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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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सूक्त-१ देवता—वरुण

पांचवां कांड सूक्त-१ देवता—वरुण ऋधङ्मन्त्रो योनिं य आबभूवामृतासुर्वर्धमानः सुजन्मा. अदब्धासुभ्राजमानो ऽ हेव त्रितो धर्ता दाधार त्रीणि (१) जिस के प्राण मरण रहित हैं, जो जन्म ले कर बढ़ता है, कोई भी जिस की हिंसा नहीं कर सकता, जो दिन के समान प्रकाश वाला है, जो तीनों लोकों का धारणकर्ता और पालक है, वह योनि से उत्पन्न हुआ है. (१) आ यो धर्माणि प्रथमः ससाद ततो वपूंषि कृणुषे पुरूणि. धास्युर्योनिं प्रथम आ विवेशा यो वाचमनुदितां चिकेत.. (२) जो जीवात्मा सब से पहले धर्म का पालन करता है तथा इसी हेतु अनेक शरीरों को धारण करता है, जो संज्ञाओं के द्वारा आकृष्ट वाणी का निर्माण करता है, वह अन्न की इच्छा से योनि में सब से पहले प्रवेश करता है. (२) यस्ते शोकाय तन्वं रिरेच क्षरद्धिरण्‍यं शुचयो ऽ नु स्वाः. अत्रा दधेते अमृतानि नामास्मे वस्त्राणि विश एरयन्ताम्.. (३) हे वरुण! जो जीवात्मा तुम्हारे निमित्त धर्म पालन हेतु कष्ट सहता हुआ सुवर्ण के समान अपनी कीर्ति फैलाने के लिए शरीर में आया है, उसे द्यावा पृथ्वी अमरत्व प्रदान करते हैं तथा प्रजाएं वस्त्र देती हैं. (३) प्र यदेते प्रतरं पूर्व्यं गुः सदःसद अतिष्ठन्तो अजूर्यम्. कविः शुषस्य मातरा रिहाणे जाम्यै धुर्यं पतिमेरयेथाम्.. (४) जो उत्तम स्थान पर बैठ कर उस परमात्मा का चिंतन करते हैं, जो ब्राह्मण के हितैषी हैं तथा उसे प्राप्त कर चुके हैं, वे लोक परमात्मा की उपासना करके उस स्त्री को भी ईश्वर के दर्शन कराएं, जो प्रजा को अपनी बहन समझ कर उस का भार वहन करती है. (४) तदू षु ते महत् पृथुज्मन् नमः कविः काव्येना कृणोमि. यत् सम्यञ्चावभियन्तावभि क्षामत्रा मही रोधचक्रे वावृधेते.. (५) पृथ्‍वी को स्थिर रखने वाले दो राजा पहिए के समान तेज चाल से आगे बढ़ रहे हैं. हे

पृथ्वी! मैं अथर्ववेद का ज्ञाता ब्राह्मण हूं और तुम्हारे लिए अन्न भेंट करता हूं. (५) सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामिदेकामभ्यं हुरो गात्. आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीडे पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ.. (६) मनु आदि ऋषियों ने चोरी, गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, मद्यपान, मिथ्याभाषण एवं पापकर्म — इन सात कर्मों के रूप में धार्मिक, मर्यादा निश्चित की है. जो इस मर्यादा को नहीं मानता, वह पापी है. इन सात मर्यादाओं का पालन करने वाला पुरुष मृत्यु के पश्चात सूर्य मंडल में स्थित आदित्य को प्राप्त करता है और प्रलय काल तक वहीं स्थित रहता है. (६) उतामृतासुर्व्रत एमि कृण्वन्नसुरात्मा तन्व १ स्तत् समुद्गुः. उत वा शक्रो रत्नं दधात्यूर्जया वा यत् सचते हविर्दाः.. (७) शरीर से संबंधित जो स्वयं प्रकाश उभरता है, मैं उसी का व्रती हूं. मैं अपने बल के सहारे आ रहा हूं. जो व्यक्ति इंद्र को शक्ति वाला हवि देता है, इंद्र उसे रत्न आदि धन प्रदान करते हैं. (७) उत पुत्रः पितरं क्षत्रमीडे ज्येष्ठं मर्यादमह्वयन्त्स्वस्तये. दर्शन् नु ता वरुण यास्ते विष्ठा आवर्व्रततः कुणवो वपूंषि.. (८) क्षत्रिय जाति का पुत्र अपने पिता की पूजा करे तथा उत्तम कल्याण पाने के लिए धर्म पालन में प्रवृत्त हो. हे वरुण! अनेक स्थानों को दिखाते हुए तुम सांसारिक जीवों की रचना करते हो. (८) अर्धमर्धेन पयसा पृणक्ष्यर्धेन शुष्म वर्धसे अमुर. अविं वृधाम शग्मियं सखायं वरुणं पुत्रमदित्या इषिरम्. कविशस्तान्यस्मै वपूंष्यवोचाम रोदसी सत्यवाचा.. (९) मित्र और वरुण अदिति के पुत्र हैं. हम इन दोनों की वृद्धि करते हैं. हे वरुण! तुम आधे दूध, घृत आदि से इस सेना का बल बढ़ाते हो और आधे से अपनी वृद्धि करते हो. हे आकाश और पृथ्वी के देवो! विद्वान् ऋषियों ने जिन शरीरों का वर्णन किया है, हम अपनी सत्य वाणी से उन्हीं का वर्णन करते हैं. (९) सूक्त-२ देवता—वरुण तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेष्णृम्णः. सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यदेनं मदन्ति विश्व ऊमाः.. (१) इंद्र संसार में धनवान एवं बली होने के कारण श्रेष्ठ माने जाते हैं. इंद्र ने जन्म लेते ही शत्रु का संहार करना आरंभ कर दिया था, इसीलिए इन के सैनिक इन की रक्षा करते हैं एवं ebook converter DEMO Watermarks*

प्रसन्न रहते हैं. (१) वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्मासाय भियसं दधाति. अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु.. (२) बढ़ता, शक्तिशाली एवं ओजस्वी शत्रु अपने दासों को भयभीत करता है. चर और अचर सारा विश्व हम में लीन हो जाता है. वेतन पाने वाले सच्चे वीर युद्ध में परमात्मा की प्रार्थना करते हैं. (२) त्वे क्रतुमपि पृञ्चन्ति भूरि द्विर्यद‍्ते त्रिर्भवन्त्यूमाः. स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः.. (३) हे इंद्र! जन्म, संस्कार और युद्ध की दीक्षा से तीन बातें मनुष्य के जन्म के साथ ही निश्चित हो जाती हैं एवं विशाल यज्ञ को तुम तक पहुंचाती हैं. तुम सभी पदार्थों को उत्तम स्वाद वाला बनाने वाले हो तुम हमारे पदार्थों को भी स्वादिष्ट बनाओ एवं सुंदर रीति से युक्त करो. (३) यदि चिन्नु त्वा धना जयन्तं रणेरणे अनुमदन्ति विप्राः. ओजीयः शुष्मिन्त्स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन् दुरेवासः कशोकाः.. (४) हे बलशाली इंद्र! तुम सभी युद्धों में विजय प्राप्त करते हो. यदि ब्राह्मण तुम्हारी स्तुति करें तो तुम उन्हें स्थिर रहने वाला बल प्रदान करो. जो मुख्य सुखमय वातावरण को दुःखमय बना देते हैं अथवा जिन की गति बुरी है, वे तुम तक न आ सकें. (४) त्वया वयं शाशदमहे रणेषु प्रपश्यन्तो यधेन्यानि भूरि. चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम युद्ध में अपने सभी विरोधियों को समाप्त कर देते हैं. मैं तपस्या द्वारा सिद्ध अपनी वाणी से तुम्हारे शस्त्रों को प्रेरणा प्रदान करता हूं तथा तुम्हारी गतिशील वाणी को तीखा बनाता हूं. (५) नि तद् दधिषेऽवरे परे च यस्मिन्नाविथावसा दुरोणे. आ स्थापयत मातरं जिगत्नुमत इन्वत कर्वराणि भूरि.. (६) जिस घर में उत्तम एवं साधारण प्राणियों का पालन हुआ तथा जिस घर में अन्न द्वारा उन की रक्षा की गई, उस घर में कालिका माता की गतिशील शक्ति की स्थापना करो. इस प्रकार वह घर अद्भुत पदार्थों से पूर्ण हो जाएगा. (६) स्तुष्व वर्मन् पुरुवर्त्मानं समृभ्वाणमिनतममाप्तमाप्त्यानाम्. आ दर्शति शवसा भूर्योजाः प्र सक्षति प्रतिमानं पृथिव्याः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे शरीरधारी पुरुष! तू उस राजा की स्तुति कर जो विचरण करने वाला, तेजस्वी, स्वामी एवं उन गुणों से युक्त है, जो आप्त जनों में होते हैं. राजा पृथ्‌वी का प्रतिरूप है एवं युद्ध में जुटा हुआ है. (७) इमा ब्रह्म बृहद्दिवः कृणवदिन्द्राय शूषमग्रियः स्वर्षाः. महो गोत्रस्य क्षयति स्वराजा तुरश्चिद् विश्वमर्णवत् तपस्वान्.. (८) यह राजा स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा से महान स्तोत्रों द्वारा इंद्र को प्रसन्न कर रहा है. स्वर्ग के स्वामी इंद्र मेघों के द्वारा जल वर्षा कर के विश्व को जल से पूर्ण करते हैं. (८) एवा महान् बृहद्दिवो अथर्वावोचत् स्वां तन्व १ मिन्द्रमेव. स्वसारौ मातरिश्वरी अरिप्रे हिन्वन्ति चैने शवसा वर्धयन्ति च.. (९) अपने शरीर को इंद्र मान कर महर्षि अथर्वा ने कहा था कि पाप रहित भगिनियां इसे बल के द्वारा बढ़ाती हुई प्रसन्न करती हैं. (९) सूक्त-३ देवता—अग्नि ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम. मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम.. (१) हे अग्नि देव! युद्धों में हम वर्चस्वी बनें. हम तुम्हें प्रकट करते हुए अपने शरीर को शक्तिशाली बनाएं. चारों दिशाएं और प्रदिशाएं हमारे सामने तथा आप के संरक्षण में शत्रुओं की इस सेना पर विजय प्राप्त करें. (१) अग्ने मन्युं प्रतिनुदन् परेषां त्वं नो गोपाः परि पाहि विश्वतः. अपाञ्चो यन्तु निवता दुरस्यवो ऽ मैषां चित्तं प्रबुधां वि नेशत्.. (२) हे अग्नि देव! तुम हजारों शत्रुओं का क्रोध समाप्त करते हुए सभी ओर से हमारी रक्षा करो. हमें दुःख देने के इच्छुक लोग हमारे सामने नम्र बनें तथा हमारे सामने से चले जाएं. (२) मम देवा विहवे सन्तु सर्व इन्द्रवन्तो मरुतो विष्णुरग्निः. ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामायास्मै.. (३) इंद्र के साथ मरुत्, विष्णु और अग्नि आदि सभी देव युद्ध भूमि में मेरे अनुकूल बनें. अंतरिक्ष में मेरा यशोगान गूंजे तथा वायु की गति मेरे अनुकूल हो. (३) मह्यं यजन्तां मम यानीष्टाकूतिः सत्या मनसो मे अस्तु. एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवा अभि रक्षन्तु मेह.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

मैं जो इच्छा और संकल्प करता हूं, वह सत्य हो. मैं सभी प्रकार के पापों से दूर रहूं तथा विश्वे देव मेरी रक्षा करें. (४) मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवहूतिः. दैवा होतारः सनिषन् न एतदरिष्टाः स्याम तन्वा सुवीराः.. (५) मैं जिन देवों को बुलाता हूं, वे मुझे अन्न से संपन्न बनाएं. यज्ञ में देवों के होता हमारे समीप बैठें, जिस से हम रोगरहित और शक्तिशाली बन सकें. (५) दैवीः षडुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह मादयध्वम्. मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विदद् वृजिना द्वेष्या या.. (६) हे विश्वे देव! आप सब हमारे लिए पृथ्‍वी, आकाश, जल, ओषधि, दिन और रात—इन छह दिव्य शक्तियों को बढ़ाइए. आप प्रसन्न हों, जिस से कोई न हमारा तिरस्कार करे और न हमारी निंदा करे. हमें पाप न लगे. (६) तिस्रो देवीर्महि नः शर्म यच्छत प्रजायै नस्तन्वे ३ यच्च पुष्टम्. मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विषते सोम राजन्.. (७) भारती, सरस्वती और पृथ्वी—ये तीन देवियां हमारा कल्याण करें. हमारी प्रजाएं पोषक पदार्थ पा कर पुण्य शरीर वाली हों. हे तेजस्वी सोम! हम संतान एवं पशुओं से हीन न हों तथा शत्रु हमें दुःख न दें. (७) उरुव्यचा नो महिषः शर्म यच्छत्वस्मिन् हवे पुरुहूतः पुरुक्षु. स नः प्रजायै हर्यश्व मृडेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दाः.. (८) हे इंद्र! तुम नदी के समान गतिशील, गुणसंपन्न एवं अन्न के स्वामी हो. तुम हमें इस यज्ञ के कारण सुख प्रदान करो. तुम हमारी संतान का नाश मत करो तथा हमारा त्याग मत करो. (८) धाता विधाता भुवनस्य यस्पतिर्देवः सविताभिमातिषाहः. आदित्या रुद्रा अश्विनोभा देवाः पान्तु यजमानं निर्ऋथात्.. (९) धाता, विधाता, संसार के स्वामी एवं शत्रुहंता सविता देव, आदित्य, रुद्र तथा दोनों अश्विनीकुमार यजमान को पाप से बचाएं और उग्र शत्रुओं से रक्षा करें. (९) ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामह एनान्. आदित्या रुद्रा उपरिस्पृशो न उग्रं चेत्तारमधिराजमक्रत.. (१०) जो हमारे शत्रु हैं, वे हम से दूर भाग जाएं. हम इंद्र और अग्नि के द्वारा अपने शत्रुओं को ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-४ देवता—कुष्ठ, तक्मा-नाशन

बांधते हैं. आदित्य और रुद्र ने हमें जो राजा बना दिया है, वह सावधान करने वाला है. (१०) अर्वाञ्चमिन्द्रममुतो हवामहे यो गोजिद् धनजिदश्वजिद् यः. इमं नो यज्ञं विहवे शृणोत्वस्माकमभूर्हर्यश्व मेदी.. (११) हम ऐसे इंद्र को यज्ञ में बुलाते हैं जो भूमि के विजेता, धन के विजेता और घोड़ों को जीतने वाले हैं, वह इंद्र हमारी स्तुति सुनें. हे इंद्र! तुम हम से स्नेह करने वाले बनो. (११) सूक्त-४ देवता—कुष्ठ, तक्मा-नाशन यो गिरिष्वजायथा वीरुधां बलवत्तमः. कुष्ठेहि तक्मनाशन तक्मानं नाशयन्न्नितः.. (१) हे पर्वतों में उत्पन्न होने वाली तथा शक्तिशाली ओषधि कुष्ठ! तू कोढ़ नामक कठिन रोग का नाश करने वाली है. तू हमें कष्ट देने वाले रोग को नष्ट करती हुई यहां आ. (१) सुपर्णसुवने गिरौ जातं हिमवतस्परि. धनैरभि श्रुत्वा यन्ति विदुर्हि तक्मनाशनम्.. (२) गरुड़ को उत्पन्न करने वाले हिमवंत पर्वत के ऊपर उत्पन्न होने वाली इस ओषधि के विषय में हम ने लोगों से सुना और अन्न ले कर वहां गए. इस प्रकार हम ने इस ओषधि को प्राप्त किया. (२) अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयास्यामितो दिवि. तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (३) यहां तीसरे देव स्थान में अश्वत्थ अर्थात् पीपल विराजमान है. यहां देवों ने अमृत के समान गुण वाले कूठ को जाना. (३) हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यबन्धना दिवि. तत्रामृतस्य पुष्पं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (४) देवों ने सोने के रस्से से बंधी हुई स्वर्ग की नौका के द्वारा अमृत के पुष्प के समान कूठ को प्राप्त किया. (४) हिरण्ययाः पन्थान आसन्नरित्राणि हिरण्यया. नावो हिरण्ययीरासन् याभिः कुष्ठं निरावहन्.. (५) सोने के बने हुए मार्ग से स्वर्ण की नाव के द्वारा कूठ को लाया गया. उन नावों की पतवारें भी सोने की थीं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

इमं मे कुष्ठ पूरुषं तमा वह तं निष्कुरु. तमु मे अगदं कृधि.. (६) हे कूठ! मेरे इस पुरुष को अपने समीप ले कर और इस रोग से छुटकारा दिला कर स्वस्थ बनाओ. (६) देवेभ्यो अधि जातो ऽ सि सोमस्यासि सखा हित:. स प्राणाय व्यानाय चक्षुषे मे अस्मै मृड.. (७) हे कूठ! तुम देवों के समीप उत्पन्न हुए हो तथा सोम के हितकारक मित्र हो. तुम मेरे इस पुरुष के प्राण, व्यान एवं नेत्रों को सुख देने वाले बनो. (७) उदङ् जातो हिमवत: स प्राच्यां नीयसे जनम्. तत्र कुष्ठस्य नामान्युत्तमानि वि भेजिरे.. (८) कूठ हिमालय पर्वत के उत्तरभाग में उत्पन्न हुआ है एवं मनुष्यों के द्वारा पूर्व दिशा में लाया गया है. वहां उस के उत्तम नामों का विभाजन हुआ. (८) उत्तमो नाम कुष्ठास्युत्तमो नाम ते पिता. यक्ष्मं च सर्वं नाशय तक्मानं चारसं कृधि.. (९) हे कूठ! तुम्हारी प्रसिद्धि उत्तम है तथा तुम्हारे पिता भी उत्तम थे. तुम सभी प्रकार के राजयक्ष्मा रोगों का नाश करो तथा कुष्ठ रोग को हम से दूर भगाओ. (९) शीर्षामयमुपहत्यामक्ष्योस्तन्वो ३ रेप:. कुष्ठस्तत् सर्वं निष्करद् दैवं समह वृष्ण्यम्.. (१०) सिर संबंधी रोग, नेत्र संबंधी व्याधियां एवं रोग उत्पन्न करने वाले पाप को कूठ ने दैवी बल पा कर इन सब को नष्ट कर दिया. (१०) सूक्त-५ देवता—लाक्षा रात्री माता नभ: पितार्यमा ते पितामह:. सिलाची नाम वा असि सा देवानामसि स्वसा.. (१) हे लाख नामक ओषधि! तू चंद्रमा की किरणों से पुष्ट होती है. इसलिए रात्रि तेरी माता है. तू वर्षा काल में उत्पन्न होती है, इसलिए आकाश तेरा पिता है. आकाश में मेघों को उत्पन्न करने के कारण सूर्य तेरा पितामह है. तेरा नाम सिलाची है और तू देवों की बहन है. (१) यस्त्वा पिबति जीवति त्रायसे पुरुषं त्वम्. भर्त्री हि शश्वतामसि जनानां च न्यञ्चनी.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

जो तुझे पीता है, वह जीवित रहता है. तू पुरुष की रक्षा करती है, तू मनुष्यों का भरणपोषण करने वाली एवं उन्नत बनाने वाली है. (२) वृक्षंवृक्षमा रोहसि वृषण्यन्तीव कन्यला. जयन्ती प्रत्यातिष्ठन्तीस्परणी नाम वा असि.. (३) तू बैल की इच्छा करने वाली गाय के समान प्रत्येक वृक्ष पर चढ़ती है. तू विजय प्राप्त करती है एवं स्थित रहती है, इसलिए तेरा नाम स्मरणी है. (३) यद् दण्डेन यदिष्वा यद् वारुर्हरसा कृतम्. तस्य त्वमसि निष्कृतिः सेमं निष्कृधि पूरुषम्.. (४) हे लाख! जो डंडे से चोट खाया है और जो धारदार शस्त्र से घायल है, तू उन के घावों को ठीक करने का उपाय है, इसलिए तू इस पुरुष को घावविहीन बना. (४) भद्रात् प्लक्षान्निस्तिष्ठस्यश्वत्थात् खदिराद् धवात्. भद्रान्न्यग्रोधात् पर्णात् सा न एह्यरुन्धति.. (५) हे लाख! तू कदंब, पाकड़, पीपल, खैर, धौ, भद्र, न्यग्रोध एवं पर्ण नामक वृक्षों से उत्पन्न होती है. हे घाव को शुद्ध करने वाली एवं भरने वाली ओषधि लाख! तू हमें प्राप्त हो. (५) हिरण्यवर्णे सुभगे सूर्यवर्णे वपुष्टमे. रुतं गच्छासि निष्कृते निष्कृतिर्नाम वा असि.. (६) हे स्वर्ण के समान वर्ण वाली सुभगा एवं सूर्य के समान चमक वाली ओषधि लाख! तू शरीर को स्वस्थ बनाती है. तू घाव को ठीक करती है, इसलिए तेरा नाम निष्कृति है. (६) हिरण्यवर्णे सुभगे शुष्मे लोमशवक्षणे. अपामसि स्वसा लाक्षे वातो हात्मा बभूव ते.. (७) हे सोने के समान वर्ण वाली, सुभगा, सूर्य के समान वर्ण वाली एवं लोगों का विनाश करने वाली लाख! तू जलों की बहन है और वायु तेरी आत्मा है. (७) सिलाची नाम कानीनो ऽ जबभ्रु पिता तव. अश्वो यमस्य यः श्यावस्तस्य हास्नास्युक्षिता.. (८) हे लाख! तेरे नाम सिलाची और कानीन हैं. बकरियों का पालक तेरा पिता है. यमराज का जो पीले रंग का घोड़ा है, उस के रक्त से तुझे सींचा गया है. (८) अश्वस्यास्नः सम्पतिता सा वृक्षां अभि सिष्यदे. सरा पतत्रिणी भूत्वा सा न एह्यरुन्धति.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-६ देवता—ब्रह्म

हे घाव भरने वाली लाख! तू घोड़े के रंग वाली है एवं वृक्षों को सींचती हैं. तू सरकने वाली है, इसलिए चिड़िया बन कर हमारे समीप आ. (९) सूक्त-६ देवता—ब्रह्म ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः. स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१) संपूर्ण सृष्टि का कारण ब्रह्म सृष्टि के आरंभ में सूर्य के रूप में प्रकट हुआ. उस का तेज सीमा रहित है, जो सभी दिशाओं और लोकों में व्याप्त होता है. वह अनुपम है. सत् इसी से उत्पन्न हुआ है और असत् इसी में समा जाता है. (१) अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे. वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (२) हे मनुष्यो! तुम्हारे विरोधी शत्रुओं ने जो उत्तम कर्म किए हैं, उन कर्मों से वे हमारी संतानों तथा वीरों का विनाश न करें, इसलिए मैं वह अभिचार कर्म तुम्हारे सामने प्रस्तुत कर रहा हूं. (२) सहस्रधार एव ते समस्वरन् दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः. तस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवे.. (३) आकाश में स्थित एवं हजारों मार्गों वाले स्वर्ग में विनाश करने वाले यह घोषित कर चुके हैं. जो लोग युद्ध में जाने के लिए आनाकानी करते हैं, उन्हें बांधने के लिए यमदूत पाश लिए हुए सदा तत्पर रहते हैं एवं अपनी आंखें कभी बंद नहीं करते. (३) पर्यु षु प्र धन्वा वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः. द्विषस्तदध्यर्णविनेयसे सनिस्रसो नामासि त्रयोदशो मास इन्द्रस्य गृहः.. (४) हे सूर्य! तुम अन्न उत्पादन के निमित्त मेघों के समीप जाते हो और उन्हें ताड़ित कर के सागर के पास पहुंचाते हो. इसी कारण तुम्हारा नाम सनिस्रत है. वर्ष का तेरहवां महीना जो इंद्र का घर है, तुम उस में भी वर्षा करने को तत्पर हो. (४) न्वे ३ तेनारात्सीरसौ स्वाहा. तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (५) इसी अभिचार कर्म द्वारा इस पुरुष ने सिद्धि प्राप्त की थी. यह अभिचार कर्म सुंदर आहुति वाला हो. हे सोम और रुद्र! तुम तीखे अस्त्रों वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी बना कर सुख प्रदान करो. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

अवैतेनारातत्सीरसौ स्वाहा. तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (६) इस अभिचार कर्म के द्वारा ही इस राजा ने सिद्धि प्राप्त की है एवं शत्रुओं का विनाश किया है. इस की छवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम एवं रुद्र! तुम तीक्ष्ण शस्त्रों वाले हो. तुम इस युद्ध में विजय प्रदान करा के हमें सुख दो. (६) अपैतेनारातत्सीरसौ स्वाहा. तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृडतं नः.. (७) इस अभिचार कर्म द्वारा ही इस राजा ने अपने शत्रुओं का विरोध करते हुए उन का दमन किया तथा सिद्धि प्राप्त की. इस की यह हवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम और रुद्र! तुम अत्यधिक तीक्ष्ण आयुधों वाले तथा सुख प्राप्त करने वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी बना कर सुख प्रदान करो. (७) मुमुक्तमस्मान्दुरितादवद्याज्जुषेथां यज्ञममृतमस्मासु धत्तम्.. (८) हे सोम एवं रुद्र देव! हमें ऐसे पाप से बचाओ, जिस का नाम लेने में भी लज्जा आती है. तुम इस यज्ञ को प्राप्त करो और इस में अमृत धारण करो. (८) चक्षुषो हेते मनसो हेते ब्रह्मणो हेते तपसश्च हेते. मेन्या मेनिरस्यमेनयस्ते सन्तु ये३स्मां अभ्यघायन्ति.. (९) हे नेत्र की, मन की, ब्रह्म की एवं तप की संहारक शक्ति! तुम सभी आयुधों की अपेक्षा श्रेष्ठ आयुध हो. जो आयुधधारी हमें नष्ट करना चाहते हैं, वे आयुधहीन हो जाएं. (९) यो ३ स्मांश्चक्षुषा मनसा चित्त्याकूत्या च यो अघायुरभिदासात्. त्वं तानग्ने मेन्यामेनीन् कृणु स्वाहा.. (१०) हे अग्नि! हमारी हत्या रूपी पाप करने का इच्छुक जो व्यक्ति हम को चक्षु से, मन से और चित्तवृत्ति से क्षीण करना चाहता है, उसे अपने आयुध के द्वारा आयुधहीन बनाओ. हमारी यह आहुति उत्तम हो. (१०) इन्द्रस्य गृहो ऽ सि. तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मेऽस्ति तेन.. (११) हे अग्नि! तुम इंद्र के गृह हो. तुम सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा एवं सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित आप की शरण में आया हूं. (११) eBook converter DEMO Watermarks*

इन्द्रस्य शर्मासि. तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मेऽस्ति तेन.. (१२) हे अग्नि! तुम इंद्र के मुख, सर्वत्र गमन करने वाले, सब की आत्मा, सब के शरीर एवं सब के पुरुष हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित तुम्हारी शरण में आया हूं. (१२) इन्द्रस्य वर्मासि. तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मे ऽ स्ति तेन.. (१३) हे अग्नि! तुम इंद्र के कवच, सर्वत्र गमन करने वाले, सब की आत्मा, सब के शरीर और सब के पुरुष हो. मैं अपने समस्त परिवार और पूरी संपत्ति के साथ तुम्हारी शरण में आता हूं. (१३) इन्द्रस्य वरूथमसि. तं त्वा प्र पद्ये तं त्वा प्र विशामि सर्वगुः सर्वपूरुषः सर्वात्मा सर्वतनूः सह यन्मे ऽ स्ति तेन.. (१४) हे अग्नि! तुम इंद्र के सैनिक, सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा और सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित तुम्हारी शरण में आया हूं. (१४) सूक्त-७ देवता—अराति आ नो भर मा परि ष्ठा अराते मा नो रक्षीर्दक्षिणां नीयमानाम्. नमो वीत्सार्या असमृद्धये नमो अस्त्वरातये.. (१) हे अराति! हम को धन संपन्न बना. तू हमारे चारों ओर स्थित मत हो और हमारे द्वारा लाई गई दक्षिणा को प्रभावित मत कर. यह हवि हम दान हीनता की अधिष्ठात्री देवी को वृद्धि न होने की इच्छा से दे रहे हैं. यह तुझे प्राप्त हो. (१) यमराते पुरोधत्से पुरुषं परिरापिणम्. नमस्ते तस्मै कृण्मो मा वनिं व्यथयीर्मम.. (२) हे अराति! हम उस पुरुष को दूर से प्रणाम करते हैं, जो तुम्हारे सम्मुख रहता है एवं केवल बोलने वाला है, काम नहीं करता. तुम हमारी इस इच्छा को ठुकराना मत. (२) प्र णो वनिर्देवकृता दिवा नक्तं च कल्पताम्. अरातिमनुप्रेमो वयं नमो अस्त्वरातये.. (३)

हम में देवों की भक्ति रातदिन बढ़ती रहे. इसीलिए हम अराति की शरण में जाते हैं. अराति को नमस्कार हो. (३) सरस्वतीमनुमतिं भगं यन्तो हवामहे. वाचं जुष्टां मधुमतीमवादिषं देवानां देवहूतिषु.. (४) मैं देवों का आह्वान करने वाले यज्ञों में उस वाणी का उच्चारण करता हूं, जो उन्हें प्रसन्न करने वाली है. हम सब सरस्वती, अनुमति और भगदेव की शरण प्राप्त करते हैं और उन्हें बुलाते हैं. (४) यं याचाम्यहं वाचा सरस्वत्या मनोयुजा. श्रद्धा तमद्य विन्दतु दत्ता सोमेन बभ्रुणा.. (५) मन से उत्पन्न सरस्वती की वाणी के द्वारा मैं जिस वस्तु को पाने की प्रार्थना करता हूं, वह शक्तिशाली सोमदेव की श्रद्धा द्वारा दी हुई प्राप्त हो. (५) मा वनिं मा वाचं नो वीत्सीरुभाविन्द्राग्नी आ भरतां नो वसूनि. सर्वे नो अद्य दित्सन्तो ऽ रातिं प्रति हर्यत.. (६) हे अराति! तू हमारी वाणी और भक्ति को अवरुद्ध मत कर. इंद्र और अग्नि हमें धन प्रदान करें तथा वे इस समय हमारे शत्रुओं के अनुकूल न हों. (६) परो ऽ पेह्यसमृद्धे वि ते हेतिं नयामसि. वेद त्वाहं निमीवन्तीं नितुदन्तीमराते. (७) हे अराति! मैं जानता हूं कि तू दुर्बल बनाने वाला और पीड़ा देने वाला है. इस कारण तू मुझ से दूर रह. मैं तेरी विनाशक शक्ति को दूर कर सकता हूं. (७) उत नग्ना बोभुवती स्वप्रया सचसे जनम्. अराते चित्तं वीर्त्सन्त्याकूतिं पुरुषस्य च.. (८) हे अराति! तू मनुष्यों की कामनाओं को असफल करता है तथा उन्हें सदा प्रभाव के रूप में प्राप्त होता है. (८) या महती महोन्माना विश्वा आशा व्यानशे. तस्यै हिरण्यकेश्यै निर्ऋत्या अकरं नमः.. (९) असमृद्धि अर्थात् दरिद्रता हमारी सभी आशाओं को सीमित कर रही है. सुनहरे केशों वाली इस असमृद्धि को मैं नमस्कार करता हूं. (९) हिरण्यवर्णा सुभगा हिरण्यकशिपुर्मही. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-८ देवता—अग्नि

तस्यै हिरण्यद्रापये ऽ रात्य अकरं नमः.. (१०) यह सुनहरे रंग वाली पृथ्वी व्याप्ति के कारण हिरण्यकश्यप के वश में हो कर समृद्धहीन हो गई थी. यह असमृद्धि रमणीयता का विनाश करती है. मैं इस को नमस्कार करता हूं. (१०) सूक्त-८ देवता—अग्नि वैकङ्कतेनेध्मेन देवेभ्य आज्यं वह. अग्ने ताँ इह मादय सर्व आ यन्तु मे हवम्.. (१) हे अग्नि! तुम शक्तिशाली ओषधि के ईंधन से देवों के हेतु घृत का वहन करो. इस कर्म से तुम देवों को प्रसन्न करो. मेरे यह में सभी देव आएं. (१) इन्द्रा याहि मे हवमिदं करिष्यामि तच्छृणु. इम ऐन्द्रा अतिसरा आकूतिं सं नमन्तु मे. तेभिः शकेम वीर्यं १ जातवेदस्तनूवशिन्.. (२) हे इंद्र! मेरे इस यज्ञ में आओ और मैं जो स्तुति कर रहा हूं, उसे सुनो. सभी ऋत्विज् मेरी इच्छा के अनुसार कार्य करें. हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता इंद्र! जिन ऋत्विजों का मैं ने वर्णन किया है, उन के प्रयत्न से हम शक्तिशाली बनें. (२) यदसावमृतो देवा अदेवः संश्रिकीर्षति. मा तस्याग्निर्हव्यं वाक्षीद्भवं देवा अस्य मोप गुर्ममैव हवमेतन.. (३) हे देवगण! जो भक्तिहीन पुरुष यज्ञ करना चाहता है, उस के हव्य को अग्नि तुम्हारे पास तक न पहुंचाएं. देवगण उस भक्ति हीन पुरुष के यज्ञ में न जा कर मेरे यज्ञ में पधारें. (३) अति धावतार्तिसरा इन्द्रस्य वचसा हत. अविं वृक इव मथ्नीत स वो जीवन् मा मोचि प्राणमस्यापि नह्यत.. (४) हे मनुष्यो! तुम इंद्र के वचनों से वृद्धि प्राप्त करो और शत्रुओं का विनाश करो. तुम शत्रु को इस प्रकार मथो, जिस प्रकार भेड़िया भेड़ को मथता है. वह जीवित न रहने पाए. तुम उसे नष्ट कर दो. (४) यममी पुरोदधिरे ब्रह्माणमपभूतये. इन्द्र स ते अधस्पदं तं प्रत्यस्यामि मृत्यवे.. (५) हे इंद्र! इन शत्रुओं ने हमारी दुर्गति के निमित्त यज्ञ में जिसे अपना पुरोहित बनाया है, उस का अधःपतन हो जाए. मैं उसे मृत्यु के समीप फेंक रहा हूं. (५)

यदि प्रेयुर्देवपुरा ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे. तनूपानं परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि.. (६) हे देव! हमारे शत्रुओं ने तनुपान एवं परिपाण नामक कर्म के समय अपने मंत्रमय कवचों को सिद्ध कर लिया है. तुम इन कर्मों से संबंधित मंत्रों को असफल बनाओ. (६) यानसावतिसराँश्चकार कृणवच्च यान्. त्वं तानिन्द्र वृत्रहन् प्रतीचः पुनरा कृधि यथामुं तृणहां जनम्.. (७) हे वृत्र राक्षस का नाश करने वाले इंद्र! हमारे शत्रु ने जिन योद्धाओं को आगे की ओर बढ़ाया है, उन्हें तुम पीछे धकेल दो, जिस से मैं शत्रु की सेना का विनाश कर सकूं. (७) यथेन्द्र उद्वाचनं लब्ध्वा चक्रे अधस्पद्म्. कृण्वे ३ हमधरांस्तथामूञ्छश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (८) इंद्र ने जिस प्रकार स्तुति वचनों के श्रेष्ठ अस्त्र से अपने शत्रु को पराजित किया था, उसी प्रकार मैं इन शत्रुओं का तिरस्कार करता हूं. (८) अत्रैनानिन्द्र वृत्रहन्नुग्रो मर्मणि विध्य. अत्रैवैनानभि तिष्ठेन्द्र मेद्य१हं तव. अनु त्वेन्द्रा रभामहे स्याम सुमतौ तव.. (९) हे वृत्र को मारने वाले इंद्र! तुम उग्र बन कर इस युद्ध में मेरे शत्रु के मर्मस्थलों का वेध करो. मैं तुम्हारा स्नेहपात्र हूं, इसीलिए तुम मेरे इन शत्रुओं से युद्ध करो. मैं तुम्हारा अनुगामी हूं और भविष्य में भी तुम्हारी सुमति में रहूंगा. (९) सूक्त-९ देवता—वास्तोष्पति दिवे स्वाहा.. (१) द्युलोक के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (१) पृथिव्यै स्वाहा.. (२) पृथ्वी के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (२) अन्तरिक्षाय स्वाहा.. (३) आकाश के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (३) अन्तरिक्षाय स्वाहा.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

अंतरिक्ष अर्थात् धरती और आकाश के अधिष्ठाता देव के लिए यह हवि समर्पित है. (४) दिवे स्वाहा.. (५) द्युलोक अर्थात् स्वर्ग के अधिष्ठाता के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (५) पृथिव्यै स्वाहा.. (६) पृथ्वी के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (६) सूर्यो मे चक्षुर्वातः प्राणो ३ न्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम्. अस्तुतो नामाहमयमस्मि स आत्मानं नि दधे द्यावापृथिवीभ्यां गोपीथाय.. (७) वायु मेरे नेत्र हैं, वायु मेरा प्राण है, अंतरिक्ष के अधिष्ठाता देव मेरी आत्मा हैं और पृथ्वी मेरा शरीर है. मैं अमर अथवा मृत्युरहित नाम वाला हूं. हे द्यावा पृथ्वी! मैं अपनी आत्मा को सुरक्षा के निमित्त आपके सामने समर्पित करता हूं. (७) उदायुरुद् बलमृत् कृतमृत् कृत्यामुन्मनीषामुदिन्द्रियम्. आयुष्कृदायूष्पत्नी स्वधावन्तौ गोपा मे स्तं गोपायतं मा. आत्मसदौ मे स्तं मा मा हिंसिष्टम्.. (८) हे द्यावा पृथ्वी! तुम हमारी आयु, बल, कर्म, कृत्या, बुद्धि तथा इंद्रियों को उत्कृष्ट बनाओ. हे आयु बढ़ाने वाले, आयु की रक्षा करने वाले एवं स्व भासमान द्यावा पृथ्वी! तुम मेरी रक्षा करो! आप मेरी आत्मा में स्थित हो और कभी मेरी हिंसा न करें. (८) सूक्त-१० देवता—वास्तोष्पति अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा प्राच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (१) हे पत्थर के बने घर! तू मेरा है. जो पापी हत्यारा मुझे पूर्व दिशा की ओर से नष्ट करना चाहता है, वह नाश को प्राप्त हो. (१) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा दक्षिणाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (२) हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो हत्या करने का इच्छुक पापी दक्षिण दिशा से मुझे नष्ट करने का इच्छुक है, वह यहां आतेआते स्वयं नष्ट हो जाए. (२) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा प्रतीच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ebook converter DEMO Watermarks*

ऋच्छात्.. (३) हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो हत्या करने का इच्छुक पापी मुझे पश्चिम दिशा से नष्ट करना चाहता है, वह मेरे समीप आने से पहले ही नष्ट हो जाए. (३) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मोदीच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (४) हे पत्थर के बने घर! तू मेरा है. जो पापी मेरी हत्या करने की इच्छा से उत्तर दिशा से आता है, वह मेरे समीप आ कर नष्ट हो जाए. (४) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा ध्रुवाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (५) हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो पापी ध्रुव दिशा अर्थात् नीचे की ओर से मुझे नष्ट करने की इच्छा करता है, उस का नाश हो. (५) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा मोर्ध्वाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (६) हे पत्थर के घर! तू मेरा है. जो पापी मुझे ऊपर की दिशा से समाप्त करना चाहता है, उस का नाश हो. (६) अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा दिशामन्तर्देशेभ्यो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स ऋच्छात्.. (७) हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है जो पापी दिशाओं के कोनों से मेरा नाश करना चाहता है, उस का नाश हो. (७) बृहता मन उप ह्वये मातरिश्वना प्राणापानौ. सूर्याच्चक्षुरन्तरिक्षाच्छोत्रं पृथिव्याः शरीरम्. सरस्वत्या वाचमुप ह्वयामहे मनोयुजा.. (८) मैं चंद्रमा के मन का आह्वान करता हूं. मैं वायु से प्राण अपान की, सूर्य से नेत्र की, अंतरिक्ष से क्षेत्र की, पृथ्वी से शरीर की और सरस्वती से मन युक्त वाणी की प्रार्थना करता हूं. (८) सूक्त-११ देवता—वरुण कथं महे असुरायाब्रवीरिह कथं पित्रे हरये त्वेषनृम्णः. पृश्निं वरुण दक्षिणां ददावान् पुनर्मघ त्वं मनसाचिकिल्सीः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे शक्तिशाली वरुण! तुम ने जगत् के पालन करने वाले सूर्य से क्या कहा था? तुम सूर्य को दक्षिणा देते हो एवं मन से चिकित्सा करते हो. (१) न कामेन पुनर्मघो भवामि सं चक्षे कं पृश्निमेतामुपाजे. केन नु त्वमथर्वन् काव्येन केन जातेनासि जातवेदाः.. (२) मैं इच्छा मात्र से ही संपत्तिशाली नहीं बन गया हूं, अपितु सूर्य देव से प्रार्थना करता हूं. मैं यह सुख प्राप्त करता रहूं. हे ऋत्विज्! तुम किस विद्या और चातुर्य के द्वारा सभी जन्म लेने वालों के ज्ञाता बन गए हो? (२) सत्यमहं गभीरः काव्येन सत्यं जातेनास्मि जातवेदाः. न मे दासो नार्यो महित्वा व्रतं मीमाय यदहं धरिष्ये.. (३) यह सत्य बात है कि मैं काव्य अर्थात् अथर्व के द्वारा प्राप्त चतुरता से ज्ञानी बन गया हूं तथा अग्नि के समान सब का मार्गदर्शन करता हूं. मैं जिस व्रत को धारण करूंगा, उसे कोई भंग नहीं कर सकता. (३) न त्वदन्यः कवितरो न मेधया धीरतरो वरुण स्वधावन्. त्वं ता विश्वा भुवनानि वेत्थ स चिन्नु त्वज्जनो मायी बिभाय.. (४) हे स्वधा वाले वरुण! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी दूसरा विद्वान् मेधावी और वीर नहीं है. तुम सभी भुवनों को जानते हो, इसलिए सब लोग तुम से भयभीत रहते हैं. (४) त्वं ह्य १ ङ्ग वरुण स्वधावन् विश्वा वेत्थ जनिमा सुप्रणीते. किं रजस एना परो अन्यदस्त्येना किं परेणावरममुर.. (५) हे सुधा के पात्र एवं नीति पालक वरुण! तुम प्राणियों के सभी जन्मों को जानते हो. तुम सभी से मोह रखते हो. इस रजोगुण युक्त धन से श्रेष्ठ कौन सी वस्तु है. इस से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है. (५) एकं रजस एना परो अन्यदस्त्येना पर एकेन दुर्णशं चिदर्वाक्. तत् ते विद्वान् वरुण प्र ब्रवीम्यधोवचसः पणयो भवन्तु नीचैर्दासा उप सर्पन्तु भूमिम्.. (६) इस रजोगुण युक्त धन से श्रेष्ठ गुण युक्त धन है. सतोगुण युक्त से श्रेष्ठ ब्रह्म है. हे वरुण देव! तुम इस विषय के जानने वाले हो, इसलिए मैं तुम से निवेदन करता हूं कि बुरा व्यवहार करने वाले लोग मेरे सामने निकृष्ट वचन न बोलें और दास जन झुक कर चलें. (६) त्वं ह्य १ ङ्ग वरुण ब्रवीषि पुनर्मघेष्ववद्यानि भूरि. मो षु पर्णीँ रभ्ये ३ तावतो भून्मा त्वा वोचन्नराधसं जनासः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे वरुण देव! तुम बारबार धन प्राप्ति के अवसरों के विषय में बताते हो. तुम इन व्यवहार करने वालों की उपेक्षा मत करो. अन्यथा ये तुम्हें धनहीन समझने लगेंगे. (७) मा मा वोचन्नराधसं जनासः पुनस्ते पृश्निं जरितर्ददामि. स्तोत्रं मे विश्वमा याहि शचीभिरन्तर्विश्वाुसु मानुषीषु दिक्षु.. (८) लोग बारबार तुम्हें धनहीन अथवा कंजूस न समझ लें, इसलिए मैं तुम्हें यह थोड़ा सा धन भेंट करता हूं. मेरी इच्छा है कि तुम्हारी यह स्तुति सारे संसार में फैल जाए और सभी दिशाओं में मनुष्य इसे गाएं. (८) आ ते स्तोत्राण्युद्यतानि यन्तून्वन्तर्विश्वा्सु मानुषीषु दिक्षु. देहि नु मे यन्मे अदत्तो असि युज्यो मे सप्तपदः सखासि.. (९) हे वरुण! मनुष्यों से युक्त सभी दिशाओं में तुम्हारी स्तुतियां फैल जाएं. तुम मुझे यह वस्तु दो जो अब तक नहीं दी है. तुम मेरे सप्तदा अर्थात् सात कदम साथ चलने वाले सखा हो. (९) समा नौ बन्धुर्वरुण समा जा वेदाहं तद्यन्नावेषा समा जा. ददामि तद् यत् ते अदत्तो अस्मि युज्यस्ते सप्तपदः सखास्मि.. (१०) हे बंधु वरुण! हम और तुम दोनों समान हैं. हमारी संतान भी समान हो. इन बातों को मैं जानता हूं. मैं ने तुम्हें अब तक जो नहीं दिया है, वह अब दे रहा हूं. मैं तुम्हारा सप्तदा सखा हूं. (१०) देवो देवाय गृणते वयोधा विप्रो विप्राय स्तुवते सुमेधाः. अजीजनो हि वरुण स्वधावन्नथर्वाणं पितरं देवबन्धुम्. तस्मा उ राधः कृणुहि सुप्रशस्तं सखा नो असि परमं च बन्धुः.. (११) हे अन्नधारक वरुण देव! देवगण देवों की स्तुति करते हैं तथा बुद्धिमान ब्राह्मण ब्राह्मणों की स्तुति करते हैं. हे सुधा के पात्र वरुण! तुम ने देवों को बंधु एवं हमारे पिता के समान अथर्व को जानने वाले को उत्पन्न किया है. तुम मुझे श्रेष्ठ धन में स्थापित करो. तुम हमारे सब से बड़े बंधु एवं सखा हो. (११) सूक्त-१२ देवता—अग्नि समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान् यजसि जातवेदः. आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान् त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः.. (१) हे उत्पन्न हुओं को जानने वाले अग्नि! तुम आज मनुष्य के यज्ञ में प्रज्वलित हुए हो और देवों का यजन कर रहे हो. तुम मित्रों की पूजा करने वाले एवं ज्ञाता हो. तुम देवों का आह्वान ebook converter DEMO Watermarks*

करो. तुम देवों के दूत, ज्ञानवान और क्रांतदर्शी हो. (१) तनूनपात् पथ ऋतस्य यानान् मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व. मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन् देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः.. (२) हे शरीररक्षक एवं उत्तम जिह्वा वाले अग्नि! तुम सत्यलोक को प्राप्त कराने वाले मार्गों को मधुर बना कर उन का आस्वादन करो एवं मेरे यज्ञ को बढ़ाते हुए इसे देवों को प्राप्त कराओ. (२) आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्च याह्यग्ने वसुभिः सजोषाः. त्वं देवानामासि यह्व होता स एनान् यक्षीषितो यजीयान्.. (३) हे अग्नि! तुम पूज्य व वंदना करने योग्य हो. तुम में भलीभांति हवन किया जाता है. हमारे इस यज्ञ कर्म में तुम वसुओं के सहित आओ. तुम देवों के होता हो. तुम हमारी प्रेरणा से देवों की पूजा करो. (३) प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्. व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्.. (४) वेदी रूपी भूमि को ढकने वाले आह्वनीय अग्नि पूर्वाह्न में विस्तृत होते हैं. अग्नि अन्य ज्योतियों की अपेक्षा श्रेष्ठ, धनवान तथा पृथ्वी को सुख देने वाले हैं. (४) व्यचस्वतीरुरुविया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः. देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः.. (५) अग्नि की ज्वाला हवि को वहन करने वाली और व्याधियों को रोकने वाली है. इस कारण वह द्वार के समान है. हे अग्नि की प्रकाशमान ज्वाला! जिस प्रकार स्त्रियां पतियों का आदर करती है, उसी प्रकार तुम देवों को सुख देने वाली बनो. तुम हवि को व्याप्त करने वाली हो. (५) आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ. दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रियं शुक्रपिशं दधाने.. (६) अग्नि की दीप्ति उषा और यज्ञ की दीप्ति से युक्त है. वह यज्ञों का संपादन करती एवं देवों से संयुक्त होती है. वह दिव्य, परस्पर मिलने वाली एवं उत्तम दीप्ति यजमान के हेतु अग्नि की स्थापना करे. (६) दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै. प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७)