राजा ने सभा विसर्जित कर दी और उस रानी को महल से निकाल दिया।

कथा-10

"शृङ्गारवती की कथा"

राजपुर नामक स्थान पर देवसाख्य नामक एक गृहपति था, उसके शृङ्गारवती और सुभगा नाम की दो पत्नियाँ थी।

वे दोनों परपुरुष मे आसक्त और एक दूसरे की रक्षा के उपाय में तत्पर रहती थी।

एक दिन जब सुभगा उपपति के साथ घर के भीतर विद्यमान थी तभी कहीं बाहर से पति कटसरैया हाथ में लिए गृहद्वार पर आ गया।

तभी तुरन्त शृङ्गारवती ने उस सुभगा को नंगीकर घर से बाहर निकाल दिया। पति ने 'यह क्या है?' पूछा तो शृङ्गारवती ने अत्यन्त, आदर से कहा– देवी जी के उपवन से जो तुमने ये कटसरैया ग्रहण किये उसी के बाद से ही देवी जी से यह आविष्ट हो गयी, अतः जाकर यथा स्थान इसे रख आओ जिससे यह स्वस्थ्य हो जाय।

जब तक वह मूढ ऐसा करने बाहर गया तब तक उसने उपपति को घर से निकाल दिया।

कथा-11

(रम्भिका और ब्राह्मण की कथा)

दाभिल नामक गाँव में विलोचन नाम का मुखिया रहता था। उसकी पत्नी रम्भिका को परपुरुष बहुत प्रिय थे परन्तु उसके पति के भय से कोई उसका भोग नहीं करता था।

तब वह जल के बहाने से घड़ा लेकर बावली पर गयी। वहाँ उसने एक सुन्दर ब्राह्मणपुत्र को देखकर रतिक्रीडा के लिए नेत्र संकेत से कहा और उसने कहा– तुम मेरे पीछे लगे मेरे घर चलो तथा मेरे पति को नमस्कार करना और सब मैं कर लूँगी।

[ 66 ]

Page 77Permalink
<!-- Blank or illustration plate: Page 77 -->
Page 78Permalink

तब उसके पति ने आकर उसे वृक्ष से धीरे-धीरे उतार कर उसके घर भेज दिया और वह धूर्ता (शोभिका) ताली बजाकर हंसने लगी।

कथा-13

‘‘वणिक् पत्नी राजिका की कथा’’

नागपुर नामक स्थान पर एक वणिक् रहता था। उसकी पत्नी राजिका बड़ी सुन्दर और दुराचारिणी थी। बनिया उसे परपुरूष में आसक्त नहीं जानता था। एक दिन उसने मार्ग में जाते हुए, संकेत किये हुए उपपति को देखा। उसे देखकर ‘घर से आज घी नहीं है? ऐसा कहकर घी के बहाने घर से निकलकर बाहर उपपति के साथ देर तक रही। पति घर में भूख से परेशान और क्रुद्ध था।

वह हाथ पैर और मुँह धूलिधूसर कर मुद्रा समेत धूलि लेकर घर आयी। क्रुद्ध रक्त नेत्र पति ने कहा- यह क्या?

दुःख की साँस छोड़ती तथा रोती हुई उसने धूल का ढेर दिखाकर कहा जिसके लिए तुम क्रुद्ध हो वह तुम्हारा द्रव्य इस धूल में गिर गया। इसे पछोर कर ले लो।

इस प्रकार कहने पर लज्जित उसने उसके अङ्गों को वास्त्राञ्चल से पोंछकर विविध लाड़-प्यार से शान्त किया।

कथा-14

‘‘धनश्री और उसके वेणीदान की कथा’’

शुक ने कहा- पद्मावती पुरी है। वहाँ धनपाल नामक वणिक् था। उसकी पत्नी धनश्री उसे प्राणों से भी प्रिय थी। (कुछ समय बीतने पर) एक दिन वह वणिक् रूपये-पैसे लेकर पत्नी से पूछकर विदेश चला गया। उसके चले जाने पर वह घर में मृत सी पड़ी रहती थी।


[ 68 ]

Page 79Permalink

इस प्रकार समय बीतता रहा। बसन्तोत्सव के अवसर पर उसके मनोभाव को समझने वाली सखी ने कहा- भामिनि! रूप और यौवन व्यर्थ मत करो।

ऐसा कहने पर धनश्री बोली-मैं विलम्ब नहीं सह सकती। जो कुछ तुमसे हो सकता है, वह शीघ्र करो। तब उसने उसे परपुरूष से मिलाया। उस पुरुष ने उसे अपने मे आसक्त जानकर उसके सिर की वेणी काट ली। तत्काल पति विदेश से आ गया अपने को बचाने के लिए उसने पति से कहा नाथ! तब तक तुम घर के द्वार पर ठहर जाओ, जब तक मैं सब ठीक तैयार कर लूँ।

पति के ऐसा करने पर उस बीच में जाकर देवी का पूजन कर (देवी के) सामने वेणी रख दी और मैदे की विशेष प्रकार की रोटियों के सहित बाहर निकलकर पति को घर के भीतर देवी के सामने ले जाकर उसने कहा- नाथ! घर के इष्ट देवता की पूजा करो।

पूजन करते हुए उसने वेणी देखकर कहा- यह क्या है? उसने कहा- मैंने देवी से प्रार्थना की थी जब मेरा पति आयेगा तब हे स्वामिनी। मैं तुम्हारे आगे वेणी काटूँगी।

उस मुग्ध मूढ पति ने देवी को नमस्कार कर उस (धनश्री) का अत्यन्त सम्मान किया।

कथा- 15

(श्रिया देवी और सुबुद्धि की कथा)

शालिपुर नामक नगर में शालिग बनिया रहता था। उसकी पत्नी का नाम जयिका था और पुत्र का नाम गुणाकर था। उसकी पत्नी श्रिया देवी सुबुद्धि नामक दूसरे बनिये के साथ रमण करती थी। चारों तरफ बात फैल जाने पर भी उसका पति इस अफवाह पर विश्वास नहीं करता था।

[ 69 ]

Page 80Permalink

एक दिन उस परपुरुष को सोते हुए उसके ससुर ने देखा और उसके पैर से नुपुर उतार लिया और उसे पता न चला। तब उसने उपपति को भेजकर पति को वहाँ लाकर उसके साथ, सोयी और निद्रा के बीच में पति को उठाकर कहा- तुम्हारे पिता ने हमारे पैर से नूपुर उतार लिया। उसने कहा प्रातः पिता से लेकर तुम्हें दे दूँगा। पिता ने कहा- परपुरुष के साथ सोयी देखकर मैंने नूपुर ले लिया था।

उस (श्रिया देवी) ने कहा- मैं तुम्हारे पुत्र के साथ सोयी थी यदि आपको विश्वास नहीं है तो गाँव में उत्तर की ओर यक्ष है जो कोई सच्चा होता है वही उसकी जाँघों की बीच से निकल पाता है।

ऐसा करने के लिए ससुर से स्वीकार कर लेने पर वह उपपति के घर जाकर बोली-मै प्रातः यक्ष की जाँघों के बीच से निकलूँगी तुम वहाँ पागल बनकर मेरा कण्ठ पकड़ लेना।

प्रातः यक्ष पूजा के लिए आती हुई उसके कण्ठ में पागल बने उपपति ने अपनी दोनों भुजाएँ डाल दीं।

तब पुनः स्नान कर यक्ष के पास आकर सब लोगों को सुनाकर कहा-हे भगवान यक्ष! मेरे पति तथा इस पागल के अतिरिक्त यदि और किसी पुरूष ने मेरा स्पर्श किया हो तो तुम्हारी जाँघों के बीच से मेरा निष्क्रमण न हो सके। ऐसा कहकर सबके सामने जाँघों के मध्य प्रवेश कर निकल गयी और लोगों के द्वारा सती मानकर सम्मानित की गयी।

कथा-16

"मुग्धिका की कथा"

विदिशा नामक नगरी में जनवल्लभ वणिक् रहता था। उसकी पत्नी मुग्धिका अत्यन्त चञ्चल और व्यभिचारिणी थी। जब उसने पति को कलंकित कर दिया तब पति ने विरादरी के लोगों से बताया कि वह परपुरुषगामिनी है।

[ 70 ]

Page 81Permalink

जब बन्धुओं ने वाणिक् की पत्नी से पूछा तो उल्टा उसने पति को ही परस्त्रीगामिनी बताया और कहा कि यह मुझे मिथ्या कलंकित कर रहे हैं।

तब सभी ने मिलकर यह योजना बनायी कि इन दोनों में से जो भी आज से बाहर सायेगा, वही अपराधी होगा। इस तरह सहमति होने पर भी वह सोते पति को छोड़कर बाहर चली गयी। उसके जाने पर पति दरवाजा बन्द करके सो गया। जब वह रतिक्रीडा करके आयी और पति ने दरवाजा नहीं खोला तो वह कुएँ में एक भारी पत्थर फेककर दरवाजे के पास खडी रही। पति ने सोचा कि कुएँ में गिर गयी होगी ऐसा समझकर द्वार खोलकर बाहर निकला तो वह तुरन्त अन्दर जाकर दरवाजा बन्द कर ली। तब पति भी बाहर खड़ा होकर 'हा प्रिये' ऐसा कहते हुए जोर-जोर से रोने लगा। तब पत्नी भी रहस्य खुल जाने के भय से बाहर निकलकर पति को अन्दर ले गयी और दोनों ने आपस में समझौता करते हुए इकरार किया कि आज से हम दोनों एक दूसरे पर दोषारोपण नहीं करेंगे।

कथा-17

"गुणाढ्य ब्राह्मण की कथा"

विशाला नगरी में यायजूक नामक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी पाहिनी सुरूप और अत्यन्त प्रिय थी। पिता ने अपने पुत्र को क्रमशः समस्त विद्यायें ग्रहण करायीं। कतिपय दिनों बाद वह माता-पिता को त्यागकर विदेश चल गया और गुणाढ्य नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने जयन्ती नगरी में बुद्धि से जीवकोपार्जन करने को सोचा और एक बैल का यव, काश आदि से पालन किया।

उस बैल को बन्धन युक्त कर वह बनजारा वेश धारण किये, मदना वेश्या की कुट्टिनी से बोला-कि माल लादे हुए हमारे बैल को जहाँ बांधने का स्थान मिलेगा वहीं मैं सो जाऊँगा।

[ 71 ]

Page 82Permalink

इस प्रकार कहने पर बैल पर स्थित धन ग्रहण करने की इच्छा से उस कुटनी ने उसे ठहरा लिया। वह भी बैल को बाँधकर विलासिनी के पास प्रेमासक्त होकर रात मे वहीं रह गया और सुबह सबसे पहले उठकर सोने की जंजीर लेकर चला गया।

उसके जाने के बाद एक दासी उठी और बैल को न देखकर कुटनी से बोली-आर्ये! यह क्या ?

तब विलासिनी के पास से गया हुआ जानकर वह मौनधारण कर ली और एक दिन जुए में हारा गुणाढ्य वेश्या द्वारा पकडा गया।

तब उसने उपाय सोचा-'शम्बली-शम्बली' (कुटनी) ऐसा कहने लगा।

तब राजभय से उसने गुणाढ्य को छोड दिया। चलती हुई उस कुटनी के पीछे लगा गुणाढ्य 'शम्बली' यह शब्द कहता चला और एकान्त में उसे ले जाकर प्रसन्न कर हाथ से सोने का आभूषण निकालकर दिया।

कथा-18

''सर्षपचौर की कथा''

शुभस्थान नगर में दरिद्र बनिया रहता था। एक दिन उसके घर में चोर घुसा जब उसे कुछ नहीं मिला तो वह सरसों लेकर निकला और सिपाहियों ने उसे घेर लिया। गले में सरसों बाँधे हुए वह राजा के पास लाया गया और पूछे जाने पर कहता है- अहो सरसों में कुछ नहीं रह गया।

तब राजा ने सभा में बुलाकार कहा- तुम्हारी बात का अभिप्राय समझ में नही आ रहा है। तब उसने कहा-

बलि के वर्ष दिन पर लोग अपनी रक्षा के लिए हाथ में सरसों के दानें बाँधते हैं, वह आज से निश्चय ही (अप्रमाण) असत्य होगा।

क्योंकि मैं गले में इतनी सरसों बाँधे भी बन्दी हूँ। यह सुनकर राजा हँसते हुए उसे छोड़ दिया।

[ 72 ]

Page 83Permalink

कथा-19

‘‘सन्तिका और स्वच्छन्दा की कथा’’

करहड नगर में गुणप्रिय नामक राजा था। वहीं पर सोढाक नाम का सेठ था। उसकी पत्नी सन्तिका अत्यन्त पतिव्रता थी। वहीं एक दूसरा बनिया भी था। उसकी भार्या स्वच्छन्दा व्यभिचारिणी थी। वह सोढाक को नित्य चाहती परन्तु वह उसकी इच्छा पूर्ति नहीं करता। एक दिन वह (सोढाक) मनोरथ नामक यक्ष को प्रणाम करने गया। तभी स्वच्छन्दा भी उसका अनुसरण करती हुई हावभावादि से उसे अनुकूल बनाकर उसके साथ रति क्रीडा की।

उन दोनों (सोढाक , स्वच्छन्दा ) को पकडने के लिए राजपुरुष ने मन्दिर घेर लिया। सन्तिका ने पति की निर्दोषता को बचाने के लिए रात को जोर-जोर से मृदङ्ग बजवाती यक्ष मन्दिर के पास गयी और पहरेदारों से कहा-मैं आज दिन-भर यक्ष परायण थी, अतः यक्ष का दर्शन एकान्त में करके ही भोजन ग्रहण करूँगी कुछ धन लेकर मुझे अन्दर जाने दिया जाय।

उन लोगों ने वैसा ही किया। तब उसने स्वच्छन्दा को अपना वेष धारण कराकर बाहर निकाल दिया और स्वयं भीतर रह गयी। प्रातः सोढाक को अपनी पत्नी सहित देखकर पहरेदार अत्यन्त लज्जित हुए।

कथा-20

‘‘केलिका की कथा’’

साभ्रमती नदी के किनारे शङ्खपुर नगर में सूर नामक एक धनी किसान रहता था। उसकी पत्नी का नाम केलिका था जो अत्यन्त कुटिल तथा कुलटा थी। वह नदी के दूसरे तट पर बसे सिद्धपुर में रहने वाले ब्राह्मण के साथ भोग-विलास करती थी। जब पति को यह वृतान्त ज्ञात हुआ तो वह उसके चरित्र का पता लगाने के लिए वहाँ गया। लेकिन नदी के किनारे केलिका ने पति को देख लिया।

[ 73 ]

Page 84Permalink

अतः उसने घड़े को जिसके सहारे वह नदी पार करती थी, पानी से भरकर पडोसिनी के घर के अन्दर देवी को सजाकर जल से स्नान कराकर पहले से ही संकेत द्वारा दिखाई गई दूती को लक्ष्य कर बोली-स्वामिनी! आप ही ने तो कहा था कि तुम सिद्धेश्वरी को स्नान नहीं कराओगी तो पाँच दिन के अन्दर तुम्हारे पति की मृत्यु हो जायेगी।

यह सुनकर पति प्रसन्न हुआ और अलक्षित ही चला गया।

कथा-21

"मन्दोदरी और उसके मयूर भक्षण की कथा"

प्रतिष्ठान नगर में हेमप्रभ नामक राजा और श्रुतशील मन्त्री रहता था यशोधरा नामक सेठ की पत्नी मोहिनी और उन दोनों की पुत्री मन्दोदरी थी। मन्दोदरी कान्तिपुर से आये श्रीवत्सनामक वणिक् को दी गयी। मन्दोदरी प्रतिदिन कुटनी द्वारा मिलाये गये राजपुत्र का उपभोग करती थी तथा गर्भिणी होने पर उसने राजा के प्रिय मयूर को मरवा कर खा लिया। राजा मयूर के आने पर ही भोजन करता ऐसा नियम था। उस दिन भोजन वेला पर मयूर के न मिलने पर डुग्गी पिट जाने पर कुटनी ने बताया कि किसी गर्भवती ने दोहद के कारण उसे खा लिया है।

तब कुटनी मन्दोदरी के घर गयी और उसने सारा मयूर वृतान्त बता दिया। विश्वासघातिनी कुटनी ने सब कुछ जानकर मन्त्री को और मन्त्री ने राजा को बताया। राजा ने कहा वणिक् वधू को बिना देखे उस पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए।

तब कुटनी मन्त्री को सन्दूक में रखकर उस मन्दोदरी के घर छोड़ आयी और कुछ समय बाद उसके घर जाकर उससे बोली-मुग्धे तुमने बहुत अच्छा किया जो मयूर का भक्षण कर लिया।

उसने सारा वृतान्त वणिक् वधू से फिर से पूछा-जिससे कि पेटी में स्थित मन्त्री सभी बात को सुन सके।

[ 74 ]

Page 85Permalink

ज्यों ही कुटनी ने हाथ से सन्दूक को पीटा त्यों ही वणिक् पुत्री मन्दोदरी ने वितर्क पूर्वक कहा-मातः जब तक मैंने ऐसा किया तब तक रात बीत चुकी थी और मैं जग गयी। इसके आगे स्वप्न मे और कुछ नहीं देखा। यदि कोई इस विषय में मेरा प्रमाण हो तो बताएँ।

ऐसा सुनकर मन्त्री सन्दूक का ढक्कन खोलकर बहार निकला और मन्दोदरी का सम्मान किया और उस कुटनी को निर्वासित कर दिया।

कथा-22

"माढुक की कथा"

दम्भिला गाँव में सोढाक नाम का किसान रहता था। उसकी पत्नी का नाम माढुका था। जब वह अपने पति के लिए प्रतिदिन खेत में भात लेकर जाती थी उसी बीच मार्ग में बाहर एक सूरपाल नामक मनुष्य उसका उपभोग करता था। एक दिन जब वह भात अलग रखकर उस सूरपाल के साथ स्थित थी तभी मूलदेव नामक धूर्त ने उस भात के भीतर ऊँट की शक्ल का मदिरा पात्र रख दिया। जब पति ने ऊँट के भीतर उष्ट्रिका देखा तो पूछा यह क्या है? तब उसने अत्यन्त चतुराई से कहा स्वामी! आज रात मैने स्वप्न में देखा कि एक ऊँटनी तुम्हें खा गयी। अतः विघ्न को दूर करने के लिए यह विपरीत किया। यह सनुकर अनुरक्त उसने उष्ट्रिका भी खा लिया।

कथा-23

"धूर्तमाया कुट्टिनी की कथा"

पद्मावती नगरी में सुदर्शन नाम का राजा था। उसकी पत्नी का नाम शृङ्गारसुन्दरी था। उसके साथ उस राजा के क्रीडा करते-करते ग्रीष्मकाल आ गया ऐसे ग्रीष्मकाल में चन्द्रनामक वणिक् अपनी पत्नी सहित घर की छत पर आरूढ़ हुआ। इस प्रकार सन्ध्याकाल में वह वणिक् उस प्रभावती के साथ क्रीडा किया करता था।

[ 75 ]

Page 86Permalink

इसके पुत्र का नाम राम था। पिता ने उसे सम्पूर्ण विद्यायें सिखवायीं उसकी माता ने एक दिन चन्द्र से कहा एक ही पुत्र होने के कारण मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। चन्द्र ने कहा- तुम्हारा एक ही पुत्र प्रशंसनीय है।

ऐसा कहकर धूर्तमाया कुटनी को बुलाकर कहा कि मैं तुझे सुवर्ण की सहस्र मुद्राएँ दूँगाँ। मेरे पुत्र को स्त्री माया के वञ्चन में निपुण बना दो और कहा कि यदि मेरा पुत्र कहीं भी वेश्या के कपट से पराजित हुआ तो मैं दूनी सुवर्ण मुद्राएँ लूँगा। उसने एवमस्तु कहते हुए उसे वेश्याओं में उत्पन्न होने वाले भावों का अध्ययन कराया।

इस प्रकार समस्त वेश्या चरित सीख लेने के बाद उस कुटनी ने उस पुत्र को बनिये को सौंप दिया। पिता के कहने पर वह व्यापार के लिए सुवर्ण द्वीप गया और वहाँ कलावती वेश्या के साथ एक वर्ष रहा किन्तु वह वेश्या अत्यन्त चतुराई करने पर भी उससे धन न ले सकी तो उसने सारा हाल अपनी माता से बताया। माता बोली कि- प्रपञ्च से ही उसका धन लिया जा सकता है। अतः जब वह अपने देश को जाने लगे तो तुम उससे कहना मैं भी चलूँगी और यदि न ले जाए तो कुएँ में झम् से कूद जाना ऐसा करने से वह तुम्हें सब धन दे देगा। उसने कुटनी के कथनानुसार ही किया और करोड़ों की सम्पत्तित लेकर उसे निकाल दिया।

इस प्रकार धन तथा मान के विषय में पराभव के प्राप्त होने पर अपने देश में आकर पिता को पूरा वृतान्त बताया। तब पिता ने धूर्तमाया को बुलाकर कहा कि तुम्हारे द्वारा शिक्षा देने पर भी अपना सर्वस्व गँवाकर आया हैं उसने कहा तुम फिर से नौका भराकर पुत्र समेत मुझे वहाँ भेजो। वहाँ पहुँचकर अत्यन्त चालाकी से उस कुटनी ने वेश्या से अपना और उसका सारा धन लेकर राम के साथ नौका पर सवार होकर अपने घर पहुँचकर महोत्सव कराया।

[ 76 ]

Page 87Permalink

कथा- 24

"सज्जनी और देवक की कथा"

चन्द्रपुर नगर में सूरपाल नामक धनी बढ़ई रहता था। उसकी पत्नी सज्जनी परपुरूष में आसक्ति रखती थी। अपने घर में ही स्थित वह देवक नाम पुरूष से रति करती थी ऐसा लोगो से सुनकर बढ़ई कपट से प्रातः ही घर से निकलकर शाम को गुप्त रूप से आकर पलंग के नीचे बैठ गया। जब उसकी पत्नी उपपति के साथ पलंग पर आरूढ हुई तो पति ने उसके बाल पकड़ लिए।

अतः अपनी ने अपने को बचाने के लिए उस उपपति का मुँह देखकर कहा-मेरे पति इस समय घर पर नहीं है। यद्यपि पति ने तुम्हारा धन लिया है तथापि क्षमा कीजिए। बढ़ई के आ जाने पर तुम दोनों को मिलाऊँगी।

कथा- 25

"श्वेताम्बर की कथा"

चन्द्रपुरी नगरी मे सिद्धसेन नामक बौद्ध संन्यासी लोगों द्वारा बहुत सम्मानित था किन्तु उसी नगर में एक दूसरा जैन साधु भी जो बहुत गुणवान था, आ गया उस गुणी ने सभी नगरवासियों यहाँ तक की बौद्ध भिक्षुओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर दिया था। इसलिए वह बौद्ध लोगों द्वारा उस जैन सन्यासी को सम्मान किये जाने को न सहता हुआ स्वयं उसके निवास स्थान पर वेश्या भेजकर, यह वेश्या में आसक्त सुचरित्रवान नहीं है- इस प्रकार उसकी लोकनिन्दा की। उसे देखने के लिए लोगों को बुलाया और बोला-बौद्ध भिक्षु ही ब्रह्मचारी है, जैनसाधु का अच्छा आचरण नहीं है। लेकिन जैनसाधु भी चालाक था वह दीपक से वासगृह को जलाकर रात बीत जाने पर नंगा हो, वेश्या का हाथ पकड़े हुए बाहर निकला। तभी सर्वत्र यह लोकापवाद फैल गया कि यह तो बौद्ध भिक्षु है, जैन साधु नहीं।

[ 77 ]