अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषार्थसहिता ॥ १११
चतुर्वक्त्राभवेद्दत्ता पृथिवीनात्रसंशयः ॥ २१ ॥
कृष्णाजिनेतिलान्कृत्वा हिरण्यमधुसर्पिषी ।
ददातियस्तुविप्राय सर्वंतरतिदुष्कृतमितिसर्वंतरतिदुष्कृतमिति२२
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे ऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥
दानेन सर्वकामानाप्नोति ॥१॥ चिरजीवित्वं ब्रह्मचा-
री रूपवान् ॥ २ ॥ अहिंस्युपपद्यते स्वर्गम् ॥ ३ ॥ अग्निप्रवे-
शाद् ब्रह्मलोकः ॥ ४ ॥ मौनात्सौभाग्यम् ॥ ५ ॥ नागाधिप-
तिरुदकवासात् ॥ ६ ॥ नीरुजः क्षीणकोशः ॥ ७ ॥ तोयदः स-
र्वकामसमृद्धः ॥ ८ ॥ अन्नप्रदाता सचक्षुः ॥ ९ ॥ स्मृतिमान्मे-
धावी सर्वतोऽभयदाता ॥ १० ॥ गोयुक्ते सर्वतीर्थोपस्पर्शन-
म् ॥ ११ ॥ शय्यासनदानादन्तःपुराधिपत्यम् ॥ १२ ॥ छत्र-
उक्त प्रकार बाण का दान किया इसमें सन्देह नहीं ॥ २१ ॥ काले मृग चर्म पर तिल धरके उन तिलों पर सुवर्ण, शहद और घी धर के जो ब्राह्मण को दान देता है वह सब दुष्कर्मों से पार हो जाता है ॥ २२ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अठ्ठाईसवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
दान धर्म से मनुष्य की सब मनोकामना पूरी हो जाती है ॥ १ ॥ दान शील पुरुष चिरंजीवी ब्रह्मचारी तथा सुरूपवान् होता है ॥ २ ॥ दयालु हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ दान शील को अग्नि में प्रवेश करने ( विधिपूर्वक मरणान्तदाह ) से ब्रह्मलोक प्राप्त होता ॥ ४॥ मौन धारण करने से सौभाग्य प्राप्त होता ॥५॥ जलमें भींगते हुए जप करने से नागों का अधिपति अर्थात् नागलोक का राजा होता है ॥ ६ ॥ दान में जिसका धन चुक जाय वह नीरोग होता ॥७॥ प्याऊ आदि जलदान करनेवाला सब कामनाओं से युक्त होता ॥ ८ ॥ अन्न दाता चक्षु हीन नहीं होता ॥ ९ ॥ सब प्रकार से अभय देने वाला स्मरण शक्ति युक्त उत्तम बुद्धिवाला होता ॥ १० ॥ बैल युक्त रथ के दान में सब तीर्थों के स्नान का फल होता है ॥ ११ ॥ शय्या दान और उत्तम२ आसनों के दान से स्त्री रणवास की महारानी होती है ॥ १२ ॥ छाता के दान
११२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
दानाद् गृहलाभः ॥ १३ ॥ गृहप्रदो नगरमाप्नोति ॥ १४ ॥ उपानत्प्रदाता यानमासादयति ॥१५॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥१६॥ यत्किंचित्कुरुतेपापं पुरुषोवृत्तिकर्शितः । अपिगोचर्ममात्रेण भूमिदानेनशुध्यति ॥ १७ ॥ विप्रायाऽऽचमनार्थंतु दद्यात्पूर्णकमण्डलुम् । प्रेत्यतृप्तिंपरांप्राप्य सोमपोजायतेपुनः ॥ १८ ॥ अनडुहांसहस्राणां दानानांधुर्यवाहिनाम् । सुपात्रेविधिदत्तानां कन्यादानेनतत्समम् ॥ १९ ॥ त्रीण्याहुरतिदानानि गावःपृथ्वीसरस्वती । आदिदानंहिरण्यानां विद्यादानंततोऽधिकम् ॥ २० ॥ आत्यन्तिकफलप्रदं मोक्षदंबन्धमोचनम् । योगिनांसंमतोविद्वानाचारमनुवर्तते ॥ २१ ॥ श्रद्दधानःशुचिर्दान्तो धारयेच्छृणुयादपि ।
से घर मिलता (घर एक प्रकार का बड़ा छाता जानो) ॥ १३॥ घर देनेवाला नगर का स्वामी होता है ॥ १४ ॥ जूतों का दान करनेवाले को सवारी प्राप्त होती है ॥ १५ ॥ और भी श्लोकों का प्रमाण कहते हैं कि ॥ १६ ॥ जीविका (रोजगार) न मिलने से दुःखित हुआ मनुष्य जो कुछ पाप करता है वह गोचर्म मात्र भूमि के दान से शुद्ध हो जाता है ॥ १७ ॥ आचमन के लिये ब्राह्मण को जो जल से भरा कमण्डलु दान करे वह जन्मान्तर में परम तृप्ति को प्राप्त होकर अग्निष्टोमादि सोमयाग करने वाला होता है ॥ १८ ॥ बलवान् गाड़ी में बोझा ले चलने में समर्थ एक हजार बैलों का दान सुपात्रों को विधिवत् देवे तो कन्यादान के तुल्य पुण्य होता है ॥ १९ ॥
गौ, पृथिवी और विद्या ये तीन दान बड़े हैं । इन में भी सुवर्ण का दान मुख्य है और विद्या का दान सुवर्ण से भी बड़ा है ॥ २० ॥ बन्धन से छुड़ा के मोक्ष देनेवाला होने से विद्या दान अत्यन्त फल देनेवाला है । जो विद्वान् होकर सदाचार पर चलता है वह योगियों का भी मान्य है ॥ २१ ॥ जो धर्म के विचारों को सुने और धारण (स्वीकार) करे आगे वैसा ही करने लगे, मनको
भाषार्थसहिता ॥ ११३
विहायसर्वपापानि नाकपृष्ठेमहीयत,इति ।
नाकपृष्ठेमहीयते । इति ॥ २२ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
धर्मंचरतमाऽधर्मं सत्यंवदतनानृतम् ।
दीर्घंपश्यतमाह्रस्वं परंपश्यतमाऽपरम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणोयज्ञो भवत्यग्निर्वै ब्राह्मणइति श्रुतेः ॥ २ ॥
तच्च कथम् ॥३॥ तत्र सतो ब्राह्मणस्य शरीरं वेदिः संक-
ल्पो यज्ञः पशुरात्मा मनो रशना बुद्धिः सदो मुखमाहवनीयं
नाभ्यामुदरोऽग्निर्गार्हपत्यः प्राणोऽध्वर्युर्पानो होता व्यानो
ब्रह्मा समान उद्गाताऽऽत्मेन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि यएवं
विद्वन्निन्द्रियैरिन्द्रियार्थं जुहोतीति ॥ ४ ॥ अपि च काठके
विज्ञायते ॥ ५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ६ ॥
पानित्रातिचदातार-मात्मानंचैवकिल्विषात् ।
वेदेन्धनसमृद्धेषु हुतंविप्रमुखाग्निषु ॥ ७ ॥
वश में रक्खें, पवित्रता से रहे, तथा श्रद्धालु हो वह सब पापों को त्याग के स्वर्ग के सिंहासन पर पूजा जाता है ॥ २२ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में उनतीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२९॥
धर्म करो अधर्म नहीं, सत्य बोलो मिथ्या नहीं, दीर्घ दर्शी बनो संकुचित विचार वाले नहीं, परम अविनाशी सब अनित्य पदार्थों में नित्य परम तत्त्व रूप ईश्वर को देखो संसार को नहीं ॥ १ ॥ ब्राह्मण यज्ञ का ही रूप है । “अग्नि ही ब्राह्मण है” ऐसा श्रुति में लिखा है ॥ २ ॥ सो कैसे ? ॥ ३ ॥ उस में सत्पात्र ब्राह्मण का शरीर-वेदि, संकल्प-यज्ञ, पशु-आत्मा, मन-रस्सी, बुद्धि-सदःशाला, मुख-आहवनीय, नाभिस्थल में उदर का जाठराग्नि-गार्हपत्य, प्राण-अध्वर्यु, अपान-होता, व्यान-ब्रह्मा, समान-उद्गाता, इन्द्रियां यज्ञपात्र, जो ऐसा जानता है वह इन्द्रियों के साथ शब्द स्पर्शादि विषयों का होमकर देता है ॥ ४ ॥ और भी कठशाख्य श्रुति से जाना जाता है ॥ ५ ॥ और भी श्लोकों का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ६ ॥ दान लेने वाले और दाता पुरुष को वह दान पाप से रक्षा करता है कि जो वेदरूप ईंधन से प्रज्वलित ब्राह्मणों के मुख रूप अग्नि में होम किया जाता है ॥ ७ ॥ न फैजता, न व्यर्थ हो-
११४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
नस्कन्दतेनव्यथते नैनमध्यापतेञ्चयत् । वरिष्ठमग्निहोत्रात्तु ब्राह्मणस्यमुखेहुतम् ॥ ८ ॥ ध्यानाग्निः सत्योपचयनं क्षान्त्यापुष्टिग्न्रवं त्रिः पुरोडा- शमहिंसा च सन्तोषो यूपःकृच्छ्रं भूतेभ्योऽभयदाक्षिण्यं स्म- तिं कृत्वा क्रतुं मानसं याति क्षयं बुधः ॥६॥ जीर्यन्ति जीर्यतःकेशा दन्ताजीर्यन्तिजीर्यतः । जीवनाशाधनाशाच जोर्यतोऽपिनजीर्यति ॥१०॥ यादुस्त्यजादुर्मतिभिर्यान्नजोर्यतिजीर्यतः । योऽसौप्राणान्तिको व्याधिस्तांतृष्णांत्यजतः सुखमिति॥११॥ नमोस्तुमित्रावरुणयोरुर्वश्यात्मजाय शतयातवे वसिष्ठाय वसिष्ठायेति ॥१२॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ समाप्ताचेयं वसिष्ठस्मृतिः ॥
ता, और न किसी प्रकार के अनिष्ट का कारण होता है (अर्थात् अग्निहोत्र में ऐसी अनेक दिक्कतें होती हैं इस कारण) अग्नि होत्र से बहुत अच्छा यह है कि जो ब्राह्मण के मुख में होम किया गया है ॥ ८ ॥ ध्यान रूप अग्नि, सत्य का संचय, क्षमा से पुष्टि अन्न वा पुरोडाश, अहिंसा-दया, सन्तोष यूप-स्तम्भ, प्राणियों के लिये अभयदान रूप कृच्छ्रव्रत, ऐसा स्मरण करके विद्वान् पुरुष संसार के साथ संबन्ध का त्याग करता हुआ मानस यज्ञ को प्राप्त होता है ॥६॥ वृद्धावस्था में बालश्वेत हो जाते, दांत गिर जाते हैं, परन्तु जीवन की और धन की तृष्णा जीर्ण (बुड्डी) नहीं होती ॥१०॥ जो शरीर के जीर्ण होते हुए भी जीर्ण नहीं होती जो निकृष्ट बुद्धि वालों से कदापि त्यागी नहीं जा सकती तथा जो मरण पर्यन्त साथ में लगी पूरी व्याधि है उस तृष्णा को त्याग ने पर ही सुख हो सकता है ॥११॥ मित्रावरुण देवतों द्वारा उर्वशीदिव्याङ्गना से उत्पन्न हुए शतयातु नामक महर्षि वसिष्ठ को बारंबार नमस्कार प्राप्त हो ॥१२॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के ब्राह्मणसर्वस्व सम्पादक पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ और यह वसिष्ठस्मृति भी समाप्त हुई॥ ओम्-शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ॥
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