अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय ३२१ * ६५९
जिनमें कमल अङ्कित रहेंगे। इस प्रकार इस चक्रमें पाँच कमल होंगे, जिनका वर्ण श्वेत होगा। मध्यवर्ती कमलमें निष्कल (निराकार परमात्मा)-का पूजन करना चाहिये। पूर्वाद दिशाओंमें हृदय आदि अङ्गोंकी तथा विदिशाओंमें अस्त्रोंकी पूजा होनी चाहिये। पूर्ववत् 'सद्योजात' आदि पाँच ब्रह्ममय मुखोंका भी पूजन आवश्यक है॥ ३४—३७॥
अब मैं 'बुद्ध्याधार-चक्र'का वर्णन करता हूँ। सौ पदोंके क्षेत्रमेंसे मध्यवर्ती पंद्रह पदोंमें एक कमल अङ्कित करे। फिर आठ दिशाओंमें एक-एक करके आठ शिवलिङ्गोंकी रचना करे। मेखलाभागसहित कण्ठकी रचना दो पदोंमें होगी। आचार्य अपनी बुद्धिका सहारा लेकर यथास्थान लता आदिकी कल्पना करे। चार, छः, पाँच और आठ आदि कमलोंसे युक्त मण्डल होता है। बीस-तीस आदि कमलोंवाला भी मण्डल होता है। १२१२० कमलोंसे युक्त भी सम्पूर्ण मण्डल हुआ करता है। १२० कमलोंके मण्डलका भी वर्णन दृष्टिगोचर होता है। श्रीहरि, शिव, देवी तथा सूर्यदेवके १४४० मण्डल हैं। १७ पदोंद्वारा सत्रह पदोंका विभाग करनेपर २८९ पद होते हैं। उक्त पदोंके मण्डलमें लतालिङ्गका उद्भव कैसे होता है, यह सुनो। प्रत्येक दिशामें पाँच, तीन, एक, तीन और पाँच पदोंको मिटा दे। ऊपरके दो पदोंसे लिङ्ग तथा पार्श्ववर्ती दो-दो कोष्ठकोंसे मन्दिर बनेगा। मध्यवर्ती दो पदोंका कमल हो। फिर एक कमल और होगा। लिङ्गके पार्श्वभागोंमें दो 'भद्र' बनेंगे। एक पदका द्वार होगा; उसका लोप नहीं किया जायगा। उस द्वारके पार्श्वभागोंमें छः-छः पदोंका लोप करनेसे द्वारशोभा बनेगी। शेष पदोंमें श्रीहरिके लिये लहलहाती लताएँ होंगी। ऊपरके दो पदोंका लोप करनेसे श्रीहरिके लिये 'भद्राष्टक' बनेंगे। फिर चार पदोंका लोप करनेसे रश्मिमालाओंसे युक्त शोभास्थान बनेगा। पचीस पदोंसे कमल, फिर पीठ, अपीठ तथा दो-दो पदोंको रखकर (एकत्र करके) आठ उपशोभाएँ बनेंगी। देवी आदिका सूचक 'भद्रमण्डल' बीचमें विस्तृत और प्रान्तभागमें लघु होता है। बीचमें नौ पदोंका कमल बनता है तथा चारों कोणोंमें चार 'भद्रमण्डल' बनते हैं। शेष त्रयोदश पदोंका 'बुद्ध्याधार-मण्डल' है। इसमें एक सौ साठ पद होते हैं। 'बुद्ध्याधार-मण्डल' भगवान् शिव आदिकी आराधनाके लिये प्रशस्त है॥ ३८—४८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मण्डलविधानका वर्णन' नामक तीन सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२०॥
तीन सौ इक्कीसवाँ अध्याय
अघोरास्त्र आदि शान्ति-विधानका कथन
महादेवजी कहते हैं—स्कन्द! पहले समस्त कर्मोंमें 'अस्त्रयाग' करना चाहिये। यह सिद्धि प्रदान करनेवाला है। मध्यभागमें शिव, विष्णु आदिके अस्त्रकी पूजा करनी चाहिये तथा पूर्वाद दिशाओंमें क्रमशः इन्द्रादि दिक्पालोंके वज्र आदि अस्त्रोंका पूजन करना चाहिये। भगवान् शंकरके पाँच मुख तथा दस हाथ हैं। उनके इस स्वरूपका ध्यान करते हुए युद्धसे पूर्व पूजा कर ली जाय तो विजयकी प्राप्ति होती है। ग्रहपूजा करते समय नवग्रहचक्रके मध्यमें सूर्यदेवकी तथा पूर्वाद दिशाओंमें सोम आदिकी अर्चना करनी चाहिये। ग्रहोंकी पूजा करनेसे सभी ग्रह एकादश (ग्यारहवें) स्थानमें स्थित होते हैं और उस स्थानमें स्थितकी भाँति उत्तम फल देते हैं॥ १—२$\frac{१}{२}$॥
६६० * अग्निपुराण *
अब मैं समस्त उत्पातोंका नाश करनेवाली 'अस्त्रशान्ति' का वर्णन करूँगा। यह शान्ति ग्रहरोग आदिको शान्त करनेवाली तथा महामारी एवं शत्रु का मर्दन करनेवाली है। विघ्नकारक गणोंके द्वारा उत्पादित उत्पातको भी शान्त करती है। मनुष्य 'अघोरास्त्र' का जप करे। एक लाख जप करनेसे ग्रहबाधा आदिका निवारण होता है और तिलसे दशांश होम कर दिया जाय तो उत्पातोंका नाश होता है। एक लाख जप-होमसे दिव्य उत्पातका तथा आधे लक्ष जप-होमसे आकाशज उत्पातका विनाश होता है। घीकी एक लाख आहुति देनेसे भूमिज उत्पातके निवारणमें सफलता प्राप्त होती है। घृतमिश्रित गुग्गुलके होमसे सम्पूर्ण उत्पात आदिका शमन हो जाता है। दूर्वा, अक्षत तथा घीकी आहुति देनेसे सारे रोग दूर होते हैं। केवल घीकी एक सहस्र आहुतिसे बुरे स्वप्न नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। वही आहुति यदि दस हजारकी संख्यामें दी जाय तो ग्रहदोषका शमन होता है। घृतमिश्रित जौकी दस हजार आहुतियोंसे विनायकजनित पीड़ाका निवारण होता है। दस हजार घीकी आहुतिसे तथा गुग्गुलकी भी दस सहस्र आहुतिसे भूत-वेताल आदिकी शान्ति होती है। यदि कोई बड़ा भारी वृक्ष आँधी आदिसे स्वतः उखड़कर गिर जाय, घरमें सर्पका कङ्गाल हो तथा वनमें प्रवेश करना पड़े तो दूर्वा, घी और अक्षतके होमसे विघ्नकी शान्ति होती है। उल्कापात या भूकम्प हो तो तिल और घीसे होम करनेसे कल्याण होता है। वृक्षोंसे रक्त बहे, असमयमें फल-फूल लगें, राष्ट्रभङ्ग हो, मारणकर्म हो, जब मनुष्य-पशु आदिके लिये महामारी आ जाय तो तिलमिश्रित घीसे अर्धलक्ष आहुति देनी चाहिये। इससे दोषोंका शमन होता है। यदि हाथीके लिये महामारी उपस्थित हो, हथनीके दाँत बढ़ जायँ अथवा हथनीके गण्डस्थलसे मद फूटकर बहने लगे तो इन सब दोषोंकी शान्तिके लिये दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। इससे अवश्य शान्ति होती है॥ ३-१२$\frac{१}{२}$॥
जहाँ असमयमें गर्भपात हो या जहाँ बालक जन्म लेते ही मर जाता हो तथा जिस घरमें विकृत अङ्गवाले शिशु उत्पन्न होते हों तथा जहाँ समय पूर्ण होनेसे पूर्व ही बालकका जन्म होता हो, वहाँ इन सब दोषोंके शमनके लिये दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। सिद्धि-साधनमें तिलमिश्रित घीसे एक लाख हवन किया जाय तो वह उत्तम है, मध्यम सिद्धिके साधनमें अर्धलक्ष और अधम सिद्धिके लिये पचीस हजार आहुति देनी चाहिये। जैसा जप हो, उसके अनुसार ही होम होना चाहिये। इससे संग्राममें विजय प्राप्त होती है। न्यासपूर्वक तेजस्वी पञ्चमुखका ध्यान करके 'अघोरास्त्र'* का जप करना चाहिये॥ १३-१६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अघोरास्त्र आदि विविध शान्तिका कथन' नामक तीन सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२१॥
तीन सौ बाईसवाँ अध्याय
पाशुपतास्त्र-मन्त्रद्वारा शान्तिका कथन
महादेवजी कहते हैं— स्कन्द! अब मैं पाशुपतास्त्र-मन्त्रसे शान्ति तथा पूजा आदिकी बात बताऊँगा। शान्ति और जप आदि पूर्ववत् (पूर्व अध्यायमें कहे अनुसार) कर्तव्य हैं। इस
* अघोरास्त्र-मन्त्रको ३१८ वें अध्यायमें स्पष्ट कर दिया गया है।
- अध्याय ३२२ * ६६१
मन्त्रके आंशिक पाठ या जपसे पूर्वकृत पुण्यका नाश होता है; किंतु फडन्त-सम्पूर्ण मन्त्रका जप आपत्ति आदिका निवारण करनेवाला है॥ १॥
ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्य-पराक्रमाय त्रिपञ्चनयनाय नानारूपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वाङ्गरक्तायभिन्नाञ्जनचयप्रख्याय श्मशानवेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तनरताय सर्वसिद्धिप्रदाय भक्तानुकम्पिनेऽसंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभजनकाय व्याधि-निग्रहकारिणे पापभञ्जनाय सूर्यसोमाग्निनेत्राय विष्णुकवचाय खड्गवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रुद्रशूलाय ज्वलज्जिह्वाय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षयकारिणे। ॐ कृष्णपिङ्गलाय फट्। हूंकारास्त्राय फट्¹। वज्रहस्ताय फट्। शक्तये फट्। दण्डाय फट्। यमाय फट्। खड्गाय फट्। नैर्ऋताय फट्। वरुणाय फट्। वज्राय फट्। पाशाय फट्। ध्वजाय फट्। अङ्कुशाय फट्। गदायै फट्। कुबेराय फट्। त्रिशूलाय फट्। मुद्गराय फट्। चक्राय फट्। पद्माय फट्। नागास्त्राय फट्। ईशानाय फट्। खेटकास्त्राय फट्। मुण्डाय फट्। मुण्डास्त्राय फट्। कङ्कालास्त्राय फट्। पिच्छिकास्त्राय फट्। क्षुरिकास्त्राय फट्। ब्रह्मास्त्राय फट्। शक्त्यस्त्राय फट्। गणास्त्राय फट्। सिद्धास्त्राय फट्। पिलिपिच्छास्त्राय फट्। गन्धर्वास्त्राय फट्। पूर्वास्त्राय² फट्। दक्षिणास्त्राय फट्। वामास्त्राय फट्। पश्चिमास्त्राय फट्। मन्त्रास्त्राय फट्। शाकिन्यस्त्राय फट्। योगिन्यस्त्राय फट्। दण्डास्त्राय फट्। महादण्डास्त्राय फट्। नमोऽस्त्राय फट्³। शिवास्तव्याय फट्। ईशानास्त्राय फट्। पुरुषास्त्राय⁴ फट्। अघोरास्त्राय⁵ फट्। सद्योजातास्त्राय फट्। हृदयास्त्राय फट्। महास्त्राय फट्। गरुडास्त्राय फट्। राक्षसास्त्राय फट्। दानवास्त्राय फट्। क्षौं नरसिंहास्त्राय फट्। त्वष्ट्रस्त्राय फट्। सर्वास्त्राय फट्। नः⁶ फट्। वः⁷ फट्। पः फट्। फः फट्⁸। मः फट्। श्रीः⁹ फट्। पेः¹⁰ फट्। भूः फट्। भुवः फट्। स्वः फट्। महः फट्। जनः फट्। तपः फट्। सत्यं फट्। सर्वलोक फट्। सर्वपाताल फट्। सर्वतत्त्व¹¹ फट्। सर्वप्राण फट्। सर्वनाडी फट्। सर्वकारण फट्। सर्वदेव फट्। ह्रीं फट्। श्रीं फट्। हूं¹² फट्। स्रुं फट्¹³। स्वां¹⁴ फट्। लां फट्। वैराग्याय फट्। मायास्त्राय फट्। कामास्त्राय फट्। क्षेत्रपालास्त्राय फट्। हुंकारास्त्राय फट्। भास्करास्त्राय फट्। चन्द्रास्त्राय फट्। विघ्नेश्वरास्त्राय फट्। गौः गां फट्। ख्रों ख्रों फट्। हौं हों¹⁵ फट्। भ्रामय भ्रामय फट्। संतापय संतापय फट्। छादय छादय फट्। उन्मूलय उन्मूलय फट्। त्रासय त्रासय फट्। संजीवय संजीवय फट्। विद्रावय विद्रावय फट्। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट्।
इस पाशुपत-मन्त्रकी एक बार आवृत्ति करनेसे ही यह मनुष्य सम्पूर्ण विघ्नोंका नाश कर सकता है, सौ आवृत्तियोंसे समस्त उत्पातोंको नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदिमें विजय पा सकता है॥ २॥
इस मन्त्रद्वारा घी और गुग्गुलके होमसे मनुष्य असाध्य कार्योंको भी सिद्ध कर सकता है। इस पाशुपतास्त्र¹⁶-मन्त्रके पाठमात्रसे समस्त क्लेशोंकी शान्ति हो जाती है॥ ३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पाशुपतास्त्र-मन्त्रद्वारा शान्तिका कथन' नामक तीन सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२२॥
१. पाठान्तर-कूर्राय फट्। २. पाठा० मूर्वास्त्राय। ३. पाठा० नानास्त्राय फट्। ४. इससे पहले पूनाकी प्रतिमें-महादण्डास्त्राय फट्। नामास्त्राय फट्-इतना अधिक पाठ है। ५. पाठा० वामदेवास्त्राय फट्। ६. पूनाकी प्रतिमें इससे पूर्व 'खः फट्'-इतना अधिक है। ७. पूनाकी प्रतिमें यह नहीं है। ८. पूनाकी प्रतिमें 'भः फट्। पः फट्।' ऐसा पाठ है। ९. पाठा० स्त्रा। १०. पाठा० है। ११. पाठा० सत्त्व। १२. पाठा० हुं। १३. स्तुं। १४. आं। १५. पाठा० हों। १६. 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र' (३०वें श्वास)-में तथा 'शारदातिलक' (२०वें पटल)-में एक षडक्षर पाशुपत-मन्त्र भी वर्णित है। यथा- 'ॐ श्लीं पशुं हुं फट्।' इसके जप और प्रयोगकी विधि वहीं द्रष्टव्य है।
६६२ * अग्निपुराण *
तीन सौ तेईसवाँ अध्याय
गङ्गा-मन्त्र, शिवमन्त्रराज, चण्डकपालिनी-मन्त्र, क्षेत्रपाल-बीजमन्त्र, सिद्धविद्या, महामृत्युंजय, मृतसंजीवनी, ईशानादि मन्त्र तथा इनके छः अङ्ग एवं अघोरास्त्रका कथन
महादेवजी कहते हैं—स्कन्द! 'ॐ हूं हं सः'—इस मन्त्रसे मृत्युरोग आदि शान्त हो जाते हैं। इस मन्त्रद्वारा दूर्वाकी एक लाख आहुतियाँ दी जायँ तो उससे साधक शान्ति तथा पुष्टिका भी साधन कर सकता है। षडानन! अथवा केवल प्रणव (ॐ) अथवा माया (ह्रीं)—के जपसे ही दिव्य, अन्तरिक्षगत तथा भूमिगत उत्पातोंकी शान्ति होती है। उत्पातवृक्षके शमनका भी यही उपाय है॥ १-२॥
(गङ्गा-सम्बन्धी वशीकरणमन्त्र)
'ॐ नमो भगवति गङ्गे कालि कालि महाकालि महाकालि मांसशोणितभोजने रक्तकृष्णमुखि वशमानय मानुषान् स्वाहा।'—इस मन्त्रका एक लाख जप करके दशांश आहुति देकर मनुष्य सम्पूर्ण कर्मोंमें सिद्धि पा सकता है। इन्द्र आदि देवताओंको भी वशमें ला सकता है, फिर इन साधारण मनुष्योंको वशमें लाना कौन बड़ी बात है? यह विद्या अन्तर्धानकरी, मोहनी, जृम्भनी, शत्रुओंको वशमें लानेवाली तथा शत्रुंकी बुद्धिको मोहमें डाल देनेवाली है। यह कामधेनुविद्या सात प्रकारकी कही गयी है॥ ३-५$\frac{१}{२}$॥
अब मैं 'मन्त्रराज'का वर्णन करूँगा, जो शत्रुओं तथा चोर आदिको मोह लेनेवाला है। यह साक्षात् शिव (मेरे) द्वारा पूजित है। इसका सभी महान् भयके अवसरोंपर स्मरण करना चाहिये। एक लाख जप करके तिलोंद्वारा हवन करनेसे यह मन्त्र सिद्ध होता है। अब इसका उद्धार सुनो॥ ६-७॥
'ॐ हले शूलो एहि ब्रह्मसत्येन विष्णुसत्येन रुद्रसत्येन रक्ष मां वाचेश्वराय स्वाहा'॥ ८॥
भगवती शिवा दुर्गम संकटसे तारती—उद्धार करती है, इसलिये 'दुर्गा' मानी गयी है॥ ९॥
'ॐ ह्रीं चण्डकपालिनि दन्तान् किट किट क्षिट क्षिट गुह्ये फट् हीम्'॥ १०॥
—इस मन्त्रराजके जपपूर्वक चावल धोकर उसको इस मन्त्रके तीस बार जपद्वारा अभिमन्त्रित करे। फिर वह चावल चोरोंमें बँटवा दे। उस चावलको दाँतोंसे चबानेपर उनके श्वेत दन्त गिर जाते हैं तथा वे मनुष्य चोरीके पापसे मुक्त एवं शुद्ध हो जाते हैं॥ ११-१२॥
(क्षेत्रपालबलि-मन्त्र)
'ॐ ज्वलल्लोचन कपिलजटाभारभास्वर विद्रावण त्रैलोक्यडामर डामर दर दर भ्रम भ्रम आकट्ट आकट्ट तोटय तोटय मोटय मोटय दह दह पच पच एवं सिद्धिरुद्रो ज्ञापयति यदि ग्रहोऽपगतः स्वर्गलोकं देवलोकं वाऽऽरामविहाराचलं तथापि तमावर्तयिष्यामि बलिं गृह्ण गृह्ण ददामि ते स्वाहा। इति'॥ १३॥
—इस मन्त्रसे क्षेत्रपालको बलि देकर न्यास करनेसे अनिष्ट ग्रह रोता हुआ चला जाता है। साधकके शत्रु नष्ट हो जाते हैं तथा रणभूमिमें शत्रु-समुदायका विनाश हो जाता है॥ १४॥
'हंस' बीजका न्यास करके साधक तीन प्रकारके विष अथवा विघ्नका निवारण कर देता है। अगुरु, चन्दन, कुष्ठ (कूट), कुङ्कुम, नागकेसर, नख तथा देवदारु—इन सबको सममात्रामें कूट-पीसकर धूप बना ले। फिर इसमें मधुमक्खीके शहदका योग कर दे। उसकी सुगन्धसे शरीर
* अध्याय ३२३ * ६६३
तथा वस्त्र आदिको धूपित या वासित करनेसे मनुष्य विवाद, स्त्रीमोहन, शृंगार तथा कलह आदिके अवसरपर शुभ फलका भागी होता है। कन्यावरण तथा भाग्योदय-सम्बन्धी कार्यमें भी उसे सफलता प्राप्त होती है। मायामन्त्र (ह्रीं)-से मन्त्रित हो, रोचना, नागकेसर, कुङ्कुम तथा मैनसिलका तिलक ललाटमें लगाकर मनुष्य जिसकी ओर देखता है, वही उसके वशमें हो जाता है। शतावरीके चूर्णको दूधके साथ पीया जाय तो वह पुत्रकी उत्पत्ति करानेवाला होता है। नागकेसरके चूर्णको घीमें पकाकर खाया जाय तो वह भी पुत्रकारक होता है। पलाशके बीजको पीसकर पीनेसे भी पुत्रकी प्राप्ति होती है॥ १५-२०॥
( वशीकरणके लिये सिद्ध-विद्या )
'ॐ उत्तिष्ठ चामुण्डे जम्भय जम्भय मोहय मोहय (अमुकं) वशमानय स्वाहा'॥ २१॥
—यह छब्बीस अक्षरोंवाली 'सिद्ध-विद्या' है। (यदि किसी स्त्रीको वशमें करना हो तो) नदीके तीरकी मिट्टीसे लक्ष्मीजीकी मूर्ति बनाकर धतूरके रससे मदारके पत्तेपर उस अभीष्ट स्त्रीका नाम लिखे। इसके बाद मूत्रोत्सर्ग करनेके पश्चात् शुद्ध हो उक्त मन्त्रका जप करे। यह प्रयोग अभीष्ट स्त्रीको अवश्य वशमें ला सकता है॥ २२-२३॥
(महामृत्युंजय)
'ॐ जूं सः वषट्'॥ २४॥
—यह 'महामृत्युंजय-मन्त्र' है, जो जप तथा होमसे पुष्टिकारक होता है॥ २५॥
(मृतसंजीवनी)
'ॐ हं सः हूं हूं सः, हः सौः'॥ २६॥
—यह आठ अक्षरवाली 'मृतसंजीवनी-विद्या' है, जो रणभूमिमें विजय दिलानेवाली है। 'ईशान' आदि मन्त्र भी धर्म-काम आदिको देनेवाले हैं॥ २७॥
(ईशान आदि मन्त्र)
(ॐ) ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्¹ ॥ २८ ॥
(ॐ) तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ २९ ॥
(ॐ) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वतः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः³ ॥ ३० ॥
(ॐ) वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः४ ॥ ३१ ॥
(ॐ) सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमो भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः५ ॥ ३२ ॥
अब मैं 'पञ्चब्रह्म'के छः अङ्गोंका वर्णन करूँगा, जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है॥ ३३॥
ईशान आदि मन्त्रोंके अर्थ—
१. जो सम्पूर्ण विद्याओंके ईश्वर, समस्त भूतोंके अधीश्वर, ब्रह्म वेदके अधिपति, ब्रह्म-बल-वीर्यके प्रतिपालक तथा साक्षात् ब्रह्मा एवं परमात्मा हैं, वे सच्चिदानन्दमय नित्य कल्याणस्वरूप शिव मेरे बने रहें॥ २८॥
२. तत्पदार्थ—परमेश्वररूप अन्तर्यामी पुरुषको हम जानें, उन महादेवका चिन्तन करें; वे भगवान् रुद्र हमें सद्धर्मके लिये प्रेरित करते रहें॥ २९॥
३. जो अघोर हैं, घोर हैं, घोरसे भी घोरतर हैं, उन सर्वव्यापी, सर्वसंहारी रुद्ररूपोंके लिये जो आपके ही स्वरूप हैं,—साक्षात् आपके लिये मेरा नमस्कार हो॥ ३०॥
४. प्रभो! आप ही वामदेव, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, रुद्र, काल, कलविकरण, बलविकरण, बल, बलप्रमथन, सर्वभूतदमन तथा मनोन्मन आदि नामोंसे प्रतिपादित होते हैं; इन सभी नाम-रूपोंमें आपके लिये मेरा बारंबार नमस्कार है॥ ३१॥
५. मैं सद्योजात शिवकी शरण लेता हूँ। सद्योजातको मेरा नमस्कार है। किसी जन्म या जगत्में मेरा अतिभव—पराभव न करें। आप भवोद्भवको मेरा नमस्कार है॥ ३२॥
६६४ * अग्निपुराण *
| ( ॐ ) नमः परमात्मने पराय कामदाय परमेश्वराय योगाय योगसम्भवाय सर्वकराय कुरु कुरु सद्य सद्य भव भव भवोद्भव वामदेव सर्वकार्यकर पापप्रशमन सदाशिव प्रसन्न नमोऽस्तु ते ( स्वाहा ) ॥ ३४ ॥<br>— यह सतहत्तर अक्षरोंका हृदय-मन्त्र है, जो सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। [कोष्ठकमें दिये गये अक्षरोंको छोड़कर गिननेपर सतहत्तर अक्षर होते हैं।] ॥ ३५ ॥<br>(इस मन्त्रको पढ़कर 'हृदयाय नमः' बोलकर हृदयका स्पर्श करना चाहिये।)<br>'ॐ शिव शिवाय नमः।'—यह शिरोमन्त्र है, अर्थात् इसे पढ़कर 'शिरसे स्वाहा' बोलकर दाहिने हाथसे सिरका स्पर्श करना चाहिये। 'ॐ शिवहृदये ज्वालिनि स्वाहा, शिखायै वषट्' बोलकर शिखाका स्पर्श करे। | 'ॐ शिवात्मक महातेजः सर्वज्ञ प्रभो संवर्तय महाघोरकवच पिङ्गल आयाहि पिङ्गल नमो महाकवच शिवाज्ञया हृदयं बन्ध बन्ध घूर्णय घूर्णय चूर्णय चूर्णय सूक्ष्मासूक्ष्म वज्रधर वज्रपाशधनुर्वज्राशनिवज्रशरीर मच्छरीरमनुप्रविश्य सर्वदुष्टान् स्तम्भय स्तम्भय हुम्* ॥ ३६ ॥<br>—यह एक सौ पाँच अक्षरोंका कवच-मन्त्र है। अर्थात् इसे पढ़कर 'कवचाय हुम्' बोलते हुए दोनों हाथोंसे एक साथ दोनों भुजाओंका स्पर्श करे ॥ ३७ ॥<br>'ॐ ओजसे नेत्रत्रयाय वौषट्' ऐसा बोलकर दोनों नेत्रोंका स्पर्श करे। इसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर अस्त्रन्यास करे—'ॐ ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोरघोरतरतनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट्।' यह (प्रणवसहित बावन अक्षरोंका) 'अघोरास्त्र-मन्त्र' है ॥ ३८ ॥ |
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इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अनेकविध मन्त्रोंके साथ ईशान आदि मन्त्र तथा छः अङ्गोंसहित अघोरास्त्रका कथन' नामक तीन सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२३ ॥
तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय
कल्पाघोर रुद्रशान्ति
| महादेवजी कहते हैं—स्कन्ध! अब मैं 'कल्पाघोर-शिवशान्ति' का वर्णन करता हूँ। भगवान् अघोर शिव सात करोड़ गणोंके अधिपति हैं तथा ब्रह्महत्या आदि पापोंको नष्ट करनेवाले हैं। उत्तम और अधम—सभी सिद्धियोंके आश्रय तथा सम्पूर्ण रोगोंके निवारक हैं। भौम, दिव्य तथा अन्तरिक्ष—सभी उत्पातोंका मर्दन करनेवाले हैं। विष, ग्रह और पिशाचोंको भी अपना ग्रास बना लेनेवाले तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं। पापसमूहको पीड़ा देकर दूर भगानेके लिये वे उस प्रबल प्रायश्चित्तके प्रतीक हैं, जो दुर्भाग्य तथा दुःखका विनाशक है ॥ १–३ ॥ | 'एकवीर' का सर्वाङ्गमें न्यास करके सदा पञ्चमुख शिवका ध्यान करे। (विभिन्न कर्मोंमें उनके विभिन्न शुक्ल-कृष्ण आदि वर्णोंका ध्यान किया जाता है। यथा—) शान्ति तथा पुष्टि-कर्ममें भगवान् शिवका वर्ण शुक्ल है, ऐसा चिन्तन करे। वशीकरणमें उनके रक्तवर्णका, स्तम्भनकर्ममें पीतवर्णका, उच्चाटन तथा मारणकर्ममें धूम्रवर्णका, आकर्षणमें कृष्णवर्णका तथा मोहन-कर्ममें कपिलवर्णका चिन्तन करना चाहिये। (अघोरमन्त्र बत्तीस अक्षरोंका मन्त्र बताया गया है।) वे बत्तीस अक्षर वेदोक्त अघोरशिवके रूप हैं। अतः उतने अक्षरोंके मन्त्रस्वरूप अघोरशिवकी |
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*पाठान्तर 'हूमू'।
* अध्याय ३२४ * ६६५
अर्चना करनी चाहिये। इस मन्त्रका (बत्तीस) या तीस लाख जप करके उसका दशांश होम करे। यह होम गुग्गुलमिश्रित घीसे होना चाहिये। इससे मन्त्र ‘सिद्ध’ होता और साधक ‘सिद्धार्थ’ हो जाता है। वह सब कुछ कर सकता है। अघोरसे बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र भोग तथा मोक्ष देनेवाला नहीं है। इसके जपसे अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी होता तथा अस्नातक स्नातक हो जाता है। अघोरास्त्र तथा अघोर-मन्त्र—दोनों मन्त्रराज हैं। इनमेंसे कोई भी मन्त्र जप, होम तथा पूजनसे युद्धस्थलमें शत्रुसेनाको रौंद सकता है॥ ४-८॥
अब मैं कल्याणमयी 'रुद्रशान्ति'का वर्णन करता हूँ, जो सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली है। पुत्रकी प्राप्ति, ग्रहबाधाके निवारण, विष एवं व्याधिके विनाश, दुर्भिक्ष तथा महामारीकी शान्ति, दुःस्वप्ननिवारण, बल आदि तथा राज्य आदिकी प्राप्ति और शत्रुओंके संहारके लिये इस 'रुद्रशान्ति'का प्रयोग करना चाहिये। यदि अपने बगीचेके किसी वृक्षमें असमयमें फल लग जाय तो यह भी अनिष्टकारक है; अतः उसकी शान्तिके लिये तथा समस्त ग्रहबाधाओंका नाश करनेके लिये भी उक्त शान्तिका प्रयोग किया जा सकता है। पूजन-कर्ममें मन्त्रके अन्तमें 'नमः' बोलना चाहिये तथा हवन-कर्ममें 'स्वाहा'। आप्यायन (तृप्ति)-में मन्त्रान्तमें 'वषट्' पदका प्रयोग करे और पुष्टि-कर्ममें 'वौषट्' पदका। मन्त्रमें जो दो जगह 'च' का प्रयोग है, वहाँ आवश्यकताके अनुसार 'नमः', 'स्वाहा' आदि जातिका योग करना चाहिये॥ ९-१२॥
रुद्रशान्ति-मन्त्र
ॐ रुद्राय च ते ॐ वृषभाय नमोऽविमुक्ताया- सम्भवाय पुरुषाय च पूज्यायेशानाय पौरुषाय पञ्च पञ्चोत्तरे विश्वरूपाय करालाय विकृतरूपायाविकृतरूपाय॥ १३॥
उत्तरवर्ती कमलदलमें नियतितत्त्वकी स्थिति है, जल (वरुण)-की दिशा पश्चिमके कमलदलमें कालतत्त्व है और नैर्ऋत्यकोणवर्ती दलमें मायातत्त्व अवस्थित है; उन सबमें देवताओंकी पूजा होती है। 'एकपिङ्गलाय श्वेतपिङ्गलाय कृष्णपिङ्गलाय नमः। मधुपिङ्गलाय नमः—मधुपिङ्गलाय।'—इन सबकी पूजा नियतितत्त्वमें होती है। 'अनन्तायार्द्राय शुष्काय पयोगणाय (नमः)।'—इनकी पूजा कालतत्त्वमें करे। 'करालाय विकरालाय (नमः)।'—इन दोकी पूजा मायातत्त्वमें करे। 'सहस्रशीर्षाय सहस्रवक्त्राय सहस्रकरचरणाय सहस्रलिङ्गाय (नमः)।'—इनकी अर्चना विद्यातत्त्वमें करे। वह इन्द्रसे दक्षिण दिशाके दलमें स्थित है। वहीं छः पदोंसे युक्त षड्विध रुद्रका पूजन करे। यथा—'एकजटाय द्विजटाय त्रिजटाय स्वाहाकाराय स्वधाकाराय वषट्काराय षड्रुद्राय।' स्कन्द! अग्निकोणवर्ती दलमें ईशतत्त्वकी स्थिति है। उसमें क्रमशः 'भूतपतये पशुपतये उमापतये कालाधिपतये (नमः)।' बोलकर भूतपति आदिकी पूजा करे। पूर्ववर्ती दल सदाशिव-तत्त्वमें छः पूजनीयोंकी स्थिति है, जिनका निम्नाङ्कित मन्त्रमें नामोल्लेख है। यथा—'उमायै कुरूपधारिणि ॐ कुरु कुरु रुहिणि रुहिणि रुद्रोऽसि देवानां देवदेव विशाख हन हन दह दह पच पच मथ मथ तुरु तुरु अरु अरु मुरु मुरु रुद्रशान्तिमनुस्मर कृष्णपिङ्गल अकाल-पिशाचाधिपति विद्येश्वराय नमः।' कमलकी कर्णिकामें शिवतत्त्वकी स्थिति है। उसमें भगवान् उमा-महेश्वर पूजनीय हैं। मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ व्योमव्यापिने व्योमरूपाय सर्वव्यापिने शिवायाननन्ताय नाथायानाश्रिताय शिवाय' (प्रणवको अलग गिननेपर इस मन्त्रमें कुल नौ पद हैं)—शिवतत्त्वमें व्योमव्यापी नामवाले शिवके नौ पदोंका पूजन करना चाहिये॥ १४-२४॥
तदनन्तर योगपीठपर विराजमान शिवका नौ
६६६ * अग्निपुराण *
पदोंसे युक्त नाम बोलकर पूजन करे। मन्त्र इस प्रकार है—‘शाश्वताय योगपीठसंस्थिताय नित्ययोगिने ध्यानाहाराय नमः। ॐ नमः शिवाय सर्वप्रभवे शिवाय ईशानमूर्धाय तत्पुरुषाय पञ्चवक्त्राय।’ स्कन्द! तत्पश्चात् ‘सद्’ नामक पूर्वदलमें नौ पदोंसे युक्त शिवका पूजन करे॥ २५-२६॥
‘अघोरहृदाय वामदेवगुह्याय सद्योजातमूर्तये ॐ नमो नमः। गुह्यातिगुह्याय गोप्त्रेऽनिधनाय सर्वयोगाधिकृताय ज्योतीरूपाय’॥ २७। १॥
अग्निकोणवर्ती ईशतत्त्वमें तथा दक्षिणदिशावर्ती विद्यातत्त्वमें ‘परमेश्वराय अचेतनाचेतन व्योमन् व्यापिन्नरूपिन् प्रमथतेजस्तेजः।’—इस मन्त्रसे परमेश्वर शिवकी अर्चना करे॥ २७। २॥
नैर्ऋत्यकोणवर्ती मायातत्त्व तथा पश्चिमदिग्वर्ती कालतत्त्वमें निम्नाङ्कित मन्त्रद्वारा पूजन करे—
‘ॐ धृ धृ वां वां अनिधान निधनोद्भव शिव सर्व परमात्मन् महादेव सद्भावेश्वर महातेज योगाधिपते मुञ्च मुञ्च प्रमथ प्रमथ ॐ सर्व सर्व ॐ भव भव ॐ भवोद्भव सर्वभूतसुखप्रद॥’ २८-३०॥
वायुकोण तथा उत्तरवर्ती दलोंमें स्थित नियति एवं पुरुष—इन दोनों तत्त्वोंमें निम्नाङ्कित नौकी पूजा करे—
‘सर्वासान्निध्यकर ब्रह्मविष्णुरुद्रपरानर्चितास्तुत स्तुत साक्षिन् साक्षिन् तुरु तुरु पतङ्ग पतङ्ग पिङ्ग पिङ्ग ज्ञान ज्ञान। शब्द शब्द सूक्ष्म सूक्ष्म शिव शिव सर्वप्रद सर्वप्रद ॐ नमः शिवाय ॐ नमो नमः शिवाय ॐ नमो नमः’॥ ३१॥
ईशानवर्ती प्राकृततत्त्वमें ‘शब्द’ से लेकर ‘नमः’ तकका मन्त्र पढ़कर पूजन, जप और होम करे। यह ‘रुद्रशान्ति’ ग्रहबाधा, रोग आदि तथा त्रिविध पीडाका शमन करनेवाली तथा सम्पूर्ण मनोरथोंकी साधिका है॥ ३२॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘रुद्रशान्ति-विधान-कथन’ नामक तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२४॥
तीन सौ पचीसवाँ अध्याय
रुद्राक्ष-धारण, मन्त्रोंकी सिद्धादि संज्ञा तथा अंश आदिका विचार
महादेवजी कहते हैं— स्कन्द! शैव-साधकको रुद्राक्षका कड़ा धारण करना चाहिये। रुद्राक्षोंकी संख्या विषम हो। उसका प्रत्येक मनका सब ओरसे सम और दृढ़ हो। रुद्राक्ष एकमुख, त्रिमुख या पञ्चमुख—जैसा भी मिल जाय, धारण करे। द्विमुख, चतुर्मुख तथा षण्मुख रुद्राक्ष भी प्रशस्त माना गया है। उसमें कोई क्षति या आघात न हो—वह फूटा या घुना न होना चाहिये। उसमें तीखे कण्टक होने चाहिये। दाहिनी बाँह तथा शिखा आदिमें चतुर्मुख रुद्राक्ष धारण करे। इससे अब्रह्मचारी भी ब्रह्मचारी तथा अस्नातक पुरुष भी स्नातक हो जाता है। अथवा शिव-मन्त्रकी पूजा करके सोनेकी अँगूठीको दाहिने हाथमें धारण करे॥ १-३॥
शिव, शिखा, ज्योति तथा सावित्र—ये चार ‘गोचर’ हैं। ‘गोचर’ का अर्थ ‘कुल’ समझना चाहिये। उसीसे दीक्षित पुरुषको लक्ष्य करना चाहिये। शिवकुलमें प्राजापत्य, महीपाल, कापोत तथा ग्रन्थिक—ये चार गिने जाते हैं। कुटिल, वेताल, पद्म और हंस—ये चार ‘शिखाकुल’में परिगणित होते हैं। धृतराष्ट्र, वक, काक और गोपाल—ये चार ‘ज्योति’ नामक कुलमें समझे जाते हैं। कुटिका, साठर, गुटिका तथा दण्डी—ये चार ‘सावित्री-कुल’में गिने जाते हैं। इस प्रकार एक-एक कुलके चार-चार भेद हैं॥ ४-६½॥
अब मैं ‘सिद्ध’ आदि अंशोंकी व्याख्या
- अध्याय ३२५ * ६६७
करता हूँ, जिससे मन्त्र उत्तम सिद्धिको देनेवाला होता है। पृथ्वीपर कूटयन्त्ररहित मातृका (अक्षर) लिखे। मन्त्राक्षरोंको विलग-विलग करके अनुस्वारको पृथक् ले जाय। साधकका भी जो नाम हो, उसके अक्षरोंको अलग-अलग करे। मन्त्रके आदि और अन्तमें साधकके नामाक्षर जोड़े। फिर सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध तथा अरि—इस संज्ञाके अनुसार अक्षरोंको क्रमशः गिने। मन्त्रके आदि तथा अन्तमें 'सिद्ध' हो तो वह शत-प्रतिशत सिद्धिदायक होता है। यदि आदि और अन्त दोनोंमें 'सिद्ध' (अक्षर) हों तो उस मन्त्रकी तत्काल सिद्धि होती है। यदि आदि और अन्तमें भी 'सुसिद्ध' हो तो उस मन्त्रको सिद्धवत् मान ले—वह मन्त्र अनायास ही सिद्ध हो गया—ऐसा समझ ले। यदि आदि और अन्त—दोनोंमें 'अरि' हो तो उस मन्त्रको दूरसे ही त्याग दे। 'सिद्ध' और 'सुसिद्ध'—एकार्थक हैं। 'अरि' और 'साध्य' भी एकसे ही हैं। यदि मन्त्रके आदि और अन्त अक्षरमें भी मन्त्र 'सिद्ध' हो और बीचमें सहस्रों 'रिपु'-अक्षर हों तो भी वे दोषकारक नहीं होते हैं। मायाबीज, प्रसादबीज और प्रणवके योगसे विख्यात मन्त्रमें अंशक होते हैं। वे क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रके अंश हैं। ब्रह्माका अंश 'ब्रह्मविद्या' कहलाता है। विष्णुका अंश 'वैष्णव' कहा गया है। रुद्रांशक मन्त्र 'वीर' कहलाता है। इन्द्रांशक मन्त्र 'ईश्वरप्रिय' होता है। नागांश-मन्त्र नागोंकी भाँति स्तब्ध नेत्रवाला माना गया है। यक्षके अंशका मन्त्र 'भूषणप्रिय' होता है। गन्धर्वोंके अंशका मन्त्र अत्यन्त गीत आदि चाहता है। भीमांश, राक्षसांश तथा दैत्यांश-मन्त्र युद्ध करानेवाला होता है। विद्याधरोंके अंशका मन्त्र अभिमानी होता है। पिशाचांश मन्त्र मलाक्रान्त होता है। मन्त्रका पूर्णतः निरीक्षण करके उपदेश देना चाहिये। एकाक्षरसे लेकर अनेक अक्षरोंतकके मन्त्रके अन्तमें यदि 'फट्'—यह पल्लव जुड़ा हो तो उसे 'मन्त्र' कहना चाहिये। पचास अक्षरोंतकके (फट्काररहित) मन्त्रकी 'विद्या' संज्ञा है। बीस अक्षरोंतककी विद्याको 'बाला विद्या' कहते हैं। बीस अक्षरोंतकके 'अस्त्रान्त' मन्त्रको 'रुद्रा' कहा गया है। इससे ऊपर तीन सौ अक्षरोंतकके मन्त्र 'वृद्ध' कहे जाते हैं। अकारसे लेकर हकारतकके अक्षर मन्त्रमें होते हैं। मन्त्रमें क्रमशः शुक्ल और कृष्ण—दो पक्ष होते हैं। अनुस्वार और विसर्गको छोड़कर दस स्वर होते हैं। ह्रस्वस्वर शुक्लपक्ष तथा दीर्घस्वर कृष्णपक्ष हैं। ये ही प्रतिपदा आदि तिथियाँ हैं। उदयकालमें शान्तिक आदि कर्म करावे तथा भ्रमितकालमें वशीकरण आदि। भ्रमितकाल एवं दोनों संध्याओंमें द्वेषण तथा उच्चाटन-सम्बन्धी कर्म करे। स्तम्भनकर्मके लिये सूर्यास्तकाल प्रशस्त है। इडा नाड़ी चलती हो तो शान्तिक आदि कर्म करे। पिङ्गला नाड़ी चलती हो तो आकर्षण-सम्बन्धी कार्य करे। विषुवकालमें जब दोनों नाड़ियाँ समान भावसे स्थित हों, तब मारण, उच्चाटन आदि पाँच कर्म पृथक्-पृथक् सिद्ध करे। तीन तल्ले गृहमें नीचेके तल्लेको 'पृथ्वी', बीचवालेको 'जल' तथा ऊपरवालेको 'तेज' कहते हैं। जहाँ-जहाँ रन्ध्र (छिद्र या गवाक्ष) है, वहाँ बाह्यपार्श्वमें वायु और भीतरी पार्श्वमें आकाश है। पार्थिव अंशमें स्तम्भन, जलीय अंशमें शान्तिकर्म तथा तैजस अंशमें वशीकरण आदि कर्म करे। वायुमें भ्रमण तथा शून्य (आकाश)-में पुण्यकर्म या पुण्यकालका अभ्यास करे॥७–२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अंशक आदिका कथन' नामक तीन सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२५॥
६६८ * अग्निपुराण *
तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय
गौरी आदि देवियों तथा मृत्युंजयकी पूजाका विधान
महादेवजी कहते हैं—स्कन्द ! अब मैं सौभाग्य आदिके निमित्त उमाकी पूजाका विधान बताऊँगा। उनके मन्त्र, ध्यान, आवरणमण्डल, मुद्रा तथा होमविधिका भी प्रतिपादन करूँगा॥ १॥
‘गौं गौरीमूर्तये नमः*।’—यह गौरीदेवीका वाचक मूल मन्त्र है। ‘ॐ ह्रीं सः शौं गौर्यै नमः।’ तीन अक्षरसे ही ‘नमः’ आदिके योगपूर्वक षडङ्गन्यास करना चाहिये। प्रणवसे आसन और हृदय-मन्त्रसे मूर्तिकी उपकल्पना करे। ‘ऊ’ कालबीज तथा शिवबीजका उद्धार करे। दीर्घस्वरसे आक्रान्त प्राण—‘यां यीं’ इत्यादिसे जातियुक्त षडङ्गन्यास करे। प्रणवसे आसन तथा हृदय-मन्त्रसे मूर्तिन्यास करे। यह मैंने ‘यामल-मन्त्र’ कहा है। अब ‘एकवीर’का वर्णन करता हूँ। सृष्टिन्याससे युक्त व्यापकन्यास अग्नि, माया तथा कृशानुद्वारा करे। शिव-शक्तिमय बीज हृदयादिसे वर्जित है। गौरीकी सोने, चाँदी, लकड़ी अथवा पत्थर आदिकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करे। अथवा पाँच पिण्डीवाली मृण्मयी प्रतिमा बनाये। चारों कोणोंमें अव्यक्त प्रतिमा रहे और मध्यभागमें पाँचवीं व्यक्त प्रतिमा स्थापित करे। आवरण-देवताओंके रूपमें क्रमशः ललिता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। पहले वृत्ताकार अष्टदल कमल बनाकर आग्नेय आदि कोणवर्ती दलोंमें क्रमशः ललिता, सुभगा, गौरी और क्षोभणीकी पूजा करे। फिर पूर्वादि दलोंमें वामा, ज्येष्ठा, क्रिया और ज्ञानाका यजन करे। पीठयुक्त वामभागमें शिवके अव्यक्त रूपकी पूजा करनी चाहिये। देवीका व्यक्त रूप दो या तीन नेत्रोंवाला है। वह शुद्ध रूप भगवान् शंकरके साथ पूजित होता है। वे देवी दो पीठ या दो कमलोंपर स्थित होती हैं। वहाँ देवी दो, चार, आठ अथवा अठारह भुजाओंसे युक्त हैं, ऐसा चिन्तन करे। वे सिंह अथवा भेड़ियेको भी अपना वाहन बनाती हैं। अष्टादशभुजाके दायें नौ हाथोंमें नौ आयुध हैं, जिनके नाम यों हैं—स्रक् (हन्), अक्ष, सूत्र (पाश), कलिका, मुण्ड, उत्पल, पिण्डिका, बाण और धनुष। इनमेंसे एक-एक महान् वस्तु उनके एक-एक हाथकी शोभा बढ़ाते हैं। वामभागके नौ हाथोंमें भी प्रत्येकमें एक-एक करके क्रमशः नौ वस्तुएँ हैं। यथा—पुस्तक, ताम्बूल, दण्ड, अभय, कमण्डलु, गणेशजी, दर्पण, बाण और धनुष॥ २—१४॥
उनको ‘व्यक्त’ अथवा ‘अव्यक्त’ मुद्रा दिखानी चाहिये। आसन-समर्पणके लिये ‘पद्म-मुद्रा’ कही गयी है। भगवान् शिवकी पूजामें ‘लिङ्ग-मुद्रा’ का विधान है। यही ‘शिवमुद्रा’ है। ‘आवाहनीमुद्रा’ दोनोंके लिये है। शक्ति-मुद्रा ‘योनि’ नामसे कही गयी है। इनका मण्डल या मन्त्र चौकोर है। यह चार हाथ लंबा-चौड़ा हुआ करता है। मध्यवर्ती चार कोष्ठोंमें त्रिदल कमल अङ्कित करना चाहिये। तीनों कोणोंके ऊर्ध्वभागमें अर्धचन्द्र रहे। उसे दो पदों (कोष्ठों)-को लेकर बनाया जाय। एकसे दूसरा दुगुना होना चाहिये। द्वारोंका कण्ठभाग दो-दो पदोंका हो; किंतु उपकण्ठ उससे दुगुना रहना चाहिये। एक-एक दिशामें तीन-तीन द्वार रखने चाहिये अथवा ‘सर्वतोभद्र’ मण्डल बनाकर उसमें पूजन करना चाहिये। अथवा किसी चबूतरे या वेदीपर देवताकी स्थापना करके पञ्चगव्य तथा पञ्चामृत आदिसे पूजन करे॥ १५–१८॥
पूजन करके उत्तराभिमुख हो उन्हें लाल रंगके फूल अर्पण करने चाहिये। घृत आदिकी
* ‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र’में इसी मन्त्रको ‘गौरीमन्त्र’ कहा है। यहाँ मूलमें जो बीज दिये गये हैं, उनका उल्लेख वहाँ नहीं मिलता।
- अध्याय ३२७ * ६६९
सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति प्रदान करनेवाला साधक सम्पूर्ण सिद्धियोंका भागी होता है। फिर बलि अर्पित करके तीन या आठ कुमारियोंको भोजन करावे। पूजाका नैवेद्य शिवभक्तोंको दे, स्वयं अपने उपयोगमें न ले। इस प्रकार अनुष्ठान करके कन्या चाहनेवालेको कन्या और पुत्रहीनको पुत्रकी प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यवाली स्त्री सौभाग्यशालिनी होती है। राजाको युद्धमें विजय तथा राज्यकी प्राप्ति होती है। आठ लाख जप करनेसे वाक्सिद्धि प्राप्त होती है तथा देवगण वशमें हो जाते हैं। इष्टदेवको निवेदन किये बिना भोजन न करे। बायें हाथसे भी अर्चना कर सकते हैं। विशेषतः अष्टमी, चतुर्दशी तथा तृतीयाको ऐसा करनेकी विधि है॥ १९—२२$\frac{१}{२}$॥
अब मैं मृत्युंजयकी पूजाका वर्णन करूँगा। कलशमें उनकी पूजा करे। हवनमें प्रणव मृत्युंजयकी मूर्ति है और 'ओं जूं सः।'—इस प्रकार मूलमन्त्र है। 'ओं जूं सः वौषट्।'—ऐसा कहकर अर्चनीय देवता मृत्युंजयको कुम्भमुद्रा दिखावे। इस मन्त्रका दस हजार बार जप करे तथा खीर, दूर्वा, घृत, अमृता (गुडुची), पुनर्नवा (गदहपूर्ना), पायस (पयःपक्व वस्तु) और पुरोडाशका हवन करे। भगवान् मृत्युंजयके चार मुख और चार भुजाएँ हैं। वे अपने दो हाथोंमें कलश और दो हाथोंमें वरद एवं अभयमुद्रा धारण करते हैं। कुम्भमुद्रासे उन्हें स्नान कराना चाहिये। इससे आरोग्य, ऐश्वर्य तथा दीर्घायुकी प्राप्ति होती है। इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित औषध शुभकारक होता है। भगवान् मृत्युंजय ध्यान किये जानेपर दुर्मृत्युको दूर करनेवाले हैं, इसलिये उनकी सदा पूजा होती है॥ २३—२७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गौरी आदिकी पूजाका वर्णन' नामक तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२६॥
तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय
विभिन्न कर्मोंमें उपयुक्त माला, अनेकानेक मन्त्र, लिङ्ग-पूजा तथा देवालयकी महत्ताका विचार
भगवान् महेश्वर कहते हैं—कार्तिकेय! व्रतेश्वर और सत्य आदि देवताओंका पूजन करके उनको व्रतका समर्पण करना चाहिये। अरिष्ट-शान्तिके लिये अरिष्टमूलकी माला उत्तम है। कल्याणप्राप्तिके लिये सुवर्ण एवं रत्नमयी, मारणकर्ममें महाशङ्खमयी, शान्तिकर्ममें शङ्खमयी और पुत्रप्राप्तिके लिये मौक्तिकमयी मालासे जप करे। स्फटिकमणिकी माला कोष-सम्पत्ति देनेवाली और रुद्राक्षकी माला मुक्तिदायिनी है। उसमें आँवलेके बराबर रुद्राक्ष उत्तम माना गया है। मेरुसहित या मेरुहीन माला भी जपमें ग्राह्य हैं। मानसिक जप करते समय मालाके मणियोंको अनामिका और अङ्गुष्ठसे सरकाना चाहिये। उपांशु जपमें तर्जनी और अङ्गुष्ठके संयोगसे मणियोंकी गणना करे; किंतु जपमें मेरुका कभी उल्लङ्घन न करे। यदि प्रमादवश माला गिर जाय, तो दो सौ बार मन्त्रजप करे। घण्टा सर्ववाद्यमय है। उसका वादन अर्थ-सिद्धि करनेवाला है। गृह और मन्दिरमें शिवलिङ्गकी, गोमय, गोमूत्र, वल्मीक-मृत्तिका, भस्म और जलसे शुद्धि करनी चाहिये॥ १—६॥
कार्तिकेय! 'ॐ नमः शिवाय'—यह मन्त्र सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थोंको सिद्ध करनेवाला है। वेदमें 'पञ्चाक्षर' और लोकमें 'षडक्षर' माना गया है। परम अक्षर ओंकारमें शिव सूक्ष्म वटबीजमें वटवृक्षके समान स्थित हैं। शिवके क्रमशः 'ॐ नमः शिवाय'—'ईशानः सर्वविद्यानाम्' आदि
६७० * अग्निपुराण *
मन्त्र समस्त विद्याओंके समुदाय इस षडक्षर मन्त्रके भाष्य हैं। 'ॐ नमः शिवाय'—यह मन्त्र ही परमपद है। इसी मन्त्रसे शिवलिङ्गका पूजन करना चाहिये; क्योंकि धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् शिव सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये लिङ्गमें प्रतिष्ठित हैं। जो मनुष्य शिवलिङ्गका पूजन नहीं करता है, वह धर्मकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाता है। लिङ्गपूजनसे भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये जीवनपर्यन्त शिवलिङ्गका पूजन करे। भले ही प्राण चले जायें, किंतु उसका पूजन किये बिना भोजन न करे। मनुष्य रुद्रके पूजनसे रुद्र, श्रीविष्णुके यजनसे विष्णु, सूर्यकी पूजा करनेसे सूर्य और शक्तिकी अर्चनासे शक्तिका सारूप्य प्राप्त करता है। उसे सम्पूर्ण यज्ञ, तप, दानकी प्राप्ति होती है। मनुष्य लिङ्गकी स्थापना करके उससे करोड़गुना फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य प्रतिदिन तीनों समय पार्थिव-लिङ्गका निर्माण करके बिल्वपत्रोंसे उसका पूजन करता है, वह अपनी एक सौ ग्यारह पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वर्गलोकको प्राप्त होता है। अपने धनसंचयके अनुसार भक्तिपूर्वक देवमन्दिर निर्माण कराना चाहिये। दरिद्र और धनिकको मन्दिर-निर्माणमें यथाशक्ति अल्प या अधिक व्यय करनेके समान फल मिलता है। संचित धनके दो भाग धर्मकार्यमें व्यय करके जीवन-निर्वाहके लिये समभाग रखें; क्योंकि जीवन अनित्य है। देवमन्दिर बनवानेवाला अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके अभीष्ट अर्थकी प्राप्ति करता है। मिट्टी, लकड़ी, ईंट और पत्थरसे मन्दिर-निर्माणका क्रमशः करोड़गुना फल है। आठ ईंटोंसे भी मन्दिरका निर्माण करनेवाला स्वर्गलोकको प्राप्त हो जाता है। क्रीडामें धूलिका मन्दिर बनानेवाला भी अभीष्ट मनोरथको प्राप्त करता है॥ ७—११॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'देवालय-माहात्म्य-वर्णन' नामक तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२७॥
तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
छन्दोंके गण और गुरु-लघुकी व्यवस्था
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं वेदके मूलमन्त्रोंके अनुसार पिङ्गलोक्त छन्दोंका क्रमशः वर्णन करूँगा। मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण और तगण—ये आठ गण होते हैं। सभी गण तीन-तीन अक्षरोंके हैं। इनमें मगणके सभी अक्षर गुरु (ऽऽऽ) और नगणके सब अक्षर लघु (।।।) होते हैं। आदि गुरु (ऽ।।) होनेसे 'भगण' तथा आदि लघु (।ऽऽ) होनेसे 'यगण' होता है। इसी प्रकार अन्त्य गुरु (।।ऽ) होनेसे 'सगण' तथा अन्त्य लघु होनेसे 'तगण' (ऽऽ।) होता है। पादके अन्तमें वर्तमान ह्रस्व अक्षर विकल्पसे गुरु माना जाता है। विसर्ग, अनुस्वार, संयुक्त अक्षर (व्यञ्जन), जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीयसे अव्यवहित पूर्वमें स्थित होनेपर 'ह्रस्व' भी 'गुरु' माना जाता है, दीर्घ तो गुरु है ही। गुरुका संकेत 'ग' और लघुका संकेत 'ल' है। ये 'ग' और 'ल' गण नहीं हैं। 'वसु' शब्द आठकी और 'वेद' चारकी संज्ञा हैं, इत्यादि बातें लोकके अनुसार जाननी चाहिये॥ १—३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दस्सारका कथन' नामक तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२८॥
* अध्याय ३३० * ६७१
तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय
गायत्री आदि छन्दोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! (गायत्री छन्दके आठ भेद हैं—आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची तथा ब्राह्मी) 'छन्द' शब्द अधिकारमें प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् इस पूरे प्रकरणमें छन्द-शब्दकी अनुवृत्ति होती है। 'दैवी' गायत्री एक अक्षरकी, 'आसुरी' पंद्रह अक्षरोंकी, 'प्राजापत्या' आठ अक्षरोंकी, 'याजुषी' छः अक्षरोंकी, 'साम्नी' गायत्री बारह अक्षरोंकी तथा 'आर्ची' अठारह अक्षरोंकी है। यदि साम्नी गायत्रीमें क्रमशः दो-दो अक्षर बढ़ाते हुए उन्हें छः कोष्ठोंमें लिखा जाय, इसी प्रकार आर्ची गायत्रीमें तीन-तीन, प्राजापत्या-गायत्रीमें चार-चार तथा अन्य गायत्रियोंमें अर्थात् दैवी और याजुषीमें क्रमशः एक-एक अक्षर बढ़ जाय एवं आसुरी गायत्रीका एक-एक अक्षर क्रमशः छः कोष्ठोंमें घटता जाय तो उन्हें 'साम्नी' आदि भेदसहित क्रमशः उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् और जगती छन्द जानना चाहिये। याजुषी, साम्नी तथा आर्ची—इन तीन भेदोंवाले गायत्री आदि प्रत्येक छन्दके अक्षरोंको पृथक्-पृथक् जोड़नेपर उन सबको 'ब्राह्मी-गायत्री', 'ब्राह्मी-उष्णिक्' आदि छन्द समझना चाहिये। इसी प्रकार याजुषीके पहले जो दैवी, आसुरी और प्राजापत्या नामक तीन भेद हैं, उनके अक्षरोंको पृथक्-पृथक् छः कोष्ठोंमें जोड़नेपर जितने अक्षर होते हैं, वे 'आर्षी गायत्री', 'आर्षी उष्णिक्' आदि कहलाते हैं। इन भेदोंको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये चौंसठ कोष्ठोंमें लिखना चाहिये ॥ १–५॥
(कोष्ठक इस प्रकार है—)
| छन्द | गायत्री के अक्षर | उष्णिक् के अक्षर | अनुष्टुप् के अक्षर | बृहती के अक्षर | पङ्क्ति के अक्षर | त्रिष्टुप् के अक्षर | जगती के अक्षर |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ आर्षी | २४ | २८ | ३२ | ३६ | ४० | ४४ | ४८ |
| २ दैवी | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
| ३ आसुरी | १५ | १४ | १३ | १२ | ११ | १० | ९ |
| ४ प्राजापत्या | ८ | १२ | १६ | २० | २४ | २८ | ३२ |
| ५ याजुषी | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
| ६ साम्नी | १२ | १४ | १६ | १८ | २० | २२ | २४ |
| ७ आर्ची | १८ | २१ | २४ | २७ | ३० | ३३ | ३६ |
| ८ ब्राह्मी | ३६ | ४२ | ४८ | ५४ | ६० | ६६ | ७२ |
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दस्सारका कथन' नामक तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२९॥
तीन सौ तीसवाँ अध्याय
'गायत्री' से लेकर 'जगती' तक छन्दोंके भेद तथा उनके देवता, स्वर, वर्ण और गोत्रका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—इस प्रकरणकी पूर्ति होनेतक 'पादः' पदका अधिकार (अनुवर्तन) है। जहाँ गायत्री आदि छन्दोंमें किसी पादकी अक्षर-संख्या पूरी न हो, वहाँ 'इय्', 'उव्' आदिके द्वारा उसकी पूर्ति की जाती है। (जैसे 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' में आठ अक्षरकी पूर्तिके लिये 'वरेण्यम्' के स्थानमें 'वरेणियम्' समझ लिया जाता है। 'स्वःपते' के स्थानमें 'सुवःपते' माना जाता है।) गायत्री छन्दका एक पाद आठ अक्षरोंका होता है। अर्थात् जहाँ 'गायत्रीके
६७२ * अग्निपुराण *
पाद'का कथन हो, वहाँ आठ अक्षर ग्रहण करने चाहिये। [यही बात अन्य छन्दोंके पादोंके सम्बन्धमें भी है।] 'जगती' छन्दका पाद बारह अक्षरोंका होता है। विराट्के पाद दस अक्षरोंके बताये गये हैं। 'त्रिष्टुप्' छन्दका चरण ग्यारह अक्षरोंका है। जिस छन्दका जैसा पाद बताया गया है, उसीके अनुसार कोई छन्द एक पादका, कोई दो पादका, कोई तीनका और कोई चार पादका माना गया है। [जैसे आठ अक्षरके तीन पादोंका 'गायत्री' छन्द और चार पादोंका 'अनुष्टुप्' होता है।] 'आदि छन्द' अर्थात् 'गायत्री' कहीं छः अक्षरके पादोंसे चार पादोंकी होती है। [जैसे ऋग्वेदमें—'इन्द्रः शचीपतिर्बलेन वीलितः। दुश्च्यवनो वृषा लमत्सु सामहिः॥'] कहीं-कहीं गायत्री सात अक्षरके पादोंसे तीन पादकी होती है। [जैसे ऋग्वेदमें—'युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम्। भूयाम वाजदाम्नाम्॥' (१।१७।४)] वह सात अक्षरोंवाली गायत्री 'पाद-निचृत्' संज्ञा धारण करती है। यदि गायत्रीका प्रथम पाद आठ अक्षरोंका, द्वितीय पाद सात अक्षरोंका तथा तृतीय पाद छः अक्षरोंका हो तो वह 'प्रतिष्ठा गायत्री' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम। ज्योक् च सूर्यं दृशे॥' (१।२२।२१)] इसके विपरीत यदि गायत्रीका प्रथम पाद छः, द्वितीय पाद सात और तृतीय पाद आठ अक्षरोंका हो तो उसे 'वर्धमाना'¹ गायत्री कहते हैं। यदि तीन पादोंवाली गायत्रीका प्रथम पाद छः, द्वितीय पाद आठ और तीसरा पाद सात अक्षरोंका हो तो उसका नाम 'अतिपाद² निचृत्' होता है। यदि दो चरण नौ-नौ अक्षरोंके हों और तीसरा चरण छः अक्षरोंका हो तो वह 'नागी' नामकी गायत्री होती है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अग्रे तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम्। ऋध्यामां ओहैः॥' (४।१०।१)] यदि प्रथम चरण छः अक्षरोंका और द्वितीय-तृतीय नौ-नौ अक्षरोंके हों तो 'वाराही गायत्री' नामक छन्द होता है। [जैसे सामवेदमें—'अग्रे मृड मँहाँ अस्यय आदेवयुं जनम्। इयेथ बर्हिरासदम्॥' (२३)] अब तीसरे अर्थात् 'विराट्' नामक भेदको बतलाते हैं। जहाँ दो ही चरणोंका छन्द हो, वहाँ यदि प्रथम चरण बारह और द्वितीय चरण आठ अक्षरका हो तो वह 'द्विपाद् विराट्' नामक गायत्री छन्द है। [जैसे ऋग्वेदमें—'नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो। राजा देवः समुद्रियः॥' (९।१०७।१६)] ग्यारह अक्षरोंके तीन चरण होनेपर 'त्रिपाद् विराट्' नामक गायत्री होती है। [उदाहरण ऋग्वेदमें—'दुहीयन् मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै। इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै॥' (१।१२०।९)]॥१-४॥
जब दो चरण आठ-आठ अक्षरोंके और एक चरण बारह अक्षरोंका हो तो वेदमें उसे 'उष्णिक्' नाम दिया गया है। प्रथम और तृतीय चरण आठ अक्षरोंके हों और बीचका द्वितीय चरण बारह अक्षरोंका हो तो वह तीन पादोंका 'ककुप् उष्णिक्' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'सुदेवः समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मर्त्यः। यं त्रायध्वेऽस्यासते³॥' (५।५३।१५)] जब प्रथम चरण बारह अक्षरोंका और द्वितीय-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो 'पुर उष्णिक्'
१. उदाहरण ऋग्वेदमें—त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः। देवेभिर्मानुषे जने॥ (६।१६।१) २. ऋग्वेदे यथा—प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम्। अग्निं रथं न वेद्यम्॥ (८।८४।१) ३. इस मन्त्रमें 'मर्त्य'के स्थानमें व्यूहकी रीतिसे 'मर्तिय' मानने तथा 'अस्यासते'के स्थानमें 'अस्य आसते' इस प्रकार दीर्घ-व्यूह करनेसे पादकी पूर्ति होती है।
* अध्याय ३३० *
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नामक तीन पादोंवाला छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये। देवा भवत वाजिनः॥' (१।२३।१९)] जब प्रथम और द्वितीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों और तृतीय चरण बारह अक्षरोंका हो तो 'परोष्णिक्' छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अग्रे वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो। अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः^१॥' (१।७९।४)] सात-सात अक्षरोंके चार चरण होनेपर भी 'उष्णिक्' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'नदं व ओदतीनां नदं यो युवतीनाम्। पतिं वो अध्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि॥' (८।६९।२)]
आठ-आठ अक्षरके चार चरणोंका 'अनुष्टुप्' नामक छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेदमें—'सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं सर्वतः स्पृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥' (३१।१)] अनुष्टुप् छन्द कहीं-कहीं तीन चरणोंका भी होता है। 'त्रिपाद अनुष्टुप्' दो तरहके होते हैं। एक तो वह है, जिसके प्रथम चरणमें आठ तथा द्वितीय और तृतीय चरणोंमें बारह-बारह अक्षर होते हैं। दूसरा वह है, जिसका मध्यम अथवा अन्तिम पाद आठ अक्षरका हो तथा शेष दो चरण बारह-बारह अक्षरके हों। आठ अक्षरके मध्यम पादवाले 'त्रिपाद अनुष्टुप्' का उदाहरण [जैसे ऋग्वेदमें—'पर्यूषु प्र धन्व वाजसातय, परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे॥' (९।११०।१)] तथा आठ अक्षरके अन्तिम चरणवाले 'त्रिपाद अनुष्टुप्' का उदाहरण [ऋग्वेदमें—'मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो मा कुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः। स्तनाभुजो अशिश्वीः॥' (१।१२०।८)]
यदि एक चरण 'जगती' का (अर्थात् बारह अक्षरका) हो और शेष तीन चरण गायत्रीके (अर्थात् आठ-आठ अक्षरके) हों तो यह चार चरणोंका 'बृहती छन्द' होता है। इसमें भी जब पहलेका स्थान तीसरा चरण ले ले अर्थात् वही जगतीका पाद हो और शेष तीन चरण गायत्रीके हों तो उसे 'पथ्या बृहती' कहते हैं। [जैसे सामवेदमें—'मा चिदन्यद् विशंसत सखायो मा रिषण्यत। इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत॥' (२४२)] जब पहलेवाला 'जगती'का चरण द्वितीय पाद हो जाय और शेष तीन गायत्रीके चरण हों तो 'न्यङ्गुसारिणी बृहती' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः। वृषा ते वृष्ण इन्दुर्वाद्वीसहस्रसातमः॥' (१।१७५।१)] आचार्य क्रोष्टुकिके मतमें यह (न्यङ्कुसारिणी) 'स्कन्ध' या 'ग्रीवा' नामक छन्द है^२। यास्काचार्यने इसे ही 'उरोबृहती' नाम दिया है। जब अन्तिम (चतुर्थ) चरण 'जगती'का हो और आरम्भके तीन चरण गायत्रीके हों तो 'उपरिष्टाद् बृहती^३' नामक छन्द होता है। वही 'जगती'का चरण जब पहले हो और शेष तीन चरण गायत्री छन्दके हों तो उसे 'पुरस्ताद् बृहती' छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—'महो यस्पतिः शस्वसो असाम्या महो नृम्णस्य ततुजिः। मर्ता वज्रस्य धृष्णोः पिता पुत्रमिव प्रियम्^४॥' (१०।२२।३)] वेदमें कहीं-कहीं नौ-नौ अक्षरोंके चार चरण दिखायी देते
१. पाँचवें श्लोकमें 'उष्णिक्' छन्दका जो लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है। यहाँ 'परोष्णिक्' यह विशेष संज्ञा बतानेके लिये पुनः उल्लेख किया गया है।
२. पिङ्गलसूत्रमें 'स्कन्धोग्रीवी' नाम आया है।
३. इसका उदाहरण सामवेदमें इस प्रकार है—'अग्रे जरितर्विश्वस्तिस्पानो देव रक्षसः। अप्रोषिवाण् गृहपते महाँ असि दिवस्यायुर्दुरोण्युः॥' (३९)
४. आठवें श्लोकके उत्तरार्धमें जो 'बृहती छन्द'का लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है; फिर भी विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनरुक्ति की गयी है।
६७४ * अग्निपुराण *
हैं। वे भी ‘बृहती’ छन्दके ही अन्तर्गत हैं। [उदाहरणके लिये ऋग्वेदमें—‘तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम। देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम् १॥’ (१।१८७।११)] जहाँ पहले दस अक्षरके दो चरण हों, फिर आठ अक्षरोंके दो चरण हों, उसे भी ‘बृहती’ छन्द कहते हैं। [जैसे सामवेदमें— ‘अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य। आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः २॥’ (४०)] केवल ‘जगती’ छन्दके तीन चरण हों तो उसे ‘महाबृहती’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘अजीजनो अमृत मर्त्येष्वॉ, ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः। सदासरो वाजमच्छसनिष्यदत्’ (९।११०।४)] ताण्डी नामक आचार्यके मतमें यही ‘सतो बृहती’ नामक छन्द है॥ ५-१०३/२॥
जहाँ दो पाद बारह-बारह अक्षरोंके और दो आठ-आठ अक्षरोंके हों, वहाँ ‘पङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। यदि विषम पाद अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण पूर्वकथनानुसार बारह-बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो उसे ‘सतःपङ्क्ति’ नामक छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन। यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः॥’ (१।३६।१०)] यदि वे ही चरण विपरीत अवस्थामें हों, अर्थात् प्रथम-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके और द्वितीय-चतुर्थ बारह- बारह अक्षरोंके तो भी वह छन्द ‘सतःपङ्क्ति’ ही कहलाता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘य ऋष्ये श्रावयत्सखा विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः। तं विश्वे मानुषा युगे, इन्द्रं हवन्ते तविशं यतासुचः॥’ (८।४६।१२)] जब पहलेके दोनों चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके, तो उसे ‘प्रस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [ग्यारहवें श्लोकमें बताये हुए ‘पङ्क्ति’ छन्दके लक्षणसे ही यह गतार्थ हो जाता है, तथापि विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनः उपादान किया गया है। मन्त्र-ब्राह्मणमें इसका उदाहरण इस प्रकार है—‘काम वेदते मदो नामासि समानया अमुं सुरा ते अभवत्। परम्त्र जन्मा अग्ने तपसा निर्मितोऽसि ४॥’] जब अन्तिम दो चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और आरम्भके दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो ‘आस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—भद्रं नो अपि वातय, मनो दक्षमृत क्रतुम्। अधा ते सख्य अन्धसो वि वो मदे रणन् गावो न यवसे विवक्षसे॥’ (१०।२५।१)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बीचमें हों और प्रथम एवं चतुर्थ चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो उसे ‘विस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘अग्ने तव श्रवो वयो, महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो। बृहद्दानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे॥’ (१०।१४०।१)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बारह हों, अर्थात् प्रथम एवं चतुर्थ चरणके रूपमें हों और बीचके द्वितीय-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो वह ‘संस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘पितुभूतो न तन्तुमित् सुदानवः प्रतिदध्मो यजामसि। उषा अप स्वसुस्तमः संवर्तयति वर्तनि सुजातता॥’ (१०।१७२।३)] पाँच-पाँच अक्षरोंके चार पाद होनेपर ‘अक्षरपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘प्र शुक्रैतु ५ देवी मनीषा। अस्मत् सुतष्टो
१.-२-३. इन सबमें व्यूहकी रीतिसे या ‘निचृत्’ मानकर पादपूर्ति की जाती है।
४. यहाँ ‘नामा असि’, ‘निर्मितः असि’—इस प्रकार संधिव्यूहसे पादपूर्ति की जाती है। कात्यायनने इसे गायत्री छन्दमें गिना है। सायणाने इसे ‘द्विपदा’ कहा है।
५. यहाँ ‘निचृत्’ होनेसे एक अक्षरकी न्यूनता है।
- अध्याय ३३० * ६७५
रथो न वाजी ॥' (७।३४।१)] पाँच अक्षरोंके दो ही चरण होनेपर 'अल्पशः-पङ्क्ति' नामक छन्द कहलाता है। जहाँ पाँच-पाँच अक्षरोंके पाँच पाद हों, वहाँ 'पदपङ्क्ति' नामक छन्द जानना चाहिये। [जैसे ऋग्वेदमें—'घृतं न पूतं तनूररेपाः शुचि हिरण्यं तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः१॥' (४।१०।६)] जब पहला चरण चार अक्षरोंका, दूसरा छः अक्षरोंका तथा शेष तीन पाद पाँच-पाँच अक्षरोंके हों तो भी 'पद-पङ्क्ति' छन्द ही होता है। आठ-आठ अक्षरोंके पाँच पादोंका 'पथ्यापङ्क्ति' नामक छन्द कहा गया है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत। अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया यती योजान्विन्द्र ते हरी॥' (१।८२।२)] आठ-आठ अक्षरोंके छः चरण होनेपर 'जगतीपङ्क्ति' नामक छन्द होता है। [जैसे मन्त्रब्राह्मणमें—'येन स्त्रियमकृणुतं येनापामृशतं सुराम्; येनाक्षामभ्यषिञ्चतम्। येनेमां पृथ्वीं महीं यद्वां तदश्विना यशस्तेन मामभिषिञ्चतम्॥'] ॥ ११–१४॥
'त्रिष्टुप्' अर्थात् ग्यारह अक्षरोंका एक पाद हो और आठ-आठ अक्षरोंके चार पाद हों तो पाँच पादोंका 'त्रिष्टुब्ज्योतिष्मती' नामक छन्द होता है। इसी प्रकार जब एक चरण 'जगती'का अर्थात् बारह अक्षरोंका हो और चार चरण 'गायत्री'के (आठ-आठ अक्षरोंके) हों तो उस छन्दका नाम 'जगतीज्योतिष्मती' होता है। यदि पहला ही चरण ग्यारह अक्षरोंका हो और शेष चार चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो 'पुरस्ताज्ज्योति'२ नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है और यदि पहला ही चरण बारह अक्षरोंका तथा शेष चार चरण आठ-आठके हों तो 'पुरस्ताज्ज्योति' नामक जगती छन्द३ होता है। जब मध्यम चरण ग्यारह अक्षरों और आगे-पीछेके दो-दो चरण आठ-आठके हों तो 'मध्ये-ज्योति'४ नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है; इसी प्रकार जब मध्यम चरण बारहका तथा आदि-अन्तके दो-दो चरण आठ-आठके हों तो 'मध्ये-ज्योति'५ नामक जगती छन्द होता है। जब आरम्भके चार चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तथा अन्तिम चरण ग्यारह अक्षरोंका हो तो उसे 'उपरिष्टाज्ज्योसि'६ नामक त्रिष्टुप् छन्द कहते हैं। इसी प्रकार जब आदिके चार चरण पूर्ववत् आठ-आठके हों और अन्तिम पाद बारह अक्षरोंका हो तो उसका नाम 'उपरिष्टाज्ज्योति'७ जगती छन्द होता है ॥ १५३/२ ॥
गायत्री आदि सभी छन्दोंके एक पादमें यदि पाँच अक्षर हों तथा अन्य पादोंमें पहलेके अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उस छन्दका नाम 'शङ्कुमती' होता है। [जैसे प्रथम पाद पाँच अक्षरका और तीन चरण छः-छः अक्षरोंका होनेपर उसे 'शङ्कुमती गायत्री' कह सकते हैं।]
१. यहाँ 'भूरिक्' होनेसे एक अक्षरकी अधिकता है। अन्यत्र भी अक्षरोंकी न्यूनता या अधिकता दीखनेपर इसी प्रकार समझना चाहिये। २. उदाहरण ऋग्वेदमें—तमुष्टुहीन्द्रं यो ह स त्वा यः शूरो मघवा यो रथेष्ठाः। प्रतीचश्चिद् यो धीमान् वृषण्वान् ववव्रुपांश्चित्तमसो विहन्ता ॥ (१।१७३।५) ३. उदाहरण ऋग्वेदमें—अबोध्याग्निर्ज्म उदेति सूर्यो व्यूषाश्चन्द्रा मह्यावो अर्चिषा। आयुक्षातामश्विना यातवे रथं प्रासावीद्देवः सविता जगत् पृथक् ॥ (१।१५७।१) ४. उदाहरण मन्त्रब्राह्मणमें—इमं तमुपस्थं मधुना संसृजामि। प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयं तेन पुंसोऽभिभवासि, सर्वान् कामान् वशिन्यसि राज्ञी ॥ ५. उदाहरण ऋग्वेदमें—बृहद्भिborderअग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा। भरद्वाजे समिधानो यविष्ठय रेवन्तः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि ॥ (६।४८।७) ६. उदाहरण मन्त्रब्राह्मणमें—अग्निं क्रव्यादमकृण्वन्, गुहाना स्त्रीणामुपस्थम्। ऋषयः पुराणाः, तेन आज्यमकृण्वं त्रैशुद्धं त्वयि त्वद्दधातु। ७. उदाहरण ऋग्वेदमें—नवानां नवतीनां विष्यस्य रोपुषीणाम्। सर्वसामग्रभंनामा अरे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार ॥ (१।१९१।१३)
६७६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
जब एक चरण छः अक्षरोंका हो और अन्य चरणोंमें पहले बताये अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उसका नाम ‘ककुदमती’ होगा। जहाँ तीन पादवाले छन्दके पहले और दूसरे चरणमें अधिक अक्षर हों और बीचवालेमें बहुत ही कम हों, वहाँ उस छन्दका नाम ‘पिपीलिकमध्या’ होगा। [जैसे त्रिपदा गायत्रीके आदि और अन्त चरण आठ-आठ अक्षरके हों तथा बीचवाला चरण तीन, चार या पाँच अक्षरका हो तो उसे ‘पिपीलिकमध्या’ कहेंगे।] इसके विपरीत जब आदि और अन्तवाले पादोंके अक्षर कम हों और बीचवाला पाद अधिक अक्षरोंका हो तो उस ‘त्रिपाद् गायत्री’ आदि छन्दको ‘यवमध्या’ कहते हैं। यदि ‘गायत्री’ या ‘उष्णिक्’ आदि छन्दोंमें केवल एक अक्षरकी कमी हो, उसकी ‘निचृत्’ यह विशेष संज्ञा होती है। एक अक्षरकी अधिकता होनेपर वह छन्द ‘भूरिक्’ नाम धारण करता है। इस प्रकार दो अक्षरोंकी कमी रहनेपर ‘विराट्’ और दो अक्षर अधिक होनेपर ‘स्वराट्’ संज्ञा होती है। संदिग्ध अवस्थामें आदि पादके अनुसार छन्दका निर्णय करना चाहिये। [जैसे कोई मन्त्र छब्बीस अक्षरका है, उसमें गायत्रीसे दो अक्षर अधिक हैं और उष्णिक्से दो अक्षर कम—ऐसी दशामें वह ‘स्वराट् गायत्री’ छन्द है या ‘विराड् उष्णिक्’?—ऐसे संदेहयुक्त स्थलोंमें यदि मन्त्रका पहला चरण ‘गायत्री’ से मिलता हो तो उसे ‘स्वराट् गायत्री’ कहेंगे और यदि प्रथम पाद ‘उष्णिक्’ से मिलता हो तो उसे ‘विराड् उष्णिक्’ कह सकते हैं। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये।] इसी प्रकार देवता, स्वर, वर्ण तथा गोत्र आदिके द्वारा संदिग्धस्थलमें छन्दका निर्णय हो सकता है। गायत्री आदि छन्दोंके देवता क्रमशः इस प्रकार हैं—अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, मित्रावरुण, इन्द्र तथा विश्वेदेव। उक्त छन्दोंके स्वर हैं—‘षड्ज’ आदि। उनके नाम क्रमशः ये हैं—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। श्वेत, सारंग, पिशङ्ग, कृष्ण, नील, लोहित (लाल) तथा गौर—ये क्रमशः गायत्री आदि छन्दोंके वर्ण हैं। ‘कृति’ नामवाले छन्दोंका वर्ण गोरोचनके समान है और अतिच्छन्दोंका वर्ण श्यामल है। अग्निवेश्य, काश्यप, गौतम, अङ्गिरा, भार्गव, कौशिक तथा वसिष्ठ—ये क्रमशः उक्त सात छन्दोंके गोत्र बताये गये हैं॥ १६—२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘छन्दस्सारका कथन’ नामक तीन सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३०॥
तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय
उत्कृति आदि छन्द, गण-छन्द और मात्रा-छन्दोंका निरूपण
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठजी! एक सौ चार अक्षरोंका ‘उत्कृति’ छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेदमें—‘होता यक्षदश्विनौ छागस्य०’ इत्यादि (२१।४१)] ‘उत्कृति’ छन्दमेंसे चार-चार घटाते जायँ तो क्रमशः निम्नाङ्कित छन्द होते हैं—सौ अक्षरोंकी ‘अभिकृति’$^१$, छानबे अक्षरोंकी ‘संस्कृति’$^२$, बानबे अक्षरोंकी ‘विकृति’$^३$, अठासी अक्षरोंकी ‘आकृति’$^४$, चौरासी अक्षरोंकी ‘प्रकृति’$^५$,
$^१$. ‘अभिकृति’ आदि छन्दोंके उदाहरणका प्रतीकमात्र यहाँ दिया जाता है, विशेष जानकारीके लिये वेदोंमें अनुसंधान करना चाहिये। यजुर्वेदे—‘देवो अग्निः स्विष्टकृत् देवान्यक्षत्’ इत्यादि (२१।५८)।
$^२$. यजुर्वेदे—‘देवो अग्निः स्विष्टकृत्, सुद्रविणामन्दः कविः’ इत्यादि।
$^३$. ‘इमे सोमाः सुरामाणाम्’ इत्यादि।
$^४$. ‘भगा अनुपयुक्तामिन्द्रो यातु पुरोगवः’ इत्यादि।
$^५$. प्रकृतेरुदाहरणम्—‘सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च’ इत्यादि प्रातराचमनमन्त्रः।
- अध्याय ३३१ * ६७७
अस्सी अक्षरोंकी ‘कृति’$^१$, छिहत्तर अक्षरोंकी ‘अभिकृति’$^२$, बहत्तर अक्षरोंकी ‘धृति’$^३$, अड़सठ अक्षरोंकी ‘अत्यष्टि’$^४$, चौसठ अक्षरोंकी ‘अष्टि’$^५$, साठ अक्षरोंकी ‘अतिशक्वरी’$^६$, छप्पन अक्षरोंकी ‘शक्वरी’$^७$, बावन अक्षरोंकी ‘अतिजगती’$^८$ तथा अड़तालीस अक्षरोंकी ‘जगती’$^९$ होती है। यहाँतक केवल वैदिक छन्द हैं। यहाँसे आगे लौकिक छन्दका अधिकार है। ‘गायत्री’से लेकर ‘त्रिष्टुप्’ तक जो आर्षछन्द वैदिक छन्दोंमें गिनाये गये हैं, वे लौकिक छन्द भी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—त्रिष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती, अनुष्टुप्, उष्णिक् और गायत्री। गायत्री छन्दमें क्रमशः एक-एक अक्षरकी कमी होनेपर ‘सुप्रतिष्ठा’, ‘प्रतिष्ठा’, ‘मध्या’, ‘अत्युक्तात्युक्त’ तथा ‘आदि’ नामक छन्द होते हैं॥१-४॥
छन्दके चौथाई भागको ‘पाद’ या ‘चरण’ कहते हैं। [छन्द तीन प्रकारके हैं—गणच्छन्द, मात्रा-छन्द और अक्षरच्छन्द]। पहले ‘गणच्छन्द’ दिखलाया जाता है। चार लघु अक्षरोंकी ‘गण’ संज्ञा होती है। [‘आर्या’के लक्षणोंकी सिद्धि ही इस संज्ञाका प्रयोजन है।] ये गण पाँच हैं। कहीं आदि गुरु (ऽ।।), कहीं मध्य गुरु (।ऽ।), कहीं अन्त्य गुरु (।।ऽ), कहीं सर्वगुरु (ऽऽ) और कहीं चारों अक्षर लघु (।।।।) होते हैं। [एक ‘गुरु’ दो ‘लघु’ अक्षरोंके बराबर होता है; अतः जहाँ सब लघु हैं, वहाँ चार अक्षर तथा जहाँ सब गुरु हैं, वहाँ दो अक्षर दिखाये गये हैं।] अब ‘आर्या’का लक्षण बताया जाता है। साढ़े सात गणोंकी, अर्थात् तीस मात्राओं या तीस लघु अक्षरोंकी आधी ‘आर्या’ होती है। [आर्यामें गुरुवर्णको दो मात्रा या दो लघु मानकर गिनना चाहिये।] ‘आर्या’ छन्दके विषम गणोंमें जगण (।ऽ।)-का प्रयोग नहीं होता$^{१०}$। किंतु छठा गण अवश्य जगण (।ऽ।) होना चाहिये।$^{११}$ अथवा वह नगण और लघु यानी सब-का-सब लघु भी हो सकता है। जब छठा गण सब-का-सब लघु हो तो उस गणके द्वितीय अक्षरसे सुबन्त या तिङन्तलक्षण पदसंज्ञाकी प्रवृत्ति होती है।$^{१२}$ यदि छठा गण मध्य गुरु (।ऽ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) हो और सातवाँ गण भी सर्वलघु ही हो, तो सातवें गणके प्रथम अक्षरसे ‘पद’ संज्ञाकी प्रवृत्ति होती है।$^{१३}$ इसी प्रकार जब आर्याके उत्तरार्ध-भागमें पाँचवाँ गण सर्वलघु हो तो उसके प्रथम अक्षरसे ही पदका आरम्भ होता है।$^{१४}$ आर्याके उत्तरार्ध भागमें छठा गण एकमात्र लघु अक्षरका (।) होता है।$^{१५}$ जिस आर्याके पूर्वार्ध और उत्तरार्धमें
१. यजुर्वेदे—‘सुपर्णोऽसि गरुत्मॉस्त्रिः सत्रिवृत्ते शिरो गायत्रम्’ इत्यादि (१७।७२)। २. ऋग्वेदे—‘स हि शर्धो न मारुतं तु विष्णोणि’ इत्यादि (१।१२७।६)। ३. ऋग्वेदे—‘अवमह इन्द्र दादृहि श्रुधि नः शुशोच हि द्यौः०’ इत्यादि (१।१३३।६)। ४. ऋग्वेदे—‘अदर्शि गातुरुरवे वरीयसी पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभिः०’ इत्यादि (१।१३६।२)। ५. ऋग्वेदे—‘त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तु विषुष्म’ इत्यादि (२।२२।१)। ६. ऋग्वेदे—‘सार्कं जातः क्रतुना साकभोजसा ववक्षिथ’ इत्यादि (२।२२।३)। ७. ऋग्वेदे—‘प्रीस्वस्मै पुरोरथं, इन्द्राय शषमर्चत्०’ इत्यादि। ८. मन्त्रब्राह्मणे—‘मा ते गृहेषु निशि घोष उत्था०’ इत्यादि। ९. सामवेदे—‘इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया। भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसदि, अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव॥’ (६६)
१०. उदाहरण— द्वीपादप्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥ ११. सा जयति जगत्यार्या देवी दिवमुत्पतिष्णुरतिरुपिरा। यादृश्यत गगनतले कंसवधोत्पातविद्युदिव॥ १२. रूपान्तरेण देवीं तामेव स्तौमि सपदि किल महिषः। पादस्पर्शसुखादिव मीलितनयनोऽभवद् यस्याः॥ यहाँ ‘मि सपदि’ यही छठा गण है, इसमें द्वितीय अक्षरसे पदका आरम्भ है। १३. ब्रह्मक्षत्रकुलीनः प्रलीनसामन्तचक्रनुतचरणः। सकलसुकृतैकपुञ्जः श्रीमान् मुञ्जश्चिरं जयति॥ जयति भुवनैकवीरः सीरायुधतुलितविपुलबलविभवः। अनवरतवित्तवितरणनिर्जितचम्पाधिपो मुञ्जः॥ १४-१५. स जयति वाक्पतिराजः सकलार्थमनोरथैककल्पतरुः। प्रत्यर्थिभूतपार्थिवलक्ष्मीहठहरणदुर्ललितः॥
६७८ * अग्निपुराण *
तीन-तीन गणोंके बाद पहले पादका विराम होता है, उसे 'पथ्या' माना गया है।१ ॥ ५-८ ॥
जिस आर्याके पूर्वार्धमें या उत्तरार्धमें अथवा दोनोंमें तीन गणोंपर पादविराम नहीं होता, उसका नाम 'विपुला' होता है। [इस प्रकार इसके तीन भेद होते हैं—१-आदिविपुला, २-अन्त्यविपुला तथा ३-उभयविपुला। इनमें पहलीका नाम 'मुख-विपुला' दूसरीका 'जघनविपुला' तथा तीसरीका 'महाविपुला' है।] इनके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं—
१- स्निग्धच्छायालावण्यलेपिनी किंचिदवनतवीणा। मुखविपुला सौभाग्यं लभते स्त्रीत्याह माण्डव्यः ॥
२- चित्तं हरन्ति हरिणीदीर्घदृशः कामिनां कलालापैः। नीवीविमोचनव्याजकथितजघना जघनविपुला ॥
३- या स्त्री कुचकलशनितम्बमण्डले जायते महाविपुला। गम्भीरनाभिरतिदीर्घलोचना भवति सा सुभगा ॥
—पहले पद्यमें पूर्वार्धमें, दूसरेमें उत्तरार्धमें तथा तीसरेमें दोनों जगह पाद-विराम तीन गणोंसे आगे होता है।२ जिस आर्या-छन्दमें द्वितीय तथा चतुर्थ गण गुरु अक्षरोंके बीचमें होनेके साथ ही जगण अर्थात् मध्यगुरु (। ऽ ।) हों, उसका नाम 'चपला' है। तात्पर्य यह है कि 'चपला' नामक आर्यामें प्रथम गण अन्त्यगुरु (।। ऽ), तृतीय गण दो गुरु (ऽ ऽ) तथा पञ्चम गण आदिगुरु (ऽ ।।) होता है। शेष गण पूर्ववत् रहते हैं। पूर्वार्धमें 'चपला'का लक्षण हो तो उस आर्याका नाम 'मुखचपला'३ होता है। परार्धमें चपलाका लक्षण होनेपर उसे 'जघनचपला'४ कहते हैं। पूर्वार्ध और परार्ध—दोनोंमें चपलाका लक्षण संघटित होता हो तो उसका नाम 'महाचपला'५ है। जहाँ
१. पथ्याशी व्यायामी स्त्रीषु जितात्मा नरो न रोगी स्यात्। यदि वचसा मनसा वा द्रुह्यति नित्यं न भूतेभ्यः ॥
२. 'पथ्या' और 'विपुला'में सहानवस्थारूप विरोध है; अतः ये दोनों छन्द एक साथ नहीं रह सकते। यदि एक अंशमें भी 'विपुला'का लक्षण संघटित हुआ तो उसका पथ्यात्व नष्ट हो जाता है; क्योंकि 'विपुला' छन्द उभयाश्रय है; वह पूर्वार्धमें, उत्तरार्धमें तथा दोनोंमें भी रह सकता है। अब 'विपुला'का जहाँ अंश भी हो, वहाँ 'पथ्या'का प्रवेश नहीं हो सकता। 'पथ्या' छन्द एक अंशसे भी विकल हो जाय तो वहीं 'विपुला'का विषय होता है; अतः वहाँ 'विपुला'की प्राप्ति अनिवार्य है। 'पथ्या' और 'चपला'में कोई विरोध नहीं है; अतः इनमें बाध्य-बाधकभाव नहीं होता। इस विषयका संक्षिप्त संग्रह नीचे लिखे श्लोकोंमें है—
एकैव भवति पथ्या विपुलास्तिस्रस्ततश्चतस्रस्ताः। चपलाभेदैस्त्रिभिरपि भिन्ना इति षोडशार्याः स्युः ॥
गीतिचतुष्टयमित्थं प्रत्येकं षोडशप्रकारं स्यात्। साकल्येनार्याणामशीतिरेवं विकल्पाः स्युः ॥
'एक 'पथ्या', तीन 'विपुला', कुल चार भेद हुए। इनमेंसे प्रत्येक छन्द 'चपला'के तीन भेदोंसे भिन्न होकर बारह प्रकारका होता है। बारह ये और चार पहलेके—यों सोलह हुए। इन सोलहोंके 'गीति' आदि चार भेदोंद्वारा भेद होनेसे चौंसठ भेद होते हैं। पहलेके सोलह और चौंसठ—कुल अस्सी हुए। इस प्रकार 'आर्या'के अस्सी भेद हैं।'
३. पथ्यापूर्वक मुखचपलाका उदाहरण—
अतिदारुणा द्विजिह्वा परस्य रन्ध्रानुसारिणी कुटिला। दूरात्परिहरणीया नारी नागीव मुखचपला ॥
आदिविपुलापूर्वक मुखचपलाका उदाहरण—
यस्याश्च लोचने पिङ्गले भ्रुवौ संगते मुखं दीर्घम्। विपुलोन्नताश्च दन्ताः कान्तासौ भवति मुखचपला ॥
उभयविपुलापूर्वक मुख-चपलाका उदाहरण—
विपुलाभिजातवंशोद्गवापि रूपातिरेकरम्यापि। निस्सार्यते गृहाद् वल्लभापि यदि भवति मुखचपला ॥
४. पथ्यापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
यत्पादस्य कनिष्ठा न स्पृशति महीमनामिका वाप। सा सर्वधूर्तभोग्या भवेदवश्यं जघनचपला ॥
अन्त्यविपुलापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
यस्याः पादाङ्गुष्ठं व्यतीत्य याति प्रदेशिनी दीर्घा। विपुले कुले प्रसूतापि सा ध्रुवं जघनचपला स्यात् ॥
महाविपुलापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
मकरध्वजसद्मनि दृश्यते स्फुटं तिलकलाञ्छनं यस्याः। विपुलान्वयाभिजातापि जायते जघनचपलासौ ॥
५. पथ्यापूर्वक महाचपलाका उदाहरण—
हृदयं हरन्ति नार्यो मुनेरपि भ्रूकटाक्षविक्षेपैः। दोर्मूलनाभिदेशं निदर्शयन्त्यो महाचपलाः ॥
विपुलापूर्वक महाचपलाका उदाहरण—
चिबुके कपोलदेशेऽपि कूपिका दृश्यते स्मिते यस्याः। विपुलान्वयप्रसूतापि जायते सा महाचपला ॥