अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
238 \hfill चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 24 | अमी वेदीं परितः क्लृप्तधिष्ण्याः० | 4 | 10 | 166 |
| 25 | अयं स ते तिष्ठति संगमोत्सुको० | 3 | 16 | 141 |
| 26 | अयं स ते श्यामलतामनोहरं० | 3 | 35 | 150 |
| 27 | अयं स यस्मात् प्रणयावधीरणा० | 3 | 17 | 141 |
| 28 | अयमगविवरेभ्यश्चातकैर्नि० | 7 | 7 | 221 |
| 29 | अरिहसि मे चुअङ्कुर दिण्णो० | 6 | 3 | 198 |
| 30 | अर्थो हि कन्या परकीय एव० | 4 | 24 | 174 |
| 31 | अर्धपीतस्तनं मातुरमर्दमक्लिष्ट० | 7 | 14 | 224 |
| 32 | अशिशिरतरैरन्तस्तापैर्विवर्ण० | 3 | 15 | 140 |
| 33 | असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा० | 1 | 22 | 110 |
| 34 | अस्मात् परं बत यथास्मृति० | 6 | 28 | 214 |
| 35 | अस्मान् साधु विचिन्त्य संयमध० | 4 | 19 | 170 |
| 36 | अस्यास्तुंगमिव स्तनद्वयमिदं० | 6 | 16 | 207 |
| 37 | अहन्यहन्यात्मन एव ताव० | 6 | 32 | 217 |
| 38 | अहिणवमहुलोहभाविओ० | 5 | 8 | 177 |
| 39 | आ जन्मनः शाठ्यमशिक्षितो० | 5 | 28 | 188 |
| 40 | आ परितोषाद् विदुषां न साधु० | 1 | 2 | 97 |
| 41 | आअम्बहरिअवेण्टं ऊससिअं विअ० | 6 | 2 | 197 |
| 42 | आखण्डलसमो भर्ता जयन्त० | 7 | 28 | 233 |
| 43 | आचार इत्यधिकृतेन मया० | 5 | 1 | 175 |
| 44 | आमूलशुद्धसंततिकुलमेतत्० | 6 | 29 | 215 |
| 45 | आलक्ष्यदन्तमुकुलान० | 7 | 17 | 226 |
| 46 | इतः प्रत्यादिष्टा स्वजनमनुगन्तुं० | 6 | 10 | 203 |
| 47 | इदं किलाव्याजमनोहरं वपु० | 1 | 17 | 106 |
| 48 | इदमनन्यपरायणमन्यथा० | 3 | 22 | 144 |
| 49 | इदमप्युपकृतिपक्षे सुरभि मुखं० | 3 | 37 | 152 |
| 50 | इदमुपनतमेवं रूपमक्लिष्ट० | 5 | 20 | 184 |
| 51 | इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना० | 1 | 18 | 106 |
| 52 | उत्पक्ष्मणोर्नयनयोरुपरुद्धवृत्तिं० | 4 | 17 | 170 |
| 53 | उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनी० | 3 | 26 | 147 |
अभिज्ञानशकुन्तलम् परिशिष्ट-१ 239
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 54 | उदेति पूर्वं कुसुमं ततः फलं० | 7 | 30 | 233 |
| 55 | उन्नमितैकभ्रूलतमाननमस्याः० | 3 | 18 | 142 |
| 56 | उपकृत्य हरेस्तस्या भवाल्लंघु० | 7 | 1 | 220 |
| 57 | उपहितस्मृतिरङ्गुलिमुद्रया० | 6 | 9 | 201 |
| 58 | उपोढशब्दा न रथाङ्गनेमयः० | 7 | 10 | 222 |
| 59 | उल्ललइ दब्भकवलं मई० | 4 | 14 | 168 |
| 60 | एकैकमत्र दिवसे दिवसे मदीयं० | 6 | 13 | 205 |
| 61 | एवमाश्रमविरुद्धवृत्तिना० | 7 | 18 | 226 |
| 62 | एष त्वामभिनवकण्ठशोणितार्थी० | 6 | 33 | 217 |
| 63 | एषा कुसुमनिषण्णा तृषिता० | 6 | 22 | 210 |
| 64 | औत्सुक्यमात्रमवसादयति० | 5 | 5 | 176 |
| 65 | कः पौरवे वसुमतीं शासति० | 1 | 25 | 111 |
| 66 | कठिनमपि मृगाक्ष्या वल्कलं० | 1 | 20 | 107 |
| 67 | कथं नु तं कोमलबन्धुरा० | 6 | 14 | 206 |
| 68 | कर्कन्धूनामुपरि तुहिनं रञ्जय० | 4 | 4 | 159 |
| 69 | का कथा बाणसंधाने ज्या० | 3 | 1 | 134 |
| 70 | कामं प्रत्यादिष्टां स्मरामि न० | 5 | 34 | 191 |
| 71 | कामं प्रिया न सुलभा मनस्तु० | 2 | 1 | 121 |
| 72 | कार्या सैकतलीनहंसमिथुना० | 6 | 20 | 209 |
| 73 | किं कृतकार्यद्वेषाद् धर्मं प्रति० | 5 | 19 | 183 |
| 74 | किं तावद् व्रतिनामुपोढतपसां० | 5 | 10 | 179 |
| 75 | किं शीकरैः क्लमविमर्दिभि० | 3 | 25 | 146 |
| 76 | कुतो धर्मक्रियाविघ्नः सतां० | 5 | 15 | 181 |
| 77 | कुमुदान्येव शशाङ्कः सविता० | 5 | 31 | 189 |
| 78 | कुल्याम्भोभिः पवनचपलैः० | 1 | 14 | 103 |
| 79 | कृतं न कर्णार्पितबन्धनं० | 6 | 21 | 209 |
| 80 | कृतः शरव्यं हरिणा तवासुरा० | 6 | 35 | 218 |
| 81 | कृतावमर्गामनुमन्यमानः० | 5 | 21 | 184 |
| 82 | कृत्ययोर्भिन्नदेशत्वाद्० | 2 | 18 | 132 |
| 83 | कृष्णसारे ददच्चक्षुस्त्वयि० | 1 | 6 | 100 |
240 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः ।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 84 | केयमवगुण्ठनवती नातिपरि० | 5 | 14 | 181 |
| 85 | क्व वयं क्व परोक्षमन्मथो मृग० | 2 | 19 | 133 |
| 86 | क्षणात्प्रबोधमायाति लंघ्यते० | 5 | 2 | 175 |
| 87 | क्षामक्षामकपोलमानन० | 3 | 12 | 138 |
| 88 | क्षौमं केनचिदिन्दुपाण्डु तरुणा० | 4 | 7 | 164 |
| 89 | खणचुम्बिआइँ भमरेहिँ उअह० | 1 | 4 | 98 |
| 90 | गच्छति पुरः शरीरं धावति० | 1 | 34 | 119 |
| 91 | गान्धर्वेण विवाहेन बह्व्यो थ० | 3 | 28 | 148 |
| 92 | गाहन्तां महिषा निपानसलिलं० | 2 | 6 | 125 |
| 93 | ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहु० | 1 | 7 | 100 |
| 94 | चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि० | 1 | 24 | 110 |
| 95 | चारुणा स्फुरितेनायमपरिक्षत० | 3 | 36 | 151 |
| 96 | चित्ते निवेश्य परिकल्पित० | 2 | 10 | 127 |
| 97 | चूतानां चिरनिर्गतापि कलिका० | 6 | 4 | 198 |
| 98 | जाने तपसो वीर्यं सा बाला० | 3 | 2 | 134 |
| 99 | ज्वलति चलितेन्धनो ग्निर्विप्रकृत० | 6 | 37 | 219 |
| 100 | णावेक्खिओ गुरुअणो इमीअ० | 5 | 17 | 182 |
| 101 | तदाशु कृतसंधानं प्रतिसंहर० | 1 | 11 | 102 |
| 102 | तदेषा भवतः पत्नी त्यज वैनं० | 5 | 29 | 188 |
| 103 | तपति तनुगात्रि मदनस्त्वाम्० | 3 | 20 | 143 |
| 104 | तव कुसुमशरत्वं शीतरश्मि० | 3 | 4 | 135 |
| 105 | तव भवतु बिडौजाः प्राज्यवृष्टि० | 7 | 34 | 235 |
| 106 | तव सुचरितमङ्गुरीय नूनं० | 6 | 12 | 204 |
| 107 | तवास्मि गीतरागेण हारिणा० | 1 | 5 | 99 |
| 108 | तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता० | 3 | 39 | 154 |
| 109 | तस्याग्रभागाद् गृहनीलकण्ठै० | 6 | 31 | 216 |
| 110 | तीव्राघातादभिमुखतरुस्कन्ध० | 1 | 33 | 118 |
| 111 | तुज्झ ण आणे हिअअं मम० | 3 | 19 | 142 |
| 112 | तुज्झे ज्जेव प्रमाणं जाणध० | 5 | 26 | 187 |
| 113 | तुरगखुरहतस्तथा हि रेणुर्विटप० | 1 | 32 | 118 |
अभिज्ञानशकुन्तलम् परिशिष्ट-1 241
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः ।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 114 | त्रिस्रोतसं वहति यो गगनप्रतिष्ठां० | 7 | 6 | 221 |
| 115 | त्वं दूरमपि गच्छन्ती हृदयं० | 3 | 29 | 148 |
| 116 | तन्मतिः केवला तावत् प्रतिपाल० | 6 | 38 | 219 |
| 117 | त्वमर्हतां प्राग्रहरः स्मृतो० | 5 | 16 | 182 |
| 118 | दर्भाङ्कुरेण चरणः क्षत० | 2 | 13 | 129 |
| 119 | दर्शनसुखमनुभवतः साक्षादिव० | 6 | 24 | 211 |
| 120 | दिष्ट्या शकुन्तला साध्वी० | 7 | 29 | 233 |
| 121 | दीर्घापाङ्गविसारिनेत्र० | 6 | 15 | 206 |
| 122 | दुःषन्तेनाहितं तेजो दधानां० | 4 | 6 | 162 |
| 123 | धर्म्यास्तपोधनानां प्रतिहतविघ्नाः० | 1 | 12 | 102 |
| 124 | न खलु न खलु बाणः संनिपात्यो० | 1 | 10 | 101 |
| 125 | न तिर्यगवलोकितं भवति चक्षु० | 5 | 24 | 187 |
| 126 | न नमयितुमधिज्यमुत्सहिष्ये० | 2 | 3 | 123 |
| 127 | नियमयसि विमार्गप्रस्थिता० | 5 | 7 | 177 |
| 128 | निराकृतनिमेषाभिर्नेत्रपंक्ति० | 2 | 8 | 126 |
| 129 | नीवाराः शुककोटरार्भकमुख० | 1 | 13 | 103 |
| 130 | नैतच्चित्रं यदयमुदधि० | 2 | 16 | 130 |
| 131 | परिग्रहबहुत्वे पि द्वे प्रतिष्ठे० | 3 | 23 | 144 |
| 132 | पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं० | 4 | 11 | 166 |
| 133 | पादन्यासं क्षितिधरगुरोर्मूर्ध्नि० | 4 | 5 | 159 |
| 134 | पिपासाक्षामकण्ठेन याचितं० | 3 | 33 | 149 |
| 135 | पुडइणिवत्तन्तरिअं वाहरिओ० | 4 | 18 | 170 |
| 136 | पुत्रस्य ते रणशिरस्ययम० | 7 | 26 | 232 |
| 137 | पृष्ट्य जनेन समदुःखसुखेन० | 3 | 13 | 139 |
| 138 | प्रजाः प्रजाः स्वा इव तन्त्रयित्वा० | 5 | 3 | 175 |
| 139 | प्रजागरात् खिलीभूत० | 6 | 25 | 211 |
| 140 | प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधि० | 6 | 6 | 200 |
| 141 | प्रथमं साराङ्गाक्ष्या प्रियया० | 6 | 7 | 200 |
| 142 | प्रलोभ्यवस्तुप्रणयप्रसारितो० | 7 | 16 | 225 |
| 143 | प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः० | 7 | 35 | 236 |
242 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 144 | प्रागेव जरसा कम्पः सविशेषेण० | 6 | 30 | 216 |
| 145 | प्राणानामनिलेन वृत्तिरुचिता० | 7 | 12 | 223 |
| 146 | प्राहूर्द्वादशधा स्थितस्य मुनयो० | 7 | 27 | 232 |
| 147 | बाष्पेन प्रतिषिद्धे पि जयशब्दे० | 7 | 23 | 230 |
| 148 | भव हृदय साभिलाषं संप्रति० | 1 | 28 | 116 |
| 149 | भवनेषु सुधासितेषु पूर्वं क्षिति० | 7 | 20 | 227 |
| 150 | भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै० | 5 | 13 | 180 |
| 151 | भानुः सकृद्युक्ततुरंग एव० | 5 | 4 | 176 |
| 152 | भूत्वा चिराय सदिगन्तमही० | 4 | 22 | 172 |
| 153 | मणिबन्धनगलितमिदं संक्रान्तो० | 3 | 31 | 149 |
| 154 | मनोरथाय नाशंसे किं बाहो० | 7 | 13 | 224 |
| 155 | मय्येव विस्मरणदारुणचित्तवृत्तौ० | 5 | 25 | 187 |
| 156 | महतस्तेजसो बीजं बालो यं० | 7 | 15 | 225 |
| 157 | महाभागः कामं नरपतिरभिन्न० | 5 | 11 | 180 |
| 158 | मानुषीभ्यः कथं नु स्यादस्य० | 1 | 26 | 115 |
| 159 | मुक्तेषु रश्मिषु निरायतपूर्व० | 1 | 8 | 100 |
| 160 | मुनिसुताप्रणयस्मृतिरोधिना० | 6 | 8 | 201 |
| 161 | मुहुरङ्गुलिसंवृत्ताधरोष्ठं० | 3 | 38 | 153 |
| 162 | मूढः स्यामहमेषा वा वदेन्मिथ्येति० | 5 | 32 | 189 |
| 163 | मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्यु० | 2 | 5 | 124 |
| 164 | मोहान्मया सुतनु पूर्वं० | 7 | 25 | 231 |
| 165 | यतो यतः षट्चरणो भिवर्तते० | 1 | 23 | 110 |
| 166 | यथा गजे साधुसमक्षरूपे० | 7 | 31 | 233 |
| 167 | यदालोके सूक्ष्मं व्रजति सहसा० | 1 | 9 | 101 |
| 168 | यदि यथा वदति क्षितिपस्तथा० | 5 | 30 | 189 |
| 169 | यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां० | 2 | 14 | 129 |
| 170 | यद्यत्साधु न चित्रे स्मिन्० | 6 | 17 | 207 |
| 171 | ययातेरिव शर्मिष्ठा पत्युर्बहुमता० | 4 | 9 | 166 |
| 172 | यस्य त्वया व्रणविरोहरणम्० | 4 | 16 | 169 |
| 173 | या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं० | 1 | 1 | 95 |
अभिज्ञानशकुन्तलम् परिशिष्ट-1 243
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 174 | यात्येकतो स्ताशिखरं पतिरोषधी० | 4 | 2 | 159 |
| 175 | यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं० | 4 | 8 | 165 |
| 176 | येन येन वियुज्यन्ते प्रजाः० | 6 | 26 | 213 |
| 177 | यो हनिष्यति वध्यं त्वां रक्ष्यं० | 6 | 34 | 218 |
| 178 | रथेनानुद्धातस्तिमितगतिना० | 7 | 33 | 234 |
| 179 | रम्यं द्वेष्टि यथा पुरा प्रकृतिभिः० | 6 | 5 | 199 |
| 180 | रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च० | 5 | 9 | 178 |
| 181 | रम्यान्तरः कमलिनीहरितैः सरोभि० | 4 | 13 | 167 |
| 182 | रहः प्रत्यासत्तिं यदि सुवदना० | 3 | 40 | 154 |
| 183 | ललितोप्सरोभवं किल मुनेरपत्यं० | 2 | 9 | 127 |
| 184 | वल्मीकार्धनिमग्नमूर्तिरुरग्० | 7 | 11 | 223 |
| 185 | वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाम० | 7 | 21 | 229 |
| 186 | वाचं न मिश्रयति यद्यपि० | 1 | 31 | 118 |
| 187 | विचिन्तयन्ती यम् अनन्यमानसा० | 4 | 1 | 156 |
| 188 | विच्छित्तिशेषैः सुरसुन्दरीणां | 7 | 5 | 221 |
| 189 | वृथैव संकल्पशतैरजस्रमनङ्ग० | 3 | 6 | 135 |
| 190 | वैखानसं किमनया व्रतमाप्र० | 1 | 27 | 115 |
| 191 | व्यपदेशमाविलयितुं समीहसे० | 5 | 22 | 185 |
| 192 | शक्योरविन्दसुरभिः कणवाही० | 3 | 8 | 136 |
| 193 | शमप्रधानेषु तपोवनेषु गूढं० | 2 | 7 | 125 |
| 194 | शशिकरविशदान्यास्तथा० | 3 | 11 | 137 |
| 195 | शहये किल ये वि णिन्दिदे० | 6 | 1 | 193 |
| 196 | शान्तमिदमाश्रमपदं स्फुरति० | 1 | 15 | 104 |
| 197 | शापादसि प्रतिहता स्मृतिलोप० | 7 | 32 | 234 |
| 198 | शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रम० | 1 | 16 | 105 |
| 199 | शुश्रूषस्व गुरून् कुरु प्रियसखी० | 4 | 20 | 171 |
| 200 | शैलानामवरोहतीव शिखराद्० | 7 | 8 | 222 |
| 201 | संकल्पितं प्रथममेव मया० | 4 | 15 | 168 |
| 202 | संदष्टकुसुमशयनान्याशु० | 3 | 21 | 143 |
| 203 | संमीलन्ति न तावद् बन्धनकोशा० | 3 | 7 | 136 |
244 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 204 | संरोपिते प्यात्मनि धर्मपत्नी० | 6 | 27 | 214 |
| 205 | सख्यस्ते स किल शतक्रतोरवध्य० | 6 | 36 | 218 |
| 206 | सतीमपि ज्ञातिकुलैकसंश्रयां० | 5 | 18 | 183 |
| 207 | सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि० | 1 | 19 | 107 |
| 208 | सा निन्दन्ती स्वानि भाग्यानि० | 5 | 33 | 190 |
| 209 | साक्षात् प्रियामुपगतामपहाय० | 6 | 18 | 207 |
| 210 | सायंतने सवनकर्मणि संप्रवृत्ते० | 3 | 41 | 154 |
| 211 | सिध्यन्ति कर्मसु महत्स्वपि० | 7 | 4 | 220 |
| 212 | सुखपरस्य हरेरुभयैः कृतं० | 7 | 3 | 220 |
| 213 | सुतनु हृदयात् प्रत्यादेशव्यलीक० | 7 | 24 | 230 |
| 214 | सुभगसलिलावगाहाः पाटलिंसंसर्ग० | 1 | 3 | 97 |
| 215 | स्तनन्यस्तोशीरं प्रशिथिल० | 3 | 10 | 137 |
| 216 | स्त्रीणामशिक्षितपटुत्वम्० | 5 | 23 | 187 |
| 217 | स्निग्धं वीक्षितमन्यतो पि नयने० | 2 | 2 | 121 |
| 218 | स्मर एव तापहेतुर्निवापयिता० | 3 | 14 | 139 |
| 219 | स्मृतिभिन्नमोहतमसो दिष्ट्या० | 7 | 22 | 230 |
| 220 | स्रस्तांसावतिमात्रलोहिततलौ० | 1 | 30 | 117 |
| 221 | स्वप्नो नु माया नु मतिभ्रमो० | 6 | 11 | 204 |
| 222 | स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यसे० | 5 | 6 | 176 |
| 223 | स्वायंभुवान्मरीचेर्यः प्रबभूव० | 7 | 9 | 222 |
| 224 | स्विन्नांगुलिनिवेशाद् रेखा० | 6 | 19 | 208 |
| 225 | हरकोपाग्निदग्धस्य दैवेनामृत० | 3 | 34 | 150 |
परिशिष्ट-2
( सन्दर्भदीपिका में निर्दिष्ट ग्रन्थ एवं ग्रन्थकारों की अ-कारादि क्रम से नामावली )
- अद्भुतसागरः-(1)-15
- अनन्तार्णवः-(2)-3
- अमरः-(1)-4, 7, 8, 12, (2)-2, 8, 12, (3)-6, 15, 25, (4)-9, (5)-9, 14, 19, 28, (7)-11,
- अमरटीका-(6)-30,
- आगमः-(7)-35,
- कविकण्ठहारः-(1)-25,
- कविकल्पलतिका-(3)-5,
- कालिदासः-(1)-1,
- काव्यमीमांसकः-(1)-6,
- कोषः-(1)-16, 20, (2)-10, (3)-24, (5)-21,
- गुरवः-(1)-10,
- चतुर्भुजमिश्रः-(1)-1,
- तीरभुक्तीयग्रन्थः-(1)-20,
- त्रिकाण्डशेषः-(4)-6,
- त्रिलोचनमिश्रः-(1)-1, 23, 24, (3)-5, (6)-33,
- दर्पणकारः (विश्वनाथः)-(3)-38, (5)-4,
- दाक्षिणात्यग्रन्थः-(1)-20, (6)-16,
- दुर्गटीका-(2)-15,
- देशी-(4)-18, (5)-19,
- नव्याः-(1)-1, 14,
- नाट्यलोचनः-(1)-23, 24, (3)-5, (6)-33,
- पाणिनिसूत्रम्-(1)-15, (2)-1 से पूर्व,
- पुराणपुस्तकम्-(5)-24,
246 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
- प्राकृतसूत्रम्-(1)-2, 15, 20, (3)-19, 37, (4)-13, (6)-2, 32, (7)-20,
- प्राचीनपुस्तकम्-(5)-20,
- प्राज्ञः (महिमभट्टः)-(2)-6,
- भरतः-(1)-1, 4, 5, 16, 21, 23, 24, (2)-1, 3, 13, (3)-1, 2, 10, 11, 14, 19, 20, 35, (4)-5, (5)-1, (6)-2,
- भर्तृहरिमिश्रः-(1)-1,
- मनुः-(1)-14, (3)-28, (5)-14,
- मेदिनी-(1)-10, 12, 16, (2)-11, (3)-25, 30, (6)-29,
- वामदेवमिश्रः-(1)-1,
- विदेशीयपुस्तकम्-(1)-14, 17, (4)-20, (6)-14, 20, (7)-5,
- व्याकरणम्-(5)-14, 30,
- व्याडिः-(1)-1,
- शङ्करः-(1)-1, 3, 4, 5, 9, 9, 10, 14, 15, 15, 16,17, 17, 20, 21, 21, 23, 24, 24, 24, 25, 25, 27, (2)-1, 3, 4, 4, 4, 5, 6, 7, 7, 7, 10, 11, 14, 17,17, (3)-5, 8, 20, 23, 28, 33, 36,37,37,37, 40, (4) 1, 1, 2, 3, 5, 5, 6, 6, 7,14,18,19, (5)-5,5,9,10, 11, 17,18, 20, 23, (6)-1, 2, 2, 6, 11, 15, 27, 34, (7)-6, 8, 11, 13, 14, 15, 20, 20,
- शाश्वतः-(1)-12, 12, 14, 26, (3)-9, 23, (4)-15, 20,
- सामुद्रिकः-(7) -15,
- साहसांकः-(1)-1,
- साहित्यदर्पणः-(2)-4,
- साहित्यरत्नाकरः-(1)-20, 23, (यज्ञनारायण दीक्षितः)
- हारावली-(4)-18, (6) 1.
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