अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
११ अकबर बीरबल बिनोद बड़ी घबड़ाहट के साथ बोला- "गरीब परवर ! अपना तो-ता, अपना तो-ता ।" उसकी घबराहट देखकर बादशाह बोल उठा- "क्या वह मर गया ?" बीरबल बात सँभालते हुए उत्तर दिया- "नहीं पृथ्वीनाथ ! वह बड़ा बिरागी हो गया है, आज सुबह से ही अपना मुख ऊपर किये हुए है और कोई अंग नहीं हिलाता, उसकी चोंच और आँखें भी बन्द हैं।" बीरबल की ऊपर कही बातें सुनकर बादशाह ने कहा- "तब क्यों नहीं कहते कि वह मर गया।" बीरबलने उत्तर दिया- "आप चाहे जो कुछ भी कहें परन्तु मेरी समझ में तो यही आता है कि वह मौन होकर तपस्या कर रहा है। आप चलकर स्वयं देख लेवें तो बहुत अच्छा हो ।" बादशाह ने बीरबल की बात मान ली और दोनों तोते के पास पहुँचे, तोते की दशा देखकर बादशाह ने बीरबल से पूछा- "बीरबल ! कहने को तो तुम बड़े चतुर बनते हो फिर भी तोते के मरने की तुम्हे खबर न मिली। यदि यही बात मुझसे पहले ही बतला दिये होते, तो मुझको यहाँ तक आने की क्या जरूरत थी ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथ्वीनाथ ! मैं लाचार था, क्योंकि यदि पहले ही बतला दिये होता तो जान से हाथ धोना पड़ता । उसकी इस चालाकी से बादशाह बहुत खुश हुआ और उसको अपनी पहली आज्ञा का स्मरण हो आया । उसने बीरबल की बड़ी प्रशंसा की और एक बड़ी रकम पुरस्कार में देकर उसे बिदा किया। बीरबल उसी क्षण उस रकम को
अकबर बीरबल बिनोद १२ तोते के रक्षक को दे दिया। इस प्रकार विचारे सेवक की प्राणरक्षा हुई और उसे धन भी मिला। बैल का दूध । एक दिन की बात है कि अकबर और बीरबल दोनों एक उपवन में बैठे हुये आनन्द मना रहे थे इतने में शाम होगई । जब बीरबल घर जाने को उद्यत हुआ तो बादशाह ने उसे रोककर कहा-"बीरबल ! आज कई दिनोंसे मैं एक बात सोच रहा था, परन्तु तुमसे कहना भूल जाता था। एक हकीम दवा बनाता है उसमें बैल के दूध की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि तुम कहीं से उसे ला दो तो अति उत्तम हो । "पत्ता खड़का बन्दा भड़का।" बीरबल बादशाह की मन्शा समझ गया और मनमें कहा कि बादशाह इस बहाने मुझे मूर्ख बनाना चाहते हैं। बीरबल बोला-"इसमें घबड़ाने की कौनसी बात है, मैं एक सप्ताह में बैल का दूध ला दूँगा।" बादशाह ने कहा-"दो-चार दिन और अधिक लग जायें तो कोई चिन्ता की बात नहीं है, परन्तु दूध का आना बहुत लाजिमी है।" "बहुत अच्छा" -कहता हुआ बीरबल वहाँ से बिदा हुआ। वह-घर पहुँच एकान्त स्थान में बैठकर बैल के दूध वाले प्रश्न पर विचार करने लगा। चिन्ताग्रस्त बीरबल को कई घण्टे का समय मिनटों के समान बीत गया। जब भोजन करने का समय हुआ तो नियमानुसार उसकी लड़की बुलाने
१३ अकबर बीरबल विनोद
१३ अकबर बीरबल विनोद
आई। वह अपने पिताका चेहरा उतरा और विचार-मग्न देख कर ठिठक गई। जब उसको खड़े कई मिनट व्यतीत होगये और पिता का ध्यान न टूटा तो वह उद्विग्न होकर पितासे चिन्ता का कारण पूछा। यद्यपि यह बीरबलकी बड़ी लड़की थी और वह इसकी बुद्धिमत्ता को कई बार परीक्षा भी ले चुका था। फिर भी ऐसे गूढ़ विषय में उसे सफलता मिलेगी ऐसी आशा स्वप्न में भी न थी। इसलिये कुछ समय तक उसकी बातों को अनसुनी कर टाल-मटोल करता रहा। पुत्री के पुनः पुनः अनुरोध करने पर उसे विवश होकर बादशाह का जटिल प्रश्न सुनाना पड़ा। कन्या बोली—"पिताजी ! यह कौनसी ऐसी कठिन बात है जिसके लिये आप ऐसे चिन्ताकुल हो रहे हैं। चलिये भोजन का समय बीता जा रहा है। मैं उसका उत्तर एक हफ्ते के भीतर ही बादशाह को पहुँचा दूँगी।" लड़की के ऐसे उत्तरसे बीरबल की चिन्ता घटी और शाह- सकर भोजन करने गया। इस प्रकार जब दो दिन व्यतीत हो गये तो बीरबल की लड़की ने एक नयी तरकीब निकाली। वह ढूँढ़कर बहुतेरे पुराने वस्त्रों को घर से बाहर निकाल लाई और उनका एक गठ्ठर तैयार किया। जब आधी रात का समय हुआ तो उस गठ्ठर को सिरपर लादकर नदी तटपर जा पहुँची और 'छियो-छियो' कर वस्त्र पछारने लगी। बादशाह का महल ठीक नदी तटपर बना हुआ था अर्ध रात्रि के समय नींद के प्रथम प्रहर में जब कपड़ा धोने की आवाज बादशाह के कान में पड़ी तो उसकी निद्रा भंग हो गई और
अकबर बीरबल बिनोद १४ पहरे वाले सन्तरी को पुकार कर बोला-"देखो इतनी रात्रि में कौन धोबी कपड़ा छाँट रहा है; उसे तुरत पकड़कर मेरे पास लाओ ?" पहरे वाला सिपाही हुक्म पाते ही कई अन्य सिपाहियों के साथ वहाँ पर जा पहुँचा जहाँ से कपड़े धोने की आवाज आ रही थी । वे सब बड़े हैरान और परेशान हुए क्योंकि देखते क्या हैं कि एक सिरसे पैर तक अति सुन्दरी युवती कपड़े पछाड़ रही है । सिपाहियों ने उसे कई बार पुकार कर बादशाह का हुक्म सुनाया परन्तु वह उनकी बातें अनसुनी कर बराबर अपने काम में व्यस्त रही-आखिर एक सिपाही उसके बिल्कुल समीप पहुँचकर बोला-"अरी तू कौन है जो इतनी धृष्टता कर रही है और पुकारने पर सुनती भी नहीं ! चल तुझे बादशाह ने बुलाया है ?" लड़की तो येनकेन प्रका- रेण बादशाह के पास पहुँचना ही चाहती थी । परन्तु फिर भी अपना अभिप्राय छिपाकर बोली-"आप लोग मुझे क्यों दुख देने पर उतारू हुए हैं, लो मैं अपने घर चली जाती हूँ ।" सिपाहियों ने कहा-"खबरदार तुम्हारा भला इसी में है कि सीधे हमलोगों के साथ बादशाह के पास चलो ।" लड़की कपड़ों को जहाँ का तहाँ छोड़ उनके पीछे हो ली और जब बादशाह के सन्निकट पहुँची तो बड़े अदब से झुककर सलाम की और डरीसी होकर एक किनारे खड़ी हो बादशाह के हुक्म की प्रतीक्षा करने लगी । बादशाह क्रोध से आग बबूला हो रहा था । उसने अपनी लाल लाल आँखे निकाकर पूछा- "ऐ कम्बख्त ! तूं कौन है और इस रात्रि के मध्यकाल में यहाँ
१५ अकबर बीरबल बिनोद कपड़े क्यों धो रही है ?" लड़की ने देखा कि बादशाह क्रोध से तमतमा गया है इसलिये काँपती हुई गिड़गिड़ाकर लड़- खड़ाती जुबान से बोली-“श्रीमान ! श्रीमान् ! मैं तो"......! बादशाह को उसे घबड़ाई हुई देखकर दया आ गई और उसे शान्त्वना देते हुए बोला-“तू इतना घबड़ाती क्यों है, यदि साफ २ बतला देगी तो तुझे माफी दी जायगी अन्यथा बहुत कष्ट उठायेगी ।” लड़की ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मुझे इस समय नितान्त आवश्यकता पड़ी है जिस कारण विवश हो कर कपड़े धोने आई हूँ ।” बादशाह ने कहा-“ऐ अभागी ! ऐसी कौन सी जरूरत थी जिसके लिये तू इतना परेशान है ।”लड़की ने उत्तर दिया- “क्या कहूँ, पृथ्वीनाथ ! आज दोपहर में मेरे पिता को लड़का पैदा हुआ है सो मैं दिन भर तो और और कामों में परेशान थी इस वक्त फुरसत पाने पर कपड़े धोने आई हूँ । क्योंकि साफ कपड़ों की आवश्यकता आन पड़ी है ।” लड़की के ऐसे कौतूहलपूर्ण उत्तर को सुन बादशाह बड़ा आश्चर्य-चकित हुआ और उसे फटकारते हुए बोला—"ऐ नादान छोकरी ! तू क्या बकती है ! क्या तेरा दिमाग खब्त तो नहीं हो गया है, भला पुरुष को भी कहीं लड़का पैदा होता है ?” लड़की सुअवसर देखकर विनम्रता पूर्वक बोली-“पृथ्वी नाथ ! जब पुरुष को लड़का नहीं हो सकता तो बैल को दूध कैसे होगा ?” बादशाह को अपनी पहली बात स्मरण हो आई चकित होकर लड़की से पूछा-“क्या तू बीरबल की लड़की तो नहीं है?”
अकबर बीरबल बिनोद १६ लड़की ने उत्तर दिया-“जी हाँ, पृथिवीनाथ ! आपका अनु- मान बिल्कुल ठीक है।” बादशाह उसकी इस चतुरता से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसको आभूषण और द्रव्य पुरस्कार में देकर बड़ी इज्जत से पालकी में बैठाकर बिदा किया। लड़की ने घर पहुँचकर पिता का चरण स्पर्श कर रात की घटना का सारा वृतान्त कह सुनाया। बीरबल अपनी बुद्धिमती कन्या से बहुत प्रसन्न हुआ और उसका पुरस्कार उसे लौटाकर बहुत आशीर्वाद दिया।
पंडित की पदवी ।
एक मूर्ख ब्राह्मण को पंडित कहलवाने की बड़ी प्रबल इच्छा थी। विचारा सतत् प्रयत्न करने पर भी जब कामयाब न हुआ तो उसे बीरबल से मिलकर कार्य-साधन की तरकीब सूझी। वह तुरंत बीरबल के मकान की तरफ प्रस्थान किया। बीरबल का घर उसके घर से दूर था। रास्ते का थका-माँदा जब वहाँ पहुँचा तो लोगों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि अभी बीरबल दरबार से नहीं आया है। 'मरता क्या न करता' वह तो पंडित कहलाने की धुन में चूर हो रहा था, तत्काल वहाँ से मुड़ा और दरबार की तरफ राही हुआ। मौन मारे चला जा रहा था, अचानक बीच रास्ते में उसकी बीरबल से मुलाकात हो गई। वह बड़ी विनम्रतापूर्वक अपना दोनों हाथ जोड़कर बीरबल से बोला-“बुद्धिवर प्रधान जी ! मैं निरक्षर भट्टाचार्य्य हूँ, यानी मुझे पढ़ना लिखना कुछ भी नहीं आता
१७ अकबर बीरबल विनोद
१७ अकबर बीरबल विनोद तिसपर मुझे पंडित बनने की बड़ी अभिलाषा है ! अपनी बुद्धि भर प्रयास करके हार गया पर मेरी मनोकामना सफल न हुई। अब लाचार होकर आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मुझे इसका उपाय बतला कर मेरी जीवन रक्षा कीजिये।” बीरबल ने कहा—“इसमें आपके घबड़ाने की बात नहीं है, इसका उपाय तो बड़ा ही सरल है। जो तुम्हें पंडित कहलाने की इतनी कांक्षा है तो किसी चौराहे पर जाकर खड़े हो जावो, जब तुम्हें कोई पंडित कहकर पुकारे तो उसे मारने दौड़ना, बस फिर देखोगे कि तुम जहाँ २ जावोगे सर्वत्र लोग पंडित ही पंडित पुकारते फिरेंगे।” बीरबल की युक्ति से वह मूर्ख ब्राह्मण बड़ा सन्तुष्ट हुआ। तुरत आगे बढ़कर वह एक चौराहे पर खड़ा होगया। इधर बीरबल भी जा पहुँचा और वहाँ के खेलते हुए छोटे २ लड़कों के कान में कुछ कहकर समझाया। फिर क्या था; चारों तरफ से पंडित २ की आवाज आने लगी और वह उन्हें मारने को दौड़ाने लगा। उस चौमोहानी पर लोगों की भीड़ लग गई। लड़कों की देखा देखी बड़कों ने भी पंडित पुकारना प्रारम्भ कर दिया। ज्यों-ज्यों वह लोगों पर चिढ़ता त्यों-त्यों लोग और भी चिढ़ाते जाते थे। देखा-देखी थोड़े समय में ही वह मूर्ख सर्वत्र पंडित के नाम से ख्यात हो गया। जब उसका मतलब हल हो गया तो बीरबल की अनुमति से क्रमशः चिढ़ना बन्द कर दिया, परन्तु लोगों ने पंडित कहना नहीं छोड़ा ? २
अकबर बीरबल बिनोद १८ दो पड़ोसिनें । दिल्ली शहर के एक महल्ले में दो पड़ोसिनें बहुत दिनों से आबाद थीं, परन्तु दोनों का स्वभाव भेद से उनकी पटरी नहीं खाती थी । उसमें एक तो गुणवती और सरल स्वभाव थी परन्तु दूसरी खोटी और कर्कशा थी । उनके मनमुटाव का यही खास कारण था । न वह उसकी विभूति को सहन करती और न वह उसकी । यहाँ तक कि कर्कशा हमेशा सरला की हँसी उड़ाया करती थी । जब वह किसी प्रकार भी सरला को न दबा सकी तो एक दिन उसने अपने लाड़ले पुत्र की हत्या कर चुपके से उस भलामानस के घर में छोड़ आई और आप स्वयं रोती बिलबिलाती हुई बादशाह के पास पहुँची । जब बीरबल ने उसके बच्चे के कत्ल का हाल सुना तो वह उस भलीमानस औरत को बुलवाया, जिसपर की दुष्टाने अपने पुत्र के मारने का अभियोग लगाया था । बीरबल की आज्ञा पर वह तुरत हाजिर हुई और अपने को इस प्रकार आकस्मिक बुलाये जाने का कारण पूछा । बीरबल ने उत्तर दिया-“क्या तूने इस औरत के बालक की हत्या की है जैसा कि यह तेरे ऊपर अभिशाप लगा रही है ? यदि नहीं, तो तेरे पास निर्दोष होने का क्या सबूत है, तुरत बतला ?” वह बोली-“महाशय जी ! न जाने कौन इस बालक की हत्या कर लाश मेरे घर में डाल गया है । मुझे इसकी बिल्कुल जानकारी नहीं। आप इसपर भलीभाँति विचार करें, मुझे
१६ अकबर बीरबल विनोद
१६ अकबर बीरबल विनोद अधिक बोलने का अभ्यास नहीं है । बीरबल दोनों स्त्रियों को वहीं रोक कर अपने एक सच्चे सेवक के कान में कुछ समझा कर उनके घर भेजा । वह उन स्त्रियों के चालचलन की जाँच कराना चाहता था । नौकर आज्ञा पाते ही उस महाल में गया; जहाँ ये रहती थीं । वह उनके अड़ोस पड़ोस के तमाम लोगों से उनके चाल चलन के संबंध में पूछ-ताछ की । उनकी जबानी मालूम हुआ कि जिस स्त्री पर अभिशाप लगाया गया है वह निहायत भलीमानस है और अभिशाप लगानेवाली स्त्री निहायत दुष्टा और फरेबिन है । नौकर जैसा सुन कर आया था उसका सारा कच्चा चिट्ठा बीरबल से कह सुनाया । सच झूठ की पहचान के लिये बीरबल ने एक तरकीब निकाली । वह पहली भलीमानस स्त्री को बुलाकर पूछा- "यदि तूने सचमुच इस बालक का बध नहीं किया है तो अपना सारा वस्त्र उतार कर एक तरफ अलग खड़ी हो जा ।” वह बोली- "मन्त्रिवर ! मैं चाहे कलकी जगह आजही मार डाली जाऊँ, परन्तु मुझसे यह नहीं होने का । मैं मरने से उतना नहीं डरती जितना निर्लज्जतासे ।” तब बीरबल ने दुश्शीला यानी दुष्टा औरत को बुलाकर पूछा- "यदि तू जानती है कि सचमुच इसने ही तेरे बालक का बध कराया है तो इस सभा के बीच अपना सारा वस्त्र अलग फेंककर एकदम नग्न खड़ी हो जा । वह तुरत वस्त्र उतार कर फेंकने को उद्यत हुई । उसकी ऐसी निर्लज्जता देखकर बीरबल स्वयं शरमिन्दा हुआ और उसे वस्त्र उतारने
अकबर बीरबल विनोद २०
अकबर बीरबल विनोद २० से रोका। उसको निश्चय हो गया कि इसीने बालक का वध किया है। बीरबल ने सिपाहियों को उसे पीटने की आज्ञा दी। उसका दोनों हाथ पाँव बाँध दिया गया और सिपाही मारने को उद्यत हुए। अब तो दुष्टा स्त्री का होश ठिकाने आ गया और उसने तुरत अपना कसूर स्वीकार कर लिया। बादशाह को उस मक्कारा की काली करतूत पर बड़ा रंज हुआ इसलिये उसे कारागार भुगतने की सजा दी और उस विनम्रा स्त्री को पुरस्कार देकर बिदा किया। गुलाम को मारडाल । सन्ध्या का समय था अकबर अपने बाग में दरबारियों के साथ राजकीय विषयों पर विचार कर रहा था, इतने में तानसेन ने अपनी सारंगी मिलानी शुरू की। सबका ध्यान तानसेन के वाद्य की तरफ आकृष्ट हो गया। दरबार का शेष कार्य स्थगित कर दिया गया। तानसेन ने एक मनहरन तान सारंगी पर छेड़ी। चारोतरफ से वाह वाह की ध्वनि आने लगी। बादशाह आनन्दमग्न तकिये के सहारे लेटा हुआ सुन रहा था। चारो तरफ आनन्द छा रहा था। इसी समय शहर का कोतवाल दो आदमियों को लिये हुए आया। उन आदमियों के कपड़े खून से लथपथ हो रहे थे। कोतवाल के अचानक आ पहुँचने से बड़ा रंग में भंग होगया । बादशाह झल्ला गया और झिड़ककर कोतवाल
२१ अकबर बीरबल बिनोद से बोला—"क्या तुमको इतनी भी तमीज न हुई कि यह समय दरबार का नहीं है, ऐसे मनबहलाव के समय बन्दियों का लाना कहाँ तक उचित था। ये कैदी रातभर हवालात में रक्खे जा सकते थे। कल्ह दरबार लगने पर इनके मामले पर विचार किया जा सकता था, फिर इतनी आतुरता दिखलाने का क्या कारण है ?" बादशाह की नाराजगी से कोतवाल सहम गया, परन्तु बिना असलियत बतलाये भी काम नहीं चलते देखा। कुछ सोच समझकर उसने कहा-“गरीबपरवर ! इसमें सन्देह नहीं कि मैं इनको सुबह लेकर हाजिर हो सकता था परन्तु इनका मामला बड़ा बेढंगा है जिस कारण मुझको विवश होकर इसी समय आना पड़ा।" उससे ऐसा सुनकर बादशाह कुछ शान्त होकर बोला-“अच्छी बात है ! इनका अभियोग सुनाओ।” कोतवाल ने कहा-“आज जब मैं नगर में गस्त लगाते हुए व्यापारियों की मंडी में पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि एक जगह बहुतेरे आदमियों की भीड़ लगी हुई है, जब वहाँ गया तो इस अपरिचित मनुष्य को इस नगर व्यापारी से मार पीट करते देखा। यह अपरिचित मनुष्य नगर व्यापारी को झिड़क रहा था कि-“अरे दुष्ट ! आज से पाँच सात वर्ष पहले तू मेरा दास था और वहाँ से छिप कर भाग आया है। बड़े परिश्रम के बाद आज तुझे पकड़ लिया है, अब मेरे रुपये अदा कर । इसको झिड़कते देख नगर व्यापारी बोला-“नालायक ! दास तो मेरा तू है तुझे मैं आज कितने ही वर्षों से ढूँढ़ रहा था, भाग्यवश इससमय हाथ
हमारा नौकर इससे दो वर्ष पहले ही मुझको छोड़कर भाग
अकबर बीरबल बिनोद २२ लगा है। इन की आपस की ऐसी लड़ाई देखकर मैं इन्हें गिरफ्तार कर सरकार में लाया हूँ, अब आपकी जैसी मरजी हो इनका निपटारा कीजिये।" बादशाह ने उनसे साक्षी माँगी। नगर सौदागर ने कहा- "गरीबपरवर ! आज पाँच वर्ष का अर्सा हुआ कि मैं अपना शहर ईरान छोड़कर दिल्ली आ बसा हूँ और यह हमारा नौकर इससे दो वर्ष पहले ही मुझको छोड़कर भाग गया था। आज जब मैं बाजार में खरीद फरोख्त कर रहा था तो यह भी अचानक वहीं आपहुँचा और मेरा हाथ पकड़ कर बोला- "तू मेरा गुलाम है, तू मेरा गुलाम है।" मेरे व्यापारी होने का सारा शहर साक्षी है।" जब पहला व्यापारी अपना बयान दे चुका तो दूसरा विदेशी व्यापारी बोला- "पृथ्वीनाथ ! यह झूठ बोलता है। क्योंकि ईरान का व्यापारी मैं हूँ। इस शहर में मैं बिल्कुल नया नया आया हूँ; इस कारण यहाँ का एक भी नागरिक मुझे नहीं पहचानता। यह जो इस नगर में शेरअली के नाम से विख्यात हो रहा है सो इसका फर्जी नाम है। यह "नसीबा" नामी मेरा गुलाम है। सात वर्ष का जमाना गुजरा जब मैं इसे दूकान पर छोड़ बाहर व्यापार के लिये गया था। मौका देख यह मेरी बहुत बड़ी रकम चुराकर भाग आया है। तभी से मैं इसकी खोज में दरदर ढूँढ़ता फिरता हूँ। आज सात वर्षों के बाद यहाँ मिला है।" इनका अभियोग दरबार के सभी लोग बड़े गौर से सुने रहे थे, मामला भी बड़ा पेचीदा जान पड़ता था, दोनों ही सौदागर के लिबास में थे और दोनों की मुखाकृति
२३ अकबर बीरबल बिनोद
भी अमीरों की सी थी । जब यह मामला चल रहा था इसी बीच एक सरदार साहब भी आ पहुँचे और नगर व्यापारी शेरअली को कैदी की सूरत में देखकर बोले- "शेरअली ! यह तुम्हारी क्या हालत है, तुम कैदी की सूरत में क्यों दिखाई पड़ रहे हो ?" शेरअली को इस सरदार के आनेसे बड़ी तसल्ली हुई और बोला- "सरदार साहब ! आप भी जानते हैं कि मैं कितने वर्षों से इस नगर में व्यापार कर रहा हूँ और यहाँ का बच्चा बच्चा मुझे पहचानता है। समय के फेर से वा दैव की अकृपा से आज मैं अपने ही दास द्वारा अभिशापित किया जा रहा हूँ । सरदार बादशाह को चिताकर बोला- "गरीबपरवर ! यह शेरअली आजकल का व्यापारी नहीं है बल्कि लड़ाई के समय में इसने कई बार सरकार को रुपये की मदद देकर राजभक्ति प्रकट की है। (शेरअली की तरफ इशारा करके ) "शेरअली ! यह तुम्हारी ही उदारता का कारण था कि मैंने गुजरात ऐसे सामर्थ्यशाली अधिपति पर विजय प्राप्त की थी तुम्हारी वह मदद हमारी नहीं बल्कि बादशाह की मदद थी।" सरकार की तरफसे तुमको अभी तक उसका कोई पुरस्कार नहीं मिला है ? सरदार की इस सारगर्भित शाक्षी से बादशाह खुश हो गया और बोला शेरअली को उस उपकार का बदला चुकाया जायगा । बादशाह ने ईरान के सौदागर की तरफ इशारा करके कहा- "क्यों भाई ! तुमको भी किसीकी साक्षी दिलानी है, यदि
अकबर बीरबल बिनोद २४ है तो उसे सामने लावो, सरदार की साक्षी से तो नगर व्या- पारी का शेरअली होना साबित होता है। ईरान का व्या- पारी बोला-"गरीबपरवर ! मैं इस स्थान में पहले पहल आया हूँ, यहाँ की भाषा तक नहीं समझता और न यहाँ पर मेरा कोई परिचित ही है। अभी मेरा सामान भी बाहर ही पड़ा हुआ है, उसको यहाँ लाने में अभी कई दिन व्यतीत हो जायेंगे, फिर मैं किसकी साक्षी दूँ। हाँ इतना जरूर है कि मैं दूर देशों से सुनता आ रहा हूँ कि आपके दर्बार में बड़ा सच्चा न्याय होता है इसलिये कृपया हमारा उचित न्याय करा दीजिये । दोनों फरीकैनों की बातें सुनकर एक सभासद् ने बाद- शाह से अर्ज किया-"पृथ्वीनाथ ! यह मामला बड़ा ही बेढंगा दीख पड़ता है। इसका फैसला कवि गंग से कराया जाय। वे ऐसे२ मामलातों को महज खिलवाड़ मात्र समझा करते हैं। विचारा कवि गंग बड़ा घबराया और झट बोल उठा- "हजूर । बीरबल के रहते इसका न्याय करने की दूसरे की आवश्यकता नहीं है अतएव इसका न्याय बीरबल से ही कराया जाय। वे इससे कभी इनकार नहीं कर सकते। बादशाह तो पहले ही से समझ रहा था, उसने बीरबल को आज्ञा दी-"इस मामले को अच्छी तरह जांचकर न्याय करो।" बीरबल ने भी सहर्ष स्वीकार किया । बीरबल की कार्रवाई शुरू हुई। वह दोनों व्यापारियों को पास बुलाकर उनसे बहुत प्रकार की पूछ-ताछ की परन्तु फिर भी कुछ मतलब की बात हासिल न हुई।
२५ अकबर बीरबल विनोद
२५ अकबर बीरबल विनोद
तब उसने एक नई सूझ निकाली। बीरबल उन दोनों सौदा- गरों को एक जगह खड़ा कराकर एक जल्लाद को नंगी तलवार लिये हुए बुलवाया। जब वह आकर हाजिर हुआ तो बीरबल उससे बोला-“क्या देखता है “गुलाम को अभी मार डाल।” बीरबल के मुख से इतना शब्द निकलते ही जल्लाद तलवार लेकर झपटा। उसका झपटना था कि नगर व्यापारी यानी नकली शेरअली अलग हट गया। बीरबल उसकी ऐसी हरकत देखकर तुरत ताड़ गया कि असल में यही गुलाम है। उसने उसकी कलाई पकड़ ली। नकली शेरअली ने भी अपना गुलाम होना स्वीकार कर लिया और वह तुरन्त कैद कर लिया गया। अनन्तर दरबारियों के पूछने पर उसने कहा-“असल में मैं ही अपने इस ईरानी मालिक असली शेरअली का गुलाम था। मेरी आदत धीरे धीरे बिगड़ने लगी, मैं हमेशा इसे हटाने की ताक में था जब मेरा मालिक मुझे दूकान पर अकेला छोड़कर बाहर चला गया तो मेरी नीयत बिगड़ी और उसका बहुत सा माल लेकर वहाँ से भाग निकला। घूमते फिरते यहाँ पहुँचा और उस चोरी के रुपयों से व्यापार करने लगा। चूंकि इस काम को मैंने अपने मालिक के यहाँ ही सीख लिया था इस कारण व्यापार चलाने में मुझे कोई दिक्कत न पड़ी और मेरा काम धड़ल्ले से चलने लगा। अब मैं असली शेरअली के नाम से विख्यात हो गया हूँ। इतने दिनोंके परिश्रम से जो मैंने भारत- वर्ष में अपना नाम प्रख्यात किया था सो आज दैव के प्रकोप से मिट्टी में मिल गया। अब मुझसे गुलामी करते नहीं
बनेगी अतएव कृपाकर मुझे प्राण दण्ड की आज्ञा दीजिये । बादशाह ने शेरअली से पूछा-शेरअली-"अब तुम इस आदमी को क्या करना चाहते हो।" शेरअली बोला- "गरीबपरवर ! अब मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है मेरी बात रह गई अब आपके जी में जो आवे सो कीजिये। शेर- अली के ऐसे सन्तोषप्रद वाक्यों से बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई परन्तु उसने अपना राज किसी पर जाहिर न किया। विचारा अपराधी नसीबा जीवन की आशात्यागकर एक तरफ खड़ा था। बादशाह उसकी तरफ लक्ष्य कर बोला- "नसीबा ! तुम्हारा अपराध प्राण-दण्ड पाने के योग्य है परन्तु तूने मेरे साथ उपकार किया है और मैंने अभी तक तुझे उसका कुछ बदला नहीं चुकाया है अतएव तुझे जीवन- दान देता हूँ और पुरस्कार में तुझे दर्बार का एक काम सौंपता हूँ, अब तुम उसी काम के सहारे से अपना जीवन निर्वाह करो। नसीबा खुशी के मारे फूला न समाया और बड़ी प्रसन्नता से उस पद को स्वीकार किया। बादशाह ने मन में विचार किया कि इस न्याय में बीरबल ने कमाल किया है इसकारण उसको भी उचित पुरस्कार देना परमोचित है। बादशाह ने तीन पोशाक मँगवाई। उसमें पहली कुछ आभूषणों के साथ असली शेरअली को और दूसरी बीरबल को तथा तीसरी नसीबा नामी गुलाम को देकर बिदा किया। नसीबा शेरअली के चरणों पर गिरकर अपने अप-
२७ अकबर बीरबल विनोद
२७ अकबर बीरबल विनोद
राध की माफी माँगी और उसको आदरपूर्वक अपने मकान पर ले गया। उसने अपना सारा धन शेरअली के हवाले कर दिया। शेरअली बहुत बड़ा व्यापारी था उसका सारा कारोबार ईमान पर चलता था। उसने विचार किया-“व्यापार से मेरे धन के अतिरिक्त जो कुछ नसीबा ने अधिक उपार्जन किया है वह उसके परिश्रम का है। उसने अपना असली धन लेकर शेष बचा धन नसीबा के हवाले किया और खुशी खुशी अपने ईरान शहर को लौट गया।
मोती की खेती।
एक दिन की घटना है कि बादशाह और बेगम दोनों भोजनोपरान्त बाग में झूला झूलते हुए सानन्द गपशप लड़ा रहे थे अचानक बेगम की उर्ध्ववायु खुली, जिससे बादशाह बहुत चिढ़ गया और बेगम को तुरत महल से बाहर निकल जाने की आज्ञा दी। बेगम शहर से बाहर एक बाग में कैदी की सूरत में नजरबन्द कर दी गई। बाद- शाह को वही धुन सवार थी। दूसरे दिन जब सबेरे दरबार लगा तो बादशाह ने सभासदों से पूछा-"क्या कभी तुमलोगों को भी अधोवायु निकलती है ? अधोवायु निकलने के कारण बेगम का दण्डित होना सबपर विदित था इस कारण एक स्वर से सभों ने इन्कार कर दिया, और उस दिन का दुर्वार समाप्त हुआ। जिस दिन की यह बात थी उस दिन बीरबल किसी
अकबर बीरबल बिनोद २८ सरकारी काम से बाहर गया था। इसलिये जब कई दिन पश्चात वह लौटा तो बादशाह ने वही प्रश्न बीरबल से भी किया। भला बीरबल कब चूकने वाला था, वह झट बोला-"पृथ्वीनाथ ! जिस तरह से अन्य लोगों को अधोवायु होती है उसी तरह मुझे भी होती है।" बीरबल के इस उत्तर से बादशाह बहुत नाराज हुआ और उससे बोला-"वाह खूब अच्छे रहे ! इस सभा में ऐसा एक भी आदमी नहीं है जिसे अधोवायु सरती हो, फिर तुम्हें कैसे सरने लगी ? जब यही बात है तो तुम दरबार से बाहर चले जावो और जब तक मैं तुम्हें आने की आज्ञा न दूँ कदापि न आना। बीरबल हाजिर जवाब था उसे उत्तर प्रत्युत्तर करने में हिचकिचाहट नहीं होती थी। परन्तु मौका देखकर काम करना बुद्धिमानो का काम है। बादशाह को अपने ऊपर बहुत नाराज देख वहाँ से वह तत्काल बाहर चला गया। बेगम को नजरबन्द हुए जब बहुत दिन हो गए तो एक दिन वह अपने नजरबन्दी के कष्टों से ऊब कर बीरबल को बुलवाया और उससे आजिजी कर बोली-"बीरबल ! आपकी मदद के बिना मेरा उद्धार नहीं हो सकता कोई तरकीब निकाल कर मुझे इस निविड़ कैद से मुक्त करो। मेरा जीवन असंभव हो रहा है। बीरबल ने कहा-"दूसरे की वकालत वही कर सकता है जो निर्दोष हो मैं तो खुद ही तुम्हारे दोष में शामिल हूँ तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ ? बेगम बीरबल को भलीभाँति जानतीथी अतएव उसकी बात
२६ Akbar Birbal Binod अकबर बीरबल बिनोद
बीच में ही काट कर बोली-"बीरबल ! तुमको मैं भलीभाँति जानती हूँ, मेरा दृढ़ विश्वास है कि चाहे बादशाह तुम से भले ही नाखुश हों, परन्तु उनको मना लेना तुम्हारे बायें हाथ का खेल है ! बेगम की इस युक्तिसंगत बात को सुनकर बीरबल खुश होकर उसके कार्यसाधन के निमित्त दश हजार रुपये की माँग पेश की । उसे तत्क्षण दशहजार की थैली समर्पण की गई । बीरबल घर पहुँचकर एक सुनार को बुलवाया वह अपने काम का बड़ा पक्का था । वीरबल उसको रुपये की एक थैली देकर बोला-"सेठजी मुझे मोती मंडित सुवर्ण का एक जव की बाली दर्कार है, इसलिये आप उत्तम २ मोतियों को बाजार से संग्रह कर उन्हें सोने में इस प्रकार जड़ो कि देखने में हूबहू जव की बाली ही जान पड़े ।” सुनार कुछ कालोपरान्त एक उत्कृष्ट बाली बना लाया । बीरबल उसे देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे कुछ द्रव्य इनाम में देकर बिदा किया। आप उस बाली को लेकर बादशाह के महल की तरफ चला । दर्बार में पहुँचते।पहुँचते आधा दिन ढल गया । पहरेदारों से अपने आने का सन्देशा बादशाह के पास यह भेजा कि-“पृथ्वीनाथ ! मैं एक बड़े आवश्यक कार्यवश आपसे मिलने आया हूँ यदि आज्ञा हो तो अन्दर आऊँ ।” बादशाह ने आज्ञा देकर बीरबल को दर्बार में बुलवा लिया । बीरवल बादशाह के पास पहुँचकर नियम अनुसार सलाम कर बगल में बैठ गया और मोती उसके हाथ में देकर बोला-
अकबर बीरबल बिनोद ३० "गरीबपरवर ! यह मोती का बीज एक बाहरी व्यापारी लेकर आया,था जिससे मैंने बड़ी कठिनता से प्राप्त किया है। इसमें एक खास खसूसियत यह है कि यदि कोई पाक साफ आदमी इसको अच्छी जमीन में बोयेगा तो इसी के समान और बहुत सी मोतियाँ पैदा होंगी । मैंने देखा कि यह काम सिवा आपके दूसरा कोई न कर सकेगा अतएव आपकी सेवा में लेकर उपस्थित हुआ हूँ। कृपया इसको किसी अच्छी जमीन पर बो दीजिये, आपको आगे चलकर इससे बड़ा लाभ होगा। बादशाह उसकी बात मानकर तुरत आज्ञा दिया-"बीरबल ! इसके योग्य जमीन ढूँढ़कर सूचना दो। परवाने में यह भी लिखा था कि जिस जमीन को बीरबल इस कार्य्य के लिये पसन्द करेगा वह चाहे बड़ी आलीशान मकानों से ही क्यों न सुशोभित की गई हो, तुरत साफ करा दी जायगी । बीरबल की खूब बन आई उसने अपने पुराने बैरियों के मकानात को आर्डर देकर तोड़वा दिया। कितने लोगों ने तो बीरबल के आतंक से बचने के लिये बड़ी बड़ी रकमों की घूसें दीं। पहले वह नाक भौं सिकोड़ कर लोगों को टरकाता, परन्तु जब न मानते और बहुत मिन्नत करते तो किसी से कम और किसी से बेस लेकर उनका मकान छोड़ देता । जब बीरबल का खासी रकम मिल गई तो बड़े बड़े महलों को गिरवाना बन्द कर दिया बाद को गरीबों की झोपड़ियों का चौगुनी कीमत देकर कुछ झोपड़ियाँ गिरवा कर एक खासी चौरस जमीन बना ली