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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१७४ ] [ षष्ट अध्याय

१७४ ] [ षष्ट अध्याय तादृशाः पुरुषा यान्ति मादृशां गणनैव का ॥२५॥ संसार एव दुःखानां सीमान्त इति कथ्यते । तन्मध्ये पतिते देहे सुखमासाद्यते कथम् ॥२६॥ प्रबुद्धोऽस्मि प्रबुद्धोऽस्मि दुष्टश्चोरोऽयमात्मनः । मनो नाम निहन्म्येनं मनसाऽस्मि चिरं हतः ॥२७॥ मा खेदं भज हेयेषु नोपादेयपरो भवः । हेयादेयहशो त्यक्त्वा शेषस्थः सुस्थिरो भव ॥२८॥ निराशता निर्भयता नित्यता समता ज्ञता । निरीहता निष्क्रियता सौम्यता निर्विकल्पता ॥२६॥ धृतिमैत्री मनस्तुष्टिर्मुदुता मृदुभाषता । हेयोपादेयनिर्मुक्ते ज्ञे तिष्ठन्त्यपवासनम् ॥३०॥ गृहीततृष्णाशबरीवासनाजालमाततम् । संसारवारिप्रसृतं चिन्तातन्तुभिराततम् ॥३१॥ अनया तीक्ष्णया तात छिन्दि बुद्धिशलाकया । वात्ययेवाम्बुदं जालं छित्त्वा तिष्ट तते पदे ॥३२॥ यह देह रूप भ्रम संसार रूप रात्रि में दुःख स्वप्न के समान है और इसका प्रसार भी पवित्रता से परे है । बाल्यकाल में अज्ञान घेरे रहता है और युवावस्था में नारी के नयन बाण द्वारा मारा हुआ रहता है, तो अन्तकाल में ही यह स्त्री पुत्रादि की चिन्ता में रत रहने वाला अधम अपना क्या उपकार कर सकता है ? सत् के ऊपर असत् का बोल- बाला है, रमणीयता पर कुरुपता चढ़ी हुई है, सुख के ऊपर दुःख है तब मुझे किसकी शरण लेनी चाहिये ? जिनके निमेष और उन्मेष में संसार का अन्त और उत्पत्ति निहित है, वैसे पुरुष भी जब काल कलवित हो जाते हैं, तब मेरे जैसे तुच्छ पुरुषों की तो बात ही क्या है । जिस संसार को दुःखों की अन्तिम परिधि माना गया है, उस संसार में पड़े रहने वाला देह सुख का रस कैसे चख सकता है । मेरी आत्मा को चुराने वाला चोर

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri महोपनिषत् ] [ १७५ मेरा यह दूषित मन ही है। इससे मुझे न जाने कब का चुरा लिया है ? अब मैं जान गया हूँ। इसलिए इसका संहार कर डालूँगा। हेय पदार्थों के लिए दुःखित होने से कोई लाभ नहीं और उपादेय पदार्थों में भी आसक्ति रखना व्यर्थ है। इसलिए हेय और उपादेय की भेद-दृष्टि का त्याग करके शेष में ही अवस्थित हो जाओ क्योंकि ज्ञानी पुरुष में नित्यता, अभिज्ञता, समता, निष्क्रियता, निष्कामता, सांसारिक विकारों में निराशा, निर्विकल्पता, सौम्यता, मृदुता, धृति, मैत्री, सन्तोष और मिष्ट भाषण आदि गुण विद्यमान रहते हैं। तृष्णा रूपिणी भीलनी ने वासना रूपी जाल फैला दिया है, उसमें तुम फँस गये हो। यह मृग मरीचि- कात्मक जल चिन्ता रूपिणी रश्मियों द्वारा सब ओर फैला दिया गया है। हे पुत्र ! इस माया को ज्ञानरूपी तीक्ष्ण अस्त्र से काट कर अपने व्यापक रूप में उसी प्रकार स्थिति होओ, जिस प्रकार बवंडर मेघों के जाल को काट डालता है ॥ २२-२३ ॥ मनसैव मनश्छित्त्वा कुठारेगोव पादपम् । पदं पावनमासाद्य सद्य एव स्थिरो भव ॥२३ तिष्ठन् तच्छन् स्वपन् जाग्रन्निवसन्नुत्पतन् पतन् । असदेवेदमित्यन्तर्निश्चित्यास्थां परित्यज्य ॥३४ दृश्यमाश्रयसीदं चेत् तत् सचित्तोऽसि बन्धवान् । दृश्यं संत्यजसीदं चेत् तदचित्तोऽसि मोक्षवान् ॥३५ नाहं नेदमिति ध्यायस्तिष्ठ त्वमचलाचलः । आत्मनो जगत्क्ष्यान्तर्द्रष्टृदृश्यदशान्तरे ॥३६ दर्शनाख्यं स्वात्मनः सर्वदा भावयन् भव । स्वाद्यस्वादकसंयक्तं स्वाद्यस्वादकमध्यगम् ॥३७ स्वदनं केवलं ध्यायन् परमात्ममयो भव । अवलम्ब्य निरालम्बं मध्येमध्ये स्थिरो भव ॥३८ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१७६ ] [ षष्ठ अध्याय

१७६ ] [ षष्ठ अध्याय रज्जुबद्धा विमुच्यन्ते तृष्णाबद्धा न केनचित् । तस्मान्निदाघ तृष्णां त्वं त्यज संकल्पवर्जनात् ॥३६॥ एतामहं भावमयीमपुण्यां छित्त्वाऽनहंभावशलाकयैव । स्वभावजां भव्यभवान्तभूमौ भव प्रशान्ताखिलभूत- भीतिः ॥४०॥ अहमेषां पदार्थानामेते च मम जीवितम् । नाहमेभिर्विना कश्चिन्न मयैते विना किल ॥४१॥ इत्यन्तर्निश्चयं त्यक्त्वा विचार्य मनसा सह । नाहं पदार्थस्य न मे पदार्थ इति भाविते ॥४२॥ अन्तःशीतलया बुद्ध्या कुर्वतो लीलया क्रियाम् । यो नूनं वासनात्यागो ध्येयो ब्रह्मन् प्रकीर्तितः ॥४३॥ जैसे वृक्ष के बँटे में लगी हुई कुल्हाड़ी वृक्ष को ही काट डालती है, वैसे ही मन से मन को काट कर पवित्र पद में अवस्थित होओ । उठते-बैठते, चलते, खड़े होते, सोते, जागते आदि सभी स्थितियों में सब को असत् रूप मानने हुए दृश्य पदार्थों से आस्था को हटा लो क्योंकि दृश्य का आश्रय लेने मात्र से चित्त युक्त बन्धन में पड़ना होता है । दृश्य का त्याग कर देने मात्र से चित्त-शून्यता के कारण मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी होते हो । 'न संसार है और न मैं हूँ' इस प्रकार की भावना करते हुए पर्वत के समान दृढ़ हो जाओ । आत्मा और विश्व के मध्य तथा दृश्य के मध्य भी स्वयं को दर्शन रूप आत्मा ही मानो । स्वादयुक्त पदार्थ तथा उसे चखने वाले से और इन दोनों के मध्य में स्थिति केवल स्वाद का ध्यान करते हुए परमात्ममय होकर रहो । यह ध्यान रखो कि रस्सी के बन्धन में पड़े हुए तो छूट जाते हैं, परन्तु तृष्णा से बन्धन में पड़े प्राणी किसी प्रकार भी नहीं छूटते । इसलिए इस पापमयी तृष्णा को छिन्न-भिन्न कर डालो क्योंकि यह अहङ्कार वाली और संकल्पमयी

महोपनिषत् ] [ १७७ है। अहम्भाव शून्यता ही इसके काटने वाला महान् अस्त्र है। जिस जन्म-मरण के भीषण भय में सभी प्राणी डूबे रहते हैं, उससे अभय होकर परमार्थ लोक में घूमो। ध्येय वही है जिसमें शान्त मन के द्वारा विचार करते हुए वासना त्याग दी जाती है। तुम भी 'यह पदार्थ मेरे नहीं हैं और न मैं इन पदार्थों का कुछ हूँ' ऐसी भावना द्वारा निरालम्ब अवस्था में स्थिति होओ ॥ ३३–४३ ॥ सर्वं समतया बुद्ध्या यः कृत्वा वासनाक्षयम् । जहाति निर्ममो देहं नेयोऽसौ वासनाक्षयः ॥४४ अहंकारमयीं त्यक्त्वा वासनां लीलयैव यः । तिष्ठति ध्येयसं त्यागी स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४५ निर्मूलं कलानां त्यक्त्वा वासनां यः शमं गतः । नेयत्यागमिमं विद्धि मुक्तं तं ब्राह्मणोत्तमम् ॥४६ द्वावेतौ ब्रह्मतां यातौ द्वावेतौ विगतज्वरौ । आपतत्सु यथाकालं सुखदुःखेष्वनारतौ ॥४७ संन्यासियोगिनौ दान्तौ विद्धि शान्तौ मुनीश्वर । ईप्सितानीप्सिते न स्तो यस्यान्र्तवृत्तिवृत्तिषु ॥४८ सुषुप्तबधश्चरति स जीव मुक्त उच्यते । हर्षामर्षभयक्रोधकामकार्पण्यदृष्टिभिः ॥४९ न हृष्यति ग्लायति यः परामर्शविवर्जितः । बाह्यार्थवासनोद्भूता तृष्णा बद्धेति कथ्यते ॥५० सर्वार्थवासनोन्मुक्ता तृष्णा मुक्तेति भण्यते । इदमस्तु ममेत्य तमिच्छां प्रार्थनयाऽन्विताम् ॥५१ तां तीक्ष्णां शृंखलां विद्धि दुःखजन्मभयप्रदाम् । तामेतां सर्वभावेषु सत्स्वसत्सु च सर्वदा ॥५२

१७८ षष्ठ अध्याय

१७८ षष्ठ अध्याय संन्तज्य परमोदारं पदमेति महामनाः । बन्धास्थामथ मोक्षास्थां सुखदुःखदशामपि ॥५३ समत्व बुद्धि के द्वारा जो पुरुष वासना को सर्वथा क्षीण करके ममत्व रहित हो जाता है, उसी से देह का बन्धन भी त्यागा जा सकता है। इसलिए वासना को नष्ट कर देना परम कर्तव्य है। जीवन्मुक्त उसी को कहते हैं जो अहङ्कारात्मिका वासना का सहज ही त्याग कर, ध्येय वस्तु का भी त्याग कर देता है। संकल्प रूपिणी वासना का समूल त्याग ही शांति-लाभ कराने वाला है। जीवन्मुक्त पुरुष ही वैसा त्याग करने में समर्थ है और वही पुरुष ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ कहा जाता है। ऐसे ही मनुष्य संसार के संतापों से मुक्त होकर ब्रह्मत्व को प्राप्त होते हैं। योगी जन शम और दम से युक्त होने के कारण समय-समय पर प्राप्त होने वाले सुख-दुःखों में लिप्त नहीं होते। इच्छा और अनिच्छा दोनों से ही जो रहित हैं और जो सुषुप्त के समान व्यवहार करने वाला है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिस पुरुष में वासना का अभाव है वह काम, क्रोध, मोह, हर्ष, अमर्ष और भय आदि के वशीभूत होकर सुख-दुःख को नहीं मानता। बाह्य विषयों से आविर्भूत तृष्णा बन्धन में डालने वाली है और सब प्रकार से विषय वासनाओं से शून्य तृष्णा मुक्ति प्राप्त कराने वाली है। किसी वस्तु के प्राप्त करने की कामना दुःख भय की जन्मदायिनी है। उसे घोर बन्धन स्वरूपा समझनी चाहिए। सन्त जन सत्-असत् रूप पदार्थों की अभिलाषा का सर्वथा त्याग करके परम श्रेष्ठ पद पाते हैं। हे पुत्र ! बन्धन में विश्वास तथा मोक्ष में विश्वास सत्-असत् में विश्वास यह सब सुख-दुःख स्वरूप ही है। इनके त्याग द्वारा प्रशान्त महासागर के समान निश्चल और अत्यन्त शांत होना श्रेयस्कर है ॥ ४५-५३ ॥ त्यक्त्वा सदसदास्थां त्वं तिष्ठाक्षुब्धमहाब्धिवत् । जायते निश्चयः साधो पुरुषस्य चतुर्विधः ॥५४

महोपनिषद् ] [ १७६ आपादमस्तकमहं मातापितृविनिर्मितः । इत्येको निश्चयो ब्रह्मन् बन्धायासवलोकनात् ॥५५ अतीतं सर्वभावेभ्यो वालाग्रादप्यहं तनुः । इति द्वितीयो मोक्षाय निश्चयो जायते सताम् ॥५६ जगज्जालपदार्थात्मा सर्व एवाहमक्षयः । तृतीयो निश्चयश्चोक्तो मोक्षायैव द्विजोत्तम् ॥५७ अहं जगद्वा सकलं शून्यं व्योम समं सदा । एवमेष चतुर्थोऽपि निश्चयो मोक्षसिद्धिदः ॥५८ एतेषां प्रथमः प्रोक्तस्तृष्णया बन्धयोग्यया । शुद्धतृष्णास्त्रयः स्वच्छा जीवन्मुक्ता विलासिनः ॥५९ सर्वं चाप्यहमेवेति निश्चयो यो महामते । तमादाय विषादाय न भूयो जायते मतिः ॥६० हे श्रेष्ठ आत्मन् ! मनुष्य चार प्रकार के निश्चय वाला है । ‘मेरे देह की रचना माता-पिता द्वारा हुई है’ यह प्रथम निश्चय मानना चाहिए । ‘मैं जगदात्मक भावों से रहित केशाग्र से भी सूक्ष्माकार आत्मा हूँ’ यह दूसरे प्रकार का निश्चय है । इस निश्चय के द्वारा सन्तजनों को मुक्ति प्राप्त होती है । ‘मैं अखिल विश्व के पदार्थों का आत्मा सर्वस्वरूप एवम् अविनाशी हूँ’ यह तीसरे प्रकार का निश्चय भी मुक्ति का कारण होता है । ‘मैं और यह सम्पूर्ण विश्व आकाश के समान शून्य हैं’ यह चौथे प्रकार का निश्चय मोक्ष-सिद्धि का दाता है । इनमें प्रथम निश्चय बन्धन प्रदान करने वाली तृष्णा से ओत-प्रोत है । शेष तीन प्रकार के निश्चय पवित्र तृष्णा वाले हैं । जो लोग इन तीन प्रकार के निश्चयों से युक्त होते हैं वे आत्मतत्व में रत रहने वाले जीवन्मुक्त हैं । सब कुछ अपने को ही मानने वाले पुरुष फिर-फिर कर विषाद में नहीं पड़ते हैं ॥ ५४-६० ॥ शून्यं तत् प्रकृतिर्माया ब्रह्म विज्ञानमित्यपि । शिवः पूरुष ईशानो नित्यमात्मेति कथ्यते ॥६१

१८० ] [ षष्ठ अध्याय

१८० ] [ षष्ठ अध्याय द्वैताद्वैतसमुद्भूतैर्जगन्निर्माणलीलया । परमात्ममयी शक्तिरद्वैतैव विजृम्भते ॥६२ सर्वातीतपदालम्बी परिपूर्णैकचिन्मयः । नोद्वेगी न च तुष्टात्मा संसारे नावसीदति ॥६३ प्राप्तकर्मकरो नित्यं शत्रुमित्रसमानदृक् । ईहितानीहितैर्मुक्तो न शोचति न काङ्क्षति ॥६४ सर्वस्याभिमतं वक्ता चोदितः पेशलोक्तिमान् । आशयज्ञश्च भूतानां संसारे नावसीदति ॥६५ पूर्वा दृष्टिमवष्टभ्य ध्येयेत्यागविलासिनीम् । जीवन्मुक्ततया स्वस्थो लोके विहर विज्वरः ॥६६ अन्तः संत्यक्तसर्वाशो वीतरागो विवासनः । बहिः सर्वसमाचारो लोके विहर विज्वरः ॥६७ बहिः कृत्रिमसंरम्भो हृदि संरम्भवर्जितः । कर्ता बहिरकर्तान्तर्लोके विहर शुद्धधीः ॥६८ त्यक्ताहंकृतिराश्वस्तमतिराकाशशोभनः । अगृहीतकलाङ्काङ्को लोके विहर शुद्धधीः ॥६९ आत्मा के नाम से बोला जाने वाला शून्य ही प्रकृति, माया, शिव, पुरुष, ईशान, नित्य एवम् ब्रह्मज्ञान है । परब्रह्म के सम्बन्धित अद्वैत शक्ति ही द्वैत दिखाई देती है और अद्वैत द्वारा प्रकट पदार्थों से विश्व निर्माण की माया करती हुई बढ़ती है । जो पुरुष विश्व प्रपञ्च से दूर आत्मवाद में स्थित रहकर सन्तोष-असन्तोष न करते हुए परिपूर्ण चिन्मय अवस्था में रहते हैं वे सांसारिक विषाद में कभी नहीं पड़ते । हे पुत्र ! तुम समस्त आशाओं का त्याग करते हुये वासना शून्य होकर राग-रहित और ताप-रहित होकर दिखावे के रूप में सभी सांसारिक व्यवहारों को करो । बाह्य क्रोध का रूपक बनाते हुए भी भीतर से क्रोध-हीन बन जाओ तथा बाहर से कर्त्ता परन्तु भीतर से अकर्त्ता बने रहो । इस प्रकार

महोपनिषत् ] [ १८१ शुद्ध चित्त वाले होकर लोक में विचरण करो क्योंकि जो शत्रु-मित्र को समान समझता और नित्य प्राप्त कर्म को करता है और जो इच्छा- अनिच्छा से मुक्त है, जिसे न किसी वस्तु की कामना है और न हर्ष-शोक है, प्रिय भाषी तथा सबके आशय का ज्ञाता है, वह इस संसार में कभी शोक को प्राप्त नहीं होता । हे पुत्र ! अहङ्कार का त्याग कर कलङ्क की कालिमा से सर्वथा बचे रहो और आकाश के समान निर्मल जीवन वाले शुद्ध मन से स्वच्छन्द विचरण करो ॥ ६१-६६ ॥ उदारः पेशलाचारः स [पू] र्वाचारानुवृत्तिमान् । अन्तः सङ्गपरित्यागी बहिः संसारवानिव ॥७० अन्तर्वैराग्यमादाय बहिराशोन्मुखेहितः । अयं बन्धुरयं नेति कलना लघुचेतसाम् ॥७१ उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् । भवभावनया मुक्तं जरामरणवर्जितम् ॥७२ प्रशान्तकलनाऽऽरम्भं नीरागं पदमाश्रय । एषा ब्राह्मी स्थितिः स्वच्छा निष्कामा विगतामया ॥७३ आदाय विहरन्नवं संकटेपु विमुह्यति । वैराग्येणाय शस्त्रेण महत्त्वादिगुणैरपि ॥७४ यत्नोपविहरार्थं तत् स्वयमेवोन्नयेन्मनः । वैराग्यात् पूर्णतामेति मनोनाशवशानुगम् ॥७५ आशया रिक्ततामेति शरदीव सरोऽमलम् । ममेव भुक्तविरसं व्यापारौघ पुनः पुनः ॥७६ दिवसे दिवसे कुर्वन् प्राज्ञः कस्मान्नं लज्जते । चिच्चैत्यकलितो बन्धस्तन्मुक्तो मुक्तिरुच्यते ॥७७ चिदचैत्याऽखिलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रहः । एतं निश्चयमादाय विलोकय धियेच्छया ॥७८

१८२ ] [ षष्ठ अध्याय

१८२ ] [ षष्ठ अध्याय CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानमानन्दं पदाप्स्यसि । चिदहं चिदिमे लोकाश्चिदाशाश्चिदमाः प्रजाः ॥७६ दृश्यदर्शननिर्मुक्तः केवलामलरूपवान् । नित्योदितो निराभासो द्रष्टा साक्षी चिदात्मकः ॥८० चैत्यनिर्मुं चिद्रूपं पूर्णज्योतिःस्वरूपकम् । संशान्तसर्वसंवेद्यं संविन्मात्रमहं महत् ॥८१ संशान्तसर्वसंकल्पः प्रशान्तसकलैषणः । निर्विकल्पपदं गत्वा स्वस्थो भव मुनीश्वर ॥८२ श्रेष्ठ आचरण वाला, उदार, विषयों में अनासक्त और सब श्रेष्ठ आचारों का अनुगामी होकर अन्तःकरण में वैराग्य धारण कर बाहर से श्रेष्ठ व्यवहार करे । 'यह मेरा बन्धु नहीं है और यह है' ऐसा विचार अल्प बुद्धि वाले करते हैं । जो लोग उदार मन वाले हैं, उनके लिए तो सम्पूर्ण संसार ही कुटुम्ब है । भाव-अभाव से रहित, जरा-मरण से सर्वथा दूर तथा जिसमें सभी संकल्प आश्रय लेते हैं, ऐसे ही राग-रहित परमपद में अवस्थित होना चाहिए । इस प्रकार की स्थिति ही कामना-रहित एवं निर्मल ब्राह्मी स्थिति कही गई है । इसका अवलम्बन करने वाला साधक संकट के उपस्थित होने पर भी मोह से दूर रहता है । शास्त्र से प्राप्त हुये ज्ञान द्वारा, महत्वादि गुणों के द्वारा अथवा वैराग्य धृत्ति के द्वारा संकल्प को नष्ट करने पर मन स्वयं ही उन्नतावस्था को प्राप्त होने लगता है । निराशा के वश में पड़ा हुआ मन वैराग्य के बिना पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता । जब वह आशा से समन्वित होता है, तब शरद् ऋतु में स्वच्छ हुए सरोवर के समान रागयुक्त हो जाता है । परन्तु भोगों से विरक्ति को प्राप्त हुये मन को बारम्बार रागादि में डालते हुए विज्ञ पुरुष लज्जित क्यों नहीं होते ? चित् और विषय का योग ही बन्धन है । उससे छुटकारा पा लेना ही मुक्ति कहा जाता है । वेदांत-

महोपनिषत् ] [ १८३ सिद्धान्त का यही एक सार है कि विषयों से मुक्त चित्त ही आत्मा है। इस विचार को सत्य मानकर स्वच्छ अन्तःकरण द्वारा स्वयं को ही देखो। ऐसा करने से आनन्दस्वरूप पद प्राप्त होगा। ये लोक, दिशायें और जीव-मात्र सब कुछ चित् है, मैं स्वयं भी चित्त हूँ। दृश्य और दर्शन से स्वच्छन्द हुआ निर्मल रूप वाला यह साक्षी चिदात्मा आभास-रहित होता हुआ तथा नित्य प्रकट होता हुआ दृष्टा बन गया है। मैं महान् संवित् मात्र, पूर्ण ज्योतिस्वरूप, संवेदन से सर्वथा मुक्त और चिद्रूप हूँ। हे मुने ! सभी संकल्पों को शांत कर, कामनाओं के परित्यागपूर्वक निर्विकल्प में अवस्थित होओ ॥ ७०-८२ ॥ य इमां महोपनिषदं ब्राह्मणो नित्यमधीते अश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति । अनुपनीत उपनीतो भवति । सोऽग्निपूतो भवति । स वायुपूतो भवति । स सूर्यपूतो भवति । स सोमपूतो भवति । स सत्यपूतो भवति । स सर्वपूतो भवति । स सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवति । स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति । स सर्वदेवैरनुध्यातो भवति । स सर्वक्रतुभिरिष्टवान् भवति । गायत्र्याः षष्टिसह- स्राणि जप्तानि फलानि भवन्ति । इतिहासपुराणानां रुद्राणां शतमहस्राणि जप्तानि फलानि भवन्ति । प्रणवानायुतं जप्तं भवति । आचक्षुषः पंक्ति पुनाति । आसप्तमान् पुरुषयुगान् पुनाति । इत्याह भगवान् हिरण्यगर्भः । जाप्येनामृतत्व च गच्छ- तीति महोपनिषत् ॥ ८३ ॥ इस महोपनिषत् का नित्य अध्ययन करने वाला ब्राह्मण यदि अश्रोत्रिय हो तो श्रोत्रिय हो जाता है। जो उपनीत न हो, वह उपनीत हो जाता है। इससे अग्निपूत, वायु पूत, सोमपूत, सत्यपूत आदि सब कुछ होता है। वह पूर्ण पवित्र होकर देवताओं से परिचय प्राप्त करता है। उसे सब देवताओं के ध्यान का और तीर्थों का फल मिलता है, वह सब यज्ञों का अनुष्ठान कर्त्ता होकर सहस्रों गायत्री-जप के फल का भागी Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१८४ ] [ षष्ठ अध्याय

१८४ ] [ षष्ठ अध्याय होता है। वह दस सहस्र प्रणव के जाप का तथा सहस्रों इतिहासों और पुराणों के पाठ तथा अध्ययन का फल प्राप्त कर लेता है। वह जहाँ तक देखता है, वहाँ तक की पंक्ति को पवित्र कर देता है। पहिले पीछे की सात-सात पीढ़ियां समाप्त हो जाती हैं। इसके जप द्वारा अमृतत्व प्राप्त होता है। यह उपनिषद् है—ऐसा हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी का कथन है ॥ ८३ ॥ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ❄ महोपनिषद् समाप्त ❄

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

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त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्ति पाठ—यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण बनता है । पूर्ण में पूर्ण ले लेने पर पूर्ण ही शेष रहता है । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । त्रिशिखी ब्राह्मण आदित्यलोकं जगाम । तं गत्वोवाच । भगवन् किं देहः किं प्राणः किं कारणं किमात्मा ॥१॥ स होवाच सर्वमिदं शिव एव विजानीहि । किं तु नित्यः शुद्धो निरञ्जनो विभुरद्वयानन्दः शिव एकः स्वेन भासेदं सर्वं सृष्ट्वा तप्तायः पिण्डवत् ऐक्यं भिन्नवत् अवभासते । तद्भासकं किमित चेत् उच्यते । सच्छब्दवाच्यं अविद्याशबलं ब्रह्म ॥२॥ ब्रह्मणोऽव्यक्तम् । अव्यक्तान्महत् । महतोऽहंकारः । अहंकारात् पञ्चतन्मात्राणि । पञ्चतन्मात्रेभ्यः पञ्चमहाभूतानि । पञ्चमहाभूतेभ्योऽखिलं जगत् ॥३॥ तदखिलं किमिति । भूतविकारविभागादिति । एकस्मिन् पिण्डे कथं भूतविकारविभागं इति । तत्कार्यकारणभेदरूपेण अंशतत्त्ववाचकवाच्यस्थानभेदविषयदेवताकोशभेदविभागा भवन्ति ॥४॥ अथाकाशः अन्तःकरणमनोबुद्धिचित्ताहंकाराः । वायुः समानोदानोव्यानापानप्राणाः । वह्निः श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाः । आपः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः । पृथिवी वाक्पाणिपादपायूपस्थाः ।५। Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१८६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

१८६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri त्रिशिखीब्राह्मण ने आदित्य लोक में जाकर भगवान् आदित्य से पूछा--"भगवन् ! देह क्या है ? प्राण क्या है ? कारण क्या है ? आत्मा क्या है ?" आदित्य भगवान् ने उत्तर दिया--"इस समस्त को शिव रूप जानो। वही नित्य, शुद्ध, निरंजन, विभु, अद्वय शिव अपने एक ही प्रकाश से सब को देख कर तप्त लोहे के पिण्ड के समान एक को अनेक रूपों में प्रकाशित करता है। यदि यह प्रश्न किया जाय कि वह प्रकाश करने वाला कौन हैं तो कहा जायगा कि अविद्या- युक्त ब्रह्म 'सत्' शब्द का वाच्य है। ब्रह्म से अव्यक्त, अव्यक्त से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से पाँच तन्मात्रा, पंच तन्मात्राओं से पञ्चमहाभूत और पञ्चमहाभूत से यह समस्त जगत उत्पन्न होता है। वह सम्पूर्ण क्या है ? यह भूतों के विकार से उत्पन्न विभाग रूप है। भूतों के विकार से एक ही पिण्ड के विभाग किस प्रकार होते हैं ? उन विभिन्न भूतों के कार्य कारण भेद से अंश तत्व, वाचक- वाच्य, स्थान-भेद, विषय, देवता कोश भेद--ये विभाग होते हैं। अन्त-करण, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार पाँच आकाश हैं। समान, उदान, व्यान, अपान, प्राण--ये पाँच वायु हैं। श्रोत्र, त्वचा, जिह्वा, घ्राण---ये अग्नि से हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये पाँच जल से हैं। वाणी, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ पृथ्वी से हैं ॥ १-५ ॥ ज्ञानसंकल्पनिश्चयानुसंधानाभिमाना आकाशकार्यान्तः- करणविषयाः। समीकरणोन्नयनग्रहणश्रवणोच्छ वासा वायुकार्य प्राणादिविषयाः । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा अग्निकार्यज्ञानेन्द्रिय- विषया अबाश्रिताः। वचनादानगमनविसर्गानन्दाः पृथिवीकार्य कर्मेन्द्रियविषयाः। कर्मज्ञानेन्द्रियविषयेषु प्राणतन्मात्रविषया अन्तर्भूताः। मनोबुद्धयोश्चत्ताहं कारौ चान्तर्भूतो॥६॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १८७

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १८७ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अवकाशविधूतदर्शनपिण्डीकारणाधारणाः सूक्ष्मतमा जैव- तन्मात्रविषयाः ॥ ७ ॥ एवं द्वादशाङ्गानि आध्यात्मिकान्याधिभौतिकान्याधिदैवि- कानि । अत्र निशाकरचतुर्मुखदिग्वातार्कवरुणाश्व्यनीन्द्रोपेन्द्र- प्रजापतियमा अक्षाधिदेवतारूपैर्द्वादशनाड्यन्तःप्रवृत्ताः प्राणा एवाङ्गानि अङ्गज्ञानं तदेव ज्ञातेति ॥ ८ ॥ अथ व्योमानिलानलजलान्नानां पञ्चीकरणमिति । ज्ञातृत्वं समानयोगेन श्रोत्रद्वारा शब्दगुणो वागधिष्ठित आकाशे तिष्ठति आकाशस्तिष्ठति । मनो व्यानयोगेन त्वग्द्वारा स्पर्शगुणः पाण्यधि- ष्ठितो वायौ तिष्ठति वायुयुस्तिष्ठति । बुद्धिरुदानयोगेन चक्षुर्द्वारा रूपगुणः पादाधिष्ठितोऽग्नौ तिष्ठत्यग्निस्तिष्ठति । चित्तमपान- योगेन जिह्वाद्बारा रसगुण उपस्थाधिष्ठितोऽप्सु तिष्ठत्यापस्ति- ष्ठन्ति । अहंकारः प्राणयोगेन घ्राणद्वारा गन्धगुणो गुदाधिष्ठितः पृथिव्यां तिष्ठति पृथिवी तिष्ठतीत्येवं वेद ॥ ६ ॥ ज्ञान, संकल्प, निश्चय, अनुसंधान अभिमान आकाश के कार्य तथा अन्तःकरण के विषय है । समीकरण, नेत्र खोलना, पकड़ना, सुनना, उच्छ्वास---ये वायु के कार्य और प्राणादि के विषय हैं । शब्द, स्पर्श रूप, रस, गन्ध, ये अग्नि के कार्य और ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं और जल के आश्रित हैं । बोलना, दान, गमन, विसर्जन तथा आनन्द पृथ्वी के कार्य तथा कर्मेन्द्रियों के विषय हैं । ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के विषयों में प्राण तथा तन्मात्राओं के विषय भी अन्तर्भूत हैं । मन और बुद्धि में चित्त और अहङ्कार अन्तर्भूत हैं । अवकाश, हटाना, दर्शन, धारणा, सूक्ष्मतम तन्मात्रा के विषय हैं । इस प्रकार बारह अङ्ग हैं, जो आध्या- त्मिक, आधिभौतिक और अधिदैविक—तीनों भागों में हैं । इनमें चन्द्रमा, Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१८८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

१८८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ब्रह्मा, दिशा, वायु, सूर्य, वरुण अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, प्रजापति और यम—ये बारह इन्द्रियों के अधिदेवता रूप से बारह नाड़ियों में स्थित रहते हैं, ये प्राण ही हैं। अंगों का ज्ञानरूप ही जाता है। अब आकाश, वायु, अग्नि, जल, अन्न का पञ्चीकरण इस प्रकार है। समान वायु के योग से ज्ञात करना होता है, श्रोत्र द्वारा शब्दरूपी गुण वाणी के आश्रय से आकाश में स्थित है और आकाश भी स्थित है। व्यान वायु के योग से मन है, त्वचा द्वारा स्पर्श गुण हाथ के सहारे वायु में स्थित है और वायु भी स्थित है। उदान वायु के योग से बुद्धि है, चक्षु द्वारा रूप गुण पैर के सहारे अग्नि में स्थित है और अग्नि स्थित है। अपान वायु के योग से चित्त है, जिह्वा द्वारा रस गुण उपस्थ के सहारे जल में स्थित है। प्राण वायु के योग से अहङ्कार है, नासिका द्वारा घ्राण गुण गुदा के सहारे पृथिवी में स्थित है और पृथिवी भी स्थित है, यह ज्ञातव्य है। इस विषय के ये श्लोक हैं ॥६-६॥

अत्रैते श्लोका भवन्ति— पृथग्भूते षोडश कलाः स्वार्धभागान् परान् क्रमात् । अन्तःकरणव्यानाक्षिरसपायुनभः क्रमात् ॥१॥ मुख्यान् पूर्वोत्तरैर्भागैर्भूतेभूते चतुश्चतुः । पूर्वमाकाशमाश्रित्य पृथिव्यादिषु संस्थितः ॥२॥ मुख्या ऊर्ध्वे परा ज्ञेया ना [आ] परानुत्तरान्विदुः । एवमशो अभूत्तस्मात्तेभ्यश्चांशो अभूत्तथा ॥३ तस्मादन्योन्यमाश्रित्य ह्यो तं प्रोतमनुक्रमात् । पञ्चभूतमया भूमिः सा चेतनसमन्विता ॥४ तत ओषधयोऽन्नं च ततः पिण्डाश्चतुर्विधाः । रसासृङ् मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्लानि धावतः ॥५ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ १८६

[Header] त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ १८६

प्रत्येक तत्व के आधे भाग से और दूसरे तत्वों की सोलह कलाओं से अन्तःकरण, व्यान, चक्षु, रस, गुदा (अर्थात् आकाशादि पाँचों) भूतों की स्थिति है । आकाश से लगाकर प्रत्येक भूत का मुख्य पूर्व भाग और अन्य भूतों के पिछले चार चार भाग पाँचों भूतों में स्थित रहते हैं ॥१-२॥ मुख्य भाग से ऊपर वाले को सूक्ष्म भूत जाने और पिछले को स्थूल जाने । इसी प्रकार ये एक दूसरे के अंश से सम्मिलित होते हैं ॥ ३ ॥ ये सब भूत इसी प्रकार एक दूसरे का आश्रय लेकर परस्पर में ओत-प्रोत हैं और इनसे युक्त यह पंचभूतमय पृथ्वी चेतन तत्व से समन्वित है ॥४॥ फिर इस पृथ्वी से ओषधि, अन्न, चारों प्रकार के पिण्ड, रस रक्त, मांस, मेद, अस्थि, वीर्य आदि सप्त धातुओं की उत्पत्ति होती है ॥ ५ ॥

केचित्तद्योगतः पिण्डा भूतेभ्यः संभवा क्वचित् । तस्मिन्नन्नमयः पिण्डो नाभिमण्डलसंस्थितः ॥६ अस्य मध्येऽस्ति हृदयं सनालं पद्मकोशवत् । सत्वान्तर्वर्तिनो देवाः कर्त्रहंकारचेतनाः ॥७ अस्य बीजं तमःपिण्डं मोहरूपं जडं घनम् । वर्तते कण्ठमाश्रित्य मिश्रीभूतमिदं जगत् ॥८ प्रत्यगानन्दरूपात्मा मूर्ध्नि स्थाने परंपदे । अनन्तशक्ति संयुक्तो जगद्रूपेण भासते ॥९ सर्वत्र वर्तते जाग्रत्स्वप्नं जाग्रति वर्तते । सुषुप्तं च तुरीयं च नान्यावस्थासु कुत्रचित् ॥१०

उन धातुओं के योग से कहीं पिण्डों की उत्पत्ति हो जाती है, नाभिस्थान में अन्नमय पिण्ड स्थित है ॥ ६ ॥ उसके मध्य भाग में नाल- युक्त पद्मकोश के समान हृदय है, उसके भीतर वे देवता स्थित हैं जिनमें

१६० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

१६० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् कर्तापन का अहङ्कार तत्व पाया जाता है ॥ ७ ॥ इसका मोह रूपी तमोगुण का पिण्ड अज्ञान कण्ठ के आश्रय से रहता और समस्त जगत में व्याप्त है ॥ ८ ॥ प्रत्येक आनन्दरूपी आत्मा परमपद मूर्धा स्थान में अनन्त शक्तियों से संयुक्त होकर जगत स्वरूप में प्रकाशित हो रहा है ॥ ६ ॥ जाग्रत सर्वत्र विद्यमान है, स्वप्न जाग्रित में रहता है। सुषुप्ति और तुरीय अवस्थायें अन्य अवस्थाओं में नहीं पायी जातीं ॥१०॥ सर्वदेशेष्वनुस्यूतश्चतूरूपः शिवात्मकः । यथा महाफले सर्वे रसाः सर्वप्रवर्तकाः ॥११॥ तथैवान्नमये कोशे कोशास्तिष्ठन्ति चान्तरे । यथा कोशस्तथा जीवो यथा जीवस्तथा शिवः ॥१२ सविकारस्तथा जीवो निर्विकारस्तथा शिवः । कोशास्तस्य विकारस्ते ह्यवस्थासु प्रवर्तकाः ॥१३ यथा रसाशये फेनं मथनादेव जायते । मनोनिर्मथनादेव विकल्पा बहवस्तथा ॥१४ कर्मणा वर्तते कर्मो तत्त्यागाच्छान्तिमाप्नुयात् । अयने दक्षिणे प्राप्ते प्रपञ्चाभिमुखं गतः ॥१५ सब स्थानों में शिव स्वरूप चार रूपों में वर्तमान है जैसे उत्तम फलों में रस सर्वत्र व्याप्त रहता है ॥ ११ ॥ वहां अन्नमय-कोश के भीतर अन्य कोश रहते हैं। जैसे-जैसे कोश हैं वैसा ही जीव है और जैसा जीव है वैसा ही शिव ( परमात्मा ) है ॥१२॥ अन्तर इतना ही है कि जीव विकार सहित है और शिव विकारों से रहित है। कोश ही जीव के विकार हैं जो सब अवस्थाओं में प्रवर्तक हैं ॥ १३ ॥ जैसे दूध को मथने से फेन की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार मन के मथे जाने से

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ १६१

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ १६१ नाना प्रकार के विकल्प उत्पन्न होते हैं ? ॥ १४ ॥ कर्म से कर्मों का अस्तित्व है, कर्मत्याग से शान्ति हो जाती है । दक्षिण अयन में आने से उसे प्रपञ्च में लिप्त होना पड़ता है ॥ १५ ॥ अहंकाराभिमानेन जीवः स्याद्धि सदाशिवः । स चाविवेकप्रकृतिसङ्गत्या तत्र मुह्यते ॥१६ नानायोनिशतं गत्वा शेतेऽसौ वासनावशात् । विमोक्षात्संचरत्येव मत्स्यः कूलद्वयं यथा ॥१७ ततः कालवशादेव ह्यात्मज्ञानविवेकतः । उत्तराभिमुखो भूत्वा स्थानात्स्थानान्तरं क्रमात् ॥१८ मूर्ध्न्याधात्मनः प्राणान्योगाभ्यासं स्थितश्चरन् । योगात्संजायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रवर्तते ॥१९ योगज्ञानपरो नित्यं स योगी न प्रणश्यति । विकारस्थं शिवं पश्येद्विकारश्च शिवे न तु ॥२० योगप्रकाशकं योगैर्ध्यायेश्चानन्यभावनः । योगज्ञाने न विद्येते तस्य भावो न सिध्यति ॥२१ अहंकार से युक्त हो जाने के कारण सदाशिव ( परमात्मा ) को जीवकोटि में आना पड़ता है । वहां अविवेक और प्रकृति के संयोग से वह मोहग्रस्त होजाता है ॥ १६ ॥ वासनाओं में फँस कर वह सैकड़ों योनियों में जाता रहता है और मछली के घूमने के समान सर्वत्र भटकता रहता है ॥ १७ ॥ फिर काल प्रभाव से वह विवेक और आत्मज्ञान को प्राप्त होकर उत्तरामुख होकर एक दर्जा से दूसरे दर्जा को प्राप्त होता जाता है ॥ १८ ॥ तब वह अपने प्राणों को मूर्धा में धारण करके योगाभ्यास में प्रवृत्त होता है । योग से ज्ञान और ज्ञान से योग की प्रवृत्ति होती है ॥ १९ ॥ जो योगी सदैव ज्ञान योग में संलग्न रहता है वह

१६२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ शिखिब्राह्मणोपनिषत् नष्ट नहीं होता। वह विकारों में भी सदैव शिव ( ब्रह्मभाव ) के दर्शन करता है। ऐसा विज्ञान-योगी सर्व विकारों से रहित ब्रह्म का अनन्य भाव से ध्यान करे। जिसको इस प्रकार ज्ञानयोग नहीं होता उसको सिद्धि प्राप्त नहीं होती ॥२०--२१॥ तस्मादभ्यासयोगेन मनःप्राणान्निरोधयेत् । योगी निशितधारेण क्षुरेणेव निकृन्तयेत् ॥२२ शिखा प्राणमयी वृत्तिर्माहष्टाङ्गसाधनैः । ज्ञानयोगः कर्मयोग इति योगो द्विधा मतः ॥२३ क्रियायोगमथेदानीं शृणु ब्राह्मणसत्तम । अव्याकुलस्य चित्तस्य बन्धनं विषये क्वचित् ॥२४ इस प्रकार योग के अभ्यास द्वारा प्राणों से मन का निरोध करे मानो छुरी की पैनी धार से उसको काट दे। यम-नियम आदि अष्टांग -योगसाधन से ज्ञानमयी शिखा उत्पन्न होती है। योग की दो श्रेणियां हैं-ज्ञानयोग और कर्मयोग ॥ २२--२३ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ! अब क्रिया (कर्म) योग के विषय में बतलाते हैं कि जिसका चित्त व्याकुलता रहित होता है वह विषयों के बन्धन में नहीं पड़ता ॥ २४ ॥ यत्संयोगो द्विजश्रेष्ठ स च द्वैविध्यमश्नुते । कर्म कर्तव्यमित्येव विहितेष्वेव कर्मसु ॥२५ बन्धनं मनसो नित्यं कर्म योगः स उच्यते । यत्तु चित्तस्य सततमर्थे श्रेयसि बन्धनम् ॥२६ ज्ञानयोगः स विज्ञेयः सर्वसिद्धिकरः शिवः । यस्योक्तलक्षणे योगे द्विविधेऽप्यव्ययं मनः ॥२७ स याति परमं श्रेयो मोक्षलक्षणमञ्जसा ।

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६३

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६३ देहेन्द्रियेषु वैराग्यं यम इत्युच्यते बुधैः ॥२८ अनुरक्तिः परे तत्त्वे सततं नियमः स्मृतः । सर्ववस्तुषूदासीनभाव आसनमुत्तमम् ॥२९ जगत्सर्वमिदं मिथ्याप्रतीतिः प्राणसंयमः । चित्तस्यान्तर्मुखीभावः प्रत्याहारस्तु सत्तम ॥३० इसी प्रकार संयोग भी दो प्रकार के होते हैं। शास्त्रानुकूल कर्मों में सदैव मन का निग्रह करते रहना कर्मयोग कहलाता है । चित्त को निरन्तर आत्म-कल्याण में संलग्न रखना ज्ञानयोग है। इससे सब प्रकार की आत्मा सम्बन्धी सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इस प्रकार दोनों तरह के योगों का जो निर्विकार भाव से करता है वह बिना बिलम्ब मोक्ष रूपी परम श्रेय को प्राप्त कर लेता है। देह और इन्द्रियों के प्रति सब प्रकार से वैराग्य भावना यम कहलाता है ॥२५--२८॥ और परम तत्व से सदा अनुराग रखना नियम कहा गया है। सब वस्तुओं में उदासीन वृत्ति ही सर्वोत्तम आसन है ॥ २९ ॥ जगत के मिथ्या स्वरूप को भली प्रकार समझ लेना प्राणायाम है। चित्त की अन्तर्मुखी वृत्ति ही प्रत्याहार है ॥ ३० ॥ चित्तस्य निश्चलीभावो धारणा धारणं विदुः । सोऽहं चिन्मात्रमेवेति चिन्तनं ध्यानमुच्यते ॥३१ ध्यानस्य विस्मृतिः सम्यक्समाधिरभिधीयते । अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्य्यँद्दताऽऽर्जवम् ॥३२ क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश । तपस्सन्तुष्टिरास्तिक्यं दानमाराधनं हरेः ॥३३ वेदान्तश्रवणञ्चैव ह्रीर्मतिश्च जपो व्रतम् ।