अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूर्य की किरणें सभी प्राणियों को जाग्रत करती हैं. प्राणी सूर्य रूपी इंद्र का दर्शन कर सकें, इसलिए ये किरणें सूर्य को ऊपर उठाती हैं. (१३) अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (१४) जिस प्रकार रात के बीतते ही चोर भाग जाते हैं, उसी प्रकार सूर्य के उदय होते ही आकाश से तारे भाग जाते हैं. (१४) अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (१५) सूर्य की किरणें ज्ञान देने वाली एवं अग्नि के समान दीप्त हैं. ये किरणें मनुष्यों का अनुकरण करती हैं. (१५) तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचन.. (१६) हे इंद्र! तुम संसार रूपी नाव के समान हो. तुम सब को देखने वाले हो, सब को ज्योति प्रदान करते हो और सब के प्रकाशक हो. (१६) प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषीः. प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे.. (१७) हे इंद्र! तुम मनुष्यों और देवों के कल्याण के लिए उदय होते हो. तुम सब के सामने प्रकाशित होते हो. (१७) येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (१८) हे पाप का नाश करने वाले इंद्र! जो पुरुष प्राचीन काल के पुण्यात्मा लोगों के मार्ग पर चलते हैं, तुम उन्हें सदैव कृपा की दृष्टि से देखते हो. (१८) वि द्योमेषि रजस्पृथ्वहर्मिमानो अक्तुभिः. पश्यंजन्मानि सूर्य.. (१९) हे इंद्र! तुम सब पर कृपा करते हो तथा उन्हें देखते हुए रात्रि और दिन का निर्माण करते हो. तुम तीनों लोकों में विचरण करते हो. (१९) सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षणम्.. (२०) हे सूर्यरूपी इंद्र! तुम्हारी चमकती हुई सात किरणें घोड़ों के रूप में तुम्हारे रथ में जुड़ी रहती हैं. वे ही तुम्हारा वहन करती हैं. (२०) अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तभिः.. (२१) इंद्र ने सात घोड़ों को अपने रथ में जोड़ा है. घोड़े इंद्र की इच्छा के अनुसार अपने ढंग से ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-४८ देवता—गौ
आगे बढ़ते हैं. (२१) सूक्त-४८ देवता—गौ अभि त्वा वर्चसा गिरः सिञ्चन्त्या राचरण्युवः. अभि वत्सं न धेनवः.. (१) विचरण करने वाली गाएं, जिस प्रकार अपने बछड़ों के पास जाती हैं, उसी प्रकार हमारी वाणी तुम्हें प्राप्त होती है और तुम्हें सींचती हैं. (१) ता अर्षन्ति शुभ्रियः पृञ्चन्तीर्वर्चसा प्रियः. जातं जात्रीर्यथा हृदा.. (२) जिस प्रकार माता जन्म लेने वाले बच्चे को अपने हृदय से लगा लेती है, उसी प्रकार सुंदर स्तुतियां इंद्र को तेज से सुशोभित करती हैं. (२) वज्रापवसाध्यः कीर्तिर्म्रियमाणमावहन्. मह्यमायुर्घृतं पयः.. (३) ये वज्रधारी इंद्र मुझे यश, आयु, घृत और दूध प्रदान करें. (३) आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (४) ये सूर्य रूपी इंद्र उदयाचल पर पहुंच गए हैं. इन्होंने पूर्व दिशा में दर्शन दे कर सभी प्राणियों को अपनी किरणों से ढक लिया है. इस के लिए उन्होंने स्वर्ग और अंतरिक्ष को वर्षा के जल से खींच कर व्याप्त कर लिया है. वर्षा का जल अमृत के समान है. उस को दुहने के कारण ही इंद्र को गौ कहा जाता है. (४) अन्तश्चरति रोचना अस्य प्राणादपानतः. व्यख्यन्महिषः स्व :.. (५) जो प्राणी प्राण अर्थात् सांस लेने और अपान वायु त्यागने का कार्य करते हैं, उन के शरीर में सूर्य की प्रभा प्राण के रूप में विचरण करती है. सूर्य ही सब लोकों को प्रकाशित करते हैं. (५) त्रिंशद् धामा वि राजति वाक् पतङ्गो अशिश्रियत्. प्रति वस्तोरहर्द्युभिः.. (६) सूर्य की किरणों से तीस मुहूर्त दीप्त होते हैं. वे ही दिन और रात के अंग बनते हैं. वेदों की वाणी सूर्य का उसी प्रकार आश्रय लेती है, जिस प्रकार पक्षी वृक्ष का आश्रय लेते हैं. (६) सूक्त-४९ देवता—इंद्र यच्छक्रा वाचमारुहन्नन्तरिक्षं सिषासथः. सं देवा अमदन् वृषा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! जब स्तुति करने वाले विद्वान् अपनी वाणी का प्रयोग करते हैं, तभी देवता उन पर प्रसन्न होते हैं. (१) शक्रो वाचमधृष्टायोरुवाचो अधृष्णुहि. मंहिष्ठ आ मदैर्दिवि.. (२) वे इंद्र शिष्ट जनों के प्रति कठोर वचन न बोलें. हे अतिशय महान इंद्र! तुम अपनी ज्योति से आकाश को पूर्ण करो. (२) शक्रो वाचमधृष्णुहि धामधर्मन् वि राजति. विमदन् बर्हिरासदन्... (३) हे इंद्र! तुम कठोर वचन मत बोलो. तुम हमारे यज्ञ में आ कर बिछी हुई कुशाओं पर विराजमान होओ तथा प्रसन्न बनो. (३) तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः. अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (४) हे यजमानो! ये इंद्र दुःखों का नाश करने वाले, देखने योग्य एवं सोमरस पी कर प्रसन्न होते हैं. तुम्हारे यज्ञ की सफलता के लिए हम इंद्र की स्तुति करते हैं. सूर्योदय और सूर्यास्त के समय रंभाती हुई गाएं जिस प्रकार अपने बछड़े के पास जाती हैं, उसी प्रकार स्तुतियां करते हुए हम इंद्र की ओर जाते हैं. (४) द्युक्षं सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम्. क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तममीमहे.. (५) दुर्भिक्ष के समय जिस प्रकार सभी जीवधारी कंद, मूल और फल वाले पर्वत की स्तुति करते हैं, उसी प्रकार हम उस की स्तुति करते हैं जो दान करने योग्य, पोषक, गायों से युक्त एवं तेजपूर्ण होता है. (५) तत् त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये. येना यतिभ्यो भृगवे धने हते येन प्रस्कण्वमाविथ.. (६) हे इंद्र! मैं तुम से बल युक्त अन्न की याचना करता हूं. जिस अन्न रूप धन को प्राप्त कर के भृगु ऋषि ने शांति अनुभव की तथा कण्व ऋषि के पुत्र प्रस्कण्व की रक्षा की, हम उसी धन की याचना करते हैं. (६) येना समुद्रमसृजो महीरपस्तदिन्द्र वृष्णि ते शवः. सद्यः सो अस्य महिमा न संनशे यं क्षोणीरनुचक्रदे.. (७) हे इंद्र! जिस बल से तुम ने सागरों को भरने वाले जल की रचना की, वह बल हम को मनचाहा फल देने वाला हो. इंद्र की महिमा को शत्रु प्राप्त नहीं कर सकते. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५० देवता—इंद्र
सूक्त-५० देवता—इंद्र कन्नव्यो अतसीनां तुरो गृणीत मर्त्यः. नही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गृणन्त आनशुः.. (१) जो इंद्र मरणशील मनुष्यों का आकार धारण करने वाले हैं, हे स्तोताओ! उन की स्तुति करो. तुम इंद्र की महिमा का पूर्ण रूप से वर्णन न कर सकोगे और थोड़ा गान कर सकोगे, इस से भी तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी. (१) कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते. कदा हवं मघवन्निन्द्र सुन्वतः कदु स्तुवत आ गमः.. (२) हे इंद्र! कौन सा ऋषि तुम्हारे संबंध में तर्क करता है? किस कारण तुम सोमरस वाले स्तोता के बुलाने पर ही आते हो? सत्य की इच्छा करने वाले देवों का समूह किस कारण तुम्हारी स्तुति करता है? (२) सूक्त-५१ देवता—इंद्र अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे. यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्रेणेव शिक्षति.. (१) हे स्तोताओ! उन स्तोत्रों का उच्चारण करो जो इंद्र को मेरे समीप लाने के कारण बनें. वे इंद्र सहस्र संख्या वाला विशाल धन देते हैं. (१) शतानीकेव प्र जिगाति धृष्णुया हन्ति वृत्राणि दाशुषे. गिरेरिव प्र रसा अस्य पिन्विरे दत्राणि पुरुभोजसः.. (२) हवि देने वाले जो यजमान अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर के उन का वध करते हैं, उन यजमानों के लिए इंद्र का स्वर्ण रूप धन इस प्रकार बरसता है, जिस प्रकार पर्वत से जल निकलता है. (२) प्र सु श्रुतं सुराधसमर्चा शक्रमभिष्टये. यः सुन्वते स्तुवते काम्यं वसु सहस्रेणेव मंहते.. (३) जो स्तोता यज्ञ में अभिषव करता है, इंद्र उसे हजार संख्या वाला धन देते हैं. हे स्तोता! तुम उन्हीं इंद्र की भलीभांति पूजा करो. (३) शतानीका हेतयो अस्य दुष्टरा इन्द्रस्य समिषो महीः. गिरिंन भुज्मा मघवत्सु पिन्वते यदीं सुता अमन्दिषु.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५२ देवता—इंद्र
पापी मनुष्य इंद्र के आयुधों से बच नहीं सकते, क्योंकि इंद्र के आयुध सैकड़ों सेनाओं के समान विनाश करने वाले हैं. भोग प्रदान करने वाला पर्वत अपने पदार्थों से जिस प्रकार संपन्न बनता है, उसी प्रकार तैयार किए हुए सोमरस को पी कर इंद्र शक्ति से पूर्ण हो जाते हैं और यजमान को अन्न प्रदान करते हैं. (४) सूक्त-५२ देवता—इंद्र वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः. पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन् परि स्तोतार आसते.. (१) हे इंद्र! हमारे पास वह सोमरस है जो तैयार करने पर जल के समान तरल हो गया है. हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१) स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः. कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः.. (२) हे इंद्र! सोमरस तैयार करने के बाद यजमान तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम बैल के समान प्यासे हो कर इस सोमरस को पीने के लिए हमारे यज्ञ में कब आओगे? (२) कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद वाजं दर्षि सहस्रिणम्. पिशङ्गरूपं मघवन् विचर्षणे मक्षू गोमन्तममीमहे.. (३) हे इंद्र! तुम शक्तिशाली मनुष्य को भी मार डालते हो तथा उस के धन पर अधिकार कर लेते हो. हम तुम से धन मांगते हैं, जो गौ आदि से युक्त हो. (३) सूक्त-५३ देवता—इंद्र क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद् वयो दधे. अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्यन्धसः.. (१) स्तोत्रों को सुन कर सुंदर ठुड्डी वाले इंद्र प्रसन्न होते हैं और शत्रुओं के नगरों का विनाश कर देते हैं. इस बात को कौन नहीं जानता है कि सोम के तैयार होने पर इंद्र कौन सा वैभव धारण करते हैं. (१) दाना मृगो प वारणः पुरुत्रा चरथं दधे. नकिष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महांश्चरस्योजसा.. (२) हे इंद्र! रथ में बैठ कर तुम हर्षित मृग के समान अनेक प्रकार से गमन करते हो. तुम्हारे गमन को रोकने में कोई भी समर्थ नहीं है. तुम अपनी शक्ति के कारण महान हो. हमारे द्वारा सोमरस तैयार किए जाने पर तुम यहां आओ. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५४ देवता—इंद्र
य उग्रः सन्ननिष्टृत स्थिरो रणाय संस्कृतः. यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्ध्वं नेन्द्रो योषत्या गमत्.. (३) शत्रु जिन की हिंसा नहीं कर पाते, वे युद्धभूमि में डटे रहते हैं. जिस प्रकार पति पत्नी के पास जाता है, उसी प्रकार इंद्र हमारे आह्वान को सुन कर इस यज्ञ में आएंगे. (३) सूक्त-५४ देवता—इंद्र विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरं सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे. क्रत्वा वरिष्ठं वर आमुरिमुतोग्रमोजिष्ठं तवसं तरस्विनम्.. (१) सभी सेनाओं ने शत्रुओं को मूर्च्छित करने वाले इंद्र का वरण किया है. वे इंद्र अत्यधिक शक्तिशाली और उग्र हैं. (१) समीं रेभासो अस्वरन्निन्द्रं सोमस्य पीतये. स्वर्पतिं यदीं वृधे धृतव्रतो ह्योजसा समूतिभिः.. (२) ये स्तोता सोमरस पीने के बाद इंद्र की स्तुति करते हैं. यह सोमरस अपनीअपनी रक्षा शक्ति के साथ इन स्तोताओं की ओर जाता है. (२) नेमिं नमन्ति चक्षसा मेषं विप्रा अभिश्वरा. सुदीतयो वो अद्रुहोऽपि कर्णे तरस्विनः समृक्वभिः.. (३) इंद्र के वज्र पर दृष्टि पड़ते ही स्तोता उन्हें प्रणाम करते हैं. हे स्तोताओ! ऋक्व नाम वाले पितरों सहित, इस वज्र की धमक तुम्हारे कानों को व्यथित न बनाए. (३) सूक्त-५५ देवता—इंद्र तमिन्द्रं जोहवीमि मघवानमुग्रं सत्रा दधानमप्रतिष्कुतं शवांसि. मंहिष्ठो गीर्भिरा च यज्ञियो ववर्तद् राये नो विश्वा सुपथा कृणोतु वज्री.. (१) मैं ऐसे इंद्र को अपने यज्ञ में बुलाता हूं जो शक्तिशाली, वज्र धारण करने वाले, युद्धों में आगे रहने वाले, उग्र, बल धारक एवं स्तुति के योग्य हैं, वे इंद्र हमारे धन प्राप्ति के मार्गों को सुंदर बनाएं. (१) या इन्द्र भुज आभरः स्वर्वाँ असुरेभ्यः. स्तोतारमिन्मघवन्नस्य वर्धय ये च त्वे वृत्तबर्हिषः.. (२) हे इंद्र! तुम स्वर्ग के स्वामी हो. तुम राक्षसों का वध करने के लिए अपनी जिन भुजाओं को उठाते हो, उन्हीं भुजाओं के द्वारा यजमान और स्तोता की वृद्धि करो. जो ऋत्विज् तुम्हारे ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५६ देवता—इंद्र
प्रति श्रद्धा परायण है, तुम उसी को बढ़ाओ. (२) यमिन्द्र दधिषे त्वमश्वं गां भागमव्ययम्. यजमाने सुन्वति दक्षिणावति तस्मिन् तं धेहि मा पणौ.. (३) हे इंद्र! तुम जिस गौ, अश्व आदि को पुष्ट बनाते हो, उसे सोमरस तैयार करने वाले और दक्षिणा देने वाले यजमान को दो, पणियों के समान शत्रुओं को मत दो. (३) सूक्त-५६ देवता—इंद्र इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः. तमिन्महत्स्वाजिषूतेमर्भे हवामहे स वाजेषु प्र नो ऽ विषत्.. (१) वृत्र असुर का वध करने वाले इंद्र को शक्ति और प्रसन्नता के लिए बड़ा किया जाता है. हम उन्हें बड़े और छोटे सभी प्रकार के युद्धों में बुलाते हैं. वे युद्ध के अवसर पर हमारे साथ मिल जाएं. (१) असि हि वीर सेन्यो ऽ सि भूरि पराददिः. असि दभ्रस्य चिद् वृधो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु.. (२) हे वीर इंद्र! तुम शत्रुओं और खंडन करने वाले दुष्टों को दंड देते हो. यज्ञ में जो तुम्हारे निमित्त सोमरस तैयार करता है उसे तुम परम ऐश्वर्य देते हो. (२) यदुदीरत आजयो धृष्णवे धीयते धना. युक्ष्वा मदच्युता हरी कं हनः कं वसौ दधो ऽ स्माँ इन्द्र वसौ दधः (३) हे इंद्र! युद्ध के अवसर पर तुम डराने वाले पुरुष से धन छीनने का प्रयत्न कर रहे होओगे उस समय तुम हरे रंग वाले अथवा हरि नाम के अपने घोड़ों के द्वारा किस का वध करोगे तथा किसे धन दे कर प्रतिष्ठित करोगे? उस समय तुम अपना धन हमें प्रदान करना. (३) मदेमदे हि नो ददिर्यूथा गवामृजुकतुः. सं गृभाय पुरू शतोभयाहस्त्या वसु शिशीहि राय आ भर.. (४) हे इंद्र! तुम्हारा यश सरलता से सभी ओर फैल जाता है. तुम प्रसन्न हो कर हमें गाएं प्रदान करते हो. तुम हमें उत्तम धन दो. (४) मादयस्व सुते सचा शवसे शूर राधसे. विद्मा हि त्वा पुरूवसुमपु कामान्त्ससृज्महे ऽ था नो ऽ विता भव.. (५)
हे वीर इंद्र! हमारे यज्ञ में सोमरस तैयार हो जाने पर तुम प्रसन्न बनो तथा बल धारण करो. हम तुम्हें असीमित शक्ति वाला जानते हैं और तुम्हारी कामना करते हैं. तुम हमारी रक्षा करो. (५) एते त इन्द्र जन्तवो विश्वं पुष्यन्ति वार्यम्. अन्तर्हि ख्यो जनानामर्यो वेदो अदाशुषां तेषां नो वेद आ भर.. (६) हे इंद्र! हम तुम्हारी शक्ति बढ़ाते हैं. जो लोग तुम्हें हवि नहीं देते और तुम्हारी निंदा करते हैं, उन का धन छीन कर तुम हमें दो. (६) सूक्त-५७ देवता—इंद्र सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे. जुहूमसि द्यविद्यवि.. (१) जिस प्रकार गाय को दुहने के लिए गोदोहक को बुलाया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक अवसर पर अपनी रक्षा के लिए हम इंद्र का आह्वान करते हैं. (१) उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब. गोदा इद् रेवतो मदः.. (२) सदा हर्षित रहने वाले एवं धनवान इंद्र गाएं प्रदान करने वाले हैं. हे इंद्र हमारे सोमयाग में आ कर तुम सोमरस का पान करो. (२) अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्. मा नो अति ख्य आ गहि.. (३) हे इंद्र! हम तुम्हारी उत्तम बुद्धि को जानते हैं. तुम दूसरों के द्वारा हमारी निंदा मत कराओ तथा हमारे यज्ञ में पधारो. (३) शुष्मिन्तमं न ऊतये द्युम्निनं पाहि जागृविम्. इन्द्र सोमं शतक्रतो.. (४) हे सैकड़ों कर्मों वाले इंद्र! तुम हमारी रक्षा के लिए शक्ति बढ़ाने वाले इस सोमरस का पान करो. (४) इन्द्रियाणि शतक्रतो या ते जनेषु पञ्चसु. इन्द्र तानि त आ वृणे.. (५) हे बहुत से कर्मों वाले इंद्र! मैं उन शक्तियों का वरण करता हूं जो देवता, पितर आदि में हैं. (५) अगन्निन्द्र श्रवो बृहद् द्युम्नं दधिष्व दुष्टरम्. उत् ते शुष्मं तिरामसि.. (६) हे इंद्र! तुम्हारा असीमित बल हमें प्राप्त हो. तुम हमें वह दमकता हुआ धन प्रदान करो जो शत्रुओं से संघर्ष होने पर हमें विजय दिला सके. हम अपने इस स्तोत्र के द्वारा सोमरस की ebook converter DEMO Watermarks*
वृद्धि करते हुए तुम्हें शक्तिशाली बनाते हैं. (६) अ॒र्वाव॑तो न॒ आ ग॑ह्यथो॑ शक्र परा॒वत॑:. उ॒ लो॒को यस्ते॑ अद्रिव॒ इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि.. (७) हे इंद्र! तुम दूर या पास जहां कहीं हो, वहीं से हमारे समीप आओ. हे वज्रधारी इंद्र! तुम अपने उत्कृष्ट स्वर्गलोक से भी सोमरस पीने के लिए हमारे यज्ञ में आओ. (७) इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग म॒हद् भ॒यम॒भी ष॑दप चुच्यवत्. स हि स्थि॒रो विच॑र्षणि:.. (८) हे ऋत्विज्! इंद्र बड़े से बड़े भय को भी दूर कर देते हैं. उन सूर्य द्रष्टा अर्थात् सब को देखने वाले इंद्र को कोई पराजित नहीं कर सकता. (८) इन्द्र॑श्च मृळया॑ति नो॒ न न॑: प॒श्चाद॒घं न॑शत्. भ॒द्रं भ॑वाति न: पु॒र:.. (९) यदि इंद्र हमारी रक्षा करेंगे तो हमारे दुःख समाप्त हो जाएंगे और सुख हमारे सामने आएंगे. इंद्र सदा मंगल कर्ता हैं. (९) इन्द्र॒ आशा॑भ्य॒स्परि॒ सर्वा॑भ्यो॒ अभ॑यं करत्. जेता॒ शत्रून् विच॑र्षणि:.. (१०) हमारे जो शत्रु सभी दिशाओं में फैले हुए हैं, इंद्र उन सभी को देखते हैं. इंद्र उन भयों को हम से अलग करें, जो सभी दिशाओं और उपदिशाओं से प्राप्त होने वाले हैं. (१०) क ईं॑ वेद सु॒ते सचा॒ पिब॑न्तं॒ कद् वयो॒ दधे॑. अ॒यं य: पु॒रो वि॒भिनत्त्योज॑सा मन्दान: शिप्र्यन्ध॑स:.. (११) इसे कौन जानता है कि सोमरस निचोड़े जाने पर इंद्र कौन से अन्न को धारण करते हैं? हवि रूप अन्न से प्रसन्न हुए इंद्र अपनी शक्ति से शत्रुओं के नगरों का विनाश करते हैं. (११) दा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒ण: पु॑रु॒त्रा च॑रथं दधे. नकि॑ष्ट्वा नि य॑मदा सु॒ते गमो॑ म॒हांश्च॒रस्योज॑सा.. (१२) हे इंद्र! तुम अपने रथ पर सवार हो कर हर्षित बने हुए हिरन के समान अनेक स्थानों पर जाते हो. जब सोमरस निचोड़ा जाता है, उस समय यज्ञ में आने से तुम्हें कोई रोक नहीं सकता. तुम अपने ही बल से महान बन कर घूमते हो. हमारा सोमरस तैयार हो जाने पर तुम हमारे यज्ञ में पधारो. (१२) य उ॒ग्र: सन्ननि॑ष्टृत॒ स्थि॒रो रणा॑य॒ संस्कृ॑त:. यदि॑ स्तो॒तुर्म॑घवा शृ॒णव॒द्वच॒ नेन्द्रो॑ योषत्या गम॑त्.. (१३) इंद्र शक्तिशाली हैं, इसलिए शत्रुओं के युद्ध करने के लिए उद्यत होने पर वे कभी ebook converter DEMO Watermarks*
पराजित नहीं होते. जिस प्रकार पति अपनी पत्नी के पास जाता है, उसी प्रकार इंद्र स्तोता द्वारा बुलाए जाने पर उस के समीप जाते हैं. (१३) वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः. पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन् परि स्तोतार आसते.. (१४) हे इंद्र! तैयार हो जाने पर सोमरस जल के समान तरल हो गया है. इस अवसर पर हम ऋत्विज् तुम्हारे स्तोत्र का गान करते हुए बैठे हैं. (१४) स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः. कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः.. (१५) हे इंद्र! सोमरस तैयार हो जाने पर उक्थ मंत्रों का गान करने वाले ऋत्विज् तुम्हें बुला रहे हैं. प्यासे बैल के समान आप कब हमारा सोमरस पीने के लिए हमारे यज्ञ में पधारेंगे. (१५) कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद वाजं दर्षि सहस्रिणम्. पिशङ्गरूपं मघवन् विचर्षणे मक्षू गोमन्तममीमहे.. (१६) हे धनों को अपने अधीन करने वाले इंद्र! तुम उन व्यक्तियों को भी मर्दित कर देते हो जो सैकड़ों साधनों वाले हैं. हम तुम से वह धन मांगते हैं, जो गायों से संपन्न हो. (१६) सूक्त-५८ देवता—इंद्र श्रायन्त इव सूर्य विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत. वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. (१) नित्य प्रति सूर्य के साथ रहने वाली किरणें जलों के स्वामी इंद्र के साथ भी रहती हैं. हम यह कामना करते हैं कि इंद्र के जल रूपी मेघ विस्तृत हों. जिस प्रकार इंद्र भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों के धनों का विभाजन करते हैं, उसी प्रकार हम उस धन के भाग पर ध्यान देते हैं. (१) अनर्शरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः. सो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन्.. (२) हे स्तोताओ! तुम धन देने वाले इंद्र का सच्चे हृदय से आश्रय लो. इंद्र का दान मंगलमय है, इसलिए तुम उन की स्तुति करो. इंद्र अपने उपासक की कामना पूर्ण करते हैं. स्तुति कर के धन मांगने वाला पुरुष इंद्र के मन को धन देने के लिए आकर्षित करता है. (२) बण्महाँ असि सूर्य बडादित्य महाँ असि. महस्ते सतो महिमा पनस्यते ऽ द्धा देव महाँ असि.. (३)
हे सूर्य रूपी इंद्र! हे आदित्य! तुम्हारे महान होने की बात सत्य है. तुम सत्य रूप वाले हो. तुम्हारी महिमा की प्रशंसा की जाती है, इसलिए तुम्हारे महिमावान होने की बात यथार्थ है. (३) बट् सूर्य श्रवसा महां असि सत्रा देव महां असि. महा देवानामसूर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम्.. (४) हे सूर्य! तुम स्वयं महान हो. हमारे हवि रूप अन्न से तुम्हारी महिमा की वृद्धि हो. तुम अपनी महिमा के कारण ही राक्षसों से संघर्ष करते हो. तुम व्यापक हो. कोई तुम्हारी हिंसा नहीं कर सकता. (४) सूक्त-५९ देवता—इंद्र उदु त्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते. सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव.. (१) ये स्तोत्र एवं गायन योग्य वाणियां उत्पन्न हो रही हैं. धन देने वाली वाणी शत्रुओं पर विजय पाती है. अन्न देने वाली स्तोता की सदा रक्षा करती है. जिस प्रकार रथ अपने स्वामी को गंतव्य पर पहुंचाने के लिए चलता है, उसी प्रकार हमारी ये वाणियां इंद्र को प्रसन्न करने के लिए उन के पास जाएं. (१) कण्वा इव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद्धीतमानशुः. इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमैधासो अस्वरन्.. (२) कण्व गोत्र के ऋषियों की स्तुति जिस प्रकार तीनों लोक के स्वामी इंद्र को प्राप्त होती है, जिस प्रकार द्यावा, अर्यमा आदि सूर्य अपने प्रेरणाप्रद इंद्र से मिलते हैं, उसी प्रकार भृगु वंश के ऋषि इंद्र का आश्रय लेते हैं और प्रिय बुद्धि वाले मनुष्य इंद्र की स्तुति करते हैं. (२) उदिन्वस्य रिच्यतें ऽ शो धनं न जिग्युषः. य इन्द्रो हरिवान्न दभन्ति तं रिपो दक्षं दधाति सोमिनि.. (३) इंद्र का यज्ञ भाग जीते हुए धन के समान होता है. हरि नाम के अथवा हरे रंग के घोड़ों वाले इंद्र की हिंसा नहीं कर सकते. जो यजमान इंद्र को सोमरस देता है, इंद्र उस में बल को स्थापित करते हैं. (३) मन्त्रमखर्वं सुधितं सुपेशसं दधात यज्ञियेष्वेषा. पूर्वीश्चन प्रसितयस्तरन्ति तं य इन्द्रे कर्मणा भुवत्.. (४) हे स्तोताओ! ऐसे यज्ञ संबंधी मंत्रों का उच्चारण करो जो सुंदर, तेज और रूप प्रदान करने में समर्थ हों. इंद्र की सेवा करने वाला मनुष्य सभी बंधनों से छुटकारा पा जाता है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-६० देवता—इंद्र
सूक्त-६० देवता—इंद्र एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः. एवा ते राध्यं मनः.. (१) हे वीर एवं स्थिर इंद्र! तुम दुष्कर्म करने वाले वीरों को रोकते हो. (१) एवा रातिस्तुवीमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः. अधा चिदिन्द्र मे सचा.. (२) हे असीमित धन के स्वामी इंद्र! तुम मेरे सहायक बनो. तुम अपनी पुष्ट करने वाली शक्ति से हम यजमानों में दान करने की शक्ति की स्थापना करो. (२) मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते. मत्वा सुतस्य गोमतः.. (३) हे अन्नों के स्वामी इंद्र! तुम ब्रह्मा के समान आलसी मत बनो. तुम बुद्धि देने वाले तैयार सोमरस के द्वारा अत्यधिक आनंद प्राप्त करो. (३) एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (४) इंद्र की भूमि गाएं प्रदान करने वाली हैं. यह हवि देने वाले यजमान के लिए पकी हुई शाखा के समान बने. (४) एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (५) हे इंद्र! जो यजमान तुम्हें हवि प्रदान करता है, उस के लिए तुम्हारे रक्षा के साधन शीघ्र प्राप्त हो जाते हैं. (५) एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (६) सोमरस का पान करते समय इंद्र को स्तोत्र, उक्थ और शस्त्र नाम की स्तुतियां बहुत प्रिय लगती हैं. (६) सूक्त-६१ देवता—इंद्र तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृत्सु सासहिम्. उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्.. (१) हे वज्रधारी, शत्रुओं को पराजित करने वाले, अश्वों की शोभा से युक्त एवं मनचाहे पदार्थों के वर्षक इंद्र! हम तुम्हारे हवि की पूजा करते हैं. (१) येन ज्योतींष्यायवे मनवे च विवेदिथ. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! जिस सोमरस के प्रभाव से तुमने आयु और मन को तेज प्राप्त कराया था, उसी सोमरस से पुष्ट हो कर तुम उस यजमान के कुशाओं से बने आसन पर बैठो. (२) तदद्या चित्त उक्थिनो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा. वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे.. (३) हे इंद्र! उक्थ नाम के मंत्रों के ये गायक तुम्हारी महिमा का गान कर रहे हैं. तुम धर्म कार्य करते हुए प्रत्येक अवसर पर विजय प्राप्त करो. (३) तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (४) बहुतों ने इन इंद्र की स्तुति की है तथा बहुत से लोगों ने इन का आह्वान किया है. हे स्तोता! तुम इन्हीं इंद्र के यश का गान करो तथा अपनी स्तुति रूपी वाणी से उन्हें प्रतिष्ठित करो. (४) यस्य द्विबर्हसो बृहत् सहो दाधार रोदसी. गिरींरज्ञाँ अपः स्व वृषत्वना.. (५) जिन इंद्र के आश्रय के कारण स्वर्ग और पृथ्वी महान बल, जल, पर्वत और वज्र को धारण करते हैं, उन्हीं इंद्र की तुम पूजा करो. (५) स राजसि पुरुष्टुतं एको वृत्राणि जिघ्नसे. इन्द्र जैत्रा श्रवस्या च यन्तवे.. (६) हे इंद्र! तुम विजय प्राप्त करने वाले यश के कारण तेजस्वी बने हो तथा अकेले ही शत्रुओं का नाश करते हो. (६) सूक्त-६२ देवता—इंद्र वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद् भरन्तोऽवस्यवः. वाजे चित्रं हवामहे.. (१) हे सदा नवीन रहने वाले इंद्र! अन्न प्राप्ति के अवसर पर हम तुम्हारी रक्षा की कामना करते हैं और तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमें विजय प्राप्त कराने के लिए हमारे समीप आओ, हमारे विरोधियों की ओर मत जाओ. जिस प्रकार विजय की कामना से राजा योद्धाओं को बुलाता है, उसी प्रकार हम तुम्हें बुलाते हैं. (१) उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्. त्वामिद्ध्वावितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! कार्य के अवसर पर हम तुम्हारा ही आश्रय लेते हैं. तुम शत्रुओं को वश में करने वाले, नित्य एवं अत्यधिक शक्तिशाली हो. तुम हमें सहायक के रूप में प्राप्त होओ. हम अपनी रक्षा के लिए सखा के रूप में तुम्हारा वरण करते हैं. (२) यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु व स्तुषे. सखाय इन्द्रमूतये.. (३) हे यजमानो! तुम्हारी रक्षा के निमित्त हम इंद्र का आह्वान करते हैं. हमें पहले गौ आदि के रूप में धन प्रदान करने वाले इंद्र मनचाहा फल देने में समर्थ हैं. हम उन्हीं इंद्र की स्तुति करते हैं. (३) हर्यश्वं सत्पतिं चर्षणीसहं स हि ष्मा यो अमन्दत. आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम्.. (४) मैं उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं जो सभी मनुष्यों के रक्षक, हरे रंग के अथवा हरित नाम वाले घोड़ों के स्वामी और सब का नियंत्रण करने वाले हैं. मैं स्तुतियों से प्रसन्न होने वाले इंद्र की स्तुति करता हूं. वे ही इंद्र हम स्तोओं को गाएं तथा घोड़े प्रदान करें. (४) इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत्. धर्मकृते विपश्चिते पनस्यवे.. (५) हे विद्वान् एवं धर्मात्मा स्तुति कर्ताओ! तुम महान इंद्र की स्तुति सोम गान के द्वारा करो. (५) त्वमिन्द्राभिभूरसि त्वं सूर्यमरोचयः. विश्वकर्मा विश्वदेवो महाँ असि.. (६) हे इंद्र! सूर्य को तुम ने ही आकाश में प्रकाशित किया है. तुम शत्रुओं का तिरस्कार करने वाले, विश्वे देव और महान विश्वकर्मा हो. (६) विभ्राजं ज्योतिषा स्व १ रगच्छो रोचनं दिवः. देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे.. (७) हे इंद्र! सभी देवता तुम्हारे मित्र हैं. जो सूर्य स्वर्ग में प्रकाश करते हैं, वे तुम्हारे द्वारा ही ज्योतिमान है. (७) तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (८) हे स्तोताओ! इंद्र को अनेक स्तोता बुला चुके हैं तथा बहुत से स्तोताओं ने इंद्र की स्तुति की है. उन्हीं पराक्रमी इंद्र को तुम भी अपनी स्तुतियों के द्वारा सुशोभित करो. (८) यस्य द्विबर्हसो बृहत् सहो दाधार रोदसी. गिरीरँजाँ अपः स्वर्ष्षत्वना.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
जो इंद्र अपनी महिमा से आकाश, पृथ्वी, जल, पर्वतों, वज्र, बल तथा स्वर्ग को धारण करते हैं, तुम उन्हीं इंद्र का पूजन करो. (९) स राजसि पुरुष्टुतँ एको वृत्राणि जिघ्नसे. इन्द्र जैत्रा श्रवस्या च यन्तवे.. (१०) हे इंद्र! तुम विजय प्राप्त करने वाले यश के लिए तेजस्वी हुए हो. तुम अकेले ही अपने शत्रुओं को नष्ट कर देते हो. (१०) सूक्त-६३ देवता—इंद्र इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवा:. यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह चीक्लृपाति.. (१) यह इंद्र, विश्वे देव और भुवन सुख पाने का प्रयत्न करते हैं. वे इंद्र आदित्यों सहित आ कर हमारे यज्ञ, शरीर और संतान को शक्ति प्रदान करें. (१) आदित्यैरिन्द्रः सगणो मरुद्भिरस्माकं भूत्वविता तनूनाम्. हत्वाय देवा असुरान् यदायन् देवा देवत्वमभिरक्षमाणा:.. (२) जिन देवताओं ने स्वर्ग की रक्षा के लिए राक्षसों का विनाश किया था, वे इंद्र आदित्य और मरुत् हमारे शरीर की रक्षा के लिए हमारे यज्ञ में पधारें. (२) प्रत्यञ्चमर्कमनयंछचीभिरादित् स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्. अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीरा:.. (३) जिन इंद्र ने अपनी शक्ति से सूर्य को प्रत्यक्ष किया तथा पृथ्वी को अन्न वाली बनाया, उन्हीं इंद्र से हम देवताओं का हितकारी अन्न प्राप्त करें तथा वीरों से युक्त रहते हुए सौ वर्षों की आयु प्राप्त करें. (३) य एक इद् विदयते वसु मर्ताय दाशुषे. ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग.. (४) इंद्र हवि देने वाले यजमान को अन्न देते हैं. इस कार्य में कोई भी इंद्र की सहायता नहीं कर सकता. (४) कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्. कदा नः शुश्रवद् गिर इन्द्रो अङ्ग.. (५) वे इंद्र यज्ञ न करने वालों पर अपने चरण का प्रहार कर के उन्हें कब ताड़ना देंगे तथा ebook converter DEMO Watermarks*
हम स्तोताओं की प्रार्थना कब सुनेंगे? (५) यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति. उग्रं तत् पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग.. (६) हे इंद्र! जो पुरुष सोमरस ले कर अनेक स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी प्रार्थना करता है, वह प्रचंड बल और ऐश्वर्य प्राप्त करता है. (६) य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति. येना हंसि न्य १ त्रिणं तमीमहे.. (७) हे इंद्र! तुम सोमरस अत्यधिक पीते हो. उस से बल उत्पन्न होता है. हे इंद्र! तुम अपने जिस बल से असुरों का नाश करते हो, हम तुम से उसी बल की याचना करते हैं. (७) येना दशग्वमधिगुं वेपयन्तं स्वर्णरम्. येना समुद्रमाविथा तमीमहे.. (८) हे इंद्र! जिस बल से तुम ने दशग्व, अधिगु और कांपते हुए स्वर्णरथ की रक्षा की थी तथा सागर को पुष्ट किया था, हम तुम से उसी बल की याचना करते हैं. (८) येन सिन्धुं महीरपो रथां इव प्रचोदयः. पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे.. (९) हे इंद्र! जिस बल से तुम ने जलों को सागर की ओर गमनशील बनाया. हम अमृत के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए उसी बल की याचना करते हैं. (९) सूक्त-६४ देवता—इंद्र एन्द्र नो गधि प्रियः सत्राजिदगोहाः. गिरिर्न विश्वतस्पृथुः पतिर्दिवः.. (१) हे सत्य के द्वारा विजय प्राप्त करने वाले इंद्र! तुम हमारे प्रिय हो. कोई भी तुम्हें ढक नहीं सकता. तुम स्वर्ग के स्वामी हो और तुम्हारा विस्तार स्वर्ग के समान है. तुम हमें अपने प्रिय के रूप में स्वीकार करो. (१) अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी. इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः.. (२) हे इंद्र! तुम यज्ञ में सब के सामने आ कर सोमरस पीते हो तथा आकाश और पृथ्वी दोनों में ही प्रकट होते हो. तुम स्वर्ग के स्वामी हो. जो तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ता है, तुम उस की वृद्धि करते हो. (२) त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि. हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम ने असुरों को मारा और उन के दृढ़ नगरों का विनाश किया है. तुम स्वर्ग के स्वामी हो और मनुष्यों की वृद्धि करते हो. (३) एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः. एवा हि वीर स्तवते सदावृधः.. (४) हे अध्वर्युजनो! शहद से भी अधिक मीठे अन्न से इंद्र को तृप्त करो. ये इंद्र सदा यजमान की वृद्धि करते हुए स्तुतियां स्वीकार करते हैं. (४) इन्द्र स्थातर्हरीणां नकिष्टे पूर्व्यस्तुतिम्. उदानंश शवसा न भन्दना.. (५) हे हरे रंग के अथवा हरि नाम वाले घोड़ों पर सवार होने वाले इंद्र! तुम्हारे पूर्व कर्म के बलों और कल्याणों की कोई समानता नहीं कर सकता. (५) तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः. अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम्.. (६) अन्न की कामना वाले हम अन्न के स्वामी इंद्र को अपने यज्ञ में बुलाते हैं. जिन यज्ञों का अनुष्ठान विधिपूर्वक किया जाता है. उन से इंद्र की सदा वृद्धि होती है. (६) सूक्त-६५ देवता—इंद्र एतो न्विन्द्रं स्तवाम सखाय स्तोम्यं नरम्. कृष्टीर्यो विश्वा अभ्यस्त्येक इत्.. (१) हम स्तुति के योग्य एवं अपने सखा के समान इंद्र से इधर आने के लिए स्तुति करते हैं. ये इंद्र सभी कर्मों के फल प्रदान करते हैं. (१) अगोरुधाय गविषे द्युक्षाय दस्म्यं वचः. घृतात् स्वादीयो मधुनश्च वोचत.. (२) हे स्तोताओ! इन तेजस्वी, देखने योग्य वाणी रूपी अन्न वाले तथा गायों को न रोकने वाले इंद्र के प्रति शहद और घी से भी अधिक मधुर वाणी का उच्चारण करो. (२) यस्यामितानि वीर्या ३ न राधः पर्येतवे. ज्योतिर्न विश्वमभ्यस्ति दक्षिणा.. (३) कार्य साधन के हेतु असीमित शक्ति वाले इंद्र दीप्तिमती दक्षिणा के रूप हैं. (३) सूक्त-६६ देवता—इंद्र स्तुहीन्द्रं व्यश चवदनूर्मिं वाजिनं यमम्. अर्यो गयं मंहमानं वि दाशुषे.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे ऋत्विजो! जो इंद्र अपने रथ से घोड़ों को खोल कर शांत भाव से यज्ञ में बैठते हैं, उन्हीं प्रशंसा के योग्य इंद्र की स्तुति यजमान की कल्याण कामना के लिए करो. (१) एवा नूनमुप स्तुहि वैयश्व दशमं नवम्. सुविद्वांसं चर्कृत्यं चरणीनाम्.. (२) जो इंद्र सदा नवीन, महान और मेधावी हैं, हे यजमान! तुम उन्हीं इंद्र की पूजा करो. (२) वेत्था हि निर्ऋतीनां वज्रहस्त परिवृजम्. अहरहः शुन्ध्युः परिपदामिव.. (३) हे वज्रधारी इंद्र! जिस प्रकार आदित्य अपने सहयोगियों को जानते हैं, उसी प्रकार तुम भी संतप्त करने वाले और शक्तिशाली असुरों को जानते हो. (३) सूक्त-६७ देवता—इंद्र वनोति हि सुन्वन् क्षयं परीणसः सुन्वानो हि ष्मा यजत्यव द्विषो देवानाभव द्विषः सुन्वान इत् सिषासति सहस्रा वाज्यवृतः. सुन्वानायेन्द्रो ददात्याभुवं रयिं ददात्याभुवम्.. (१) सोमरस निचोड़ने वाला यजमान अपने शत्रुओं के साथसाथ देवताओं के शत्रुओं का भी पराभव करता है. वह बहुत से घरों को प्राप्त करता है तथा विविध पदार्थों के दान की इच्छा करता है. वह शत्रुओं से घिरा हुआ नहीं रहता तथा अन्न का स्वामी बनता है. इंद्र उसे पृथ्वी संबंधी सभी धन देते हैं. (१) मो षु वो अस्मदभि तानि पौंस्या सना भूवन् द्युम्नानि मोत जारिषुरस्मत् पुरोत जारिषुः. यद् वश्चित्रं युगेयुगे नव्यं घोषादमर्त्यम्. अस्मासु तन्मरुतो यच्च दुष्टरं दिधृता यच्च दुष्टरम्.. (२) हे मरुतो! तुम्हारा तेज संताप देने वाला है. वह हमारे सामने आ कर हमें जीर्ण न करे. तुम अपने नवीन, चयन योग्य और अविनाशी उस बल को हम में स्थापित करो, जिसे शत्रु कभी प्राप्त नहीं कर सकते. (२) अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसुं सूनुं सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्. य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा. घृतस्य विभ्राष्टिमनु वष्टि शोचिषाजुह्वानस्य सर्पिषः.. (३) अग्नि देव बल देने वाले, देवों के होता, उत्पन्न हुओं के जानने वाले तथा बल के अनुज ebook converter DEMO Watermarks*
हैं. वे अपनी ज्वालाओं से यज्ञ को सुसज्जित करते हैं तथा होम अग्नि में डाली गई घृत की बूंदों तथा उन की दीप्ति की कामना करते हैं. (३) यज्ञैः संमिश्राः पृषतीभिरृष्टिभिर्यामंछुभ्रासो अञ्जिषु प्रिया उत. आसद्या बर्हिर्भरतस्य सूनवः पोत्रादा सोमं पिबता दिवो नरः.. (४) हे स्वर्ग के नेता मरुतो! फल देने के समान तुम अपनी पृषती नाम वाली घोड़ियों के द्वारा यज्ञ में आते हो. तुम इन बिछी हुई कुशाओं पर विराजमान हो कर सोमरस का पान करो. (४) आ वक्षि देवाँ इह विप्र यक्षि चोशन् होतर्नि षदा योनिषु त्रिषु. प्रति वीहि प्रस्थितं सोम्यं मधु पिबाग्नीध्रात् तव भागस्य तृप्णुहि.. (५) हे अग्नि! तुम देवताओं को हमारे इस यज्ञ में ला कर उन का पूजन करो. तुम होता के रूप में पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग तीनों—स्थानों में विराजमान होओ. तुम हवि का भाग सभी देवों को पहुंचा कर स्वयं भी ग्रहण करो तथा मधुर सोमरस पी कर तृप्ति प्रदान करो. (५) एष स्य ते तन्वो नृम्णवर्धनः सह ओजः प्रदिवि बाह्वोर्हितः. तुभ्यं सुतो मघवन् तुभ्यमाभृतस्त्वमस्य ब्राह्मणादा तृपत् पिब.. (६) हे इंद्र! यह सोमरस तुम्हारे शरीर के बल को बढ़ाने वाला है. अन्य सब को वश में करने के लिए तुम्हारी भुजाओं में बल व्याप्त है. हे इंद्र! यह सोमरस निचोड़ा जा कर तुम्हारे पीने के लिए पात्र में रखा है. तुम इसे तब तक पियो, जब तक ब्राह्मण संतुष्ट न हो जाएं. (६) यमु पूर्वमहुवे तमिदं हुवे सेदु हव्यो ददिर्यो नाम पत्यते. अध्वर्युभिः प्रस्थितं सोम्यं मधु पोत्रात् सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः.. (७) मैं पहले के समान ही अपने यज्ञ में इंद्र का आह्वान करता हूं. हे इंद्र! तुम अध्वर्युजनों द्वारा दिए गए इस सोमरस रूपी मधु का पान करो. (७) सूक्त-६८ देवता—इंद्र सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे. जुहूमसि द्यविद्यवि.. (१) जिस प्रकार सरलता से गायों का दूध दुहने के लिए दोहनकर्ता को बुलाया जाता है, उसी प्रकार रक्षा का अवसर आने पर हर बार इंद्र का आह्वान करते हैं. (१) उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब. गोदा इद् रेवतो मदः.. (२) ऐश्वर्य संपन्न इंद्र सदा प्रसन्न रहते हैं और यजमानों को गाएं देते हैं. हे इंद्र! प्रातःकाल, ebook converter DEMO Watermarks*
मध्याह्न और सायंकाल के तीन सवनों में आ कर सोमरस का पान करो. (२) अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्. मा नो अति ख्य आ गहि.. (३) हे इंद्र! तुम्हारी उत्तम बुद्धियों को हम जानते हैं. तुम हमारी निंदा मत होने दो तथा हमारे यज्ञ में आओ. (३) परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्. यस्ते सखिभ्य आ वरम्.. (४) हे स्तोताओ! कोई भी इंद्र की हिंसा नहीं कर सकता. तुम मित्रों का मंगल करने वाले इंद्र का आश्रय लो. (४) उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत. दधाना इन्द्र इद् दुवः (५) हे स्तोताओ! तुम इंद्र का आश्रय ग्रहण करो. इस से निंदा करने वाले हमारी निंदा नहीं कर सकेंगे. (५) उत नः सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः. स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि.. (६) हम इतने यशस्वी बनें कि शत्रु भी हमारे यश का गान करें. इंद्र के द्वारा सुख प्राप्त कर के हम सुंदर कृषि से संपन्न बनें. (६) एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम्. पतयन्मन्दयत् सखम्.. (७) हे स्तोता! ये इंद्र मनुष्यों को प्रसन्न करने वाले मित्रों को मुदित कराने वाले तथा यज्ञ की शोभा के रूप हैं. इन इंद्र के लिए सोमरस अर्पण करो. (७) अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः. प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (८) हे इंद्र! तुम सोमरस पी कर वृत्र असुर के लिए मृत्यु रूप बनो तथा युद्ध क्षेत्र में हमारे ऐश्वर्य की रक्षा करो. (८) तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो. धनानामिन्द्र सातये.. (९) हे इंद्र! तुम सैकड़ों कर्म करने वाले हो! हम हवियों के द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं और धन पाने के लिए तुम्हें अपने यज्ञ में बुलाते हैं. (९) यो रायो ३वनिर्महान्त्सुपारः सुन्वतः सखा. तस्मा इन्द्राय गायत.. (१०) इंद्र धन प्रदान करने वाले एवं धन के रक्षक हैं. इंद्र उस के लिए मित्र के समान हैं जो सोमरस तैयार करता है. हे स्तोताओ! तुम इंद्र की स्तुति करो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*