१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
“वीर सावरकर द्वार लिखित' 1857 का स्वातंत्र्य समर' पुस्तक ने भगत सिंह को बहुत अधिक प्रभावित किया था। यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थी। मैंने इस पुस्तक की बहुत प्रशंसा सुनी थी और इसे पढ़ने का बहुत ही इच्छुक था। पता नहीं कहां से भगत सिंह को यह पुस्तक प्राप्त हो गई थी। वह एक दिन इसे मेरे पास ले आए। जिससे ली होगी उसे जल्द वापस करनी होगी, इसलिए वह मुझे बहुत कहने पर देने को तैयार नहीं हो रहे थे। पर जब मैंने जल्द-से-जल्द पढ़कर उसे अवश्य लौटा देने का पक्का वायदा किया, तब उन्होंने वह मुझे केवल 3 घंटे के लिए पढ़ने को दी। उसको मैं कभी नहीं भूल सकता। मैंने एम वक्त खाना नहीं खाया और रात-दिन उसे पढ़ता ही रहा। पुस्तक ने मुझे बहुत ज्यादा प्रभावित किया। भगत सिंह के अपने पर मैंने पुस्तक की बहुत प्रशंसा की। कुछ समय बाद भगत सिंह ने एक दिन मुझसे कहा कि 'यदि तुम कुछ परिश्रम करो और मदद करने के लिए तैयार हो जाओ तो गुप्त रूप से इस पुस्तक को प्रकाशित करने का उपाय सोचा जाए।' मैं पूर्ण रूप से सहायता करने को तैयार हो गया। “भगत सिंह ने किसी प्रेस में प्रबंध कर दिया। वह प्रतिदिन रात के समय कुछ मैटर मुझे प्रूफ देखने को दे जाते थे; मैं रात में उसे देखकर प्रूफ ठीक करके रख छोड़ता था। दूसरे दिन भगत सिंह उस ले जाते थे। कुछ दिनों तक बराबर यह सिलसिला चलता रहा। इस पुस्तक को दो खंडों में प्रकाशित किया गया। प्रत्येक खंड की कीमत आठ आना रखी गई, फिर गुप्त रूप से इसे बेचने का प्रबंध हुआ। मुझे याद है कि मैंने इस पुस्तक को सर्वप्रथम राजर्षि श्री पुरुषोत्तमदास टंडन के हाथ बेचा था। इसके प्रकाशन से टंडन जी बहुत प्रसन्न हुए थे। इसके बेचने में सुखदेव ने बहुत अधिक परिश्रम किया था; (पृ. 89-90) सन् 1929-30 में भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों की गिरफ्तारी के समय उनमें से अधिकांश के पास इस पुस्तक की प्रतियां पुलिस को प्राप्त हुईं। सन् 1942 में जर्मनी में फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसाइटी ने भी इस पुस्तक का एक संस्करण प्रकाशित किया। आजाद हिंद फौज के निर्माण में '1857 का स्वातंत्र्य समर' पुस्तक की भारी भूमिका रही। आजाद हिंद फौज के मूल संस्थापक रासबिहारी बोस क्रांतिकारी बोस क्रांतिपथ पर सावरकर को अपना गुरू मानते थे। जापान में शरण लेने के बाद भी वे द्वितीय विश्व युद्ध तक सावरकर से लगातार पत्राचार करते रहे। वे जापान में हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी बने। उन्होंने ही सुभाषचन्द्र बोस को आजाद हिंद फौज का नेतृत्व करने के लिए जर्मनी से जापान आने का निमंत्रण दिया था। सुभाष बाबू भी सावरकर के प्रति श्रद्धाभव रखते थे और स्वतंत्रता-प्राप्ति की उनकी रणनीति से सहमत थे। द्वितीय विश्व युद्ध द्वारा उत्पन्न 17
स्थिति का लाभ उठाने के लिए जनवरी 1941 में ब्रिटिश सरकार की आंखों में धूल झोंककर भारत के विदेश पलायन के छह महीने पूर्व 22 जून, 1940 को उन्होंने बंबई में सावरकर के निवास-स्थान पर उनसे गुप्त मंत्रणा की थी। अतः यह कहा जा सकता है कि आजाद हिंद फौज के गठन और ब्रिटिश विरोधी रणनीति की प्रेरणा रासबिहारी बोस व सुभाषचंद्र बोस को सावरकर द्वारा लिखित ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक से ही प्राप्त हुए थे। उसी को आदर्श रूप में सामने रखकर नेताजी ने रानी झांसी रेजीमेंट का गठन किया था। आजाद हिंद फौज के सेनाधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस पुस्तक का एक संस्करण विशेष रूप से छपवाकर सैनिकों को पढ़ने के लिए दिया जाता था। अंग्रेजी के अतिरिक्त एक तमिल संस्करण का प्रकाशन भी हुआ था। इस ग्रंथ का पाठन बार-बार किया जाता था। तमिल संस्करण का संपादन आजाद हिंद फौज के एक प्रचार अधिकारी जयमणि सुब्रह्मण्यम ने किया था। उन्होंने स्वयं ही बताया कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आशीर्वाद से ही वह संस्करण तैयार हुआ था। सावरकर द्वारा लिखित इतिहास की इस महान रचना ने सन् 1914 के गदर आंदोलन से 1943-44 की आजाद हिंद फौज तक कम-से-कम दो पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी। बंबई की ‘फ्री हिंदुस्तान’ साप्ताहिक पत्रिका ने मई 1946 में ‘सावरकर विशेषांक’ प्रकाशित किया, जिसमें के.एफ.नरीमन ने अपने लेख में स्वीकार किया कि ‘आजाद हिंद फौज की कल्पना और विशेषकर रानी रेजीमेंट के नामरण की मूल प्रेणा सन् 1857 की महान क्रांति पर वीर सावरकर की जब्तशुदा रचना में ही दिखाई देती है।’ ‘यदि सावरकर ने 1857 और 1943 के बीच हस्तक्षेप न किया होता तो मुझे विश्वास है कि आजाद हिंद फौज के ताजा प्रयासों को भी एक मामूली विद्रोह कह दिया गया होता। किंतु धन्यवाद है सावरकर की पुस्तक को कि ‘गदर’ शब्द का अर्थ ही बदल गया। यहां तक कि अब लॉर्ड वावेल भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के प्रयास को मामूली गदर कहने का साहस नहीं कर सकता। इस परिवर्तन का पूरा श्रेय सावरकर और केवल सावरकर को ही जाता है।’ द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद स्वतंत्रता की दस्तक सुनाई देने लगी थी। जनमानस में बहुत परिवर्तन आ गया था। महाराष्ट्र में सावरकर की सभी रचनाओं, विशेषकर ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पर से प्रतिबंध हटाने की मांग ने एक जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया। एक सावरकर-भक्त एम.एस.गोखले ने गुप्त रूप से इस पुस्तक को छापकर घोषणा कर दी कि यदि पुस्तक पर से प्रतिबंध न हटाया गया तो वे सार्वजनिक रूप से पुस्त की ब्रिकी करके प्रतिबंध के कानून का 18
उल्लंघन करेंगे। इस विषय पर प्रबल जन-भावनाओं को पहचानकर बंबई प्रांत की कांग्रेस सरकार ने मई 1946 में इस पुस्तक सहित सावरकर की सभी रचनाओं पर ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के अड़तीस वर्ष पुराने आदेश को रद्द कर दिया। तब कहीं जाकर जनवरी 1947 में महान् ऐतिहासिक ग्रंथ का प्रथम कानूनी संस्करण प्रकाशित हो पाया। 10 जनवरी, 1947 का जी.एम.जोशी ने जब इस पुस्तक के प्रथम अधिकृत कानूनी संस्करण की भूमिका में इस पुस्तक का रोमांचकारी इतिहास लिखा तब तक पुस्तक की मूल मराठी पांडुलिपि उपलब्ध नहीं हुई थी और यह मान लिया गया था कि सावरकर द्वारा 1901 में लिखित सिक्ख इतिहास की पांडुलिपि के समान यह भी सदा के लिए खो गई है। जी.एम.जोशी लिखते हैं कि "सावरकर की गिरफ्तारी के बाद मूल मराठी पुस्तक की पांडुलिपि को मैडम कामा के पास पेरिस भेज दिया गया थां उन्होंने ब्रिटिश गुप्तचर विभाग के एजेंटों के हाथ में पड़ने से बचाने के लिए उस पांडुलिपि को बैंक ऑफ फ्रांस में अपने लॉकर में सुरक्षित छिपा दिया। फ्रांस पर जर्मनी के आक्रमण के कारण फ्रांस का शासन-तंत्र बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। मैडम कामा की भी मृत्यु हो गई। फलतः बहुत खोजबीन के बाद भी उस पांडुलिपि कोई पता नहीं लग पाया। इस प्रकार मराठी साहित्य का एक महान् पुष्प खो गया और उसकी प्राप्ति की सभी आशाएं समाप्त हो गई।" किंतु वीर सावरकर के जीवनीकार धनंजय कीर के अनुसार, "भारत की स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद वह पांडुलिपि सावरकर के पास बड़े नाटकीय ढंग से वापस लौट आई।" उनके अनुसार, "अभिनव भारत' के एक सदस्य गोआ निवासी जे.डी.एस. कोरिन्हो फ्रांस स्थित पुर्तगाली दूतावास की सहायता से उन उथल-पुथल के दिनों में उस पांडुलिपि को लेकर पहले पुर्तगाल और वहां से अमेरिका पहुंच गए। वे वाशिंगटन के एक कॉलेज में शिक्षक हो गए। तमाम कठिनाइयों और संकटों से जूझकर भी उन्होंने अड़तीस साल तक इस बहुमूल्य पांडुलिपि को सुरक्षित संजोकर रखा और भारत के स्वाधीन होने पर डॉ. डी.वाई. गोहकर नामक एक सज्जन के माध्यम से उसे सावरकर के पास वापस भेज दिया।" हरींद्र श्रीवास्तव अपनी पुस्तक 'फाइव स्टोर्मी ईयर्स : सावरकर इन लंदन' में इस कहानी में इतनी जानकारी और जोड़ते हैं कि "डॉ. गोहकर उस समय अमेरिका में पढ़ रहे थे और अब महाराष्ट्र राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष हैं।" हरींद्र के अनुसार, " पांडुलिपि सावरकर को मई 1949में प्राप्त हुई; पर उसमें वे दो अध्याय नहीं थे, जिन्हें ब्रिटिश गुप्तचर तंत्र ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगने से पूर्व चोरी कर लिया था" उनका कहना है कि वीर सावरकर के भतीजे बालाराव सावरकर ने आवश्यक संशोधन करके मराठी ग्रंथ को भी प्रकाशित कर दिया है। 19
जनवरी 1947 के अंग्रेजी संस्करण में पुस्तक की यात्रा कथा को जी.एम.जोशी ने बालाराव के साथ मिलकर लिखा है। उस संस्करण के प्रकाशन की अनुमति स्वयं वीर सावरकर ने फोनिक्स प्रकाशन गृह को दी थी। तब वश्य ही जी. एम. जोशी एवं बाल सावरकर द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई पुस्तक-गाथा को वीर सावरकर ने देख लिया होगा। यहां कुछ प्रश्न खड़े होते है कि यदि मूल पांडुलिपि मैडम कामा के बैंक लॉकर में सुरक्षित थी तो वह कोरिन्हो के पास कब, कैसे पहुंची? यदि कीर के अनुसार, मई 1917 के पूर्व अड़तीस वर्ष वह कोरिन्हो के पास रही तो इसका अर्थ है कि सन् 1911 के लगभग ही वह उन्हें मिल गई होगी। मैडम कामा सन् 1935 में भारत आईं और 1916 में अपनी मृत्यु तक एक वर्ष तक यहां रहीं। उन दिनों वीर सावरकर जेल के बाहर रत्नागिरी जिले में स्थानबद्ध जीवन व्यतीत कर रहे थे। क्या उन दिनों मैडम कामा और उनका कभी कोई संपर्क नहीं हुआ? क्या मैडम कामा ने उन्हें पांडुलिपि कोरिन्हो को देने की बात नहीं बताई? जी.एम. जोशी के वर्णन से लगता है कि जानवरी 1947 तक बहुत खोजबीन के बाद भी उन पांडुलिपि का पता नहीं लग पाया था और उसे खोया हुआ मान लिया गया था। इसका अर्थ होता है कि एस समय तक वीर सावरकर को भी उस पांडुलिपि को कोई अता-पता नहीं था। क्या यह संभव है? दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि यदि मई 1949 में वापस मिली पांडुलिपि में दो अध्याय नहीं थे, क्योंकि वे ब्रिटिश गुप्तचरों द्वारा चोरी कर लिये गए थे, तो यह चोरी कब हुई होगी? प्रतिबंध का आदेश 23 जुलाई, 1909 को जारी हुआ। अंग्रेजी अनुवाद उसके पूर्व प्रकाशित हो चुका था। अंग्रेजी अनुवाद मराठी मूल के आधार पर ही हुआ होगा। क्या हम यह मान लें कि मराठी पांडुलिपि के दो अध्यायों की चोरी अंग्रेजी अनुवाद पूरा हो जाने के बाद हुई? अंतिम प्रश्न यह उठता है कि बालाराव सावरकर ने मराठी पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए उन दो अध्यायों को कैसे पूरा किया? क्या उन्होंने प्रकाशित अंग्रेजी अनुवाद का मराठी रूपांतर करके पुस्तक को पूरा किया? क्या उन्होंने प्रकाशित अंग्रेजी अनुवाद का मराठी रूपांतर करके पुस्तक को पूरा किया? वीर सावरकर 25 फरवरी, 1966 तक जीवित थे। 1947 में 1857 के स्वातंत्र्य समर का शताब्दी वर्ष भी उनके सामने मनाया गया। क्या उन्होंने मराठी ग्रंथ की पांडुलिपि के इतिहास पर कहीं कोई प्रकाश डाला? ये सभी प्रश्न पुस्तक के इतिहास को रहस्यपूर्ण बना देते हैं। 1957 में 1857 की क्रांति की शताब्दी के अवसर पर पुनः यह असमंजस खड़ा हुआ कि उस घटना को क्या कहें-गदर, क्रांति या स्वातंत्र्य समर? वरिष्ठ इतिहासकार आर.सी.मजूमदार ने उसे 'सिपाही विद्रोह' कहा तो उन्हीं के शिष्य डॉ, एस.बी.चौधरी ने उसे 'जन विद्रोह' का शीर्षक दिया। भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने उसे '1587 का विद्रोह' कहा। भारत सरकार ने विवाद से बचने के लिए इतिहासकार एस.एन. सेन द्वारा 20
लिखित पुस्तक में केवल '1587' जैसा नपुंसक शीर्षक अपनाया। पर, दो वर्ष बाद ही सन् 1959 में मास्को से सोवियत संघ ने अमेरिका के एक दैनिक पत्र 'न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून' में कार्ल मार्क्स एवं फ्रेडरिक एंगिल्स द्वारा 1857 की क्रांति पर लेखों का एक संकलन प्रकाशित किया और इस संकलन के लिए उन्होंने 'प्रथम भारतीय स्वातंत्र्य समर 1857-59' जैसा शीर्षक ही अपनाया। इधर सन् 1857 की घटना के स्वरूप को लेकर आर.सी. मजूमदार और उनके शिष्य एस.बी.चौधरी में जबरदस्त बौद्धिक बहस छिड़ गई, जिसका समापन करने के लिए एस.बी.चौधरी ने सन् 1965 में 'थ्योरीज ऑन इंडियन म्यूटिनी' नामक पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक में उन्होंने सन् 1857 से अब तक इस घटना के स्वरूप के बारे में जितने मत प्रतिपादित हुए थे और नामकरण किए गए थे, उन सभी की समीक्षा की। अंत में उन्होंने सावरकर द्वारा प्रस्तुत चित्रण और नामकरण को ही तथ्यों की कसौटी पर सही ठहराया।
यह सावरकर की ऐतिहासिक दृष्टि की भारी विजय थी। सन् 1909 में प्रकाशित प्रथम गुप्त संस्करण की भूमिका में सावरकर ने लिखा था कि यद्यपि उन्हें इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी व नेशनल म्यूजियम लाइब्रेरी में केवल ब्रिटिश सरकार के दस्तावेजों एवं ब्रिटिश लेखकों की पुस्तकों पर ही अवलंबित रहना पड़ा, किंतु उस पूर्वग्रह-युक्त विशाल सामग्री में भी उन्हें 'सिपाही विद्रोह' के परदे के भीतर एक सुनियोजित स्वातंत्र्य समर के स्पष्ट दर्शन तथ्यों में से कैसा नया चित्र उभर आता है, इतिहास-लेखन के क्षेत्र में उसका यह अत्युत्तम उदाहरण है। इसीलिए सावरकर की पुस्तक दो-दो स्वातंत्र्य समरों (1814 व 1943) का प्रेरणा-स्त्रोत बन गई।
देवेन्द्र स्वरूप
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ओ हुतात्माओं ! स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो एक बार पिता से पुत्र को पहुंचे बार-बार भले हो पराजय यदा-कदा पर मिले विजय हर बार। आज 10 मई है। 1857 के स्मरणीय वर्ष में आज के दिवस ही, ओ हुतात्माओ! आपके द्वारा भारतवर्ष की रणभूमि में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम अभियान का सूत्रपात किया गया था। अपनी पतनकारी दासता के भाव से जाग्रत हो हमारी मातृभूमि ने अपना खड्ग निकाल लिया था और बेड़ियों को भंग करते हुए अपनी मुक्ति और सम्मान हेतु प्रथम प्रहार किया था। आज ही के दिवस 'मारो फिरंगी को' का रणघोष कोटि-कोटी कंठों से गूंज उठा था। आज ही के दिवस मेरठ के सिपाहियों ने भयानक विद्रोह में शामिल होते हुए दिल्ली की ओर कूच किया था और सूर्य के प्रकाश में झिलमिलाते यमुना जल के दर्शन किए थे, और उन ऐतिहासिक पलों को आत्मसात् किया था तथा प्राचीन युग का अवसान कर नए युग का उदय किया था और "एक ही पल में अपने नेता, अपने ध्वज तथा एक कारण को प्राप्त कर लिया था और सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय व धार्मिक संग्राम में परिवर्तित कर दिया था।" ओ हुतात्माओ! समस्त सम्मान आपको प्राप्त हों, क्योंकि जाति के संरक्षण व सम्मान के लिए आपने उस समय क्रांति की कठोर अग्निपरीक्षा को सहन किया जब इस पावन भूमि के धर्मों पर बलात् व कुटिलतापूर्ण धर्मांतरण का संकट छा रहा था। जब पाखंडी ने अपने मित्रवत् आवरण को उतार फेंका था और विश्वासघाती शत्रु के घृणित रूप में नग्न खड़ा हो गया था तथा संधियों का उल्लंघन करने लगा था, मुकुटों को भंग करने लगा था और हमारी कृपालू मातृभूमि का उसकी निष्ठा के लिए उपहास करने लगा था, जिससे उसने मिथ्याभाषी गोरों के ढोंग का विश्वास किया था। 23
हे बलिदानियों! तभी आपने माता को जाग्रत किया, प्रेरित किया और माता के हेतु ही ‘मारो फिरंगी को' के रणघोष के साथ भयावह व विशाल रणभूमि की ओर प्रस्थान किया। आपके ध्वज पर ईश्वर और हिंदुस्तान का पवित्र मंत्र था। संग्राम में आपने नेक कार्य किया, क्योंकि भले ही आपका रक्तपात होने से बच जाता, लेकिन दासता का दंश कहीं अधिक गहरा होता। आत्मबलहीन धैर्य की अभिशापित श्रृंखला में एक और कड़ी जुड़ जाती। समस्त विश्व घृणा से हमारे राष्ट्र की ओर उंगली उठाता और कहता, ‘‘ भारत दासता का अधिकारी है। वह दासता में ही प्रसन्न है, क्योंकि 1857 में भी अपने हित और अपने सम्मान की रक्षा हेतु वह उठ खड़ा नहीं हुआ।’' इसीलिए आज के दिवस को ओ हुतात्माओं! आपकी प्रेरणादायी स्मृति को समर्पित करते हैं। आज ही के दिन आपने एक नवीन ध्वज उठाया था, जिसे ऊंचा रखना है; एक मिशन का उद्घोष को अंगीकार करते हैं; हम आपके ध्वज की उपासना करते हैं; ‘विदेशी को भगाने’ के उस कठिन मिशन को जारी रखने के लिए हम दृढ़-संकल्प हैं जिसका आपने क्रांतिकारी युद्ध की पैगंबरी गर्जनाओं के बीच उद्घोष किया था। हां, यह एक क्रांतिकारी युद्ध था, क्योंकि 1857 का संग्राम तब तक नहीं थमेगा जब तक कि क्रांति न हो जाए, दासता को धूल में न मिला दिया जाए, दासता को धूल में न मिला दिया जाए और स्वतंत्रता को सिंहासनारूढ़ न कर लिया जाए। जब कभी कोई व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता के लिए जाग्रत होता है; जब कभी स्वतंत्रता का बीज उसके पिता के लहू में अंकुरित होता है और जब कभी एक भी सच्चा पुत्र अपने पिता के रक्त का प्रतिरोध लेने के लिए जीवित, तब तक ऐसे संग्राम का कभी अंत नहीं हो सकता। क्रांतिकारी युद्ध में कोई विराम नहीं है। स्वतंत्रता अथवा मृत्यु मिलने पर ही इसका अंत होता है। आपकी स्मृति से प्रेरित हम 1857 में आपके द्वारा आरंभ संग्राम को परिणति तक ले जाने को कृतसंकल्प हैं। हम अस्त्र-शस्त्रों के बल प्रथम अभियान के युद्धों के रूप में देखते हैं। इनमें मिली पराजय संग्राम की पराजय नहीं हो सकती है। क्या विश्व यह कहेगा कि भारत ने पराजय को अंतिम पराजय के रूप में स्वीकार कर लिया है? क्या सन् 1857 में बहाया गया रक्त व्यर्थ का रक्तपात था? क्या भारतभूमि के पुत्रों ने अपने जनकों की शपथ को मिथ्या सिद्ध कर दिया? नहीं, हिंदुस्तान की सौगंध, नहीं। भारतीय राष्ट्र की ऐतिहासिक निरंतरता भंग नहीं हुई है। 10 मई, 1857 को समाप्त नहीं हो गया और न ही यह तब तक समाप्त होगा जब तक कि ऐसी कोई 10 मई नहीं आती है, जो हमारे संकल्प के साकार होने की साक्षी हो; जो हमारे सुंदर भारत के शीर्ष पर विजय का जगमगाता मुकुट अथवा २४
बलिदान की आभा को देख ले। किंतु हे गरिमामय हुतात्माओ! अपने पुत्रों के इस पावन संग्राम में सहायता करो। अपनी प्रेरक उपस्थिति से हमारी सहायता करो। अनगिनत क्षुद्र स्वार्थों से विदीर्ण होकर हम भारत माता की महान् एकता को कभी भी साकार नहीं कर सकेंगे। हमारे कर्णों में वह मंत्र उच्चरित करो, जिसके जादू से आपने एकता के रहस्य को प्राप्त कर लिया था। बताओ कि किस प्रकार फिरंगी शासन छिन्न-भिन्न हो गया था और हिंदुओं-मुसलमानों की आम सहमति से स्वदेशी सिंहासन स्थापित हो गए थे। किस प्रकार मातृभूमि के उच्चतर प्रेम ने जाति और नस्लों के अंतर को दूर कर दिया था। किस प्रकार पूज्य और पूजनीय बहादुरशाह ने समस्त भारतवर्ष में गौ वध को प्रतिबंधित कर दिया था। किस प्रकार दिल्ली के सम्राट् को तोप-गर्जना की प्रथम सलामी के पश्चात् श्रीमंत नाना साहब ने द्वितीय सलामी को अपने लिए आरक्षित कर लिया था। किस प्रकार आपने मातृभूमि के ध्वज तले संगठित होकर समस्त विश्व को अचंभित कर दिया था और अपने शत्रुओं को भी यह कहने के लिए बाध्य कर दिया था कि इतिहासकारों व प्रशासकों को भारतीय सैन्य-क्रांति द्वारा सिखाए गए अनेक पाठों में कोई भी इस चेतावनी से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है-“अब ऐसी क्रांति संभव है, जिसमें ब्राह्मण व शुद्र तथा हिंदू-मुसलमान सभी हमारे विरूद्ध एक साथ संगठित हों और यह मानना सुरक्षित नहीं है कि हमारे आधिपत्य की शांति व स्थिरता बहुत सीमा तक उस महाद्वीप पर निर्भर है, जिसमें विभिन्न धर्मोंवाली विभिन्न जातियां निवास करती हैं, क्योंकि वे एक-दूसरे को समझती हैं और एक-दूसरे की गतिविधियों का सम्मान करती हैं और उनमें शामिल होती हैं। सैनिक विद्रोह हमें स्मरण कराता है कि हमारा शासन एक पतली पर्पटी पर आधारित है, जो सामाजिक परिवर्तनों और क्रांतियों की भीषण ज्वालाओं के द्वारा कभी भी विदीर्ण हो सकता है।‘' 1 हमारे कर्णों में धर्म और देशभक्ति ऐसे गठबंधन की कुलीनता का मंत्र उच्चरित करो; वह सच्चा धर्म, जो सर्वदा देशभक्ति का पक्षधर है; वह सच्ची देशभक्ति, जो धर्म की स्वतंत्रता को सुरक्षित करती है। हमें वह अत्युत्तम ऊर्जा प्रदान करो, वह साहस व गोपनीयता प्रदान करो, जिसके बल पर आपने शक्तिशाली ज्वालामुखी को संगठित किया; हमें उस ज्वालामुखीय लावा के दर्शन कराओ, जो पतली व हरी पर्पटी के नीचे दबा है, जिस पर शत्रु को झूठी सुरक्षा के भ्रम में रखा जा सकता है। हमें बताओ कि किस प्रकार भारत के भयावह विरोध की प्रतीक चपाती गांव-गांव और घाटी-घाटी घूमी थी, जिसने राष्ट्र की समूची प्रज्ञा को अपने संदेश की अस्पष्टता से प्रज्वलित कर दिया था। तत्पश्चात् हमें श्रवण करने दें उस दहाड़ती हुई गर्जना का, जिसके साथ ज्वालामुखी अंततः फूट पड़ा था अपने समस्त ध्वंसकारी बल के साथ और जो अपने रक्त-तत्व लावा 25 1 जॉर्ज विलियम फॉरेस्ट, स्टेट पेपर्स (अनेक श्रृंखलाएं)।
प्रवाह में सभी को छिन्न-भिन्न करता, जलाता और भस्म करता चला गया था। एक माह के भीतर रेजीमेंट-पर-रेजीमेंट, रजवाड़ों-पर-रजवाड़े, नगर-पर-नगरए सिपाही, पुलिस, जमींदार, पंडित, मौलवी और बहुमुखी क्रांति ने घंटानाद कर दिया था और मंदिरों तथा मस्जिदों में एक ही घोष गूंज रहा था-मारो फिरंगी को!' मेरठ जागा, दिल्ली जागी; बनारस, आगरा, पटना, लखनऊ, इलाहाबाद, जगदलपुर, झांसी, बांदा, इंदौर-सभी नगर जाग उठे-पेशावर से कलकत्ता और नर्मदा से हिमालय तक यह ज्वालामुखी के एक धधकते लावा के रूप में फूट पड़ा। तत्पश्चात्, ओ हुतात्माओ! हमें उन छोटी-बड़ी त्रुटियों के बारे में बताओ जो आपको इस महान् परीक्षण के दौरान हमारे सेनानियों में मिली। परंतु सर्वोपरि, उस सर्वाधिक घातक-नहींए, उस एकमात्र कमी की ओर भी इंगित करो, जो हमारे राष्ट्र के हित में संग्राम में शामिल होने के मार्ग पर चलने से इन्कार कर दिया। करो कि हिंदुस्तान की पराजय का एकमात्र कारण हिंदुस्तान था, कि शताब्दियों कि निद्रा से जागकर माता शत्रु पर प्रहार करने को उठी; पर जब उसका दाहिना हाथ फिरंगियों को मौत के घाट उतार रहा था, उसका वाम हस्त शत्रु पर नहीं बल्कि उसी के मस्तक पर प्रहार कर रहा थां इसीलिए माता डगमगाई और पचास वर्षों की अवश्यंभावी मूर्च्छा में धराशायी हो गई। पचास वर्ष व्यतीत हो गए, परंतु हे अशांत शूरवीरों ! विश्वास करो कि तुम्हारी हीरक जयंती तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति किए बिना नहीं संपन्न होगी। हमने तुम्हारी गर्जना को सुना है और हम उससे साहस प्राप्त करते हैं। अपने सीमित साधनों के बल पर आपने न केवल निरंकुश शासन के, बल्कि निरंकुश शासन और विश्वासघात दोनों के विरूद्ध लंबा युद्ध लड़ा। दोआब और अयोध्या ने संगठित होकर न केवल ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध संग्राम छेड़ा, बल्कि शेष भारत के विरूद्ध भी संग्राम छेड़ा। आपने तीन वर्षों तक युद्ध लड़ा और हिंदुस्तान का ताज फिरंगियों से लगभग छीन लिया था तथा विदेशी शासन के खोखले अस्तित्व को चकनाचूर कर दिया था। कितना कड़ा पराक्रम है यह! दोआब और अयोध्या जो काम एक माह में कर सकते थे, वही कार्य समूचे हिंदुस्तान का एक संगठित, आकस्मिक और संकल्पित जागरण एक दिन में ही कर सकता है। यही प्रत्याशा हमारे अंतर को प्रकाशित करती है और हमें सफलता का आश्वासन देती है तथा इसलिए हम सशपथ यह घोषणा करते हैं कि तुम्हारा हीरक जयंती वर्ष पुनरोदयी भारत को विजयी भाव के साथ विश्व में पर्दापण करते हुए देखे बिना नहीं व्यतीत होगा। बहादुरशाह की अस्थियां अपनी कब्र से प्रतिशोध का आह्वान कर रही हैं। मंगल पांडे की आत्मा अभी भी सलीब पर से पवित्र मिशन की पूर्ति के लिए पुकार रही है। 26
निडर लक्ष्मीबाई का रक्त क्रोध से उबल रहा है। कुंवर सिंह की ब्रिटिश शासन को छिन्न-भिन्न करने की एकमात्र प्रतिज्ञा आज भी हिंदुस्तान की हवा में गूंज रही है। अजीमुल्ला खान और वीर अली शाह के तन से निकली रक्त-धाराओं ने इतिहास के पृष्ठों पर अमिट छाप छोड़ी है। क्योंकि जब अपना अपराध स्वीकार करने और युद्धनीति के रहस्यों को प्रकट करने से इंकार करने पर वीर तात्या टोपे को फांसी के फंदे पर ले जाया जा रहा था तो फिरंगियों के मुंह पर ही उन्होंने ये पैगंबरी शब्द बोले थे- “आज आप मुझे फांसी पर लटका सकते हैं-आप हर दिन मेरे जैसे अन्य लोगों को भी फांसी पर लटका सकते हैं; परंतु मेरे जैसे अन्य लोगों को भी फांसी पर लटका सकते हैं; परंतु मेरे स्थान पर हजारों क्रांतिकारी उत्पन्न होंगे और आपका उद्देश्य कभी भी पूरा नहीं होगा।‘’ हे भारतीय जन! इन शब्दों को पूरा किया जाना चाहिए। ओ हुतात्माओ! हमारे रक्त का प्रतिशोध अवश्य लिया जाएगा।
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अनुक्रम भाग- 1 : ज्वालामुखी 31
- स्वधर्म और स्वराज्य 33
- कारण परंपरा डलहौजी 44
- नाना साहब और लक्ष्मीबाई 46
- अवध 53
- धकेलो उसमें ़ ़ 62
- अग्नि में घी 72
- गुप्त संगठन 78 भाग-2 : विस्फोट 93
- शहीद मंगल पांडे 95
- मेरठ 100
- दिल्ली 107
- मध्यांतर और पंजाब 115
- अलीगढ़ और नसीराबाद 140
- रूहेलखंड 148
- बनारस और इलाहाबाद 154
- कानपुर और झांसी 176
- अवध का रण 204
- संकलन 218 भाग-3 : अग्नि-कल्लोल 233
- दिल्ली लड़ती है 235
- हैवलॉक 250
हिन्दू धर्म और हिंदू राज्य के लिए फिर एक बार जूझना होगा 257 3. बिहार 259 4. दिल्ली हारी 272 5. लखनऊ 284 6. तात्या टोपे 307 7. लखनऊ का पतन 316 8. कुंवर सिंह और अमर सिंह 333 9. मौलवी अहमद शाह 348 10. रानी लक्ष्मीबाई 357 भाग-4 : अस्थायी शांति 391
- विहंगावलोकन 393
- पूर्णाहुति 404 यत्र-तत्र तात्या टोपे 404
- समारोप 419
भाग-9 ज्वालामुखी प्रकरण -9
स्वधर्म और स्वराज्य धर्मासाठी मरावे, मरोनि अवघ्यांसी मारावें। मारिता मारित घ्यावें, राज्य आपुलें।। —स्वामी रामदास अर्थात्– धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें; मारते–मारते जीतें, राज्य अपना। कोई छोटा सा घर बनाना तो भी इतनी मजबूत नींव तो बनाई ही जाती है कि वह उसका भार सह सके। नींव मजबूत और घर का भार संभालने योग्य न हो तो उस नींव पर निर्मित मकान ताश के तंबू से अधिक भव्य या विशाल कभी भी नहीं माना जा सकता, यह बात अशिक्षित–गंवार भी जानता है। परंतु किसी सामान्य मनुष्य को भी ज्ञात यह व्यवहारज्ञान भुलाकर जब कोई लेखक प्रचंड क्रांति मंदिर किसी घास के तिनके पर निर्मित था–तो या तो वह पागल होता है या फिर क्षुद्र प्राणी। वह इन दोनों विशेषणों में से किसी एक का भी पात्र हो तो इतिहास–लेखन के पवित्र कार्य के लिए पूरी तरह अयोग्य है। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 33
बड़ी-बड़ी धर्म क्रांतियों या राज्य क्रांतियों के सतही स्वरूप में विहिप असंबद्धता या असमानता की निरंतरता उन क्रांतियों के मूल तत्त्व को समझे बिना कभी भी समझ में नहीं आ सकती। अनेक चक्र और अनेक लौह मार्गोंवाला कोई विशाल संयंत्र प्रचंड शक्ति से काम करता हो तो वह शक्ति किस यंत्र-शास्त्रीय नियम से उत्पन्न की गई है, यह पूर्ण रीति से समझे बिना देखनेवालों को आश्चर्य-मिश्रित विस्मय होगा। उसे ज्ञान से प्राप्त समझ या बूझ कभी नहीं कहा जा सकता। फ्रांस की राज्य क्रांति या हॉलैंड की धर्म क्रांति जैसी अद्भुत घटनाएं जब पाठकों एवं लेखकों को अपनी भव्यता से चकित करती हैं तब उनकी उस भव्यता में हक्का-बक्का होकर पाठक की दृष्टि और लेखक की लेखनी भी उसके मूल शक्ति-स्रोत को देखने-दर्शाने की हिम्मत नहीं कर पाती। परंतु उस मूल शक्ति को जाने बिना उस क्रांति का वास्तविक रहस्य कभी भी समझ में नहीं आता, अतः इतिहास शास्त्र में वर्णन से अधि कमूल स्रोत को दर्शाने ही अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। यह मूल स्रोत दर्शाने हुए बहुत बार इतिहास-लेखक और एक चूक करते हैं। प्रत्येक कार्य में कुछ प्रत्यक्ष, कुछ अप्रत्यक्ष, कुछ विशिष्ट और कुछ सामान्य, कुछ आकस्मिक और कुछ प्रधान कारण निहित होते हैं और उनका वर्गीकरण करने में ही इतिहास-लेखक का वास्तविक कौशल होता है। परंतु कुछ इतिहासकार यहां भ्रमित होकर इस वर्गीकरण में आकस्मिक कारणों को प्रधान कारण का स्वरूप दे देते हैं। किसी घर को आग लगने पर उस आग को लगानेवाले व्यक्ति को छोड़ उसके हाथ की माचिस की तीली पर सारा आरोप लादनेवाले मूर्ख न्यायाधीश की तरह वह इतिहासकार भी हास्यास्पद हो जाता है। आकस्मिक कारण को ही प्रधान कारण मानकर किसी ऐतिहासिक घटना का इतिहास लिखने से उस घटना न कुछ कारणों से घटित हुई देखकर उस घटक और उसमें सम्मिलित व्यक्तियों के लिए तुच्छ भावना उत्पन्न होने लगती है। इसलिए ऐतिहासिक घटनाओं का--और विशेषकर क्रांतिकारी घटनाओं का-इतिहास लिखते समय उसका केवल वर्णन लिखने से उकसी समुचित कल्पना प्रस्तुत करना संभव नहीं होता या उसका उद्गम उसके निमित्त कारण तक ही खोजकर लौट आने से भी उसका यथार्थ स्वरूप ज्ञात नहीं होता। अतः जिसे सत्य, पक्षपात-रहित और मर्मस्पर्शी इतिहास लिखना हो, उसे उस घटना और उस क्रांति की ज्वाला की नींव के कारणों का, उसके मूल में क्या तत्त्व थे, उसके प्रधान कारण क्या थे-इन सबका पर्यालोचन अवश्य करना चाहिए। 'हर क्रांति की नींच में कोई-न-कोई तत्त्व होना ही चाहिए' -इटली के प्रख्यात दार्शनिक और देशभक्त मैजिनी ने कार्लाइल लिखित फ्रांसीसी राज्य क्रांति की एक पुस्तक पर टीकात्मक लेख में ऐसा कहा है। क्रांति अथवा इतिहास में मनुष्य जाति के जीवन की उठा-पटक होती है। जिसके लिए लाखों जूझते हैं, राजसिंहासन जिस कारण डगमगाते हैं, 1857 का स्वातंत्र्य समर - 34
स्थापित मुकुट लुढ़कते हैं, अजन्मे मुकुट सिर चढ़ते हैं, स्थापित मूर्ति भंग होकर नई मूर्ति की स्थापना भी जिसके कारण होती है और प्रचंड समूह को लगने लगता है कि इसके आगे रक्त बहाना तो कुछ भी नहीं, ऐसे किसी विक्षोभक तत्त्व के सिवाय किसी अन्य क्षुद्र व क्षणिक नींव पर क्रांति के भव्य भवन का निर्माण असंभव है। पर क्रांति की नींव का यह तत्त्व जिस प्रमाण में पवित्र या अपवित्र होता है उसी प्रमाण में उस क्रांति के कार्यकर्त्ता-व्यक्ति के स्वरूप और कृत्य भी पवित्र या अपवित्र होते हैं। हेतु से जैसे कृत्य की परीक्षा सामान्य व्यवहार में की जाती है उसी तरह इतिहास में भी व्यक्ति या राष्ट्र के हेतु की परीक्षा सामान्य व्यवहार में की जाती है उसी तरह इतिहास में भी व्यक्ति या राष्ट्र के हेतु से उसके कृत्य का स्वरूप निश्चित होता है। यह कसौटी यदि छोड़ दे तो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को मारना या किसी एक सेना द्वारा दूसरी सेना को मारने में कोई भेद नहीं रहेगा। साम्राज्य के लिए सिकंदर की चढ़ाई और इटली की स्वतंत्रता के लिए गैरीबाल्डी द्वारा की गई चढ़ाइयां दोनों समान हेतु समझ लेना आवश्यक है उसी तरह हर क्रांति का यथोचित परीक्षण विवेचन करने के लिए उसका हेतु क्या था, अंतर्निहित इच्छा क्या थी, किस तत्त्व दर्शन से उसका उद्भव हुआ था, यह सब जानना आवश्यक है। सारांश यह कि ऐतिहासिक क्रांति के इतिहासकार को उस क्रांति में असंबद्ध दिखाई देनेवाले प्रसंगों को या उनकी अद्भुतता को देखकर विस्मित होकर वहीं बैठ नहीं जाना चाहिए, अपितु उसके उद्गम की खोज करते जाना चाहिए। इतना ही नहीं अपितु उस खोज में असंगत एवं आकस्मिक रूप से निकल आई शाखा को छोड़कर मूल के विस्तीर्ण प्रदेश का निरिक्षण करना चाहिए। इस तरह प्रारंभ किए जाने पर अनेक असंबद्ध घटनाओं में पूर्ण संबद्धता दिखने लगती है, वक्र लगने लगती है। अंधकार में प्रकाश दिखने लगता है और प्रकाश में अंधेरा दिखाई देता है। नीचता में उच्चता और उच्चता में नीचता दृष्टिगोचर होती है, विद्रूपता में सुरूपता और सुरूपता में विद्रूपता मिलती है और अपेक्षित या अनपेक्षित रीति से परंतु स्पष्ट स्वरूप में वह क्रांति इतिहास के सामने आती है। सन् 1857 जैसी प्रचंड क्रांति बिना हेतु के घटित होना संभव है क्या? पेशावर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 35
से कलकत्ता तक जो आंधी चली उसका हेतु इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि से अपनी सामर्थ्य भर कुछ खास चीजों को नष्ट कर देना है। दिल्ली पर डाले गए घेरे, कानपुर में हुए कत्ल, साम्राज्य के ऊंचे उठे ध्वज और उस ध्वज की छाया में लड़ते-लड़ते रणतीर्थ में शूरों द्वारा लगाई गई छलांगे जैसी उदात्त एवं स्फूर्तिजनक घटनाएं किसी एक अति उदात्त एवं स्फूर्तिजनक हेतु के बिना संभव थी क्या? कोई हर हफ्ते लगनेवाला बाजार भी अकारण नहीं लगता। फिर जिस बाजार का आयोजन करने की तैयारी वर्षों से चल रही थी, जिसकी दुकानें पेशावर से कलकत्ता तक के हर सिंहासन पर सजनेवाली थीं, जिसमें राज्य और साम्राज्य का लेन-देन चल रहा था और जहां रक्त और मांस के सिक्कों के सिवाय और किसी सिक्के की पूछ नहीं थी-वह बाजार क्या यों ही लगा और यों ही उठ गया? ऐसा नहीं हो सकता। ज्ञात होना बहुत कठिन है, इसलिए नहीं अपितु वह ज्ञात हुआ, यह मानना अपने हित में न होने के कारण इस मुद्दे की ओर अंग्रेज़ इतिहासकारों ने दुर्लक्ष्य किया है। परंतु इस दुर्लक्ष्य से भी अधिक उलझानेवाली और सन् 1857 के क्रांतियुद्ध के स्वरूप को सर्वाधिक भ्रष्ट करनेवाली दूसरी युक्ति या चूक विजातीय एवं उनकी धूल ओढ़नेवाले स्वजातीय इतिहासकारों ने जो की है, वह यह है कि इस सन् 1857 के प्रलय का कारण दूसरा कुछ नहीं, मुट्ठी भर लालची लोगों द्वारा उठाई गई कारतूसों की अफवाह है। अंग्रेज़ इतिहासकार और अंग्रेज़ों की कृपा पर पले-बढ़े एक देसी ग्रंथकार कहते हैं-कारतूसों में गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, केवल इतना सुनकर ही मूर्ख लोग भड़क गए। सुनी हुई बात सच है या झूठ, इसकी खोज किसी ने नहीं की। एक ने कहा, इसलिए दूसरे ने कहा और दूसरा बिगड़ गया इसलिए तीसरा बिगड़ गया। ऐसी अंधपरंपरा चली जिससे अविवेकी मूर्खों का समाज जमा हुआ और विद्रोह हो गया। कारतूसों की बात पर लोगों ने अंधपरंपरा से विश्वास किया या क्या हुआ, इसका निर्णय आगे यथास्थान किया जाएगा, परंतु ये सच्चे या झूठे विश्वास विद्रोह की जड़ें थीं, यह विचार उत्पन्न करने का कैसा सुदीर्घ प्रयास चल रहा था, यह इससे स्पष्ट होता है। सन् 1857 जैसी प्रचंड क्रांति ऐसे कारणों से उत्पन्न होगी, यह कहनेवाले मंद या कुटिल बुद्धि के लोगों को क्रांति एक अविवेकी मूर्खों का समाज लगता है; लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यदि सन् 1857 की क्रांति मुख्यतः कारतूसों के कारण ही प्रदीप्त हुई तो उसमें नाना साहब, दिल्ली का बादशाह, झांसी की रानी या रोहिलखंड का खान बहादूर कैसे सम्मिलित हुए? इनको अंग्रेजी सेना में नौकरी करनी नहीं थी या घर बैठे भी वह फौजी कारतूस तो तोड़ने ही होंगे, ऐसा आदेश भी किसी ने उन्हें नहीं दिया था। यदि यह विद्रोह केवल या मुख्य रूप से कारतूसों की चरबी से ही हुआ था तो हिंदुस्तान के अंग्रेज गवर्नर द्वारा उसे उपयोग में न लाने का आदेश देते ही उसे तुरंत ठंडा हो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 36
जाना चाहिए था। पर सिपाही अपने हाथ से अपने कारतूस बना लें, ऐसी अनुमति मिलने पर भी उसका उपयोग न कर या सेना की नौकरी छोड़ सारी किटकिट से परे न हटकर सेना के सिपाहियों ने ही नहीं बल्कि सेना से जिनका दूर का भी संबंध नहीं था-ऐसे लाखों लोगों ने, राजा-महाराजाओं ने अपने प्राण रणभूमि पर क्यों अर्पित किए? फौजी और सामान्य जन, राजा और रंक, हिंदू और मुसलमान-इन सबको एक साथ आवेशित करनेवाली बातें क्षुद्र नहीं होती, उसके मूल में होते हैं तात्त्विक कारण। कारतूसों का डर ही विद्रोह का प्रमुख कारण है-इस कथन में जितनी अर्थयार्थता है उतनी ही इस तर्क में भी कि उस विद्रोह का उद्गम केवल अवध का राज छीनने में था। अवध के राज्य के हित-अहित से जिनका कुछ भी संबंध नहीं था, ऐसे कितने ही लोग इस भयंकर क्रांति में सिर हाथ पर लिये लड़ रहे थें फिर उस लड़ाई से उनका क्या हेतु था? स्वयं अवध का नवाब तो कलकत्ता के किले में बंद था और उसकी प्रजा अंग्रेज इतिहासकारों के कथनानुसार नवाब के शासन से बेहद नाखुश थी। फिर पंजाब से बंगाल तक केवल राजा या लश्कर के लोग ही नहीं अपितु हर असल हिंदू व्यक्ति अपनी शमशीर ताने क्यों खड़ा था? सन् 1857 की क्रांति पर लिखा एक लेख किसी हिंदू ने उसी समय इंग्लैंड में प्रकाशिात कराया था। उसमें वह हिंदू कहता है-"जिन्होंने अवध के नवाब को जन्म से भी कभी नहीं देखा था और न आगे देखने की संभावना थी, ऐसे कितने ही सरल और दयालु लोग अपनी-अपनी झोंपड़ियों में नवाब पर आ पड़े दुःखों को कहते जार-जार रोते थे, इसकी कल्पना आपको नहीं हैं। और ऐसे आंसू बह जाने के बाद, जैसे स्वयं पर ही क्रूर प्रहार हो रहे हों, ऐसा मानकर वाजिद अली शाह के अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा कितने सिपाही प्रतिदिन कर रहे थे, यह भी आपको ज्ञात नहीं˙ ˙ ˙ ˙।”² इन सिपाहियों को उससे सहानुभूति क्यों होने लगी और जिन्होंने नवाब को जन्म से नहीं देखा था उनकी आंखें और कंठ क्यों भर आए? अतः अवध का राज्य हड़पने से विद्रोह नहीं उपजा अपितु इन राज्यों को हड़पने में जिस तत्त्व का हनन हो रहा था 1857 का स्वातंत्र्य समर – 37 ² यह लेख इंडिया ऑफिस के ग्रंथालय में है। यह लेख अनेक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस लेख में से निम्न उद्धरण दिए बगैर रहा नहीं जाता- “Your (Englishmen’s) conduct has all along been mean and pettifogging. Your accuse our ancient moghul rulers of despotism. They were despotic to some extent; but on the whole, they knew how to goern an empire&you know to keep a shop. They has a large mind; you have an ingenious and a crafty one. They could conceive of grand projects. Despite their faults, they were loved by a grand people like us. They settled in the country and tried to improve it. Your servants come here only to make money and go home as soon as they have satisfied themselves on the score. Indeed, in as much as we have come to know you, we have learnt to dispise you. With increasing knowledge we have known that the Anglo-Saxon race is selfish and gypocritical in the extreme and always unprincipled in matters of gain!” यह लेख करीब 25 पृष्ठों का है और दि. 13.10.1857 को प्रकाशित हुआ है।