आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
संयोगिनिस्वयंम्बर । २६ दुखी जो बाम्हन हाँपर होइहैं तौ सब क्षत्री धर्म नशाय ॥ सुनिकै बातें पृथुइराज की भा मन खुशी चँदेलाराय ४६ डोला मँगायो संयोगिनि को सो रण खेतन दीन धराय ॥ देखिकै डोला संयोगिनि को बोला तुरत पिथौराराय ५० लड़ो सिपाही दिल्लीवाले डोला तुरत लेउ उठवाय ॥ जीतिकै चलिहौ जोकनउजते चौगुन तलब देब घरजाय ५१ दै दै पानी रजपूतन को पिरथी सब को दीन जुझाय ॥ फिरि मुकुन्द औ रतीभानको मुर्चा परो बरोबरि आय ५२ दोऊ बराबरि के क्षत्री हैं दोऊ समरधनी बलवान ॥ खैंचि सिरोही ली मुकुन्द ने करिकै रामचन्द्र को ध्यान ५३ हनिकै मारा रतीभान को ठाकुर लीन्ह्यों वार बचाय ॥ औ ललकारा फिरि मुकुन्दको अब तुम खबरदार द्वैजाय ५४ वार हमारी सों बचिहौना तुमका लावा काल बुलाय ॥ यह कहि मारा तलवारी को सो फिरि परी ढालपरजाय ५५ बचिगा ठाकुर दिल्ली वाला ज्यहिका राखिलीन भगवान॥ सो फिरि बोला रतीभान सों करिकै मनै बड़ा अभिमान ५६ किह्यो लड़ाई है लरिकन सों कबहूँन परा जवानते काम ॥ सँभरिकै बैठो अब घोड़ा पर तुमको पठैदेउँ यमधाम ५७ खैंचिकै मारा रतीभान को सोऊ लीन ढाल की वार ॥ मुठिया रहिगै कर मुकुन्द के रणमा टूटि गिरी तलवार ५८ गद्दी कटिगै मखमल वाली औ फटिगई गैंड़की ढाल ॥ रिसहा ह्वैगा रतीभान तहँ दोऊ नैन भये तब लाल ५६ ऐंचि सिरोही को कम्मर सों मारा रतीभान बलवान ॥ गिरा तड़ाका शिर धरती माँ मरिगा तुरत मुकुन्दाज्वान ६०
३० आल्हखण्ड । मरा मुकुन्दा रण खेतनमें सुद्धत ठाकुर चला रिसाय ॥ तब ललकारा त्यहि हिरसिंहने ठाकुर खबरदार है जाय ६१ जयो नगीचे ना डोलाके नहिं शिर धरती देउँ गिराय ॥ सुनिकै बातें ये हिरसिंह की सुद्धत भाला लीन उठाय ६२ ताकिकै मारा सो हिरसिंह के ठाकुर लैगा वार बचाय ॥ खाली वार परी सुद्धत की तबमनगयो सनाकाखाय ६३ ऐंचि सिरोही फिरि कम्मर सों मारा हरीसिंह को जाय ॥ बचिगा ठाकुर फिरि दिल्लीका औमनकोपकीन अधिकाय ६४ खैंचिकै मारा तलवारी को सुद्धत गिरा धरणि भहराय ॥ मरिगा ठाकुर जब कनउज का आयो हम्माँ जमाँ तब धाय ६५ हम्माँ जमाँ के तब मुर्चा में गोविंद नृपति पहुँचा आय ॥ औ ललकारा फिर शूरन को तुरतै डोला लेउ उठाय ६६ डोला उठायो रण शूरन ने औ दिल्ली को चले दबाय ॥ हम्माँ जमाँ तब निज शूरन ते बोले दोऊ भुजा उठाय ६७ जान न पावैं दिल्ली वाले मारो इनका खेत खेलाय ॥ सुनिकै बातें हम्माँ जमाँ की क्रोधित चले सिपाहीधाय ६८ चलीं जुनब्बी औ गुजराती ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ भाला बरछिन की मारुइ भई कोताखानी चलै कटार ६९ कटि कटि क्षत्री गिरे खेत माँ हाथिन लागे ऊंच पहार ॥ पैदल पैदल सों मारुइ भई औ असवार साथ असवार ७० विकट लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो देवता कांपि उठे असमान ॥ शूर सिपाही ईजति वाले तिनतजिदीन सांसराप्रान ७१ मान न रहिगे कोउ क्षत्री के सब के टूटि गये अभिमान ॥ पृथुइराज औ जयचंद राजा दोऊ दीन लड़ाई ठान ७२
संयोगिनिस्वयम्बर। ३१ हमॉँ जमाँ औ गोबिंद राजा दोऊ समरधनी बलवान ॥ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं दोऊ एक बैस के ज्वान ७३ गदा बनेठी केर खिलारी करि पैंतड़ा लड़ैं मैदान ॥ बारु बराबरि प्राणन जानैं एकते एक बढ़े अभिमान ७४ हमॉँ जमाँ जब भाला मारैं गोबिंद राजा लेयँ बचाय ॥ मारैं गोबिंद तलवारी सों सोऊ लेयँ ढाल पर आय ७५ बड़ी लड़ाई भै गोबिंद कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ जो हम गावैं विस्तारित करि तौफिरिएकसाललगिजाय७६ खैंचि सिरोही हमॉँ जमाँ ने मार्यो बीच गला को ताकि ॥ तबहीं शिर धरती माँ गिरिगा बोल्यो मारुमारु मुह हांकि७७ बिन शिर धड़ रणमाँ तब दौरा हाथ में लिये ढाल तलवार ॥ ज्यहि दिशिजावै रणमंडलमें त्यहिदिशिजूंझैंशूरअपार ७८ ब्याकुल क्षत्री चौगिर्दा ते बिन शिर लड़ै वीरबलवान ॥ शंका ब्यापी रण शूरन के कायर भागे छांड़ि परान ७६ नील कि झंडी ताहि छुवायो छुवतैं गिरा तुरत भहराय ॥ तौलौं डोला संयोगिनि का लैगे ग्यरा कोस पर जाय ८० तब महराजा कनउज वाला बोला सब सों बचन रिसाय ॥ नालति ऐसी रजपूती का औधिरकाल जिंदगी भाय ८१ डोला जाई जो दिल्लीमाँ तौ यश जाई सबै नशाय ॥ मानुष देही फिरि मिलिहै ना तातेखालौ लोह अघाय ८२ बीर बखानों दुर्योधन को ज्यहियशआपनलीनबचाय ॥ जो कछु भाखासो सब राखा औतजिदीन पुत्रधन भाय ८३ धन्य बखानों त्यहि रावण को ज्यहि हरिलीन रामकी नारि ॥ सम्मुख जूझी त्यहि रथ्यतिसब करिकै रामचन्द सों रारि ८४
३२ आल्हखण्ड । समय समइया की बातें हैं समया परै न बारम्बार ॥ समया परिगा राजा नलपर खूंटी हरा नौलखाहार ८५ रोज न मुर्चा कनउज ह्वैहै रोज न चढ़ी पिथौरा ज्वान ॥ मारो मारो ओ - रजपूतो सुनिकै बात हमारी कान ८६ इतनी सुनिकै सब क्षत्रिन ने अपनो मरण कीनअख्तयार ॥ भाला बरछी दोउ दल छूटे औफिरिचलनलागितलवार८७ धरिधरि धमकैंकड़ाबीन कोउ कोऊ मारैं खेंचि कटार ॥ बड़ी लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो नदिया बही रकतकीधार ८८ जैसे फागुन फगुई खेलैं तैसे लड़ैं वीर चौहान ॥ मुहँ नहिं फेरैं समरभूमि ते एकते एक वीर बलवान ८६ तबलौं डोला संयोगिनि को पहुँचा तीस कोसपर जाय ॥ रिसहा राजा कनउज वाला बहुतक क्षत्री डरा नशाय ९० तबलौं डोला संयोगिनि को आइयो रतीभान तहँ जाय ॥ बहुतक क्षत्री घायल कैकै सो पृथीमाँ दीन खवाय ६१ कोगति वरणैं रतीभानकै हमरे बूत कही ना जाय ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै रणमाँ घोड़ा रहानचाय ६२ रतीभान के तब मुर्चा में कोउ राजपूत न रोंकै पायँ ॥ सम्मुख आवै जो लड़ने को ताको मारै खेत खेलाय ६३ देखि लड़ाई रतीभान की हिरसिंह ठाकुर उठा रिसाय ॥ औ ललकारा रतीभान को ठाकुर खबरदार ह्वैजाय ६४ तबलौं डोला संयोगिनि को दिल्ली शहर पहुँचा जाय ॥ पाछे मारै औ ललकारै यहु महराज कनौजीराय ६५ तीर अनेकन पिरथी मारे लाखन डारे शूर नशाय ॥ बड़ा लड़ैया यहुतीरन में ज्यहिका कही पिथौराराय ६६
संयोगिनिस्वयंम्बर । ३३ दिल्ली केरे तब फाटक पर भारी भीर भई तहँ आय॥ रतीभान औ कान्ह कुवँर तहँ दोऊ रहिगे पैर जमाय ६७ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं मानैं कोऊ नहीं तहँ हारि॥ वसरिन वसरिन याविधि खेलैं जैसे कुवाँ भरै पनिहारि ६८ बैस बराबरि है दोऊ कै दोऊ बड़े लड़ैया ज्वान॥ पृथुइराज औ जयचँदराजा येऊ करैं घोर घमसान ६६ शयलंगरी हिरासिंह ठाकुर येऊ खूब करैं तलवारि॥ अपने अपने सब मुर्चन में मानैं कऊ न नेको हारि १०० मारो मारो भुजा उखारो सब दिशि यहै रहे चिल्लाय॥ भरि भरि खप्पर नचैं योगिनी मज्जनकरैं भूत तहँ आय १०१ स्यार औ कुत्तनकी बनिआई कागन लागी कारि बजार॥ चील्ह गीध ये सउदा लै कै अपने घरका भये तयार १०२ रतीभान औ कान्ह कुवँर तहँ दोऊ बीर करैं मैदान॥ हनि हनि भाला दोऊ मारैं नहिं भयकरैं नेकहू ज्वान १०३ लाखन जूझे दिल्ली वाले लाखन कनउज के सरदार॥ रतीभानने त्यहि समया माँ हाथमलीन नांगि तलवार १०४ सवैया॥ जूझिगये बहु शूर अपार बही तहँ शोणित की अतिधारा। गावत चामुँड नाचत योगिनि प्रेत बजावत हैं करतारा॥ जोर बह्यो रतिभानकी खड्ग सो घोर मच्यो तहँ पै हहकारा। जात चढ़े शव ऊपर गृद्ध मनौं ललिते जल खेलैं निवारा १०५ को गति वरणै त्यहि समया कै हमरे बून कही ना जाय॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै यहु महराज कनौजीराय १०६
३४ आल्हखण्ड । कान्ह कुँवरहू अतिकोपित भा यहु रजपूत वीर चौहान ॥ लीन्हे भाला नागदवनि का क्षत्रिनमारिकीन खरिहान १०७ औ ललकारा रतीभान का ठाकुर खबरदार ह्वैजाय ॥ यह कहि मारा तलवारी का सोपै लैगा वार बचाय १०८ आपौ मारा तलवारी को परिगै कान्ह कुँवर शिरजाय ॥ ककरी ऐसी खपरी फाटी पै शिखांधि तहांरहिजाय १०९ खैंचि सिरोही को कम्मर सों मारा रतीभान को धाय ॥ रतीभान फाटक पर गिरिगे गिरिगो कान्हकुँवरभहराय ११० दोऊ जूझे जब फाटक में डोला अटा महल में जाय ॥ उतरिकै डोला सों संयोगिनि बैठी रङ्ग महल में आय १११ चंद कवीश्वर फिरि जल्दी सों पहुँचा जहां चँदेलाराय ॥ औ फिरि बोला हाथ जोरिकै ओ महराज कनौजीराय ११२ लाखन जूझे दिल्ली वाले लाखन कनउज के सरदार ॥ बड़ी लड़ाई दउदल कीन्ह्यो ज्यहिका रहा न वारा पार ११३ बचा पिथौरा अब इकलो है ज्यहिका राखिलीन भगवान ॥ त्यहि नहिं मारो महाराजा तुम मानों सत्य बचन परमान ११४ लौटि कनौजै जो चलि जइहौ कीरति बनी रही संसार ॥ हारि तुम्हारी कोउ गाईना राजा कनउज के सरदार ११५ कनउज तेनी औ दिल्ली लौं कीन्ह्यो घोर शोर घमसान ॥ अस कोउ क्षत्री मैं देखों ना जोफिरिकैरैसमरअभिमान ११६ चंद कवीश्वर की बातें सुनि बोला कनउज का महराज ॥ कहा तुम्हारो हम टारब ना मानोसत्यबचनकबिराज ११७ - बड़ो भरोसो तुम हमरो करि आयो मिलन हमारे पास ॥ कहा तुम्हारो जो मानैंना तौफिरिजावोआपनिराश ११८
संयोगिनिस्वयम्बर । ३५ करन निराशा नहिं चाहत हैं मानो सत्य बचन कबिराज ॥ तुमहूं जावो निज मन्दिर को हमहूं जात आपनी राज ११६ यह सुनि गमने चन्द कवीश्वर जयचँद कूच दीन करवाय ॥ राति दिनौनन के धावा करि पहुँचेकनउजमेंफिरिआय १२० पृथुइराज निज महलन पहुँचे पद्मिनि मिली तहांपर आय ॥ करि गन्धर्व ब्याह ताके सँग औसुखकरनलागिअधिकाय १२१ पूर स्वयम्बर संयोगिनि का गायों सत्य सत्य सब हाल ॥ माथ नवावों शिवशङ्करका अम्बुजसरिसनयनत्रयलाल १२२ किहे कोपिनी हैं सर्पन की धारे जटाजूट हैं शीश ॥ सकल जगत के सो स्वामी हैं किरपाकरें ललितपर ईश १२३ माथ नवावों पितु अपने को जिन म्वहिं विद्या दीन पढ़ाय ॥ आशिर्वाद देंव मुंशीसुत जीवहु प्रागनारायणभाय १२४ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२५ इति श्रीलखनऊनिवार्सि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्त- र्गत पँडरीकलांनिवासि मिश्रबंशोद्भवबुध कृपाशङ्कर सूनु पण्डितललिताप्रसादकृत पृथुइराजजयचन्द युद्धवर्णनो नाम तृतीयस्तरङ्गः ॥ ३ ॥ संयोगिनिस्वयंम्वरसम्पूर्ण ॥ इति ॥
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अथ आल्हखण्ड ॥ महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ॥ स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ॥ दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ सुमिरन ॥ कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ जासों करूँ आल्ह को गान १ नहीं आसरा निजभुजबलको है यहु आल्हा सिंधु अपार ॥ डगमग डगमग नैया होवै माता तुही लगावै पार २ रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ जबलग रहे परीक्षित यार ३ अब बृद्धाई अति छाई है गाई जाय नहीं सो यार ॥
२ आल्हखण्ड । ३८ कलियुग बाबा की रजधानी माता तुही लगावै पार ४ जप तप भाग्यो मेरि देही ते अब मैं भयौं बहुत सुकुमार ॥ ताते नैया डगमग होवै बेड़ा कौन लगावै पार ५ तुही खेवैया शारद मैया माता खेय लगावै पार ॥ नाहिं तो बूडौं मँझधारा में माता होवै हँसी तुम्हार ६ छूटि सुमिरनी गै शारद कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ करिया आई अब मोहवे का जो जम्बैका राजकुमार ७ अथ कथाप्रसङ्ग ॥ एक समइया की बातें हैं यारो सुनिल्यो कांन लगाय ॥ परब दशहरा की बुड़की रहै गंगा न्हान सबै कोउ जाय १ बड़ा महातम श्रीगंगा को गायो वालमीकि महराज ॥ ब्यास बनायो महभारत जो तामें कह्यो जगत के काज २ सो सब जानै माड़ोवाला यहु जम्बै का राजकुमार ॥ हाथ जोरिकै फिरि बोलतभा दद्दुवा सुनिल्यो वचन हमार ३ भारी मेला श्री गंगा को दद्दुवा जाजमऊ के घाट ॥ पुरके बाहर हम देखा है जावैं राव रङ्क सब बाट ४ हुकुम जो पावैं हम दद्दुवा को तो गंगा को अवैं अन्ह्याय ॥ पाप नशावैं सब देही के गंगा चरण शरण में जाय ५ सुनिकै बातें ये करिया की जम्बै गोद लीन बैठाय ॥ चूम्यो चाट्यो गले लगायो बोल्यो बचन तुरत मुसुकाय ६ बारह वरसनका अरसा भो पैसा दीन न कनउज केर ॥ नायब मन्त्री चन्देले के तुमको लेयँ वहाँ जो हेर ७ बाँधिकै मुशकें म्वरे बचुवा त्वहिं तुरतै जेहल देयँ पहुँचाय ॥ पैसा देवौ तो बचिजावौ नाहिं तो जाय प्राणपर आय ८
महोबेकाप्रथमयुद्ध । ३६ ३ त्यहिते तुम का समुझावत हौं बचुवा मानो कहा हमार ॥ राह कनौजी कै तहँते है ठाकुर समरधनी तलवार ६ हाथ जोरिकै करिया बोल्यो दोऊ चरणन शीश नवाय ॥ मने न करिये म्वहिं गंगा को दहुवा बार बार बलिजायँ १० पार लगे हैं श्री गंगाजी मेरो बार न बांको जाय ॥ पकरो जइहौं जो मेला में पैसा माफ लेउँ करवाय ११ हुकुम जो पावौं मैं दहुवा को तौ फिरि गंगाअवौं अन्ह्याय ॥ बिनती सुनिकै बहु करिया की जम्बै हुकुम दीन फरमाय १२ हुकुम पायकै सो जम्बै को अपने कह्यो सिपाहिन बात ॥ करो तयारी जाजमऊ की गंगा न्हान हेतु हम जात १३ हुकुम पायकै सो करिया का तुरतै होन लागि तय्यार ॥ झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथ म लीन ढाल तलवार १४ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी लीन्हेनि कड़ाबीन सबज्वान ॥ बजे नगारा त्यहि सम या माँ भारी होन लाग घमसान १५ करिया चलिभा त्यहि समया माँ माता भवन पहूँचा जाय ॥ हाथ जोरिकै करिया बोल्यो माता चरणन शीशनवाय १६ मोहिं आज्ञा है दंदुवा की गंगा न्हान हेतु हम जायँ ॥ आज्ञा पाऊँ जो माता की तौसब काज सिद्धह्वैजायँ १७ बातैं सुनिकै ये करिया की मातैं हुकुम दीन फरमाय ॥ चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो आशिर्वाद दीन हर्षाय १८ बहिनि बिजैंसिनि तब बोलत भै भैया बार बार बलिजाउँ ॥ मोहिं निशानी कछु लैआयो जासों यादिकरुं तव नाउँ १६ इतनी सुनिकै करिया बोला बहिनी मानो कहा हमार ॥ लवों निशानी मैं मेलाते बहिनी कहा न टारौं त्वार २०
४ आल्हखण्ड । ४० इतनी कहिकै करिया चलिभो फौजन फेरि पहुँचा आय ॥ तुरत नगड़ची को ललकार्यो मारू डंका देय बजाय २१ बजा नगाड़ा तब माड़ो में क्षत्रिन धरा रकावन पायँ ॥ आपो चढ़िकै फिरि घोड़ापर मनमें रामचन्द्र को ध्याय २२ कूच कराय दयो माड़ो सों पहुँचे जाजमऊ में जाय ॥ तम्बू गड़िगे तहँ करिया के चकरन विस्तर दीन बिछाय २३ उतरयो करिया तब तम्बू में मनमें सुमिरि शारदा माय ॥ लैकै धोती रेशमवाली गंगा निकट पहुँचा जाय २४ न्हवन करिकै श्री गंगा में आसन तहाँ लीन बिछवाय ॥ संध्या वन्दन करि प्रातः की विप्रन तुरत लीन बुलवाय २५ दान दक्षिणा दै विप्रन को तम्बू फेरि पहुँचा आय ॥ पहिरिकै कपड़ा अलबेला सो मेला फेरि पहुँचा जाय २६ जाय दुकानन माँ देखतभा कतहुँ न मिला नौलख्यहिहार ॥ तबलों माहिल उरई वाला तासों हैगै राम जुहार २७ माहिल बोल्यो तब करियाते ओ जम्बै के राजकुमार ॥ काह खरीदन को आयो है जो तुम घूमो सकल बजार २८ सुनिकै बातें ये माहिल की करिया बोला वचन उदार ॥ हार लखौटा नीको ढूंढें सो नहिं पावा कतौं बजार २९ बहिनि बिजैसिनि म्वरिमांगहैं ताते खोज करौं अधिकाय ॥ तुम्हरो जानों जो कतहूँ हो मोको वेगि देव बतलाय ३० सुनिकै बातें ये करिया की माहिल कहा वचन मुसुकाय ॥ हार नौलखा है मोहबे माँ तुरतै चला तहाँको जाय ३१ बहिनि हमारी मल्हना जानों औ बहनोई रजा परिमाल ॥ कऊ लड़ैया तिन घर नाहीं मानों सत्य सत्य सब हाल ३२
महोबेका प्रथमयुद्ध । ४१ ५ सुनिकै बातें ये माहिल की करिया चरण शीश नवाय ॥ बिदा माँगिकै फिरि माहिलसों तम्बू तुरत पहुंचा आय ३३ हुकुम लगायो सब क्षत्रिनको हाँते कूच देव करवाय ॥ करो तयारी अब मोहबे की सीताराम चरणको ध्याय ३४ सुनिकै बातें ये करिया की क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ३५ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ चालिभो करिया फिरि मोहबेको मनमें किहे गंगको ध्यान ३६ त्यही समय की बातें हैं यारो सुनिल्यो कान लगाय ॥ चारो भाई हैं बकसर के जिनका कही बनाफरराय ३७ रहिमलें टोंडेर बच्छराजैं औ चौथे देशराजैं महराज ॥ मीराताल्हन हैं बनरस के जिनके नौ लड़िका शिरताज ३८ अली अलोमत औ दरियाखां बेटा जानबेगें सुल्तानै ॥ मियांबिसारतैं औ दरियाई नाहर कारे औ कल्यानै ३६ कारे बाना करे निशाना कारे घोड़न पर असवार ॥ चीरा शिर पर है सुलतानी मीराताल्हन केर कुमार ४० ये सब मिलिकै यकठौरी है डाँड़ पै किहेनि बखेड़ाजाय ॥ जयचंद केरी तहँ ठकुरी है जिनका कही कनौजीराय ४१ सब फिरियादी गे कनउज को पहुँचे नगर महोबा जाय ॥ नगर महोबा सों कनउज को रस्ता सीध निकरिगै भाय ४२ यक हरिकारा सों पूँछत भे चारों भई बनाफरराय ॥ जावा चाहें हम कनउज को जहँपै रहैं चँदेलोराय ४३ सुनिकै बातें इन चारों की सोऊ कहा बचन हर्षाय ॥ कौने मतलब को जावत हौ हमते सत्य देव बतलाय ४४
६ आल्हखण्ड । ४२ सुनिकै बातें हरिकारा की ताल्हन बोला बनारसक्यार ॥ भयो बखेड़ा है धूरेपर . हूँवनाचली बिषमतलवार ४५ हम फिरियादी कनउज जावैं राजा जयचंद के दरबार ॥ सुनिकै बातें ये ताल्हनि की सोऊ बोला बचन उदार ४६ उन घर नायब चंदेलो है जो परिमाल मोहोबे क्यार ॥ एक महीना की छुट्टी लै आयो घरे आपने यार ४७ तुमचलिजावो परिमालिकढिग तौ सब काज सिद्धि ह्वैजाय ॥ नाहिं तो बरसैं तुमका लगिहैं मानो सत्य सत्य सबभाय ४८ सुनिकै बातें हरिकारा की ये चलिगयो जहाँ परिमाल ॥ तुरतै मिलिकै परिमालिक सों अपनो गायगयो सबहाल ४६ बड़ी प्रीतिसों परिमालिक तब इनको द्वार दीन टिकवाय ॥ सिधा मँगायो सब क्षत्रिन को ताल्हनि खानादीन मँगाय ५० बनी रोसइयाँ राजपूतन की क्षत्रिन जेइँ लीन ज्यँवनार ॥ अब यहु लड़िका जम्बैवाला ठाकुर माड़ोका सरदार ५१ दावतिआवै सो मोहवे को करिया करिया के अनुमान ॥ बजै नगाड़ा त्यहि फौजन माँ भारी होय घोर घमसान ५२ सुन्यो नगाड़ा के शब्दन को चक्रित भयो रजापरिमाल ॥ तब हरिकारा दुइ आवतभे तेसब कह्यो वहाँ परहाल ५३ सुनिकै बातें हरिकारा की फाटक बन्द लीन करवाय ॥ तवलों करिया फौजैं लै कै फाटक ऊपर पहुँचा आय ५४ हुकुम लगायो राजपूतन को कुल्हड़न फाटक देव गिराय ॥ मर्दिगर्दै करि सब मोहवे को नेका टकालेउँ निकराय ५५ तौतौ लरिका मैं जम्बै का नाहिं ई डारौं मुच्छमुड़ाय ॥ नीके गहना ये देहैं ना कादर बंश चँदेलाराय ५६
महोबेका प्रथमयुद्ध । ४३ ७ सुनिकै बातें ये करिया की क्षत्रिन लिह्यो कुल्हाड़ाहार्थ ॥ मरै कुल्हाड़ा फिरि फाटक में नायकै रामचन्द्र को माथ ५७ यह गति चारो भाइन दीख्यो ताल्हन बनरस को सरदार ॥ पांचों मिलिकै सम्मत करिकै गरुई हांक दीन ललकार ५८ जल्दी खोलो अब फाटक को मूरति दखौं करिंगा केरि ॥ जान न पाई माड़ोवाला मारौ एक एक को हेरि ५६ यह कहि फाटक को खुलवायो औ फौजनमाँ परे दबाय ॥ मारन लागे चारो भाई जिनका कही बनाफरराय ६० जौनी दिशि को ताल्हन जावैं कोउ न पैर अड़ावै ज्वान ॥ जौनी दिशिको बच्छराजजायँ त्यहिदिशिमारिकैरैंखरिहान ६१ को गति बरौ देशराजकै सरबरि करै कौन सरदार ॥ बड़ा लड़ैया रहिमलतोंड़र दोऊहाथ करै तलवार ६२ मूंड़नकेरे मुड़चौरा भे औ रुंडनके लाग पहार ॥ खूनकिनदिया तहँ बहिनिकरी जूझे बड़े बड़े सरदार ६३ बड़ा लड़ैया माड़ोवाला यहु जम्बैको राजकुमार ॥ ताल्हनकेरे यहु मुरचापर कीन्हेसि पाँचघरी तलवार ६४ जीति न दीख्यो जब ताल्हनसों तब फिरि भागा लिहेपरान ॥ बचे खुचे जे माड़ोवाले तेऊ भागिगये सब ज्वान ६५ यह सुनि पावा रनिमलहनांने चारिउ कुँवर लीन बुलवाय ॥ बड़ी बड़ाई करि चारों की औ परिमालसों कहा बुझाय ६६ इन्हें टिकावो तुम मोहबे माँ इनके ब्याह देव करवाय ॥ ईजति हमरी इन राखी है औ गाढ़ेमाँ भये सहाय ६७ बातें सुनिकै रनिमलहना की फिरि दरबार पहुंचे आय ॥ देशराज औ बच्छराज को दोउन लीन्ह्यो हृदय लगाय ६८
= आल्हाखण्ड । १४ तिनसों बोल्यो परिमालिक फिरि हमरी बात सुनो दोउ भाय ॥ दूध पूत औ धनदौलत के मालिक तुम्हीं बनाफरराय ६९ मीराताल्हन वनरस वाले तिनसों बोल्यो रजापरिमाल ॥ फौजनकेरे तुम मालिक हौ हमरे बचन करौ प्रतिपाल ७० नाई बारी को बुलवायो तिनसों कह्यो बचन समुझाय ॥ जाति बिरादर जहाँ हमरे हैं तिनका खबरि सुनायो जाय ७१ लरिका द्वारे परिमालिक घर ब्याहन योग भये हैं आय ॥ क्वारी कन्या जिनघर होवैं टीका तुरत देयँ पठवाय ७२ सुनिकै बातें परिमालिक की नाइन पतालगायो जाय ॥ दलपतिराजा ग्वालीयर का त्यहिफिरि टीका दीनपठाय ७३ देशराज औ बच्छराज को लैके पहुँचिगयो परिमाल ॥ द्यावलि विरमाँ दूनो कन्या इनको ब्याहिदीन नरपाल ७४ देशराज का द्यावलि सँगमें विरमाँ बच्छराज के साथ ॥ ब्याहिकै चलिभे परिमालिक फिरि मनमें सुमिरि भवानीनाथ ७५ दोनों बहुवन को सँग में लै मोहवे आयगये परिमाल ॥ खबरि जनायो यह सखियनने मल्हनावहुत भई खुशियाल ७६ दौरति आई फिरि द्वारे पर औ आरती उतारी आय ॥ बाँह पकरिलइ दोउ बहुवन की राखी रंगमहल में जाय ७७ हार नौलखा के लेबे को आयो रहै करिंगाराय ॥ स्वई हार लै रानी मल्हना औद्यावलिको दीन पहिराय ७८ दूसर हार और तैसे लै विरमागले दीन फिर डार ॥ अनँद बधैया बाजन लागी घर घर होयं मंगलाचार ७९ को गनि बरणै त्यहिसमया कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ सुखमाँ सोयो परिमालिक फिरि मल्हना संग महल हर्षाय ८०
महोबेका प्रथमयुद्ध । ४५. ९ सवैया ॥ सोय उठी परिमाल कि नारि तबै मनमें यह सोचन लागी । मंदिर एक कसामसि होय नई दुलही सुलही बड़ भागी ॥ दुःख मिलै इन नारिन को मन में यह सोचि उरै अनुरागी । सोय उठे ललिते परिमाल तबै यह नारि सुनावन लागी =१ सुनिकै परिमाल कह्योहँसिकै इनको हम आनहि ठौर टिकावैं । उठिकै पुर दूर कछू यक जाय तहां पुरवा कर नेव डरावैं ॥ नामधर्यो दशहरिपुर ताहि यहाँ दउकुँवरन फेरि बुलावैं । ललिते दउबन्धु टिकेतहँजाय न गायसकों जोमहासुखपावैं=२ को गति बरणै त्यहि पुरवा कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ तहँही द्यावलि के आल्हा भे प्याट म रहे उदयसिंहराय =३ बिरमा केरे मलखाने भे सुलखे गये गर्भ में आय ॥ तबहीं करिया माड़ोवाला आधीरात पहुँचा आय =४ सोवत मास्यो बच्छराज को काट्यो देशराज शिरजाय ॥ आगि लगायो फिरि पुरवा में सबियाँ जेवर लीन मँगाय =५ लीन्ह्यो हाथी देशराज का घोड़ा पपिहा लिह्यो खुलाय ॥ लखा पतुरिया देशराज की सोऊ करिया लीन बुलाय =६ मालखजाना परिमालिक का सबियाँ बेगि लीन लुटवाय ॥ हार नौलखा को लैकै फिरि मोहबेते कूच दीन करवाय =७ आठरोजकी मंजिल करिकै माड़ो गयो करिंगाराय ॥ खबरि सुनाईती माहिलने सोऊ गयो तहाँ फिरि आय =८ बड़ी बड़ाई भै माहिलकै राजा जम्बै के दरबार ॥ अनँद बधैया माड़ो बाजी घरघरभये मंगलाचार =६ ब्रह्मारंजित भे मल्हना के औ द्यावलिके उदयसिंहराय ॥
१० आल्हखण्ड । ४६ सुलखे पैदा भे विरमा के ताकी खुशी कही ना जाय ६० देवा पैदाभा भीषम के ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ सो भा साथी बघऊदन का ज्वानों सुनो चित्तदै कान ६१ याविधि लड़का इकठौरी है बाँधे छोटि छोटि तलवार ॥ छुटि छुटि ढालें सोहैं पीठि में शिरपर पगिया करैं बहार ६२ छुटि छुटि कलँगी तिनपरसोहैं छोटी बैसनके सरदार ॥ छुटि छुटि घोड़न के चढ़वैया बड़ बड़ ठकुरन केर कुमार ६३ रोज शिकारन को जावें ते बाँधे गूंरा और गुलेल ॥ जुलफै सोहैं तिन कुँवरन के जिनमाँ महकै अतरफुलेल ६४ आगे घोड़ा है आल्हा को पाछे जायँ वीर मलखान ॥ तिनके पीछे ब्रह्मा सोहैं पीछे उदयसिंह बलवान ६५ सुलखे भाई 'मलखाने का सोऊ लीन्हे हाँथ गुल्याल ॥ हिरना ढूंढें सब जंगल माँ एक ते एक दई के लाल ६६ हिरना पायो नहिं जंगल में लौटे फेरि महोबे बाल ॥ एक न लौट्यो उदयसिंह तहँ नाहर देशराजका लाल ६७ सो यह सोचै मन अपनेमाँ औ मनहीमाँ करै विचार ॥ हम कहिआये हैं माता सों माता लावैं आज शिकार ६८ हिरना मारे बिन जावें ना हमरो याही ठीक विचार ॥ यहै सोचि कै मन अपने माँ ढूंढ़न लाग्यो तहाँ शिकार ६६ हिरनादीख्यो इक झाबर में मारन चल्यो बनाफरराय ॥ हिरना भाग्यो तहँ उरईको माहिल बाग पहुँचा जाय १०० घोड़ बेंदुला को रपटाये पाछे चला बनाफर जाय ॥ खाँई ऊंची त्यहि बगियाकी ऊदन घोड़ा दीन फँदाय १०१ मारि बेंदुला की टापन सों सबियाँ बगिया दीन खुदाय ॥
महोबेका प्रथमयुद्ध । ४७ ११ छोटी दरखत बहु टूटत भे रौसैं पटरी दई गिराय १०२ यहगतिदीख्यो जब मालिनने बोल्यो उदयसिंहते आय ॥ कौने राजा के लरिकाहौ सबियाँ डार्यो बाग नशाय १०३ काह नाम है सो बतलाओ आपन देश देव बतलाय ॥ सुनिकै बातें त्यहि मालीकी बोल्यो तुरत बनाफरराय १०४ देश हमारो नगर महोबा हमरो उदयसिंह है नाम ॥ फिरिकै माली अब बोलेना नाहिं तो पठैदेवँ यमधाम १०५ सुनिकै बातें बघऊदन की माली चुप्प साधि तब लीन ॥ सुमिरि भवानी शिवशंकरको ह्याँते कलम बन्दकै दीन १०६ आशिर्वाद देवँ मुंशीसुत जीवहु प्रागनरायण भाय ॥ कीरति तुम्हरी जो सब गावैं तौफिरिकथाबहुतबढ़िजाय १०७ माथ नवावों पितु अपने को जिन म्वहिं बिद्यादीन पढ़ाय ॥ सो सुख पावैं देवलोक में गावैंललितचरितनितध्याय १०८ अब मैं ध्यावों रामचन्द्रको जो मम इष्टदेव महराज ॥ ईज्जति हमरी जग में राखैं पुरवैं सकल हमारे काज १०६ इति श्रीलखनऊनिव।सि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबायू प्रयागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृतमहोवायुद्धऊदनशिकार वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ महोबेकाप्रथमयुद्धसमाप्त ॥
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