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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

व्याधियों से पूर्ण मूल नक्षत्र मेरे लिए कल्याणकारी हो. (३) अन्नं पूर्वा रासतां मे अषाढा ऊर्जं देव्युत्तरा आ वहन्तु. अभिजिन्मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठाः कुर्वतां सुपुष्टिम्.. (४) जल देवता का पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र मुझे खाने योग्य उत्तम अन्न दे. विश्वे देवों का उत्तराषाढ़ा नक्षत्र हमें बलदायक रस प्रदान करे. ब्रह्म देवता का अभिजित नक्षत्र मुझे पुण्य दे. विष्णु देव का श्रवण नक्षत्र तथा वसु देवता का धनिष्ठा नक्षत्र भी भलीभांति मेरा पालन करे. (४) आ मे महच्छतभिषग् वरीय आ मे द्वया प्रोष्ठपदा सुशर्म. आ रेवती चाश्वयुजौ भगं म आ मे रयिं भरण्य आ वहन्तु.. (५) इंद्र देव का शतभिषा नक्षत्र, अजैकपाद का पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र तथा अहिर्बुध्न्य देव का उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हमारे लिए महान फल दे और सुसज्जित घर प्रदान करे. पूषा देव का रेवती नक्षत्र तथा अश्विनीकुमारों का अश्विनी नक्षत्र मुझे सौभाग्यशाली बनाए. यम देवता का भरणी नक्षत्र मुझे ऐश्वर्य प्रदान करे. (५) सूक्त-८ देवता—नक्षत्र यानि नक्षत्राणि दिव्य १ न्तरिक्षे अप्सु भूमौ यानि नगेषु दिक्षु. प्रकल्पयंश्रन्द्रमा यान्येति सर्वाणि ममैतानि शिवानि सन्तु.. (१) जो नक्षत्र अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में, जलों में, भूमियों तथा पर्वतों पर एवं दिशाओं में हैं तथा चंद्रमा जिन नक्षत्रों को प्रकट करता हुआ उदय होता है, वे नक्षत्र मुझे सुख देने वाले हों. (१) अष्टाविंशानि शिवानि शग्मानि सह योगं भजन्तु मे. योगं प्र पद्ये क्षेमं च क्षेमं प्र पद्ये योगं च नमो ऽहोरात्राभ्यामस्तु.. (२) देखने में सुख देने वाले तथा सुख प्रदान करने वाले जो अट्ठाईस नक्षत्र हैं, वे एकसाथ मिल कर मुझे प्राप्त हों एवं मुझे सुख प्रदान करें. मैं नक्षत्रों की कृपा से अप्राप्त वस्तुओं को प्राप्त करूं तथा प्राप्त वस्तुओं की सुरक्षा कर सकूं. दिन और रात को मेरा नमस्कार है. (२) स्वस्तितं मे सुप्रातः सुसायं सुदिवं सुमृगं सुशकुनं मे अस्तु. सुहवमग्ने स्वस्त्य १ मर्त्य गत्वा पुनरायाभिनन्दन्.. (३) प्रातःकाल मुझे सुख प्रदान करें, सायं काल मुझे सुख प्रदान करे तथा दिनरात मुझे सुखी बनाएं. मैं जिस प्रयोजन संबंधी नक्षत्र में प्रस्थान करूं, उस में हरिण आदि शुभ शकुन के रूप मेरे अनुकूल गति वाले हों. हे अग्नि! सभी नक्षत्रों के देवताओं का अभिनंदन करने वाले एवं अविनश्वर द्युलोक में जा कर हवि देने वाले हम यजमानों और ऋत्विजों को प्रसन्न ebook converter DEMO Watermarks*

करने के हेतु पुनः यहां आओ. (३) अनुहवं परिहवं परिवादं परिक्षवम्. सर्वैर्मे रिक्तकुम्भान् परा तान्तसवितः सुव.. (४) हे सविता देव! कार्य के निमित्त जाते हुए मुझ को तुम सभी नक्षत्रों में अनुभव नाम ले कर पीछे से बुलाना, परिहव नाम ले कर दोनों ओर से पुकारना. परिवाद अर्थात् कठोर भाषण, परिक्षव अर्थात् वर्जित स्थल में प्रवेश व खाली घड़े आदि देखना—अपशकुनों से बचाओ. (४) अपपापं परिक्षवं पुण्यं भक्षीमहि क्षवम्. शिवा ते पाप नासिकां पुण्यगन्ध्राभि मेहताम्.. (५) अहित करने वाली छींक हम से दूर हो. धन प्राप्ति के लिए जाते हुए पुरुष को गीदड़ी का दर्शन, उस का शब्द सुनना तथा नपुंसक का दर्शन—ये सभी हमारे पापों को शांत करने वाले हों. (५) इमा या ब्रह्मणस्पते विषूचीर्वात ईरते. सध्रीचीरिन्द्रा ताः कृत्वा मह्यं शिवतमास्कृधि.. (६) हे ब्रह्मणस्पति इंद्र! ये सभी दिशाएं आंधी के कारण धुंधली हो जाती हैं तथा पता नहीं चलता कि यह कौन सी दिशा है. उन अंधकार से ढकी हुई दिशाओं को मेरे अनुकूल करते हुए कल्याण करने वाली बनाओ. (६) स्वस्ति नो अस्त्वभयं नो अस्तु नमो ऽ होरात्राभ्यामस्तु.. (७) हमारा कल्याण हो तथा हमारा भय दूर हो. दिन और रात के लिए हमारा नमस्कार हो. (७) सूक्त-९ देवता—मंत्र में बताए हुए शान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तमिदमुर्व१न्तरिक्षम्. शान्ता उदन्वतीरापः शान्ता नः सन्त्वोषधीः.. (१) अपने कारण से उत्पन्न दोषों को शांत करता हुआ द्युलोक हमें सुख प्रदान करे. विशाल अंतरिक्ष और पृथ्वी हमें सुख प्रदान करें. सागरों के जल तथा ओषधियां हमें सुख देने वाले हों. (१) शान्तानि पूर्वरूपाणि शान्तं नो अस्तु कृताकृतम्. शान्तं भूतं च भव्यं च सर्वमेव शमस्तु नः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

कार्य से पहले होने वाले कारण मेरे लिए शांत हों. मेरे द्वारा किए गए और न किए गए दुष्कर्म मुझे शांति प्रदान करने वाले हों. भूतकाल के कार्य और भविष्यत् काल के कार्य मेरे लिए शांतिप्रद हों. भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालों से संबंधित सभी कार्य मेरे लिए शांति देने वाले हों. (२) इयं या परमेष्ठिनी वाग् देवी ब्रह्मसंशिता. ययैव ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु नः.. (३) उत्तम स्थान में रहने वाली अथवा ब्रह्मा की पत्नी, मंत्रों के द्वारा भलीभांति उत्तेजित एवं विद्वानों के द्वारा स्वयं अनुभव की गई जो वाग्देवी अथवा सरस्वती हैं, ये शाप देने आदि में भी उच्चारण की जाती हैं—ये हमारे लिए शांति देने वाली हों. (३) इदं यत परमेष्ठिनं मनो वां ब्रह्मसंशितम्. येनैव ससृजे घोरं तेनैव शान्तिरस्तु नः.. (४) परमेष्ठी ने सृष्टि के आदि में मन की रचना की, जो संसार का मूल कारण है. ऐसा ब्रह्म ने कहा है. जिस मन के द्वारा कर्म किया जाता है, उसी मन के द्वारा हमें शांति प्राप्त हो. (४) इमानि यानि पञ्चेन्द्रियाणि मनःषष्ठानि मे हृदि ब्रह्मणा संशितानि. यैरेव ससृजे घोरं तैरेव शान्तिरस्तु नः.. (५) जो पांच ज्ञानेंद्रियां, (आंख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा) हैं, इन के अतिरिक्त मन छठी ज्ञानेंद्रिय है. ये मेरे हृदय में स्थित हैं और चेतन आत्मा इन पर नियंत्रण करता है. इन्हीं के द्वारा घोर कर्म किया जाता है. इन्हीं के द्वारा हमें शांति प्राप्त हो. (५) शं नो मित्रः शं वरुणः शं विष्णुः शं प्रजापतिः. शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो भवत्वर्यमा.. (६) मित्र अर्थात् सूर्य, वरुण, विष्णु, प्रजापति, इंद्र, बृहस्पति और अर्यमा हमें शांति प्रदान करने वाले हों. (६) शं नो मित्रः शं वरुणः शं विवस्वाञ्छमन्तकः. उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षाः शं नो दिविचरा ग्रहाः.. (७) मित्र, वरुण, सूर्य तथा अंतक हमें शांति प्रदान करें. पृथ्वी और अंतरिक्ष में होने वाले उत्पात एवं द्युलोक में संचरण करने वाले गृह हमें शांति प्रदान करें. (७) शं नो भूमिर्वेप्यमाना शमुल्का निर्हतं च यत्. शं गावो लोहितक्षीराः शं भूमिरव तीर्यतीः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

प्राणियों का संहार करने वाले काल के कारण कांपती हुई पृथ्वी हमारे कंपन रूपी दोष को दूर करने वाली बने. ज्वाला के रूप में गिरने वाली उल्काओं के स्थान हमें शांति प्रदान करें. दूध के स्थान पर रक्त देने वाली गाएं तथा फटती हुई धरती हमें शांति प्रदान करे. (८) नक्षत्रमुल्काभिहतं शमस्तु नः शं नोऽभिचाराः शमु सन्तु कृत्याः. शं नो निखाता वल्गाः शमुल्का देशोपसर्गाः शमु नो भवन्तु.. (९) आकाश से गिरती हुई उल्काओं से अपने स्थान से पतित होने वाले नक्षत्र हमें शांति प्रदान करें. शत्रुओं द्वारा हमें मारने के निमित्त किए गए अभिचार कर्म (जादूटोने, टोटके) तथा पिशाचियां हमारे उपद्रवों को शांत करने वाली हों. भूमि खोद कर तथा हड्डी, केश आदि लपेट कर बनाई गई विष पुत्तलिकाएं हमें शांति देने वाली हों. आकाश से गिरने वाली उल्काएं देखने से जो अनिष्ट होता है, उसे उल्काएं ही शांत करें. राष्ट्र में होने वाले विघ्न भी शांत हों. (९) शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा. शं नो मृत्युर्धूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः.. (१०) चंद्र मंडल भेदक मंगल आदि ग्रह हमें शांति प्रदान करें. राहु के द्वारा ग्रसित सूर्य हमारी शक्ति का निमित्त बने. मारक धूमकेतु हमें शांति देने वाला हो. तीक्ष्ण तेज वाले रुद्र हमें शांति देने वाले हों. (१०) शं रुद्राः शं वसवः शमादित्याः शमग्नयः. शं नो महर्षयो देवाः शं देवाः शं बृहस्पतिः.. (११) रुद्र, वायु, आदित्य और अग्नि देव हमारे लिए शांति के कारण बनें. अतिमान तेज वाले सात महर्षि, इंद्र आदि देव और देवों के पुरोहित बृहस्पति हमारी शांति के कारण बनें. (११) ब्रह्म प्रजापतिर्धाता लोका वेदाः सप्तऋषयो ऽग्नयः. तैर्मे कृतं स्वस्त्ययनमिन्द्रो मे शर्म यच्छतु ब्रह्मा मे शर्म यच्छतु. विश्वे मे देवाः शर्म यच्छन्तु सर्वे मे देवाः शर्म यच्छन्तु.. (१२) सच्चिदानंद लक्षण वाला ब्रह्म, प्रजापति, चार मुखों वाले ब्रह्मा, सात लोक, अंगों सहित चार वेद, सात ऋषि तथा तीन अग्नियां मुझे शांति देने वाली हों. इन सब ने मुझे स्वस्त्य यमन अर्थात् शांति प्रदान की है. इंद्र और ब्रह्मा मुझे सुख प्रदान करें. विश्वे देव मुझे सुख प्रदान करें तथा विश्वे देव मुझे सुख प्रदान करें. (१२) यानि कानि चिच्छान्तानि लोके सप्तऋषयो विदुः. सर्वाणि शं भवन्तु मे शं मे अस्त्वभयं मे अस्तु.. (१३) सप्त ऋषि लोक में जिन शक्तियों को जानते थे, वे सब मुझे सुख देने वाली हों, मुझे

सुख प्राप्त हो तथा मुझे सभी से अभय मिले. (१३) पृथिवी शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिर्द्यौः शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे मे देवाः शान्तिः सर्वे मे देवाः शान्तिः शान्तिः शान्तिः शान्तिभिः. ताभिः शान्तिभिः सर्व शान्तिभिः शमयामो ऽ हं यदिह घोरं यदिह क्रूरं यदिह पापं तच्छान्तं तच्छिवं सर्वमेव शमस्तु नः.. (१४) पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्युलोक, जल, ओषधियां, वनस्पतियां तथा सभी देव हमारी अपेक्षा अधिक शक्ति प्राप्त करें. सभी प्रकार की इस शांति प्रक्रिया में यहां जो भयानक और निर्दय फल है, उसे हम दूर करते हैं. ये सभी शांत बन कर हमें कल्याण प्रदान करें. (१४) सूक्त-१० देवता—मंत्र में बताए हुए शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या. शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ.. (१) हे इंद्र और अग्नि! तुम अपनी रक्षा बुद्धि के द्वारा हमारे सकल दुःखों को दूर करने वाले बनो. यजमानों के द्वारा हवि दिए गए इंद्र और वरुण हमारे दुःखों को दूर करें. इंद्र और सोम हमें सुख देने के लिए हमारा दुःख निवारण करें. इंद्र और पूषा देव भयंकर युद्ध में हमारे दुःखों, भयों एवं रोगों का शमन करें. (१) शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शं नः पुरंधिः शमु सन्तु रायः. शं नः सत्यस्य सुयमस्य शंसः शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु.. (२) भग और नराशंस देवता हमारा कल्याण करने वाले हों. हमारी बुद्धि और हमारा धन हमें सुख देने वाले हों. शोभन संयम से युक्त सत्य वचन हमारे दुःख निवारण और सुख देने के हेतु बनें. सब से आरंभ में उत्पन्न अर्यमा देव हमें सुख दें. (२) शं नो धाता शमु धर्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः. शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः शं नो देवानां सुहवानि सन्तु.. (३) सब का निर्माण करने वाले ब्रह्मा तथा वरुण देव हमें सुख देने वाले हों. पृथ्वी अन्नों के साथ हमारे दुःखों का निवारण कर के सुख देने वाली बने. धाता, पृथ्वी एवं पर्वत हमें सुख प्रदान करें. देवताओं की स्तुतियां हमारा कल्याण करें. (३) शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्.

शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वातः.. (४) जिस के मुख में ज्योति है, ऐसी अग्नि हमें सुख देने वाले हों. मित्र, वरुण और अश्विनीकुमार हमारे सुख के कारण बनें. पुण्य कर्म करने वालों के उत्तम कर्म हमें सुख प्रदान करें. गमनशील वायु हमारे सुख के उद्देश्य से चले. (४) शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु. शं न ओषधीर्वनिणो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः.. (५) देवों के द्वारा सब से पहले स्तुति किए गए द्यावा और पृथ्वी हमारा कल्याण करने वाले हों. अंतरिक्ष अर्थात् मध्यम लोक हमारी दृष्टि को सुख देने वाला हो. ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियां तथा वनों के वृक्ष हमारा कल्याण करें. लोकों के पालनकर्ता एवं जयशील इंद्र हमें सुख प्रदान करें. (५) शं न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः. शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाषः शं नस्त्वष्टा ग्नाभिरिह शृणोतु.. (६) वसु नाम के देवों के साथ इंद्र हमें सुख प्रदान करें. शोभन स्तुतियों वाले वरुण आदित्य देवों के साथ हमारा कल्याण करें. सुखकारी रुद्र रुद्रों के साथ हमें सुख दें. त्वष्टा देव सभी देव पत्नियों के साथ इस यज्ञ में हमें सुख प्रदान करने वाले बनें. (६) शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः. शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु शं नः प्रस्व १: शम्वस्तु वेदिः.. (७) निचोड़े गए सोम, स्तोत्रों तथा शंसों वाले मंत्र, सोमलता कुचलने के साधन पत्थर तथा यज्ञ हमारा कल्याण करें. यूपों के समूह हमें सुख दें. चरु और पुरोडाश बनाने में काम आने वाली तथा अधिकता से उत्पन्न होने वाली ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियां हमारा कल्याण करें. यज्ञ की वेदी हमें सुख प्रदान करे. (७) शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु शं नो भवन्तु प्रदिशश्चतस्रः. शं नः पर्वता ध्रुवयो भवन्तु शं नः स्सिन्धवः शमु सन्त्वापः.. (८) फैले हुए तेज वाले सूर्य हमें सुख देने के लिए उदय हों. चारों दिशाएं, स्थिर रहने वाले पर्वत, नदियां और जल हमारा कल्याण करने वाले हों. (८) शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभिः शं नो भवन्तु मरुतः स्वर्काः. शं नो विष्णुः शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः.. (९) देवमाता अदिति व्रतों के साथ हमें सुख देने वाली हों. उत्तम स्तुतियों वाले मरुत् हमारा कल्याण करें. विष्णु, पूषा, अंतरिक्ष अथवा जल हमें सुख देने वाले हों. वायु हमारा कल्याण ebook converter DEMO Watermarks*

करते हुए चलें. (९) शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः. शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शंभुः.. (१०) भयों से रक्षा करते हुए सविता देव हमारे सुख के कारण बनें. सुंदर प्रतीत होती हुई उषाएं हमारा कल्याण करें. वृष्टि करने वाले बादल हमारी प्रजाओं अर्थात् पुत्रों और सेवकों को सुख देने वाले हों. क्षेत्र के स्वामी शंभु हमारा कल्याण करें. (१०) सूक्त-११ देवता—मंत्र में कहे गए शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्तः शमु सन्तु गावः. शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवन्तु पितरो हवेषु.. (१) सत्य का पालन करने वाले देव हमारी शांति के कारण बनें. घोड़े और गाएं हमें शांति देने वाले हों. उत्तम कर्म करने वाले तथा शोभन हाथों वाले देव हमें सुख दें. पितर हमारे स्तोत्रों अथवा मंत्रों को सुन कर सुख देने वाले हों. (१) शं नोः देवा विश्वेदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु. शमभिषाचः शमु रातिषाचः शं नो दिव्याः पार्थिवाः शं नो अप्याः.. (२) विश्वे देव एवं इंद्र आदि देव हमें शांति प्रदान करें. हमारी स्तुतियों के साथ सरस्वती हमें सुख देने वाली हों. यज्ञ में चारों ओर से आने वाले एवं दान के हेतु एकत्र होने वाले देवता हमें शांति दें. देव, पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि तथा आकाश में उड़ने वाले पक्षी हमें सुख दें. (२) शं नो अज एकपाद् देवो अस्तु शमहिर्बुध्न्य १: शं समुद्रः. शं नो अपां नपात् पेरुरस्तु शं नः पृश्निर्रभवतु देवगोपा.. (३) जन्म न लेने वाले तथा स्थावर जंगम रूप एक चरण वाले एकपाद देव हमें शांति प्रदान करें. अहिर्बुध्न्य नाम के देव एवं सागर हमें सुख दें. अपानपात नाम के देव हमें शांति प्रदान करें तथा दुःखों से पार करने वाले हों. देव जिस की रक्षा करते हैं, ऐसी पृश्नि हमारी रक्षा करे. (३) आदित्या रुद्रा वसवो जुषन्तामिदं ब्रह्म क्रियमाणं नवीयः. शृण्वन्तु नो दिव्याः पार्थिवासो गोजाता उत ये यज्ञियासः.. (४) अदिति के पुत्र देव, रुद्र एवं वसु हमारे किए गए इस नवीन स्तोत्र को स्वीकार करें. दिव्य पार्थिव अर्थात् पृथ्वी पर उत्पन्न मनुष्य पशु, वृक्ष आदि, पृश्नि से उत्पन्न मरुत् नाम के देव तथा यज्ञ के योग्य देव हमारी रक्षा करें. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

ये देवानामृत्विजो यज्ञियासो मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः. ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) देवताओं के ऋत्विज्, यज्ञकर्ता, मनु के पुत्र अर्थात् मनुष्य, अमृतत्व को प्राप्त तथा सत्यनिष्ठ देवता हैं, वे आज हमें अधिक यज्ञ प्रदान करें. हे देवताओ! तुम कल्याणकारी रक्षा साधनों से सदा हमारी रक्षा करो. (५) तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शं योरस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम्. अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय.. (६) हे मित्र और वरुण! हमें कहा जाता हुआ फल प्राप्त हो. भयों एवं रोगों से रक्षा करने वाला प्रशंसनीय फल हमें प्राप्त हो. हम धन लाभ और प्रतिष्ठा का अनुभव करें. विशाल एवं सभी देवों के निवासस्थान द्युलोक को नमस्कार है. (६) सूक्त-१२ देवता—उषा उषा अप स्वसुस्तमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता. अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (१) उषा आते ही अपनी बहन रात्रि के अंधकार को दूर कर देती है. इस के पश्चात उषा लौकिक और वैदिक मार्ग को पूर्ण रूप से खोलती है. इस उषा के द्वारा हम देवों द्वारा भली प्रकार दिए हुए एवं हितकारी अन्न को प्राप्त करें. कर्म करने में कुशल पुत्र एवं पौत्र वाले हम सौ वर्षों तक प्रसन्न हों. (१) सूक्त-१३ देवता—इंद्र इन्द्रस्य बाहू स्थविरौ वृषाणौ चित्रा इमा वृषभौ पारयिष्णू. तौ योक्षे प्रथमो योग आगते याभ्यां जितमसुराणां स्वर्ह्यत्.. (१) इंद्र की भुजाएं देवों से वैर करने वाले राक्षसों पर विजय प्राप्त करने वाली, स्थूल तथा अभिमत फल देने वाली हैं. मैं अपने कल्याण के लिए इन भुजाओं का पूजन करता हूं. ये भुजाएं सब के द्वारा प्रशंसनीय, सांडों के समान सबल तथा शत्रुओं का हनन करने में समर्थ हैं. परम ऐश्वर्य संपन्न इंद्र की दोनों भुजाएं सभी उपासकों के लिए पूर्व निश्चित है. मैं अप्राप्त की प्राप्ति अर्थात् योग और प्राप्त के रक्षण अर्थात् क्षेम के लिए इन की पूजा करता हूं. इन भुजाओं ने स्वर्ग के निवासी देवों को बाधा पहुंचाने वाली सेना को पराजित किया है. (१) आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्. संक्रन्दनो ऽ निमिष एकवीरः शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः.. (२) eBook converter DEMO Watermarks*

शीघ्रकारी, अपनी इच्छा पूरी करने में संलग्न, सांड के समान भयंकर, शत्रुओं के हंता, मनुष्यों को क्षुब्ध करने वाले, युद्ध में शत्रुओं का आह्वान करने वाले, आंखें न झपकाने वाले, बिना किसी सहायक के कार्य पूर्ण करने वाले एवं वीर इंद्र ने शत्रुओं की सौ सेनाओं को एक साथ जीत लिया था. (२) संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना ऽ योध्येन दुश्च्यवनेन धृष्णुना. तदिन्द्रेण जयत तत् सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा.. (३) युद्ध में शत्रुओं को रुलाने वाले, निमिषहीन नयनों वाले, जयशील, युद्ध में प्रहार करने वाले, दुःख से विचल करने योग्य, शत्रु का वार सहन करने वाले, धनुर्धारी तथा मनचाही वर्षा करने वाले इंद्र की सहायता से हमें विजय प्राप्त हो. हे योद्धाओ! उन्हीं इंद्र की सहायता शत्रु को पराजित करे. (३) स इषुहस्तैः स निषङ्गिभिर्वशी संस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन. संसृष्टजित् सोमपा बाहुशर्यु १ ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (४) खड्ग धारण करने वाले एवं बाण धारण करने वाले इंद्र अपने वीर अनुचरों को शत्रुओं के सामने भेजते हैं. इंद्र युद्ध की इच्छा से आने वाले शत्रुओं पर इसी प्रकार विजय प्राप्त करते हैं. सोमपान करने वाले इंद्र शत्रुओं के समूहों को जीतने वाले, बाहुबल से युक्त, भयंकर धनुष वाले एवं दूसरों के शरीरों पर मारे गए बाणों से उन के संहारक हैं. हे वीरो! तुम इस प्रकार के इंद्र की सहायता से जय प्राप्त करो. (४) बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान् वाजी सहमान उग्रः. अभिवीरो अभिषत्वा सहोजिज्जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोविदन्.. (५) शत्रुओं के बल को जानने वाले, पुरातन, उग्र, बलवान वीरों के स्वामी, पराजित करने की शक्ति वाले, वेगवान, शत्रुओं को अपमानित करने वाले, शत्रुओं की सेना के विजेता एवं दूसरों की गायों को अपनी जानने वाले हे इंद्र! तुम हमारी सहायता के लिए अपने जयशील रथ पर बैठने योग्य हो. (५) इमं वीरमनु हर्षध्वमुग्रमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम्. ग्रामजितं गोजितं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा.. (६) हे समान बुद्धि और कर्म वाले योद्धाओ! तुम सब इस शत्रु को पराजित करने में समर्थ, वीर एवं उग्र इंद्र को आगे कर के उत्साह वाले बनो. शत्रु के विनाश के लिए उद्योगशील इंद्र के साथ तुम भी उद्योग करो. इंद्र शत्रुओं के समूह के विजेता, शत्रुओं की गायों के विजेता एवं हाथ में वज्र धारण करने वाले हैं. इंद्र शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले एवं अपनी शक्ति से शत्रुओं की सेनाओं का विनाश करने वाले हैं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

अभि गोत्राणि सहसा गाहमानो ऽ दाय उग्रः शतमम्युरिन्द्रः. दुश्च्यवनः पृतनाषाडयोध्यो ३ स्माकं सेना अवतु प्र युत्सु.. (७) इंद्र युद्ध क्षेत्र में अपनी शक्ति से शत्रु सेना के सामने से प्रवेश करने वाले, दयाहीन, क्रोध करने वाले एवं प्रचंड पराक्रमी हैं. ये शत्रुओं की सेना को वश में कर लेते हैं. कोई भी इन्हें युद्ध क्षेत्र से भगाने में समर्थ नहीं है. ये शत्रु सेनाओं को पराजित करने वाले हैं. इन से युद्ध करने में कोई भी समर्थ नहीं है. इस प्रकार के इंद्र युद्धों में हमारी सेना की रक्षा करें. (७) बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्रां अपबाधमानः. प्रभञ्जञ्छत्रून् प्रमृणन्नमित्रानस्माकमेध्यविता तनूनाम्.. (८) हे देवों का पालन करने वाले बृहस्पति! तुम रथ में बैठ कर युद्ध में सभी ओर गमन करो. तुम राक्षसों का वध करने वाले एवं शत्रुओं को बाधा पहुंचाने वाले हो. तुम शत्रुओं को सभी ओर से नष्ट करते हुए एवं उन की हिंसा करते हुए हमारे शरीरों के रक्षक बनो. (८) इन्द्र एषां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः. देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्तु मध्ये.. (९) हमारे शत्रुओं को सामने से नष्ट करने के लिए विजय प्राप्त करने वाली देव सेनाओं के इंद्र नेता हैं. बृहस्पति इन देव सेनाओं की दक्षिण दिशा में चलें. यज्ञ और सोम इन के आगे चलें तथा मरुद्गण इन सेनाओं के मध्य भाग में गमन करें. (९) इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुतां शर्ध उग्रम्. महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (१०) कामनाओं को पूर्ण करने वाले अथवा निरंतर शस्त्रों की वर्षा करने वाले इंद्र, शत्रुओं को युद्ध भूमि से भगाने वाले वरुण, मरुद्गण तथा आदित्य शत्रुओं को वश में करने वाली शक्ति सहित प्रकट हों. आदित्य शत्रुओं को इस लोक से भी दूर भगाने में समर्थ हैं. वे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. सभी देवों की जयध्वनि उठे. (१०) अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु. अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्मान् देवासो ऽ वता हवेषु.. (११) ध्वजाओं वाले संग्रामों के प्राप्त होने पर इंद्र हमारे रक्षक हों. हमारे बाण शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. हमारे वीर उत्तर दिशा में अथवा उत्तम स्थिति में हों. हे देवो! आप सब भी संग्रामों में हमारी रक्षा करो. (११) सूक्त-१४ देवता—द्यावा पृथ्वि इदमुच्छ्रेयो ऽ वसानमागां शिवे मे द्यावापृथिवी अभूताम्. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१५ देवता—इंद्र एवं मंत्र में कहे गए

असपत्नाः प्रदिशो मे भवन्तु न वै त्वा द्विष्मो अभयं.. (१) मैं ने श्रेष्ठ फल के रूप में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है. द्यावा और पृथिवी मुझे उत्तम फल देने वाले हों. पूर्व आदि उत्तम दिशाएं मेरे लिए शत्रु रहित हों. हे विरोधी! मैं तुझ से द्वेष न करूँ, इसलिए मुझे अभय प्राप्त हो. (१) सूक्त-१५ देवता—इंद्र एवं मंत्र में कहे गए यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि. मघवञ्छग्धि तव त्वं न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृधो जहि.. (१) हे अभय करने वाले इंद्र! हम भयभीत हैं. इसलिए हमारे भय के कारण उपद्रव को समाप्त कर के हमें भय रहित बनाइए. हे धनवान इंद्र! तुम अपने रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करने के लिए समर्थ बनो. तुम हमारे शत्रुओं को नष्ट करो तथा हमारे शत्रु संबंधी संग्रामों में हमें विजयी बनाओ. (१) इन्द्रं वयमनूराधं हवामहे ऽ नु राध्यास्म द्विपदा चतुष्पदा. मा नः सेना अरुषीरुप गुर्विषूचीरिन्द्र द्रुहो वि नाशय.. (२) सब अपनेअपने कार्यों की सिद्धि के लिए इंद्र से ही प्रार्थना करते हैं. हम क्रम के अनुसार पूजनीय इंद्र का आह्वान करते हैं. इंद्र की कृपा से हम दो पैरों वाले सेवकों तथा चार पैरों वाले पशुओं से संपन्न बनें. हमारे मन चाहे फल में बाधा डालने वाली शत्रुसेनाएं हमारे सामने न आएं. हे इंद्र! सब स्थानों पर फैली हुई शत्रु सेनाओं का नाश करो. (२) इन्द्रस्त्रातोत वृत्रहा परस्फानो वरेण्यः. स रक्षिता चरमतः स मध्यतः स पश्चात् स पुरस्तान्नो अस्तु.. (३) वृत्र असुर का अथवा जल रोकने वाले मेघ का वध करने वाले इंद्र हमारे रक्षक हों. वरण करने योग्य इंद्र शत्रुओं से हमारी रक्षा करने वाले हैं. वे ही इंद्र अंत में, मध्य में, पीछे और आगे हमारी रक्षा करने वाले हों. (३) उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्व१र्यज्ज्योतिरभयं स्वस्ति. उग्रा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप क्षयेम शरणा बृहन्ता.. (४) हे इंद्र! तुम सब कुछ जानते हो. तुम हमें इहलोक और विस्तृत स्वर्गलोक का सुख प्राप्त कराओ. स्वर्ग को व्याप्त करने वाला प्रकाश हमें भय रहित कर के सुख प्रदान करे. हे इंद्र! तुम महान हो. शत्रुओं का संहार करने में समर्थ, शत्रुओं से रक्षा करने वाली एवं विशाल आप की भुजाओं की हम शरण में जाते हैं. (४) अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे इमे. ebook converter DEMO Watermarks*

अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु.. (५) अंतरिक्ष अर्थात् मध्यमलोक हमें अभय प्रदान करे. ये दोनों द्यावा और पृथ्वी हमें अभय प्रदान करें. पीछे से, आगे से, ऊपर से तथा नीचे से हमें अभय प्राप्त हो. (५) अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं पुरो यः. अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु.. (६) हमें मित्रों से तथा शत्रुओं से अभय प्राप्त हो. हम प्रत्यक्ष और परोक्ष जनों से भयभीत न हों. दिन में और रात में हमें अभय प्राप्त हो. सभी दिशाएं मेरे लिए मित्र के समान हित करने वाली हों. (६) सूक्त-१६ देवता—मंत्र में कहे गए असपत्नं पुरस्तात् पश्चान्नो अभयं कृतम्. सविता मा दक्षिणत उत्तरान्मा शचीपतिः.. (१) हे सब के प्रेरक सविता देव! पूर्व दिशा में हमें शत्रु रहित बनाओ तथा पश्चिम दिशा को भी हमारे शत्रुओं से शून्य कर दो. सविता देव उत्तर दिशा में तथा शची के पति इंद्र दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें. (१) दिवो मादित्या रक्षन्तु भूम्या रक्षन्त्वग्नयः. इन्द्राग्नी रक्षतां मा पुरस्तादश्विना— वभितः शर्म यच्छताम्. तिरश्चीनघ्न्या रक्षतु जातवेदा भूतकृतो मे सर्वतः सन्तु वर्म.. (२) आदित्य अर्थात् अदिति के पुत्र सभी देव द्युलोक में मेरी रक्षा करें. भूमि संबंधी उपद्रवों से तीन अग्नियां मेरी रक्षा करें. इंद्र और अग्नि पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. सूर्य के पुत्र एवं देवों के वैद्य अश्विनीकुमार सभी ओर से मुझे सुख प्रदान करें. जातवेद अग्नि सभी दिशाओं में मेरी रक्षा करें. भूतों और पिशाचों की रक्षा करने वाले देव सभी ओर से हमारी रक्षा करें. (२) सूक्त-१७ देवता—मंत्र में कहे गए अग्निर्मा पातु वसुभिः पुरस्तात् तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (१) पृथ्वी स्थानीय देव अग्नि वसु नाम वाले देवों के साथ पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में और पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें, जहां मैं जाऊं एवं वे मेरा हित साधन करें. मैं सभी प्रकार से रक्षक अग्नि के प्रति समर्पण ebook converter DEMO Watermarks*

करता हूं. यह हवि अग्नि को प्राप्त हो. (१) वायुर्मान्तरिक्षेणैतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये क्रमे तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (२) अंतरिक्ष के स्थायी देवता वायु अंतरिक्ष में एवं पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में और पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें, जहां मैं जाऊं एवं वे मेरा हित साधन करें. मैं वायु के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि वायु को प्राप्त हो. (२) सोमो मा रुद्रैर्दक्षिणाया दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (३) सोम देवता रुद्र नाम के देवों के साथ मिल कर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें, जहां मैं जाऊं. वे मेरा हित साधन करें. मैं सोम के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि सोम को प्राप्त हो. (३) वरुणो मादित्यैः रेतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (४) वरुण आदित्यों के साथ मिल कर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें एवं मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं वरुण के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि वरुण को प्राप्त हो. (४) सूर्यो मा द्यावापृथिवीभ्यां प्रतीच्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (५) सूर्य देवता द्यावा और पृथ्वी के साथ पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा एवं मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं सूर्य देव के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि सूर्य को प्राप्त हो. (५) आपो मौषधीमतीरेतस्या दिशः पान्तु क्रमे तासु श्रये तां पुरं प्रैमि. त् मा रक्षतु सन्तु मा गोपायता तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (६) जल ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों वाली पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने ebook converter DEMO Watermarks*

की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा एवं मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं वायु देव के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि जल को प्राप्त हो. (६) विश्वकर्मा मा सप्तऋषिभिरुदीच्याः दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (७) विश्वकर्मा सप्त ऋषियों के साथ उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने की क्रिया में एवं स्थान में रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा और हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं विश्वकर्मा के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं. यह हवि विश्वकर्मा को प्राप्त हो. (७) इन्द्रो मा मरुत्वानेतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (८) मरुतों से युक्त इंद्र उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान पर मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा और मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं इंद्र के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं. यह हवि इंद्र को प्राप्त हो. (८) प्रजापतिर्मा प्रजननवान्त्सह प्रतिष्ठया ध्रुवाया दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (९) सर्व जगत् को उत्पन्न करने के साधन वाले प्रजापति प्रतिष्ठा के साथ भूमि की दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा और मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं प्रजापति के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं. यह हवि प्रजापति को प्राप्त हो. (९) बृहस्पतिर्मा विश्वैर्देवैरूर्ध्वाया दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (१०) बृहस्पति विश्वे देवों के साथ ऊपर की दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने की क्रिया में तथा पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करे. वे उस नगर में मेरी रक्षा और मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं बृहस्पति के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं. यह आहुति बृहस्पति के लिए हो. (१०) सूक्त-१८ देवता—मंत्र में कहे गए ebook converter DEMO Watermarks*

अग्निं ते वसुवन्तमृच्छन्तु. ये माघा ऽ यवः प्राच्या दिशो ऽ भिदासात्.. (१) जो मेरी हिंसा रूपी पाप की इच्छा करते हैं, वे पूर्व दिशा से आ कर रात्रि की पूजा करने वाले मुझे किसी प्रकार हिंसित न करें. वे शत्रु अपने विनाश के लिए वसु नामक देवों वाली अग्नि के पास जाएं. (१) वायुं ते ३ न्तरिक्षवन्तमृच्छन्तु. ये माघायव एतस्या दिशो ऽ भिदासात्.. (२) दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु पूर्व दिशा से आ कर रात्रि की पूजा करने वाले मेरी हिंसा करें, वे शत्रु अपने विनाश के लिए अंतरिक्ष अधिष्ठान वाली वायु को प्राप्त हों. (२) सोमं ते रुद्रवन्तमृच्छन्तु. ये माघा ऽ यवो दक्षिणाया दिशो ऽ भिदासात्.. (३) दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु दक्षिण दिशा से आ कर रात्रि की पूजा करने वाले मेरी हिंसा करें, वे शत्रु अपने विनाश के लिए रुद्रों का सहयोग प्राप्त करने वाले सोम को प्राप्त हों. (३) वरुणं त आदित्यवन्तमृच्छन्तु. ये माघायव एतस्या दिशो ऽ भिदासात्.. (४) जो दूसरों की हिंसा करने की इच्छा वाले शत्रु हैं, वे दक्षिण दिशा में आ कर रात्रि की पूजा करने वाले मेरी हिंसा करें. वे अपने विनाश के लिए आदित्यों का सहयोग प्राप्त करने वाले वरुण को प्राप्त हों. (४) सूर्यं ते द्यावापृथिवीवन्तमृच्छन्तु. ये माघायव प्रतीच्या दिशो ऽ भिदासात्.. (५) दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु हैं, वे पश्चिम दिशा से आ कर रात्रि की पूजा करने वाले मेरी हिंसा करें, वे अपने विनाश के लिए द्यावा पृथ्वी का सहयोग प्राप्त करने वाले सूर्य को प्राप्त हों. (५) अपस्त ओषधीमतीर्ऋच्छन्तु. ये माघायव एतस्या दिशो ऽ भिदासात्.. (६) दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु हैं, वे पश्चिम दिशा से आ कर रात्रि की उपासना करने वाले मेरी हिंसा करें, वे अपने विनाश की ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों का सहयोग प्राप्त करने वाले जलों को प्राप्त हों. (६) विश्वकर्माणं ते सप्तऋषिवन्तमृच्छन्तु. ebook converter DEMO Watermarks*

ये माघायव उदीच्या दिशो ऽ भिदासात्.. (७) दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु हैं, वे उत्तर दिशा से आ कर रात्रि की अर्चना करने वाले मेरी हिंसा करें, वे सप्त ऋषियों का सहयोग प्राप्त करने वाले विश्वकर्मा को अपने विनाश के हेतु प्राप्त हों. (७) इन्द्रं ते मरुत्वन्तमृच्छन्तु. ये माघायव एतस्या दिशो ऽ भिदासात्.. (८) दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु उत्तर दिशा से आ कर रात्रि की अर्चना करने वाले मेरी हिंसा करें, वे मरुतों का सहयोग प्राप्त करने वाले इंद्र को अपने विनाश के लिए प्राप्त हों. (८) प्रजापतिं ते प्रजननवन्तमृच्छन्तु. ये माघा ऽ यवा ध्रुवाया दिशो ऽ भिदासात्.. (९) दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु पृथ्वी की दिशा से आ कर रात्रि की अर्चना करने वालो मेरी हिंसा करे, वे अपने विनाश के लिए प्रजनन में समर्थ प्रजापति को प्राप्त हों. (९) बृहस्पतिं ते विश्वदेववन्तमृच्छन्तु. ये माघा ऽ यव ऊर्ध्वाया दिशो ऽ भिदासात्.. (१०) दूसरों की हिंसा के इच्छुक जो शत्रु ऊपर की दिशा से आ कर मुझ रात्रि की अर्चना करने वाले की हिंसा करें, वे अपने विनाश के लिए विश्वे देवों से युक्त बृहस्पति को प्राप्त हों. (१०) सूक्त-१९ देवता—मंत्र में कहे गए मित्रः पृथिव्योदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (१) मित्र नाम वाले अग्नि जिस पुर की रक्षा के लिए पृथ्वी से उठते हैं, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं. वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (१) वायुरन्तरिक्षेणोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (२) वायु अंतरिक्ष अर्थात् मध्यम लोक से जिस पुर की रक्षा के लिए अंतरिक्ष से उठते हैं, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं. वह पुर तुम ebook converter DEMO Watermarks*

को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (२) सूर्यो दिवोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (३) सूर्य द्युलोक अर्थात् अपने निवास स्थान से जिस पुर की रक्षा के लिए उठते हैं. उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा सहित प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (३) चन्द्रमा नक्षत्रैरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (४) चंद्रमा नक्षत्रों के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए उदय होता है, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं. वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (४) सोम ओषधीभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (५) सोम ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियों के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (५) यज्ञो दक्षिणाभिरूद्रक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (६) यज्ञ दक्षिणा के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए प्रकट हुआ है, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं. वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात रक्षा प्रदान करे. (६) समुद्रो नदीभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (७) सागर नदियों के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए उद्यत हुआ है, उस शैया युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम्हें सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (७) ब्रह्म ब्रह्मचारिभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

वे ब्रह्म अर्थात् वेद ब्रह्मचारियों सहित जिस पुर की रक्षा के लिए प्रकट हुए हैं, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (८) इन्द्रो वीर्ये ३ णोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (९) इंद्र अपने शक्तिशाली बाहुओं के द्वारा जिस पुर की रक्षा को उद्यत होते हैं, उस शैया युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (९) देवा अमृतेनोदक्रास्तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (१०) सभी देव अमृत के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (१०) प्रजापतिः प्रजाभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तं प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (११) प्रजापति ने मनुष्य आदि के साथ जिस पुर की रक्षा की है, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा सहित प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुझ को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (११) सूक्त-२० देवता—मंत्र में कहे गए अप न्यधुः पौरुषेयं वधं यमिन्द्राग्नी धाता सविता बृहस्पतिः. सोमो राजा वरुणो अश्विना यमः पूषा ऽ स्मान् परि पातु मृत्योः.. (१) शत्रु पुरुषों द्वारा गुप्त रूप से हमारे विरुद्ध जो मृत्यु साधन किया गया है, उस में इंद्र, अग्नि, धाता, सविता, बृहस्पति, सोम, वरुण, अश्विनीकुमार, यम और पूषा हमारे कवचधारी राजा की रक्षा करें. (१) यानि चकार भुवनस्य यस्पतिः प्रजापतिर्मातरिश्वा प्रजाभ्यः. प्रदिशो यानि वसते दिशश्च तानि मे वर्माण बहुलानि सन्तु.. (२) सभी प्राणियों के पालनकर्ता प्रजापति ने मनुष्य, पशु आदि प्रजाओं की रक्षा के लिए जो कवच बनाए हैं तथा सभी दिशाएं, प्रदिशाएं तथा अवांतर दिशाएं जिन कवचों को रक्षा के लिए धारण करती हैं, वे कवच मुझ युद्ध करने के इच्छुक के लिए अधिक संख्या में प्राप्त हों. ebook converter DEMO Watermarks*

(२) यत् ते तनूष्वनह्यन्त देवा द्युराजयो देहिनः. इन्द्रो यच्चक्रे वर्म तदस्मान् पातु विश्वतः.. (३) स्वर्गलोक में विराजमान शरीरधारी देवों ने असुरों से युद्ध करते समय अपने शरीर की रक्षा के लिए जिन कवचों को धारण किया था, इंद्र ने भी जिस कवच को पहना था, वह कवच युद्ध करने के लिए उद्यत हमारी सभी ओर से रक्षा करे. (३) वर्म मे द्यावापृथिवी वर्मार्हवर्म सूर्यः. वर्म मे विश्वे देवाः क्रन् मा मा प्रापत् प्रतीचिका.. (४) द्यावा पृथिवी, अग्नि एवं सूर्य मुझ युद्ध करने के इच्छुक को रक्षा करने वाला कवच प्रदान करे. हमारे अथवा हमारे राजा के समीप शत्रु सेना गुप्त रूप से न पहुंच सके. (४) सूक्त-२१ देवता—इंद्र गायत्र्यु १ ष्णिगुनुष्टुब् बृहती पङ्क्तिस्त्रिष्टुब् जगत्यै.. (१) गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप तथा जगती नाम के छंदों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१) सूक्त-२२ देवता—मंत्र में कहे गए आङ्गिरसानामाद्यैः पञ्चानुवाकैः स्वाहा.. (१) आंगिरसों अर्थात् अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के लिए आरंभ के पांच अनुवाकों के द्वारा यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१) षष्ठाय स्वाहा.. (२) षष्ठ अर्थात छठे के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२) सप्तमाष्टमाभ्यां स्वाहा.. (३) सातवें और आठवें के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (३) नीलनखेभ्यः स्वाहा.. (४) नीले नाखून वालों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

हरितेभ्यः स्वाहा.. (५) हरित नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (५) क्षुद्रेभ्यः स्वाहा.. (६) क्षुद्रों अर्थात् तुच्छ व्यक्तियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (६) पर्यायिकेभ्यः स्वाहा.. (७) पर्यायिकों अर्थात् पर्यायिक नाम वाले ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (७) प्रथमेभ्यः शङ्खेभ्यः स्वाहा.. (८) प्रथम शंख नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (८) द्वितीयेभ्यः शङ्खेभ्यः स्वाहा.. (९) द्वितीय शंख नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (९) तृतीयेभ्यः शङ्खेभ्यः स्वाहा.. (१०) तीसरे शंख नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१०) उपोत्तमेभ्यः स्वाहा.. (११) उपोत्तम अर्थात् उत्तमों के समीपवर्ती ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (११) उत्तमेभ्यः स्वाहा.. (१२) उत्तम ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१२) उत्तरेभ्यः स्वाहा.. (१३) उत्तरवर्ती अर्थात् बाद में होने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१३) ऋषिभ्यः स्वाहा.. (१४) ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१४) शिखिभ्यः स्वाहा.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*