१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
मन्त्र ८६ २६५ इस प्रकार के अभ्यास द्वारा जैसे-जैसे योगी को चित्त-शक्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे ही उसको दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, क्षण भर में सुदूर क्षेत्र से आ जाना, वाणी की सिद्धि, जब चाहे जैसा रूप ग्रहण कर लेना, अदृश्य हो जाना, उसके मल-मूत्र के स्पर्श से लोहे का स्वर्ण में परिवर्तन हो जाना, आकाश मार्ग से गमन कर सकना आदि सिद्धियाँ प्रकट होने लगती हैं। बुद्धिमान् श्रेष्ठ योगी सदैव योग की सिद्धि की ओर ही ध्यान बनाये रखे॥ एते विघ्ना महासिद्धेर्न रमेत्तेषु बुद्धिमान् । न दर्शयेत्स्वसामर्थ्यं यस्य कस्यापि योगिराट् ॥ ७६ (परन्तु) ये सभी सिद्धियाँ योग-सिद्धि के लिए विघ्नरूप हैं, बुद्धिमान् योगी साधक को इन (सिद्धियों) से बचना चाहिए। अपनी इस तरह की सामर्थ्य को कभी भी किसी के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए॥ ७६ यथा मूढो यथा मूर्खो यथा बधिर एव वा । तथा वर्तेत लोकस्य स्वसामर्थ्यस्य गुप्तये ॥ ७७ ॥ इसलिए श्रेष्ठ योगी को जन सामान्य के समक्ष अज्ञानी, मूर्ख एवं बधिर की भाँति बनकर रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य को सभी तरह से छिपाकर गुप्त रीति से रहना चाहिए॥ ७७ ॥ शिष्याश्च स्वस्वकार्येषु प्रार्थयन्ति न संशयः । तत्तत्कर्मकरव्यग्रः स्वाभ्यासेऽविस्मृतो भवेत् ॥ शिष्य-समुदाय अपने-अपने कार्यों के लिए योगी साधक से निश्चित ही प्रार्थना करेंगे; किन्तु योगी को उन (शिष्यगणों) के काम में पड़कर अपने कर्त्तव्य (अभ्यास) को विस्मृत नहीं कर देना चाहिए॥ ७८ ॥ सर्वव्यापारमुत्सृज्य योगनिष्ठो भवेद्यतिः । अविस्मृत्य गुरोर्वाक्यमभ्यसेत्तदहर्निशम् ॥ ७९ ॥ उस योगी को चाहिए कि गुरु के वाक्यों को याद करके सभी तरह के क्रिया-कलापों को छोड़कर योग के अभ्यास में लगा रहे॥ ७९॥ एवं भवेद्घटावस्था संतताभ्यासयोगतः । अनभ्यासवतश्चैव वृथागोष्ठ्या न सिद्ध्यति ॥ ८० ॥ इस प्रकार लगातार योग के अभ्यास से उसे घटावस्था की प्राप्ति हो जाती है; परन्तु इस तरह की सिद्धि अभ्यास के द्वारा ही मिल सकती है, केवल बातों से कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता ॥ ८० ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन योगमेव सदाभ्यसेत् । ततः परिचयावस्था जायतेऽभ्यासयोगतः ॥ ८१ ॥ वायुः परिचितो यत्नादग्निना सह कुण्डलीम् । भावयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधतः ॥ ८२ ॥ अतः योगी को निरन्तर प्रयत्नपूर्वक योग का अभ्यास करते रहना चाहिए। तदनन्तर अभ्यास योग से 'परिचय अवस्था' का शुभारम्भ होता है। उस (अवस्था) के लिए प्रयत्नपूर्वक वायु से प्रदीप्त अग्नि सहित कुण्डलिनी को साधना के द्वारा जाग्रत् करके भावनापूर्वक सुषुम्ना में अवरोध रहित प्रवेश कराना चाहिए॥ वायुना सह चित्तं च प्रविशेच्च महापथमू । यस्य चित्तं स्वपवनं सुषुम्नां प्रविशेदिह ॥ ८३ ॥ भूमिरापोऽनलो वायुराकाशश्चेति पञ्चकः । येषु पञ्चसु देवानां धारणा पञ्चधोच्यते ॥ ८४ ॥ तत्पश्चात् वायु के सहित चित्त को महापथ में अग्रसर करना चाहिए। जिस योगी का चित्त वायु के सहित 'सुषुम्ना' नाड़ी में प्रविष्ट हो जाता है, उसे पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु तथा आकाश इन पञ्च महाभूत रूपी देवों की पाँच प्रकार की धारणा हो जाती है॥ ८३-८४॥ पादादिजानुपर्यन्तं पृथिवीस्थानमुच्यते । पृथिवी चतुरस्रं च पीतवर्णं लवर्णकम् ॥ ८५ ॥ पार्थिवे वायुमारोप्य लकारेण समन्वितम् । ध्यायेश्चतुर्भुजाकारं चतुर्वक्त्रं हिरण्मयम् ॥ ८६ ॥ पैरों से जानु (घुटनों) तक पृथ्वी तत्त्व का स्थान बतलाया गया है। चार कोनों से युक्त यह पृथ्वी, पीत वर्ण, 'ल' कार से युक्त कही गयी है। पृथ्वी तत्त्व में वायु को आरोपित करते हुए 'ल' कार को उसमें संयुक्त करके उस स्थान में स्वर्ण के समान रंग से युक्त चार भुजाओं एवं चतुर्मुख ब्रह्मा जी का ध्यान करना चाहिए ॥
२६६ योगतत्त्वोपनिषद धारयेत्पञ्च घटिकाः पृथिवीजयमाप्नुयात्। पृथिवीयोगतो मृत्युर्न भवेदस्य योगिनः ॥ ८७ ॥ इस तरह से पाँच घटी (२ घंटे) तक ध्यान करने से योगी पृथ्वी तत्त्व को जीत लेता है। ऐसे योगी की पृथ्वी के संयोग (विकार या आघात) से मृत्यु नहीं होती ॥ ८७ ॥ आजानोः पायुपर्यन्तमपां स्थानं प्रकीर्तितम्। आपोऽर्धचन्द्रं शुक्लं च वंबीजं परिकीर्तितम् ॥ वारुणे वायुमारोप्य वकारेण समन्वितम्। स्मरन्नारायणं देवं चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥ ८९ ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं पीतवाससमच्युतम्। धारयेत्पञ्च घटिकाः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ९० ॥ घुटनों से गुदास्थान तक जल-तत्त्व का क्षेत्र बतलाया गया है। यह जल-तत्त्व अर्द्ध चन्द्र के रूप में 'वं' बीज वाला होता है। इस जल-तत्त्व में वायु को आरोपित करते हुए 'वं' बीज को समन्वित करके चतुर्भुज, मुकुट धारण किये हुए, पवित्र स्फटिक के सदृश, पीत वस्त्रों से आच्छादित अच्युतदेव श्री नारायण का पाँच घटी (२ घंटे) तक ध्यान करना चाहिए। इससे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है ॥ ८८-९० ॥ ततो जलाद्भयं नास्ति जले मृत्युर्न विद्यते । आपायोर्हृदयान्तं च वह्निस्थानं प्रकीर्तितम् ॥ ९१ ॥ इसके पश्चात् उस योगी को जल से किसी भी तरह का डर नहीं रहता और न ही जल से उसकी मृत्यु हो सकती है। जलतत्त्व (गुदा भाग) से हृदय क्षेत्र तक अग्नि का स्थान बताया गया है ॥ ९१ ॥ वह्निस्त्रिकोणं रक्तं च रेफाक्षरसमुद्भवम्। वह्नौ चानिलमारोप्य रेफाक्षरसमुज्ज्वलम् ॥ ९२ ॥ तीन कोणों से युक्त अग्नि, लाल रंग वाला एवं 'र' कार से संयुक्त होता है। अग्नि में वायु को आरोपित करके उस समुज्ज्वल 'र' कार को समन्वित करना चाहिए ॥ ९२ ॥ त्रियक्षं वरदं रुद्रं तरुणादित्यसंनिभम्। भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं सुप्रसन्नमनुस्मरन् ॥ ९३ ॥ त्रियक्ष (तीन नेत्रों) से युक्त वर प्रदान करने वाले, तरुण आदित्य के सदृश प्रकाशमान तथा समस्त अङ्गों में भस्म धारण किये हुए भगवान् रुद्र का प्रसन्न मन से सदा ध्यान करना चाहिए ॥ ९३ ॥ धारयेत्पञ्च घटिका वह्निनासौ न दह्यते। न दह्यते शरीरं च प्रविष्टस्याग्निमण्डले ॥ ९४ ॥ पाँच घटी (२ घंटे) तक इस तरह से चिन्तन करने से वह (योगी) अग्नि से नहीं जलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रखर जलती हुई अग्नि में भी संयोगवश प्रविष्ट कराया जाए, तो भी वह नहीं जलता ॥ ९४ ॥ आहृदयाद्भ्रुवोर्मध्यं वायुस्थानं प्रकीर्तितम् । वायुः षट्कोणकं कृष्णं यकाराक्षरभासुरम् ॥ हृदय क्षेत्र से भृकुटियों तक का स्थान वायु का क्षेत्र कहा गया है, यह षट्कोण के आकार वाला, कृष्ण वर्ण से युक्त भास्वर 'य' अक्षर वाला होता है ॥ ९५ ॥ मारुतं मरुतां स्थाने यकाराक्षरभासुरम् । धारयत्तत्र सर्वज्ञमीश्वरं विश्वतोमुखम् ॥ ९६ ॥ मरुत् स्थान पर यकार होता है। यहाँ 'य' अक्षर के सहित विश्वतोमुख सर्वज्ञ ईश्वर का सतत चिन्तन करना चाहिए ॥ धारयेत्पञ्च घटिका वायुवद्व्योमगो भवेत् । मरणं न तु वायोश्च भयं भवति योगिनः ॥ ९७ ॥ इस तरह पाँच घटी अर्थात् दो घंटे तक उन विश्वतोमुख भगवान् का ध्यान करने से योगी वायु के सदृश आकाश में गमन करने वाला हो जाता है। उस महान् योगी को वायु से किसी भी तरह का भय नहीं व्याप्त होता तथा वह वायु से मृत्यु को भी नहीं प्राप्त होता ॥ ९७ ॥ आभूमध्यात्तु मूर्धान्तमाकाशस्थानमुच्यते । व्योम वृत्तं च धूम्रं च हकाराक्षरभासुरम् ॥ ९८ ॥ भृकुटी के मध्य भाग से लेकर मूर्धा के अन्त तक का आकाश तत्त्व का क्षेत्र कहा गया है। यह व्योमवृत्त के आकार वाला, धूम्र वर्ण से युक्त तथा 'ह' कार (अक्षर) से प्रकाशित है ॥ ९८ ॥
मन्त्र १०९ २६७ आकाशे वायुमारोप्य हकारोपरि शंकरम्। बिन्दुरूपं महादेवं व्योमाकारं सदाशिवम्॥ ९९॥ इस आकाश तत्त्व में वायु का आरोपण करके 'ह' कार के ऊपर भगवान् शंकर (का ध्यान करे), जो बिन्दु रूप महादेव हैं। वही व्योमाकार में सदाशिव रूप हैं॥ ९९॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं धृतबालेन्दुमौलिनम्। पञ्चवक्त्रयुतं सौम्यं दशबाहुं त्रिलोचनम्॥ १००॥ वे भगवान् शिव परम पवित्र स्फटिक के सदृश निर्मल हैं, बालरूप चन्द्रमा को मस्तक में धारण किये हुए हैं, पाँच मुखों से युक्त, सौम्य, दश भुजा एवं तीन नेत्रों से युक्त हैं॥ १००॥ सर्वायुधैर्धृताकारं सर्वभूषणभूषितम्। उमार्धदेहं वरदं सर्वकारणकारणम्॥ १०१॥ वे भगवान् शिव सभी प्रकार के शस्त्रास्त्रों को धारण किये हुए, विभिन्न प्रकार के आभूषणों से विभूषित, पार्वती जी से सुशोभित अर्धाङ्ग वाले, वर प्रदान करने वाले तथा सभी कारणों के भी कारण रूप हैं॥ १०१॥ आकाशधारणात्तस्य खेचरत्वं भवेद्ध्रुवम्। यत्र कुत्र स्थितो वापि सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ १०२ ॥ उन भगवान् शिव का ध्यान आकाश तत्त्व में करने से निश्चित ही आकाश मार्ग में गमन की शक्ति मिल जाती है। इस ध्यान से साधक कहीं भी रहे, वह अत्यन्त सुख की प्राप्ति करता है॥ १०२॥ एवं च धारणाः पञ्च कुर्याद्योगी विचक्षणः। ततो दृढशरीरः स्यान्मृत्युस्तस्य न विद्यते ॥ १०३ ॥ इस प्रकार विशेष लक्षणों से संयुक्त योगी को पाँच तरह की धारणा करनी चाहिए। इस धारणा से उस योगी का शरीर अत्यन्त दृढ़ हो जाता है तथा उसे मृत्यु का भय भी व्याप्त नहीं होता॥ १०३॥ ब्रह्मणः प्रलयेनापि न सीदति महामतिः। समभ्यसेत्तथा ध्यानं घटिकाषष्टिमेव च। वायुं निरुध्य चाकाशे देवतामिष्टदामिति ॥ १०४॥ सगुणं ध्यानमेतत्स्यादणिमादिगुणप्रदम्। निर्गुणध्यानयुक्तस्य समाधिश्च ततो भवेत्॥ १०५॥ ब्रह्म-प्रलय अर्थात् चराचर में जल ही जल की स्थिति होने पर भी वह महामति दुःख को प्राप्त नहीं होता। छः घटी अर्थात् दो घंटे चौबीस मिनट तक वायु को रोककर आकाश तत्त्व में इष्ट सिद्धिदाता-देवों का निरन्तर ध्यान करते रहना चाहिए। सगुण ध्यान करने से अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं तथा निर्गुण रूप में चिन्तन करने से समाधि की स्थिति प्राप्त होती है ॥१०४- १०५ ॥ दिनद्वादशकेनैव समाधिं समवाप्नुयात्। वायुं निरुध्य मेधावी जीवन्मुक्तो भवत्ययम् ॥ १०६ ॥ योग में निष्णात साधक मात्र बारह दिन में ही समाधि की सिद्धावस्था को प्राप्त कर लेता है। वह योगी वायु (प्राण) को स्थिर करके (समाधि को सिद्ध करके) अपने जीवन में मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥१०६॥ समाधिः समतावस्था जीवात्मपरमात्मनोः। यदि स्वदेहमुत्स्रष्टुमिच्छा चेदुत्सृजेत्स्वयम्॥ १०७॥ समाधि में जीवात्मा एवं परमात्मा की समान अवस्था हो जाती है। उसमें यदि अपना शरीर छोड़ने की इच्छा हो, तो उसका परित्याग भी किया जा सकता है ॥ १०७॥ परब्रह्मणि लीयेत न तस्योत्क्रान्तिरिष्यते। अथ नो चेत्समुत्स्रष्टुं स्वशरीरं प्रियं यदि ॥ १०८ ॥ सर्वलोकेषु विहरन्नणिमादिगुणान्वितः। कदाचित्स्वेच्छया देवो भूत्वा स्वर्गे महीयते ॥ १०९ ॥ इस प्रकार से योगी अपने आपको परब्रह्म में विलीन कर लेता है, उसे पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता; किन्तु यदि उसको शरीर प्रिय लगता है, तो वह स्वयं ही अपने शरीर में स्थित होकर अणिमा आदि समस्त सिद्धियों से युक्त हो सभी लोकों में गमन कर सकता है तथा यदि चाहे तो कभी भी देवता होकर स्वर्ग में निवास कर सकता है ॥ १०८-१०९ ॥
२६८ योगतत्त्वोपनिषद् मनुष्यो वापि यक्षो वा स्वेच्छयापि क्षणाद्भवेत्। सिंहो व्याघ्रो गजो वाश्वः स्वेच्छया बहुतामियात् ॥ ११० ॥ योगी स्वेच्छा से मनुष्य अथवा यक्ष का रूप भी क्षणभर में धारण कर सकता है। वह सिंह, हाथी, घोड़ा आदि अनेक रूपों को स्वेच्छापूर्वक धारण कर सकने में समर्थ होता है ॥ ११०॥ यथेष्टमेव वर्तेत यद्वा योगी महेश्वरः । अभ्यासभेदतो भेदः फलं तु सममेव हि ॥ १११ ॥ महेश्वर पद के प्राप्त हो जाने पर योगी इच्छानुकूल व्यवहार कर सकता है। यह भेद तो मात्र अभ्यास का ही है, फल की दृष्टि से तो दोनों समान ही हैं ॥ १११ ॥ पार्ष्णि वामस्य पादस्य योनिस्याने नियोजयेत् । प्रसार्य दक्षिणं पादं हस्ताभ्यां धारयेद्दृढम् ॥ साधक को चाहिए कि बाँयें पैर की एड़ी के द्वारा योनि स्थान को दबाये तथा दायें पैर को फैलाकर के उस पैर के अँगूठे को मजबूती से पकड़ ले ॥ ११२ ॥ चुबुकं हृदि विन्यस्य पूरयेद्वायुना पुनः । कुम्भकेन यथाशक्ति धारयित्वा तु रेचयेत् ॥ ११३ ॥ इसके बाद थोड़ी को छाती से लगा लेना चाहिए। तदनन्तर वायु को धीरे-धीरे अन्दर धारण करे और शक्ति के अनुसार कुम्भक करे, फिर रेचक के द्वारा वायु को बाहर निकाल देना चाहिए ॥ ११३ ॥ वामाङ्गेन समभ्यस्य दक्षाङ्गेन ततोऽभ्यसेत् । प्रसारितस्तु यः पादस्तमूरूपरि नामयेत् ॥ ११४ इस क्रिया को निरन्तर अभ्यास पूर्वक बाँयें अंग से करने के उपरान्त दायें अंग से करे अर्थात् जो पैर फैलाया हुआ था, उसे योनि के स्थान पर लगाये और जो योनि के स्थान पर था, उसे फैलाकर अँगूठे को दृढ़तापूर्वक पकड़ लेना चाहिए ॥ ११४॥ अयमेव महाबन्ध उभयत्रैवमभ्यसेत् । महाबन्धस्थितो योगी कृत्वा पूरकमेकधीः ॥ ११५ ॥ वायुना गतिमावृत्य निभृतं कण्ठमुद्रया । पुटद्वयं समाक्रम्य वायुः स्फुरति सत्वरम् ॥ ११६ ॥ यह ही महाबन्ध कहलाता है। इस बन्ध का दोनों ही प्रकार से अभ्यास किया जाता है। महाबन्ध की क्रिया में सतत संलग्न रहने वाले योगी को एकाग्र होकर कण्ठ की मुद्रा द्वारा वायु की गति को आवृत करके दोनों नासिका-रन्ध्रों को संकुचित करने से तत्परतापूर्वक वायु भर जाती है ॥ ११५-११६॥ अयमेव महावेधःसिद्धैरभ्यस्यतेऽनिशम् । अन्तःकपालकुहरे जिह्वां व्यावृत्य धारयेत् ॥ ११७ भ्रूमध्यदृष्टिरप्येषा मुद्रा भवति खेचरी । कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेद्दृढया धिया ॥ ११८ ॥ बन्धो जालंधराख्योऽयं मृत्युमातङ्गकेसरी । बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ॥ ११९ ॥ उड्यानाख्यो हि बन्धोऽयं योगिभिः समुदाहृतः । पार्ष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चये- दृढम् ॥१२० ॥ अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य योनिबन्धोऽयमुच्यते । प्राणापानौ नादबिन्दू मूलबन्धेन चैकताम् ॥ १२१ ॥ गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नात्र संशयः । करणी विपरीताख्या सर्वव्याधिविनाशिनी ॥ १२२ ॥ सिद्ध योगीजन इस (ऊपर वर्णित) महावेध का निरन्तर अभ्यास करते रहते हैं। जिह्वा को लौटाकर, अन्तः कपाल-कुहर में लगाकर दोनों भृकुटियों के मध्य में दृष्टि को स्थिर करना खेचरी मुद्रा है। कण्ठ को संकुचित करके (थोड़ी को) दृढ़तापूर्वक वक्ष पर स्थापित करना ही जालन्धर बन्ध कहलाता है। जो मृत्यु रूपी हाथी के लिए सिंह के समान होता है। जिस बन्ध से प्राण सुषुम्ना में उठ जाता है। उसे योगी लोग उड्डियान
मन्त्र १३२ २६९ बन्ध कहते हैं। एड़ी से योनि स्थान को ठीक प्रकार से दबाकर अन्दर की तरफ खींचे, इस तरह अपान को ऊर्ध्व की ओर उठाये, यही योनि बन्ध कहलाता है। इस क्रिया से प्राण, अपान, नाद और बिन्दु में मूलबन्ध के द्वारा एकता की प्राप्ति होती है तथा यह संशयरहित योग सिद्ध कराने वाला है। अब विपरीतकरणी मुद्रा के सन्दर्भ में बतलाते हैं। इसे समस्त व्याधियों का विनाश करने वाली कहा गया है॥११७-१२२॥ नित्यमभ्यासयुक्तस्य जाठराग्निविवर्धनी। आहारो बहुलस्तस्य संपाद्यः साधकस्य च ॥१२३ इस विपरीतकरणी मुद्रा का नित्य अभ्यास करने से साधक की जठराग्नि बढ़ जाती है। इस कारण साधक अधिक आहार (भोजन) को पचा सकने में समर्थ हो जाता है॥१२३॥ अल्पाहारो यदि भवेदग्निर्देहं हरेत्क्षणात्। अधः शिरश्चोर्ध्वपादः क्षणं स्यात्प्रथमे दिने ॥१२४ यदि साधक कम भोजन ग्रहण करेगा, तो उसकी जठराग्नि उसके शरीर को ही नष्ट करने लगेगी। इस मुद्रा के लिए प्रथम दिन क्षणभर के लिए सिर नीचे की ओर करके तथा पैरों को ऊपर की ओर करे॥१२४॥ क्षणाच्च किंचिदधिकमभ्यसेत्तु दिनेदिने। वली च पलितं चैव षण्मासार्ध्वान्न दृश्यते ॥१२५ इसके पश्चात् प्रत्येक दिन ऐक-एक क्षण भर निरन्तर अभ्यास बढ़ाता रहे, तो छः मास में ही साधक के शरीर की झुर्रियाँ तथा बालों की सफेदी समाप्त हो जायेगी॥१२५॥ याममात्रं तु यो नित्यमभ्यसेत्स तु कालजित्। वज्रोलीमभ्यसेद्यस्तु स योगी सिद्धिभाजनम् ॥ लभ्यते यदि तस्यैव योगसिद्धिः करे स्थिता। अतीतानागतं वेत्ति खेचरी च भवेद्ध्रुवम् ॥ जो प्रतिदिन एक प्रहर (तीन घंटे) तक (इस विपरीतकरणी मुद्रा का) अभ्यास करता है, वह योगी काल को अपने वश में कर लेता है। जो योगी वज्रोली मुद्रा का नित्य अभ्यास करता है, वह जल्दी ही सिद्धावस्था को प्राप्त कर सकता है। जो उस मुद्रा का अभ्यास कर लेता है, तो योग की सिद्धि उसके हाथ में ही जानना चाहिए। वह भूत, भविष्यत् का ज्ञाता हो जाता है तथा वह अवश्य ही आकाश मार्ग से गमन करने में समर्थ हो जाता है॥ १२६-१२७॥ अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन्दिने दिने। वज्रोलीमभ्यसेन्नित्यममरोलीति कथ्यते ॥ १२८ ॥ जो (योगी) 'अमरी' (मूत्र) को प्रतिदिन पीता है एवं घ्राणेन्द्रिय के द्वारा उसका नस्य करता (सूँघता) है तथा वज्रोली का अभ्यास करता है, तो उसे अमरोली का साधक कहा जाता है॥ १२८॥ ततो भवेद्राजयोगो नान्तरा भवति ध्रुवम्। यदा तु राजयोगेन निष्पन्ना योगिभिः क्रियाः ॥१२९ इसके पश्चात् वह राजयोग सिद्ध करने में समर्थ हो जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। राजयोग के सिद्ध हो जाने से योगी को हठयोग की शरीर सम्बन्धी क्रियाओं की जरूरत नहीं पड़ती ॥१२९॥ तदा विवेकवैराग्यं जायते योगिनो ध्रुवम्। विष्णुर्नाम महायोगी महाभूतो महातपाः ॥१३०॥ उसे निश्चय ही वैराग्य एवं विवेक की प्राप्ति सहजतया हो जाती है। भगवान् विष्णु ही महायोगी, महाभूत स्वरूप तथा महान् तपस्वी हैं॥१३०॥ तत्त्वमार्गे यथा दीपो दृश्यते पुरुषोत्तमः। यः स्तनः पूर्वपीतस्तं निष्पीड्य मुदमश्नुते ॥१३१॥ तत्त्वमार्ग पर गमन करने वाले को वे पुरुषोत्तम दीपक की भाँति दृष्टिगोचर होते हैं। (यह जीवन विभिन्न योनियों में घूमता हुआ मानव योनि में आता है,) तब वह जिस स्तन को पीता है, दूसरी अवस्था में वैसे ही स्तन को दबाकर आनन्दानुभूति करता है॥१३१॥ यस्माज्जातो भगात्पूर्वं तस्मिन्नेव भगे रमन्। या माता सा पुनर्भार्या या भार्या मात्रेव हि ॥
२७० योगतत्त्वोपनिषद् (जीव ने) जिस योनि में जन्म लिया था, वैसी ही योनि में पुनः-पुनः रमण किया करता है। एक जन्म में जो माँ होती है, वही दूसरे जन्म में पत्नी भी हो जाती है तथा जो पत्नी होती है, वह माता बन जाती है ॥१३२ ॥ यः पिता स पुनः पुत्रो यः पुत्रः स पुनः पिता। एवं संसारचक्रेण कूपचक्रे घटा इव ॥ भ्रमन्तो योनिजन्मानि श्रुत्वा लोकान्समश्रुते । त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रिस्रः संध्यास्त्रयः स्वराः ॥ त्रयोऽग्नयश्च त्रिगुणाः स्थिताः सर्वे त्रयाक्षरे । त्रयाणामक्षराणां च योऽधीतेऽप्यर्धमक्षरम् ॥ जो पिता होता है, वह पुत्र बन जाता है तथा जो पुत्र होता है, वह पिता के रूप में जन्म ले लेता है। इस तरह से यह संसार चक्र, कूप-चक्र (पानी खींचने की रहट) के सदृश है, जिसमें प्राणी नाना प्रकार की योनियों में सतत गमनागमन करता रहता है। तीन ही लोक हैं, तीन ही वेद कहे गये हैं, तीन संध्यायें हैं, तीन स्वर हैं, तीन अग्नि हैं, तीन गुण (सत्, रज, तम) बतलाये गये हैं तथा तीन अक्षरों में सभी कुछ विद्यमान है। अतः इन तीन अक्षरों तथा अर्द्धाक्षर का भी योगी को अध्ययन करना चाहिए ॥ १३३-१३५ ॥ तेन सर्वमिदं प्रोतं तत्सत्यं तत्परं पदम्। पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम् ॥ १३६ ॥ तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम्। हृदि स्थाने स्थितं पद्मं तस्य वक्त्रमधोमुखम् ॥१३७॥ ऊर्ध्वनालमधोबिन्दुस्तस्य मध्ये स्थितं मनः। अकारे रेचितं पद्ममुकारेणैव भिद्यते ॥ १३८ ॥ मकारे लभते नादमर्धमात्रा तु निश्चला। शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥१३९॥ सभी कुछ उसी (तीन अक्षरों) में पिरोया हुआ है, वही सत्यस्वरूप है, वही शाश्वत परमपद है। जैसे- पुष्प में सुगन्ध होती है, दुग्ध में घृत सन्निहित है, तिलों में तेल उत्पन्न होता है और प्रस्तर खण्ड में स्वर्ण निहित है, वैसे ही वह भी सभी में व्याप्त है। हृदय-संस्थान में जो कमल-पुष्प स्थित है, उसका मुख नीचे की ओर है एवं उसकी नाल (दण्डी) ऊर्ध्व की ओर है। नीचे बिन्दु है, उसी के मध्य में मन प्रतिष्ठित है। 'अ' कार में रेचित किया हुआ हृदय कमल का 'उ' कार से भेदन किया जाता है एवं 'म' कार में नाद (ध्वनि) को प्राप्त होता है। अर्द्ध मात्रा निश्चल, शुद्ध स्फटिक के समान निष्कल एवं पापनाशक है ॥ १३६-१३९ ॥ लभते योगयुक्तात्मा पुरुषस्तत्परं पदम्। कूर्मः स्वपाणिपादादिशिरश्चात्मनि धारयेत् ॥ १४० ॥ एवं द्वारेषु सर्वेषु वायुपूरितरेचितः। निषिद्धं तु नवद्वारे ऊर्ध्वं प्राङ्निःश्वसस्तथा ॥ १४१ ॥ इस प्रकार योग से संयुक्त हुआ योगी पुरुष मुक्तावस्था को प्राप्त कर लेता है। जिस तरह से कच्छप अपने हाथ, पैर एवं सिर को अपने अन्दर प्रतिष्ठित कर लेता है, उसी तरह से सभी द्वारों से भर करके दबाया हुआ वायु, नौ द्वारों के बन्द होने से ऊर्ध्व की ओर गमन कर जाता है ॥ १४०-१४१ ॥ घटमध्ये यथा दीपो निवातं कुम्भकं विदुः। निषिद्धैर्नवभिर्द्वारैर्निर्जने निरुपद्रवे ॥ निश्चितं त्वात्ममात्रेणावशिष्टं योगसेवयेत्युपनिषत् ॥१४२॥ जिस तरह वायुरहित घड़े के मध्य में (स्थिर लौ वाला) दीपक रखा होता है, उसी तरह से कुम्भक को जानना चाहिए। इस योग-साधना में नौ द्वारों के अवरुद्ध किये जाने पर सुनसान एवं निरुपद्रव स्थान में आत्मतत्त्व ही मात्र शेष रहता है। ऐसा ही यह योगतत्त्व उपनिषद् है ॥ १४२ ॥ ॐ सह नाववतु............. इति शान्तिः ॥ ॥ इति योगतत्त्वोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ वज्रसूचकापानषद् ॥ यह उपनिषद् सामवेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल ९ मन्त्र हैं। सर्वप्रथम चारों वर्णों में से ब्राह्मण की प्रधानता का उल्लेख किया गया तथा ब्राह्मण कौन है, इसके लिए कई प्रश्न किये गये। क्या ब्राह्मण जीव है? शरीर है, जाति है, ज्ञान है, कर्म है या धार्मिकता है? इन सब सम्भावनाओं का निरसन कोई न कोई कारण बताकर कर दिया गया, अन्त में 'ब्राह्मण' की परिभाषा बताते हुए उपनिषद्कार कहते हैं कि जो समस्त दोषों से रहित, अद्वितीय, आत्मतत्त्व से सम्पृक्त है, वह ब्राह्मण है। चूँकि आत्मतत्त्व सत्, चित्, आनन्द रूप ब्रह्म भाव से युक्त होता है, इसलिए इस ब्रह्म भाव से सम्पन्न मनुष्य को ही (सच्चा) ब्राह्मण कहा जा सकता है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु .......... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-आरुण्युपनिषद्) वज्रसूचीं प्रवक्ष्यामि शास्त्रमज्ञानभेदनम्। दूषणं ज्ञानहीनानां भूषणं ज्ञानचक्षुषाम् ॥ १ ॥ अज्ञान नाशक, ज्ञानहीनों के दूषण, ज्ञान नेत्र वालों के भूषण रूप वज्रसूची उपनिषद् का वर्णन करता हूँ॥ ब्राह्मक्षत्रियवैश्यशूद्रा इति चत्वारो वर्णास्तेषां वर्णानां ब्राह्मण एव प्रधान इति वेदवचनानुरूपं स्मृतिभिरप्युक्तम्। तत्र चोद्यमस्ति को वा ब्राह्मणो नाम किं जीवः किं देहः किं जातिः किं ज्ञानं किं कर्म किं धार्मिक इति ॥ २ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं। इन वर्णों में ब्राह्मण ही प्रधान है, ऐसा वेद वचन है और स्मृति में भी वर्णित है। अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ब्राह्मण कौन है? क्या वह जीव है अथवा कोई शरीर है अथवा जाति अथवा कर्म अथवा ज्ञान अथवा धार्मिकता है॥ २ ॥ तत्र प्रथमो जीवो ब्राह्मण इति चेत्तन्न। अतीतानागतानेकदेहानां जीवस्यैकरूपत्वात् एकस्यापि कर्मवशादनेकदेहसंभवात् सर्वशरीराणां जीवस्यैकरूपत्वाच्च। तस्मान्न जीवो ब्राह्मण इति ॥ ३ ॥ इस स्थिति में यदि सर्वप्रथम जीव को ही ब्राह्मण मानें (कि ब्राह्मण जीव है), तो यह सम्भव नहीं है; क्योंकि भूतकाल और भविष्यत्काल में अनेक जीव हुए हैं व होंगे। उन सबका स्वरूप भी एक जैसा ही होता है। जीव एक होने पर भी स्व-स्व कर्मों के अनुसार उनका जन्म होता है और समस्त शरीरों में, जीवों में एकत्व रहता है, इसलिए जीव को ब्राह्मण नहीं कह सकते ॥ ३ ॥ तर्हि देहो ब्राह्मण इति चेत्तन्न। आचाण्डालादिपर्यन्तानां मनुष्याणां पाञ्चभौतिकत्वेन देहस्यैकरूपत्वाज्जरामरणधर्माधर्मादिसाम्यदर्शनाद् ब्राह्मणः श्वेतवर्णः क्षत्रियो रक्तवर्णो वैश्यः पीतवर्णः शूद्रः कृष्णवर्ण इति नियमाभावात्। पित्रादिशरीरदहने पुत्रादीनां ब्रह्महत्यादिदोष- संभवाच्च। तस्मान्न देहो ब्राह्मण इति ॥ ४ ॥ क्या शरीर ब्राह्मण (हो सकता) है? नहीं, यह भी नहीं हो सकता। चाण्डाल से लेकर सभी मानवों के शरीर एक जैसे ही अर्थात् पाञ्चभौतिक होते हैं, उनमें जरा-मरण, धर्म-अधर्म आदि सभी समान होते हैं। ब्राह्मण-गौर वर्ण, क्षत्रिय-रक्त वर्ण, वैश्य-पीत वर्ण और शूद्र-कृष्ण वर्ण वाला ही हो, ऐसा कोई नियम देखने में नहीं आता तथा (यदि शरीर ब्राह्मण है तो) पिता, भाई के शरीर के दाह संस्कार करने से पुत्र आदि को ब्रह्म हत्या आदि का दोष भी लग सकता है। अस्तु, शरीर का ब्राह्मण होना सम्भव नहीं है॥ ४॥ तर्हि जातिर्ब्राह्मण इति चेत्तन्न। तत्र जात्यन्तरजन्तुष्वनेकजातिसंभवा महर्षयो बहवः सन्ति। ऋष्यशृङ्गो मृग्याः कौशिकः कुशात् जाम्बूको जम्बूकात्। वाल्मीको वल्मीकात् व्यासः कैवर्तकन्यकायाम् शशपृष्ठात् गौतमः वसिष्ठ उर्वश्याम् अगस्त्यः कलशे जात इति श्रुतत्वात्। एतेषां जात्या विनाप्यग्रे ज्ञानप्रतिपादिता ऋषयो बहवः सन्ति। तस्मान्न जातिर्ब्राह्मण इति ॥ ५
२७२ वज्रसूचिकोपनिषद् क्या जाति ब्राह्मण है (अर्थात् ब्राह्मण कोई जाति है) ? नहीं, यह भी नहीं हो सकता; क्योंकि विभिन्न जातियों एवं जन्तुओं में भी बहुत से ऋषियों की उत्पत्ति वर्णित है। जैसे-मृगी से श्रृंगी ऋषि की, कुश से कौशिक की, जम्बूक से जाम्बूक की, वल्मीक (बाँबी) से वाल्मीकि की, मल्लाह (धीवर) कन्या (मत्स्यगन्धा) से वेदव्यास की, शशक पृष्ठ से गौतम की, उर्वशी नामक अप्सरा से वसिष्ठ की, कुम्भ (कलश) से अगस्त्य ऋषि की उत्पत्ति वर्णित है। इस प्रकार पूर्व में ही कई ऋषि बिना (ब्राह्मण) जाति के ही प्रकाण्ड विद्वान् हुए हैं, इसलिए जाति विशेष भी ब्राह्मण नहीं हो सकती ॥ ५ ॥ तर्हि ज्ञानं ब्राह्मण इति चेत्तन्न। क्षत्रियादयोऽपि परमार्थदर्शिनोऽभिज्ञा बहवः सन्ति। तस्मान्न ज्ञानं ब्राह्मण इति ॥ ६ ॥ क्या ज्ञान को ब्राह्मण माना जाए ? ऐसा भी नहीं हो सकता; क्योंकि बहुत से क्षत्रिय (राजा जनक) आदि भी परमार्थ दर्शन के ज्ञाता हुए हैं (होते हैं)। अस्तु, ज्ञान भी ब्राह्मण नहीं हो सकता ॥ ६ ॥ तर्हि कर्म ब्राह्मण इति चेत्तन्न। सर्वेषां प्राणिनां प्रारब्धसंचितागामिकर्मसा- धर्म्यदर्शनात्कर्माभिप्रेरिताः सन्तो जनाः क्रियाः कुर्वन्तीति। तस्मान्न कर्म ब्राह्मण इति ॥ ७॥ तो क्या कर्म को ब्राह्मण कहा जाए ? नहीं, ऐसा भी सम्भव नहीं है; क्योंकि समस्त प्राणियों के संचित, प्रारब्ध और आगामी कर्मों में साम्य प्रतीत होता है तथा कर्माभिप्रेरित होकर ही व्यक्ति क्रिया करते हैं। अतः कर्म को भी ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता ॥ ७॥ तर्हि धार्मिको ब्राह्मण इति चेत्तन्न। क्षत्रियादयो हिरण्यदातारो बहवः सन्ति। तस्मान्न धार्मिको ब्राह्मण इति ॥८॥ क्या धार्मिक ब्राह्मण हो सकता है ? यह भी सुनिश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता; क्योंकि क्षत्रिय आदि बहुत से लोग स्वर्ण आदि का दान करते रहते हैं। अतः धार्मिक भी ब्राह्मण नहीं हो सकता ॥ ८ ॥ तर्हि को वा ब्राह्मणो नाम। यः कश्चिदात्मानमद्वितीयं जातिगुणक्रियाहीनं षडूर्मिषड्भावे- त्यादिसर्वदोषरहितं सत्यज्ञानानन्दानन्तस्वरूपं स्वयं निर्विकल्पमशेषकल्पाधारमशेषभूतान्तर्यामित्वेन वर्तमानमन्तर्बहिश्चाकाशवदनुस्यूतमखण्डानन्द स्वभावमप्रमेयमनुभवैकवेद्यमापरोक्षतया भासमानं करतलामलकवत्साक्षादपरोक्षीकृत्य कृतार्थतया कामरागादिदोषरहितः शमदमादिसंपन्नो भावमात्सर्यतृष्णाशामोहादिरहितो दम्भाहंकारादिभिरसंस्पृष्टचेता वर्तत एवमुक्तलक्षणो यः स एव ब्राह्मण इति श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासानामभिप्रायः। अन्यथा हि ब्राह्मणत्वसिद्धिर्नास्त्येव। सच्चिदानन्दमात्मान- मद्वितीयं ब्रह्म भावयेदात्मानं सच्चिदानन्दं ब्रह्म भावयेदित्युपनिषत् ॥ ९॥ तब ब्राह्मण किसे माना जाय ? (इसका उत्तर देते हुए उपनिषदकार कहते हैं-) जो आत्मा के द्वैत भाव से युक्त न हो; जाति, गुण और क्रिया से भी युक्त न हो; षड् ऊर्मियों और षड्भावों आदि समस्त दोषों से मुक्त हो; सत्य, ज्ञान, आनन्द स्वरूप, स्वयं निर्विकल्प स्थिति में रहने वाला, अशेष कल्पों का आधार रूप, समस्त प्राणियों के अन्तस् में निवास करने वाला, अन्दर-बाहर आकाशवत् संव्याप्त; अखण्ड आनन्दवान्, अप्रमेय, अनुभवगम्य, अप्रत्यक्ष भासित होने वाले आत्मा का करतल आमलकवत् परोक्ष का भी साक्षात्कार करने वाला; काम-रागद्वेष आदि दोषों से रहित होकर कृतार्थ हो जाने वाला; शम-दम आदि से सम्पन्न; मात्सर्य, तृष्णा, आशा, मोह आदि भावों से रहित; दम्भ, अहङ्कार आदि दोषों से चित्त को सर्वथा अलग रखने वाला हो, वही ब्राह्मण है; ऐसा श्रुति, स्मृति-पुराण और इतिहास का अभिप्राय है। इस (अभिप्राय) के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार से ब्राह्मणत्व सिद्ध नहीं हो सकता। आत्मा ही सत्-चित् और आनन्द स्वरूप तथा अद्वितीय है। इस प्रकार के ब्रह्मभाव से सम्पन्न मनुष्यों को ही ब्राह्मण माना जा सकता है। यही उपनिषद् का मत है ॥ ९॥ ॐ आप्यायन्तु ............ इति शान्तिः ॥ ॥ इति वज्रसूच्युपनिषत्समाप्ता ॥
॥ शाट्यायनायापनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदीय है। इसमें कुल ४० मंत्र हैं, जिसमें मुख्यतया विष्णुल्लिंग संन्यास धर्म का विवेचन किया गया है। सर्वप्रथम मन को बन्धन एवं मोक्ष का कारण बताया गया है, तत्पश्चात् साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, शमादि सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व), कुटीचक का स्वरूप तथा अन्य संन्यासियों के धर्म, योग-यज्ञ आदि के चार रूप, परिव्राजकों के कर्तव्य, उनके निवास विषयक नियम, आत्मज्ञान से युक्त साधक की स्थिति, संन्यास धर्म से च्युत होने पर प्रत्यवाय (पाप) लगने का विशद वर्णन है। अन्त में विष्णुल्लिंग संन्यासी की फलश्रुति बताई गई है। जिस वंश में एक भी विष्णुल्लिंग संन्यासी होता है, उसकी तीस पीढ़ी पूर्व, तीस पीढ़ी बाद की तथा तीस पीढ़ी उसके बाद की भी तर जाती हैं। इस प्रकार वह संन्यासी ब्रह्मपद का अधिकारी बन जाता है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः............. इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद् ) मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥ १ ॥ मन ही मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का कारण है। विषयादि भोगों में आसक्त मन बन्धन का और विषय-वासनाओं से पराङ्मुख मन मोक्ष का कारण है ॥ १ ॥ समासक्तं सदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरे । यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥ २ ॥ जैसे यह मन सांसारिक विषय-भोगों में आसक्त रहता है, ऐसा यदि ब्रह्म में आसक्त हो जाये, तो फिर ऐसे कौन से सांसारिक बन्धन हैं, जिनसे मुक्ति न मिलती हो, अर्थात् सभी बन्धनों से मुक्ति मिल जाती है ॥ २ ॥ चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् । यच्चित्तस्तन्मयो भाति गुह्यमेतत्सनातनम् ॥ ३ ॥ चित्त ही संसार है। हर पुरुष को अभ्यास द्वारा अपने चित्त का शोधन करना चाहिए। जो अपने चित्त को ब्रह्म में लगाता है, वह मनुष्य ब्रह्ममय हो जाता है। यह शाश्वत और परम गोपनीय बात है ॥ ३ ॥ नावेदविन्मनुते तं बृहन्तं नाब्रह्मवित्परमं प्रैति धाम। विष्णुकान्तं वासुदेवं विजानन्विप्रो विप्रत्वं गच्छते तत्त्वदर्शी ॥ ४ ॥ वेदतत्त्व को न जानने वाले के लिए तो विराट् है ही नहीं, वह उसे मानता ही नहीं। ब्रह्म के ज्ञान से हीन मनुष्य उस परम स्वप्रकाशित धाम को प्राप्त ही नहीं करता। तत्त्वदर्शी विवेकवान् ब्राह्मण ही व्यापक, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी उस वासुदेव को अपने स्वरूप में (अहं ब्रह्मास्मि) समझता हुआ विप्रत्व और जीवन्मुक्ति के तत्त्व को प्राप्त कर पाता है ॥ ४ ॥ अथ ह यत्परं ब्रह्म सनातनं ये श्रोत्रिया अकामहता अधीयूः। शान्तो दान्त उपरतस्तिति- क्षुर्योऽनूचानो ह्यभिजज्ञौ समानःत्यक्तेषणो ह्यनृणस्तं विदित्वा मौनी वसेदाश्रमे यत्र कुत्र ॥५॥ वेद में निष्णात तथा सभी तरह की इच्छाओं-कामनाओं से रहित होकर जो पुरुष सनकादिक की भाँति उस परमब्रह्म, सत्य-सनातन के स्वरूप को समझते हैं। वे सभी ब्रह्म के रूप वाले ही हो जाते हैं। ऐसा पुरुष अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला सभी विषय-भोगों से तृप्त, पराङ्मुख, सहनशील, वेदज्ञ, मुमुक्षुओं की भाँति उस परमब्रह्म को समझ लेता है। वह पुरुष सभी इच्छाओं से विरत, पितृदेव एवं गुरु के ऋणों से मुक्त होकर उस परब्रह्म को जान करके शान्त-मौन होकर कहीं आश्रम में निवास करे ॥ ५ ॥
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२७४ शाट्यायनीयोपनिषद् अथाश्रमं चरमं संप्रविश्य यथोपपत्तिं पञ्चमात्रां दधानः॥ ६॥ इसके बाद अन्तिम संन्यास-आश्रम में प्रविष्ट होकर के यथाबल त्रिदण्ड आदि पंच मात्राओं को स्वीकार करता हुआ मोक्ष को प्राप्त करे॥ ६॥ त्रिदण्डमुपवीतं च वासः कौपीनवेष्टनम्। शिक्यं पवित्रमित्येतद्विभृयाद्यावदायुषम्॥ ७॥ जब तक आयु रहे, तब तक त्रिदण्ड, उपवीत, वस्त्र (उत्तरीय), कौपीन (लँगोटी), शिक्य (छींका), ॰पवित्र (पवित्री) को धारण करे॥ ७॥ पञ्चैतास्तु यतेर्मात्रास्ता मात्रा ब्रह्मणे श्रुताः। न त्यजेद्यावदुत्क्रान्तिरन्तेऽपि निखनेत्सह॥ ८॥ यति की ये पाँचों मात्राएँ ही ब्रह्म (ॐकार) में समाहित हैं। इनका त्याग कभी नहीं करना चाहिए। इन सभी को मृत्यु के उपरान्त शरीर के साथ ही भूमि में गाड़ देना चाहिए॥ ८॥ विष्णुलिङ्गं द्विधा प्रोक्तं व्यक्तमव्यक्तमेव च। तयोरेकमपि त्यक्त्वा पतत्येव न संशयः॥ ९॥ विष्णुलिङ्ग व्यक्त और अव्यक्त ऐसे दो प्रकार के चिह्न विष्णु (संन्यासी) के कहे गये हैं। इन दोनों में से किसी एक का भी परित्याग कर देने पर संन्यासी पथभ्रष्ट हो जाता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं ॥ ९॥ त्रिदण्डं वैष्णवं लिङ्गं विप्राणां मुक्तिसाधनम्। निर्वाणं सर्वधर्माणामिति वेदानुशासनम्॥१०॥ त्रिदण्ड जो वैष्णवलिङ्ग (संन्यासी के चिह्न विशेष) के रूप में जाना जाता है। यह चिह्न ब्राह्मणों को मुक्ति प्रदान करने वाला है। यह चिह्न वेद का अनुशासन रूप एवं समस्त धर्मों का निर्वाण स्वरूप है॥ १०॥ अथ खलु सौम्य कुटीचको बहूदको हंसः परमहंस इत्येते परिव्राजकाश्चतुर्विधा भवन्ति। सर्व एते विष्णुलिङ्गिनः शिखिन उपवीतिनः शुद्धचित्ता आत्मानमात्मना ब्रह्म भावयन्तः शुद्धचिद्रूपोपासनरता जपयमवन्तो नियमवन्तः सुशीलिनः पुण्यश्लोका भवन्ति । तदेतदृचाभ्यु- क्तम्। कुटीचको बहूदकश्चापि हंसः परमहंस इव वृत्त्या च भिन्नाः। सर्व एते विष्णुलिङ्गं दधाना वृत्त्या व्यक्तं बहिरन्तश्च नित्यम्॥ ११॥ हे सौम्य! संन्यासी के कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस-ये चार भेद होते हैं। ये चारों यज्ञोपवीत शिखा तथा विष्णु लिंग (संन्यासी के प्रतीक सर्वव्यापकता-समदर्शिता) को धारण करने वाले शुद्ध चित्त, स्वयं अपनी आत्मा में ब्रह्म को प्रतिष्ठित करने की भावना करते हुए उपासना करने वाले, जप और यम-नियम का पालन करने वाले एवं सुन्दर स्वभाव वाले होते हैं। इस सम्बन्ध में यह ऋचा है-'कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस ये चार प्रकार अपनी-अपनी पृथक् वृत्तियों से भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। ये सभी व्यक्त एवं अव्यक्त, बाह्य एवं अन्तःरूप विष्णु लिंग (संन्यास के चिह्न) को धारण करने वाले होते हैं'॥ ११॥ पञ्चयज्ञा वेदशिरः प्रविष्टाः क्रियावन्तोऽभि संगता ब्रह्मविद्याम्। त्यक्त्वा वृक्षं वृक्षमूलं श्रितासः संन्यस्तपुष्पा रसमेवाश्रुवानाः। विष्णुक्रीडा विष्णुरतयो विमुक्ता विष्ण्वात्मका विष्णुमेवापियन्ति॥ १२॥ ये पञ्चयज्ञ (गायत्री मन्त्र जप, योग, तप, स्वाध्याय एवं ज्ञान) तथा उपनिषदों के अर्थ का श्रवण करने वाले होते हैं। सभी अपने-अपने धर्मानुकूल कर्म करने वाले एवं ब्रह्मविद्या का आश्रय प्राप्त करने वाले हैं। ये सभी संसार रूपी वृक्ष को त्यागकर इसके मूलभाग (ब्रह्म) का आश्रय प्राप्त करने वाले तथा सभी कर्मकाण्ड आदि को छोड़कर सारभूत तत्त्व के रस का आनन्द प्राप्त करने वाले हैं। ये संन्यासी बाह्य क्रीड़ाओं को छोड़कर विष्णु के साथ ही क्रीड़ा करने वाले, विष्णु रूप आत्मा विष्णु का ही अर्चन एवं ध्यान करके कृतार्थ होते हैं॥
मन्त्र २१ २७५ त्रिसन्ध्यं शक्तितः स्नानं तर्पणं मार्जनं तथा। उपस्थानं पञ्चयज्ञान्कुर्यादामरणान्तिकम् ॥ १३ ॥ सभी को मृत्यु पर्यन्त प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन संध्या, स्नान, तर्पण, मार्जन, उपस्थान तथा पञ्चयज्ञ (देवयज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ या अतिथि यज्ञ, भूतयज्ञ एवं ब्रह्मयज्ञ) अवश्य ही करना चाहिए ॥ १३ ॥ दशभिः प्रणवैः सप्तव्याहृतिभिश्चतुष्पदा। गायत्रीजप यज्ञश्च त्रिसन्ध्यं शिरसा सह ॥ १४॥ दश प्रणव (ॐकार) तथा सात व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) के सहित चार पाद युक्त एवं सिर (आपोज्योती इत्यादि) युक्त गायत्री का जप एवं यज्ञ त्रिकाल सन्ध्या के साथ करना चाहिए ॥ १४ ॥ योगयज्ञः सदैकाग्र्यभक्त्या सेवा हरेर्गुरोः। अहिंसा तु तपोयज्ञो वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥१५॥ एकाग्रचित्त होकर भक्ति भाव से योग, यज्ञ भगवान् (विष्णु) तथा गुरु की सेवा और मन, वाणी एवं कर्म के द्वारा हिंसारहित तप रूपी यज्ञ सतत करते रहना चाहिए ॥ १५ ॥ नानोपनिषदभ्यासः स्वाध्यायो यज्ञ ईरितः। ओमित्यात्मानमव्यग्रो ब्रह्मण्यग्नौ जुहोति यत् ॥ १६ ॥ समस्त उपनिषदों का अभ्यास (पाठ) स्वाध्याय यज्ञ कहा गया है।'ॐ' इस प्रकार उच्चारण करते हुए ब्रह्मरूपी अग्नि में ही आत्मा की आहुति दी जाती है अर्थात् आत्मा को ब्रह्म में विलीन किया जाता है ॥ १६ ॥ ज्ञानयज्ञः स विज्ञेयः सर्वयज्ञोत्तमोत्तमः। ज्ञानदण्डा ज्ञानशिखा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः ॥ १७ ॥ वह (ॐकार ही) सभी श्रेष्ठ यज्ञों से भी उत्तम ज्ञानयज्ञ कहा गया है। इन सभी का ज्ञान ही दण्ड है, ज्ञान ही शिखा है और ज्ञान ही इनका यज्ञोपवीत है ॥ १७ ॥ शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति वेदानुशासनम् ॥ १८ जिसकी शिखा (चोटी) एवं यज्ञोपवीत ज्ञानमय होता है। उसकी समस्त वस्तुयें ब्रह्मरूप ही हैं, ऐसा वेद का अनुशासन (आदेश है) ॥ १८ ॥ अथ खलु सोम्यैते परिव्राजका यथा प्रादुर्भवन्ति तथा भवन्ति। कामक्रोधलोभमो- हदम्भदर्पासूयाममत्वांहकारादींस्तितीर्य मानावमानौ निन्दास्तुती च वर्जयित्वा वृक्ष इव तिष्ठा- सेत्। छिद्यमानो न ब्रूयात्। तदेवं विद्वांस इहैवामृता भवन्ति। तदेतदृचाभ्युक्तम्। बन्धुपुत्रमनुमो- दयित्वानवेक्ष्यमाणो द्वन्द्वसहः प्रशान्तः। प्राचीमुदीचीं वा निर्वर्तयंश्चरेत ॥ १९ ॥ हे प्रिय सोम्य ! ये परिव्राजक जिस प्रकार प्रादुर्भूत होते हैं, वह बतला दिया गया है। ये संन्यासी काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प (घमण्ड), असूया (दूसरे के गुणों में दोष निकालना), ममता, अहंकार आदि को पार करके, मान-अपमान, निन्दा-प्रशंसा को देखकर वृक्षवत् अविचल रहते हैं, काटे जाने (कष्ट पड़ने) पर भी कुछ बोलते नहीं। इस प्रकार से विद्वज्जन इस लोक में ही अमृत-जीवनमुक्त हो जाते हैं। इस सन्दर्भ में यह ऋचा द्रष्टव्य है-'भाई, पुत्रादि का पालन-पोषण करने के पश्चात् फिर कभी उनकी ओर नहीं देखे। दुःखादि सहते हुए पूर्व एवं उत्तर दिशाओं में अपने-अपने स्वरूप का अनुसंधान करते हुए भ्रमण करे॥ १९॥ पात्री दण्डी युगमात्रावलोकी शिखी मुण्डी चोपवीती कुटुम्बी। यात्रामात्रं प्रतिगृह्णन्मनुष्यात् अयाचितं याचितं वोत भैक्षं ॥ २० ॥ पात्र एवं दण्ड धारण करते हुए युग (दो-जीवात्मा-परमात्मा) मात्र के दर्शन करने वाले, विशाल जटा- वाले या मुण्डन किये हुए मस्तक वाले, उपवीत ही जिसका कुटुम्ब है, ऐसे संन्यासी को केवल अपने प्राणयात्रा के लिए मनुष्यों से भिक्षा माँगकर या बिना माँगे ही भिक्षा ग्रहण करते हुए निरन्तर विचरण करना चाहिए ॥ २० ॥ मृद्वार्बलाबूफलं तन्तुपर्णपात्रं तत्तथा यथा तु लब्धम्। क्षाणं क्षामं तृणं कन्थाजिने च पर्णमाच्छादनं स्यादहतं वा विमुक्तः ॥ २१ ॥
२७६ शाट्यायनायापानषद् मिट्टी, लकड़ी की तुम्बी, श्रीफल, तन्तु ग्रथित या पत्तों से निर्मित पात्र जिस तरह का भी मिले, ग्रहण कर लेना चाहिए। चटाई, वृक्षों की छाल या सूखी घास से बनी कथरी, अजिन (कृष्णमृग चर्म) तथा जो पत्ते कीड़ों द्वारा खाये न गये हों, ऐसे श्रेष्ठ पत्तों के द्वारा बनाई गयी ओढ़नी-उत्तरीय को धारण करना चाहिए॥ २१ ॥ ऋतुसन्धौ मुण्डयेन्मुण्डमात्रं नाधो नाक्षं जातु शिखां न वापयेत्। चतुरो मासान्ध्रुवशीलतः स्यात्स यावत्सुप्तोऽन्तरात्मा पुरुषो विश्वरूपः ॥ २२ ॥ हंस (संन्यासी) की ऋतु सन्धि के समय क्षौर कर्म अर्थात् मुण्डन कराना चाहिए, किन्तु कुटीचक (यह भी संन्यासियों का एक भेद है) शिखा (जटा) को कभी न कटाये। जब विश्वरूप विराट् पुरुष भगवान् नारायण शयन करते हैं, तब तक चार मास (चौमासा) एक ही स्थान पर स्थिर चित्त से निवास करे॥ २२ ॥ अन्यांनथाष्टौ पुनरुत्थितेऽस्मिन्स्व कर्मलिप्सुर्विहरेद्वा वसेद्वा। देवाग्न्यगारे तरुमूले गुहायां वसेदसङ्गोऽलक्षितशीलवृत्तः। अनिन्धनो ज्योतिरिवोपशान्तो न चोद्विजेदुद्विजयेच्च कुत्र ॥२३॥ इस प्रकार अन्य (श्रवण, ध्यान एवं समाधि आदि की) अवस्थाओं को प्राप्त करने का इच्छुक संन्यासी स्वकर्म करते हुए एक स्थान पर ही निवास हेतु रह जाये अथवा उसे अन्यत्र आश्रय प्राप्त कर लेना चाहिए। अपना निवास किसी देवालय में वृक्ष के मूल (जड़) के समीप में अथवा गुफा में कर लेना चाहिए तथा वहाँ निःसंग एवं सर्वथा अलक्षित (जन संसर्ग से दूर रहकर) बिना काष्ठ को अग्नि के समान शान्त चित्त होकर रहे। किसी को भी देखकर क्षुभित न हो, सभी में आत्मबुद्धि कर लेनी चाहिए॥ २३ ॥ आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः। किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ २४ ॥ यदि पुरुष अपनी आत्मा को ब्रह्म रूप में जान ले, तो फिर वह क्या चाहता हुआ किस इच्छा से शरीर का पोषण अथवा शोषण करे ? अर्थात् उसे नहीं करना चाहिए॥ २४॥ तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः। नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥२५ ॥ धैर्यवान् ब्राह्मण उस अविनाशी परब्रह्म को पहचान कर, उसी (ब्रह्म) में बुद्धि को स्थिर करे। अधिकाधिक शब्दाडम्बर में नहीं पड़ना चाहिए; क्योंकि यह सब वाणी का दुरुपयोग है॥ २५ ॥ बाल्येनैव हि तिष्ठासेन्निर्विद्य ब्रह्मवेदनम्। ब्रह्मविद्यां च बाल्यं च निर्विद्य मुनिरात्मवान्॥२६ ॥ वैराग्ययुक्त होकर ही स्थिर रहने की इच्छा करनी चाहिए। ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, ऐसा दृढ़ निश्चय कर ब्रह्म को पहचान एवं वैराग्य को भली-भाँति समझकर आत्माराम होकर सर्वत्र आत्मदर्शन करे॥ यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ जब हृदय में रहने वाली समस्त कामनाएँ शान्त हो जाती हैं, तब यह मरणधर्मा होता हुआ भी मृत्युहीन होकर ब्रह्मानन्द का रसास्वादन करता है॥ २७॥ अथ खलु सोम्येदं परिव्राज्यं नैष्ठिकमात्मधर्मं यो विजहाति स वीरहा भवति। स ब्रह्महा भवति। स भ्रूणहा भवति। स महापातकी भवति। य हमां वैष्णवीं निष्ठां परित्यजति। स स्तेनो भवति। गुरुतल्पगो भवति। समित्रध्रुग्भवति। स कृतघ्नो भवति। स सर्वस्मा ल्लोकात्प्रच्युतो भवति। तदेतदृचाभ्युक्तम्। स्तेनः सुरापो गुरुतल्पगामी मित्रध्रुगेते निष्कृतेर्यान्ति शुद्धिम्। व्यक्तमव्यक्तं वा विधृतं विष्णुलिङ्गं त्यजन्न शुध्येदखिलैरात्मभासा ॥ २८ ॥ हे प्रिय सोम्य! जो अपने इस नैष्ठिक संन्यासियों के धर्म को छोड़ देता है, वह पुरुषत्वनाशक, ब्रह्मघाती,
मन्त्र ३५ २७७ गर्भघाती तथा महापातकी (के सदृश) होता है। जो (संन्यासी) इस वैष्णवी निष्ठा को त्याग देता है, वह चोर होता है। गुरुपत्नीगामी, मित्रद्रोही एवं कृतघ्न हो जाता है तथा समस्त लोकों से भ्रष्ट होकर अधोगति को प्राप्त होता है। इस सन्दर्भ में ये ऋचाएं हैं-चोर, शराबी, गुरुपत्नीगामी, एवं मित्रद्रोही ये प्रायश्चित्त से शुद्ध हो जाते हैं; किन्तु व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूप विष्णु लिङ्ग (अनुशासन सूत्रों) को छोड़ने पर संन्यासी किसी भी तरह से पवित्र नहीं हो सकता है ॥ २८ ॥ त्यक्त्वा विष्णोर्लिङ्गमन्तर्बहिर्वा यः स्वाश्रमं सेवतेऽनाश्रमं वा। प्रत्यापत्तिं भजते वातिमूढो नैषां गतिः कल्पकोट्यापि दृष्टा ॥ २९ ॥ अन्तः तथा बाह्य विष्णु लिङ्ग को छोड़कर जो संन्यासी अपने आश्रम में ही निवास करता है अथवा आश्रम का त्याग कर देता है, वह प्रतिपल विपत्तियों से घिरा रहता है, ऐसे व्यक्तियों की सद्गति अनन्तकाल तक भी देखने में नहीं आती ॥ २९ ॥ त्यक्त्वा सर्वाश्रमान्धीरो वसेन्मोक्षाश्रमे चिरम्। मोक्षाश्रमात्परिभ्रष्टो न गतिस्तस्य विद्यते ॥३०॥ धैर्यवान् पुरुष समस्त आश्रमों का परित्याग करके मोक्षरूपी आश्रम में दीर्घकाल तक निवास करे। यदि मोक्ष-आश्रम से भी भ्रष्ट हो जाये, तो फिर उसको कहीं पर भी ठौर नहीं है ॥ ३० ॥ पारिव्राज्यं गृहीत्वा तु यः स्वधर्मे न तिष्ठति । तमारूढच्युतं विद्यादिति वेदानुशासनम् ॥ ३१ ॥ जो (पुरुष) संन्यास-आश्रम को ग्रहण करके अपने धर्म में स्थिर नहीं रहता, ऐसे (पुरुष) को आरूढ़ च्युत (पातकी) समझना चाहिए, क्योंकि वह (पुरुष) संन्यास आश्रम में आकर के भी पातकी हो चुका है, ऐसा वेद का अनुशासन (आदेश) है ॥ ३१ ॥ अथ खलु सोम्येमं सनातनमात्मधर्मं वैष्णवीं निष्ठां लब्ध्वा यस्तामदूषयन्वर्तते स वशी भवति। स पुण्यश्लोको भवति। स लोकज्ञो भवति। स वेदान्तज्ञो भवति। स ब्रह्मज्ञो भवति। स सर्वज्ञो भवति। स स्वराड् भवति। स परं ब्रह्म भगवन्तमाप्नोति। स पितृन्संबन्धिनो बान्धवान्सुहृदो मित्राणि च भवादुत्तारयति ॥ ३२ ॥ हे प्रिय सोम्य ! जो पुरुष इस सनातन आत्मधर्म, विष्णु से सम्बन्धित निष्ठा को प्राप्त करके उसको प्रदूषित न करता हुआ प्रतिष्ठित रहता है, वह जितेन्द्रिय होता है। वह विशाल कीर्ति एवं लोकतत्त्व का ज्ञाता होता है। वह ब्रह्मवेत्ता होता है, वह सर्वज्ञ होता है। वह स्वयं प्रकाश स्वरूप होता हुआ परब्रह्म को प्राप्त करता है। वह अपने पितरों, सम्बन्धियों, बन्धुओं, मित्रों तथा समस्त प्रेमी-सम्बन्धियों को संसार-सागर से तार देता है ॥३२ ॥ तदेतदृचाभ्युक्तम् । शतं कुलानां प्रथमं बभूव तथा पराणां त्रिशतं समग्रम्। एते भवन्ति सुकृतस्य लोके येषां कुले संन्यसतीह विद्वान् ॥ ३३॥ जो विद्वान् इस संन्यास-धर्म को ग्रहण करता है, उसके कुल में सौ पीढ़ी पूर्व तथा तीन सौ पीढ़ी बाद तक जन्म लेने वालों का उद्धार हो जाता है। ऐसे श्रेष्ठ कृत्य करने वाले विद्वान् संन्यासी कभी-कभी ही इस लोक में प्रकट होकर इसे कृतार्थ करते हैं ॥ ३३ ॥ त्रिंशत्परांस्त्रिंशदपरांस्त्रिंशच्च परतः परान् । उत्तारयति धर्मिष्ठः परिव्राडिति वै श्रुतिः ॥ ३४॥ विद्वान् धर्मिष्ठ संन्यासी तीस पर (बाद की), तीस अपर (पूर्व की) एवं तीस पर से भी पर(बाद से बाद की) पीढ़ियों-पूर्वजों को तार देता है, ऐसा श्रुति का वचन है ॥ ३४ ॥ संन्यस्तमिति यो ब्रूयात्कण्ठस्थप्राणवानपि। तारिताः पितरस्तेन इति वेदानुशासनम् ॥ ३५ ॥
२७८ शाट्यायनीयोपनिषद् प्राणों के कण्ठगत (मृत्यु के समीप) होने पर भी जो इस प्रकार कह दे कि 'मैंने संन्यास ले लिया है', तो ऐसा समझना चाहिए कि उसने पितरों को तार दिया, ऐसी वेद की आज्ञा (अनुशासन) है॥ ३५॥ अथ खलु सोम्येमं सनातनमात्मधर्मं वैष्णवीं निष्ठां नासमाप्य प्रब्रूयात्। नानूचानाय नानात्मविदे नावीतरागाय नाविशुद्धाय नानुपसन्नाय नाप्रयतमानसायेति ह स्माहुः। तदेतदृचाभ्युक्तम्। विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मां शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायानुजवे शठाय मा मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम्॥ ३६॥ हे प्रिय सौम्य ! विद्वान् पुरुष को चाहिए कि वह इस सनातन आत्मनिरूपक धर्म को विष्णु सम्बन्धी निष्ठा को सम्यक् रूप से निर्वाह किये (स्वयं आचरण किये) बिना उपदिष्ट न करे। इसके साथ ही जो वेदान्त का ज्ञानी न हो, आत्मबोध युक्त न हो, वीतराग न हो, शुद्धचित्त, विनीत एवं जिज्ञासु न हो, ऐसे पुरुष को इसका उपदेश नहीं करना चाहिए। इस बात को पोषण प्रदान करने वाली ऋचाएँ ये हैं-ब्रह्मविद्या ब्राह्मण के समीप में आयी एवं बोली-हे ब्रह्मन् ! मेरी रक्षा करो, मैं ही तुम्हारी निधि हूँ। मुझे दूसरों के गुणों में दोष देखने वाले कुटिल, धूर्त, मूर्ख पुरुष को उपदिष्ट मत करो। ऐसा करने पर मैं प्रभावशालिनी न रह सकूँगी ॥ ३६॥ यमेवैष विद्याच्छुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम्। अस्मा इमामुपसन्नाय सम्यक् परीक्ष्य दद्याद्वैष्णवीमात्मनिष्ठाम् ॥ ३७॥ जिसे पवित्र, अभिमानशून्य, सावधान, मेधावी एवं ब्रह्मचारी समझे, ऐसे समीप में आये हुए उस जिज्ञासु की भली-भाँति परीक्षा करके इस आत्मतत्त्व बोधिका वैष्णवी विद्या का उपदेश करना चाहिए ॥ ३७॥ अध्यापिता ये गुरुं नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा। यथैव तेन न गुरुर्भोजनीयस्तथैव चान्नं न भुनक्ति श्रुतं तत्॥ ३८॥ शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भी जो (पुरुष) मन, वाणी तथा कर्म से अपने गुरुजनों का आदर नहीं करते, ऐसे लोगों के अन्न को कल्याण की इच्छा रखने वाले ग्रहण नहीं करते तथा गुरु भी उसके अन्न को स्वीकार नहीं करते। ठीक वैसे ही यति भी उस कृतघ्न के घर का अन्न ग्रहण न करे, ऐसा श्रुति का कथन है॥ गुरुरेव परो धर्मो गुरुरेव परा गतिः। एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाभिनन्दति। तस्य श्रुतं तपो ज्ञानं स्रवत्यामघटाम्बुवत्॥ ३९॥ गुरु ही परम धर्म है, गुरु ही परम गति है। ज्ञान प्रदाता गुरु को जो पुरुष आदृत नहीं करता अर्थात् उनका सम्मान हीं करता, उस पुरुष का पढ़ा हुआ (उसकी शिक्षा), उसकी तपस्या, उसका ज्ञान धीरे-धीरे उसी प्रकार क्षीण होकर समाप्त हो जाता है, जिस प्रकार कच्चे घड़े से जल ॥ ३९॥ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। स ब्रह्मवित्परं प्रेयादिति वेदानुशासनम् इत्युपनिषत् ॥ जिस पुरुष की देवताओं में परम भक्ति होती है एवं जैसे देवताओं में वैसे ही गुरु में भी उसकी परम भक्ति होती है। ऐसा (पुरुष) ब्रह्मज्ञानी परम पद की प्राप्ति करता है, ऐसा वेदानुशासन है, वेद की आज्ञा (आदेश) है। इस प्रकार यह उपनिषद् (विद्या) पूर्ण हुई ॥ ४० ॥ ॐ पूर्णमदः ........... इति शान्तिः ॥ ॥ इति शाट्यायनीयोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ शाण्डिल्योपनिषद् ॥ यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। इसमें 'योगविद्या' का समग्र वर्णन महर्षि शाण्डिल्य और मुनि अथर्वा के प्रश्नोत्तर रूप में प्रस्तुत है। इसमें कुल तीन अध्याय हैं। प्रथम अध्याय ११ खण्डों वाला विस्तृत है। जिसका शुभारम्भ शाण्डिल्य ऋषि के आत्मतत्त्व की प्राप्ति के उपाय स्वरूप अष्टाङ्गयोग के प्रश्न से हुआ है। महामुनि अथर्वा इसके उत्तर में अष्टांगयोग का विशद वर्णन करते हैं। यम-नियम को दस-दस बताते हुए पातंजलयोग से इसकी विशिष्टता सिद्ध कर देते हैं। नाड़ी शोधन की प्रक्रिया का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं, जिससे प्राण-जय किया जा सके और अनेकानेक सिद्धियों का अधिकारी बना जा सके। दूसरे अध्याय में ऋषि शाण्डिल्य ने महामुनि अथर्वा से ब्रह्म विद्या का रहस्य पूछा है, जिसके उत्तर में महामुनि ने ब्रह्म का सर्वव्यापी स्वरूप, उसकी अनिर्वचनीयता, उसका लोकोत्तर रूप बताते हुए कहा कि 'वह ब्रह्म तुम्हीं हो, उसे ज्ञान के द्वारा जानो'। तीसरे अध्याय में ऋषि शाण्डिल्य ने पुनः प्रश्न किया कि जो ब्रह्म एक, अक्षर, निष्क्रिय, शिव, सत्तामात्र एवं आत्म स्वरूप है, उससे जगत् का निर्माण, पोषण एवं संहार किस प्रकार हो सकता है ? इसके उत्तर में महामुनि ने ब्रह्म का सकल, निष्कल एवं सकल-निष्कल भेद बताते हुए कहा कि ब्रह्म के सकल-निष्कल रूप से उसके संकल्प मात्र से सृष्टि का प्राकट्य, विकास और विलय होता रहता है। अन्त में ब्रह्म, आत्मा, महेश्वर एवं दत्तात्रेय शब्द का निर्वचन प्रस्तुत करते हुए आदि देवपुरुष दत्तात्रेय का सतत ध्यान करते रहने की बात कही और यह भी कहा कि इसी ध्यान से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर परम कल्याण (मोक्ष) का अधिकारी बन जाता है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः..........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद्) ॥ प्रथमोऽध्यायः ॥ शाण्डिल्यो ह वा अथर्वाणं पप्रच्छात्मलाभोपायभूतमष्टाङ्गयोगमनुब्रूहीति। स होवाचाथर्वा यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टाङ्गानि। तत्र दश यमाः। तथा नियमाः। आसनान्यष्टौ। त्रयः प्राणायामाः। पञ्च प्रत्याहाराः। तथा धारणा। द्विप्रकारं ध्यानम्। समाधिस्त्वेकरूपः। तत्राहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यदयार्जवक्षमाधृतिमितहारशौचानि चेति यमा दश। तत्राहिंसा नाम मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वभूतेषु सर्वदाऽक्लेशजननम्। सत्यं नाम मनोवाक्कायकर्मभिर्भूतहितयथार्थाभिभाषणम्। अस्तेयं नाम मनोवाक्कायकर्मभिः परद्रव्येषु निःस्पृहता। ब्रह्मचर्य नाम सर्वावस्थासु मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वत्र मैथुनत्यागः। दया नाम सर्वभूतेषु सर्वत्रानुग्रहः। आर्जवं नाम मनोवाक्कायकर्मणां विहिताविहितेषु जनेषु प्रवृत्तौ निवृत्तौ वा एकरूपत्वम्। क्षमा नाम प्रियाप्रियेषु सर्वेषु ताडनपूजनेषु सहनम्। धृतिर्नामार्थहानौ स्वेष्टबन्धुवियोगे तत्प्राप्तौ सर्वत्र चेतःस्थापनम्। मिताहारो नाम चतुर्थांशावशेषकसुस्निग्धमधुराहारः। शौचं नाम द्विविधं बाह्यमान्तरं चेति। तत्र मृज्जलाभ्यां बाह्यम्। मनःशुद्धिरान्तरम्। तदध्यात्मविद्यया लभ्यम्॥१॥
२८० शाण्डिल्योपनिषद् महर्षि शाण्डिल्य अथर्वा मुनि से पूछते हैं कि 'हे मुने ! आत्मतत्त्व की प्राप्ति के उपाय स्वरूप अष्टाङ्ग योग का वर्णन करने की कृपा करें।' ऐसा सुनकर उन अथर्वा मुनि ने कहा-हे महर्षे ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि-ये ही योग के आठ अंग कहे गये हैं। 'यम' एवं 'नियम' की संख्या दस- दस है, 'आसन' आठ प्रकार के हैं, 'प्राणायाम' की संख्या तीन है, 'प्रत्याहार' एवं 'धारणा' दोनों के पाँच- पाँच भेद हैं, 'ध्यान' दो प्रकार के होते हैं तथा 'समाधि' का एक ही भेद है। इसमें यम के दस भेद इस प्रकार हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, सरलता, क्षमा, धैर्य, अल्प-आहार ग्रहण करना तथा पवित्रता। अहिंसा का तात्पर्य है-मन, वचन, शरीर एवं अपने कार्य के द्वारा किसी भी प्राणी को कभी भी दुःख न देना। सत्य का अर्थ है कि मन, वचन, शरीर एवं कर्म से जो हितकारी हो, वही वाणीं प्राणियों के समक्ष बोलना। अस्तेय अर्थात् मन, वचन, शरीर एवं अपने कार्य के द्वारा दूसरों के धन-साधनों के प्रति निस्पृह रहना। ब्रह्मचर्य का तात्पर्य है कि सभी अवस्थाओं में मन, वचन, शरीर एवं कर्म के द्वारा सभी तरह के मैथुन (असंयम) का परित्याग करना। दया अर्थात् समस्त प्राणियों पर सदैव अपना अनुग्रह बनाये रखना। आर्जव अर्थात् मन, वचन, शरीर एवं कर्म से लोगों के द्वारा उचित अथवा अनुचित व्यवहार करने अथवा न करने पर भी समभाव बनाये रखना। क्षमा का तात्पर्य है-सदैव प्रिय-अप्रिय, पूजा अथवा ताड़ना आदि का बर्ताव किया जाए, तब भी उसे सहन करना। धृति अर्थात् धन हानि हो, अपने इष्ट-मित्रों का वियोग अथवा संयोग हो, हर स्थिति में चित्त को स्थिर रखना। अल्पाहार अर्थात् पेट में चौथा भाग खाली रहे, इस प्रकार अपने आहार में श्रेष्ठ घी, दुग्ध वाले मधुर पदार्थों का समावेश रखना। शौच का तात्पर्य है-बाह्य एवं अन्तः दोनों प्रकार की शुद्धि रखना। मिट्टी तथा जल के द्वारा बाहर की पवित्रता होती है तथा मन की शुद्धि आन्तरिक है जो अध्यात्म विद्या से होती है ॥ १ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ तपःसन्तोषास्तिक्यदानेश्वरपूजनसिद्धान्तश्रवणह्रीमतिजपव्रतानि दश नियमाः। तत्र तपो नाम विध्युक्तकृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः शरीरशोषणम्। संतोषो नाम यदृच्छालाभसंतुष्टिः। आस्तिक्यं नाम वेदोक्तधर्माधर्मेषु विश्वासः। दानं नाम न्यायार्जितस्य धनधान्यादेः श्रद्धया- र्थिभ्यः प्रदानम्। ईश्वरपूजनं नाम प्रसन्नस्वभावेन यथाशक्ति विष्णुरुद्रादिपूजनम्। सिद्धान्तश्र- वणं नाम वेदान्तार्थविचारः। ह्रीर्नाम वेदलोकिकमार्गकुत्सितकर्मणि लज्जा। मतिर्नाम वेदवि- हितकर्ममार्गेषु श्रद्धा। जपो नाम विधि वदुपदिष्टवेदाविरुद्धमन्त्राभ्यासः। तद्द्विविधं वाचिकं मानसं चेति। मानसं तु मनसा ध्यानयुक्तम्। वाचिकं द्विविधमुच्चैरूपांशुभेदेन। उच्चैरुच्चारणं यथोक्तफलम्। उपांशु सहस्रगुणम्। मानसं कोटिगुणम्। व्रतं नाम वेदोक्तविधिनिषेधानुष्ठा- ननैयत्यम् ॥ १ ॥ तप, संतोष, आस्तिकता, दान, ईश्वर-पूजन, सिद्धान्त-श्रवण, ह्री (लज्जा), मति, जप तथा व्रत-ये दस प्रकार के भेद 'नियम' के कहे गये हैं। इसमें तप का तात्पर्य यह है कि विधिपूर्वक कृच्छ्र चान्द्रायण आदि से शरीर को सुखाना। संतोष अर्थात् दैव की इच्छा से जो भी कुछ प्राप्त हो जाए, उस पर संतोष रखना। आस्तिक्य का भाव यह है कि वेद द्वारा कहे हुए धर्म और अधर्म में विश्वास रखना। नीति पूर्वक प्राप्त हुए धन-धान्य आदि को श्रद्धापूर्वक गरीबों को देना ही दान कहा जाता है। ईश्वर-पूजन प्रसन्न स्वभाव से यथोचित मात्रा में विष्णु, रुद्र आदि का पूजन-अर्चन करना। सिद्धान्त श्रवण अर्थात् वेदान्त के अर्थ का चिन्तन करना। ही अर्थात् वेद मार्ग में तथा लोकमार्ग में नीच माने जाने वाले कृत्य के करने में लज्जा का अनुभव होना। मति अर्थात्
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र ८ २८१
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र ८ २८१ वेदोक्त कर्म में श्रद्धा का उत्पन्न होना। जप का तात्पर्य यह है कि विधिपूर्वक गुरु ने जिस वैदिक मन्त्र का उपदेश दिया है, उसका अभ्यास करना। जप का अभ्यास दो तरह से होता है- वाचिक और मानसिक। मानसिक-जप मन के द्वारा ध्यान युक्त होने से होता है तथा वाचिक दो प्रकार से होता है-१. उच्चारण पूर्वक से तथा २. उपांशु (फुसफुसाहट) रूप में उच्चारण पूर्वक जप का यथोक्त फल होता है। उपांशु का उससे सहस्रगुना फल प्राप्त होता है तथा मानसिक जप करने का फल तो करोड़ गुना मिलता है। व्रत का तात्पर्य वेद के द्वारा कहे हुए विधि-निषेध का नियमित आचरण करना है ॥ १ ॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥ स्वस्तिकगोमुखपद्मवीरसिंहभद्रमुक्तमयूराख्यान्यासनान्यष्टौ। स्वस्तिकं नाम जान्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले उभे। ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥ १ ॥ स्वस्तिक, गोमुख, पद्म, वीर, सिंह, भद्र, मुक्त तथा मयूर नाम वाले ये आठ प्रकार के आसन कहे गये हैं-इस (स्वस्तिक आसन) में पैर के दोनों तलवों को दोनों जानुओं (घुटनों) के बीच में बराबर रखकर सीधा तनकर बैठना पड़ता है। इस क्रिया को ही स्वस्तिकासन कहा जाता है ॥ १॥ सव्ये दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठपार्श्वे नियोजयेत्। दक्षिणेऽपि तथा सव्यं गोमुखं गोमुखं यथा ॥२ पीठ के बायीं ओर दाहिना गुल्फ एवं दायीं तरफ बायाँ गुल्फ (टखना) जोड़कर गोमुख के सदृश बैठना ही गोमुखासन है ॥ १ ॥ अङ्गुष्ठेन निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण च। ऊर्वोरुपरि शाण्डिल्य कृत्वा पादतले उभे। पद्मासनं भवेदेतत्सर्वेषामपि पूजितम् ॥३॥ हे शाण्डिल्य ! दोनों जंघाओं के ऊपर दोनों पैरों के तलवों को रखकर दोनों हाथों से दोनों पैरों के अँगूठों को उल्टी रीति से पकड़कर रखना ही सर्वमान्य पद्मासन कहलाता है ॥ ३ ॥ एकं पादमथैकस्मिन्विन्यस्योरुणि संस्थितः। इतरस्मिंस्तथा चोरुं वीरासनमुदीरितम् ॥ ४ ॥ एक जाँघ को एक पैर से तथा दूसरी जाँघ को दूसरे पैर से जोड़कर बैठने को वीरासन कहते हैं ॥ ४॥ दक्षिणं सव्यगुल्फेन दक्षिणेन तथेतरम्। हस्तौ च जान्वोः संस्थाप्य स्वाङ्गुलीश्च प्रसार्य च ॥५॥ व्यात्तवक्त्रो निरीक्षेत नासाग्रं सुसमाहितः। सिंहासनं भवेदेतत्पूजितं योगिभिः सदा॥ ६ ॥ दाहिने टखने के साथ बायाँ टखना तथा बायें टखने के साथ दायें टखने को लगाकर बैठ जाना और दोनों हाथों को दोनों जानुओं (घुटनों) पर रखकर अँगुलियों को फैलाकर रखना चाहिए। तत्पश्चात् ठीक तरह से एकाग्र होकर मुँह फैलाकर घ्राणेन्द्रिय के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करनी चाहिए। इसको ही सिंहासन कहते हैं और योगीजन सदैव इस आसन की प्रशंसा करते हैं ॥ ५-६ ॥ योनिं वामेन संपीड्य मेढ्रादुपरि दक्षिणम्। भ्रूमध्ये च मनोलक्ष्यं सिद्धासनमिदं भवेत् ॥ ७ ॥ गुदा क्षेत्र को बायें पैर से दबाकर दायें पैर को लिङ्ग के ऊपर स्थिर करना; तत्पश्चात् भौंहों के बीच में लक्ष्य स्थिर करना ही सिद्धासन कहा जाता है ॥ ७ ॥ गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत्। पादपार्श्वे तु पाणिभ्यां दृढं बद्ध्वा सुनिश्चलम्। भद्रासनं भवेदेतत्सर्वव्याधिविषापहम् ॥ ८॥
२८२ शाण्डिल्योपनिषद्
लिङ्ग के नीचे की ओर सीवनी प्रदेश में दोनों टखनों को स्थिर करने तथा हाथों से पैरों के दोनों पार्श्वों को मजबूती से पकड़कर निश्चलतापूर्वक बैठना ही भद्रासन कहलाता है, जो सभी तरह के रोग एवं विष आदि को विनष्ट करने वाला है ॥ ८ ॥ संपीड्य सीविनीं सूक्ष्मां गुल्फेनैव तु सव्यतः। सव्यं दक्षिणगुल्फेन मुक्तासनमुदीरितम्॥ ९॥ सूक्ष्म सीवनी प्रदेश को बायें टखने के द्वारा दबा करके दाहिने गुल्फ (टखने) से बायें टखने को दबा करके (बैठना) ही मुक्तासन कहलाता है ॥ ९ ॥ अवष्टभ्य धरां सम्यक्तलाभ्यां तु करद्वयोः। हस्तयोः कूर्परौ चापि स्थापयेन्नाभिपार्श्वयोः ॥१०॥ समुन्नतशिरः पादो दण्डवद्व्योम्नि संस्थितः। मयूरासनमेतत्तु सर्वपापप्रणाशनम्॥ ११॥ दोनों हाथ की हथेलियों को भूमि से सटाकर स्थिर करना और हाथ की कोहनियों से नाभि के दोनों ओर दबा करके बैठना चाहिए। तदनन्तर मस्तक और पैरों को ऊर्ध्व की ओर उठाकर लकड़ी की तरह से आकाश में अधर स्थिर रखना ही मयूरासन कहलाता है। यह आसन सभी तरह के पापों का विनाश करने वाला है॥ शरीरान्तर्गताः सर्वे रोगा विनश्यन्ति। विषाणि जीर्यन्ते ॥ १२॥ इन आसनों के करने से शरीर के अन्दर विद्यमान रहने वाले सभी तरह के रोग विनष्ट हो जाते हैं तथा सभी प्रकार के विष स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं ॥ १२ ॥ येन केनासनेन सुखधारणं भवत्यशक्तस्तत्समाचरेत् ॥ १३ ॥ जो (मनुष्य) अशक्त हो, उसे जिस किसी आसन से सुख मिले, वही आसन करना चाहिए ॥ १३ ॥ येनासनं विजितं जगतत्रयं तेन विजितं भवति ॥ १४॥ जिसने इन सभी आसनों को जीत लिया है, उसने तीनों लोक जीत लिये हैं, ऐसा समझना चाहिए ॥ १४॥ यमनियमासनाभ्यासयुक्तः पुरुषः प्राणायामं चरेत् । तेन नाड्यः शुद्धा भवन्ति ॥ १५ ॥ यम, नियम एवं आसन से पूर्णरूपेण सम्पन्न होने के पश्चात् मनुष्य को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। इसके अभ्यास से नाड़ियों की शुद्धि हो जाती है ॥ १५ ॥॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ अथ हैनमथर्वाणं शाण्डिल्यः पप्रच्छ केनोपायेन नाड्यः शुद्धाः स्युः । नाड्यः कतिसंख्या- काः । तासामुत्पत्तिः कीदृशी। तासु कति वायवस्तिष्ठन्ति । तेषां कानि स्थानानि। तत्कर्माणि कानि। देहे यानि यानि विज्ञातव्यानि तत्सर्वं मे ब्रूहीति ॥ १ ॥ तत्पश्चात् महात्मा शाण्डिल्य ने अथर्वा मुनि से पूछा-किस उपाय से नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं ? नाड़ियों की संख्या कितनी होती है ? उनकी उत्पत्ति किस तरह से हुई ? उसमें कितने प्रकार के वायु रहते हैं ? उनका स्थान कौन सा है ? उनके कार्य क्या-क्या होते हैं ? इस शरीर में जो भी कुछ जानने के लिए आवश्यक है, वह सभी कुछ आप मुझे बताने की कृपा करें ॥ १ ॥ स होवाचाथर्वा । अथेद्ं शरीरं षण्णवत्यङ्गुलात्मकं भवति। शरीरात्प्राणो द्वादशाङ्गुला- धिको भवति ॥ २॥ शरीरस्थं प्राणमग्निना सह योगाभ्यासेन समं न्यूनं वा यः करोति स योगिपुङ्गवो भवति ॥ ३॥ तदनन्तर उन अथर्वा ऋषि ने कहा कि यह शरीर छियानबे (९६) अंगुल का प्रमाण स्वरूप है। यह
अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ९ | २८३
अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ९ | २८३ प्राण-शरीर की अपेक्षा बारह अंगुल और अधिक होता है। इस शरीर में उपस्थित रहने वाले प्राण को योग के अभ्यास द्वारा जो भी मनुष्य अग्नि के साथ सम अवस्था में स्थिर करता है या फिर उससे भी कम करता है, वह श्रेष्ठ योगी कहलाता है॥ २-३॥ देहमध्ये शिखिस्थानं त्रिकोणं तप्तजाम्बूनदप्रभं मनुष्याणाम्। चतुष्पदां चतुरश्रम्। विहङ्गानां वृत्ताकारम्। तन्मध्ये शुभा तन्वी पावकी शिखा तिष्ठति॥ ४॥ मनुष्यों की देह में अग्नि का स्थान त्रिकोण की भाँति तप्तस्वर्ण के सदृश प्रकाश युक्त होता है। चौपायों का आयताकार तथा पक्षियों का गोलाकार होता है। इस अग्नि स्थान में क्षीणकाय, शुभ अग्निशिखा रहती है॥ ४॥ गुदाद्द्व्यङ्गुलादूर्ध्वं मेढ्राद्द्व्यङ्गुलादधो देहमध्यं मनुष्याणां भवति। चतुष्पदां हृन्मध्यम्। विहगानां तुन्दमध्यम्। देहमध्यं नवाङ्गुलं चतुरङ्गुलमुत्सेधायतमण्डाकृति॥ ५॥ गुदामार्ग से दो अङ्गुल ऊर्ध्व की ओर तथा लिङ्ग से दो अङ्गुल नीचे की ओर मनुष्य के शरीर का मध्यस्थल होता है। चौपायों के हृदय का मध्य एवं पक्षियों के पेट का मध्य ही उनके शरीरों के बीच का मध्य स्थल होता है। शरीर का वह बीच का भाग नौ अंगुल ऊँचा तथा चार अंगुल विस्तार वाला होता है। उसकी आकृति अण्डे के सदृश होती है॥ ५॥ तन्मध्ये नाभिः। तत्र द्वादशारयुतं चक्रम्। तच्चक्रमध्ये पुण्यपापप्रचोदितो जीवोभ्रमति॥६ तन्तुपञ्जरमध्यस्थलूतिका यथा भ्रमति तथा चासौ तत्र प्राणश्चरति। देहेऽस्मिञ्जीवः प्राणारूढो भवेत्॥ ७॥ उसके मध्य में नाभि है तथा उसमें बारह अरों से युक्त चक्र स्थित है। उस चक्र के मध्य में पुण्य-पाप से प्रेरणा प्राप्त करता हुआ जीव यत्र-तत्र भ्रमण करता रहता है। जिस प्रकार से मकड़ी अपने द्वारा निर्मित तन्तु (जाल) के अन्दर भ्रमण करती रहती है, उसी तरह से यह जीव भी वहीं पर विचरण करता रहता है। इस देह में जीव प्राण के ऊपर सतत आरूढ़ रहता है॥ ६-७॥ नाभेस्तिर्यगध ऊर्ध्वं कुण्डलिनीस्थानम्। अष्टप्रकृतिरूपाऽष्टधा कुण्डलीकृता कुण्ड- लिनी शक्तिर्भवति। यथावद्वायुसंचारं जलान्नादीनि परितः स्कन्धपार्श्वेषु निरुध्यैनं मुखेनैव समावेष्ट्य ब्रह्मरन्ध्रं योगकाले चापानेनाग्निना च स्फुरति। हृदयाकाशे महोज्ज्वला ज्ञानरूपा भवति॥ ८॥ नाभि के समीप नीचे एवं ऊपर की ओर कुण्डलिनी का क्षेत्र स्थित है। कुण्डलिनी शक्ति आठ प्रकार की प्रकृति से युक्त एवं आठ कुण्डली (घुमाव) बनाये हुए है। यह शक्ति योग की अवस्था में वायु के संचार को यथावत् करके जल एवं अन्न आदि को चारों ओर से कन्धों के पार्श्व में स्थिर करके पुनः मुख से लेकर ब्रह्मरन्ध्र तक अपान तथा अग्नि के द्वारा जाग्रत् होती है। यह स्फुरणयुक्ता शक्ति हृदयाकाश में महान् उज्ज्वल एवं ज्ञानरूपा होती है॥ ८॥ मध्यस्थकुण्डलिनीमाश्रित्य मुख्या नाड्यश्चतुर्दश भवन्ति। इडा पिङ्गला सुषुम्ना सरस्वती वारुणी पूषा हस्तिजिह्वा यशस्विनी विश्वोदरी कुहूः शङ्खिनी पयस्विनी अलम्बुसा गान्धारीति नाड्यश्चतुर्दश भवन्ति॥ ९॥ कुण्डलिनी का आश्रय प्राप्त करके मध्य में स्थित रहने वाली चौदह मुख्य नाड़ियाँ हैं। ये क्रमशः इड़ा,
२८४ शाण्डिल्योपनिषद् पिंगला, सुषुम्ना, सरस्वती, वारुणी, पूषा, हस्तजिह्वा, यशस्विनी, विश्वोदरी, कुहू, शंखिनी, पयस्विनी, अलंबुसा एवं गान्धारी नामवाली हैं ॥ ९ ॥ तत्र सुषुम्ना विश्वधारिणी मोक्षमार्गेति चाचक्षते । गुदस्य पृष्ठभागे वीणादण्डाश्रिता मूर्धपर्यन्तं ब्रह्मरन्ध्रे विज्ञेया व्यक्ता सूक्ष्मा वैष्णवी भवति ॥ १० ॥ इन समस्त नाड़ियों में सुषुम्ना नाड़ी विश्व को धारण करने में समर्थ तथा मोक्षमार्ग को प्रदान करने वाली है, ऐसा योगीजन कहते हैं। गुदा के पृष्ठ भाग में वह नाड़ी मेरुदण्ड के आश्रित रहती है तथा मस्तक में ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचती है। यह स्पष्ट, सूक्ष्म एवं वैष्णवी रूपा होती है ॥ १० ॥ सुषुम्नायाः सव्यभागे इडा तिष्ठति। दक्षिणभागे पिङ्गला। इडायां चन्द्रश्चरति । पिङ्गलायां रविः । तमोरूपश्चन्द्रः । रजोरूपो रविः । विषभागो रविः । अमृतभागश्चन्द्रमाः । तावेव सर्वकालं धत्तः । सुषुम्ना कालभोक्त्री भवति । सुषुम्नापृष्ठपार्श्वयोः सरस्वतीकुहू भवतः । यशस्विनी- कुहूमध्ये वारुणी प्रतिष्ठिता भवति । पूषासरस्वतीमध्ये पयस्विनी भवति । गान्धारीसरस्वतीमध्ये यशस्विनी भवति । कन्दमध्येऽलम्बुसा भवति । सुषुम्नापूर्वभागे मेढ्रान्तं कुहूर्भवति । कुण्ड- लिन्या अधश्चोर्ध्वं वारुणी सर्वगामिनी भवति । यशस्विनी सौम्या च पादाङ्गुष्ठान्तमिष्यते । पिङ्गला चोर्ध्वगा याम्यनासान्तं भवति । पिङ्गलायाः पृष्ठतो याम्यनेत्रान्तं पूषा भवति । याम्यक- र्णान्तं यशस्विनी भवति । जिह्वाया ऊर्ध्वान्तं सरस्वती भवति । आसव्यकर्णान्तमूर्ध्वगा शङ्खिनी भवति । इडापृष्ठभागात्सव्यनेत्रान्तगा गान्धारी भवति । पायुमूलादधोध्र्वगाऽलम्बुसा भवति । एतासु चतुर्दशसु नाडीष्वन्या नाड्यः संभवन्ति । तास्वन्यास्तास्वन्या भवन्तीति विज्ञेयाः । यथाऽश्वत्थादिपत्रं सिराभिर्व्याप्तमेवं शरीरं नाडीभिर्व्याप्तम् ॥ ११ ॥ इस सुषुम्ना नाड़ी के बायीं ओर इड़ा नामक नाड़ी है तथा दायीं ओर पिंगला नाड़ी स्थित है। इड़ा में चन्द्रमा चलायमान रहता है और पिंगला में सूर्य विचरण करता है। चन्द्रमा तमोगुण के स्वरूप वाला एवं सूर्य रजोगुण के स्वरूप से युक्त है। चन्द्रमा अमृत का क्षेत्र है तथा सूर्य विष का प्रभाग है। ये दोनों सम्पूर्ण काल को धारण करते हैं। सुषुम्ना नाड़ी काल का उपभोग करने वाली है। सुषुम्ना के पृष्ठ भाग की तरफ सरस्वती नाड़ी विद्यमान है तथा उसके बगल के क्षेत्र में कुहू नाड़ी स्थित है। यशस्विनी एवं कुहू के मध्य में वारुणी नाड़ी प्रतिष्ठित है। पूषा और सरस्वती के मध्य में पयस्विनी नाड़ी स्थित है। गान्धारी और सरस्वती के मध्य में यशस्विनी नाड़ी विद्यमान है। कन्द के बीच में अलम्बुसा नाड़ी है। सुषुम्ना नाड़ी के पूर्व भाग में लिंग क्षेत्र तक कुहू नाड़ी फैली हुई है। कुण्डलिनी के नीचे एवं ऊपर की ओर वारुणी नाड़ी चारों तरफ गयी हुई है। यशस्विनी और सौम्या पैर के अँगूठे तक फैली हुई है। पिङ्गला नाड़ी ऊपर की तरफ चलकर के दायीं नासिका तक पहुँचती है। पिंगला के पृष्ठ भाग की तरफ से दायीं आँख तक पूषा नाड़ी फैली हुई है। दायें कान तक यशस्विनी स्थित है। जिह्वा के ऊपरी भाग तक सरस्वती नाड़ी प्रतिष्ठित है। बायें कान तक ऊपर की ओर गमन करती हुई शंखिनी नाड़ी स्थित है। इड़ा नाड़ी के पृष्ठ भाग की ओर से बायें नेत्र तक गमन करने वाली गांधारी नाड़ी कहलाती है। गुदा क्षेत्र के मूल से नीचे-ऊपर की ओर जाने वाली अलम्बुसा नाड़ी कहलाती है। इन चौदह प्रकार की नाड़ियों में अन्य और दूसरी नाड़ियाँ भी स्थित हैं। उन नाड़ियों के अन्दर भी अन्य इस प्रकार की बहुत सी नाड़ियाँ हैं। जिस प्रकार से पीपल आदि के पत्ते शिराओं (केशों) से संव्याप्त होते हैं,उसी तरह शरीर भी तरह-तरह की नाड़ियों से संव्याप्त है ॥११ ॥