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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

उसके कारण विद्रोह उपजा। कारतूसों का डर या अवध का राज्य हड़पना गौण औ आकस्मिक कारण थे। इन्हीं को प्रधान कारण मानने से सन् 1857 की क्रांति का वास्तविक स्वरूप कभी भी ज्ञात नहीं हो पाएगा। इन निमित्त कारणों को ही मूल कारण मान लें तो उसका अर्थ यह होगा कि यदि ये विशिष्ट कारण घटित या अवध का अधिग्रहण न किया गया होता तो सन् 1857 की क्रांति घटित न होती। परंतु इस प्रकार के विचार से अधिक भ्रामक और मूर्खतापूर्ण अन्य कोई मान्यता मिलना असंभव है। कारण, उस डर के मूल में छिपा तत्त्व यदि किसी और घटना द्वारा प्रकट हो जाता तो भी यह क्रांतियुद्ध होता ही, भले ही अवध का राज्य हड़पा न गया होता। फ्रांस देश की राज्य क्रांति का प्रधान कारण जैसे अनाज के बढ़े हुए मूल्य या बास्तील या राजा का पेरिस छोड़कर जाना या दावतों का रंग नहीं था वैसे ही उपर्युक्त आकस्मिक एवं विशिष्ट घटनाएं इस प्रचंड क्रांति के प्रधान कारण न होकर केवल निमित्तभूत कारण हैं। जैसे सीता-हरण रामायण का केवल निमित्त है और मुख्य या प्रधान कारण उसके मूल में छिपे तत्त्व ही हैं। वे तत्त्व कौन से थे? हजारों शूरों की तलवारों को उनकी म्यानों से खींचकर रणांगण में चमचमानेवाले वे तत्त्व कौन से हैं? निस्तेज हुए मुकुटों को सतेज करनेवाले और टूटे पड़े ध्वजों को फिर से खड़ा करनेवाले वे तत्त्व कौन से थे जिनपर हजारों व्यक्तियों ने अपने उष्ण रक्त का अभिषेक करना वर्षानुवर्ष अखंड प्रेम से चालू रखा है, ऐसे तत्त्व कौन से थे? मौलवी जिनका उपदेश करते थे, ब्राह्मण जिन्हें 'विजयी भवः' कहकर आशीर्वाद देते थे, दिल्ली की मस्जिद से और काशी के मंदिरों से जिनकी यशःप्राप्ति के लिए परमेश्वर की ओर दिव्य प्रार्थनाएं भेजी जाती थी, जिनकी सहायता के लिए श्रीमंत हनुमानजी ने स्वयं कानपुर के रण-मैदान पर हुंकार भी और जिनके लिए झांसी की महालक्ष्मी ने शुंभ-निशुंभ के रक्त से भीगी अपनी पुराण-प्रसिद्ध तलवार फिर से चलाई, ऐसे वे तत्त्व कौन से थे? सन् 1857 की क्रांति के प्रधान कारण जो दिव्य तत्त्व थे-स्वधर्म व स्वराज्य। अपने प्राणप्रिय धर्म पर भयंकर, विघातक एवं कपटपूर्ण हमला हुआ है, यह यथार्थ दिखते ही स्वधर्म-रक्षणार्थ जो 'दीन-दीन' की गर्जना शुरू हुई उस गर्जना में और अपनी प्रकृति दत्त स्वतंत्रता के कपटपूर्ण छीने जाने पर और अपने पैरों में पड़ी राजनीतिक गुलामी की जंजीरें देखते ही स्वराज्य प्राप्त करने की पवित्र इच्छा उत्पन्न होने के कारण इस दास्य श्रृंखला पर जो प्रचंड आघात किए गए उन्हीं में इस क्रांतियुद्ध की जड़ें हैं। स्वधर्म-प्रीति एवं स्वराज्य-प्रीति के तत्त्व हिंदुस्थान के इतिहास में जितनी स्पष्टता से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 38

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (transcription) दिया जा रहा है:

एवं उदात्तता से दिखते हैं उससे अधिक वे किस इतिहास में मिलनेवाले हैं? विदेशी और स्वार्थी इतिहासकारों ने इस दिव्य हिंद का चित्र कितने ही गंदे रंगों से भरा हो, फिर भी जब हमारे इतिहास के पृष्ठों पर से चित्तौड़ का नाम पोंछा हुआ नहीं है, सिंहगढ़ का नाम मिटा नहीं है, प्रताप आदि का नाम मिटा नहीं हैं या गुरू गोविन्द सिंह का नाम पोंछा नहीं गया है, तब तक ये स्वधर्म और स्वराज्य के तत्त्व हिंदुस्थान के रक्त-मांस में जमे रहेंगे। उनपर क्षण भर गुलामी के भ्रम के बादल चाहे आएं-सूर्य पर भी बादल आते हैं-परंतु वह क्षण समाप्त होते-न-होते उस तत्व सूर्य की उष्णता से वे पिघल जाएंगे, इसमें शंका नहीं। स्वराज्य के लिए हिंदुस्थान ने कौन सा प्रयास नहीं किया और स्वधर्म के लिए हिंदुस्थान ने कौन सी दिव्यता अंगीकार नहीं की। ˙˙˙"सूरा सो पचालिए जो लढ़े दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे तबहु न छोड़े खेत।''(गुरू गोविंद सिंह) इस रीति से स्वधर्म के लिए रण-मैदान में टुकड़े-टुकड़े हो जाने पर भी जो हटते नहीं-वीरों की ऐसी घटनाओं से भारतभूमि का संपूर्ण इतिहास भरा हुआ है। इस परंपरागत एवं तत्त्व का संचार होने के लिए सन् 1857 के वर्ष में जितने कारण घटित हुए उतने पहले कुछेक बार ही घटित हुए थे। इन विशिष्ट घटनाओं से हिंद भूमि के शरीर में किंचित् प्रस्फुरण हुआ, इन मनोवृत्तियों को विलक्षण चेतना मिली और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लोक-शक्तियां सज्जित होने लगी। दिल्ली के बादशाह द्वारा स्वराज्य-स्थापना के लिए जारी घोषणापत्र में वे कहते हैं और अपने प्राणप्रिय धर्म एवं प्राणप्रिय देश को पूरी तरह भयमुक्त कर सकते हैं।''³ इस वाक्य में उल्लेखित दिव्य तत्त्वों के लिए जो क्रांति होती है, अपने प्राणप्रिय धर्म को एवं अपने प्राणप्रिय देश को बंधनमुक्त करने के लिए जो क्रांतियुद्ध से अधिक पवित्र विश्व में दूसरा क्या मिलनेवाला है? स्वदेश-रक्षा, स्वराज्य-संस्थापन एवं स्वधर्म-परित्राण के लिए दिल्ली के सिंहासन से प्रार्थित इस स्पष्ट दिव्य एवं स्फूर्तिजनक मंत्र में ही सन् 1857 की क्रांति का बीज है। बरेली में मुद्रित कर प्रकाशित किए हुए, अवध के नवाब द्वारा निकाले गए दूसरे एक आज्ञापत्र में वे कहते हैं-"हिंदुस्थान के सारे हिंदुओं और मुसलमानो, उठो! स्वदेश बंधुओं, परमेश्वर की दी हुई सौगात में सबसे श्रेष्ठ सौगात स्वराज्य (Sovereign) ही है। यह ईश्वरीय सौगात जिसने हमसे छल से छीन ली है उस अत्याचारी राक्षस को वह बहुत दिन प्रचेगी क्या? यह ईश्वरीय इच्छा के विरूद्ध किया गया कृत्य क्या जय प्राप्त करेगा? नहीं, नहीं। अंग्रेजों ने इतने जुल्म ढाए हैं कि उनके पाप के घड़े पहले ही लबालब भरे हुए हैं। और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 39 ³ लेकी द्वारा लिखित-'फिक्शन एक्सपोज्ड'।

उसमें हमारे पवित्र धर्म का नाष करने की कुबुद्धि और समा गई है। अब आप अभी भी शांति से बैठे रहेंगे क्या? आप शांति से बैठे, यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। क्योंकि सारे हिंदुओं और मुसलमान के हृदय में उसी की इच्छा उत्पन्न हुई हैं-परमेश्वर की इच्छा-और आपके पराक्रम से जल्दी ही उनका ऐसा सर्वनाश हो जाएगा कि अपने हिंदुस्तान में उनका छिलका, टुकड़ा भी नहीं रहेगा। छोटे-बड़े के सारे भेदभाव भुलाकर इस सेना में सब ओर समता का राज हो। क्योंकि पवित्र धर्मयुद्ध में जो वीर स्वधर्म के लिए अपनी तलवार म्यान के बारह निकालते हैं वे सब समान योग्यता के होते हैं। वे भाई-भाई हैं। उनमें किसी तरह का भेद नहीं है। इसलिए फिर से एक बार मैं सारे हिंदू बंधुओं का आह्वान करता हूं-उठो और इस परम ईश्वरीय और दिव्य कर्तव्य के लिए रण-मैदान में कूद पड़ो।'"⁴ ये तत्त्वरत्न देखकर जिसे इस क्रांतियुद्ध की ओजस्विता भासित नहीं होगी उसे या तो मंदबुद्धि या दुर्बुदि होना चाहिए। ईश्वर-प्रदत्त अधिकारों के लिए लड़ना मनुष्यमात्र का कर्तव्य है और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लड़ने को ही उस मय के भारतीय शूरों ने अपने शस्त्र निकाले थे, यह सिद्ध करने के लिए इससे सबल साक्ष्य और क्या दिया जा सकता है! भिन्न-भिन्न स्थानों और भिन्न-भिन्न कालों में निकाले गए ये घोषणापत्र इस क्रांतियुद्ध की मीमांसा करने के लिए एक अक्षर भी और अधिक लिखने की आवश्यकता शेष नहीं रहने देते। ये घोषणापत्र ऐरे-गैरे द्वारा निकाले हुए नहीं हैं। इस युद्ध में जो भी शमशीर निकालते हैं वे सब समान योग्यता के हैं। धर्मयुद्ध में उठी यह गर्जना 'स्वधर्म एवं स्वराज्य' दोनों तत्त्वों का उच्चारण एवं जयघोष करती है। पर क्या ये दोनों ही तत्त्व (स्वराज्य-स्वधर्म) परस्पर विरुद्ध या भिन्न समझे जाते थे? स्वधर्म एवं स्वराज्य का एक-दूसरे से किसी भी अर्थ में संबंध नहीं है, ऐसी कम-से-कम प्राचीन लोगों की धारणा कभी नहीं थी। मैजिनी के कथानुसार, स्वर्ग और पृथ्वी को किसी एक बांस के बीच में बांधकर अलग नहीं किया गया है। ये दोनों तो एक ही वस्तु के दो छोर हैं। ऐसी ही प्राचीन जनों की पूर्वा पर यथार्थ एवं परिपक्व धारणा है। हमारी स्वधर्म के कल्पना स्वराज्य से भिन्न नहीं है। ये दोनों साध्य नाते से संलग्न हैं। स्वधर्म के बिना स्वराज्य तुच्छ है और स्वराज्य के बिना स्वधर्म बलहीन है। स्वराज्य 1857 का स्वातंत्र्य समर – 40 ⁴ लेकी कृत-'फिक्शन एक्सपोस्ड' में वर्णित यह घोषणापत्र उस क्रांतियुद्ध के समय लोक-वृत्ति किस तरह चेत गई थी-यह दर्शाने को बहुत उपयोगी है। इसका काफी कुछ अंश आगे भी दिया जाएगा।

नामक ऐहिक सामर्थ्य की तलवार स्वधर्म नामक पारलौकिक साध्य के लिए हमेशा बाहर निकली रहनी चाहिए। यह प्राचीन जनों के मन का रुझान इतिहास में पग-पग पर दिखेगा। प्राचीन काल में हुई क्रांतियों को धार्मिक स्वरूप क्यों मिलता है, या यह कहें कि धार्मिक पवित्रता के या धर्म-संलग्नता के सिवाय प्रचंड क्रांति का होना-यह बात प्राचीन इतिहास में बिल्कुल भी क्यों ज्ञात नहीं है, इसका बीज भी धर्म के इस विश्व व्यापक स्वरूप में ही है। हिंदुस्थान के इतिहास में आज तक अखंड रूप से व्यक्त होते आए स्वराज्य एवं स्वधर्म के साधन और साध्य तत्त्व इस सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में भी व्यक्त हुए, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। दिल्ली के बादशाह द्वारा पहले-पहल निकाले गए घोषणापत्र का उल्लेख पहले किया गया है। उसके बाद जब दिल्ली को अंग्रेजी सेनाओं ने घेर लिया और युद्ध घमासान हो गया तब बादशाह ने हिंदुओं के लिए दूसरा घोषणापत्र जारी किया। उसमें वे कहते हैं- "जीम राजगान वो रोसाए हिंद पर वाझे होके तुम बेहामा उजूः नेकी और फय्याजी में मुश्तईर उद्दईर हों ़ ़ ़ खुदावंत ने तुमको ये मर्तबए आली और मुल्क और दौलत और हुकूमत इसी वास्ते बख्शी है कि तुम उन लोगों को, जो तुम्हारे मजहब में दखलंदाजी करें, गारद करों ़ ़ ़ ।" (हमें ईश्वर ने संपत्ति, देश, अधिकार किस लिए दिए हैं? ये सभी केवल व्यक्ति से संबंधित सुख-भोग के लिए न होकर स्वधर्म-संरक्षण के पवित्र हेतु के लिए हैं।) परंतु इस पवित्र एवं अंतिम हेतु के ये साधन कहां है? पहले दिए हुए घोषणापत्र के अनुसार परमेश्वर की सब सौगातों में अत्यंत श्रेष्ठ स्वराज की सौगात कहां है? दौलत कहां है? मुल्क कहां है? हुकूमत कहां है? गुलामी के प्लेग में यह सारी दैविक स्वतंत्रता मृतप्राय हो गई है। गुलामी का प्लेग किस तरह संहार कर रहा है, यह दिखाने के लिए उपर्युक्त घोषणापत्र में नागपुर का, अवध, झांसी का स्वराज्य-सब कैसे धूल में मिला दिए गए, इसका मार्मिक वर्णन करने के बाद ऐसी चेतावनी दी गई है कि इस तरह धर्म-रक्षण के साधन गंवाने पर तुम परमेश्वर के दरबार में अपराधी और धर्मद्रोही माने जाओगे। ़ ़ ़ ़ स्वधर्म के लिए उठो और स्वराज्य प्राप्त करो'-इस तत्त्व ने हिंदुस्थान के इतिहास में कितने दैवी चमत्कार किए हैं? श्री समर्थ रामदास न महाराष्ट्र को ढाई सौ वर्ष पहले यही दीक्षा दी थी- "धर्मासाठी मरावें, मरोनि अवघ्यांसि मारावें। मारिता मारिता घ्यावे, राज्य आपुलें।" 1857 का स्वातंत्र्य समर - 41

धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें; मारते-मारते जीतें, राज्य अपना। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध का यही तात्त्विक कारण है। इस क्रांतियुद्ध का यही मनःशास्त्र है। जिस दूरबीन से उस युद्ध का स्पष्ट एवं सत्य स्वरूप दिखेगा, ऐसी खरी दूरबीन अर्थात् ˙ ˙ ˙ 'धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें, मारते-मारते जीतें राज्य अपना। इस दूरबीन से उस क्रांति की ओर देखें तो कितना अलग दृश्य दिखने लगता है! स्वधर्म एवं स्वराज्य-इन दो पवित्र कारणों से जो क्रांतियुद्ध लड़ा गया उसकी पवित्रता पराजय से भंग नहीं होती। गुरू गोविंद सिंह के प्रयास तादृश रीति से विफल रहे, इस कारण उसका दिव्यत्व कम नहीं होता। या सन् 1857 में इटली में राज्य क्रांति की जो विशाल लहर उठी उसमें उस क्रांति के नेताओं की संपूर्ण पराजय हुई, इस कारण उनके हेतु का पुण्य क्षीण नहीं होता। जस्टिन मैकार्थी ने कहा है-‘‘वस्तुस्थिति यह है कि भारतीय प्रायद्वीप के संपूर्ण उत्तरी एवं उत्तर-पश्चिम प्रदेशों में ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध देशी जातियों ने विद्रोह कर दिया था। केवल सिपाहियों ने ही विद्रोह नहीं किया, इसे कोरी सैनिक क्रांति का ही नाम नही ˙दिया जा सकता। यह तो भारत पर आंग्ल सत्ता के विरूद्ध सैनिक कठिनाइयों, राष्ट्रीय घृणा और धार्मिक कट्टरता का संयुक्त उभार था। इसमें देशी राजाओं और सैनिकों ने भी भाग लिया मुसलमान और हिंदुओं ने अपने शताब्दियों के धार्मिक विरोध आंदोलन को प्रोत्साहित किया था। चरबीवाले कारतूसों के विवाद ने तो केवल चिंगारी दहकाई और उस चिंगारी ने सभी ज्वलनशील पदार्थों में आग भड़का दी। यदि इस चिंगारी से अग्नि प्रज्वलित न होती तो किसी अन्य माध्यम से भी यही कार्य संपन्न हो जाता। ˙ ˙ ˙ मेरठ के सिपाहियों ने क्षण भर में ही एक नेता पा लिया, उन्हें एक ध्वज भी मिल गया और उद्देश्य भी और यह विद्रोह एक क्रांतियुद्ध में परिणत हो गया। जब वे प्रातःकालीन सूर्य की रश्मियों से जगमगाती यमुना के तट पर पहुंचे तो उन्होंने अनजाने में ही इतिहास की एक निर्णायक घड़ी को प्राप्त कर लिया तथा सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय धर्मयुद्ध में परिणत कर दिया।’’⁵ चार्ल्स बाल लिखते हैं-‘‘आगे चलकर धारा किनारों को तोड़कर बह निकली और उसने भारत की सैनिक वसुंधरा को आप्लावित कर दिया। उस समय तो यही आशा की जाती थी कि ये धाराएं संपूर्ण यूरोपीय तत्त्वों को विनष्ट कर निगल जाएंगी। जिस समय विद्रोह की यह धारा पुनः मर्यादित होगी और अपने आपको सीमाओं में आबद्ध 1857 का स्वातंत्र्य समर – 42


⁵ 'हिस्ट्री ऑफ अवर ओन टाइम', खंड 3 ।

कर लेगी तो राष्ट्रभक्त भारत अपने विदेशी शासकों से अपने आपको स्वतंत्र कर लेगा तथा वह देशी राजाओं के स्वतंत्र राज्यदंड के सम्मुख नतमस्तक होगा। अब यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप ग्रहण कर चुका था। यह विद्रोह उस संपूर्ण जनता के विद्रोह का रूप धारण कर चुका था जो काल्पनिक गलतियों से क्षुब्ध होकर भड़क उठी थी और घृणा व कट्टरता के भ्रम में आबद्ध हो चुकी थी।'"⁶ 'कंपलीट हिस्ट्री ऑफ द ग्रेट सेपॉय वार' शीर्षक अपनी पुस्तक में हाइट लिखते हैं- "यदि मैं अवधवासियों के द्वारा प्रदर्शित साहस की प्रशंसा नहीं करूंगा तो एक इतिहासकार का पावन दायित्व न निभा पाऊंगा । नैतिक दृष्टि से अवध के तालूकेदारों की एक महान् भूल यह थी कि उन्होंने हत्यारे विद्रोहियों से हाथ मिलाया। किंतु इसके लिए भी उन्हें सदुद्देश्य से प्रेरित निष्ठावान देशभक्तों के रूप में मान्यता दी जा सकती है, क्योंकि वे अपनी मातृभूमि और सम्राट् के लिए संग्राम कर रहे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के लिए संघर्षरत हुए थे।" 1857 का स्वातंत्र्य समर – 43 ⁶ सर जॉन के, 'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 644 ।

प्रकरण-2 कारण परंपरा स्वधर्म एवं स्वराज्य-इन दो देवताओं का अधिष्ठान रखकर सन् 1857 में प्रारंभ हुए इस रण-यज्ञ का संकल्प कब लिया गया? अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार, इस रण-यज्ञ का संकल्प डलहौजी साहब के कार्यकाल में लिया गया था। उनकी यह धारणा भ्रमपूर्ण है। जिस क्षण हिंदुस्थान के तट पर परतंत्रता ने पहला कदम रखा तभी। बेचारा डलहौजी! उसने अधिक बुरा किया ही क्या? हिंदुस्थान की जन्मजात स्वतंत्रता का हरण कर इसके बदले गुलामी और स्वधर्म के स्थान पर ईसाइयत लादने का पातकी विचार जब पहले-पहल अंग्रेज व्यापारियों के मन में आया, तभी से हिंद भूमि के हृदय में क्रांति चेतना का संचार हुआ है। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध का कारण अंग्रेजों के 'अच्छे शासन' या 'बुरे शासन' में न होकर केवल 'शासन' में है। अच्छा या बुरा का प्रश्न गौण है, मुख्य प्रश्न 'शासन' है। जिस देश को हिमालय ने उत्तर और समुद्र देवता ने 'दक्षिण' की ओर से सुरक्षित किया हुआ है उस निसर्गतः बलिष्ठ एवं निसर्गप्रिय हिंदुस्थान पर अंग्रेजों की सत्ता चलने देना है या नहीं, यह मुख्य प्रश्न सन् 1857 के समर-पट पर हल किया जा रहा था, यह यदि सत्य है तो फिर इस समर की मूल उत्पत्ति तभी ही हुई होगी जब यह प्रश्न पहले-पहल सामने आया होगा। मैजिनी कहता है-"स्वतंत्रता प्रत्येक का प्रकृतिदत्त अधिकार है और इसलिए इस पवित्र अधिकार का अपहरण करने की इच्छा के अत्याचार को मिटाना भी प्रत्येक का प्रकृतिदत्त कर्तव्य है। व्यक्ति की, राष्ट्र की एवं मनुष्य जाति की प्रगति के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 44

प्रथम भाग: ज्वालामुखी (स्वधर्म, स्वराज्य व क्रांति योजना)

उसमें चैतन्य चाहिए। परंतु जहां स्वतंत्रता नहीं होती वहां चैतन्य रहना संभव नहीं। जो लोगों की स्वतंत्रता छीन लेता है वह लोगों की प्रगति का विरोध कर पर-पीड़न का अक्षम्य पाप करता है। इतना ही नहीं अपितु अनजाने सारी मानव जाति का अर्थात् अपनी ही गरदन पर कुल्हाड़ी मारकर आत्महत्या के भयंकर पाप का भी भागीदार हो जाता है। यह पाप कर के आज तक किसका उद्धार हुआ है? ये गुलामी की बेड़ियां परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपने मानवी बंधुओं के पैरों में जकड़कर आज तक किस पक्ष की विजय हुई है? स्वतंत्रता और गुलामी के झगड़े में अंतिम जय स्वतंत्रता की ही होती है।"7 सीले कहता है-"अंग्रेजों का हिंदुस्थान से संबंध प्रकृति से मजाक है। इन दो देशों में किसी तरह का प्राकृतिक बंधन नहीं है। उनका रक्त भिन्न है।"8 पर यह सब भूलकर जिस वर्ष क्लाइव ने स्वार्थ और अन्याय का साम्राज्य स्थापित करने के लिए प्लासी के मैदान पर रक्त-मांस की नींव रखी उस सन् 1687 के ही वर्ष इस क्रांतियुद्ध के बीज कहां-कहां नहीं बोए? हेस्टिंग ने काशी, रोहिलखंड और बंगाल में वे बीज बोए तो वेलेजली ने मैसूर, आसई, पुणे, सतारा एवं उत्तरी हिंदुस्थान की उपजाऊ भूमि में उसकी बुआई की। इस बुआई में उन्हें कुछ भी कष्ट नहीं हुए, ऐसा नहीं है। तलवार और तोपों से हिंदुस्थान की भूमि जोतनी पड़ी। क्योंकि अन्य किन्हीं ऐरे-गैरे हलों को श्री वर्धन के परकोटे, शनिवार के बाड़े, सह्याद्रि के टीले, आगरा के बुर्ज और दिल्ली के भरी सिंहासन दाद न देते। इस पथरीली भूमि पर हल चलाकर उन्हें इकसार करने के बाद बीच में बचे-खुचे छोटे-बड़े ढेलों को भी फोड़ा गया। वचन भंग, अविश्वास, घात, जुल्म आदि छोटे-बड़े हथौड़ों से छोटे-छोटे रियासतदार समाप्त किए गए। सेना में नेटिव सिपाहियों का अपमान होने लगा। उनपर उन्मत्त फिरंगी अधिकारियों के हाथों कोड़ों की मार पड़ने लगी। उनके पराक्रम से नए प्रदेश मिलने पर मराठे या निजाम की ओर से उन्हें जागीरें मिलती थी। परंतु कंपनी की ओर से मिलती केवल मीठी-मीठी गप्पें ।9 जिनकी तलवारों ने अंग्रेजों 1857 का स्वातंत्र्य समर – 45 7 'मानव के कर्तव्य' । 8 'इंग्लैंड का विस्तार', पृष्ठ 214 । 9 "यदि उसे (देशी सैनिक को) अपना संपूर्ण जीवन अपनी पूर्ण क्षमता का प्रदर्शन करते हुए सेना में लगाना पड़ता था तो जो सर्वाधिक सम्मान उसे प्राप्त हो पाता था-वह थी सूबेदारी। एक अंग्रेज सार्जेंट भी अपने से उच्च पद पर नियुक्त देशी अधिकारियों पर हुकुम चलाता था। परेड में भी अंग्रेज अधिकारी भूल करते थे तथा आदेश देते समय गलत शब्दों का प्रयोग करते थे; किंतु इसका संपूर्ण दोष सिपाहियों पर डालकर वे उनकी निंदा और भर्त्सना किया करते। इतना ही नहीं, जो देशी अधिकारी सेना में सेवा करते-करते वृद्ध हो गए थे उन्हें भी यूरोपियन खुलेआम अपशब्द कहते थे।' 'देशी शासकों की सेनाओं के समान उन्हें यात्रा को पूर्ण करने के लिए हाथी और पालकियां

के लिए सारा हिंदुस्थान जीता था, उन सिपाहियों से इतना क्रूर व्यवहार किया जाता कि जनरल ऑर्थर वेलेजली घायल हुए सिपाहियों का उपचार करने के स्थान पर उन्हें तोप से उड़ा देता। इस तरह हिंदुस्थान के कोने-कोने में भयंकर क्रांतियुद्ध के बीज अंग्रेज लगातार बोते आ रहे थे और उनके इन प्रयासों को सफलता जल्दी ही प्राप्त होगी, ऐसे चिह्न प्रादुर्भूत होने में अधिक देर नहीं लगती।10 डलहौजी जिस दिन स्पेन ने नीदरलैंड की भूमि पर परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपनी गुलामी लादी, उसी दिन यह निश्चित हो गया था कि नीदरलैंड और स्पेन के मध्य हजारों लड़ाइयों से भरा हुआ क्रांतियुद्ध होगा। वह कब, कहां और कैसे होगा-केवल इन गौण बातों का निर्णय आल्वा नामक स्पेन के गर्वनर ने किया। जिस क्षण ऑस्ट्रिया ने इटली के पैरों में गुलामी की बेड़ियां डाली। उसी दिन अनेक पराजयों परंतु अंतिम जय से घटित होनेवाला प्रचंड क्रांतियुद्ध निश्चित हो गया था। केवल शेष रहा तिथि निर्णय, वह मैटरनिख के जुल्मों से हो गया। उसी तरह जिस समय आंग्ल भूमि हिंद भूमि पर दासता लादने के लिए किसी राक्षस की तरह दौड़कर आई उसी दिन अंग्रेजों और हिंदुओं का जो भयंकर, क्रूर और घमासान युद्ध होना है, यह तय हो गया; केवल उसका आरंभ कब हो, यह डलहौजी ने तय कर दिया। डलहौजी के शासनकाल में हुए अमानुषी अन्याय कुछ सीमा तक नरम भी हुए होते तो भी उसके कारण अंतिम संग्राम टल नहीं सकता था, क्योंकि प्रत्येक देश स्वतंत्र रहे, यही प्राकृतिक दर्शनशास्त्र का अबाधित रहने वाला अंतिम सिद्धांत है। इस प्रकृति-हेतु के विरूद्ध कोई राष्ट्र के पैरों में बलपूर्वक गुलामी की बेड़ियां, फिर भले ही वे सोने से मढ़ी क्यों न हों, डाल दे तो काल के घन प्रहार के नीचे उनके टुकड़े होना निश्चित है। तथापि जहां-जहां गुलामी होती है वहां-वहां अत्याचार होना स्वाभाविक है और जहां-जहां फिरंगी शासन है वहां-वहां डलहौजी आने ही चाहिए, क्योंकि बिना अत्याचार के जिस तरह गुलामी असंभव है उसी तरह बिना डलहौजी फिरंगी राज्य असंभव बात है। विदेशियों पर अपना अन्यायमूलक शासन चलाना जहां सर्वसम्मत हो, वहां अपने शासन में जो सर्वाधिक क्रूर होगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा-अर्थात् जो जितना ही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 46 10 प्राप्त नहीं होती थीं, फिर चाहे उन्हें कितनी भी लंबी यात्रा क्यों न करनी पड़े। वे कहते थे-निजाम और मराठी सरदारों के सिपाही भी हमारे सूबेदारों और जमादारों से अच्छा जीवन व्यतीत करते थे। अंग्रेज अधिकारी देश की सुंदरतम महिलाओं के जनानेखानों में भी प्रविष्ट हो सकते थे।' 'और इस सबकी पराकाष्ठा तो तब हो गई थी जबकि जनरल ऑर्थर वेलेजली ने अपने घायल सैनिकों को निर्ममता सहित गोलियों से उड़ा देने का आदेश दे दिया था।” –सर जॉन के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 160-61

अन्यायी है उसे उस अन्याय का कमाल दिखाने के सिवाय अपना श्रेष्ठतम बनाए रखने की दूसरी कोई युक्ति नहीं बचती। इस तरह अन्याय और अधमता में जहां खुली स्पर्धा शुरू होती है वहां डलहौजी ही पैदा होंगे। अनीति-मूलक साम्राज्य जहां-जहां बढ़े वहां वहां ऐसे डलहौजियों के जंगल ही देश रहे। पर इन सब डलहौजियों को पीछे छोड़ देनेवाला एक आंग्ल डलहौजी सन् 1848 में भारत आया। डलहौजी को अंग्रेज इतिहासकार 'साम्राज्य का प्रणेता' कहते हैं 'इस बात से अलग डलहौजी के अधम और नीच कर्मों के लिए अन्य किसी साक्ष्य की आवश्यकता ही नहीं है। सौ वर्ष तक चलाई गई अंग्रेजी अनीति का मूर्त परिणाम, स्वभाव से जिद्दी, जो मैं कहूं वही होगा-इस टेक पर रहनेवाला, साम्राज्य की चटक और उसका घमंड जिसके रक्त-मांस में घुला हुआ था, ऐसा धूर्त न भी हो पर दुःसाहसी राजनीतिज्ञ, हिंदुस्थान की भूमि को सपाट करने के लिए इस भूमि पर उतरा। डाकुओं के मुख्य नायक की दृष्टि में जिसके घर में संपत्ति भरी हुई है पहले उधर जाना स्वाभाविक है। ऐसा संपत्ति भरा घर दिखते ही वह उस घर पर, चाहे जिस रीति से संभव हो, डाका डालने की योजना बनाने में जुट जाता है। इस जल्दी में न्याय-अन्याय का विचार शुरू हो जाता है तो उसी समय डाकूगिरी समाप्त हो जाती है। ऐसी ही वस्तुस्थिति होने से अंग्रेजों के हिंदुस्थान पर डाले गए भयंकर डाकों¹¹ में अंग्रेजों के शासन में उस शासन को स्थिरता देनेवाले और उस डकैती को बढ़ानेवाले उनके कृत्य न्यायसंगत थे या अन्यायी, यह निश्चित करने के लिए घिस-घिस करना इतिहास की व्यर्थ खींचतान करना है। संधिपत्र, वचन, दोस्ती आदि शब्दों का डाकेजनी के शास्त्र में स्थान नहीं होता, इतना ध्यान में रखा जाए तो फिर इतिहास बहुत सी असंगतियों से बच जाएगा। फिर वॉरेन हेस्टिंग्स ने नंदकुमार को न्याय से मारा या अन्याय से और उस वॉरेन हेस्टिंग्स को अंग्रजों ने निरपराध मानकर क्यों छोड़ दिया, यह तय करने के लिए कागजों के ढेर खराब करने की आवश्यकता नहीं होगी। अज्ञानी लोग अपने भोले स्वभाव के अनुसार संधिपत्रों की सूचियां लेकर, उनकी तिथियां देकर, धर्मशास्त्र के वचन देकर, तर्कों के ताने-बाने रच या पिछली परंपराओं के आधार देकर, अपने घर पर आक्रमण करने के लिए आए डाकुओं में परावृत्ति या सहानुभूति उत्पन्न करने का भ्रमपूर्ण प्रयास 1857 का स्वातंत्र्य समर - 47 11 मॉलकम लेविन कहता है-"...Grasping everything that could render life desirable, we have desired to the people of the country all that could raise them in society, all that could elevate them as men....we have delivered up their pagoda-properly to confiscation; we have branded them in our official records as 'heathens.' We have seized the possessions of their native princes and confiscated the estates of the nobles; We have unsettled the country by exactions and collected the revenue by means neighbour's purse for what it contains."

भले ही करें; परंतु धूर्त लोग इन निष्फल, बांझ प्रयासों पर हंसे बिना नहीं रहेंगे। डाकुओं पर लागू ये सारी बातें डलहौजी की डकैतियों पर तो विशेष रूप से लागू होती हैं, अतः उसके शासनकाल में घटित कृत्यों में न्याय-अन्याय निश्चित करने का प्रयास करना मूर्खता है। हिंदुस्थान की भूमि समतल करके उसपर तांडव करने डलहौजी आया था, इतना ध्यान में रखा जाए तो काफी होगा। जिसका अंतिम उद्देश्य प्राकृतिक रूप से सुंदर हिंद भूमि को अपनी दासी बनाना था, ऐसे दुर्योधन के लिए न्याय कैसा और अन्याय कैसा? इस पाप वासना को तृप्त करने के लिए जो भी साधन मिलें वे सारे वह उपयोग में लाता ही। इन साधनों में से पहला साधन था पंजाब से हुई लड़ाई। डलहौजी के पैरों का स्पर्श हिंदुस्थान के किनारे से होते ही उसे तुरंत यह ध्यान में आया कि पंजाब में जब तक रणजीत सिंह है तब तक अपनी पाप वासना पूरी करना इंग्लैंड के लिए बहुत भारी होगा यह देखकर उसका दृढ़ निश्चय बना कि उस पंजाबी सिंह को किसी तरह गुलामी के जाल में फंसाना ही चाहिए। यद्यपि चिलियनवाला के द्वार से बाहर आकर उस पंजाबी सिंह ने एक भयंकर आघात अपने शत्रु की छाती कर किया, लेकिन गुजरात के पिछले द्वार से शत्रु अंदर घुसा और सिंह गुफा जल्दी ही सिंह का पिंजरा बन गई। रणजीत सिंह की पटरानी चंद्रकुंवर लंदन में घुटकर मरी और रणजीत सिंह का पुत्र दिलीप सिंह दूसरे के दरवाजे टुकड़े जोड़ता पड़ा रहा। 12 अब हिमालय से कन्याकुमारी तक तो सारा हिंदुस्थान लाल हो गया, परंतु अभी भी सिंधु नदी से इरावती (नदी) तक जैसा चाहिए था वैसा लाल नहीं हुआ था। फिर देर क्यों? ब्रह्मदेश में एक शांति मिशन भेजा कि फतह हुई। केवल वह शांति मिशन शांति का इतने प्रेम से आलिंगन करे कि उसकी पसलियां चूर-चूर हो जाएं। यह अति प्यारा कार्य भी अंत में संपन्न हो गया और ब्रह्मदेश लाल रंग में रंग गया। अब सिंधु नदी से इरावती तक और हिमालय से रामेश्वरम तक सारा हिंदुस्थान सचमुच लाल हो गया! पर जल्दी ही रक्तरंजित नहीं होगा, यह कैसे कहें? पंजाब और ब्रह्मदेश अंग्रेजों ने जीते अर्थात् क्या किया, उसकी कल्पना केवल नामों से नहीं हो सकती। अकेले पंजाब का अर्थ था पचास हजार वर्ग मील का प्रदेश और चालीस लाख जनसंख्या। जिन पांच नदियों के तट पर ऋषियों ने वेदमंत्र गाए, उनके द्वारा सिंचित यह प्रदेश-पंजाब। यही प्रदेश लेने अलेक्जेंडर आया और इसी प्रदेश को बचाने के लिए पोरस लड़ा। इसी प्रदेश को लेकर रावण की भी महत्त्वाकांक्षा 1857 का स्वातंत्र्य समर – 48 12 रणजीत सिंह के साम्राज्य के उत्तराधिकारी दिलीप सिंह की दुर्दशा सुनकर किसी को भी दया आएगी। किंतु 'निष्पक्ष' के ने लिखा है-“दिलीप सिंह के लिए यह एक सुखद परिवर्तन था कि अपने जीवन के 12वें वर्ष में ही वह गवर्नर जनरल का आश्रित हो गया और उसे बंगाल की सेना के एक सहायक कर्मचारी की देखरेख में रखा गया, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति था, जिसके निर्देशन में सिख राजकुमार का विकास एक भद्र ईसाई, एक अंग्रेज दरबारी के रूप में हुआ। ”

पूरी हो गई होती। परंतु डलहौजी को पंजाब और ब्रह्मदेश जैसे विस्तृत प्रदेश लेकर भी कोई संतोष न हुआ। हिंदुस्थान की सरहद तो अवश्य बढ़ी, परंतु अब भी अंदर पूर्व बादशाहों के कुछ मजार षेश थे, अतः उन्हें भी उखाड़कर सर्वत्र मैदान करने की उसने प्रतिज्ञा की। पुरानी बादशाही के ये मजार स्थान घेरे हुए थे; केवल इतना ही नहीं, इन पुराने मजारों में गड़े प्रेतों से ही भावी बादशाही के पुनरुज्जीवित होने की संभावना थी और यह संभावना डलहौजी को पूरी तरह समझ में आ गई थी। सतारा के मजार में हिंदू पदपादशाही गड़ी हुई थी और यीषू मसीह के पुनरुज्जीवन की तरह उन गाड़े हुए प्रेतों में से कदाचित् किसी भावी बादशाही का पुरुज्जीवन होगा, यह डर यीषू के चरित्र पर विश्वास रखने वाले डलहौजी को लगा हो तो कोई आश्चर्य नहीं। सन् 1857 के अप्रैल माह में सतारा के अंतिम महाराज अप्पा साहब दिवंगत हुए । यह समाचार मिलते ही डलहौजी ने वह रियासत हथियाने का निश्चय किया। कारण यह कि राजा की जायज संतति नहीं थी। जायज संतति न होने से गंवार मजदूर की झोंपड़ी भी लावारिस नहीं हो जाती। वह उके द्वारा नियुक्त दत्तक को या उसके निकट संबंधी को दे दी जाती है। पर सतारा? वह तो किसी गंवार की झोंपड़ी न होकर अंग्रेजों की बराबरी की 'दोस्त सरकार' थी।¹³ सन् 1839 में प्रताप सिंह छत्रपति पर अंग्रेजी राज्य उलटने के षड्यंत्र का आरोप लगाकर उन्हें गद्दी से हटाने के बाद उके स्थान पर छत्रपति अप्पा साहब की नियुक्ति अंग्रेज सरकार ने ही की थी। इस पदच्युति के संबंध में मि. आर्नाल्ड अपने ग्रंथ ‘Dalhousie’s Administration” में कहते हैं-‘“it is not pleasant to dwell upon the circumstances of the dethronement&so discreditable they were.” परंतु इस बेहूदी पदच्युति के बाद जिसे अंग्रेजों ने सतारा की गद्दी पर बैठाया वह प्रताप सिंह का जायज पुत्र न होकर भाई था। अर्थात् जायज पुत्र के अभाव में हिंदू षास्त्र के अनुसार अन्य संबंधियों का सिंहासन पर अधिकार बनता है, इस समय तक अंग्रेजों ने यह स्पष्ट स्वीकार किया है। यह स्वीकृति अपनी नियमित विश्वासघाती रीति के अनुसार डलहौजी साहब ने अस्वीकार कर दी। यही सत्य है। विभिन्न राजाओं से किए गए समझौतों में हमने दत्तक संतति पहले ही अमान्य की हुई है, ऐसा वे कभी भी नहीं कह सकते थे। सन् 1824 में कोटा के राजा का दत्तक स्वीकार करते समय अंग्रेजी सरकार ने ऐसा स्पष्ट कहा था- “कोटा के राजकुमार के इस अधिकार को मान्यता दी ही जानी चाहिए कि उन्हें षास्त्रों के नियमानुसार दत्तक पुत्र ग्रहण करने और उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त 1857 का स्वातंत्र्य समर – 49 ¹³ सतारा की गद्दी पर सन् 1819 में छत्रपति की पुनर्योजना करते हुए अंग्रेजी द्वारा किए गए समझौते की पहली धारा निम्नवत् थी-‘‘अंग्रेज सरकार अपनी ओर से वह देश अथवा क्षेत्र, जिसको विशेष रूप से निर्दिष्ट किया गया है, सरकार अथवा महाराजाधिराज छत्रपति (सतारा-नरेश) को देने पर सहमत है। हिज हाइनेस महाराजा छत्रपति और उनके पुत्र और उत्तराधिकारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रभुसत्ता प्राप्त राजाओं के रूप में इस क्षेत्र पर शासन करते रहेंगे।’’

करने का अधिकार है।'"14 पुनः सन् 1837 में जब ओरछा के राजा ने दत्तक लिया तब अंग्रेजों ने उसे स्वीकार करते हुए वचन दिया था- "हिंदू नरेशों को यह अधिकार है कि वे स्ववंश की शाखा में उत्पन्न उत्तराधिकारी से अलग भी किसी को गोद ले लें। ब्रिटिश सरकार को ऐसे दत्तक को मान्यता देनी होगी; किंतु गोद लेने की यह प्रक्रिया हिंदू शास्त्र के विरूद्ध नहीं होनी चाहिए।'"15 इतनी स्पष्ट भाषा में और इतने साफ-साफ दिए गए वचन कागजों में लिखे होते हुए भी यह कहने की हिम्मत अंग्रेज प्रवक्ता और अंग्रेजी नीति के सिवाय और कोई नहीं कर सकता कि वे हमने दिए ही नहीं थें उपर्युक्त दोनों उद्धरण देने का आशय बस इतना ही है। केवल यही दो उद्धरण हों, ऐसा नहीं। हिंदू शास्त्र के अनुसार दत्तक लेने का रजवाड़ों का अधिकार अंग्रेजों ने अनंत बार और अतंत करने का मूल कारण उपर्युक्त समझौतों एवं वचनों की भाषा में खोजने का अर्थ पूर्व शब्दों में मान्य किया हुआ था। केवल सन् 1823 से 1847 तक अंग्रेज सरकार ने एकदम स्पष्ट शब्दों में लगभग पंद्रह राज्यों की गद्दियों पर दत्तक राजाओं की योजना एवं अधिकार मान्य किए हैं-इतना कहना पर्याप्त है। क्योंकि इन रियासतों को अधिग्रहण दिशा की खोज में उत्तर दिशा को जाना है। 'हिंदुस्थान की भूमि सपाट' करने के लिए डलहौजी आया था और सतारा के हिंदू पदपादशाही की कब्र अपना सिर ऊंचा करना चाहती थी। अर्थात् प्रताप सिंह एवं अप्पा साहब इन दोनों ही भाइयों ने शास्त्रोक्त पद्धति से दत्तक लिये थे, फिर भी अंग्रेजों ने उन्हें सतारा की गद्दी। सन् 1674 में गागाभट्ट के हाथों अभिषिक्त और शिवाजी जिसपर विराजे थे, वह वही गद्दी को पहला बाजीराव अपनी विजय अर्पण कर मुजरा करता था यह वही सिंहासन था। महाराष्ट्र! देख, शिवाजी जिसपर बैठता था और संताजी, धनाजी, निराजी, बाजी-जिनके आगे 'जी' कहकर लोग नम्रता से झुकते थे तेरा वही सिंहासन डलहौजी ने टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया। अब तू चाहे अर्जियां लिख या डेपुटेशन भेजता रह। डलहौजी नहीं सुनता तो फिर नहीं ही सुनता। इंग्लैंड में उसके वरिष्ठ अधिकारी तो जीवित हैं न? डलहौजी एक सामान्य आदमी है, पर उसके वे वरिष्ठ अधिकारी देवता भी हो सकते हैं? हमने उन्हें देखा ही कहां है? यह रंगों बापूजी बहुत बढ़िया और स्वामीभक्त व्यक्ति है-सतारा की शिकायत लेकर उसका इंग्लैंड जाना उचित है। कृपा की तो देव नहीं तो पत्थर! पर वे कृपा करते हैं या नहीं, इसकी बाट जोहता तू कितनी देर बैठेगा? कृपा अब होगी तब होगी, इस 1857 का स्वातंत्र्य समर - 50 14 पार्लियामेंट पेपर्स, 15 फरवरी, 1851, पृष्ठ 153। 15 वही, पृष्ठ 141 ।

आशा में रंगों बापूजी लंदन के लीडन हॉल स्ट्रीट की सीढ़ियां कितनी बार चढ़े-उतरेंगे। अपमान होने तक-मजाक बनाएं जाने तक-करोड़ों रुपए अंग्रेज बैरिस्टरों की जेब में पहुंचाने पर लौटने के लिए दमड़ी भी न बचने तक-और अंत में हम सतारा नहीं देंगे, ऐसा गर्वीला उत्तर मिलने तक रंगों बापूजी लंदन का मृगजल पीते रहें। जब रंगों बापूजी लंदन जाने की तैयारी में लगे थे तब डलहौजी का ध्यान दूसरा षड़यंत्र रचने में लगा था। मराठा सत्ता का एक पौधा, नागपुर की गद्दी के स्वामी राघोजी भोंसले अपनी आयु के सैंतालिसवें वर्ष में ही अचानक स्वर्ग नाश का कारण बना। जिन्हें यह ज्ञात रहा कि अंग्रेज हमसे द्वेष करते हैं वे बच गए। परंतु जिन्होंने भी यह माना कि अंग्रेजों से हमारा स्नेह है, उनकी गरदन मीठी छुरी से कटी। विदर्भ का राज्य अंग्रेजों की जागीर नहीं थी या वह उनकी मातहत रियासत भी नहीं थी; वह एक स्वतंत्र और बराबरी की सरकार थी। ऐसे राज्य का राजा निस्संतान मर गया तो उस राज्य को अधिग्रहण करने का अधिकार किस पूर्व या पश्चिम के न्याय से मिलता है, यह सिद्ध करके दिखाने के लिए जे. सिल्वियन ने अंग्रेज सरकार का आह्वान किया था। सारी मिलीभगत। एक खाए, दूसरा हजम करे। एक गला काटे, दूसरा पूछे कि किस प्रकार से गला काटा? मानो गला काटनेवालों को कानून का बहुत डर रहता है। सन् 1843 में डलहौजी ने अपने मित्र की गरदन उतार दी। कारण दिखाया-राजा ने दत्तक लिया ही नहीं था। राजे राघोजी संतान-प्राप्ति की संभावना की आयु में एकाएक दिवंगत हो गए। उसमें यदि वे दत्तक न लेते हुए दिवंगत हुए थे तो भी वह अधिकार उनकी पत्नी को प्राप्त था। राजा की मृत्यु के बाद राजपत्नी द्वारा लिये एग दत्तक, 1834 में धार की राजपत्नी द्वारा लिया दत्तकए 1841 में किशनगढ़ की रानी का लिया हुआ दत्तक-एक-दो नहीं अनेक दत्तक अंग्रेजों ने स्वीकार किए थे। परंतु उस समय उन्हें स्वीकारने में लाभ था और आज राघोजी के पीछे उनकी पत्नी द्वारा लिये गए दत्तक को नकारने में लाभ था। क्या लाभकारी था, यह मुख्य प्रश्न था और उसी के अनुसार सारी बातें तय होती थीं। दत्तक नहीं लिया, इसलिए सतारा का राज्य अधिग्रहित किया तो लिया हुआ दत्तक वारिस नहीं होता, इसलिए सतारा का राज्य अधिगृहीत किया। अपने प्राण बचाने की वास्तविकता इच्छा हो तो तर्कशास्त्र के चक्कर में न पड़ें, यही उचित है! नागपुर का राज्य अधिग्रहण कर डलहौजी ने 76, 432 वर्ग मील का विस्तीर्ण प्रदेश, 46,50,000 जनसंख्या और 5 लाख वार्षिक आमदनी का राज्य हड़प लिया। राजवंश की गरीब रानियां दुःख से रो रही थी। ठीक उसी समय राजमहल के दरवाजे को 1857 का स्वातंत्र्य समर - 51

खटखटाया गया। कौन है, यह देखने के लिए द्वार खोला तो अंग्रेजों के सिपाही महल में घुसने लगे। तबेले से घोड़े छोड़े गए, हाथी पर बैठी रानियों को नीचे उतारकर उन हाथियों को बाजार में बिकने भेजा गया-वैसे ही राजमहल की सोने-चांदी की वस्तुएं छीन-छीनकर नागपुर के बाजारों में बिकने के लिए रखी गई। राजपत्नी के कंठ में शोभित हार बाजार में धूल खाता पड़ा रहा। हाथी जहां सौ रूपए में बिका, उसी नीलामी में घोड़े की कीमत-जिस घोड़े को डलहौजी के घोड़े से अधिक मूल्यवान खुराक मिलती थी उस घोड़े की कीमत-बीस रूपये और दूसरा जोड़ा पांच रूपए में बिका, क्या आश्चर्य! हाथी और हाथी के हौदे, घोड़े और बैलों की पीठ की झूलें बेची गई। शरीर के सरे अलंकार छिन जाने से रानियां निष्कांचन हो गई। फिर भी अंग्रेजों का स्नेह कम नहीं हुआ था। फिर राजभवन खोदा जाने लगा।16 स्वयं रनी के शयनकक्ष में फिरंगियों की कुदाल चली। पाठक! ठहरें, इतनी जल्दी शरीर में सिहरन मत आनें दें, क्योंकि यह खुदाई अभी तो आगे भी चलेगी। देखिए, वह रानी के शयनकक्ष के पलंग को तोड-फोड़कर भूमि खोदने लगा। और यह कब? जब बराबर के कक्ष में राजपत्नी अन्नपूर्णाबाई जीवन के अंतिम क्षण गिन रही थी। नागपुर के भोंसले घराने की रानी के शयन के पवित्र पलंग पर बैठकर अंग्रेज उस अंतिम सांस के ताल पर कुदाली चला रहे हैं। और अपराध कौन सा? वह यह कि राजा राघोजी दत्तक लेने से पहले स्वर्गवासी हो गए। अन्नपूर्णाबाई अंततः उस असह्य अपमान से मर गई। परंतु रानी बांकाबाई की विलायत से न्याय पाने की आशा अभी नहीं मरी थी। पर जल्दी ही अंग्रेजी डॉक्टरों को लाखों रूपए चराने के बाद उन्होंने जो रामबाण औषधियां दीं उनसे वह आशा भी निजधाम चली गई। फिर रानी बांकाबाई क्या कर रही थी? वह अपनी शेष आयु ‘राजनिष्ठा’ में बिता रही थी। जब सन् १८५७ में झांसी में बिजली कड़क रही थी तब इधर ‘बांका’ नागपुर में अपने पुत्रों के मन में स्वराज्य के लिए तलवार उठाने की इच्छा जाग्रत होने की संभावना को देख “मैं स्वयं तुम्हारे नाम सरकार को बताऊंगी और तुम्हारे सिर कलम करने की सलाह दूंगी”-ऐसी धौंस दे रही थी। कुल-कलंकिनी बांका, जा पड़ नरक में-यदि वहां भी देशद्रोहियों को प्रवेश हो तो। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 52 16 डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेन', पृष्ठ 165-68 ।

प्रकरण-3 नाना साहब और लक्ष्मीबाई महाराष्ट्र की पुण्यभूमि में माथेरान के गिरी शिखर के गौरव और उस गिरी शिखर की तलहटी में हरी चादर से शोभित भूमि के गौरव में से किसका वर्णन अधिक किया जाए, इसका निर्णय करना असंभव है। इस शानदार माथेरान की देखरेख में और इस सुंदर भूमि की गोद में वेणु नामक एक छोटा सा गांव अपनी सहज सुंदरता से पहले से ही सुंदर उस प्रदेश को और अधिक सुंदर बना रहा था। वेणुग्राम में जो कुलीन एवं सदाचार संपन्न परिवार थे उनमें माधवराव नारायण का परिवार मुख्य रूप से गिना जा सकता था। माधवराव नारायण और उनकी सुशील भार्या गंगाबाई का जोड़ा गृह-दरिद्रता से पीड़ित होकर भी परस्पर प्रेम के सुख में स्वयं को भाग्यवान समझता था। उस पवित्र परिवार के उस छोटे से घर में सन् 1824 में सबके मन और बदन उस समय उल्लास से खिल उठे जब साध्वी गंगाबाई ने पुत्र को जन्म दिया। वह सत्पुत्र और कोई नहीं, श्रीमंत नाना साहब पेशवा ही थे जिनके नाम से अत्याचारी राजाओं की देह कांपने लगती थी और जिन्होंने स्वराज्य और स्वतंत्रता के लिए मर मिटनेवालों में अपना नाम अजर-अमर किया। जिस दिन यह भाग्यशाली बालक जनमा वह दिन कौन सा था, इसकी भी इतिहास को जानकारी नहीं। जिस दिन की जयंती मनानी चाहिए उस दिन की स्मृति इतिहास में न हो, यह बात कितनी उद्वेगकारी है! ऐसे दिन राष्ट्र के इतिहास में बहुत 1857 का स्वातंत्र्य समर - 53

अधिक नहीं होते। हिंदुस्थान में गुलामी के गोबर में सड़ते हुए गोबर के कीड़ों को जन्म देनेवाले दिन लाखों उदय या अस्त होते हैं। परंतु अपनी ईश्वरदत्त स्वतंत्रता और स्वराज्य का अपहरण करनेवाले का रक्त-प्राशन करने के लिए तृषित, मानधन नाना साहब को जन्म देनेवाले दिन शताब्दियों में एक-दो ही होंगे। ऐसे अलभ्य दिन की यह अवमानना देखकर परमेश्वर ऐसे अपात्र को फिर से दान नहीं करेगा, इसकी लज्जा महाराष्ट्र, तुझको होनी चाहिए। जिसने तेरे लिए और तेरे सम्मान के लिए रणांगण में अपना रक्त उड़ेला-उसकी जन्मतिथि तुम्हें ज्ञात न हो-और हाय-हाय! उसकी मृत्युतिथि भी तुझे ज्ञात न हो! तेरे स्वाभिमानी पुत्र कब जनमे, यह तुझे ज्ञात न हो और तेरे ही विश्वासघात के कारण कब मरे, यह भी तुझे ज्ञात न हो! इस अक्षम्य कृतघ्नता के लिए तुम्हारे लिए गुलामी की बेड़ियों का दंड ही उचित है! और वही तुम भोग भी रहे हो! यह गुलामी की बेड़ी 8 लाख रुपयों में पहली बार खरीदनेवाले कुल-कलंकी अंतिम रावबाजी पुणे की राजगद्दी से उतरकर भागीरथी के तीर पर इसी समय आए थे। उनके साथ ही महाराष्ट्र से बहुत से परिवार भी आए थे और यह सुनकर कि उन सब परिवारों का योगक्षेम आश्रय में आकर रहने लगे। माधवराव नारायण भी इन्हीं लोगों के साथ सन् 1827 में ब्रह्मवर्त में रावबाजी के आश्रय में रहने सपरिवार चले गए। वहां रावबाजी की माधवराव के पुत्र से उनके बाल-तेज को देखकर रावबाजी इतने चकित हो गए कि कि माधवराव उनके सगोत्री हैं, यह ज्ञात होते ही उन्होंने नाना साहब को 7 जून, 1827 को दत्तक के रूप में ग्रहण कर लिया। उस समय नाना साहब की आयु केवल ढाई वर्ष की थी। इस रतह वेणुग्राम में जनमा यह बालक अपने पूर्वसंचित पुण्य अंध के कारण महाराष्ट्र राज्य के अधिपति की गद्दी का वारिस हो गया। पेशवा की गद्दी का वारिस होना महाभाग्य की बात है। परंतु ऐ तेजस्वी राजकुमार! उस भाग्य के साथ ही आनेवाला उत्तरदायित्व भी तुम्हें समरण है कि नहीं? पेशवाओं की लड़ी हैं। इसने बड़गांव की संधि की और सबसे विषेश महत्त्व की बात यह कि अब पीघ्र ही अपवित्र स्पर्श से इसके भ्रष्ट होने का अवसर आनेवाला है या आ ही गया है, यह सब तुझे मालूम है या नहीं? गद्दी का वारिस होने का अर्थ होता है उसके संरक्षण और सम्मान की रक्षा करना। फिर पेशवाओं की इस गद्दी के सम्मान की रक्षा करेगा या नहीं, या तो विजय का मुकुट इस गद्दी के सिर पर रखना पड़ेगा अन्यथा चितूर की मानिनी की तरह दीप्त चिता में जलना होगा। इसके सिवाए पेशवा की गद्दी का सम्मान तीसरे किसी उपाय से नहीं होगा। हे तेजस्वी राजकुमार! यह दायित्व ध्यान में रखकर तू महाराष्ट्र की गद्दी पर सुख से बैठ। पेशवा की गद्दी षरणागत हुई, यह सुनने का अवसर तेरे बा पके कारण आने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 54

से सब ओर लज्जा की कालिमा छा गई थी और सबकी यह इच्छा थी कि पेशवा की गद्दी का अंत होना ही है तो वह उसके प्रारंभ जैसा उज्जवल हो। मरना हो तो मारते-मारते मरे। बालाजी विश्वनाथ जिस गद्दी का पहला पेशवा था उस गद्दी का अंतिम पेशवा श्रीमंत नाना साहब था, यह अभिमानपूर्वक इतिहास को कहा जा सके, इसलिए हे राजतेजयुक्त बालक! तू महाराष्ट्र की पेशवाई गद्दी पर चिरकाल विराजमान हो। इसी समय श्री क्षेत्र काशी में मोरोपंत तांबे और उनकी सुशील पत्नी भागीरथी चिमणाजी अप्प साहब पेशवा के आश्रय में रहते थे। इस दंपती को अपना नाम इतिहास में अजर-अमर होनेवाला था, लेकिन हिंदुस्थान के हाथ में दामिनी-सी दमकनेवाली खड्ग जैसी कन्या को जन्म देने का सौभाग्य उसे प्राप्त है, उस समय उस दंपती को यह शायद ही ज्ञात होगा। 19 नवंबर, 1835 को उपर्युक्त दंपती की गोद में महारानी लक्ष्मीबाई साहब ने जन्म पाया। उस शौर्यशालिनी का बचपन का नाम मनुबाई था। इस सुलक्षणी कन्या का जन्म हुए तीन-चार वर्ष बीतते-न-बीतते सारा परिवार काशी छोड़ बाजीराव के उदार आश्रय में ब्रह्मावर्त आ गया और वहां लक्ष्मीबाई और नाना साहब के मेल से रत्न और कांचन का जो संयोग बना उसे देखकर किसे आनंद न हुआ होगा! आगे चलकर अपने स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए तलवारें कैसे चलानी हैं, इसका प्रशिक्षण लेते हुए शस्त्रशाला में राजपुत्र नाना साहब एवं मनोहारिणी छबीली लक्ष्मीबाई को साथ-साथ खेलते देखकर किन नेत्रों को हर्ष नहीं हुआ होगा! मनुष्य की शक्ति कितनी मर्यादित है! जिस समय राजपुत्र नाना और छबीली लक्ष्मी तलवार का खेल एक साथ सीखते थे, उस समय लोगों को न अद्वितीय बच्चों का भावी दिव्यत्व नहीं दिखा और अब जब वह दिव्यत्व उन्हें दिखता है, तब उनकी वह भूतकालीन बाल लीलाएं नहीं दिखती। लेकिन मनुष्य के चर्मचक्षु की वह अदूरदृष्टि दूर करने को यदि कल्पना का चश्मा मिले तो भूतकाल की वह बाललीला हम सहज ही देख सकेंगे। श्रीमंत नाना साहब और उनके बंधु राव साहब जब अपने शिक्षक के पास विद्याभ्यास कर रहे थे तब यह तेजस्विनी छबीली भी अटक-अटककर पढ़ना सीख रही थी।¹⁷ हाथी के हौदे में नाना साहब बैठे हैं और दूसरे पर बैठकर यह मूर्त लक्ष्मी कब आती है, इसकी प्रतीक्षा में लगाम खींचे खड़े हैं-तभी कमर में तलवार लटकी हुई, वायु के कोमल झोंके से जिसके घुंघराले केश किंचित् मात्र हिल रहे हैं और जिसकी गौर तनु उन्मत्त घोड़े को नियंत्रण में रखने के श्रम से गुलाबी हो गई है-ऐसी छबीली अपने घोड़े पर साथ आते ही दोनों ही दौड़ते निकल जाते हैं। नाना की आयु लगभग अठारह और छबीली का सात वर्ष के आसपास थी। सातवें वर्ष से भावी धर्मयुद्ध के इन दो प्रमुख योद्धाओं की कवायद प्रारंभ हुई, यह कितनी मनोरम बात है! इन दो मानवी रत्नों का तब से एक-दूसरे पर बहुत प्रेम था। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 55 ¹⁷ पारसनी कृत 'झांसी की रानी का चरित्र', पृष्ठ 28-29 ।

इन दो भाई-बहनों की यम द्वितीया के दिन भाईदूज होती थी। सुंदर, सतेज, मनोहारी छबीली हाथ में सोने का दीप लेकर उस तरुण राजकुमार की आरती उतारती थी। सन् 1542 में छबीली का झांसी के महाराज गंगाधर राव साहब से विवाह हुआ और वह झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई बनी। महारानी लक्ष्मीबाई झांसी में अपने पति सहित लोकप्रिय हो रही थी। कि सन् 1841 में बाजीराव साहब का देहांत हो गया। बाजीराव साहब की मृत्यु के लिए एक बूंद आंसु भी नहीं बहाना है, क्योंकि सन् 1818 में स्वयं का राज्य बेचकर इस कुल कलंकी ने देसरे राज्य को डुबोने में अंग्रेजों की सहायता की थी। अपनी 5 लाख की पेंशन में से बहुत सारा धन बचाया था। अफगानिस्तान की लड़ाई में जब अंग्रेजों को भेजे। फिर आगे जब पंजाब में सिख राष्ट्र से अंग्रेजों की लड़ाई शुरू हुई तब ब्रह्मावर्त का मराठा मंडल सिखों से मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध उठेगा, ऐसा दिखने लगा; परंतु तभी इस बाजी ने उसे बेरंग कर दियां उसने शिवाजी के इस पेशवा ने अपनी गांठ का व्यय करके एक हजार पैदल और एक हजार शनिवार बाड़ा बचाने के लिए सेना नहीं थी, पर सिखों का बाड़ा अंग्रेजों को सौंपने के लिए भरपूर सेना थी। हाय रे राष्ट्र! मराठे सिखों का राज लेंगे और सिख मराठों का राज्य लेंगे। किस कारण से? इसलिए कि दोनों की छाती पर अंग्रेज नाच सकें। ऐसा बाजीराव मरा, इसके लिए मृत्यु का आभार ही माना जाए। बाजीराव ने मृत्यु-पूर्व ही मृत्युपत्र लिखकर श्रीमंत नाना साहब को पेशवाई के सारे अधिकार और अपने वारिसदारी के सारे हक सौंप दिए थे। परंतु बाजीराव के मरने का समाचार मिलते ही अंग्रेज सरकार ने घोषित किया कि नाना साहब को 5 लाख रूपयों की पेंशन पर किसी भी तरह का अधिकार नहीं है। अंग्रेज सरकार का कुछ प्रतिबिंब उनके द्वारा स्वयं लिखवाए गए पत्र में प्रतिबिंबित हुआ है। वे पूछते हैं-‘हमारे विख्यात राजवंश से आपका यह कृपण व्यवहार पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है। हमारा विस्तृत राज्य और राज्य-षासन जब आपको श्रीमंत बाजीराव से प्राप्त हुआ त बवह ऐसे समझौते पर प्राप्त हुआ कि आप उसके मूल्य के रूप में 5 लाख रूपए प्रति वर्श दें। यह पेंशन यदि हमेशा रहनेवाली नहीं है तो उस पेंशन के लिए दिया हुआ राज्य हमेशा आपके पास कैसे रहेगा? उस समझौते की एक षर्त तो तोड़ी जाए और दूसरी बनी रहे, यह अनुचित है।’'18 बाद में ऐसा जो कहा जा रहा था कि आप दत्तक पुत्र हैं, इसलिए आपका हक नहीं बनता, उसके संबंध में साफ-साफ और तर्कसंगत निवेदन करने के बाद श्रीमंत नाना साहब कहते हैं- ‘'श्रीमंत बाजीराव साहब 1857 का स्वातंत्र्य समर – 56 18 नाना साहिब्स क्लेम ईस्ट इंडिया कंपनी' में यह मूल पत्र दिया हुआ है।

ने अपनी पेंशन में मितव्ययिता से कुछ राशि बचाई, इसलिए अब पेंशन चालू रखने का कोई कारण नहीं है, ऐसा यदि कंपनी कहती है तो इस तर्क का सारे इतिहास में उदाहरण मिलना कठिन होगा। यह पेंशन जो दी गई वह समझौते की शर्त के रूप में दी गई उस समझौते में बाजीराव उस पेंशन को किस तरह व्यय करें, उस शर्त में क्या यह भी तय किया गया था? दिए हुए राज्य के लिए यह पेंशन मिलती है। उसे कैसे व्यय करना है, यह कहने का इस जगत् में किसी को तनिक भी अधिकार नहीं है। इतना ही नहीं अपितु श्रीमंत बाजीराव इस पेंशन की सारी-की-सारी राशि यदि ब चाते तो भी वैसा करने में वे पूरी तरह स्वतंत्र थे। कंपनी से मैं यह पूछता हूं कि उनके कर्मचारियों की पेंशन का व्यय किस तरह होता है, क्या इसकी जांच करने का अधिकार उसे है? कोई भी पेंशनभोगी कितना खर्च करता है, क्या बचाता है,? यह स्वयं के नौकरों से भी पूछना संभव है क्या? परंतु जो प्रश्न नौकरों से भी नहीं पूछा जा सकता वह एक विख्यात राजवंश के अधिपति से पूछा जो प्रश्न नौकरों से भी नहीं पूछा जा सकता वह एक विख्यात राजवंश के अधिपति से पूछा जा रहा है।” यह आवेदन लेकर नाना के विश्वासपात्र वकील अजीमुल्ला खान विलायत गए। इस सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में जो महत्त्व के पात्र हैं उनमें अजीमुल्ला खान का नाम स्मरणीय है। अजीमुल्ला खान पहले बहुत निर्धन होते हुए भी अपने बुद्धिबल से अपनी उन्नति कर नाना के एकनिष्ठ वकील हो गए थे। वे पहले एक अंग्रेज के यहां घरेलु नौकर थे।¹⁹ उस अति सामान्य नौकरी में भी अपनी महत्त्वाकांक्षा न छोड़ते हुए वहां उन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा का अच्छा परिचय प्राप्त किया। ये दो भाषाएं अच्छी तरह सीख लेने पर उन्होंने कानपुर के एक स्कूल में षेश अध्ययन किया और थोड़े ही दिनों में वहां की सरकारी पाठषाला में षिक्षक हो गए। उनकी बुद्धिमत्ता की कीर्ति नाना साहब के कानों में पड़ते ही उन्होंने उन्हें अपने दरबार में रख लिया। सन् 1854 में अजीमुल्ला खान इंग्लैंड गए। अंग्रेजी रीति-रिवाजों की संपूर्ण जानकारी होने से लंदन के लोगों में वे बहुत प्रिय हो गए। अपनी आकर्षक और मीठी वाणी, अपने षारीरिक तेज एवं अपनी असीम उदारता के कारण अजीमुल्ला अनेक अंग्रेजी ललनाओं के गले का हार बन गए। लंदन के सार्वजनिक बगीचों में या ब्राइटन के समुद्री किनारे पर रत्न जड़ित पोषाक में इस ‘भारतीय राजा’ को देखने आंग्ल नर-नारियों की भीड़ इकट्ठी होती थी। कुछ अंग्रेज युवतियां तो अजीमुल्ला पर इतनी लट्टू हो गई थी कि उनके वापस हिंदुस्थान आ जाने पर भी उन्हें अत्यंत आदर और प्रेम की भाषा में लिखे उनके प्रेमपत्र आते थे। हैवलॉक की सेना ने जब ब्रह्मवर्त जीता तब उसे इंग्लैंड की अनेक भद्र महिलाओं द्वारा अपने ‘प्रिय अजीमुल्ला खान’ को भेजे पत्र देखने को मिले। अजीमुल्ला खान के प्रति महिलाओं के मन आकर्षित हो गए थे तो भी ईस्ट इंडिया कंपनी का मन उसकी ओर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 57 ¹⁹ थॉमसन कृत-‘कानपुर’।