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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

ब्राह्मण हो तो गायत्री छन्द बोले क्योंकि ब्राह्मण गायत्री

७४ [ प्रथम पञ्चिका २८—(अग्नि प्रणयन* कृत्य का वर्णन आगे है)। अध्वर्यु होता को आदेश करता है कि (जब अग्नि को उत्तरवेदी में ले जाना हो तो) अग्नि प्रणयन के उचित मंत्र बोलो। (वह पढ़ता है :—) 'प्रदेवं देव्या धिया भरता जातवेदसम् । हव्या नो वक्षदानुषक् ॥ (ऋ० १०।१७६।२) ब्राह्मण हो तो गायत्री छन्द बोले क्योंकि ब्राह्मण गायत्री वाला है। गायत्री तेजयुक्त और ब्रह्मवर्चस्-युक्त है। इस प्रकार यह यजमान को तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी करता है। यदि क्षत्रिय हो तो त्रिष्टुप् † छन्द में यह मन्त्र बोले :— इमं महे विदथ्याय शूषं शश्वत् कृत्व ईड्याय प्रजभ्रुः । शृणोतु नो दम्येभिरनीकैः शृणोत्वग्निर्दिव्यैरजस्रः ॥ (ऋ० ३।५४।१) त्रिष्टुभ् वाला क्षत्रिय है। त्रिष्टुभ् ओज, इन्द्रिय-बल और पराक्रम युक्त है। इस प्रकार वह यजमान को ओज, इन्द्रिय-बल और पराक्रम-युक्त कर देता है। इस मन्त्र में जो कहा "शश्वत् कृत्व ईड्याय प्रजभ्रुः (अर्थात् सदा पूजनीय के लिये लाये) इससे होता यजमान को उसके सम्बन्धियों के ऊपर श्रेष्ठ बनाता है। यह जो कहा :— शृणोतु नो दम्येभिरनीकैः शृणोत्वग्निर्दिव्यैरजस्रः । (अग्नि हमारी बात को तेज चिंगारियों से सुने। अग्नि निरन्तर हमको दिव्य प्रकाश के द्वारा सुने।) इससे ऐसा ही

  • 'अग्नि-प्रणयन' का अर्थ है अग्नि को ले जाना। यह कृत्य तब होता है जब अग्नि को उत्तरवेदी में ले जाते हैं। † इस मंत्र का छन्द 'पंक्ति' है। ऋग्वेद में भी इसका "निचृत्- पंक्ति" ही छन्द दिया हुआ है। न जाने यहाँ त्रिष्टुम् क्यों दिया ?

पाँचवाँ अध्याय ] ७५ होता है। अग्नि बुढ़ापे तक निरन्तर उसके घर में रहती है। यदि वैश्य हो तो नीचे का जगती ❊ छन्द वाला मन्त्र बोले :- अय॑मि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्य॑: । यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरुचुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भवं॑ वि॒शे वि॑शे ॥ ( ऋ० ४।७।१ ) वैश्य जगती वाला है। पशु जगती वाले हैं। इस प्रकार वह यजमान को पशु-युक्त कर देता है। चौथे पाद में “वनेषु चित्रं विभवं विशे विशे” में विश शब्द वैश्य के अर्थ में आया है। इससे इसमें रूप समृद्धता है। जो रूप समृद्ध है वही यज्ञ में सफलता देता है। अयमुष्य प्र देवयुर्होता यज्ञाय नीयते। रथो न योरभीशुतो घृणी- ञ्चेतति त्मना ॥ ( ऋ० १०।१७६.३ ) इस अनुष्टुभ् वाले मंत्र से वाणी को छोड़ता है ( अर्थात जोर से बोलता है )। अनुष्टुभ् वाणी है। अनुष्टुभ् छन्द बोल कर वह वाणी को वाणी में छोड़ता है। ‘अयमुष्य’ से यह तात्पर्य है कि “मैं जो पहले गन्धर्वों के साथ थी अब वापिस आ गई।” अयमग्निरुरुष्यत्यमृतादिव जन्मनः। सहसश्चित् सहीयान् देवो जीवात्वे कृतः ॥ ( ऋ० १०।१७६।४ ) ( यह अग्नि अपनी अमृत प्रकृति से हमको निडर बनाती है ) इस मंत्र को पढ़ कर वह यजमान को अमर बनाता है। दूसरे पाद “सहसश्चित् सहीयान् देवो जीवात्वे कृतः” ( देवता हमारे जीवन के लिये अपनी शक्ति द्वारा शक्तिशाली बनाया गया ) से यह तात्पर्य है कि मंत्र को पढ़ कर अग्नि को अपने जीवन का रक्षक बनाता है। ❊ यह वेद में त्रिष्टुभ् दिया हुआ है।

७६ [ प्रथम पञ्चिका अब होता पढ़ता है :- इला यास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या अधि। जातवेदो निधीमह्यग्ने हव्याय वोह्लवे ॥ (ऋ० ३।२६।४) (हे जातवेद अग्नि हम तुझको पृथिवी की नाभि में इला के स्थान में हवि के ले जाने के लिये रखते हैं)। "इला के पद" का अर्थ है उत्तरवेदी की नाभि। 'जातवेदोनिधीमहि' का अर्थ है कि 'वह अग्नि हवि को ले जायगा।' अब होता पढ़ता है :- अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीदयोनिम्। कुलायिनं घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु ॥ (ऋ० ६।१५।१६) (हे अग्नि सब देवों के साथ पहले अपनी ऊन से भरी हुई योनि या स्थान में बैठ। सविता रूपी यजमानों के लिये घी वाले यज्ञ की आहुतियों को ले जा)। 'अग्ने विश्वेभिः' कह कर वह अग्नि को अन्य देवों के साथ बिठाता है। "कुलायिनं घृत वन्तं सवित्रे" कह कर देवदास की लकड़ियों, गुग्गल, ऊन, और सुगन्ध युक्त घास से अग्नि के लिये यज्ञ में चिड़िया के घोंसले के समान स्थान बनाया जाता है, 'यज्ञं नय यजमानाय साधु' कह कर यज्ञ को सीधा अग्नि पर रखता है। अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- सीद होतः स्व उ लोके चिकित्वान् त्सादय यज्ञं सुकृतस्य योनौ। देवावीर्देवान् हविषा यजास्यग्ने बृहद् यजमाने वयो धाः ॥ (ऋ० ३।२६।८) [हे होता (अर्थात् अग्नि) अपने स्थान में बैठ, हे प्रसिद्ध (अग्नि) सुकृत अर्थात् अच्छी तरह बने हुये घोंसले के सूराख (योनि) में यज्ञ को बिठाल। हवि के साथ देवों के पास जाने वाले अग्नि! देवों के लिये मन्त्र बोल (यज)। हे अग्नि यज- मान के लिये वृद्धि और आयु को धारण करा]।

पाँचवाँ अध्याय ] ७७ अग्नि देवों का होता है। उत्तरवेदी की नाभि ही उसका अपना लोक है। 'साद्या यज्ञं सुकृतस्य योनौ' में यजमान ही यज्ञ है। इसलिये यजमान के लिये आशीर्वाद है। "देवावीर्देवान् हविषा यजात्याग्ने बृहद् यजमाने वयो धा' में प्राण ही वयः है। ऐसा कह कर यजमान में प्राण धारण कराता है। अब होता नीचे का मन्त्र पढ़ता है :- निहोता होतृषदने विदानस्त्वेधो दीदिवाँ असदत्सुदक्षः । अदब्ध व्रत प्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः ॥ (ऋ० २।६।१) [ ज्ञानवान्, प्रकाशवान्, और दक्ष होता होतृ के स्थान में बैठा। वह होता अग्नि कैसा है ? अदब्धव्रतप्रमति (उचित व्रतों का जानने वाला), वसिष्ठ (उत्तम), सहस्रंभर (हज़ारों का पोषण करने वाला), शुचिजिह्वः (चमकदार जीभ वाला]। अग्नि देवों का होता है। उत्तर वेदी की जो नाभि है वह उसका बैठने का स्थान है। 'बैठ गया' से तात्पर्य है कि 'वह रख दिया गया'। 'उचित व्रत का जानने वाला और उत्तम' से तात्पर्य है कि देवों का अग्नि वसिष्ठ अर्थात् उत्तम है। 'सहस्र भर' का अर्थ है कि यद्यपि अग्नि एक है तो भी भिन्न २ अवसरों पर प्रयुक्त होने के कारण उसमें बहुत्व हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह हज़ारों का लाभ पाता है। नीचे का मंत्र पढ़ कर समाप्त करता है :- त्वं दूतस्त्वमु नः परस्पास्त्वं वस्य आ वृषभप्रचेता । अग्ने तोकस्य नस्तने तनूनामप्रयुच्छन्दीद्यद्बोधि गोपाः ॥ (ऋ० २।६।२) (तू हमारा दूत है। तू हमारा पीछे भी रक्षक है। हे बलवान्, तू धन का लाने वाला है। हे अग्नि, हमारे घराने के फैलने में शरीरों की रक्षा में असावधानी न कर। चमकने वाला गोप जागता था)।

७८ [ प्रथम पञ्चिका अग्नि देवों का गोप या ग्वाला है। जो इस रहस्य को समझ कर अग्नि-प्रणयन के कृत्य को इस मंत्र से समाप्त करता है वह अपने और यजमान के लिये अग्नि को हर स्थान पर अपना गोप या रक्षक पाता है और साल भर तक कल्याण लाभ करता है। वह इन आठ मंत्रों को पढ़ता है जो रूप-समृद्ध हैं। जिसमें रूप-समृद्धता होती है अर्थात् जो मंत्र पढ़ा जाय उसमें वही क्रिया वर्णित हो उसी से यज्ञ सफल होता है। इनमें पहला तीन बार पढ़ा जाता है और आख़िरी तीन बार। इस प्रकार बारह हो जाते हैं। साल में बारह मास होते हैं। संवत्सर को प्रजापति कहते हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह इन प्रजापति-सम्बन्धी ऋचाओं द्वारा सुखी होता है। पहली और पिछली ऋचा को तीन बार पढ़ कर वह यज्ञ के दोनों सिरों को बांधता है जिससे यज्ञ काबू में रहे और गिर न पड़े। (२) २९—अध्वर्यु होता को आदेश देता है कि दोनों हविर्धानों (वह बर्तन जिसमें हवि रक्खा जाय) के ले जाने के लिये उचित मंत्र पढ़ो। वह पढ़ता है। युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरेः। शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥ (ऋ० १०।१३।१) ये देव ब्रह्म से युक्त हुये। दोनों हविर्धानों को ब्रह्म से युक्त करता है। इस प्रकार ब्रह्म की शक्ति पाकर विपत्ति में नहीं पड़ता। अब नीचे के तीन मंत्रों (तृचों) को बोलता है :- प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा युवामिदा वृणीमहे। अग्निं च हव्यवाहनम् ॥ (ऋ० २।४१।१६)

पाँचवाँ अध्याय ] ७९ द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम् । यज्ञं देवेषु यच्छताम् ॥ ( ऋ० २।४१।२० ) आ वामुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्ञियाः । इहाद्य सोम पीतये ॥ ( ऋ० २।४१।२१ ) यह द्यावा-पृथिवी के मंत्र हैं । यहां प्रश्न होता है कि जब हविर्धानों के ले जाने का प्रसंग था तो द्यावा-पृथिवी की तीन ऋचायें क्यों बोली गईं । इसका उत्तर यह है कि द्यौ और पृथिवी देवों के दो हविर्धान हैं । जो कुछ हवि यहां दिया जाता है वह सब द्यौ और पृथिवी के बीच में ही होता है । इसलिये द्यावा-पृथिवी बोधक ऋचायें पढ़ी गईं । यमे इव यतमाने यदैतं प्र वां भरन् मानुषा देवयन्तः । आ सीदतं स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवतमिन्दवे नः ॥ ( ऋ० १०।१३।२ ) ‘यमे इव यतमाने यदैतं’ का अर्थ है कि ‘दोनों हविर्धान जुड़वां बहनों के समान हाथ पसार कर चलते हैं’ । “प्रवां भरन् मानुषा देवयन्तः” का अर्थ है कि ‘आदमी देवों की पूजा करते हुये तुम दोनों को लाते हैं’, ‘स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवत- मिन्दवे नः’ में ‘इन्दु’ के नाम से सोम का वर्णन है । इस आधी ऋचा को पढ़ कर सोम राजा के बैठने का स्थान ठीक करता है । अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः । असंयत्तौ व्रते ते क्षेति पुष्यति भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वते ॥ ( ऋ० १।८३।३ ) यह जो ‘उक्थ्यं वचः’ है वह दो हविर्धानों का तीसरा ढकना है । क्योंकि ‘उक्थ्यंवचः’ यज्ञ का कर्म है इसलिये ऐसा कह कर यज्ञ की उन्नति करता है । मंत्र में “यतस्रुचा……पुष्यति” तक में ‘यत्त’ वाले पद से जो ‘क्रूरता’ प्रकट होती है उसका “असंयत्त”, पद से शमन करता

८० [ प्रथम पञ्चिक है “भद्रा शक्तिः” इत्यादि से यजमान के लिये आशीर्वाद देता है। अब वह विश्वरूपी ऋचा पढ़ता है विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीद् भद्रं द्विपदे चतुष्पदे । वि नाकमख्यत् सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो विराजति ॥ ( ऋ० ५।८१।२ ) इस मंत्र को रराटी की ओर देखते हुए पढ़ना चाहिये, ( रराटी दर्भ की माला है जो हविर्धान के बीच के खंभों पर लटकी रहता है —ले० )। क्योंकि इस रराटी पर ही सफेद ओर काली सभी तरह की चीजें टंगी रहती हैं। जो इस रहस्य को समझ कर रराटी की ओर देखते हुये मंत्र को बोलता है वह अपने लिये और यजमान के लिये हर एक प्रकार की चीज सम्पादित कर लेता है। इस मंत्र को पढ़ कर समाप्त करता है। परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः । वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ ( ऋ० १।१०।१२ ) इस मंत्र को तब पढ़े जब दोनों हविर्धानों को दर्भ के गुच्छे से ढका हुआ मान ले। जो इस रहस्य को समझ कर दोनों हविर्धानों के ढक जाने पर इस मंत्र को पढ़ता है वह अपने और यजमान के लिये ओढ़ी पहनी हुई स्त्रियों का ( जो नंगी न हों ) सम्पादन करता है। दोनों हविर्धान यजु-मंत्र से ढके जाते हैं। अध्वर्यु इस यजु से इस प्रकार ढकते हैं। जब अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों ओर से मेथी ( एक प्रकार की लकड़ियां ) चलावें तब समाप्त करना चाहिये। क्योंकि तभी दोनों हविर्धान बन्द होते हैं। यह आठ ऋचायें जो बोली गईं रूप-समृद्ध हैं। जो रूप-समृद्ध होती हैं अर्थात् जिनमें उसी बात का विधान होता है। जो क्रिया की जाती है उसी से यज्ञ में सफलता होती है। इनमें से पहले और पिछले

प्रथम पञ्चिका ] ८१ को तीन बार बोलते हैं जिससे बारह हो जायं। क्योंकि साल में बारह महीने होते हैं। प्रजापति संवत्सर है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति सम्बन्धी इन ऋचाओं द्वारा समृद्धि को पाता है। पहली और पिछली ऋचा को तीन २ बार पढ़ कर वह यज्ञ के दोनों सिरों को बांध देता है जिससे यज्ञ काबू में रहे और गिर न जाय। (३) ३०—( उत्तर वेदी में अग्नि और सोम को लाना )। अग्नि और सोम के लाने पर अध्वर्यु होता को आदेश देता है कि उचित मंत्र पढ़ो। वह सविता के मंत्र को पढ़ता हैः— सावीर्हि देव प्रथमाय पित्र वर्ष्माणमस्मै वरिमाणमस्मै । अथ स्मभ्यं सवितर्वार्याणि दिवोदिव आ सुवा भूरि पश्वः ॥ (अथर्व ७।१४।३, आश्व० श्रौ० ४।१० ) यहां प्रश्न होता है कि जब अग्नि और सोम के लाने का प्रसंग है तो सविता का मंत्र क्यों पढ़ा गया। ( इसका उत्तर यह है ) कि सविता प्रसव का स्वामी है। इस मंत्र को पढ़कर ( अग्नि और सोम ) दोनों को सविता द्वारा उत्पन्न कराते हैं। इस लिये सविता का मंत्र पढ़ते हैं। अब वह ब्रह्मणस्पति की ऋचा पढ़ता है :— प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्रदेव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ ( ऋ० १।४०।३ ) यहां प्रश्न होता है कि जब अग्नि और सोम के लाने का प्रसंग है तो ब्रह्मणस्पति का मंत्र क्यों पढ़ते हैं। ( उत्तर यह है ) कि बृहस्पति ही ब्रह्मा है। इस मंत्र को पढ़कर ब्रह्मा को ( अग्नि और सोम ) दोनों का पुरोगव अर्थात् नेता बना देता है और ६

८२ [प्रथम पत्रिका यजमान ब्रह्म से युक्त होकर हानि नहीं उठाता। 'प्रदे॒व्ये॑तु सूनृता' से यज्ञ को 'सूनृत' या भद्र युक्त कर देता है। इसलिये ब्रह्मण- स्पति का मंत्र पढ़ता है। अब अग्नि की गायत्री छन्द की तीन ऋचाओं को पढ़ता है:- होता॑ दे॒वो अम॑र्त्यः पुर॒स्तादे॑ति मा॒यया॑। वि॒दथा॑नि प्र॒चोद॑यन् ॥ (ऋ० ३।२७।७) वा॒जी वाजे॑षु धीयतेऽध्व॒रेषु॒ प्र णी॑यते। विप्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ सा॒धन॑:॥ (ऋ० ३।२७।८) धि॒या च॑क्रे वरे॒ण्यो भूतानां॒ गर्भ॑माद॒धे। दक्ष॑स्य पि॒तरं॑ त॒ना॥ (ऋ० ३।२७।६) जब सोमराजा को (उत्तर वेदी पर) एक बार ले गये तो असुरों और राक्षसों ने उसको 'सदस्' और हविर्धानों के बीच में मारना चाहा। अग्नि ने माया से उसको बचा लिया। जैसा कि मंत्र में है “पुरस्तादेति मायया” (माया से आगे २ चलता है)। अग्नि ने उसे इस तरह बचाया। इसलिये (सोम के) आगे २ अग्नि को ले चलते हैं। अब नीचे लिखे तीन मंत्र और एक मंत्र बोलते हैं:— (१) उप॑ त्वाग्ने दि॒वे दि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धिया व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि। (२) राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं॒ स्वे दमे॑॥ (३) स न॑: पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥ (ऋ० १।१।७-६) (४) उप॑ प्रि॒यं प॑नि॒प्नतं॒ युवान॒माहु॑तीवृधम्॥ अगन्म बिभ्रतो नमः॥ (ऋ० ६।१६।२६) क्योंकि यह दो अग्नियां, एक जो पहले लाई गई और दूसरी जो पीछे लाई गई, यदि आपस में लड़ जायं तो यजमान को कष्ट देंगी। इन तीन और एक मंत्रों को पढ़ कर वह उन में

पाँचवाँ अध्याय ] ८३ भिन्नता कर देता है और उनको उन उन के स्थान में पहुँचा देता है, बिना स्वयं अपने को या यजमान को हानि पहुँचाये हुये । आहुति देते हुये इस मंत्र को बोलता है :— अग्ने जुषस्व प्रति हर्य तद्वचो मन्द्र स्वधाव ऋतजात सुक्रतो॑ । यो विश्वतः प्रत्यङ् ङसि दर्शतो रण्वः सन् दृष्टौ पितुमाँ इव क्षयः ॥ ( ऋ० १।१४४।७ ) इससे अग्नि को एक जुष्टि ❀(१) आहुति देता है । जब सोम राजा को ले जाते हैं तो होता नीचे के तीन मंत्र जो गायत्री छन्द में हैं और सोम देवता के हैं पढ़ता है :— (१) सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम् । ऋतस्य योनिमासदम् ॥ (२) सोमो अस्मभ्यं द्विपदे चतुष्पदे च पशवे । अनमीवा इषस्करत् ॥ (३) अस्माकमायुर्वर्धयन्नभिमातीः सहमानः । सोमः सधस्थमासदत् ॥ ( ऋ० ३।६२।१३,१४,१५ ) इस मंत्र को पढ़ने से वह सोम को उसी के देवता और उसी के छन्द से बढ़ाता है । ‘सोमः सधस्थमासदत्’ यह अन्तिम शब्द जिनसे प्रकट होता है कि सोम अपने स्थान पर बैठ रहा है होता को उस समय पढ़ने चाहिये जब कि सोम को लिये जा रहे हैं और अग्नीध्र के आगे बढ़ गये हैं तथा होता की पीठ अग्नीध्र की ओर हो गई है । अब विष्णु देवता का नीचे का मंत्र जपता है :— तमस्य राजा वरुणास्तमश्विना ऋतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः । दधार दक्षमुत्तममहर्विदं व्रजं च विष्णुः सखियाँ अपोर्णुते । ( ऋ० १।१५६।४ ) ❀हौग ने जुष्टि का अर्थ किया है- ‘as a favour’ or रियायती । सायण कहता है कि यह आहुति ‘अग्ने प्रियं’ अग्नि को प्रिय लगने के लिये है ।

८४ [ प्रथम पञ्चिका ( उस मरुतों के राजा विष्णु की बुद्धि का वरुण और दोनों अश्विन अनुकरण करते हैं। विष्णु अपने मित्रों सहित अन्धकार के स्थान को खोल कर दिन को उत्पन्न करता है।) विष्णु देवों का द्वारपाल है। इस लिये वह सोम के लिये द्वार खोल देता है । जब सोम को सदस् में रखने के निकट होते हैं तो यह मंत्र पढ़ता है :— अन्तश्च प्रागा अदितिर्भवास्यवयाता हरसो दैव्यस्य । इन्द विन्द्रस्य सख्यं जुषाणः श्रोधीव धुरमनुराय ऋध्याः । ( ऋ० ८।४८।२ ) जब सोम बैठ गया हो तो यह मंत्र पढ़ते हैं :— श्येनो न योनि सदनं धिया कृतं हिरण्ययमसदं देव एषति । प- रिखन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवां अप्येति यज्ञियः । ( ऋ० ६।७१।६ ) जैसे बाज पक्षी अच्छी तरह बनाये हुये घोंसले में बैठता है वैसे ही सोम देवता स्वर्ण के आसन पर बैठता है। आसनों पर प्यारी स्तुतियां चलती हैं और यज्ञ सम्बन्धी घोड़े के समान वह देवताओं तक पहुँचता है । स्वर्ण के आसन से काले मृगचर्म का तात्पर्य है जिससे देवों का हवि ढका जाता है । वरुण के इस मंत्र से समाप्त करता है :— अस्तभ्नाद् द्यामसुरो विश्ववेदा अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः । आसीदद् विश्वा भुवनानि सम्राड् विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि । ( ऋ० ८।४२।१ ) ( असुर अर्थात् प्राणों के रक्षक देव ने द्यौ को थामा और पृथिवी के विस्तार को नापा । उस सम्राट् ने सब लोकों में प्रवेश किया। यह सब वरुण के व्रत हैं )

पाँचवाँ अध्याय ] ८५ सोम जब तक बंधा हुआ है तब तक वरुण के अधीन है । यह जब तक चल रहा है। इसको इसी के देवता और इसी के छन्द से समृद्ध करते हैं । यदि कोई यजमान का आश्रय चाहे या उसकी रक्षा का मांगने वाला हो तो होता इस मंत्र से समाप्त करे :- एवा वन्दस्व वरुणं बृहन्त नमस्या धीरममृतस्य गोपाम् । स नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसत् पातं नो द्यावा पृथिवी उपस्थे । ( ऋ० ८।४२।२ ) जो इस रहस्य को समझ कर इस मंत्र से समाप्त करता है वह जितने लोगों के लिये चाहता है उनके लिये अभय प्राप्त कराता है । जो इस रहस्य को समझता है उसे इसी मंत्र से समाप्त करना चाहिये । यह सब १७ मंत्र जो बोले गये रूप समृद्ध हैं । जो मंत्र रूप समृद्ध होते हैं अर्थात् जिनमें उसी कृत्य का वर्णन होता है जो किया जाता है उससे यज्ञ में सफलता होती है। इन १७ में से पहले और पिछले को तीन-तीन वार पढ़ा । इस प्रकार २१ हो गये । प्रजापति २१ अंक वाला है । क्योंकि प्रजापति में १२ मास, पांच ऋतुयें, तीन लोक और सूर्य शामिल हैं । सूर्य का स्थान सब से ऊंचा है । वह देवों का क्षत्र है, वह श्री है, वह आधिपत्य है, वह चमकने वाले का स्वर्ग है, वह प्रजापति का घर है । वह स्वाराज्य है । होता यजमान को इन १७ मंत्रों से समृद्ध कर देता है ।

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पहला अध्याय १—यज्ञ द्वारा ही देव ऊँचे स्वर्ग लोक को गये। उनको भय हुआ कि हमारे इस ( यज्ञ ' को देखकर मनुष्य और ऋषि लोग पीछें से जिज्ञासा करेंगे। उन्होंने यूप ( यज्ञ शाला का खंभा जिसमें पशु बांधते हैं ) द्वारा उनको रोक दिया। ( आयोपयन् ) इसीलिये इसका नाम यूप पड़ा। ( यूप का अर्थ हुआ वह जिसके द्वारा रोका जाय )। उन ( देवों ) ने स्वर्ग जाते हुये यूप को भूमि में इस प्रकार गाड़ा कि सिरा नीचे को रहे। तब मनुष्य और ऋषि भी देवों के यज्ञ करने के स्थान पर आकर सोचने लगे कि हमको भी यज्ञ के विषय में कुछ ज्ञान हो जाय। उन्होंने केवल यूप को पृथ्वी में नीचे की ओर सिरा किये हुये गढ़ा पाया। उन्होंने जाना कि इसी से देवों ने यज्ञ के रहस्य को छिपा दिया। उन्होंने यूप को उखाड़ दिया और उसका सिरा ऊपर को कर दिया। इससे उन्होंने यज्ञ को मालूम किया और स्वर्ग को देख लिया। यही प्रयोजन है कि यूप का सिरा ऊपर को करके गाड़ते हैं कि यज्ञ को जानें और स्वर्ग को देखें। ( ८९ )

९० [ दूसरी पञ्चिका यह यूप वज्र है। इसमें आठ धारें होनी चाहियें। वज्र में आठ धारें होती हैं। जब कोई वज्र को अपने शत्रु या वैरी पर मारता है वह मर जाता है। जो वध करने के योग्य है उसका वध करने के लिये। यूप वज्र है जो शत्रु के मारने के लिये खड़ा किया जाता है। इसलिये जो यजमान से द्वेष करता है वह यह देखकर कि यह अमुक पुरुष का यूप है हानि को प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग की कामना वाला खदिर का यूप बनावे। क्योंकि खदिर का यूप बना कर ही देवों ने स्वर्ग को प्राप्त किया। इसी प्रकार खदिर का यूप बना कर ही यजमान स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है। जो अन्न और पुष्टि की इच्छा करे वह बिल्व का यूप बनावे। बिल्व पर हर साल फल आता है। वह अन्न आदि का रूप है। वह मूल से शाखा तक बढ़ता है और पुष्टि का द्योतक है। जो इस रहस्य को समझ कर बिल्व का यूप बनाता है वह अपने बच्चों और पशुओं को पुष्ट करता है। बिल्व के यूप के विषय में यह बात है कि बिल्व ज्योति है। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने जाति वालों में ज्योति होता है श्रेष्ठ होता है। जिस को तेज और ब्रह्मज्ञान की इच्छा हो वह पलाश का यूप बनावे। वनस्पतियों में पलाश तेज और ब्रह्मवर्चस है। जो इस रहस्य को समझ कर पलाश का यूप बनाता है वह तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी होता है। पलाश के यूप के विषय में यह है कि पलाश सब वनस्पतियों की योनि है। इसीलिये पलाश वृक्ष के पलाशों अर्थात् पत्तों का अनुकरण करके ही हर वृक्ष के पत्तों को पलाश कहते हैं। जो

प्रथम अध्याय ] ९१ इस रहस्य को समझता है वह सब वृक्षों के सम्बन्ध में जो कामनायें होती हैं उनको पूरा कर लेता है । (१) २-अध्वर्यु होता से कहता है, "हम यूप को चुपड़ते हैं । उपयुक्त मंत्र बोलिये ।" होता पढ़ता है :- अञ्जन्ति त्वामध्वरे देवयन्तो वनस्पते मधुना दैव्येन । यदूर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह धत्ताद् यद्वा क्षयो मातुरस्या उपस्थे । ( ऋ० ३।८।१ ) ( हे वनस्पति ! तुझ को ऋत्विज लोग यज्ञ में दिव्य मधु से चुपड़ते हैं । जो तू सीधा खड़ा है या इस माता ( भूमि ) की गोद में पड़ा है हमको धन दे ) । यह जो घी है वही दिव्य मधु है । अगले टुकड़े से यह तात्पर्य है कि चाहे खड़ा हो चाहे पड़ा हो मुझे धन दे । अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- उच्छ्र यस्व वनस्पते वर्ष्मन् पृथिव्या अधि । सुमिती मीयमानो वर्चो धा यज्ञ वाहसे । ( ऋ० ३।८।३ ) ( हे वनस्पति पृथिवी के ऊपर उठ । तू जो अच्छी तरह पड़ा हुआ है। यज्ञ के वाहक या ले जाने वाले के लिये तेज धारण करा ) । यह मंत्र यूप के उठाने के लिये रूप-समृद्ध है । जिस में रूपसमृद्धता होती है वही सफल होता है । 'वर्ष्मन् पृथिव्या अधि' से तात्पर्य है उस स्थान का जहाँ यूप गाड़ते हैं । "सुमितीमीयमानो वर्चोधा यज्ञ वाहसे" से तात्पर्य है कि यूप से आशीर्वाद चाहता है । अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्ताद् ब्रह्म वन्वानो अजरं सुवीरम् । आरे अस्मदमतिं बाधमान उच्छ्रयस्व महते सौभगाय । ( ऋ० ३।८।२ ) ( प्रज्वलित अग्नि के सामने खड़ा हुआ तू नाश न होने वाले

९२ [ दूसरी पञ्चिका और वीरता युक्त ब्रह्म तेज को देता है हमारे शत्रुओं को रोकता हुआ हमारे बड़े भाग्य के लिये खड़ा हो ) 'समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्तात्' का अर्थ है प्रज्वलित हुई अग्नि के सामने । 'ब्रह्म चन्वानो अजरं सुवीर्यम्' से आशीर्वाद से तात्पर्य है 'आरे अस्मदमतिं बाधमानः' का अर्थ है कि 'अमति' अर्थात् पाप या भूख है। इस से वह यज्ञ और यजमान को भूख से और पाप से मुक्त कर देता है । 'उच्छ्रयस्व' ( खड़ा हो ) आशीर्वाद है । अब होता नीचे के मंत्र को पढ़ता है:- ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे । ( ऋ० १।३६ १३ ) ( सीधा खड़ा हो ! सविता के समान ! हमारी रक्षा के लिये । खड़ा होकर अन्न दे । जब हम तुझ को बुलाते हैं उस समय जब कि ऋत्विज तुझ को चुपड़ते हैं ) 'देवो न सविता' में 'न' का अर्थ है 'इव' या 'समान' । 'ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता' का अर्थ है अन्न का बांटने वाला । 'अंजिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे' का तात्पर्य है छन्दों से जिनके द्वारा देवों को बुलाते हैं । जब कई यज्ञों में देवों को बुलाते हैं कि 'मेरे यज्ञ में आइये' । 'मेरे यज्ञ में आइये' तो देवता उसके यज्ञ में जाते हैं जहाँ इस रहस्य को समझने वाला होता मंत्र पढ़ कर आवाहन करता है । अब नीचे का मंत्र पढ़ता है :- ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह । कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः । ( ऋ० १।३६।१४ ) ( सीधे खड़ा होकर पाप से बचा । अपनी आग से सब मांसाहारियों के जला । हमको सीधा कर कि हम खड़े हो सकें और जी सकें । हमार हवि को देवों तक ले जा ) । 'अत्रिणं' यां खाने वाले राक्षस हैं । इसके द्वारा यूप से पापी राक्षसों को मरवाता है । 'चरथाय' का अर्थ है 'चरणाय' ( चलने

प्रथम अध्याय ] ९३ के लिये ) । ‘जीवसे’ कहकर वह यजमान को छुड़ाता है चाहे उसे ( मृत्यु ने ) पकड़ ही क्यों न लिया हो। और उसे साल भर के लिये सुरक्षित कर देता है ‘विदा देवेषु नो दुवः’ से आशीर्वाद का तात्पर्य है ( अपने कर्मों की सफलता के लिये प्रार्थना करता है ) । होता अब नीचे का मन्त्र पढ़ता है :— जातो जायते सुदिनत्वे अह्नां समर्य आ विदथे वर्धमानः। पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा देव्या विप्र उदि यर्त्ति वाचम् ॥ ( ऋ० ३।८।५ ) ( उत्पन्न होकर अपनी युवावस्था में मनुष्य के हित के लिये बढ़ता है। धीर लोग इसको बुद्धिमत्ता से अलंकृत करते हैं। ऋत्विक ब्राह्मण समूह देव विषयक वाणी का उच्चारण करता है। इस मन्त्र के पहले भाग को पढ़ कर वह ( धूप को ) बढ़ाते हैं। “पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा” पढ़ कर उसे पवित्र या अलंकृत करते हैं। ‘देव या विप्र उदियीर्त वाचम्’ से धूप को देवों के प्रति निवेदन करते हैं। अर्थात् उसका देवों को परिचय कराते हैं। होता नीचे के मन्त्र के समाप्त करता है :— युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ ( ऋ० ३।८।४ ) ( जवान वस्त्रों से अलंकृत आया है। वह उत्पन्न हुआ श्रेष्ठ है। बुद्धिमान विद्वान् लोग अपने उत्तम विचारों को प्रकट करके उसे बढ़ाते हैं ) । “युवा सुवासा” का अर्थ है प्राण। यह शरीरों से घिरा हुआ है। ‘श्रेयान् भवति जायमानः” ‘यूप’ से तात्पर्य है अर्थात् इस मंत्र को पढ़ने से यूप अधिक सुन्दर प्रतीत होता है। ‘कवयः’ का अर्थ है वह मंत्र वाले विद्वान् जो ‘यूप’ को उन्नत करते हैं।