अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
( ८ ) विषय पृष्ठ संख्या १२६—मुझको हँसा दो ३७७ १३०—स्वप्न का भावार्थ ३७८ १३१—अन्धकार ३७६ १३२—चार प्रश्नों का एक उत्तर ,, १३३—अँगुली का संकेत ३८० १३४—सबसे बड़ा कौन ३८४ १३५—राजा, लड़का, फूल और दाँत किसके किसके बड़े हैं और गुण कौन सा बड़ा है ३८६ १३६—बीरबल को सजा— ३८८ १३७—हाथी का पैर और कुँए का विवाह ३६१ १३८—बाजार की खाट, हाथ की मणी, नरक का मार्ग, व्यापार की नाक और आँख रहते अंधा ३६७ १३६—आधा आपका ४१५ १४०—उत्तम जल किस नदी का है ४१६ १४१—आमका छिलका ,, १४२—बाग और जंगली पेड़ों में अन्तर ४१७ १४३—हाथ के कंकन और दाढ़ी के बाल ४१८ १४४—फाँसी से मुक्त करदो ४२० १४५—पाखाने में चित्र ,,
( ९ ) विषय पृष्ठ संख्या १४६—शायद कोई पट्ठा चढ़ गया ४२१ १४७—यहाँ है, वहाँ नहीं, यहाँ नहीं पर वहाँ है यहाँ वहाँ दोनों जगह नहीं है और यहाँ वहाँ दोनों जगह है ,, १४८—हुजूर गधे आ रहे हैं ४२३ १४९—यह तो हमारा ही है ,, १५०—बारह में से चार गये ४२४ १५१—दो मास का एक मास ,, १५२—खुश वा नाखुश ,, १५३—आपही बादशाह कैसे होते ४२५ १५४—जो ईश्वर न करे उसे मैं करूँ ,, १५५—आम की चोरी ४२६ १५६—कुरान की बे नुकते वाली टीका ४३० १५७—नौका का न्याय ४३२ १५८—चतुर और भुग्गा ४३६ १५९—आप मुझको चाटते थे और मैं आपको चाट रहा था ,, १६०—कौन सुखी है ४४० १६१—निकस्यो रवि फोड़ पहाड़ की ताईं ४४१
(१०) विषय पृष्ठ संख्या १६२—बेटी दे दो पोती दिलादो ४४२ १६३—दण्ड वा पुरस्कार ” १६४—देने वाले का हाथ नीचा ४४४ १६५—स्वर्ग और नरक ” १६६—बख्तर की परीक्षा ४४५ १६७—सबसे उज्ज्वल क्या ४४७ १६८—प्राकृतिक और कृत्रिम ४४६ १६९—मेरी धरती पर पैर न रखना ४५२ १७०—आकाश के तारों की गणना ४५४ १७१—मूर्खों की फेहरिस्त ४५५ १७२—हथेली पर बाल क्यों नहीं उगता ४५६ १७३—नाव लाने दो ४५७ १७४—सुन्दर बच्चा किसका ४५८ १७५—बिचारे जूतों के मारे खड़े हैं ४६१ १७६—मोम निर्मित शाहजादा ” १७७—गऊ के चमड़े का जूता ४६२ १७८—आधा बाहर आधा भीतर ४६३ १७९—नदी रोती क्यों है ४६४ १८०--जाड़ा कितना ४६६
(११) विषय पृष्ठ संख्या १८१--इस समय कौन चलता है ४६६ १८२--राम के बदले मेरा नाम लिखो ,, १८३--पूर्णिमा का चन्द्रमा ४६७ १८४--कृतघ्न और कृतज्ञ ४७० १८५--दुनियाँ में स्त्रियों की संख्या अधिक है वा पुरुषों की ४७१ १८६--खिजाब लगाने वालों को दिमाग नहीं होता ४७२ १८७--गधा तम्बाकू नहीं खाता ,, १८८--बैगन की भाँजी ४७३ १८६--पाद और दस्त ,, १९०--हाथन के छूये कोऊ बेरहू न खायगो ४७४ १९१--एक भँडुवा दूसरे मालजादी ४७५ १९२--सड़क किस तरफ जाती है ४७६ १९३--फूलकर चगत्ता हो गया ,, १९४--दूध भाई ४७७ १९५--हाँ मिहर्वांन ४७८ १९६--नौकर ने चूना खाया ,, १९७--सत्ताईस में से नौ गये बाकी बचा कुछ नहीं ४८२ १९८--सूर्य पश्चिम में ही क्यों छिपता है। ,,
( १२ ) पृष्ठ संख्या विषय १९९-- इतने पैर पसारिये जितनी चादर होय ४८३ २००-- पूर्व जन्म का निर्णय ४८५ २०१-- रुई की चोरी ४८६ २०२-- आँखों देखी बात झूठी हो सकती है ४८७ २०३-- चोर पकड़ने की युक्ति ४८६ २०४-- बलात्कार ४९१ २०५-- हमारा पैर अधिक सुन्दर है ४९२
अकबर बीरबल-विनोद ।
- ॐ विष्णवे नमः * अकबर बीरबल-विनोद । बादशाह का मूल्य । अकबर बादशाह को बुद्धिमान पुरुषों से बड़ा प्रेम था । यही खास कारण था जिससे उसके दरबार में नवरत्न सदैव विद्यमान रहते थे। एक दिन दरबार लगा हुआ था और बादशाह अपने राज-सम्बन्धी कार्यों को खटा-खट निपटा रहा था उसी के अन्तर्गत एक दरबारी बीरबल को नीचा दिखाने के अभिप्राय से बोला-“शाहन्शाह ! क्षमा हो तो गुलाम कुछ अर्ज करे।” बादशाह ने उसे बोलने की अनुमति दी । वह बोला “गरीब परवर ! आज मुझे रास्ते में एक आदमी से एक अमीर की अजब वार्ता सुनने में आई। वह अमीर अपने भृत्य से कह रहा था- “तूँ मुझे किसी काम का नहीं जान पड़ता कारण कि तूँ बड़ा मूर्ख है।” दूसरा आदमी उस अमीर का नौकर था, उससे सुनकर चुप न रहा गया और अपने मालिक सेठ से बड़ी विनम्रता से बोला-“सेठजी ! यद्यपि मैं आपका सेवक हूँ, परन्तु फिर भी
अकबर बीरबल बिनोद २ कहना पड़ता है कि आपको अभी तक मनुष्य की कीमत- लगाना नहीं मालूम है। यदि आप कुछ भी विचार करते तो स्वयं सिद्ध हो जाता कि मैं आपके लिये कितना लाभदायक हूँ।" उसकी ऐसी बातें सुनकर मैं चक्कर में पड़ गया और अपने तईं कुछ भी हल न कर सका कि मनुष्य की क्या कीमत होता है । पृथिवीनाथ ! आपसे निवेदन करता हूँ कि इसका निपटारा कराकर आप मेरे सन्देह को दूर कीजिये । उसके ऐसे प्रश्न को सुनकर बादशाह विचार करने लगा; परन्तु फिर भी कुछ निश्चित न कर सका। उसने सोचा- “आज सेठ का नौकर कहता था कल्ह मेरा कोई दरबारी कह बैठे कि बादशाह क्या चीज है, वह तो हमी लोगों के बैठाने से गद्दी पर बैठा है। तो फिर मैं उसको क्या जवाब दूँगा । अतएव इसी क्षण मुझे भी अपने मूल्य का निपटारा करा लेना चाहिये ।” बादशाह ने उस आदमी के प्रश्न को अपनी सभा में दोहराकर सभासदों से अपना मूल्य पूछा। लोग चकराये कि बादशाह के प्रश्न का क्या उत्तर देना चाहिये ? इसी बीच एक वृद्ध पुरुष जो बीरबल से ईर्षा करता था बोला- “गरीबपरवर ! इस उपस्थित जनता के बीच बीरबल की ही बुद्धि बड़ी है, अतएव इसका निपटारा उसीके द्वारा होना चाहिये ।” वृद्ध की यह युक्ति बादशाह के मनमें बैठ गई और बीरबल से पूछा- "बीरबल ! क्या तुम बतला सकते हो कि मेरा मूल्य और वजन क्या है ?"
३ अकवर बीरबल विनोद
३ अकवर बीरबल विनोद -------------------
बादशाह का प्रश्न सुनकर बीरबल विचारपूर्वक बोला— “पृथिवीनाथ ! यह जौहरियों का काम है; क्योंकि मूल्य लगाना वे ही जानते हैं। यदि हुक्म हो तो एक आन में शहर के तमाम जौहरी, शराफ और साहूकारों को बुलवा लूँ। वृद्ध की मंशा बीरबल को फाँसने की थी, परन्तु बीरबल ने अपनी बुद्धिबल से उसी को फँसा दिया क्योंकि वह भी जौहरी ही था। बादशाह के हुक्म से नगर के सब जौहरी सर्राफ और साहूकार बुलवाये गये, वे सब इस आकस्मिक बुलावे से बहुत घबड़ाये हुए थे। बीरबल बोला–नगर जौहरियो, सर्राफ तथा साहूकारो ! आप लोगों को इस लिये बुलाया गया है कि आप लोग मिलकर बाद- शाह का वजन और मूल्य निश्चित करें। यह सुनकर वे जौहरी अवाक हो गये, किसी की समझ में न आया कि बादशाह का मूल्य और वजन कैसे निश्चित किया जावे। अन्तमें उनका सरदार गिड़गिड़ाता हुआ बोला— “गरीब परवर ! इस समय हम लोग सरकारी सूचना पाकर तुरन्त भागे चले आरहे हैं जिस कारण हमारा हृदय भय- विह्वल हो रहा है। हमको कुछ देर की मुहलत मिले तो एक जगह अलग बैठकर आपस में विचार कर उत्तर दें। बादशाह ने उस सरदार की बात स्वीकार करली और उनकी मदद के लिये बीरबल को भी उनके साथ कर दिया। बीरबल उनको लेकर एक अलग कमरे में चला गया। सबों ने मिलकर कोशिश की परन्तु किसो सिद्धान्त पर अटल न हुए। बीरबल बोला—“यह बात इतनी आसान नहीं है जो
अकबर बीरबल बिनोद ६
पन्द्रहवें दिन प्रातःकाल सब जौहरी बीरबल के मकान पर उपस्थित हुए और अशर्फी का तोड़ा लिए हुये बीरबल भी उनके साथ हो लिया। उधर बादशाह भी पन्द्रहवें दिन की प्रतीक्षा कर रहा था। वह शहर के बाहर बाग में एक बड़ा तंबू खड़ा करवाया। उसमें इतनी कुशादह जमीन रक्खी गयी थी कि जिसमें सर्वसाधारण से लेकर बड़े-बड़े सेठ साहूकार तक के बैठने के लिये अलग-अलग स्थान मिले। पन्द्रहवें दिन उसी बाग में ठीक समय पर दरबार लगा और तमाम लोग जमा होकर किते से बैठ गये। तंबू के मध्य में बादशाह का सिंहासन था। उसके ठीक सामने जौहरियों को बैठनेके लिये जमीन छोड़ी गई थी। बीरबल जौहरियों के दल से पहिले पहुँचा। थोड़ी देर बाद जौहरियों का दल भी जा पहुँचा। सब लोग किते से खाली स्थान पर बैठाये गये और उनके मध्य अशर्फियों का तोड़ा रख दिया गया, फिर क्या पूछना था; उनमें से प्रत्येक जौहरी एक २ अशर्फी को तराजू पर रखकर बटखरेसे तौलना शुरू किये। कुछ कालोपरान्त एक जौहरी बोला—"मिल गयी ! मिल गयी !! मिल गयी !!! जिस बात की तलाश थी वह मिल गयी।" इतने में उनका मुखिया उठा और उस अशर्फी को लेकर बादशाह के क़दमोंपर जा रखा। लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। बादशाह को एक तरफ विस्मय और दूसरी तरफ हर्ष हुआ वह उस अशर्फी को अपने हाथ में लेकर बोला-"क्या मेरी कीमत यही एक अशर्फी है?" बूढ़े जौहरी ने गम्भीरता पूर्वक उत्तर दिया- "जी हाँ, यही
७ Akbar Birbal Binod / अकबर बीरबल बिनोद
अशर्फी आपका मूल्य है और यही श्रीमान् का वजन है। यह अन्य अशर्फियों से एक रत्ती बड़ी है, इस कारण इसके समान दूसरी अशर्फी नहीं है। पृथिवीनाथ ! हम प्रजागण साधारण अशर्फी हैं और आप इस बड़ी अशर्फी के समान हैं। बादशाह ने पूछा-"तो क्या मुझमें और अन्य दूसरे मनु- ष्यों में केवल एक रत्ती का ही अन्तर है ?" शर्फ़ों का मुखिया बोला-"जी हाँ, गरीबपरवर ! इसमें कुछ भी सन्देह करने की बात नहीं है। आप में और आपकी प्रजा में केवल इतना ही अन्तर है कि प्रजा आपके आधीन रहने के लिये बनाई गयी है और आप प्रजा को अपने आधीन रखने के लिये हैं। आप प्रजाओं में जिस प्रकार बड़े समझे जाते हैं उसी प्रकार यह अशर्फी भी अन्य अशर्फियों में श्रेष्ठ साबित हुई है। आपके बैठने को ऊँचा आसन मिलता है और प्रजावर्ग को बैठने के लिये नीचा आसन दिया जाता है। इन्हीं सब कारणों से निश्चित हुआ कि यही अशर्फी आपका मूल्य है।" जौहरी की उपरोक्त युक्तिभरी वार्ता सुन बादशाह गद- गद हो गया और उसको उसके साथियों सहित अच्छा पुरस्कार देने की आज्ञा दी। जौहरी का मुखिया पुरस्कार पाकर मनही मन बीरबल को आशीर्वाद देता हुआ अपनी मण्डली के सहित नगर को चला गया और सभा भंग हुई।
अकबर बादशाह को कहानी सुनने का बड़ा शौक था।
अकबर बीरबल बिनोद २८ और क्या ! फुर्र । अकबर बादशाह को कहानी सुनने का बड़ा शौक था। इसलिये वह कुछ चुने हुए दरबारियों की ऐसी पारी बाँध रक्खी थी जो अपनी अपनी पारी पर रात्रि में बादशाह के मनोरंजनार्थ नित्य नवीन नवीन कहानियाँ सुनाया करते थे । एक दिन बीरबलकी बारी आई । यथा समय कहानी शुरू हुई। बादशाह हुँकारी भरने लगा। इस प्रकार बीरबल को कहानी कहने में बड़ी तकलोफ होती थी कारण की वादशाह बड़ी से बड़ी कहानी सुनना चाहता था। जब बीरबल एक सम्पूर्ण वाक्य कह जाता तब बादशाह केवल 'और' कह कर ही छुट्टी पा जाता था। छोटी मोटी कहानियों से बादशाह को सन्तोष नहीं होता था। वह हमेशा बड़ी से बड़ी कहानियाँ सुनने की फिराक में रहता था । बीरबल को कहानी सुनाते बहुत रात व्यतीत हो गई फिर भी बादशाह से फुरसत मिलने की कोई आशा न दिखाई पड़ी, वह झल्ला उठा और अपने मन में सोचा-‘जो कुछ भी परिश्रम है; वह मेरे को है, बादशाह तो केवल एक शब्द कह कर फुरसत पा जाते हैं इसलिये अब कोई ऐसी तरकीब सोचनी चाहिये जिससे बादशाह भी झल्ला उठें ।' वह अपनी प्रखर बुद्धिके कारण तुरत एक ऐसी ही तरकीब ढूँढ़ निकाली और उसी के अनुसार दूसरी कहानी शुरू की-‘‘एक धनिक किसान ने अपने अन्न को सुरक्षित रखने के लिये एक कोठलीं बनवा रक्खी थी, उसमें अनाज भर कर उसके मुँह
चिड़िया घुसी और अपना भाग लेकर 'फुर्र' उड़ गई । फिर
६ अकबर बीरबल बिनोद पर ढक्कन रखकर उसे भलीभाँति बन्द कर दिया, यहाँ तक कि उसमें हवा आने जाने तक की जगह भी नहीं छूटी थी । विधना का विधान कठिन होता है, दैवात उस कोठली में एक छोटा सा छिद्र छूट गया था जिसके द्वारा एक छोटी चिड़िया उस कोठली में घुस गई और एक दाना अपनी चोंच में लेकर बाहर निकल आई और 'फुर्र' उड़ गई। फिर दूसरी चिड़िया घुसी और अपना भाग लेकर 'फुर्र' उड़ गई । फिर तीसरी चिड़िया आई और भीतर गई, अपना दाना लेकर 'फुर्र' उड़गई । फिर एक चिड़िया आई, भीतर घुसी अपना दाना लेकर 'फुर्र' उड़ गई, फिर और एक चिड़िया आई और भीतर घुसकर अपना दाना लेकर 'फुर्र' उड़ गई । इसी तरह लगातार कहते कहते बीरबल को सैकड़ों बार हो गया जब बादशाह और और कहता कहता थक गया तो भुँझला कर बीरबल से बोला- "यह तो मैं सुन चुका, अब आगे क्या हुआ सो कहो । बीरबल ने गम्भीरता से उत्तर दिया- "पृथ्वी- नाथ ! दाने के लोभ से वहाँ पर चिड़ियों का जमघट लग गया यहाँ तक कि वहाँ करोड़ों चिड़ियाँ इकट्ठी हो गईं और अपना अपना दाना बारी बारी से लेकर जाने आने लगीं । अभी सौ पचास की ही बारी आई है, जब सब चिड़ियों का पेटभर जायगा तो कहानी आगे चलेगी। क्या अभी खतम हुआ जाता है । इसमें वर्षों का समय लगेगा । बादशाह बोला- "मैं ऐसी कहानी से भर पाया अब इसे यहीं बन्द करो।" बीरबल को अवकाश मिल गया वह मनही मन गाजता हुआ वहाँ से प्रस्थान किया ।
अकबर बीरबल बिनोद १० बादशाह का तोता । एक फकीर बड़ा तोते बाज था। वह तोता बाजार से खरीद कर लाता और उसे भली प्रकार शिक्षित कर अमीर उमरावों को देकर द्रव्य उपार्जन करता। एक दिन वह अपने नियम के अनुसार एक बहुत अच्छे तोते को खूब सिखा पढ़ा कर बादशाह को दिया। बादशाह तोते की खूबसूरती और इल्मियत से निहायत खुश हुआ और वह उसे एक सुविज्ञ सेवक को सुपुर्द कर उससे बोला—"देखो इस तोते की आब हवा और दाना पानी पर बड़ी सावधानी रखना, इसकी प्रकृति में कुछ अन्तर न पड़ने पावे। इसको जरा भी तकलीफ होते ही फौरन मुझे खबर देना। यदि कोई मेरे पास इसके मरने की खबर लायेगा तो तुरत उसकी गर्दन मार दी जायगी।" दैवात् तोता मर गया। बिचारा सेवक बहुत डरा, उसे अपने जीवनरक्षा की कोई सूरत नहीं दिखलाई पड़ती थी। दोनों प्रकारसे मृत्यु का सामना था। "कहने पर गर्दन मारी जावेगी और यदि मरने का समाचार न देकर गुप्त रक्खूँ तो किसी दिन भेद खुलने पर और भी दुर्गति होगी।" लाचार अपना कुछ वश न चलते देख बीरबल के पास गया और उससे सारा समाचार कहकर बहुत गिड़गिड़ाया और कष्ट से छुटकारा पाने की तरकीब पूछी। बीरबल बोला—"डरो नहीं, मैं तुमको अभयदान देता हूँ।" इधर नौकर को बिदा कर वह तुरत बादशाह के पास जा पहुँचा और
११ अकबर बीरबल बिनोद बड़ी घबड़ाहट के साथ बोला- "गरीब परवर ! अपना तो-ता, अपना तो-ता ।" उसकी घबराहट देखकर बादशाह बोल उठा- "क्या वह मर गया ?" बीरबल बात सँभालते हुए उत्तर दिया- "नहीं पृथ्वीनाथ ! वह बड़ा बिरागी हो गया है, आज सुबह से ही अपना मुख ऊपर किये हुए है और कोई अंग नहीं हिलाता, उसकी चोंच और आँखें भी बन्द हैं।" बीरबल की ऊपर कही बातें सुनकर बादशाह ने कहा- "तब क्यों नहीं कहते कि वह मर गया।" बीरबलने उत्तर दिया- "आप चाहे जो कुछ भी कहें परन्तु मेरी समझ में तो यही आता है कि वह मौन होकर तपस्या कर रहा है। आप चलकर स्वयं देख लेवें तो बहुत अच्छा हो ।" बादशाह ने बीरबल की बात मान ली और दोनों तोते के पास पहुँचे, तोते की दशा देखकर बादशाह ने बीरबल से पूछा- "बीरबल ! कहने को तो तुम बड़े चतुर बनते हो फिर भी तोते के मरने की तुम्हे खबर न मिली। यदि यही बात मुझसे पहले ही बतला दिये होते, तो मुझको यहाँ तक आने की क्या जरूरत थी ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथ्वीनाथ ! मैं लाचार था, क्योंकि यदि पहले ही बतला दिये होता तो जान से हाथ धोना पड़ता । उसकी इस चालाकी से बादशाह बहुत खुश हुआ और उसको अपनी पहली आज्ञा का स्मरण हो आया । उसने बीरबल की बड़ी प्रशंसा की और एक बड़ी रकम पुरस्कार में देकर उसे बिदा किया। बीरबल उसी क्षण उस रकम को
अकबर बीरबल बिनोद १२ तोते के रक्षक को दे दिया। इस प्रकार विचारे सेवक की प्राणरक्षा हुई और उसे धन भी मिला। बैल का दूध । एक दिन की बात है कि अकबर और बीरबल दोनों एक उपवन में बैठे हुये आनन्द मना रहे थे इतने में शाम होगई । जब बीरबल घर जाने को उद्यत हुआ तो बादशाह ने उसे रोककर कहा-"बीरबल ! आज कई दिनोंसे मैं एक बात सोच रहा था, परन्तु तुमसे कहना भूल जाता था। एक हकीम दवा बनाता है उसमें बैल के दूध की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि तुम कहीं से उसे ला दो तो अति उत्तम हो । "पत्ता खड़का बन्दा भड़का।" बीरबल बादशाह की मन्शा समझ गया और मनमें कहा कि बादशाह इस बहाने मुझे मूर्ख बनाना चाहते हैं। बीरबल बोला-"इसमें घबड़ाने की कौनसी बात है, मैं एक सप्ताह में बैल का दूध ला दूँगा।" बादशाह ने कहा-"दो-चार दिन और अधिक लग जायें तो कोई चिन्ता की बात नहीं है, परन्तु दूध का आना बहुत लाजिमी है।" "बहुत अच्छा" -कहता हुआ बीरबल वहाँ से बिदा हुआ। वह-घर पहुँच एकान्त स्थान में बैठकर बैल के दूध वाले प्रश्न पर विचार करने लगा। चिन्ताग्रस्त बीरबल को कई घण्टे का समय मिनटों के समान बीत गया। जब भोजन करने का समय हुआ तो नियमानुसार उसकी लड़की बुलाने
१३ अकबर बीरबल विनोद
१३ अकबर बीरबल विनोद
आई। वह अपने पिताका चेहरा उतरा और विचार-मग्न देख कर ठिठक गई। जब उसको खड़े कई मिनट व्यतीत होगये और पिता का ध्यान न टूटा तो वह उद्विग्न होकर पितासे चिन्ता का कारण पूछा। यद्यपि यह बीरबलकी बड़ी लड़की थी और वह इसकी बुद्धिमत्ता को कई बार परीक्षा भी ले चुका था। फिर भी ऐसे गूढ़ विषय में उसे सफलता मिलेगी ऐसी आशा स्वप्न में भी न थी। इसलिये कुछ समय तक उसकी बातों को अनसुनी कर टाल-मटोल करता रहा। पुत्री के पुनः पुनः अनुरोध करने पर उसे विवश होकर बादशाह का जटिल प्रश्न सुनाना पड़ा। कन्या बोली—"पिताजी ! यह कौनसी ऐसी कठिन बात है जिसके लिये आप ऐसे चिन्ताकुल हो रहे हैं। चलिये भोजन का समय बीता जा रहा है। मैं उसका उत्तर एक हफ्ते के भीतर ही बादशाह को पहुँचा दूँगी।" लड़की के ऐसे उत्तरसे बीरबल की चिन्ता घटी और शाह- सकर भोजन करने गया। इस प्रकार जब दो दिन व्यतीत हो गये तो बीरबल की लड़की ने एक नयी तरकीब निकाली। वह ढूँढ़कर बहुतेरे पुराने वस्त्रों को घर से बाहर निकाल लाई और उनका एक गठ्ठर तैयार किया। जब आधी रात का समय हुआ तो उस गठ्ठर को सिरपर लादकर नदी तटपर जा पहुँची और 'छियो-छियो' कर वस्त्र पछारने लगी। बादशाह का महल ठीक नदी तटपर बना हुआ था अर्ध रात्रि के समय नींद के प्रथम प्रहर में जब कपड़ा धोने की आवाज बादशाह के कान में पड़ी तो उसकी निद्रा भंग हो गई और
अकबर बीरबल बिनोद १४ पहरे वाले सन्तरी को पुकार कर बोला-"देखो इतनी रात्रि में कौन धोबी कपड़ा छाँट रहा है; उसे तुरत पकड़कर मेरे पास लाओ ?" पहरे वाला सिपाही हुक्म पाते ही कई अन्य सिपाहियों के साथ वहाँ पर जा पहुँचा जहाँ से कपड़े धोने की आवाज आ रही थी । वे सब बड़े हैरान और परेशान हुए क्योंकि देखते क्या हैं कि एक सिरसे पैर तक अति सुन्दरी युवती कपड़े पछाड़ रही है । सिपाहियों ने उसे कई बार पुकार कर बादशाह का हुक्म सुनाया परन्तु वह उनकी बातें अनसुनी कर बराबर अपने काम में व्यस्त रही-आखिर एक सिपाही उसके बिल्कुल समीप पहुँचकर बोला-"अरी तू कौन है जो इतनी धृष्टता कर रही है और पुकारने पर सुनती भी नहीं ! चल तुझे बादशाह ने बुलाया है ?" लड़की तो येनकेन प्रका- रेण बादशाह के पास पहुँचना ही चाहती थी । परन्तु फिर भी अपना अभिप्राय छिपाकर बोली-"आप लोग मुझे क्यों दुख देने पर उतारू हुए हैं, लो मैं अपने घर चली जाती हूँ ।" सिपाहियों ने कहा-"खबरदार तुम्हारा भला इसी में है कि सीधे हमलोगों के साथ बादशाह के पास चलो ।" लड़की कपड़ों को जहाँ का तहाँ छोड़ उनके पीछे हो ली और जब बादशाह के सन्निकट पहुँची तो बड़े अदब से झुककर सलाम की और डरीसी होकर एक किनारे खड़ी हो बादशाह के हुक्म की प्रतीक्षा करने लगी । बादशाह क्रोध से आग बबूला हो रहा था । उसने अपनी लाल लाल आँखे निकाकर पूछा- "ऐ कम्बख्त ! तूं कौन है और इस रात्रि के मध्यकाल में यहाँ
१५ अकबर बीरबल बिनोद कपड़े क्यों धो रही है ?" लड़की ने देखा कि बादशाह क्रोध से तमतमा गया है इसलिये काँपती हुई गिड़गिड़ाकर लड़- खड़ाती जुबान से बोली-“श्रीमान ! श्रीमान् ! मैं तो"......! बादशाह को उसे घबड़ाई हुई देखकर दया आ गई और उसे शान्त्वना देते हुए बोला-“तू इतना घबड़ाती क्यों है, यदि साफ २ बतला देगी तो तुझे माफी दी जायगी अन्यथा बहुत कष्ट उठायेगी ।” लड़की ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मुझे इस समय नितान्त आवश्यकता पड़ी है जिस कारण विवश हो कर कपड़े धोने आई हूँ ।” बादशाह ने कहा-“ऐ अभागी ! ऐसी कौन सी जरूरत थी जिसके लिये तू इतना परेशान है ।”लड़की ने उत्तर दिया- “क्या कहूँ, पृथ्वीनाथ ! आज दोपहर में मेरे पिता को लड़का पैदा हुआ है सो मैं दिन भर तो और और कामों में परेशान थी इस वक्त फुरसत पाने पर कपड़े धोने आई हूँ । क्योंकि साफ कपड़ों की आवश्यकता आन पड़ी है ।” लड़की के ऐसे कौतूहलपूर्ण उत्तर को सुन बादशाह बड़ा आश्चर्य-चकित हुआ और उसे फटकारते हुए बोला—"ऐ नादान छोकरी ! तू क्या बकती है ! क्या तेरा दिमाग खब्त तो नहीं हो गया है, भला पुरुष को भी कहीं लड़का पैदा होता है ?” लड़की सुअवसर देखकर विनम्रता पूर्वक बोली-“पृथ्वी नाथ ! जब पुरुष को लड़का नहीं हो सकता तो बैल को दूध कैसे होगा ?” बादशाह को अपनी पहली बात स्मरण हो आई चकित होकर लड़की से पूछा-“क्या तू बीरबल की लड़की तो नहीं है?”
अकबर बीरबल बिनोद १६ लड़की ने उत्तर दिया-“जी हाँ, पृथिवीनाथ ! आपका अनु- मान बिल्कुल ठीक है।” बादशाह उसकी इस चतुरता से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसको आभूषण और द्रव्य पुरस्कार में देकर बड़ी इज्जत से पालकी में बैठाकर बिदा किया। लड़की ने घर पहुँचकर पिता का चरण स्पर्श कर रात की घटना का सारा वृतान्त कह सुनाया। बीरबल अपनी बुद्धिमती कन्या से बहुत प्रसन्न हुआ और उसका पुरस्कार उसे लौटाकर बहुत आशीर्वाद दिया।
पंडित की पदवी ।
एक मूर्ख ब्राह्मण को पंडित कहलवाने की बड़ी प्रबल इच्छा थी। विचारा सतत् प्रयत्न करने पर भी जब कामयाब न हुआ तो उसे बीरबल से मिलकर कार्य-साधन की तरकीब सूझी। वह तुरंत बीरबल के मकान की तरफ प्रस्थान किया। बीरबल का घर उसके घर से दूर था। रास्ते का थका-माँदा जब वहाँ पहुँचा तो लोगों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि अभी बीरबल दरबार से नहीं आया है। 'मरता क्या न करता' वह तो पंडित कहलाने की धुन में चूर हो रहा था, तत्काल वहाँ से मुड़ा और दरबार की तरफ राही हुआ। मौन मारे चला जा रहा था, अचानक बीच रास्ते में उसकी बीरबल से मुलाकात हो गई। वह बड़ी विनम्रतापूर्वक अपना दोनों हाथ जोड़कर बीरबल से बोला-“बुद्धिवर प्रधान जी ! मैं निरक्षर भट्टाचार्य्य हूँ, यानी मुझे पढ़ना लिखना कुछ भी नहीं आता
१७ अकबर बीरबल विनोद
१७ अकबर बीरबल विनोद तिसपर मुझे पंडित बनने की बड़ी अभिलाषा है ! अपनी बुद्धि भर प्रयास करके हार गया पर मेरी मनोकामना सफल न हुई। अब लाचार होकर आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मुझे इसका उपाय बतला कर मेरी जीवन रक्षा कीजिये।” बीरबल ने कहा—“इसमें आपके घबड़ाने की बात नहीं है, इसका उपाय तो बड़ा ही सरल है। जो तुम्हें पंडित कहलाने की इतनी कांक्षा है तो किसी चौराहे पर जाकर खड़े हो जावो, जब तुम्हें कोई पंडित कहकर पुकारे तो उसे मारने दौड़ना, बस फिर देखोगे कि तुम जहाँ २ जावोगे सर्वत्र लोग पंडित ही पंडित पुकारते फिरेंगे।” बीरबल की युक्ति से वह मूर्ख ब्राह्मण बड़ा सन्तुष्ट हुआ। तुरत आगे बढ़कर वह एक चौराहे पर खड़ा होगया। इधर बीरबल भी जा पहुँचा और वहाँ के खेलते हुए छोटे २ लड़कों के कान में कुछ कहकर समझाया। फिर क्या था; चारों तरफ से पंडित २ की आवाज आने लगी और वह उन्हें मारने को दौड़ाने लगा। उस चौमोहानी पर लोगों की भीड़ लग गई। लड़कों की देखा देखी बड़कों ने भी पंडित पुकारना प्रारम्भ कर दिया। ज्यों-ज्यों वह लोगों पर चिढ़ता त्यों-त्यों लोग और भी चिढ़ाते जाते थे। देखा-देखी थोड़े समय में ही वह मूर्ख सर्वत्र पंडित के नाम से ख्यात हो गया। जब उसका मतलब हल हो गया तो बीरबल की अनुमति से क्रमशः चिढ़ना बन्द कर दिया, परन्तु लोगों ने पंडित कहना नहीं छोड़ा ? २