भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

उपस्थित हो कर मैं रोग निवारण की प्रार्थना करता हूं. (१) त्रायन्तामिमं पुरुषं यक्ष्माद् देवेषितादधि. यासां द्यौष्पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव.. (२) पृथ्वी जिन की माता, आकाश जिन का पिता और सागर जिन का मूल है, वे जड़ीबूटियां दुर्भाग्य के कारण उत्पन्न इस राजयक्ष्मा रोग से इस पुरुष की रक्षा करें. (२) आपो अग्रं दिव्या ओषधयः. तास्ते यक्ष्ममेनस्य१मङ्गादङ्गादनीनशन्.. (३) हे रोगी पुरुष! जो पवित्र जल और दिव्य जड़ीबूटियां हैं, वे तेरे शरीर के प्रत्येक अंग से यक्ष्मा रोग का विनाश कर दें. (३) प्रस्तृणती स्तम्बिनीरेकशृङ्गाः प्रतन्वतीरोषधीरा वदामि. अंशुमतीः काण्डिनीर्या विशाखा ह्वयामि ते वीरुधो वैश्वदेवीरुग्राः पुरुषजीवनीः... (४) हे यक्ष्मा रोग से ग्रसित पुरुष! मैं तेरे स्वास्थ्य लाभ के निमित्त फैली हुई, बहुत सी टहनियों वाली, एक टहनी वाली, गांठों वाली, पत्तियों वाली, शाखाओं से रहित एवं नसों वाली जो जड़ीबूटियां तुझे जीवन देने वाली हैं, उन सभी अत्यधिक प्रभावशालिनी एवं समस्त देवों के निवास वाली जड़ीबूटियों को तेरे लिए ग्रहण करता हूं. (४) यद् वः सहः सहमाना वीर्यं १ यच्च वो बलम्. तेनेममस्माद् यक्ष्मात् पुरुषं मुञ्चतौषधीरथो कृणोमि भेषजम्.. (५) हे रोगों का विनाश करने वाली जड़ीबूटियों! तुम में जो रोग नाश करने वाली शक्ति, वीर्य और बल है, उस के द्वारा इस पुरुष की यक्ष्मा रोग से रक्षा करो. मैं सभी ओषधियों को मंत्रों से युक्त बनाता हूं. (५) जीवलां नघारिषां जीवन्तीमोषधीमहम्. अरुन्धतीमुन्नयन्तीं पुष्पां मधुमतीमिह हुवे ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (६) कल्याण के निमित्त मैं जीवन देने वाली एवं क्रोध न करने वाली जीवंती एवं अरुंधती नामक जड़ी बूटियों का आह्वान करता हूं. ये जड़ीबूटियां ऊपर की ओर बढ़ने वाली, पुष्पों से युक्त एवं मधु सहित हैं. (६) इहा यन्तु प्रचेतसो मेदिनीर्वर्चसो मम. यथेमं पारयामसि पुरुषं दुरितादधि.. (७) मेरे मंत्रों के प्रभाव से चेतनायुक्त जड़ीबूटियां यहां आएं तथा इस रोग के कारण रूप ebook converter DEMO Watermarks*

पाप का विनाश करें. (७) अग्नेर्घासो अपां गर्भो या रोहन्ति पुनर्णवाः. ध्रुवाः सहस्रनाम्नीर्भेषजीः सन्त्वाभृताः.. (८) जो जड़ीबूटियां जल का गर्भ हैं, अग्नि का भोजन हैं तथा बारबार उगने के कारण नवीन रहती हैं, इस प्रकार की हजारों नाम वाली जड़ीबूटियां नित्य यहां लाई जाएं. (८) अवकोल्बा उदकात्मान ओषधयः. व्युषन्तु दुरितं तीक्ष्णशृङ्ग्यः.. (९) जो जड़ीबूटियां सिवार घास का गर्भ हैं और जल जिन का जीवन है, बारबार उगने के कारण जो सदा नवीन रहती हैं, वे रोगों के कारण रूप पापों का नाश करें. उन ओषधियों के पत्ते अथवा कांटे नोकीली सींक के समान हैं. (९) उन्मुञ्चन्तीर्विवरुणा उग्रा या विषदूषणीः. अथो बलासनाशनीः कृत्यादूषणीश्च यास्ता इहा यन्त्वोषधीः.. (१०) जलोदर रोग का विनाश करने वाली, विष को शांत करने वाली, खांसी आदि रोगों पर प्रभावशालिनी तथा जो कृत्या नामक पाप देवता को दूर भगाने वाली हैं, वे जड़ीबूटियां यहां लाई जाएं. (१०) अपक्रीताः सहीयसीर्वीरुधो या अभिष्टुताः. त्रायन्तामस्मिन् ग्रामे गामश्वं पुरुषं पशुम्.. (११) हमारे द्वारा लाई गई, रोगों का विनाश करने में समर्थ एवं मंत्रों द्वारा प्रभावित जो जड़ीबूटियां हैं, वे इस गांव के मनुष्यों और पशुओं की रक्षा करें. (११) मधुमन्मूलं मधुमदग्रमासां मधुमन्मध्यं वीरुधां बभूव. मधुमत् पर्णं मधुमत् पुष्पमासां मधोः संभक्ता अमृतस्य भक्षो घृतमन्नं दुहतां गोपुरोगवम्.. (१२) जिन वृक्षों की जड़, ऊपर का भाग एवं मध्य भाग मधुरता पूर्ण हैं, जिन के पत्ते एवं फूल मधु से भरे हुए हैं, जो मधु से भलीभांति पूर्ण हैं, उन का सेवन करने वाला अमृत का सेवन करता है. वह स्वस्थ रहता हुआ गायों से घृत तथा अन्न प्राप्त करता है. (१२) यावतीः कियतीश्चेमाः पृथिव्यामध्योषधीः. ता मा सहस्रपर्ण्यो मृत्योर्मुञ्चन्त्वंहसः.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

पृथ्वी पर जितनी भी हजार पत्तों वाली जड़ीबूटियां हैं, वे मुझे मृत्यु एवं पाप से बचाएं. (१३) वैयाघ्रो मणिवीरुधां त्रायमाणो ऽ भिशस्तिपाः. अमीवाः सर्वा रक्षांस्यप हन्त्वधि दूरमस्मत्.. (१४) वृक्षों से निर्मित वैयाघ्र मणि रक्षक एवं पवित्र करने वाली है. वह सभी रोगों और राक्षसों को हम से दूर करे. (१४) सिंहस्येव स्तनथोः सं विजन्ते ऽ ग्नेरिव विजन्त आभूताभ्यः. गवां यक्ष्मः पुरुषाणां वीरुद्भिरतिनुत्तो नाव्या एतु स्रोत्याः.. (१५) जिस प्रकार सिंह की गर्जना से प्राणी भयभीत होते हैं एवं प्रज्वलित अग्नि से सभी जीव व्याकुल हो कर भागते हैं, उसी प्रकार हमारे गौ आदि पशुओं तथा पुत्र, पौत्र आदि मनुष्यों का यक्ष्मा रोग नदियों को पार कर बहुत दूर चला जाए. (१५) मुमुचाना ओषधयो ऽ ग्नेर्वैश्वानरादधि. भूमिं संतन्वतीरित यासां राजा वनस्पतिः.. (१६) जो ओषधियां धरती को आच्छादित किए हुए हैं और वनस्पति जिन के राजा हैं, वैश्वानर अग्नि से भी अधिक प्रभाव वाली वे ओषधियां हमें रोगों से मुक्त करती हैं. (१६) या रोहन्त्याङ्गिरसीः पर्वतेषु समेषु च. ता नः पयस्वतीः शिवा ओषधीः सन्तु शं हृदे.. (१७) अंगिरा ऋषि द्वारा बताई गई जो जड़ीबूटियां ऊंचे पर्वतों पर एवं समतल मैदानों में उत्पन्न होती हैं, वे दूध के समान सार वाली जड़ीबूटियां हमारे लिए कल्याणकारिणी हों एवं हमारे हृदयों को शांति प्रदान करें. (१७) याश्चाहं वेद वीरुधो याश्च पश्यामि चक्षुषा. अज्ञाता जानीमश्च या यासु विद्म च संभृतम्.. (१८) जिन वृक्षों को मैं जानता हूं, जिन को मैं अपनी आंखों से देख सकता हूं और जिन को मैं नहीं जानता, वे सभी रोग विनाश में समर्थ हैं. (१८) सर्वाः समग्रा ओषधीर्बोधन्तु वचसो मम. यथेमं पारयामसि पुरुषं दुरितादधि.. (१९) सभी जड़ीबूटियां मेरी स्तुतियों का अभिप्राय संपूर्ण रूप से जान लें तथा मुझे इस योग्य बना दें कि मैं इस रोगी पुरुष को रोग रूपी पाप से उस पार पहुंचा सकूं. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*

अश्वत्थो दर्भो वीरुधां सोमो राजा ऽ मृतं हविः. व्रीहिर्यवश्च भेषजौ दिवस्पुत्रावमर्त्यौ.. (२०) वृक्षों का गर्भ पीपल, राजा सोम और अमृत हवि हैं. धान और जौ नामक फसलें आकाश से होने वाली वर्षा से उत्पन्न होने के कारण आकाश की संतान तथा अमर हैं. (२०) उज्जिहीध्वे स्तनयत्यभिक्रन्दत्योषधीः. यदा व पृश्निमातरः पर्जन्यो रेतसा ऽ वति.. (२१) जड़ीबूटियां बिजली की कड़क से और बादलों के गर्जन से जीवित रहती हैं. वायु और मेघ वर्षा रूपी जीवन से जड़ीबूटियों की रक्षा करते हैं. (२१) तस्यामृतस्येमं बलं पुरुषं पाययामसि. अथो कृणोमि भेषजं यथा ऽ सच्छतहायनः.. (२२) जड़ीबूटियों के अमृत रूपी बल को मैं रोगी पुरुष को पिलाता हूं. मैं इस की चिकित्सा इस प्रकार करता हूं कि यह रोगी पुरुष सौ वर्ष की अवस्था प्राप्त करे. (२२) वराहो वेद वीरुधं नकुलो वेद भेषजीम्. सर्पा गन्धर्वा या विदुस्ता अस्मा अवसे हुवे.. (२३) सुअर जिन वृक्षों को जानता है और नेवला जिन जड़ीबूटियों से परिचित है तथा सांप और गंधर्व जिन्हें जानते हैं, उन जड़ीबूटियों को मैं इस रोगी पुरुष की रक्षा के लिए बुलाता हूं. (२३) याः सुपर्णा आङ्गिरसीर्दिव्या या रघटो विदुः. वयांसि हंसा या विदुर्याश्च सर्वे पतत्रिणः. मृगा या विदुरोषधीस्ता अस्मा अवसे हुवे.. (२४) जिन सुंदर पत्तों वाली जड़ीबूटियों का अंगिरा ऋषि ने रोगियों पर प्रयोग किया, रमद्रुट जिन दिव्य जड़ीबूटियों को जानते थे, हंस एवं अन्य सभी पक्षी जिन जड़ीबूटियों से परिचित हैं तथा हरिण जिन जड़ीबूटियों को जानते हैं, उन सभी जड़ीबूटियों को मैं इस रोगी पुरुष की चिकित्सा के लिए बुलाता हूं. (२४) यावतीनामोषधीनां गावः प्राश्नन्त्यघ्न्या यावतीनामजावयः. तावतीस्तुभ्यमोषधीः शर्म यच्छन्त्वाभृताः.. (२५) हे रोगी पुरुष! हिंसा के अयोग्य गाएं जितनी जड़ीबूटियों को खाती हैं और बकरियां या भेड़ें जिन जड़ीबूटियों को चरती हैं, मेरे द्वारा लाई गई वे सभी जड़ीबूटियां तेरा कल्याण करें. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

यावतीषु मनुष्या भेषजं भिषजो विदुः. तावतीर्विश्वभेषजीरा भरामि त्वामभि.. (२६) हे रोगी पुरुष! वैद्य जितनी भी जड़ीबूटियों को ओषधि के रूप में जानते हैं, उन समस्त जड़ीबूटियों को मैं तेरी चिकित्सा के लिए लाता हूं. (२६) पुष्पवतीः प्रसूमतीः फलिनीरफला उत. संमातर इव दुहामस्मा अरिष्टतातये... (२७) फूलों वाली, अंकुर उत्पन्न करने वाली, फल वाली और बिना फल वाली जो जड़ीबूटियां हैं, मैं इस रोगी पुरुष के कल्याण के लिए उन सब का प्रयोग इस प्रकार करता हूं, जिस प्रकार माता बालक को दूध पिलाती है. (२७) उत् त्वाहार्षं पञ्चशलादथो दशशलादुत. अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात्.. (२८) हे रोगी पुरुष! मैं ने पंच शलाका एवं दस शलाका वाली, काठ के चरण बंधन से यमराज के पाश से तथा सभी पापों से छुड़ा कर तुझे प्राप्त कर लिया है. (२८) सूक्त-८ देवता—इंद्र इन्द्रो मन्थतु मन्थिता शक्रः शूरः पुरंदरः. यथा हनाम सेना अमित्राणां सहस्रशः.. (१) शत्रुओं का दलन करने वाले, शक्तिशाली, वीर एवं विरोधियों के नगरों को उजाड़ने वाले इंद्र इस यज्ञ में अरणि मंथन कर के अग्नि प्रज्वलित करें, जिस के प्रभाव से हम अपने शत्रुओं की हजारों सैनिकों वाली सेनाओं का विनाश कर सकें. (१) पूतिरज्जुरुपध्मानी पूतिं सेनां कृणोत्वमूम्. धूममग्निं परादृश्या ऽ मित्रा हृत्स्वा दधतां भयम्.. (२) अग्नि में गिरने वाली पुरानी रस्सी शत्रु की सेना को शक्तिहीन करे. इस यज्ञ अग्नि का धुआं देख कर ही शत्रु भयभीत हों और अपना धन छोड़ कर भाग जाएं. (२) अमूनश्वत्थ निः शृणीहि खादामून् खदिराजिरम्. ताजद्भङ्गा इव भज्यन्तां हन्त्वेनान् वधको वधैः.. (३) हे पीपल के वृक्ष! तुम इन शत्रुओं को समाप्त करो. हे खैर के वृक्ष तुम इन सभी गमनशील शत्रुओं को खा डालो. शत्रु अरंडी के वृक्ष के समान टूट जाएं. तुम अपने काष्ठ के प्रहार से इन का वध करो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

परुषानमून॒ परुषाङ्गः कृणोतु हन्त्वेनान् वधको वधैः. क्षिप्रं शर इव भज्यन्तां बृहज्जालेन संदिताः.. (४) परुष नाम का काठ इन शत्रुओं को कठोर अर्थात् गतिहीन बनाए तथा वधक नाम का काठ अपने प्रहारों से इन का वध करे. वृहत् जाल से टूटने वाले बाणों के समान ये शत्रु भी शीघ्र टूट जाएं. (४) अन्तरिक्षं जालमासीज्जालदण्डा दिशो महीः. तेनाभिधाय दस्यूनां शक्रः सेनामपावपत्.. (५) इंद्र ने आकाश का जाल बनाया और पृथ्‍वी की दिशाओं को डंडा बना कर उसे ताना. इंद्र ने राक्षसों की सेनाओं को ललकार कर इसी जाल से नष्ट कर दिया. (५) बृहद्धि जालं बृहतः शक्रस्य वाजिनीवतः. तेन शत्रूनभि सर्वान् न्युब्ज यथा न मुच्यातै कतमश्चनैषाम्.. (६) सेनापति इंद्र का आकाशरूपी जाल अत्यधिक विशाल है. हे इंद्र! इस जाल में फंसा कर शत्रुओं को इस प्रकार मारो कि उन में से एक भी न बचे. (६) बृहत् ते जालं बृहत इन्द्र शूर सहस्रार्घस्य शतवीर्यस्य. तेन शतं सहस्रमयुतं न्यर्बुदं जघान शक्रो दस्यूनामभिधाय सेनया.. (७) हे सूर्य एवं इंद्र! तुम्हारा जाल विशाल है. तुम हजार के आधे अर्थात् पांच सौ सैनिकों के स्वामी हो, जिन में से प्रत्येक सौ मनुष्यों के समान शक्तिशाली है. शक्तिशाली इंद्र ने ललकार कर अपनी सेना की सहायता से राक्षसों के सौ हजार, दस हजार एवं एक अरब सैनिकों को अंधकार से ढक दिया था. (७) अयं लोको जालमासीच्छक्रस्य महतो महान्. तेनाहमिन्द्रजालेनामूंस्तमसाभि दधामि सर्वान्.. (८) यह विशाल लोक ही महान इंद्र का जाल था. मैं इंद्र के इसी जाल की सहायता से इन सभी शत्रुओं को अंधकार से ढकता हूं. (८) सेदिरुग्रा व्यृद्धिरार्तिश्चानपवाचना. श्रमस्तन्द्रीश्च मोहश्च तैरमूनभि दधामि सर्वान्.. (९) मैं सुस्ती, व्याकुलता, धनहीनता, दुःख, वचन का अभाव, थकान, तंद्रा और बेहोशी के द्वारा इन सभी शत्रुओं को आच्छादित करता हूं. (९) मृत्यवे ऽ मून॒ प्र यच्छामि मृत्युपाशैरमी सिताः. ebook converter DEMO Watermarks*

मृत्योर्ये अघला दूतास्तेभ्य एनान् प्रति नयामि बद्ध्वा.. (१०) ये शत्रु मृत्यु के पाशों से बंध चुके हैं, इसलिए मैं इन्हें मृत्यु को देता हूं. मैं इन्हें बांध कर मृत्यु के शक्तिशाली दूतों की ओर ले जाता हूं. (१०) नयतामूनन् मृत्युदूता यमदूता अपोम्भत. परः सहस्रा हन्यन्तां तणेढ्वेनान् मत्यं भवस्य.. (११) हे मृत्यु दूतो! इन शत्रु सैनिकों को ले जाओ. हे यमदूतो! इन का विनाश करो. जिस प्रकार तिनका तोड़ देते हैं, उसी प्रकार इन हजारों से अधिक राक्षसों का वध करो. (११) साध्या एकं जालदण्डमुद्यत्य यन्त्वोजसा. रुद्रा एकं वसव एकमादित्यैरेक उद्यतः.. (१२) साध्य देवता जाल के एक डंडे को पकड़ कर शत्रुओं पर बल से आक्रमण कर रहे हैं. जाल के शेष तीन डंडों में से एक को रुद्र ने, दूसरे को वसु ने और तीसरे को आदित्य ने उठा लिया है. (१२) विश्वे देवा उपरिष्टादुब्जन्तो यन्त्वोजसा. मध्येन घ्नन्तो यन्तु सेनामङ्गिरसो महीम्.. (१३) विश्वे देव अपने बल के द्वारा ऊपर से मारते हुए जाएं. अंगिरा के पुत्र सेना के मध्य भाग का विनाश करते हुए जाएं. (१३) वनस्पतीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः. द्विपाच्चतुष्पादिष्णामि यथा सेनाममूं हनन्.. (१४) मैं अपने मंत्र बल से वनस्पतियों को, वनस्पतियों से बनी हुई ओषधियों को, वृक्षों को, दो चरणों वाले मनुष्यों को प्रेरित करता हूं, जिस से वे शत्रु सेना का विनाश कर सकें. (१४) गन्धर्वाप्सरसः सर्पान् देवान् पुण्यजनान् पितॄन्. दृष्टानदृष्टानिष्णामि यथा सेनाममूं हनन्.. (१५) मैं गंधर्वों, अप्सराओं, सर्पों, देवों, पवित्रजनों, पितरों तथा देखे और बिना देखे हुए प्राणियों को अपने मंत्र बल से प्रेरित करता हूं कि वे शत्रु सेना को मार डालें. (१५) इम उप्ता मृत्युपाशा यानाक्रम्य न मुच्यसे. अमुष्या हन्तु सेनाया इदं कूटं सहस्रशः.. (१६) हे शत्रु! मैं ने ये मृत्युपाश फैला दिए हैं. तू इन को पार कर के छूट नहीं सकता. यह कूट इस शत्रु सेना का हजारों की संख्या में संचार करे. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

घर्मः समिद्धो अग्निनायं होमः सहस्रहः. भवश्च पृश्निबाहुश्च शर्व सेनाममूं हतम्.. (१७) धूप चढ़ी हुई है और यह होम अग्नि के कारण हजार गुना बढ़ चुका है. हे भव! पृश्निबाहु और सर्व नामक देवो! इस शत्रु सेना का संहार करो. (१७) मृत्योराषमा पद्यन्तां क्षुधं सेदिं वधं भयम्. इन्द्रश्चाक्षुजालाभ्यां शर्व सेनाममूं हतम्.. (१८) ये शत्रु भूख, दरिद्रता, वध और भय के कारण मृत्यु के मुख में चले जाएं. हे इंद्र और शर्व अक्ष और जालों के द्वारा इस शत्रु सेना का संहार करो. (१८) पराजिताः प्र त्रसतामित्रा नुत्ता धावत ब्रह्मणा. बृहस्पतिप्रणुत्तानां मामीषां मोचि कश्चन.. (१९) हे शत्रुओ! तुम हमारे मंत्र बल से पराजित, भयभीत एवं दलित हो कर यहां से भाग जाओ. बृहस्पति के द्वारा मंत्र बल से प्रभावित इन में से एक भी न बचे. (१९) अव पद्यन्तामेषामायुधानि मा शकन् प्रतिधामिषुम्. अथैषां बहु बिभ्यतामिषवो घ्नन्तु मर्मणि.. (२०) इन शत्रुओं के आयुध न उठ सकें. इन के हाथ बाण चलाने में समर्थ न हों. इन अत्यधिक भयभीत शत्रुओं के मर्मस्थलों को हमारे बाण बींध दें. (२०) सं क्रोशतामेनान् द्यावापृथिवी समन्तरिक्षं सह देवताभिः. मा ज्ञातारं मा प्रतिष्ठां विदन्त मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्.. (२१) छाया, पृथ्वी एवं आकाश सभी देवों के साथ इन शत्रुओं को शाप दें. ये शत्रु अथर्ववेद के किसी विद्वान् का आश्रय न ले सकें और प्रतिष्ठा को प्राप्त न करें. ये एकदूसरे के प्रति विद्वेष करते हुए मृत्यु को प्राप्त हों. (२१) दिशश्चतस्रो ऽ श्वतर्यो देवरथस्य पुरोडाशाः शफा अन्तरिक्षमुद्धिः. द्यावापृथिवी पक्षसी ऋतवो ऽ भीशवो ऽ न्तर्देशाः किंकरा वाक् परिरथ्यम्.. (२२) चारों दिशाएं, अग्नि देव के रथ की चार अश्वतरियां अर्थात् खच्चरियां हैं. यज्ञ का पुरोडाश उन खच्चरियों का सुम है तथा अंतरिक्ष उन का निवास स्थान है. धरती और आकाश के बीच का भाग बाण और वाणी उस रथ को हांकने वाला सारथी है. (२२) संवत्सरो रथः परिवत्सरो रथोपोस्थो विराडीषाग्नी रथमुखम्. ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्रः सव्यष्ठाश्चन्द्रमाः सारथिः.. (२३) संवत्सर अग्नि देव का रथ, परिवत्सर उस का पिछला भाग, विराट् लगाम और अग्नि मुख तथा चंद्रमा उस का सारथी है. इंद्र इन की बाईं ओर बैठते हैं. (२३) इतो जयेतो वि जय सं जय जय स्वाहा. इमे जयन्तु परामी जयन्तां स्वाहैभ्यो दुराहा ऽ मीभ्यः. नीललोहितेनामूनभ्यवतनोमि.. (२४) हे राजन्! इधर से, उधर से एवं सभी ओर से आप की शोभन जय हो. इन मित्रों की विजय के लिए यह आहुति उत्तम हो. आप के शत्रु हार जाएं और मित्र विजयी हों. मैं नीले और लाल डोरों से इन शत्रुओं को लपेटता हूं. यह आहुति मित्रों के लिए कल्याणकारी और शत्रुओं के लिए हानिकारक हो. (२४) सूक्त-९ देवता—मंत्र में बताए गए कुतस्तौ जातौ कतमः सो अर्धः कस्माल्लोकात् कतमस्याः पृथिव्याः. वत्सौ विराजः सलिलादुदैतां तौ त्वा पृच्छामि कतरेण दुग्धा.. (१) विराट् के दोनों वत्स कहां से उत्पन्न हुए? उन में से एक किसी लोक से उत्पन्न हुआ. उन में से पृथ्वी से कौन सा वत्स उत्पन्न हुआ? विराट् के दोनों वत्स जल से निकले. मैं तुम से पूछता हूं कि तुम ने इन्हें किस प्रकार समझा है. (१) यो अक्रन्दयत् सलिलं महित्वा योनिं कृत्वा त्रिभुजं शयानः. वत्सः कामदुघो विराजः स गुहा चक्रे तन्वः पराचैः.. (२) जिस ने जल को महत्त्व देते हुए, क्रंदन किया और जल को त्रिभुज बना कर सोता रहा. विराट् का यह वत्स अभिलाषा पूर्ण करने वाला है. उस ने दूसरों के शरीर को अपनी गुफा बनाया है. (२) यानि त्रीणि बृहन्ति येषां चतुर्थं वियुनक्ति वाचम्. ब्रह्मैतद् विद्यात् तपसा विपश्चिद् यस्मिन्नेकं युज्यते यस्मिन्नेकम्.. (३) इन में से तीन बृहती एवं महत्त्वपूर्ण हैं तथा चौथी वाणी है. विद्वान् ब्रह्मा ने इस वाणी को तपस्या के द्वारा जाना. एकाकी रहने वाला ही इन में से एक को जान सकता है. (३) बृहतः परि सामानि षष्ठात् पञ्चाधि निर्मिता. बृहद् बृहत्या निर्मितं कुतो ऽ धि बृहती मिता.. (४) बृहती से पांच सोम निर्मित हुए. इन में छठे से पांच का निर्माण हुआ. अर्थात् ब्रह्म से ebook converter DEMO Watermarks*

पांच तत्त्व—पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश की उत्पत्ति हुई. बृहत् बृहती से उत्पन्न हुआ तो बृहती निर्मित कैसे हुई? (४) बृहती परि मात्रया मातुर्मात्राधि निर्मिता. माया ह जज्ञे मायाया मायाया मातली परि.. (५) बृहती मात्राओं अर्थात् पंचतन्मात्राओं से बढ़ कर है, क्योंकि पंच तन्मात्राएं अपनी माता प्रकृति से जन्मती हैं. ये माया से ही उत्पन्न हुईं. इस प्रकार मातली माया से महान है. (५) वैश्वानरस्य प्रतिमोपरि द्यौर्यावद् रोदसी विबबाधे अग्निः. ततः षष्ठादामुतो यन्ति स्तोमा उदितो यन्त्यभि षष्ठमह्नः.. (६) यह द्यौ वैश्वानर अग्नि पर ही स्थित है. धरती और आकाश जहां तक हैं, वहीं तक अग्नि देव बाधा पहुंचा सकते हैं. दिन के छठे भाग से स्तोत उत्पन्न हुआ. उस छठे भाग से ये आते हैं. (६) षट् त्वा पृच्छाम ऋषयः कश्यपेमे त्वं हि युक्तं युयुक्षे योग्यं च. विराजमाहुर्ब्रह्मणः पितरं तां नो वि धेहि यतिधा सखिभ्यः.. (७) हे कश्यप ऋषि! आप युक्त और योग्य को संयुक्त करते हैं. हम छः ऋषि तुम से पूछते हैं कि विराट् को ब्रह्म का पिता क्यों कहा जाता है. इन सखाओं को उस ब्रह्म का उपदेश करो. (७) यां प्रच्युतामनु यज्ञाः प्रच्यवन्त उपतिष्ठन्त उपतिष्ठमानाम्. यस्या व्रते प्रसवे यक्षमेजति सा विरादृषयः परमे व्योमन्.. (८) जिस के अनुपस्थित होने पर यज्ञ नहीं होते तथा जिस के उपस्थित होने पर यज्ञ का अनुष्ठान होता है, जिस से संबंधित व्रत होने पर यज्ञ प्राप्त होता है, उसी विराट् के परम व्योम में होने की बात कही जाती है. (८) अप्राणैति प्राणेन प्राणतीनां विराट् स्वराजमभ्येति पश्चात्. विश्वं मृशन्तीमभिरूपां विराजं पश्यन्ति त्वे न त्वे पश्यन्त्येनाम्.. (९) हे ऋषियो! प्राण वायु से हीन विराट् प्राण वायु का सेवन करने वाली प्रजाओं के प्राण के रूप में प्रवेश करता है. इस के पश्चात वह स्वराज को प्राप्त होता है. अनुरूप एवं जीवित विश्व में विराट् को देखा जाता है तथा नहीं भी देखा जाता. (९) को विराजो मिथुनत्वं प्र वेद क ऋतून् क उ कल्पमस्याः. क्रमान् को अस्याः कतिधा विदुग्धान् को अस्या धाम कतिधा व्युष्टीः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

प्रजापति विराट् के मिथुन को जानते हैं. ऋतुओं और कल्पों के जानने वाले भी वे ही हैं. प्रजापति ही इस के क्रमों को जानते हैं कि वे कितने हैं तथा वे ही इस के स्थानों की संख्या जानते हैं. (१०) इयमेव सा या प्रथमा व्यौच्छदास्वितरासु चरति प्रविष्टा. महान्तो अस्यां महिमानो अन्तर्वधूर्जिगाय नवगज्जन्त्री.. (११) वह विराट् ही है, जो सब से पहले उषा के रूप में उत्पन्न हुआ था तथा उसी ने सृष्टि का अंधकार मिटाया था. विराट् से संबंधित उषा ही समस्त उषाओं में प्रवेश कर के प्रकाश करती है. सोम, सूर्य, अग्नि आदि सभी देव विराट् के अधीन हैं. विराट् रूप उषा ही सूर्य की पत्नी है. (११) छन्दः पक्षे उषसा पेपिशाने समानं योनिमनु सं चरेते. सूर्यपत्नी सं चरतः प्रजानती केतुमर्ती अजरे भूरिरेतसा.. (१२) वृद्धावस्था को प्राप्त न होने वाले छंद पक्षी उषा रूपी विराट् के प्रकट होते ही समान कारण का अनुसरण करते हैं. सूर्य की पत्नी उषा ज्योति के वीर्य को जानती है. (१२) ऋतस्य पन्थामनु तिस्र आगुस्त्रयो घर्मा अनु रेत आगुः. प्रजामेका जिन्वत्यूर्जमेका राष्ट्रमेका रक्षति देवयूनाम्.. (१३) सूर्य, चंद्र एवं अग्नि—ये तीनों सत्यों के मार्ग पर चलते एवं शक्ति के अनुसार अपने धर्म का पालन करते हैं. इन तीन में से एक की शक्ति ऋत्विजों को प्राप्त करती है. दूसरी शक्ति बल की वृद्धि करती है और तीसरी शक्ति राष्ट्र की रक्षा करती है. (१३) अग्नीषोमावदधुर्या तुरीयासीद् यज्ञस्य पक्षावृषयः कल्पयन्तः. गायत्रीं त्रिष्टुभं जगतीमनुष्टुभं बृहदर्की यजमानाय स्व राभरन्तीम्.. (१४) अग्नि तथा सोम ने एवं यज्ञ की कल्पना करते हुए ऋषियों ने उस शक्ति को धारण किया जो चौथी थी. इस के पश्चात उस के गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप् और अर्की नामक पद्य बनाए गए. (१४) पञ्च व्युष्टीरनु पञ्च दोहा गां पञ्चनाम्नीमृतवो ऽ नु पञ्च. पञ्च दिशः पञ्चदशेन कॢप्तास्ता एकमूर्ध्नीरभि लोकमेकम्.. (१५) पांच शक्तियों के अनुकूल पांच दोहन, पांच गाएं एवं पांच ऋतुएं बनाई गईं. पांच दिशाएं इन पंद्रह अर्थात् पांच दोहनों, पांच गायों और पांच ऋतुओं के द्वारा समर्थ हुईं. ये योगी के लिए एक लोक के रूप में बनीं. (१५) षड् जाता भूता प्रथमजर्तस्य षडु सामानि षडहं वहन्ति. ebook converter DEMO Watermarks*

षड्योगं सीरमनु सामसाम षडाहुर्द्यावापृथिवीः षडुर्वीः.. (१६) ऋतु अर्थात् सत्य से पहलेपहल छः ने जन्म लिया. छः साम दिन के छः विभागों को वहन करते हैं. छः साम पृथ्वी का अनुगमन करते हैं. धरती, आकाश एवं छः मास ये सब उष्णता से संबंधित हैं. (१६) षडाहुः शीतान् षडु मास उष्णानृतुं नो ब्रूत यतमो ऽ तिरिक्तः. सप्त सुपर्णाः कवयो नि षेदुः सप्त च्छन्दांस्यनु सप्त दीक्षाः.. (१७) छः मास शीत ऋतु के और छः मास ग्रीष्म ऋतु के कहे गए हैं. हमें सत्य बताओ कि उन के अतिरिक्त कौन है. विद्वान् लोग सात सुंदर पर्णों, सात छंदों और सात दीक्षाओं को जानते हैं. (१७) सप्त होमाः समिधो ह सप्त मधूनि सप्तर्तवो ह सप्त. सप्ताज्यानि परि भूतमायन् ताः सप्तगृध्रा इति शुश्रुमा वयम्.. (१८) सात होमों की सात समिधाएं, सात मधु और सात ऋतुएं हैं. पुरुष को सात प्रकार के घृत प्राप्त होते हैं. हम ने ऐसा भी सुना है कि इसी प्रकार गृध्र भी सात हैं. (१८) सप्त च्छन्दांसि चतुरुत्तराण्यन्यो अन्यस्मिन्नध्यार्पितानि. कथं स्तोमाः प्रति तिष्ठन्ति तेषु तानि स्तोमेषु कथमार्पितानि.. (१९) सात छंद और चार उत्तर अर्थात् वेद परस्पर संबंधित हैं. ये दोनों प्रकार के सात एकदूसरे में स्थित हैं. स्तोम उन में किस प्रकार स्थित रहते हैं तथा वे स्तोत्रों में किस प्रकार समाहित हैं? (१९) कथं गायत्री त्रिवृतं व्याप कथं त्रिष्टुप् पञ्चदशेन कल्पते. त्रयस्त्रिंशेन जगती कथमनुष्टुप् कथमेकविंशः.. (२०) त्रिवृत में गायत्री किस प्रकार व्याप्त तथा त्रिष्टुप् पंद्रह वर्णों से किस प्रकार निर्मित होता है. जगती छंद तैंतीस वर्णों से किस प्रकार बनता है और अनुष्टुप् में इक्कीस वर्ण किस प्रकार होते हैं. (२०) अष्ट जाता भूता प्रथमजर्तस्याष्टेन्द्रर्त्विजो दैव्या ये. अष्टयोनिरदितिरष्टपुत्राष्टमीं रात्रिमभि हव्यमेति.. (२१) ऋतु से सर्वप्रथम आठ भूत अर्थात् तत्त्व उत्पन्न हुए. हे इंद्र! वे आठों दिव्य ऋत्विज् हैं. आठ योनियों और आठ पुत्रों वाली अदिति अष्टमी तिथि की रात में हव्य ग्रहण करती हैं. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

इत्थं श्रेयो मन्यमानेदमागमं युष्माकं सख्ये अहमस्मि शेवा. समानजन्मा क्रतुरस्ति वः शिवः स वः सर्वाः सं चरति प्र ऽ जानन्.. (२२) इस प्रकार तुम्हारा समान जन्मा मैं तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर के सुखी हूं और अपने को श्रेयस्कर मानता हूं. कल्याण करने वाला यज्ञ ही तुम सब को जानता हुआ सर्वत्र संचरण करता है. (२२) अष्टेन्द्रस्य षड् यमस्य ऋषीणां सप्त सप्तधा. अपो मनुष्या ३नोषधीस्ताँ उ पञ्चानु सेचिरे.. (२३) इंद्र की आठ, यम की छः और ऋषियों की सतहत्तर जड़ीबूटियां हैं. (२३) केवलिन्द्राय दुदुहे हि गृष्टिवंशं पीयूषं प्रथमं दुहाना. अथातर्पयच्चतुरश्रुतुर्धा देवान् मनुष्यां ३ असुरानुत ऋषीन्.. (२४) इन जड़ीबूटियों को और मनुष्यों को पांच जल सींचते हैं. पहली बार बच्चा देने वाली गाय ने इंद्र के लिए अमृतरूपी दूध दिया. उसी दूध से इंद्र ने देवों, मनुष्यों, ऋषियों एवं असुरों —इन चारों को तृप्त किया. (२४) को नु गौः क एकऋषिः किमु धाम का आशिषः. यक्षं पृथिव्यामेकवृदेकर्तुः कतमो नु सः.. (२५) वह गाय कौन सी है? एक ऋषि कौन है. उन का स्थान क्या है और आशीर्वाद क्या है. पृथ्‍वी पर एक वृत्त और एक ऋतु ही पूजनीय है. वह कौन सी है? (२५) एको गौरैक एकऋषिरेकं धामैकधाशिषः. यक्षं पृथिव्यामेकवृदेकर्तुर्नाति रिच्यते.. (२६) वह धेनु एक ही है. वह ऋषि भी अकेला ही है. वे धाम और आशीर्वाद भी एक ही प्रकार के हैं. पृथ्वी पर एक वृत और एक ऋतु ही पूजनीय है. इन से बढ़ कर कोई भी नहीं है. (२६) सूक्त-१० (१) देवता—विराट् विराड् वा इदमग्र आसीत् तस्या जातायाः सर्वमबिभेदियमेवेदं भविष्यतीति.. (१) प्रारंभ में विराट् ही था. उस के उत्तम होने से सब को भय हुआ कि भविष्य में यह अकेला ही रहेगा. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

सोदक्रामत् सा गार्हपत्ये न्यक्रामत्.. (२) उस विराट् ने उत्क्रम किया. वह जल बन कर गार्हपत्य अग्नि में प्रवेश कर गया. (२) गृहमेधी गृहपतिर्भवति य एवं वेद.. (३) जो गृहपति इस प्रकार जानता है, वह गृहमेधि बन जाता है. (३) सोदक्रामत् साहवनीये न्यक्रामत्.. (४) उस विराट् ने पुनः उत्क्रम किया और आह्वनीय अग्नि में प्रवेश कर गया. (४) यन्त्यस्य देवा देवहूतिं प्रियो देवानां भवति य एवं वेद.. (५) जो इस बात को जानता है, वह देवों का प्रिय हो जाता है और उस के आह्वान पर देवगण पधारते हैं. (५) सोदक्रामत् सा दक्षिणाग्नौ न्यक्रामत्.. (६) उस विराट् ने पुनः उत्क्रम किया और वह दक्षिणाग्नि में प्रवेश कर गया. (६) यज्ञर्तों दक्षिणीयो वासतेयो भवति य एवं वेद.. (७) जो इस बात को जानता है, वह यज्ञ, ऋत और दक्षिणाग्नि में निवास करने वाला बनता है. (७) सोदक्रामत् सा सभायां न्यक्रामत्.. (८) विराट् ने पुनः उत्क्रम किया तथा वह सभा में प्रवेश कर गया. (८) यन्त्यस्य सभां सभ्यो भवति य एवं वेद.. (९) जो इस बात को जानता है, वह सभ्य अर्थात् सभा में बैठने योग्य बनता है और उस की सभा में सभी जाते हैं. (९) सोदक्रामत् सा समितौ न्यक्रामत्.. (१०) उस ने पुनः उत्क्रम किया और वह समिति में प्रवेश कर गया. (१०) यन्त्यस्य समितिं सामित्यो भवति य एवं वेद.. (११) जो इस को जानता है, वह समित्य अर्थात् समिति में सम्मिलित होने योग्य बन जाता है. उस की समिति में सभी सम्मिलित होते हैं. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१० (२) देवता—विराट्

सोदक्रामत् सामन्त्रणे न्यक्रामत्.. (१२) उस विराट् ने पुनः उत्क्रम किया और वह आमंत्रण में प्रवेश कर गया. (१२) यन्त्यस्यामन्त्रणमामन्त्रणीयो भवति य एवं वेद.. (१३) जो इस बात को जानता है, वह आमंत्रणीय अर्थात् आमंत्रण के योग्य बन जाता है और सभी जन उस का आमंत्रण स्वीकार करते हैं. (१३) सूक्त-१० (२) देवता—विराट् सोदक्रामत् सा ऽ न्तरिक्षे चतुर्धा विक्रा ऽ न्तातिष्ठत्.. (१) उस विराट् ने अंतरिक्ष में उत्क्रमण किया और उत्क्रमण कर के वह चार प्रकार से स्थित हुआ. (१) तां देवमनुष्या अब्रुवन्नियमैव तद् वेद यदुभय उपजीवेमेमामुप ह्वयामहा इति.. (२) इस से देवों और मनुष्यों ने कहा— “इसे जो जानता है, वे दोनों ज्ञाता और गेय के सहारे जीवित हैं. हम उन का आह्वान करते हैं.” (२) तामुपाह्वयन्त.. (३) उन्होंने उसे बुलाया. (३) ऊर्ज एहि स्वध एहि सूनृत एहीरावत्येहीति.. (४) हे ऊर्जा! यहां आओ. हे स्वधा! हमारे समीप आओ. हे सूनृता! यहां आओ. हे इरावती! हमारे समीप आओ. (४) तस्या इन्द्रो वत्स आसीद् गायत्र्यभिधान्यभ्रमूध:.. (५) इंद्र उस का बछड़ा बना, गायत्री उस की रस्सी बनी और मेघ उस के थन बनें. (५) बृहच्च रथन्तरं च द्वौ स्तनावास्तां यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च द्वौ.. (६) बृहत् साम और रथंतर साम उस गाय के दो थन थे. उस गाय के शेष दो थन— यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य. (६) ओषधीरेव रथन्तरेण देवा अदुहन् व्यचो बृहता.. (७) eBook converter DEMO Watermarks*

देवों ने गाय के रथंतर रूपी थन से जड़ीबूटियों को और बृहत सामरूपी थन से व्यच को दुहा. (७) अपो वामदेव्येन यज्ञं यज्ञायज्ञियेन.. (८) देवों ने वामदेव्य सामरूपी थन से जल का और यज्ञिय रूपी थन से यज्ञ का दोहन किया. (८) ओषधीरेवास्मै रथंतरं दुहे व्यचो बृहत्.. (९) इस बात को जो जानता है, उस के लिए रथंतर साम जड़ीबूटियां और बृहत् साम अर्थात् व्याप्त आकाश प्रदान करते हैं. (९) अपो वामदेव्यं यज्ञं यज्ञायज्ञियं य एवं वेद.. (१०) इस बात को जानने वाले के लिए वामदेव्य साम जल और यज्ञायज्ञिय साम यज्ञ प्रदान करते हैं. (१०) सूक्त-१० (३) देवता—विराट् सोदक्रामत् सा वनस्पतीनागच्छत् तां वनस्पतयो ऽ घ्नत सा संवत्सरे संभवत्.. (१) उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह वनस्पतियों के समीप पहुंचा. वनस्पतियों ने उस का हनन किया तो वह संवत्सर बन गया. (१) तस्माद् वनस्पतीनां संवत्सरे वृक्णमपि रोहति. वृश्चते ऽ स्याप्रियो भ्रातृव्यो य एवं वेद.. (२) इसी कारण वनस्पतियों का कटा हुआ भाग संवत्सर अर्थात् एक वर्ष में उत्पन्न हो जाता है. जो इस बात को जानता है, उस का शत्रु नाश को प्राप्त होता है. (२) सोदक्रामत् सा पितॄनागच्छत् तां पितरोऽघ्नत सा मासि संभवत्.. (३) उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह पितरों के समीप पहुंचा. पितरों ने उस का हनन किया तो वह विराट् मास बन गया. (३) तस्मात् पितृभ्यो मास्युपमास्यं ददति प्र पितृयाणं पन्थां जानाति य एवं वेद.. (४) इसीलिए प्रतिमास पितरों की उपासना कर के उन्हें भोजन दिया जाता है. जो इस बात ebook converter DEMO Watermarks*

को जानता है, वह पितृयान मार्ग का ज्ञाता होता है. (४) सोद्रक्रामत् सा देवानागच्छत् तां देवा अघ्नत सार्धमासे समभवत्.. (५) उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह देवों के समीप पहुंचा. देवों ने उस का हनन किया, तब पक्ष उत्पन्न हुआ. (५) तस्माद् देवेभ्यो ऽ र्धमासे वषट् कुर्वन्ति प्र देवयानं पन्थां जानाति य एवं वेद.. (६) इसीलिए आधा मास अर्थात् पखवाड़े में देवों के लिए वषट् करते हैं. जो इस बात को जानता है, वह देवयान मार्ग का ज्ञात होता है. (६) सोद्रक्रामत् सा मनुष्या३नागच्छत् तां मनुष्या अघ्नत सा सद्यः समभवत्.. (७) उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह मनुष्यों के समीप पहुंचा. मनुष्यों ने उस का हनन किया तो वह तुरंत ही प्रकट हो गया. (७) तस्मान्मनुष्येभ्य उभयद्युरुप हरन्त्युपास्य गृहे हरन्ति य एवं वेद.. (८) इसीलिए मनुष्यों के लिए दूसरे दिन अपहरण करते हैं. जो इस बात को जानता है, उस के घर में प्रतिदिन अन्न पहुंचाया जाता है. (८) सूक्त-१० (४) देवता—विराट् सोद्रक्रामत् सा ऽ सुरानागच्छत् तामसुरा उपाह्वयन्त माय एहीति.. (१) उस विराट् ने पुनः उत्क्रमण किया और वह असुरों के समीप पहुंचा. असुरों ने उस का आह्वान किया कि हमारे समीप आओ. (१) तस्या विरोचनः प्राह्लादिर्वत्स आसीदयस्पात्रं पात्रम्.. (२) प्रथम आह्वान करने वाला विरोचन उस का वत्स हुआ. लोहे का पात्र उस का पात्र बना. (२) तां द्विमूर्धा ऽ र्त्त्यो ऽ धोक् तां मायामेवाधोक्.. (३) दो सिरों वाले ऋतुपुत्र ने उस का तथा माया का दोहन किया. (३) तां मायामसुरा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (४)

असुर उसी माया के उपजीवी हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब के उपजीवन के योग्य है. (४) सोदक्रामत् सा पितॄनागच्छत् तां पितर उपाह्वयन्त स्वध एहीति.. (५) वह विराट् उत्क्रमण कर के पितरों के समीप पहुंचा. पितरों ने उस का आह्वान किया— “हे स्वधा, आओ.” (५) तस्या यमो राजा वत्स आसीद् रजतपात्रम् पात्रम्.. (६) राजा यम उस के वत्स हुए तथा चांदी का पात्र उस का पात्र हुआ. (६) तामन्तको मार्त्यवो ऽ धोक् तां स्वधामेवाधोक्.. (७) मृत्यु के देवता यमराज ने उस का तथा स्वधा का भी दोहन किया. (७) तां स्वधां पितर उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (८) पितर उस स्वधा के उपजीवी बनते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब के उपजीवन के योग्य बनता है. (८) सोदक्रामत् सा मनुष्या ३ नागच्छत् तां मनुष्या ३ उपह्वयन्तेरावत्येहीति.. (९) वह विराट् उत्क्रमण कर के मनुष्यों के समीप आया. मनुष्यों ने उस का आह्वान करते हुए कहा, “हे इरावती, यहां आओ.” (९) तस्या मनुर्वैवस्वतो वत्स आसीत् पृथिवी पात्रम्.. (१०) वैवस्वत मनु उस के वत्स थे और पृथ्वी उस का पात्र बनी. (१०) तां पृथी वैन्यो ऽ धोक् तां कृषिं च सस्यं चाधोक्.. (११) वेन के पुत्र पृथु ने उस पृथ्वी का दोहन करते हुए उस से फसलें और कृषि प्राप्त की. (११) ते कृषिं च सस्यं च मनुष्या ३ उप जीवन्ति कृष्ट्राधिरुपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१२) मनुष्य उस कृषि और फसल के सहारे जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह कृषि कर्म में कुशल होता है तथा उस के सहारे सब जीवन यापन करते हैं. (१२) eBook converter DEMO Watermarks*

सोदक्रामत् सा सप्तऋषीनागच्छत् तां सप्तऋषय उपाह्वयन्त ब्रह्मण्वत्येहीति.. (१३) उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह सात ऋषियों के समीप पहुंचा. सात ऋषियों ने उस का आह्वान करते हुए कहा—"ब्रह्मणस्पति, आओ." (१३) तस्याः सोमो राजा वत्स आसीच्छन्दः पात्रम्.. (१४) राजा सोम उस के वत्स थे और छंद उस का पात्र था. (१४) तां बृहस्पतिराङ्गिरसो ऽ धोक् तां ब्रह्म च तपश्चाधोक्.. (१५) आंगिरस बृहस्पति ने उस का दोहन किया तथा उस के ब्रह्म और तप का भी दोहन किया. (१५) तद् ब्रह्म च तपश्च सप्तऋषय उप जीवन्ति ब्रह्मवर्चस्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१६) उस ब्रह्म और तप के उपजीवी सात ऋषि होते हैं. जो इस बात को जानता है, वह ब्रह्मवर्चस्व वाला होता है और सभी प्राणियों को उपजीवन देता है. (१६) सूक्त-१० (५) देवता—विराट् सोदक्रामत् सा देवानागच्छत् तां देवा उपाह्वयन्तोज॑ एहीति.. (१) उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह देवों के समीप पहुंचा. देवों ने उस का आह्वान करते हुए कहा—"हे ऊर्जा, आओ." (१) तस्या इन्द्रो वत्स आसीच्चमसः पात्रम्.. (२) उस के वत्स इंद्र हुए और चमस उस का पात्र था. (२) तां देवः सविता ऽ धोक् तामूर्जामेवाधोक्.. (३) सविता देव ने उस का दोहन किया और ऊर्जा को दुहा. (३) तामूर्जां देवा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (४) देवगण उस ऊर्जा के सहारे जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को जीने का सहारा देने योग्य बनता है. (४) सोदक्रामत् सा गन्धर्वाप्सरस आगच्छत् ebook converter DEMO Watermarks*

तां गन्धर्वाप्सरस उपाह्वयन्त पुण्यगन्ध एहीति.. (५) उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह गंधर्वों तथा अप्सराओं के समीप पहुंचा. गंधर्वों और अप्सराओं ने उस का आह्वान करते हुए कहा—“हे पुण्य गंध, आओ.” (५) तस्याश्चित्ररथः सौर्यवर्चसो वत्स आसीत् पुष्करपर्णं पात्रम्.. (६) सूर्यवर्चस का पुत्र उस का वत्स था और पुष्करपर्ण अर्थात् सरोवर का पत्ता उस का पात्र था. (६) तां वसुरुचिः सौर्यवर्चसो ऽ धोक् तां पुण्यमेव गन्धमधोक्.. (७) सूर्यवर्चस के पुत्र वसुरुचि ने उस का दोहन किया और पुण्यगंध को ही दुहा. (७) तं पुण्यं गन्धं गन्धर्वाप्सरस उप जीवन्ति पुण्यगन्धिरुपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (८) गंधर्व और अप्सराएं उस पुण्यगंध को अपने जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को जीवन का आश्रय देने वाला बनता है. (८) सोदक्रामत् सेतरजनानागच्छत् तामितरजना उपाह्वयन्त तिरोध एहीति.. (९) उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह अन्य जनों के समीप गया. अन्य जनों ने उस का आह्वान करते हुए कहा—“हे तिरोधा, आओ.” (९) तस्याः कुबेरो वैश्रवणो वत्स आसीदामपात्रं पात्रम्.. (१०) विश्रवा ऋषि के पुत्र कुबेर उस के वत्स थे और मिट्टी का कच्चा पात्र उस का पात्र था. (१०) तां रजतनाभिः काबेरकोऽधोक् तां तिरोधामेवाधोक्.. (११) रजत नाभि काबेरक ने उस का दोहन किया और उस से तिरोधा को दुहा. (११) तां तिरोधामितरजना उप जीवन्ति तिरो धत्ते सर्वं पाप्मानमुपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१२) अन्य जन तिरोधा को जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब के पापों को तिरोहित करता है और सब को जीवन का सहारा देने वाला बनता है. (१२) सोदक्रामत् सा सर्पानागच्छत् तां सर्पा उपाह्वयन्त विषवत्येहीति.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*